इस प्रकार यह उत्तर प्रदेश को फिर से एक बार सौभाग्य और श्रेय प्राप्त हुआकि वह कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का केन्द्र बने। इससे पहले फरवरी 1924 में 8 क्रांतिकारियों और कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षड्यंत्र केस चलाया गया था। इसमें प्रमुख नेताओं में एस0ए0 डांगे, शौकत उस्मानी तथा अन्य थे। मेरठ कैदियों का मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में चलाया जा रहा था। यह मुकदमा मेरठ में ही क्यों चलाया गया, कलकत्ता बम्बई किसी अन्य स्थान पर क्यो नहीं? इसके दिलचस्प कारण थे। बम्बई या कलकत्ता जैसी जगहों पर ज्यूरी की व्यवस्था करनी पड़ती जो अंग्रेज सरकार के लिए सरदर्द साबित हो सकती थी। इसके अलावा अंग्रेज सरकार के लिए प्रशासनिक और व्यावहारिक रूप से मेरठ ज्यादा अनुकूल था। फिर एक और कारण यह था कि मेरठ में मजदूर किसान पार्टी की एक शाखा भी थी। वहाँ मुकदमे में आरोपित फिलिप स्प्राट, सोहन सिंह, जोश, मुजफ्फर अहमद, अब्दुल माजिद और सहगल जैसे साथी जा चुके थे और उन पर इस आधार पर आसानी से आरोप लगाए जा सकते थे।
मेरठ जेल में आरम्भ में कैदियों को अलग अलग कोठरियों या सेल्स में रखा गया और उन पर कड़ा पहरा लगाया गया। उनके जरूरी सामान तक उनसे ले लिए गए और पुस्तकंे नहीं दी गईं। आगे चलकर काफी संघर्ष हुआ और दबाव पड़ा। तब जाकर उन्हें काफी बाद में एक बड़े बैरक में रहने की इजाजत मिली। साथ ही कुछ अन्य सुविधाएँ भी मिलीं।
इन 32 कैदियों में उत्तर प्रदेश के मुख्य नेता पी0सी0 जोशी, शौकत उस्मानी, अयोध्या प्रसाद, गौरी शंकर, विश्वनाथ मुखर्जी, धरमवीर सिंह और एच0एल0 कदम। मुकदमे की गूँज सारे देश और दुनिया में मची। मेरठ कैदियों के बचाव के लिए कांग्रेस ने एक विशेष कानूनी समिति बनाई जिसके अन्तर्गत पं0 नेहरू,सम्पूर्णानन्द तथा अन्य लोग और वकील सहायता कर रहे थे। कम्युनिस्टों ने मेरठ के एक जूनियर वकील शिव प्रसाद को भी लगा रखा था जो बहुत कम फीस पर काम कर रहे थे और उन्हें इन कैदियों से लगाव हो गया था। ब्रिटेन और अन्य देशों में भी मेरठ मुकदमे के कैदियों के समर्थन में आन्दोलन और अभियान चल पड़ा। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में एम0पी0 तथा अन्य लोगों ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए जिनका जवाब अंग्रेज सरकार को देते नहीं बना। मेरठ मुकदमा न सिर्फ भारत बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।
1936 का साल सी0पी0आई0 के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। उसी वर्ष लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यह सर्वविदित है कि उसी वर्ष तीन अखिल भारतीय जन संगठनों की स्थापना लखनऊ में की गई। ए0आई0एस0एफ0, अखिल भारतीय किसान सभा और प्रगतिशील लेखक संघ, इस प्रकार यह गौरव भी उत्तर प्रदेश को मिला। इसी समय लखनऊ में ही सी0पी0आई0 की केन्द्रीय समिति की बैठक हुई। यह बड़ी ही महत्वपूर्ण बैठक थी और इसने मेरठ षड्यंत्र केस के बाद सी0पी0आई0 को पुनः संगठित होने में बड़ी मदद की। नोट करने लायक तथ्य यह है कि इस केन्द्रीय समिति की बैठक में एक तीन सदस्यीय पोलित ब्यूरो चुनी गई और वे तीनों ही सदस्य उत्तर प्रदेश ही के थे। वे थे पी0सी0 जोशी, आर0डी0 भारद्वाज और अजय घोष। पी0सी0 जोशी पार्टी के महामंत्री चुने गए। वास्तव में एक तरह से वे पहले से ही महामंत्री का कार्य सँभाल रहे थे। इसके कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश में पार्टी निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया। पोलित ब्यूरो के निर्देश पर अजय घोष कानपुर चले गए। कानपुर उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था। रुद्रदत्त, भारद्वाज को उत्तर प्रदेश का दौरा करके परिस्थिति का जायजा लेने की जिम्मेदारी दी गई। उन पर वारण्ट था, इसलिए उन्हें यह काम छिपकर करना पड़ता था।
भारद्वाज मार्च 1937 में गुप्त रूप से इलाहाबाद गए और वहाँ जेड0ए0 अहमद समेत कई साथियों से मिले। उन्होंने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह कम्युनिस्टों से सम्पर्क करके पार्टी बनाने, की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उनके विचार में कानपुर, बलिया,
इलाहाबाद, बनारस और दूसरी कई जगहों पर कम्युनिस्ट ग्रुप बनाए जा सकते थे। उन्होंने रमेश सिन्हा, जेड0 ए0 अहमद, हाजरा बेगम, हर्षदेव मालवीय, सज्जाद ज़हीर तथा कई अन्य साथियों से सम्पर्क किया। उनके साथ एक बड़े ही होनहार कार्यकर्ता थे जो उनके साथ बम्बई से आए थे, उनका नाम था शरीफ अतहर अली। शरीफ को सम्पर्क करने का काम सौंपकर भारद्वाज वापस बम्बई लौट गए। इलाहाबाद के अलावा आगरा में शिवदान सिंह चैहान और एम0एन0 टण्डन, लखनऊ में नारायन तिवारी और रफीक नकवी, झाँसी में अयोध्या प्रसाद, फिरोजाबाद में अशफाक, रेलवे और दूसरे कई विभागों के मजदूरों में सन्त सिंह युसूफ और कई अन्य नेता एवं कार्यकर्ता उभरने लगे। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस समय जेड0ए0 अहमद उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे और कम्युनिस्ट में भी काम कर रहे थे। यह जानकारी बहुत कम लोगों को है। इस हैसियत से उन्होंने उत्तर प्रदेश का दौरा करके पार्टी बनाने में बड़ी मदद की। 1940 आते-आते उत्तर प्रदेश में मजदूरों, किसानों, बुद्धिजीवियों, छात्रों,नौजवानों इत्यादि के बीच कम्युनिस्ट पार्टी उभरने लगी। जनाधार बढ़ने लगा। बाँदा, बुलन्दशहर, हमीरपुर, गोरखपुर, चैरी-चैरा, अलीगढ़, आजमगढ़, फैजाबाद, गाजीपुर
वगैरह जगहों में पार्टी के दल कायम हो गए। इस प्रक्रिया की परिणति प्रान्तीय कम्युनिस्ट सम्मेलन के रूप में हुई। इलाहाबाद में पहले ही 1936 में प्रांतीय पार्टी कार्यालय गुप्त रूप से स्थापित किया जा चुका था। वह काफी कठिनाई से काम कर रहा था।
उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थापना करने के लिए एक प्रान्त स्तरीय गुप्त सम्मेलन लखनऊ में 1938 में आयोजित किए जाने की जानकारी मिली। पार्टी पर प्रतिबंध होने और सम्मेलन गुप्त रूप से होने के कारण सटीक और विस्तृत जानकारी पाना कठिन था। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। अर्जुन अरोड़ा प्रादेशिक सी0पी0आई0 के प्रथम
सचिव बनाए गए।
इस प्रकार यह उत्तर प्रदेश को फिर से एक बार सौभाग्य और श्रेय प्राप्त हुआकि वह कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का केन्द्र बने। इससे पहले फरवरी 1924 में 8 क्रांतिकारियों और कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षड्यंत्र केस चलाया गया था। इसमें प्रमुख नेताओं में एस0ए0 डांगे, शौकत उस्मानी तथा अन्य थे। मेरठ कैदियों का मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में चलाया जा रहा था। यह मुकदमा मेरठ में ही क्यों चलाया गया, कलकत्ता बम्बई किसी अन्य स्थान पर क्यो नहीं? इसके दिलचस्प कारण थे। बम्बई या कलकत्ता जैसी जगहों पर ज्यूरी की व्यवस्था करनी पड़ती जो अंग्रेज सरकार के लिए सरदर्द साबित हो सकती थी। इसके अलावा अंग्रेज सरकार के लिए प्रशासनिक और व्यावहारिक रूप से मेरठ ज्यादा अनुकूल था। फिर एक और कारण यह था कि मेरठ में मजदूर किसान पार्टी की एक शाखा भी थी। वहाँ मुकदमे में आरोपित फिलिप स्प्राट, सोहन सिंह, जोश, मुजफ्फर अहमद, अब्दुल माजिद और सहगल जैसे साथी जा चुके थे और उन पर इस आधार पर आसानी से आरोप लगाए जा सकते थे।
मेरठ जेल में आरम्भ में कैदियों को अलग अलग कोठरियों या सेल्स में रखा गया और उन पर कड़ा पहरा लगाया गया। उनके जरूरी सामान तक उनसे ले लिए गए और पुस्तकंे नहीं दी गईं। आगे चलकर काफी संघर्ष हुआ और दबाव पड़ा। तब जाकर उन्हें काफी बाद में एक बड़े बैरक में रहने की इजाजत मिली। साथ ही कुछ अन्य सुविधाएँ भी मिलीं।
इन 32 कैदियों में उत्तर प्रदेश के मुख्य नेता पी0सी0 जोशी, शौकत उस्मानी, अयोध्या प्रसाद, गौरी शंकर, विश्वनाथ मुखर्जी, धरमवीर सिंह और एच0एल0 कदम। मुकदमे की गूँज सारे देश और दुनिया में मची। मेरठ कैदियों के बचाव के लिए कांग्रेस ने एक विशेष कानूनी समिति बनाई जिसके अन्तर्गत पं0 नेहरू,सम्पूर्णानन्द तथा अन्य लोग और वकील सहायता कर रहे थे। कम्युनिस्टों ने मेरठ के एक जूनियर वकील शिव प्रसाद को भी लगा रखा था जो बहुत कम फीस पर काम कर रहे थे और उन्हें इन कैदियों से लगाव हो गया था। ब्रिटेन और अन्य देशों में भी मेरठ मुकदमे के कैदियों के समर्थन में आन्दोलन और अभियान चल पड़ा। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में एम0पी0 तथा अन्य लोगों ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए जिनका जवाब अंग्रेज सरकार को देते नहीं बना। मेरठ मुकदमा न सिर्फ भारत बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।
1936 का साल सी0पी0आई0 के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। उसी वर्ष लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यह सर्वविदित है कि उसी वर्ष तीन अखिल भारतीय जन संगठनों की स्थापना लखनऊ में की गई। ए0आई0एस0एफ0, अखिल भारतीय किसान सभा और प्रगतिशील लेखक संघ, इस प्रकार यह गौरव भी उत्तर प्रदेश को मिला। इसी समय लखनऊ में ही सी0पी0आई0 की केन्द्रीय समिति की बैठक हुई। यह बड़ी ही महत्वपूर्ण बैठक थी और इसने मेरठ षड्यंत्र केस के बाद सी0पी0आई0 को पुनः संगठित होने में बड़ी मदद की। नोट करने लायक तथ्य यह है कि इस केन्द्रीय समिति की बैठक में एक तीन सदस्यीय पोलित ब्यूरो चुनी गई और वे तीनों ही सदस्य उत्तर प्रदेश ही के थे। वे थे पी0सी0 जोशी, आर0डी0 भारद्वाज और अजय घोष। पी0सी0 जोशी पार्टी के महामंत्री चुने गए। वास्तव में एक तरह से वे पहले से ही महामंत्री का कार्य सँभाल रहे थे। इसके कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश में पार्टी निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया। पोलित ब्यूरो के निर्देश पर अजय घोष कानपुर चले गए। कानपुर उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था। रुद्रदत्त, भारद्वाज को उत्तर प्रदेश का दौरा करके परिस्थिति का जायजा लेने की जिम्मेदारी दी गई। उन पर वारण्ट था, इसलिए उन्हें यह काम छिपकर करना पड़ता था।
भारद्वाज मार्च 1937 में गुप्त रूप से इलाहाबाद गए और वहाँ जेड0ए0 अहमद समेत कई साथियों से मिले। उन्होंने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह कम्युनिस्टों से सम्पर्क करके पार्टी बनाने, की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उनके विचार में कानपुर, बलिया,
इलाहाबाद, बनारस और दूसरी कई जगहों पर कम्युनिस्ट ग्रुप बनाए जा सकते थे। उन्होंने रमेश सिन्हा, जेड0 ए0 अहमद, हाजरा बेगम, हर्षदेव मालवीय, सज्जाद ज़हीर तथा कई अन्य साथियों से सम्पर्क किया। उनके साथ एक बड़े ही होनहार कार्यकर्ता थे जो उनके साथ बम्बई से आए थे, उनका नाम था शरीफ अतहर अली। शरीफ को सम्पर्क करने का काम सौंपकर भारद्वाज वापस बम्बई लौट गए। इलाहाबाद के अलावा आगरा में शिवदान सिंह चैहान और एम0एन0 टण्डन, लखनऊ में नारायन तिवारी और रफीक नकवी, झाँसी में अयोध्या प्रसाद, फिरोजाबाद में अशफाक, रेलवे और दूसरे कई विभागों के मजदूरों में सन्त सिंह युसूफ और कई अन्य नेता एवं कार्यकर्ता उभरने लगे। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस समय जेड0ए0 अहमद उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे और कम्युनिस्ट में भी काम कर रहे थे। यह जानकारी बहुत कम लोगों को है। इस हैसियत से उन्होंने उत्तर प्रदेश का दौरा करके पार्टी बनाने में बड़ी मदद की। 1940 आते-आते उत्तर प्रदेश में मजदूरों, किसानों, बुद्धिजीवियों, छात्रों,नौजवानों इत्यादि के बीच कम्युनिस्ट पार्टी उभरने लगी। जनाधार बढ़ने लगा। बाँदा, बुलन्दशहर, हमीरपुर, गोरखपुर, चैरी-चैरा, अलीगढ़, आजमगढ़, फैजाबाद, गाजीपुर
वगैरह जगहों में पार्टी के दल कायम हो गए। इस प्रक्रिया की परिणति प्रान्तीय कम्युनिस्ट सम्मेलन के रूप में हुई। इलाहाबाद में पहले ही 1936 में प्रांतीय पार्टी कार्यालय गुप्त रूप से स्थापित किया जा चुका था। वह काफी कठिनाई से काम कर रहा था।
उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थापना करने के लिए एक प्रान्त स्तरीय गुप्त सम्मेलन लखनऊ में 1938 में आयोजित किए जाने की जानकारी मिली। पार्टी पर प्रतिबंध होने और सम्मेलन गुप्त रूप से होने के कारण सटीक और विस्तृत जानकारी पाना कठिन था। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। अर्जुन अरोड़ा प्रादेशिक सी0पी0आई0 के प्रथम
सचिव बनाए गए।
हम भारद्वाज का कुछ उल्लेख कर आए हैं। वे एक असाधारण कम्युनिस्ट थे, दुर्भाग्य से वे मात्र 40 वर्ष की उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुए। उनका जन्म दिसम्बर 1908 में और मृत्यु 8 अप्रैल 1948 को हुई। लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश और भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन पर अपनी अमिट छाप अंकित कर दी। उनके राजनैतिक जीवन का प्रारम्भ पं0 जवाहर लाल नेहरू और पी0सी0 जोशी की देखरेख में हुआ। 1919 में जब महात्मा गांधी पालवाल (आजकल हरियाणा में) में गिरफ्तार कर लिए गए तो रुद्र दत्त भारद्वाज ने बड़ौत (मेरठ) में अपने स्कूल में हड़ताल करवा दी। इसके अगले ही साल तिलक की मृत्यु पर स्कूल में उन्होंने फिर हड़ताल करवाई। गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने फिर हड़ताल करवाई। गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने स्कूल का बहिष्कार कर दिया। पैदल चलकर दिल्ली गए और गांधी जी के आम आह्वान पर उन्होंने दो महीनों तक चरखा चलाया। फिर उनके बड़े भाई देव दत्त भारद्वाज उन्हें वापस ले गए। 1925 के कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में वे सक्रिय कार्यकर्ता बने। बाद में इलाहाबाद और बनारस में पॄे। पी0सी0 जोशी से उनका परिचय 1928 में हुआ। वे जोशी के भाषण से प्रभावितहो गए और उनसे बातें करने गए। फिर उनकी दोस्ती आगे ब़ती गई और वैचारिक विचार विमर्श होता गया। तब भारद्वाज को समझ में आया कि रूसी और फ्रांसीसी क्रांतियों में क्या अन्तर है।
1929 में मेरठ षडयंत्र केस में पी0सी0 जो0शी की गिरफ्तारी के बाद कम्युनिस्ट पर चार और पार्टी बनाने की जिम्मेदारी भारद्वाज पर आ गई। इसी समय उन्हें पं0 नेहरू के साथ यूथ लीग में काम करने का मौका मिला।
आर0डी0 भारद्वाज ने 1931 में एम0ए0 पास किया। साथ ही उन्होंने मेरठ मुकदमे के कैदियों के लिए सक्रिय काम भी किया। पॄाई पूरी करके रुद्रदत्त भारद्वाज बम्बई चले गए जहाँ वे गिरनी कामगार यूनियन तथा नौजवान मजदूर सभा के काम में लग गए। ऐसा उन्होंने मेरठ में गिरफ्तार बम्बई के साथियों के आग्रह पर किया क्योंकि वहाँ काम करने वाले साथियों की जरूरत थी। वे वहाँ बी0बी0 एण्ड सी0आई0 रेलवे की यूनियन के महामंत्री चुने गए। उन्हें कामरेड सर देसाई के साथ काम करने का मौका मिला। भारद्वाज ने बम्बई तथा अन्य जगहों के कपड़ा मिल मजदूरों में बड़ा ही सक्रिय काम किया। फलस्वरूप उन्हें 3 महीनों की जेल की सजा दी गई। फिर रेलवे के मजदूरों में काम के लिए भी ड़े महीने की सजा भुगतनी पड़ी। यह तीस के दशक के आरम्भ की बात है। वे 1934 के बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय कपड़ा मिल मजदूर सम्मेलन में सक्रिय थे। उन्हें फिर अहमदाबाद से दो साल का वारण्ट जारी करके गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें सिन्धु प्रदेश के हैदराबाद में गिरफ्तार रखा गया। 1936 में जेल से छूटने पर पुलिस उन्हें इलाहाबाद ले आई और उनके बड़े भाई देवदत्त भारद्वाज के हवाले कर दिया। देवदत्त लीडर नामक अखबार के सम्पादक थे।
अब आर0डी0 भारद्वाज के राजनैतिक जीवन की अगली मंजिल आरम्भ हुई और वे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में काम करने लगे। उन्हें नागपुर में उसी समय हुई केन्द्रीय समिति की बैठक में समिति का सदस्य बना दिया गया। गुप्त पार्टी कार्यालय बनाकर लखनऊ में वे रहने लगे। फिर पार्टी के दो हिन्दी अखबार उन्होंने प्रकाशित करने शुरू किए। इनके नाम थे साप्ताहिक नया हिन्दुस्तान और मासिक प्रभा। बहुत जल्द ही कानपुर में पार्टी का एक मजबूत केन्द्र स्थापित हो गया। इसमें संत सिंह, यूसुफ, अशोक बोस, सोने लाल, संतोष कपूर, अर्जुन अरोड़ा इत्यादि के साथ भारद्वाज हमेशा तत्परता के साथ शामिल रहते थे।
आगे चलकर रुद्रदत्त भारद्वाज को कठिन जेल जीवन और कष्टमय परिस्थितियों के कारण टी0बी0 हो गया। उनका देहान्त इसी बीमारी के कारण 1948 में हो गया। वे उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि समूचे भारत के एक असाधारण कम्युनिस्ट तथा स्वतंत्रता सेनानी थे। वे सच्चे मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण थे, भले उनका अपना जीवन सुखों से वंचित और विभिन्न प्रकार के दुखों से भरा हुआ था। यह बड़े ही खेद का विषय है कि उनकी जीवनी और योगदान की उपेक्षा कर दी गई है। अब समय आ गया है कि उनके यादों के बारे में विस्तार से जनता को ही नहीं बल्कि स्वयं कम्युनिस्टों को भी अवगत कराया जाए
क्रमश:।





