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                                                        धर्म के नाम पर मानव का शोषण करने का यह मामला सदियों
से चल रहा है. हद तो तब हो गयी जब गीता प्रेस के प्रबंधक गण  कहते हैं कि पैसे की कमी नहीं है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक गीता प्रेस को बचाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है . धर्म भीरु और धर्म परायण कोई भी आगे आकर यह कहने के लिए तैयार नहीं है की गीता प्रेस में श्रम कानूनों को लागू करो. मजदूरों को सम्मानजनक वेतन दो जिससे धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन में कोई बाधा न आये. पूँजीवाद मजदूरों के श्रम के शोषण के ऊपर फलता फूलता है उसी तरह से धार्मिक ट्रस्ट ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए मजदूरों को सम्मानजनक जीवन जीने ही नहीं देना चाहते हैं. उसी की चरम प्रणिति गीता प्रेस की ताला बंदी है.
                 हमारे छात्र जीवन में मोतीलाल-श्यामसुंदर लखनऊ की थ्री फेदर्स की अच्छी कापियां बिकती थी जिनके बारे में यह कहा जाता था की भारत सरकार द्वारा गीता प्रेस को किताबें छपने के लिए जो सस्ता कागज मिलता है, उसी को बचाकर यह कापियां तैयार करके बेचा जाता है, अब आगे का अंक गणित स्वयं लगा सकते हैं.
 गीता प्रेस में काम करने वाले लोगों की संख्या लगभग 500 हैं। जिनमें 185 नियमित स्थाई  हैं और लगभग 315 ठेका और कैजुअल पर काम करते हैं।  शासनादेश दिनांक 24-12-06 जारी होने के बाद न्यूनतम मज़दूरी से अधिक पाने वाले मज़दूरों के मूल वेतन का निर्धारण शासनादेश के पैरा-6 के अन्तर्गत किया जाये। प्रदेश सरकार द्वारा स्पष्ट रूप से आदेश किया गया है कि शासनादेश जारी होने के पूर्व यदि किसी कर्मचारी का वेतन न्यूनतम पुनरीक्षित वेतन से अधिक है, तो इसे जारी रखा जायेगा तथा इसे उक्त न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के अन्तर्गत न्यूनतम मज़दूरी माना जायेगा।
 गीता प्रेस के प्रबन्धन द्वारा सभी कर्मचारियों के मूल वेतन को दो भागों में बाँटकर – एक भाग सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल वेतन तथा दूसरे भाग में न्यूनतम से अधिक वेतन को एडहाक वेतन के अन्तर्गत रखा गया और इस एडहाक मूल वेतन पर कोई महँगाई भत्ता नहीं दिया जाता। किसी भी न्यूनतम पुनरीक्षित वेतन शासनादेश में एडहाक वेतन निर्धारण नहीं है। गीता प्रेस द्वारा मूल वेतन पर महँगाई भत्ता न देना पड़े इससे बचने के लिए मूल वेतन के हिस्से में कटौती करके कुछ भाग एडहाक में शामिल कर दिया गया। गीता प्रेस का प्रबन्धन शासनादेश का सीधा उल्लंघन कर रहा है।
  गीता प्रेस में  सभी कर्मचारियों को समान सवेतन 30 अवकाश दिया जाये, क्योंकि साल में किसी को 21 तो किसी को 27 सवेतन अवकाश दिया जाता है जो अनुचित है।  हाथ मशीनों में दबने, कटने और डस्ट आदि से बचने के लिए ज़रूरी उपकरण हो ।
 गीता प्रेस में लगभग 315 मज़दूर ठेके और कैजुअल पर काम करते हैं। इनकी कोई ईएसआई की कटौती नहीं की जाती। इनको  धर्म के नाम पर मज़दूरों की लूट का — 4500 रुपये वेतन देकर 8000 रुपये पर हस्ताक्षर कराया जाता है। ‘सेवा भाव’ के नाम पर इनसे एक घण्टे बिना मज़दूरी दिये काम लिया जाता है। उक्त ठेके का काम गीता प्रेस परिसर में तथा प्रेस से बाहर सामने रामायण भवन तथा भागवत भवन नाम के बिल्डिंग में कराया जाता है। वेतन की पर्ची या रसीद तक नहीं दी जाती। ठेके व कैजुअल पर काम करने वाले सभी मज़दूरों को स्थाई करे । परमानेण्ट होने की अवधि से पहले ठेका कानून 1971 के मुताबिक उनको समान काम के लिए समान वेतन, डबल रेट से ओवरटाइम, पीएफ़, ईएसआई, ग्रेच्युटी आदि सभी सुविधाएँ दे  ।
  आसाराम, रामपाल, राधे माँ, रामदेव सहित तमाम सारे धार्मिक ट्रस्ट जनता की आस्था और विश्वास का लाभ उठा कर अपना-अपना व्यापार कर रहे हैं इस व्यापार में कोई कानून नियम, संविधान लागू नहीं हो सकता है क्यूंकि उनके समर्थकों के आस्था और विशवास का मामला होता है. कोई आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापारी है तो कोई धार्मिक किताबों का व्यापारी है. यह व्यापार व्यापारिक नियमो से अलग हटकर होता है. मजदूरों का हक़ मारकर इनका व्यापार चलता है. मजदूरों के खून से ही इनके चेहरों के ऊपर सफेदी आती है और जितनी अधिक सफेदी आती है. भक्तगणों की भक्ति और अधिक बढ़ जाती है. यह खेल सदियों से खेला जा रहा है और धर्म का वास्तविक स्वरूप सिर्फ मछली को फ़साने के लिए यह शिकारी चारे के लिए इस्तेमाल करते हैं. धर्म अगर अपने मानने वालों को एक सन्देश यह सिखा दे की इमानदारी जीवन की सबसे अच्छी नीति है तो धर्म का स्वरूप उज्जवलमयी होगा समाज को लाभ भी होगा.
              धर्म के नाम पर बहुत सारे धन्ना सेठो  से  बड़ी मात्रा में दान और चढ़ावा मिलता है । दैनन्दिनी, पंचांग पोस्टर ,किताबे  देश  और विदेशों में लाखों की संख्या में बिक्री करके  करोड़़ों रुपये की आय अर्जित करते है ।
 धर्म के नाम पर गीता प्रेस को टैक्स में भारी छूट लेता है। जिस तरह से भेड़िया खरगोश को खाने के लिए पाठ पढ़ता है की मेरे नजदीक आओ क्यूंकि  
अयं निज परोवेति गणना लघु चेतसाम .
उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम्..
है. वास्वतिक मंशा यह है की खरगोश उसके नजदीक आये और वह उसका भक्षण कर अपनी क्षुधा को शांत कर सके लेकिन धर्म का स्वरूप यह नहीं है. 
 
सुमन 

मोदी का नया अवतार

गुजरात, प्रधानमंत्री मोदी की वजह से आजकल चर्चित रहता है. पहले आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सफल संघर्ष चलाने वाले महानायक मोहन दास करमचंद गाँधी के कारण चर्चित रहा है आजादी के बाद नेहरु मंत्रीमंडल के उप-प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों के कारण चर्चा में रहा है. मोदी जब मुख्यमंत्री थे, मुसलमानों के नरसंहार के समय उनके मूक दर्शक होने के कारण गुजरात चर्चित रहा है. मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और महात्मा गाँधी को किसी भी रूप में न मानने के लिए चर्चित संघ रहा है और गाँधी की हत्या में भी संघ का नाम आया और सरदार पटेल ने संघ के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो बाद में माफीनामे के बाद उसको सांस्कृतिक गतिविधियाँ करने की छूट मिली थी. आज मोदी गुजरात में चल रहे आन्दोलन को शांति करने के लिए जो अपील की है वह महात्मा गाँधी की फोटो व सरदार पटेल की फोटो के साथ की है. यह उनका नया अवतार माना जाए या राजनीति में सत्ता के शिखर के ऊपर बने रहने के लिए विचारों की तिलांजलि माना जाए. यह नया मुखौटा प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए मजबूरी है या जरूरी है.
ज्ञातव्य है कि गुजरात में रिजर्वेशन की मांग कर रही पटेल-पाटीदार कम्युनिटी का आंदोलन हिंसक हो जाने के बाद राज्य के बड़े शहरों में तनाव है। अहमदाबाद और सूरत में असर सबसे ज्यादा है। हालात काबू करने के लिए गांधीनगर से आर्मी की एक टुकड़ी अहमदाबाद बुलवाई गई। इससे पहले कुछ लोगों ने पटरियां उखाड़कर कोयले से लदी एक मालगाड़ी में आग लगाने की भी कोशिश की। वहीं, मंगलवार रात से अब तक हुई हिंसा की वजह से उत्तरी गुजरात के पालनपुर में दो लोगों की मौत हो गई। इस तरह हिंसा के चलते अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, केंद्र ने पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियां  भेजी हैं।
गुजरात में चल रहे मुसलमानों के नरसंहार के समय न महात्मा गाँधी की बात आई थी और न ही सरदार पटेल ही याद आये थे. आज यह अपील अद्भुत अपील है – महात्मा गांधी और सरदार पटेल की तस्वीरों के साथ गुजरात की जनता को टीवी पर दो मिनट छह सेकेंड के इस संबोधन में मोदी ने कहा, ‘मेरी सभी भाइयों और बहनों से विनती है कि उन्हें हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। इस समय हमारा एक ही मंत्र होना चाहिए, शांति।’
 ‘हर समस्या का समाधान बातचीत द्वारा निकाला जा सकता है। लोकतंत्र की मर्यादा का पालन हम सबको करना चाहिए। मैं एक बार फिर गुजरात के सभी भाइयों और बहनों को शांति रखने का आग्रह करता हूं। हिंसा के मार्ग पर चलकर कभी कुछ नही मिलता। हम सब साथ मिलकर बातचीत के जरिए समस्या का समाधान करें।’
यह अपील जब गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हो रही थी उस समय अगर आई होती तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी का कद जनता के दिमाग में बढ़ गया होता लेकिन आज जब उनका स्वयं का वोट बैंक हिंसा के ऊपर उतर आया है तब वह शांति का पाठ पढ़ाकर गौतम बुद्ध का सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं और जब अल्पसंख्यकों का नरसंहार चल रहा था तब वह हिटलर की यहूदी विरोधी नीति का अनुसरण कर रहे थे. शायद राजनीति में सब कुछ जायज है.
सुमन

लफ्फाजों की महाभारत

महाभारत  के नायक

उफ़ा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने मिलकर दोनों पक्ष सभी लंबित मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमति बनी , जिसमें भारत और पाकिस्तान ने मुम्बई आतंकी हमले से संबंधित मुकदमे में तेजी लाने का निर्णय, दिल्ली में मिलेंगे भारत-पाकिस्तान के NSA डीजी BSF और DGMI की बैठक, दोनों पक्षों ने 15 दिनों के भीतर एक-दूसरे के मछुआरों और उनकी नौकाओं को छोड़ने का निर्णय, मुंबई हमले के वॉयस सैंपल मुहैया कराएंगे व नवाज शरीफ ने पीएम मोदी को दिया सार्क सम्मेलन में आने का न्योता दिया.

दो तीन दिन से लगातार दाउद से लेकर कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की नजरबंदी और फिर नजरबंदी को वापस लेना तथा अलगाववादी नेताओं की जेलों से रिहाई आदि का हाई प्रोफाइल ड्रामा देश की जनता को देखने को मिल रहा है. न पाकिस्तान दाउद को भारत को सौंपने जा रहा है न ही भारत पाकिस्तान से अच्छे सम्बन्ध रखना चाहता है. अगर भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध अच्छे हो जायेंगे तो तथाकथित राष्ट्रवादी देशभक्तों की दुकाने अपने आप बंद हो जाएँगी, लेकिन ड्रामा चल रहा है इस ड्रामे का अंत अगर हो जाता है तो दोनों देशों के राष्ट्रवादी एक इंच जमीन न देने का नारा लगाने वाले लोगों की राजनीति समाप्त हो जाएँगी. चुनाव में कई दलों को इस नाटक से वोट का प्रतिशत बढ़ता है इसलिए यह सब होता रहता है. हिंदी साहित्य में भी अगर पकिस्तान और कश्मीर न होता तो आधी कवितायेँ नहीं लिखी जाती और बहुत सारे लोग कवि बनने से वंचित रह जाते. पिछली एनडीए सरकार में कारगिल की घुसपैठ या युद्ध या सीमापार फायरिंग कुछ भी नाम दे, नूराकुश्ती का ही परिणाम था और राष्ट्रवादियों ने ताबूत घोटाला कर डाला था. देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए यह सब होता रहता है और लफ्फाजों का युद्ध मीडिया में घमासान रूप से जारी रहता है.
वहीँ, उग्र हिन्दुवत्व वाला दल शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा कि’दाऊद का भजन बंद करो, अगर आप में हिम्मत है तो पाकिस्तान में घुसो और उसे पकड़ कर लेकर आइए।’ यह दल हमेशा उग्र राष्ट्रवाद की बात करता है लेकिन देश बकी एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई कोर-कसर नही छोड़ता है. कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर यह अपने देश के नागरिकों के खिलाफ भी तलवारें भांजता रहता है.
 यह सब हाई प्रोफाइल ड्रामा जान बूझकर जनता का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए किया जाता है वहीँ, दूसरी तरफ सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए जो काम कर रही होती है, उसकी तरफ लोगों का ध्यान न जाए और उसकी बहस संसद में भी न होने पाए उसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है. यह सरकार सोमवार को पेट्रोलियम क्षेत्र की सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कार्पोरेशन (आइओसी) में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी का विनिवेश करने जा रही है. सरकार का कहना है कि इससे सरकारी खजाने में 9,500 करोड रुपये आने की उम्मीद है. सरकार ने इंडियन ऑयल कार्पोरेशन में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिये 387 रुपये का न्यूनतम शेयर मूल्य तय किया. इससे पहले किये गये तीन विनिवेश से 3,000 करोड रुपये जुटाये गये. सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान विनिवेश से 69,500 करोड रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. इस तरह से सार्वजानिक क्षेत्र को सस्ते दामों पर उद्योगपतियों को बेचने का काम जारी है जिसकी चर्चा न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है न प्रिंट मीडिया में है. सरकार में स्थापित नेतागण पाकिस्तान से लफ्फाजी की महाभारत करते रहते हैं और एक विशेष प्रकार का उन्माद जनता में पैदा करते हैं ताकि जनता उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों के सम्बन्ध में सोचने व समझने की स्तिथि में न रह जाए यही आतंकवाद के नाम पर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. लफ्फाजी की महाभारत ज़ारी रहेगी, कॉर्पोरेट सेक्टर जनता से जल,जंगल, जमीन छीनता रहेगा. सरकार उसकी गुलामी करती रहेगी.
सुमन
उनसे कह दो, गुजरे हुए गवाहों सेझूंठ तो बोले, मगर झूंठ का सौदा न करे ===== जिसे यूएई की राजधानी में बनने वाला पहला मंदिर बताकर सरकार द्वारा प्रचारित किया जा रहा है इस ऐतिहासिक फैसले के लिए मोदी ने यूएई सरकार का शुक्रिया अदा किया, बताया जा रहा है कि इस मंदिर के लिए जमीन तो वर्ष 2013 में ही एक अरब शेख ने दान दी थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 9 जुलाई 2013 की खबर के अनुसार, एक निवेश कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नाज़ेम-अल-कुदसी के निमंत्रण पर स्वामीनारायण संप्रदाय मंदिर के अधिकारियों ने अबूधाबी का दौरा भी किया था।
 विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया था, ‘भारतीय समुदाय की लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई। प्रधानमंत्री की यात्रा पर यूएई सरकार ने अबू धाबी में एक मंदिर बनाने के लिए जमीन आबंटित करने का फैसला किया।’ उन्होंने लिखा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए यूएई नेतृत्व का शुक्रिया अदा किया।’
 दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं.दुबई का पहला हिंदू मंदिर 1958 में बना था और यह एक मस्जिद के निकट है.
देश में झूठ, विदेश में झूठ, चुनाव में झूठ शायद नागपुर मुख्यालय की यही आदर्श और नैतिकता है. दुबई में मंदिर जमीन को लेकर सोशल मीडिया में भक्तों द्वारा तरहत-तरह की कहानियाँ लिखी जा रही हैं. जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है. दुबई में भी जाकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बता आये हैं. वहीँ, जेडीयू नेता के. सी. त्यागी ने कहा कि कल देर रात तक वो दुबई में थे, आत्मा उनकी बिहार में पड़ी हुई थी. और वो दुबई से बिहार के मतदाताओं को राजनीतिक रिश्वत देने के लिए आरा पहुंचे. चुनाव में तरह-तरह की अफवाहों और झूठ बोले गए जिनका वास्तविकता से कोई मतलब ही नहीं था. बिहार में चुनाव शुरू हो रहे हैं सवा लाख करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने की बात शुरू कर दी जबकि यह पैकेज कहाँ और कैसे खर्च होगा उसका कोई प्लान भारत सरकार के पास नहीं है. बस काम चल रहा है किसी तरह से . सरकार चल रही है किसी तरह से.
सुमन

राम राज्य का ढोल बजाया,

नेता ने कंट्रोल उठाया ,

काले-बाजारी बनियों को –

दिल में,दिल्ली में बैठाया ;

खुल्लमखुल्ला लुट मच गई

महगाई ने रंग दिखाया!

आज़ादी की चाल दुरंगी ,

घर-घर अन्नं-वस्त्र की तंगी ,

तरस दूध को बच्चे सोए-

निर्धन की औरत अधनंगी ,

बढती गई गरीबी दिन-दिन ,

बेकारी ने मुह फैलाया!

तब गरीबी ने शोर मचाया,

बहुत सहा, अब नहीं सहेगे!

कहा गए वे वादे ?अब हम

भूखे नंगे नहीं रहेंगे!

सुन ललकार जगी जनता की –

दिल्ली कापी , दिल थर्राया!

लीडर ने तरकीब निकाली ,

हिटलरशाही को अपनाया ,

जगह-जगह गोलिया चलाई ,

नेताओ को जेल भिजाया ;

उम्मीदों की सीता हर ली ,

अपना रावण रूप दिखाया !

सोशलिस्ट कहलाने वाले

बोले, “पैदावार बढाओ !

पेट सेठ का कहाँ भरा है ,

और खिलाओ ,और ठुसाओ !”

झुक पटेल की चप्पल चूमी ,

मौका देखा , पलटा खाया !

संघ खुला , खद्दर जी बोले,

“आओ तिनरंगे के नीचे !

रोटी ऊपर से बरसेगी ,

करो कीर्तन आँखे मीचे !

तुमको भूख नहीं है भाई ,

कम्युनिस्टो ने है भड़काया !”

लेकिन भैया ,भूख आग है ,

भड़क उठे तो खा जाती है !

नहीं गोलिओ से बुझती है ,

गुपचुप जेल नहीं जाती है !

भूख बला है , कुछ मत पूछो ,

बड़े-बड़ो को नाच नचाया!

“अब यों गाड़ी नहीं चलेगी “,

रेल कामगार का नारा !

“बोनस ,या मिल नहीं चलेगी “,

गिरनी वालो ने ललकारा !

गोदी पोस्ट मजूर कह उठे –

“बहुत दिनों तक धोखा खाया !”

गवरमिंट बटुवा दिखलाती ,

कहती कौड़ी पास नहीं है !

चाहो तो गोली खिलवा दे,

गोली कभी खलास नहीं है !

छोड़ दिए जासूस हजारो ,

तरह-तरह का दर दिखलाया !

खून रंगा परचम जनता का ,

रहा फहरता , झुक नहीं सका !

दमन बढा तो और बढ़ गया ,

जन आन्दोलन रुक नहीं सका !

फूट डालने वालो ने ऊपर थूका

तो   मुँह    पर     आया !

हरदम गरज रहा है अम्बर ,

शत संघर्षो के नारों से ;

एका कब कटता है भाई

ज़ोंर जुंल्म की तलवारों से?

एका हर बल से तगड़ा है ,

एक हर बल से झगड़ा है ,

इसने भू पैर स्वर्ग उतारे ,

पलटी इस दुनिया की काया !

-शंकर शैलेन्द्र

शंकर शैलेन्द्र

शंकर शैलेन्द्र

शंकर शैलेन्द्र

                                                                                                 शंकर शैलेन्द्र

सुन भैय्या रहिमू पाकिस्तान के 

भुलआ पुकारे हिंदुस्तान से

भुलवा जो था तेरे पड़ोस में

संग-संग थे जब से आए होश में

सोना- रूपा धरती की गोद में

खेले हम दो बेटे किसान के |

सुन भैय्या …

दोनों के आँगन एक थे भैय्या

कजरा औ “सावन एक थे भैया

ओढत -पहरावन एक थे भैय्या

जोधा हम दोनों एक मैदान के |

सुन भैय्या …

परदेशी कैसी चाल चल गया

झूठे सपनो से हमको छल गया

डर के वह घर से तो निकल गया

दो आँगन कर गया मकान के |

सुन भैय्या …

मुश्किल से भर पाए है दिल के घाव

कल ही बुझा लाशो का अलाव

अब भी मझधार में है अपनी नाव

फिर क्यों आसार है तूफान के |

सुन भैय्या …

तेरे मन भाया जो नया मेहमान

आया जो देने शक्ति का वरदान

आँखों से काम ले भैया पहचान

लिया चेहरे -मोहरे शैतान के |

सुन भैया …

इसने ही जग को दिया हथियार

फांसी के फंदे बांटे है उधार

इसका तो काम लाशो का ब्यापार

बचना ये सौदे है नुकसान के |

सुन भैया …

मै सभलू भैया तू भी घर संभाल

गोला-बारूद ये लकड़ी की ढाल

छत पर मत रखो यह परदेशी माल

कहते है नर-नारी जहान के |

सुन भैया …

हर कोई गुस्सा थूको मुस्कराओ

जो भी उलझन है मिल-जुल के सुलझाओ

सपनो का स्वर्ग धरती पर बसाओ

बरसाओ मोती गेहू -धान के |

सुन भैया …

– शंकर  शैलेन्द्र

शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

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