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Posts Tagged ‘सुनील दत्ता’

सामन्तवाद , साम्प्रदायिकता और अराजक तत्वों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजहब और धर्म के नाम पर लड़ने – झगड़ने वालो को आडे हाथो लेने वाले , गरीबी और नाइंसाफी को देश से उखाड़ फेकने की तमन्ना रखने वाले मानवीय संवेदनाओं और असहाय लोगो की आवाज को जन – जन तक पुह्चाने वाले प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी
पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की फूलपुर तहसील से पांच — छ: किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा गाँव मिजवा | मिजवा गाँव के एक प्रतिष्ठित जमीदार परिवार में उन्नीस जनवरी 1919 को सैयद फतह हुसैन रिज्वी और कनिज फातमा के चौथे बेटे के रूप में अतहर हुसैन रिज्वी का जन्म हुआ | अतहर हुसैन रिज्वी ने आगे चलकर अदब की दुनिया में कैफ़ी आजमी नाम से बेमिशाल सोहरत हासिल की
कैफ़ी की चार बहनों की असामयिक मौत ने कैफ़ी के दिलो — दिमाग पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला |

कैफ़ी के वालिद को आने वाले समय का अहसास हो चुका था | उन्होंने अपनी जमीदारी की देख रेख करने के बजाय गाँव से बाहर निकल कर नौकरी करने का मन बना लिया | उन दिनों किसी जमीदार परिवार के किसी आदमी का नौकरी — पेशे में जाना सम्मान के खिलाफ माना जाता था | कैफ़ी के वालिद का निर्णय घर के लोगो को नागवार गुजरा | वो लखनऊ चले आये और जल्द ही उन्हें अवध के बलहरी प्रांत में तहसीलदारी की नौकरी मिल गयी | कुछ ही दिनों बाद अपने बीबी बच्चो के साथ लखनऊ में एक किराए के मकान में रहने लगे | कैफ़ी के वालिद साहब नौकरी करते हुए अपने गाँव मिजवा से सम्पर्क बनाये हुए थे और गाँव में एक मकान भी बनाया | जो उन दिनों हवेली कही जाती थी |कैफ़ी की चार बहनों की असमायिक मौत ने न केवल कैफ़ी को विचलित किया बल्कि उनके वालिद साहब का मन भी बहुत भारी हुआ | उन्हें इस बात कि आशका हुई कि लडको को आधुनिक तालीम देने के कारण हमारे घर पर यह मुसीबत आ पड़ी है | कैफ़ी के माता — पिता ने निर्णय लिया कि कैफ़ी को दीनी तालीम ( धार्मिक शिक्षा ) दिलाई जाय | कैफ़ी का दाखिला लखनऊ के एक शिया मदरसा सुल्तानुल मदारिस में करा दिया गया | आयशा सिद्दीक ने एक जगह लिखा है कि ” कैफ़ी साहब को उनके बुजुर्गो ने एक दीनी शिक्षा गृह में इस लिए दाखिल किया था कि वह पर फातिहा पढ़ना सीख जायेंगे | कैफ़ी साहब इस शिक्षा गृह में मजहब पर फातिहा पढ़कर निकल गये ” |

” तुम इतना क्यु मुस्कुरा रहे हो , क्या गम है जिसको छुपा रहे हो , गीतों के पक्तियों को आजादी के बाद की पीढ़ी में कौन सा शख्स ऐसा होगा जिसने कभी न गुनगुनाया हो कोई ऐसा भी शख्स है जो यह गीत न गुनगुनाया हो जिससे उसके रोगटे खड़े न हुए हो ” कर चले हम फ़िदा जाने ए वतन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो ” कैफ़ी ने इन गीतों से पूरी दुनिया के आवाम को आवाज दी और कहा ” देश में समाजवाद आया कि नही आया इस पचड़े में क्यों पड़ते हो और तुम अखबारनवीसो को वैसे भी समाजवाद से क्या लेना देना है | एक झोक में इतना बोलने के बाद बोले देखो , ”पेट के भूख और राख के ढेर में पड़ी चिनगारी को कमजोर न समझो ” | जंगल में किसी ने पेड़ काटने से अगर रोका नही तो किसी ने देखा नही | यह समझने के भूल कभी मत करना | गाँव – देहात का हर शख्स , खेती — किसानी से जुडा चेहरा मेहनतकश मजूर हो या खटिया — मचिया पर बैठा कोई अपाहिज , वह तुम्हारी हर चल को देख और समझ रहा है | वह भ्रष्ट अफसर शाही को खूब समझता है पर यह दौर समझने का नही बल्कि समझाने का है | अपने साथियो से मैं हर वक्त यही कहता हूँ — लड़ने से दरो मत , दुश्मन को खूब पहचानो और मौका मिले तो छोडो मत , अपनी माटी के गंध और पहचान को बनाये रखो , अपने हर संघर्ष में आधी दुनिया को मत भूलो , वही तुम्हारे संघर्ष की दुनिया को पूरा मरती है
मागने के आदत बंद करो , छिनने के कूबत पैदा करो | देखो , तुम्हारी कोई समस्या फिर समस्या रह जाएगी क्या ? बोले मेरे घर में तो खैर कट्टरपथि जैसा कोई माहौल कभी नही रहा मगर भइया मैं तो गाँव के मदरसे कभी नही गया | हमे तो होली का हुडदंग और रामायण की चौपाई ही अच्छी लगती थी | कैफ़ी के ये विचार उनको बखूबी बया करती है
” खून के रिश्ते ” यह वाक्य उनके चिंतन विचार शैली और सोच के दिशा का न केवल प्रतीक है बल्कि उनके विशाल व्यक्तित्व के झलक भी दिखलाती है इसी द्र्श्म की झलक हमे उनके इन गीतों से मिलती है
माटी के घर थे , बादल को बरसना था , बरस गये |
गरीबी जलेगी , मुल्क से यह सुनते — सुनते उम्र के सत्तर बरस गये |
समवेदना के धरातल पर दिल को झकझोर देने वाले शायर कैफ़ी की आवाज आज नही तो आने वाले कल शोषित — पीड़ित की आवाज बनकर इस व्यवस्था को झकझोर कर रखेगी ही बस वक्त का इन्तजार है |

सुल्तानुल मदारिस में पढ़ते हुए कैफ़ी साहब 1933 में प्रकाशित और ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जब्त कहानी संग्रह ” अंगारे ” पढ़ लिया था , जिसका सम्पादन सज्जाद जहीर ने किया था | उन्ही दिनों मदरसे की अव्यवस्था को लेकर कैफ़ी साहब ने छात्रो की यूनियन बना कर अपनी मांगो के के साथ हडताल शुरू कर दी | डेढ़ वर्ष तक सुल्तानुल मदरीस बन्द कर दिया गया | परन्तु गेट पर हडताल व धरना चलता रहा | धरना स्थल पर कैफ़ी रोज एक नज्म सुनाते | धरना स्थल से गुजरते हुए अली अब्बास हुसैनी ने कैफ़ी की प्रतिभा को पहचान कर कैफ़ी और उनके साथियो को अपने घर आने की दावत दे डाली | वही पर कैफ़ी की मुलाक़ात एहतिशाम साहब से हुई जो उन दिनों सरफराज के सम्पादक थे | एहतिशाम साहब ने कैफ़ी की मुलाक़ात अली सरदार जाफरी से कराई | सुल्तानुल मदारीस से कैफ़ी साहब और उनके कुछ साथियो को निकाल दिया गया | 1932 से 1942 तक लखनऊ में रहने के बाद कैफ़ी साहब कानपुर चले गये और वह मजदूर सभा में काम करने लगे | मजदूर सभा में काम करते हुए कैफ़ी ने कम्युनिस्ट साहित्य का गम्भीरता से अध्ययन किया | 1943 में जब बम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी का आफिस खुला तो कैफ़ी बम्बई चले गये और वही कम्यून में रहते हुए काम करने लगे सुल्तानुल मदारीस से निकाले जाने के बाद कैफ़ी ने पढ़ना बन्द नही किया | प्राइवेट परीक्षा में बैठते हुए उन्होंने दबीर माहिर ( फार्सी ० दबीर कामिल ( फार्सी ) आलिम ( अरबी ) आला काबिल ( उर्दू ) मुंशी ( फार्सी ) कामिल ( फार्सी ) की डिग्री हासिल कर ली | कैफ़ी के घर का माहौल बहुत अच्छा था | शायरी का हुनर खानदानी था | उनके तीनो बड़े भाई शाइर थे | आठ वर्ष की उम्र से ही कैफ़ी ने लिखना शुरू कर दिया | ग्यारह वर्ष की उम्र में पहली बार कैफ़ी ने बहराइच के एक मुशायरे में गजल पढ़ी | उस मुशायरे की अध्यक्षता मानी जयासी साहब कर रहे थे | कैफ़ी की जगल मानी साहब को बहुत पसंद आई और उन्होंने काफी को बहुत दाद दी |मंच पर बैठे बुजुर्ग शायरों को कैफ़ी की प्रंशसा अच्छी नही लगी और फिर उनकी गजल पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया गया कि क्या यह उन्ही की गजल है ? कैफ़ी साहब को इम्तिहान से गुजरना पडा | मिसरा दिया गया —- ” इतना हंसो कि आँख से आँसू निकल पड़े ‘ फिर क्या कैफ़ी साहब ने इस मिसरे पर जो गजल कही वह सारे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मशहूर हुई | लोगो का शक दूर हुआ ” काश जिन्दगी में तुम मेरे हमसफर होते तो जिन्दगी इस तरह गुजर जाती जैसे फूलो पर से नीमसहर का झोका ”

जिन्दगी जेहद में है , सब्र के काबू में नही ,
नब्जे हस्ती का लहू , कापते आँसू में नही ,
उड़ने खुलने में है निकहत , खमे गेसू में नही ,
जन्नत एक और है जो मर्द के पहलु में नही |

उसकी आजाद रविश पर भी मचलना है तुझे , उठ मेरी जान , मेरे साथ ही चलना है तुझे | ( कैफ़ी )

कामरेड अतुल अनजान कहते है कि कैफ़ी साहब साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे | लोकतंत्र के जबर्दस्त हामी थे | गरीब मजदूरो , किसानो के सबसे बड़े पैरोकार थे | मार्क्सवादी दर्शन तथा वैज्ञानिक समाजवाद में उनकी जबर्दस्त आस्था थी | आवाज बड़े बुलंद थी | गम्भीर बातो को भी बड़ी आसानी से जनता के सामने रखने की अद्भुँत क्षमता थी | शब्दों का प्रयोग बहुत सोच समझकर नपे – तुले अंदाज में रखते थे | इसीलिए वे आवामी शायर थे | इसीलिए उनकी पहचान और मकबूलियत देश परदेश में थी | इतना विशाल व्यक्तित्व और अत्यंत सादे और सरल | यही थे कामरेड कैफ़ी | मेरे जीवन में साहित्यिक अभिरुचि बनाये रखने के प्रेरणा स्रोत थे कामरेड कैफ़ी | –
कैफ़ी एक ऐसे संवेदनशील शयर थे जिन्हें मुंबई की रगिनियत बाँध न सकी | जिले के कई नामवर मुंबई से लेकर इडियन द्वीप बार्वाडोस और सूरीनाम ,अमेरिका ,जापान तक गये लेकिन वही के होकर वहा रह गये | कई लोगो ने मुंबई को व्यवसायिक ठिकाना बनाया और जिले के मिटटी के प्रति प्रेम उपजा तो चंद नोटों की गद्दिया चंदे के नाम व हिकारत की नजर से यहाँ के लोगो को सौप दी ; लेकिन कैफ़ी इसके अपवाद साबित हुए | उन्होंने एक शेर में जिक्र भी किया है
” वो मेरा गाँव है वह मेरे गाँव के चूल्हे कि जिनमे शोले तो शोले धुँआ नही उठता ”
कैफ़ी ने जिन्दगी के आखरी वकत को बड़ी सिद्दत के साथ अपने गाँव मिजवा की तरक्की के नाम दिए | लकवाग्रस्त शरीर जो की व्हील चेयर पर सिमट गया था , के वावजूद उन्होंने यहाँ के विकास के ऐसे सपने सजोये थे , जो एक कृशकाय शरीर को देखते हुए कल्पित ख़्वाब की तरह नजर आता था | लेकिन कैफ़ी ने अपने अपाहिज शरीर को आडे आने नही दिया | उन्होंने मिजवा में बालिका डिग्री कालेज खोलने का सपना देखा था वो तो साकार नही हो पाया लेकिन आज मिजवा में बालिकाओं का माध्यमिक विद्यालय उनके सपने को साकार करने का रह का सेतु बना | इस विद्यालय में बालिकाओ को कधी , बुनाई से लेकर आधुनिक दुनिया से लड़ने के लिए कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है |
कैफ़ी का मानना था कि ” अपनी मिटटी से कटा व्यक्ति किसी का भी नही हो सकता | जमीदार के घर में पैदा होने और लखनऊ के शायराना फिजा में पलने — बढने के वावजूद कैफ़ी को मुज्वा की बुनियादी जरूरते अक्सर खिचती रहती थी |
पतेह मंजिल नाम लोगो की जुबान पर बसे कैसी का यह आशियाना आज भी कैफ़ी की यादो का चिराग बना हुआ है और आने वाले सदियों तक बना रहेगा |

अजीब आदमी था वो ——–

मुहब्बतों का गीत था बगावतो का राग था
कभी वो सिर्फ फूल था कभी वो सिर्फ आग था
अजीब आदमी था वो
वो मुफलिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते है
वो जाबिरो से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज है
कभी पिघल भी सकते है
वो बन्दिशो से कहता था
मैं तुमको तोड़ सकता हूँ
सहूलतो से कहता था
मैं तुमको छोड़ सकता हूँ
हवाओं से वो कहता था
मैं तुमको मोड़ सकता हूँ
वो ख़्वाब से ये कहता था
के तुझको सच करूंगा मैं
वो आरजू से कहता था
मैं तेरा हम सफर हूँ
तेरे साथ ही चलूँगा मैं |
तू चाहे जितनी दूर भी बना अपनी मंजिले
कभी नही थकुंगा मैं
वो जिन्दगी से कहता था
कि तुझको मैं सजाऊँगा
तू मुझसे चाँद मांग ले
मैं चाँद ले आउंगा
वो आदमी से कहता था
कि आदमी से प्यार कर
उजड़ रही ये जमी
कुछ इसका अब सिंगार कर111814
अजीब आदमी था वो ————–

कैफ़ी अपनी जिन्दगी से रुखसत होते — होते ये नज्म कही थी पूरे दुनिया के मेहनतकस आवाम से ——–

” कोई तो सूद चुकाए , कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का , जो आज तक उधार सा है |
– सुनील दत्ता . स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

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अब अगर ब्रिटेन के इस एकाधिकारी लूट – पाट एवं प्रभुत्व के संबंधो से अलग करके अंग्रेजो द्वारा ब्रिटिश राज की स्थापना एवं संचालन को ही देश की गुलामी मान लिया जाय तो इससे गुलामी के मूल सम्बन्ध छिपने ही नही जायेंगे , चर्चा तक में नही आयेंगे | फलत: ये सम्बन्ध छिप ही नही जायेंगे बल्कि विरोध से बच जायेंगे और ज्यो के त्यों बने रहेंगे | 1947 में यही हुआ है |
राज के संचालन से अंग्रेजो के हटने और उस राज पर हिन्दुस्तानियों के चढने को ही परतंत्रता का अन्त और स्वतंत्रता का शुभारम्भ घोषित कर दिया गया | मुख्यत: इसीलिए ब्रिटेन और ब्रिटेन की कम्पनियों के साथ बने संबंधो को संचालित करने वाले राज का ढाचा भी जस का तस रह गया | उसमे मुख्य परिवर्तन हुआ तो यही की उसके मुख्य संचालक अब अंग्रेज नही बल्कि भारतीय थे | उच्च अफसरशाही में अंग्रेज नही बल्कि भारतीय बैठे हुए थे | इस राज के मूल ढाचे को ज्यो का त्यों बने रहने का एक बड़ा सबूत यह भी है अभी भी सारे प्रमुख या बुनियादी कानून ब्रिटिश दासता के काल के ही बने हुए है और लागू भी है | कोई भी समझ सकता है की कानून का राज कहे जाने वाले आधुनिक भारतीय राज में अगर मूल या प्रमुख कानून ही दासता के काल के हो तो उसे स्वतंत्र और जनतांत्रिक राज कहना या बताना न्याय संगत नही कहा जा सकता |
इसलिए आँखे मूंदकर 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता को मनाने या मानने की जगह अब यह अहम सवाल खड़ा होना चाहिए की 1947 में ब्रिटेन के साथ लूट व दस्ता के आर्थिक संबंधो को बनाये रखकर फिर ब्रिटिश राज उसके शासन — प्रशासन के मूल ढाचे को , उसे संचालित करने वाले प्रमुख कानूनों को बनाये रखकर 1947 में घोषित स्वतंत्रता को क्या राष्ट्र की स्वतंत्रता माना जाए ? या स्वतंत्रता के रूप में छिपी परतंत्रता ? देश का धनाढ्य वर्ग , कम्पनिया और देश का उच्च हुकुमती तथा गैर हुकुमती हिस्सा इसे स्वतंत्रता मानता है , क्योकि उसे राज के संचालन नियंत्रण से लेकर देश के संसाधनों की लूट का प्रभुत्व अधिकार मिल गया है | ब्रिटिश राज के रहते ही इस देश की धनाढ्य कम्पनियों को तथा उच्च हिस्सों को ( खासकर 1920 के बाद से ) ये अधिकार बढ़ते रहे थे जो 1947 में ब्रिटिश सरकार के आसन पर चढने के साथ परिपूर्ण हो गये | आपसी समझौते से मिली इस स्वतंत्रता में सत्ताधारी , भारतीयों को ये अधिकार ब्रिटेन के साथ ब्रिटिश दासता के समय में बनते बढ़ते रहे आर्थिक , राजनितिक , सामाजिक , सांस्कृतिक संबंधो को बनाये रखने के लिए ही मिले थे | यही सम्बन्ध बाद के दौर में अमेरिका और अन्य साम्राज्यी देशो से भी बढ़ते रहे है | इसके फलस्वरूप इस देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा साम्राज्यी देशो के सहयोग व साठगाठ से और ज्यादा धनाढ्य एवं अधिकार सम्पन्न होता गया है | लेकिन इन्ही स्थितियों एवं संबंधो खासकर आर्थिक , कुटनीतिक संबंधो के चलते जनसाधारण हिस्से की बुनियादी समस्याए — महगाई , बेकारी से लेकर साधन — हीनता , अधिकारहीनता की समस्याए प्रत्यक्ष ब्रिटिश दासता काल से लेकर आज तक न केवल विभिन्न रूपों में बढती भी रही है | इन संबंधो में जीते — मरते हुए कोई भी गम्भीर व समझदार आदमी जनसाधारण के लिए इसके निरंतर बदतर होती दिशा या कहिये जन्घाती दिशा का पूर्वानुमान लगा सकता है | ऐसी स्थिति में जन साधारण 1947 की स्वतंत्रता को ज्यादा से ज्यादा ऐसी आशिक स्वतंत्रता कह सकता है , जिसके भीतर परतंत्रता के मूल सम्बन्ध मौजूद थे व है | बाद के दौर में और वे बढ़ते भी रहे है | इसीलिए ब्रिटिश काल से आज तक चली आ रही अपनी इस परतंत्रता तथा संकटों से युक्त अपनी स्थितियों को बदलने के लिए भी तथा 1947 की स्वतंत्रता को पूर्ण स्वतंत्रता में बदलने के लिए भी देश के इसी जनसाधारण को अपरिहार्यत:खड़ा होना पडेगा | इसके लिए अब साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |

सुनील दत्ता ….पत्रकार

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1947 में अंग्रेजो द्वारा बनाये गये राज शासन – प्रशासन के संचालन व नियंत्रण के अधिकार हिन्दुस्तानियों के हाथ में आ जाने को ही राष्ट्र की स्वतंत्रता का द्योतक माना जाता है | क्योंकि राष्ट्र की परतंत्रता या गुलामी को मुख्यत: ब्रिटिश राज और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभुत्व में ही निहित माना जाता था व है | इसे मानने को दो तीन प्रमुख कारण है | पहला तो किसी क्षेत्र या राष्ट्र का राज्य ही उसका सर्व प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नजर आता है | चाहे वह सामन्ती रहा ब्रिटिश राज हो या चाहे किसी देश का स्वतंत्र माना जाने वाला वर्तमान दौर जैसा जनतांत्रिक राज हो | इसका दुसरा कारण यह है ब्रिटिश राज ही ब्रिटेन द्वारा देश की श्रम संपदा की लूट- पाट को संचालित करने के साथ इसके विरोध के राष्ट्रव्यापी दमन का काम प्रत्यक्षत: करता रहा था | उसके लिए नीतियों और कानूनों को लागू करता रहा था | इसका तीसरा कारण खुद इस राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में लगी रही शक्तियों के एक हिस्से द्वारा लगातार किया जाता रहा यह प्रचार की राज्य का संचालन अंग्रेजो के हाथ से देशवासियों के हाथ में आते ही यह राष्ट्र स्वतंत्र हो जाएगा | जैसा की 1947 के बाद कहा और मान गया |

इन तीनो प्रमुख कारणों के चलते राज व शासन प्रशासन से हटते ही इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र मान लिया | सवाल है की क्या ऐसा मानना ठीक है ? अशत: जाहिरा तौर पर तो ठीक है , लेकिन दरअसल व मुकम्मल तौर पर इसे राष्ट्र की स्वतंत्रता मानना गलत है भ्रामक है | क्योंकि किसी भी परतंत्र व्यक्ति , वर्ग या राष्ट्र की परतंत्रता उसको परतंत्र बनाने वाली द्रश्य या अदृश्य शक्ति में नही है , बल्कि मुख्यत: उन उद्देश्यों व संबंधो में निहित होती है जो उसे परतंत्र बनाने के लिए बनाये गये होते है | इसलिए ब्रिटिश काल में इस देश की परतंत्रता को जानने समझने के लिए ब्रिटेन द्वारा इस देश के साथ बनाये गये संबंधो और उद्देश्यों को
जरुर देखा जाना चाहिए |

सभी जानते है की ब्रिटेन के साथ इस राष्ट्र के दासता के संबंधो की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी | यह उसके विश्वव्यापी बाजार और उस पर एकाधिकार के प्रयासों का ही एक हिस्सा था , ताकि कम्पनी अपने व्यापार , बाजार व लाभ — मुनाफे का निरंतर विस्तार कर सके | कम्पनी ने इस देश के साथ सम्बन्ध बढाने के साथ — साथ उस पर एकाधिकार स्थापित करने में आई हर बाधा को हटाने के लिए सैन्य कारवाइयो को चलाते रहने का भी काम निरन्तर किया | इसी के अंतर्गत उसने सबसे पहले 1757 में बंगाल में छोटे से इलाके में
कम्पनी राज स्थापित किया | फिर बाद में शासन प्रशासन में बदलाव , सुधारों को निरंतर आआगे बढाते हए कम्पनी ने अपने व्यापार के साथ राज्य का विस्तार जारी रखा | कम्पनी ने यह काम पूरे देश की व्यापारिक लूट – पाट के लिए तथा अपने फ्रांसीसी , डच ,जैसे विदेशी व्यापारिक विरोधियो को यहाँ से भगाने के लिए और राजाओं , नबावो द्वारा खड़े किए जाते रहे विरोधो — प्रतिरोधो को खत्म कर देने के लिए किया था | साफ़ बात है की ईस्ट इंडिया कम्पनी वाला ब्रिटिश राज या 1857 के बाद का ब्रिटिश साम्राज्यी राज ब्रिटेन के साथ बने
इन उन संबंधो के बुनियाद में नही था | उसकी बुनियाद तो ब्रिटिश कम्पनी और 1840 के बाद से खासकर 1857 के बाद सभी ब्रिटिश कम्पनियों के व्यापारिक और फिर औद्योगिक व महाजनी लूटपाट के लिए बनाये व बढाये गये आर्थिक संबंधो में निहित थी | कम्पनी यहा के उत्पादनों को कच्चे मालो को तथा श्रम शक्ति को
सस्ते में खरीदने और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशो के उत्पादन को ऊँचे मूल्यों पर बेच करके भारी लाभ लुटने के व्यापारिक सम्बन्ध शुरू से ही अर्थात अपने राज्य की स्थापना के पहले से ही बनाती रही | बाद में वह देश के समूचे बाजार पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आगे बढाने के साथ देश के कच्चे माल के स्रोतों पर भी लगातार कब्जा जमाती बढाती रही | अपने उद्योग व्यापार के लिए नए किस्म के कच्चे — पक्के मालो का उत्पादन करवाती रही | नील , अफीम कपास तम्बाकू आदि की खेतियो को बढावा देकर स्थानीय एवं परम्परागत खेतियो को तोड़ने का काम करती रही | दस्तकारियो को नष्ट करने का भी काम किया | इस सारे काम में कम्पनी राज या 1857के बाद ब्रिटेन की संसद सवारा संचालित ब्रिटिश राज , ब्रिटिश कम्पनियों की व्यापारिक लूट व प्रभुत्व के संबंधो को बनाने बढाने एवं चलाने में सहयोग करता रहा | यह राज खुद भी लगान तथा टैक्सों करो आदि के जरिये इस देश की जनता की लूट को उन पर ब्रिटेन के प्रभुत्व व दासता को बढाता रहा | इसके फलस्वरूप और देश के बाजार पर देश की श्रम संपदा पर ब्रिटिश कम्पनियों का और ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित होता रहा |बीसवी शताब्दी अर्थात १९०० की शुरुआत से इन लूट के संबंधो में व्यापारिक औद्योगिक शोषण लूट के साथ महाजनी लूट का सम्बन्ध भी जुड़ गया | अब ब्रिटेन से मालो मशीनों तकनीको के इस देश में निर्यात के साथ पूंजी का भी निर्यात होने लगा | ब्रिटेन के विशाल बैंको व उद्योगों की सम्मलित पूंजी ने इस देश के विभिन्न क्षेत्रो में माल मशीन तकनीक के बिक्री बाजार से भारी लाभ कमाने के साथ देश की श्रम संपदा से सूद दर सूद कमाने का महाजनी सम्बन्ध भी बना लिए | इन्ही संबंधो में ब्रिटिश कम्पनिया लाभ सूद के साथ ब्रिटेन की औध्यिगिक जरूरतों के साथ आम उपभोग के मालो सामानों को भी इस देश से ले जाती रही है | फलस्वरूप ब्रिटेन को धनाढ्य , विकसित था साधन सिविधा व शक्ति सम्पन्न बनाती रही तो इस देश को पराधीन , परनिर्भर , पिछड़ा . गरीब व कमजोर बनाती रही |
मुल्त: इन्ही संबंधो को बढाने व मजबूत करने के लिए ही ब्रिटेन से आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति का भी निर्यात किया जाता रहा | और उसके प्रभाव प्रभुत्व को भी इस देश पर फैलाया , बढाया जाता रहा | स्पष्ट बात है की ब्रिटिश राज को स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेजो ने इस देश को अपना गुलाम नही बनाया था , बल्कि मुख्यत: अपने व्यापारिक , औद्योगिक व महाजनी लूट पाट के लिए तथा इस देश के बाजार से लेकर श्रम संपदा पर एकाधिकार प्रभुत्व जमाने के लिए इस देश को पराधीन बनाया था | लूट के इन संबंधो को संचालित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही ब्रिटिश राज को , शासन प्रशासन व सैन्य व्यवस्था को स्थापित किया था | इसी के लिए ब्रिटिश राज व शासन — प्रशासन ने शताब्दियों तक इस देश में एक के बाद एक नीतियों , कानूनों को बनाया व लागू किया | इनका विरोध करने वाले देशवासियों एवं राष्ट्रवादियो को ब्रिटिश राज अपने पूरे दौर में हर तरह के जुल्म व अत्याचार का शिकार बनाता रहा।
क्रमश:

-सुनील दत्ता
पत्रकार

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हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के शासकीय कन्या महाविद्यालय में दिया गया प्रखर चिंतक — कवियत्री महादेवी वर्मा का यह व्याख्यान आप को साझा कर रहा हूँ |

मुझे पता नही था की आप के बीच आना है दिन भर घुमती रही अन्त में यही आई हूँ तो बहुत थकी हूँ | आप से बहुत बात करना चाहती थी लेकिन बंधुओ ने मौका नही दिया | अब आप से इतना कहना चाहती हूँ की भारत का भविष्य आपके हाथ में है , लडको के हाथ में नही है हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
लेकिन हमारी संस्कृति ने हमे बहुत शक्ति दी है | देखिये , ब्रह्मा के चार मुँह है , सो कोई नही जानता उनको क्यों बनाया क्योंकि चार मुँह से हो सकता है , चार तरह की बात करते रहे होंगे | बनाया तो सरस्वती को है | सरस्वती एक बात करती है | हमारे ज्ञान की अधिष्ठात्री है |हाथ में वीणा लिए हुए है , पुस्तक लिए हुए है , अक्ष माला लिए हुए है | समय , हर क्षण का प्रतीक है वो | और समयके लिए सृजन का प्रतीक है |
आप देखिये , ऐश्वर्य मिलता है घर मिलता है , लेकिन अगर घर में पत्नी न हो , बहन न हो ,माँ न हो तो कैसा घर है | वास्तव में वह लक्ष्मी है | शिव उस के मस्तक पर है | शवेताबरा
है , सब को मंगलमय रखती है और जब आसुरी शक्तिया ध्वस्त करने लगती है तो वह आसुरी शक्तियों पर आरूढ़ होती है , तब वह सिंहवाहिनी होती है , दुर्गा होती है | बड़ी शक्ति है उसमे | प्रारम्भ में संस्कृति ने हमे महत्व दिया , लेकिन समाज ने धीरे — धीरे हमारा महत्व छीन लिया , कब छीन लिया ? जब आप कमजोर बनी , सिर्फ लक्ष्मी रह गई , सम्पत्ति बन गई |
आप जो नए युग की नारी है , आप को बड़ा काम करना है | अपनी शक्ति को पहचानना है | सम्पत्ति होना अस्वीकार कर दो | सामान है क्या आप?सब आप को सामान मानते है और अगर पति न रहे , तो जैसे खिलौना फेंक देता है बच्चा , ऐसे स्त्री को फेंक देते है | कानून ने हमे बहुत अधिकार दिए है | लेकिन कानून पात्रता नही देगा | पात्रता आप से आएगी | हमारा युग बड़ा कठिन था | हमे लड़ाई लड़नी पड़ी | पुलिस की लाठियों के सामने , गोलियों के सामने खड़े रहे और फिर पढने के लिए चारो ओर भटकते रहे | आप को सब सुविधाए है | इस लिए आप देश को बनाइए जैसा आप बनाएगी , वैसा देश बनेगा | तो आप इस भारत की धरती की तरह , जैसे सीता को भूमिजा कहते है , वैसे भूमिजा है आप आप सीता बनिये | मान लिया की राम रक्षा करने गये थे | वन में चले गये थे की रक्षा करंगे , लेकिन रावण के यहा रक्षा कौन करता था सीता की ? वह तो राम लक्ष्मण नही थे | उन्हें पता नही था | ढूढ़ रहे थे | सीता ने अपने वर्चस्व से , अपनी शक्ति से अपनी रक्षा की | रावण उसको अपने प्रासाद में भवन में नही ले जा सका | अशोक वाटिका में रखा |
और उसकी शक्ति देखिये | अग्नि परीक्षा दी उसने | और उसका तेजस्वी रूप देखिये | जब राम ने कहा , लव — कुश बड़े हो और राम , लव — कुश से हार गये तो उन्होंने सीता से कहा की अब अयोध्या की महारानी होइए और अयोध्या चलिए | सीता ने इनकार कर दिया | राम ने कहा प्रजा के सामने सिर्फ परीक्षा दे दीजिये | अस्वीकार कर दिया उसने |
कोई माता अपने पुत्रो के सामने परीक्षा देती है ? अपने सतीत्व के लिए ? नही देती है | तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और राम ने जब बहुत कहा तो सीता ने धरती में प्रवेश कर लिया |
अब उस की शक्ति देखिये | वो चाहती तो राम के हाथ पाँव जोडती , अयोध्या की रानी हो जाती , लेकिन उसने नही होना चाहा | ऐसा पति जो किसी के कहने से , पति का कर्तव्य भूल जाए , उसके साथ क्यों जायेगी ? नही गई वह | सो मैं बार — बार कहती हूँ | सीता बनो , तुम्हारा उत्तर होना चाहिए , हम तो सीता है ही हम तो धरती की पुत्री है | स्वंय शक्ति रखती है | वह आप का घर बनाती है | आपको सुख देती है | आपको मंगलमय बनाती है | कितने रूपों में पुरुष को सहयोग देती है | वह पति को कितना आत्मत्याग सिखाती है | पुत्र को कितना तेजस्वी बनाती है | वह तो मानव जीवन की निर्मात्री है | जीवन की श्रुति है वह | बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसकी गोद में आएगा , छाए राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो, किसी माता की गोद में किसी माता के आंचल की छाया में बड़ा होगा | उसकी आँखों के सपने अपने आप को देखेगा | वह उसे अंगुली पकड कर चलना सिखाएगी | आप अपने को छोटा मत समझिये |
आपके भी कुछ कर्तव्य है | हमने देखा , आधुनिका बनने के लिए , लडकिया घंटे भर घुघराले बाल बनाएगी | आँखों में काजल लगाएगी , होठ रंगेगी , चेहरा रंगेगी | एक जगह हम गये तो रंगे चेहरे वाली लडकिया सामने बैठी थी | हमने कहा , पहले मुँह धोकर आओ , हम तो पहचान नही पाती आप को |
आदमी तो आदमी है न | वह आपको कठपुतली बना देता है | आप लड़के को कोई खिलौना दे दीजिये तोडकर देखेगा | लेकिन लड़की घर बसाएगी , गृहस्थी बसाएगी , घरौदा बनाएगी , उसमे गुड्डे — गुड्डी बैठाएगी | उनका व्याह रचाएगी , यानी यह सब कुछ जानती है | छोटी लड़की भी | और लड़के को देखिये तो उसकी टांग तोड़ देगा , सर फोड़ देगा | पुरुष का स्वभाव ही आक्रामक है | अगर स्त्री उसे सयम नही सिखाएगी तो फिर वह सयम से नही रहता || हमारे युग के एक बड़े व्यक्ति ने कहा की राष्ट्र स्वतंत्र नही होगा , यदि उसकी नारी जो शक्ति है वो स्वतंत्र नही होगी | जितनी कला है वह आप के पास है | जितनी विद्या है , वह आप के पास है | आप तितली या कठपुतली मत बनिये | साक्षात शक्ति स्वरूपा है आप | आप शक्ति को पहचानिए और देश को बनाइए | मेरी मंगलकामना आपके साथ है |
– सुनील दत्ता
आभार-लोक गंगा पत्रिका

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अजीब था शहीदे आजम भगत सिंह
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते -ख़ाक हैं ,फानी रहे रहे न रहे |

फांसी के समय भगत सिंह की उम्र कुल 23 साल थी |उनके क्रांतिकारी जीवन की कुल अवधि 1923 से लेकर 1931 तक के कुल 8 वर्षो की ही रही |इतनी कम उम्र और इतने कम राजनितिक जीवन में भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्य से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए देश के मेहनतकशो की मुक्ति के लिए वैचारिक एवं व्यावहरिक क्रान्ति का विराट और अथक प्रयास करते रहे |यह दुर्भाग्यपूर्ण है की देश का जन मानस उन्हें बम -पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी के रूप में ही जानते है |विदेशी शोषण -लूट व परतंत्रता के संबंधो से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता और राष्ट्र के मेहनत कशो के हित में समाज के क्रांतिकारी बदलाव के उनके महान वैचारिक और बहुआयामी प्रयासों को नही जानता |जबकि भगत सिंह की उच्चता ,महानता को समझने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र व समाज के क्रांतिकारी बदलाव के लिए भी देश के जनसाधारण को उनके उन प्रयासों को जानना जरूरी है |भगत सिंह के विचारों को आज के संदर्भ में जानने समझने का प्रयास जरुर किया जाना चाहिए |आज भगत सिंह हमारे बीच नही है लेकिन उनके चिंतन व विचार मौजूद है |

स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रान्तिकारियो ,शहीदों में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त नाम भगत सिंह का ही है |23 मार्च 1931 के दिन राजगुरु व सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दी गयी थी |तब से आज तक देश के हर क्षेत्र में भगत सिंह व उनके साथियो के शहादत के दिन को ‘शहीद दिवस ‘ के रूप में मनाया जाता है |भगत सिंह की शहादत के सर्वाधिक ऊँचे मूल्याकन के फलस्वरूप देश का जन मानस उन्हें ‘शहीदे -आजम ‘भगत सिंह के रूप में याद करता आ रहा है |उनके 81 वे शहादत दिवस के अवसर पर यह देखना और समझना बेहतर रहेगा कि उनकी शहादत का इतना उंचा मूल्याकन आखिर क्योंकर किया जाता है ?और हमे यह भी समझना होगा कि वर्तमान दौर में भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियो को याद करने के साथ उनके क्रांतिकारी विचारों ,व्यवहारों से कुछ प्रेरणा ली जा सकती है या ली जानी चाहिए ?
जंहा तक भगत सिंह के सर्वाधिक मूल्याकन का सवाल है तो इसके लिए केवल भगत सिंह के जीवन एवं संघर्ष को ही जानना काफी नही होगा बल्कि उस दौर कि यानी 1907 से 1931 के दौर कि परिस्थितियों को तथा उसके महत्व व महानता को जानना ,समझना भी एकदम जरूरी है |क्योंकि ऐसी परिस्थितिया ही भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी विभूतियों कि सृजनकर्ता होती है |ऐसी परिस्थितिया ही एक नही अनेकानेक महान विभूतियों को क्रान्तिकारियो और शहीदों को जन्म देती है |उनमे से कुछ विभूतियों को महानता के शिखर पर पहुचने का अवसर प्रदान करती है |भगत सिंह और उनकी शहादत कि महानता कि पृष्ठभूमि में भी ऐसी महान परिस्थितिया मौजूद रही है |कोई महान परिस्थिति भी अचानक नही बन जाती बल्कि वह अपेक्षित सामाजिक संघर्षो कि एक कड़ी के रूप में विकसित होती है |1905 -06 के बाद राष्ट्रीय संघर्षो के उभार कि परिस्थितियों के निर्माण में भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उसके पहले और बाद में चले ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों ,संघर्षो का निश्चित योगदान था |इतिहास कि थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि भगत सिंह के समय कि वैश्विक परिस्थितिया महान परिवर्तनकारी परिस्थितिया थी |खासकर प्रथम विश्व युद्ध (1914-1917)के दौरान और उसके बाद रूस व कई यूरोपीय देशो में समाजवादी आंदोलनों व संघर्षो का सिलसिला चल पडा था |इसी के साथ हिन्दुस्तान जैसे तमाम पिछड़े व गुलाम देशो में विदेशी साम्राज्यी ताकतों के विरुद्ध राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्षो का सिलसिला भी तेज़ी से बढने लगा था |
विश्व युद्ध के दौर में ही रूस में ‘मजदूर क्रान्ति ‘ सम्पन्न हुई थी |इस क्रान्ति ने दुनिया के तमाम पिछड़े देशो के मजदूरों ,किसानो एवं अन्य जनसाधारण को साम्राज्यी ताकतों की शोषण ,लूट तथा परतंत्रता व प्रभुत्व के संबंधो से अपने आप को पूरी ताकत से मुक्त कर लेने का पुरजोर आह्वान किया था और उसके लिए यथासंभव प्रेरणा व मदद भी दी थी |इसके फलस्वरूप इस देश में भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ जनसाधारण मजदूरों ,किसानो की स्वतंत्रता का लक्ष्य लेकर आंदोलनों ,संघर्षो की शुरुआत हो गयी |
अपने पुरवर्ती क्रान्तिकारियो ,शहीदों की तुलना में भगत सिंह और उनके साथियो की महानता इन्ही वैश्विक परिस्थितियों की देन थी |उन्होंने और उनके साथियो ने ब्रिटिश साम्राज्यी ताकतों से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ -साथ इस राष्ट्र के नये पुराने धनाढ्य वर्गो से देश के जनसाधारण की मेहनत कशो की स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठा दिया |ब्रिटिश राज को हटाकर हिन्दू राज ,मुस्लिम राज या जनतांत्रिक राष्ट्र -राज बनाने की जगह ,उन्होंने देश के मेहनतकशो के नेतृत्त्व में समाजवादी -प्रजातांत्रिक राष्ट्र राज के पक्ष में खुली घोषनाये की |
भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन पर अमेरिका व कनाडा में रह रहे हिन्दुस्तानियों द्वारा गठित गदर पार्टी के संघर्षो व प्रयासों का भी असर जरुर पडा था |भगत सिंह अपने क्रांतिकारी जीवन में 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर गदर पार्टी के उद्देश्यों व क्रियाकलापों से प्रेरणा व उर्जा ग्रहण करते रहे थे |जंहा तक उस दौर की राष्ट्रीय परिस्थितियों का सवाल है तो 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रवादी आंदोलनों व संघर्षो का ज्वार उठा हुआ था |यह ज्वार विदेशी बहिष्कार के साथ ,स्वदेशी अपनाने राष्ट्रीय -शिक्षा -संस्कृति को बढावा देने तथा स्वराज्य का लक्ष्य हासिल करने के लिए राष्ट्रवादी संघर्ष के रूप में आगे बढ़ता रहा था |राष्ट्रीय आंदोलनों के इसी उभार के दिनों में लोकमान्य तिलक का यह राष्ट्रवादी सन्देश पूरे देश में गूजने लगा था की “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे |”
राष्ट्र की इन्ही महान संघर्षशील एवं क्रांतिकारी परिस्थितियों में पंजाब के लायलपूर जिले के बंगा गाँव में 27 अक्तूबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था |भगत सिंह का बचपन पंजाब में खासतौर पर प्रथम विश्व युद्ध के दौर में अंग्रेजी शासन के भारी दमन व उत्पीडन को देखते और भोगते बीता था |1919 में घटा जलियावाला बाग़ काण्ड उसकी चरम अभिव्यक्ति था |उस समय 7 वीक्लास का छात्र रहा 12 साल का भगत सिंह जलियावाला बाग़ की घटना के बाद वहा की मिट्टी लेने गया और उसे अपने साथ लाया भी |यह जलियावाला बाग़ काण्ड के साथ -साथ ब्रिटिश शासन द्वारा किए जाते रहे दमन के प्रति बालक भगत सिंह में उठते विद्रोह व विरोध का एक परिलक्षण भी था | ब्रिटिश शासन के दमन -अत्याचार के विरुद्ध पंजाब में खड़े होते रहे आंदोलनों ,संघर्षो की परिस्थियों ने भी भगत सिंह और उनके साथियो को महान क्रांतिकारी बनाने में महत्व पूर्ण भूमिका निभायी |
इन आम परिस्थियों के अलावा भगत सिंह के साथ जुडी विशिष्ठ परिस्थितियाँ भी थी |भगत सिंह का स्वंय एक राष्ट्रवादी -क्रांतिकारी परिवार में जन्म और पालन -पोषण |भगत सिंह के जन्म के समय पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी ,राष्ट्रवादी गतिविधियों कर कारण जेल में थे |ठीक उनकी पैदाइश के ही दिन दोनों रिहा होकर घर पहुचे थे |इसलिए घरवालो ने भगत सिंह का नाम भागो वाला (यानी भाग्य वाला )रख दिया |निसंदेह:भगत सिंह की पारिवारिक पृष्ठ भूमि ने उन्हें भागो वाला से महान क्रांतिकारी भगत सिंह बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी |दूसरी भूमिका लाहौर के नेशनल कालेज की परिस्थितियों की थी |इस कालेज में भगत सिंह ने उच्च शिक्षा लेने के लिए दाखिला लिया था |उस समय लाला छबीलदास उस कालेज के प्रिंसिपल थे वे नौजवानों को पाठ्य पुस्तके पढने के साथ -साथ इस बात को प्रोत्साहित करते रहते थे की उन्हें राष्ट्र व समाज हित में क्या कुछ पढ़ना और जानना चाहिए|
लाहौर में लाला लाजपत राय की ‘द्वारका दास लाइब्रेरी ‘और लाहौर के ही अनारकली बाज़ार में ‘रामकृष्ण एंड सन्स’ की किताबो की दूकान से भगत सिंह को मैगजीन ,गैरी बाल्डी,वाल्टेयर,जैसे यूरोपीय क्रान्तिकारियो के जीवन संघर्ष को पढने और जानने के साथ विक्टर ह्यूगो ,टालस्टाय,बर्नाड शा ,मैक्सिम गोर्की आदि जैसे महान लोगो के साहित्य को भी पढने का सुअवसर मिला और उससे उन्होंने भरपूर मार्ग दर्शन लिया | भगत सिंह को देश के जनसाधारण के प्रति मेहनत कशो के प्रति सिद्धांतनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ होने का मार्गदर्शन देने में सोहन सिंह जोश ने अहम भूमिका निभायी |वे कम्युनिस्ट नेता होने के साथ -साथ ‘कीरति’ मासिक पत्रिका के सम्पादक भी थे |
वे भगत सिंह से विभिन्न विषयों पर चर्चा करने के साथ -साथ उन्हें ‘कीरति ‘में लिखने के लिए प्रोत्साहित भी करते रहते थे |उन्ही के शुरूआती प्रयासों के फलस्वरूप भगत सिंह कई अखबारों के लेखन ,सम्पादन में महत्व पूर्ण भूमिका निभाने में सफल रहे |
इसके अलावा वे ब्रिटिश ताकतों के विरुद्ध देश में होते रहे विरोधो ,विद्रोहों के खासकर 1857 के और फिर उससे भी ज्यादा गदर पार्टी के विरोध -विद्रोह के प्रयासों को जानने समझने में लगे रहते थे |वे गदर पार्टी के महान नेता करतारसिंह सराभा की फोटो अपने पास रखते थे और कहते थे कि यह मेरा गुरु ,मेरा साथी और मेरा भाई है | याद रखने की बात है कि करतार सिंह सराभा को भगत सिंह से कम उम्र में (19 )वर्ष फांसी के फंदे पर झुलना पडा था |यह बात स्मरणीय है कि गदर पार्टी के करतार सिंह सराभा जैसे ज्यादातर पंजाब से जुड़े हुए थे |इन्ही महान संघर्षशील अन्तराष्ट्रीय व राष्ट्रीय तथा स्थानित परिस्थितियों ने भगत सिंह को महान क्रांतिकारी की भूमिका निभाने के लिए उनका पथ प्रशस्त किया |उन्हें वैचारिक व व्यहारिक रूप में राष्ट्रीय व सामाजिक क्रान्ति का अग्रदूत बनने का सुअवसर प्रदान किया |यह बात दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश कि बहुसंख्यक जनता उन्हें बम पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान एवं राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी बलिदानी के रूप में जानती है |जबकि राष्ट्र स्वतंत्रता से लेकर समाज के बदलाव के बारे में उनके वैचारिक क्रान्ति के प्रयास कही ज्यादा है |देश कि आम जनता के लिए आज के दौर में भी वे प्रयास मार्गदर्शक और दिशानिर्धारक है |
देश काल कि उपरोक्त परिस्थितियों से उर्जा लेते हुए सबसे पहले नेशनल कालेज के छात्र के रूप में भगत सिंह और उनके साथियो ने 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया |भगत सिंह इस सभा के महासचिव और भगवती चरण वोहरा प्रचार मंत्री बने |1928 में अमृतसर में हुए सम्मलेन में नौजवान भारत सभा ने अपना घोषणा पत्र जारी किया उसमे साफ़ कहा गया है कि “हमे अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए करना पडेगा |हमारी राजनैतिक लड़ाई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के ठीक बाद से ही आरम्भ हो गयी थी |वह कई दौरों से होकर गुजर चूकि है |20 वी शताब्दी के आरम्भ से अंग्रेज नौकरशाही ने भारत के प्रति एक नयी नीति अपनाई है |वे हमारे देश के पूंजीपतियों तथा निम्न पूंजीपति वर्ग को सहूलियत देकर उन्हें अपनी तरफ मिला रहे है |दोनों का हित एक हो रहा है |भारत में ब्रिटिश पूंजी के अधिकाधिक प्रवेश का अनिवार्यत:यही परिणाम होगा |निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को तथा उसके नेताओं को विदेशी शासको के साथ जाते देखेंगे |अत:’अब देश को तैयार करने के भावी कार्यक्रम का शुभारम्भ इस आदर्श वाक्य से होगा -क्रान्ति जनता द्वारा जनता के हित में |दूसरे शब्दों में 98 प्रतिशत के लिए स्वराज्य जनता द्वारा प्राप्त ही नही बल्कि जनता के लिए भी |
यह एक बहुत कठिन काम है ………..युवको के सामने काफी कठिन काम है और उनके साधन बहुत थोड़े है |उनके मार्ग में बहुत सी बाधाये भी आ सकती है लेकिन थोड़े किन्तु निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है |युवको को आगे जाना चाहिए |उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा मार्ग है ,और उन्हें जो महान कार्य सम्पन्न करना है ,उसे समझना होगा |उन्हें अपने दिल में यह बात रख लेनी चाहिए कि सफलता मात्र एक संयोग है जबकि बलिदान एक नियम |…………………….. इस बीच नौजवान भारत सभा के क्रान्तिकारियो ने काकोरी ट्रेन डकैती में पकडे गये रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियो को जेल से छुडा लेने की योजना भी बनाई ,परन्तु ब्रिटिश पुलिस प्रशासन की बड़ी और संगठित ताकत के चलते वह योजना अमल में नही लायी जा सकी |
इसी दौरान भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा मनमाने ढंग से गठित साइमन कमीशन का देश में आगमन हुआ |इस कमीशन का देश भर में विरोध हुआ |30 अक्तूबर 1928 को यह कमीशन लाहौर पहुचा |विरोध प्रदर्शन में हुए लाठी चार्ज के चलते लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी साडर्स की हत्या कर दी |भगत सिंह ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई |साडर्स -वध के बाद क्रान्तिकारियो द्वारा गठित हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन की तरफ से जारी नोटिस में यह घोषणा की गयी कि…..’मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमे खेद है |परन्तु क्रान्ति की बलि वेदी पर कभी -कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है |हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी ।इन कारवाइयो के साथ -साथ भगत सिंह कीरति नाम की पंजाबी पत्रिका में तथा हिदी के प्रताप ,प्रभा महारथी ,चाँद आदि पत्रिकाओं में राष्ट्र की स्वतंत्रता और समाज कीं विभिन्न समस्याओं को लेकर लिखते रहे |उनके लेखो में पंजाब -की भाषा तथा लिपि की समस्या (1924) ‘विश्व प्रेम ‘(1929 )’युवक ‘(1925) ‘धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम (1928 )’साम्प्रदायिक दंगे ‘और उनका इलाज़ ‘(1928) ‘अछूत ‘समस्या (1928) ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ‘(1930 )आदि जैसे महत्वपूर्ण लेख है |राजनीतिक लेखो में वे और उनके क्रांतिकारी साथी राष्ट्र की क्रांतिकारी घटनाओं और शहीदों के जीवन संघर्षो को लेकर निरंतर लेख लिखते और प्रकाशित करते रहे
इनमे ‘होली के दिन रक्त के छीटे’ (1926) ‘काकोरी के वीरो से परिचय ”काकोरी के शहीदों की फांसी के हालात’ (1928) ‘काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आंसू ‘सूफी अम्बा प्रसाद (1928) बलवंत सिंह (1928) डाक्टर मथुरा सिंह (1928) शहीद करतार सिंह सराभा (1928) मदनलाल धिगरा (1928) शहीद खुदीराम बोस (1928) अराजकता वाद (1928) विद्यार्थी और राजनीत (1928) ‘नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणा पत्र (1928) हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएसन का घोषणा पत्र (1929 )बम का दर्शन (1930 )क्रांतिकारी मसौदा (1931) युद्ध अभी जारी है (1931 ) तथा अन्य बहुत सारे सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण लेख तथा पर्चे व पत्र आदि शामिल है |भगत सिंह के जीवन के बाद की घटनाओं में असेम्बली बम काण्ड प्रमुख है |ब्रिटिश साम्राज्य का जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों को बढावा देने के लिए सरकार सदन में चर्चा के बाद सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल )और ‘औद्योगिक विवाद विधयेक (ट्रेड डिस्प्यूट बिल ) लागू करने जा रही थी |असेम्बली हाल में उन्ही बिलों पर चर्चा के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को हाल की खाली जगह पर दो बमो का धमाका करने के साथ हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना की तरफ से पर्चे फेके |इस बम विस्फोट से कोई मारा नही गया और न ही बम फेकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहा से भागे नही |उन्होंने पूर्वनियोजित योजना के अनुसार अपनी गिरफ्तारिया दी |इसके बाद उसी योजनानुसार न्यायालय की सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने अपना ब्यान अदालत के माध्यम से पूरे देश में पहुचा दिया |वे ब्यान भी एक महत्वपूर्ण एतिहासिक दस्तावेज बन चुके है |न्यायालय में पहला मुकदमा असेम्बली बम काण्ड को लेकर था जिसकी जिमीदारी दोनों ने बम के साथ पर्चे फेकने के रूप में ही ले ली थी |अदालत में उन्होंने स्पष्ट कहा की उनका उद्देश्य भरी सरकार की जनविरोधी बिलों के प्रति अपने विरोध को सुनाना था न की किसी को मारना |इस केस में दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी | लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को मृत्यु दंड दिया गया |मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने क्रान्तिकारियो के साथ जेल में होते रहे अमानुषिक व्यवहार व अत्याचार के विरुद्ध लंबा अनशन किया |लेकिन इस बीच उनका लिखना पढ़ना और पत्र व्यवहार निरन्तर जारी रहा |अनशन के दौरान कमजोर हालात में स्ट्रेचर पर लाये जाने के वावजूद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और उसकी न्यायालयी व्यवस्था के ढोंग ,पाखण्ड को नगा करने के साथ -साथ क्रान्तिकारियो के लक्ष्यों ,उद्देश्यों को स्पष्ट करने तथा उनके विरुद्ध होते रहे दुष्प्रचारो का जबाब देना जारी रखा |23 मार्च 1931 के दिन सारे नियम -कानून ताक पर रखकर भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को शाम के समय फांसी दे दी गयी |जेल प्रशासन ने उनकी लाशें परिजनों को भी नही दी |उनको सतलुज के किनारे जलाकर खत्म कर दिया |क्योंकि उनको डर था की लाशें पाकर भारी जन समूह इकठ्ठा हो सकता है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उग्र विरोध के लिए खड़ा हो सकता है |साम्राज्यवादियों की यह करतूत एकदम समझ में आने वाली है |लेकिन कडवी सच्चाई यह भी है की 1947 से पहले और उसके बाद भी देश के ख्याति प्राप्त नेताओं द्वारा भी भगत सिंह और उनके साथियो के साथ भारी अन्याय किया जाता रहा है |उनके क्रान्ति के महान व गंभीर उद्देश्यों पर पर्दा डालने का काम किया जाता रहा है |उन्हें मुख्य रूप से कांग्रेस व गांधी जी के अहिंसा के पथ के विपरीत हिंसा के पथ के अनुगामी के रूप में चित्रित किया जाता रहा |आज भी देश का जन मानस गांधी व अन्य कांग्रेसी नेताओं को अहिंसावादी देशभक्त तथा भगत सिंह व अन्य क्रान्तिकारियो को हिंसावादी देशभक्त के रूप में ही जानता है |
जबकि सच्चाई एकदम दूसरी है |वह यह की 1922 -24 के बाद से देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों की अगुवाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता करते हुए सत्ता की बागडोर को अपने हाथ में लेना चाहता था |देश पर 250 सालो से आधिपत्य जमाए रहे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लूट के संबंधो को बरकरार रखते हुए देश के संसाधनों पर और शासन सत्ता पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो का पूर्ण अधिकार स्थापित करना चाहता था |इन्ही अधिकारों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ किए जाते रहे समझौतों के जरिये बढाया भी जाता रहा था |और फिर समझौतों की अगली व अंतिम कड़ी के रूप में 1947 की स्वतंत्रता का समझौता भी पूरा कर लिया गया |इसकी भविष्यवाणी भगत सिंह के संगठन हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन ने अपने घोषणा (वर्ष 1929 ) में पहले ही कर दी थी |इसे आप संगठन के घोषणा पत्र में देख सकते है |उस घोषणा पत्र के कुछ अंश “”.भारत साम्राज्यवाद के जुए के नीचे पिस रहा है |इसमें करोड़ो लोग आज अज्ञानता और गरीबी के शिकार हो रहे है |भारत की बहुत बड़ी जनसख्या मजदूरों और किसानो की है ,उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है |भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है |उसके सामने दोहरा खतरा है -विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ से |भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है |कुछ राजनैतिक नेताओं का डोमिनियन (प्रभुता सम्पन्न ) का रूप स्वीकार करना भी हवा के उसी रुख को स्पष्ट करता है |……
भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगो को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वास घात की कीमत के रूप में सरकार से कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है |……… फिर फांसी से 13 दिन पहले जेल से लिखे लेख ‘युद्ध अभी जारी है (10 मार्च 1931 ) में भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव ने यह घोषणा की है की “अंग्रेज जातिऔर भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है |….हमने निश्चित रूप से इस युद्ध में भाग लिया है |…यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है |चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही क्यों ना हो |उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपति के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी |..इससे कोई अन्तर नही पड़ता |यह युद्ध जारी रहेगा ..जब तक की समाज का वर्तमान ढ़ाचा समाप्त नही हो जाता |…..
क्या यह युद्ध आज भी जारी नही है ? एकदम जारी है |अमेरिका इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो की साम्राज्यी कम्पनियों ,सरकारों और उनकी सहयोगी बनी भारत -पाक जैसे पिछड़े देशो की धनाढ्य कम्पनियों व सरकारों में गठजोड़ व सहयोग से जारी है |पिछड़े देशो के जनसाधारण पर हो रहे आर्थिक ,कुटनीतिक एवं सैन्य हमलो के रूप में जारी है |पिछले 20 सालो से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के हितो को बढाने और जनसाधारण के हितो को काटने -घटाने वाली वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों और भोगवादी संस्कृति नीतियों के रूप में प्रत्यक्ष:जारी है |फिर यह युद्ध ईराक ,अफगानिस्तान ,लीबिया जैसे पिछड़े देशो में हमलावार सैन्य साम्राज्यी नीतियों के रूप में भी प्रत्यक्ष:जारी है इस युद्ध और हमले को देश का जनसाधारण महंगाई ,बेकारी के रूप में ,खेती -किसानी एवं छोटे स्तर के कारोबारों की टूटन के रूप में महंगाई और पहुच से बाहर होती जा रही शिक्षा के रूप में ,नग्न -अर्धनग्न लचर भोगवादी संस्कृति के रूप में और सामाजिक टूटन -बिखराव आदि के रूप में झेलता जा रहा है |दुःख कष्ट और जिल्लत से जीने की मजबूरी के साथ वह आत्महत्या का रास्ता भी पकड़ता जा रहा है |क्योंकि वह इस युद्ध को देख नही पा रहा है ,समझ नही पा रहा है |आवश्यकता है इस जारी युद्ध को समझने की और संगठित होकर उसका मुकाबला करने की |विदेशी वैश्विक नीतियों के विरोध के साथ राष्ट्र व राष्ट्र के जनसाधारण को वैश्विक लूट व प्रभुत्व के संबंधो से मुल्त करने के लिए नया क्रांतिकारी युद्ध छड़ने की |उसके लिए भगत सिंह व अन्य राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय क्रान्तिकारियो से सबक ,शिक्षा व मार्ग दर्शन ग्रहण करने की |
युद्ध अभी जारी है …

-सुनील दत्ता
पत्रकार
साभार चर्चा आज कल

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आज है पुण्यतिथि
मैंने इस आवाज़ को मर -मर पाला है फिराक
आज जिसकी नर्म लव है समय मेहरावे हयात …..फिराक

कहाँ का दर्द भरा था तेरे फँसाने में
फिराक दौड़ गई सह सी जमाने में
शिव का विषपान सुना होगा
मैं भी ऐ दोस्त रात पी गया आंसू
इस दौर में जिन्दगी बसर की
बीमार रात हो गई …..फिराक ने उर्दू अदब की शायरी और साहित्य को वो मुकाम दिया जो दुनिया की अन्य भाषाओं से काफी आगे नजर आता है |फिराक ने अपने उर्दू शायरी से एक नया फलसफा दी जमाने को उर्दू के मशहूर शायर फिराक ने एक बार कहा था ……हासिले जिन्दगी तो कुछ यादे हैं ….याद रखना फिराक को यारो ……लेकिन यह बात कहने में मुझे जरा भी संकोच नही है की ऐसे अजीमो शक्सियत को जमाना अपने स्मृति पटल से भुलाता जा रहा है .फिराक गोरखपुर में पैदा हुए थे |गोरखपुर -लखनऊ राज मार्ग संख्या 28 के पास एक सडक है जो रावत पाठशाला होते हुए घंटाघर की तरफ जाता है |इसी पाठशाला के करीब वह लक्ष्मी भवन है जिसमे फ्रिआक ने आँखे खोली थी और यही रावत पाठशाला जहा उन्होंने शिक्षा आरम्भ की थी और यही से उस उर्दू अदब के शायर ने अपने विचारों और दर्शन को उर्दू शायरी में ढालने का काम किया और उर्दू अदब को एक नया मुकाम दिया |लक्ष्मी भवन उनके जिन्दगी में बिक गया और अब फिराक के नाम पर इस शहर में न तो कोई पार्क है और न ही भवन और न ही कोई शिक्षण संस्थान |बस एक चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी हुई है जिससे लगता है की शहर से इस शायर का कोई रिश्ता था |फिराक का जन्म 1898 में हुआ था और 3 मार्च 1982 को फिराक इस दुनिया से रुखसत हुए थे |फिराक बचपन से ही मेधावी रहे इसीलिए उन्होंने आई. सी. एस. की नौकरी छोडकर और महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आज़ादी की जंग में कूद पड़े |उनके पिता ईश्वरीय प्रसाद बड़े वकील थे और पंडित जवाहर लाल नेहरु से उनके व्यक्तिगत रिश्ते थे |फिराक उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद गये और वहा आनद भवन के सम्पर्क में आये |उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया तो घर की आर्थिक स्थिति बिगने लगी |पंडित नेहरु को उनकी स्थिति को भापने में देर नही लगी |उन्होंने फिराक को कांग्रेस कार्यालय का सचिव बना दिया लेकिन फिराक को तो साहित्य की दुनिया में उंचाइयो पर पहुचना था इसीलिए वे वहा पर भी साहित्य सृजन के क्रम को आगे बढाते रहे |वह पहले कानपुर फिर आगरा के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हुए और बाद में इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर बने |फिराक और हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हरिबंश राय बच्चन में एक समानता थी |दोनों इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक थे |श्री बच्चन यदि हिन्दी में लिखते थे तो फिराक का शौक उर्दू लेखन में था अंग्रेजी भाषा का भरपूर ज्ञान ,भारतीय संस्कृति और संस्कृत साहित्य की अच्छी समझ , गीता के दर्शन और उर्दू भाषा से लगाव ने फिराक को हिमालय बना दिया |फिराक ने उर्दू गजल और शायरी को उस नाजुक वक्त में नई जिन्दगी बक्शी जब की नारेबाजी और खोखली शायरी गजल की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी |लेकिन उन्होंने गजल में आम हिन्दुस्तानियों का दर्द भर दिया और बोल पड़े
शामे -गम कुछ उस निगाहें नाज़ की बाते करो
बेखुदी बढती चली है राज की बाते करो
ये सकू ते नाज़ -ए -दिल की रगों का टूटना
खामोशी में कुछ शिकस्ते साज़ की बाते करो
कुछ कफस की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फजा कुछ हसरते परवाज की बाते करो
वह आवाज़ जिसमे एक जादू था खामोश हो गयी |लेकिन फिराक ने जिस आवाज़ को मर -मर पाला था वह आज साहित्य की दुनिया में सुनाई दे रही है |उन्होंने लिखा की मैंने इस आवाज़ को मर -मर पाला है फिराक ,आज जिसकी नर्म लव है समय मेहरावे हयात ………|

-सुनील दत्ता
पत्रकार

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विधान सभा चुनाव के घोषणा के तुरंत बाद एक हिन्दी दैनिक द्वारा 29 दिसम्बर को आयोजित ‘समृद्धि ;सम्मलेन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास के मुद्दे पर इस क्षेत्र के बड़े उद्योगपति में शामिल दीनानाथ झुनझुनवाला का साक्षात्कार फोटो के साथ छपा है |उन्होंने साक्षात्कार में पूर्वांचल को विशेष औद्योगिक क्षेत्र का दर्जा देने की माँग की है ,ताकि इस क्षेत्र में उद्योग लगाने वालो को विशेष छूटे व रियायते मिल सके |उन्होंने इस क्षेत्र में ढाचागत सुविधाओं की और विशिष्ट औद्योगिक विकास के लिए एक अलग व सरल प्रशानिक तंत्र (सिंगल विंडो सिस्टम )की स्थापना की माँग भी की है |इस माँग के साथ उन्होंने पूर्वांचल की तुलना वर्तमान में तेज़ी से विकास कर रहे बिहार से करते हुए बताया है की बिहार सरकार उद्योगपतियों को कही ज्यादा छूटे व सुविधाए दे रही है |इसीलिए उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से के उद्योगपति भी यहा उद्योग लगाने की जगह बिहार में उद्योग लगाने को प्राथमिकता दे रहे है |
श्री झुनझुनवाला की मांगे उद्योगपतियों के लिए तो एकदम ठीक है |लेकिन ये मांगे पूर्वांचल की ठोस स्थितियों को नजरंदाज़ करने वाली भी है |क्योंकि उनके सुझाव व मांगे उद्यमियों को मिलने वाली विशिष्ट छूटो व सुविधाओं के साथ ही इस क्षेत्र का विकास देख रही है |कृषि क्षेत्र और उसकी होती रही उपेक्षा को पूरी तरह से अनदेखा कर रही है |उनके साक्षात्कार में तथा उनकी मांगो व सुझावों में कृषि विकास के जरिये पूर्वांचल के विकास की कोई माँग शामिल नही है |जबकि पूरे पूर्वांचल का कृषि क्षेत्र न केवल समतल जमीन का क्षेत्र है ,बल्कि आमतौर पर दो तीन फसल उत्पादन देने वाला कृषि क्षेत्र भी है |लेकिन पूर्वांचल के कृषि क्षेत्र में सिंचाई के साथ कृषि के अन्य आधुनिक विकास की लगातार उपेक्षा होती रहती है |पश्चिमी व पूर्वी उत्तर प्रदेश की जमीनों की उत्पादकता में कोई ज्यादा अन्तर नही है |उनमे मुख्य अन्तर है तो कृषि के आधुनिक विकास का |
कृषि विकास और कृषि पर आधारित औद्योगिक विकास (चीनी मिल , कटाई मिल जैसे उद्योगों का विकास )इस क्षेत्र के और क्षेत्र की बहुसंख्यक जनसाधारण के विकास के स्तर को उंचा उठा सकता है |उसे पिछड़े पन से किसी हद तक मुक्ति दिला सकता है | उसी के साथ इस क्षेत्र के छोटे व मध्यम दर्जे के कुटीर एवं छोटे उद्योगों के लिए स्थानीय बाज़ार का भी विकास हो सकता है |इस विकास के साथ ही साधारण मजदूरों को कृषि पर आधारित मझोले व बड़े स्तर के उद्योगों में स्थायी रोजगार मिल पाने की स्थितिया भी बढ़ सकती है |लेकिन यह सब तभी संभव है जब पूरे पूर्वांचल को विशिष्ट औद्योगिक क्षेत्र का नही बल्कि विशिष्ट कृषि क्षेत्र का दर्जा मिले और वह भी बड़े स्तर की ‘कान्टेक्ट फार्मिंग ‘के लिए नही बल्कि आम किसानो ,मजदूरों के स्थानीय एवं स्थायी जीविकोपार्जन के लिए | लेकिन यह माँग इस क्षेत्र के उद्योगपति करने वाले नही है
श्री झुनझुनवाला ने तो यहा तक कह दिया है की पूर्वांचल में सुविधा न मिल पाने पर वे बिहार में अपनी औद्योगिक इकाईया लगा देंगे और लगा भी रहे है |यह भी सबूत हैकि उनके जैसे उद्योगपतियों के लिए पूर्वांचल को विशिष्ट औद्योगिक क्षेत्र घोषित करने का मामला इस क्षेत्र का समग्र विकास करना नही है |वे यहा तभी टिकेंगे जब उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाभ पाने , कमाने के अवसर मिले |
लेकिन उनके एकदम विपरीत इस क्षेत्र के आम किसान ,मजदूर ,दस्तकार ,बुनकर ,दुकानदार व अन्य जनसाधारण समुदाय यह क्षेत्र अपने लाभ के लिए नही छोड़ते और न ही छोड़ेंगे |उनकी रोजी -रोटी की मजबूरिया ही उन्हें इस क्षेत्र व प्रांत से बाहर दूसरे प्रान्तों में जाने के लिए मजबूर करती है |
जागो —जागो -जागो -
…आती हुई हवाएँ
मायूस होने लगी थीं
ख़ुशबू की तलाश में !
दुर्गन्ध का साम्राज्य था
हर तरफ फैला हुआ
आदमी तो आदमी
दिमाग तक सड़ा हुआ!!

भटकती ही रह गई
अंधेरी राहों पर
रोशनी की तलाश में !!
-सुनील दत्ता
पत्रकार
मो0 9415370672

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