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डॉलरब्रिटिश साम्राज्यवाद की ताकत पौंड थी जिसकी बदौलत उसके राज्य का सूरज अस्त नहीं होता था जिसका सीधा अर्थ यह था कि इंग्लैंड के राज्य में सूरज कहीं न कहीं उसकी रोशनी से प्रकाशमय होता था. उसकी मुद्रा पौंड में गिरावट आई और डॉलर ने ताकत ली. इंग्लैंड से ताज अमेरिका चला गया. अमेरिकी साम्राज्यवाद का ताज आज दुनिया में शासन का एक प्रमुख अस्त्र है. बहुत सारी सरकारें उस ताज की बदौलत अपने-अपने देशों में राज कर रही हैं. उसकी चापलूसी में अपने देश में नागपुरी मुख्यालय उसके गीत गाने में लगा रहता है. गीत गुनगुनाता रहता है. आज कल जो मुख्य गीत गुनगुनाया जा रहा है ‘आतंकवाद खत्म कर दो, आतंकवाद ख़त्म कर दो’.ये नकली गीत नए मुखौटों के साथ गाया जा रहा है. सभी जानते हैं की आतंकवाद का सरगना अमेरिका और उसका साम्राज्यवाद है. उसकी चेलाही नागपुर मुख्यालय करता है. पहले नागपुर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गीत गाता था और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के गीत गाता है लेकिन वह नहीं भूला है अपने बाप एडोल्फ़ हिटलर को और उसकी मानवता को शर्मसार करने वाली कत्लेआम की घटनाएं.
           विश्व परिद्रश्य बदल रहा है. डालर दुनिया में अपना शासन स्थापित करने में असमर्थ हो रहा है. डॉलर के ख़त्म होने का मतलब है कि सम्पूर्ण मानवता के खिलाफ जारी एक युद्ध की समाप्ति. इस काम में चीन, ईरान सहित जो आर्थिक समझौते और मानवता को अमेरिकी साम्राज्यवाद से बचाए रखने के लिए जो रास्ते खोजे जा रहे हैं उसी के सन्दर्भ में अमेरिकी-जर्मन विद्वान, इतिहासकार और रणनीतिक जोखिम परामर्शदाता विलियम एंगडाह्ल ने ‘न्यू ईस्टर्न आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कहा है:
“कभी-कभी वैश्विक राजनीति में युगांतरकारी परिवर्तन ऐसी घटनाओं से आरम्भ होते हैं जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता| चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की हाल ही की तेहरान यात्रा ऐसी ही एक घटना है| इन वार्ताओं के परिणाम यह दिखाते हैं कि शांतिपूर्ण आर्थिक विकास में विश्वास रखने वाले देशों के यूरेशियाई स्वर्ण त्रिकोण की जीवानाधारी तीसरी भुजा अब पा ली गई है|”
                एंगडाह्ल ने यह निष्कर्ष व्यक्त किया है: “रेशम मार्ग की योजना में यह लक्ष्य निर्धारित है कि रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास इस तरह किया जाएगा ताकि इससे नए स्वर्ण-खनन कार्य को मदद मिले जो यूरेशियाई सदस्य देशों  की मुद्राओं की पीठ मजबूत करेगा| अब ईरान अपने अभी तक अछूते पड़े स्वर्ण-भंडारों के साथ भी इस योजना में शामिल हो जाएगा तो कर्ज में डूबी, अतिशय स्फीति से ग्रस्त डालर प्रणाली के लिए एक घातक सकारात्मक विकल्प पैदा हो जाएगा जो शांति और विकास के लिए कृतसंकल्प है|”
वह कहते हैं: “ईरान और चीन के बीच नवीनतम व्यापर समझौतों के बाद ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर’ का जीवनदायक महत्व और भी बढ़ गया है”|
डॉलर की मौत का मतलब है. सम्पूर्ण मानवता को नया जीवन. हमारे देश में डॉलर की मौत का मतलब है नागपुर मुख्यालय की मौत. इसका स्वभाव रहा है पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जूतों में पोलिश करना और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के जूतों की चमक को बढाने के लिए नरम ओठों से उसको चमकाना.
सुमन

सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान के उन क्षेत्रों को जो अफगानिस्तान से मिले हुए थे वहां पर मदरसों के माध्यम से तालिबान को पूरी तरीके से पोषित कर सोवियत संघ को अफगानिस्तान में नीचा दिखाया था. अमेरिकी मदद के बाद तालिबान का वृक्ष वटवृक्ष का रूप धारण कर लिया और जब अमेरिका के खिलाफ कुछ क्षेत्रों में उसने लड़ाईयां लड़ी तो अमेरिका ने आतंकवाद समाप्त करने का नारा दिया. ईराक में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार को नष्ट कर दिया और वहां की जनता को कोई व्यवस्था नहीं दी. इसी तरह इराक के अगल-बगल के देशों में अमेरिका ने उन सरकारों को नष्ट करने के लिए तमाम सारे आतंकी संगठनो को मदद करके एक शैतान का साम्राज्य स्थापित कर दिया.
ईराक की अव्यवस्था के बाद आई एस आई एस का उभार सामने आता है और सीरिया में असद की सरकार को नष्ट करने के लिए उसकी मदद पश्चिमी देशों ने की थी . आई एस आई एस का नेता अबु बक्र अल-बगदादी 2003 में इराक में अमेरिकी घुसपैठ के बाद बागी गुटों के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था। वह पकड़ा भी गया और 2005-09 के दौरान उसे दक्षिणी इराक में अमेरिका के बनाए जेल कैंप बुका में रखा गया था। और 2010 में इराक के अलकायदा का नेता बन गया। कहा यह जाता है कि बगदादी को अमेरिकी जेलों में ट्रेनिंग देकर छोड़ा गया था कि सीरिया जैसे मुल्कों को वह अपने कब्जे में ले लेगा. जो भी ताकत बगदादी के पास है वह ताकत अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों के समर्थक देशों के बदौलत है. अब सवाल यह उठता है कि बगदादी के पास जो अत्याधुनिक हथियार हैं उनकी सप्लाई कौन से मुल्क कर रहे हैं और उसके बदले में सस्ता पेट्रोलियम पदार्थ कौन से मुल्क खरीद रहे हैं इन सवालों का पश्चिमी देश चुप्पी साध लेते हैं.
आतंकियों को बेरोजगार नौजवानों  को  जिनके कोई रोजगार  नही है तो वह पैसो  के लिए   उनके हितसाधक  बन जाते है और धर्म  की गलत बयानी का नशा  पीकर  जन्नत   जाने की लालसा  में  वह सब कुछ करने को तैयार  हो जाते है तब वह धर्म की करुणा-दया -प्यार   को भूल जाते है अमरीकियों  ने तो धर्म  के शब्दों  के अर्थ  ही बदल डाले है
वही दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर  डॉक्टर सुधीर सिंह कहते हैं,कि “अफगानिस्तान की सेना बहुत हद तक तालिबान से या इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से लड़ने में सक्षम है। ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि अफगानिस्तान की सेना को और मजबूत किया जाए। रूस-भारत और मध्य एशिया के देशों ने अच्छी पहल की है। भारत ने भी चार लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स दिए हैं अफगानिस्तान की सेना को। अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी भारत आने वाले हैं। भारत-रूस ने बहुत सारे हथियार अफगानिस्तान की सेना को देने का फैसला किया है। ईरान भी इसमें सहयोग कर रहा है। अब अमेरिका वस्तुस्थिति को समझते हुए इसे मुद्दा न बनाए। सीरिया में भी असद के विरोध या समर्थन को भी अमेरिका को मुद्दा नहीं बनाते हुए सारा ध्यान इस्लामिक स्टेट के सफाई पर केंद्रित किया जाना चाहिए। इस लड़ाई का विस्तार इराक में भी होना चाहिए क्योंकि यहां भी इस्लामिक स्टेट का गढ़ है और इन आतंकियों के लिए देश की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है। अभी तक लड़ाई सीरिया की सीमा के अंदर चल रही हैं। यही नहीं अमेरिका को यहां भी यह तय करना होगा कि वो इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का सफाया करे ना की असद की सेना को नुकसान पहुंचाया जाए“। फ्रांस की राजधानी पेरिस में जो घटनाएं घटी हैं वह निंदनीय हैं, दुखद हैं लेकिन यह तय करना पड़ेगा कि दोहरी नीतियों के कारण बगदादी जैसे लोग विश्व समुदाय के लिए खतरा बन गए हैं लेकिन जब तक अमेरिका की दोहरी नीतियां बंद नहीं होती हैं और उसकी मुनाफाखोर नीतियां हमेशा आतंक और आतंकवादियों को जन्म देती रहेंगी. बगदादी का विनाश अगर पश्चिमी मुल्क चाहे तो उसके सस्ते पेट्रोल खरीद को बंद करके तथा इमानदारी से हथियार सप्लाई करने वाली चैन को ध्वस्त कर दे तो निश्चित रूप से इन आधुनिक शैतानो का विनाश हो सकता है. रूस ने लगातार हमले कर बगदादी की ताकत को लगभग समाप्त सा कर दिया है लेकिन पश्चिमी देशों की दोमुही नीतियों के कारण वह आज भी जिंदा है. आतंकवाद हमेशा निरीह जनता को मार डालने का ही काम करता है उसका कोई धर्म नहीं होता है. इंसान का लहू पीना उसकी फितरत है लेकिन राजनीति की जरूरतों के कारण आतंकवादी पैदा किये जाते हैं और जब वह पलट कर पैदा करने वालों को पीटने लगते हैं तब असली कष्ट का एहसास होता है वही हालत पेरिस घटना के बाद तमाम सारे साम्राज्यवादी लोगों को महसूस हो रहा है. हम सब मानवता पसंद लोग फ्रांस की जनता के साथ हैं. जनता को चाहिए कि अपने-अपने मुल्कों की सरकारों को बाध्य करे की वह आतंकवादियों की मदद अपनी राजनितिक आवश्यकताओं के लिए न करे.
 सुमन

लो क सं घ र्ष !

आरक्षण और हिंदुत्व

सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने अब भारतीय कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है। भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। भारत की केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में 27% आरक्षण दे रखा है और विभिन्न राज्य आरक्षणों में वृद्धि के लिए क़ानून बना सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता है।
.                          इस व्यवस्था के खिलाफ नागपुर मुख्यालय समय-समय पर समाप्त करने के लिए तरह-तरह के मुखौटे लगा कर आन्दोलन चलने का काम करता रहा है. विश्वनाथ प्रताप सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का काम पूरा कर दिया था. तब नागपुर मुख्यालय ने छात्रों नौजवानों से लेकर अडवानी की रथयात्रा निकलवा कर मंडल पर कमंडल की विजय प्राप्त करने की कोशिश की थी. संघ ने आखिर विश्वनाथ प्रताप सिंह की खिचड़ी सरकार को गिरा कर ही दम लिया था. हाँ यह बात जरूर सही है कि मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद उसको समाप्त नहीं कर पाए थे. इस बीच संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात उठा कर इस मुद्दे को पुन: जीवंत कर दिया मुख्य सवाल यह है कि आरक्षण के बाद जो अभिजात्य वर्ग आरक्षित समुदायों में पैदा हुआ उसका सीधा सम्बन्ध हिन्दुवत्व की राजनैतिक विचारधारा वाले संघ को फायदा हुआ संघ के राजनितिक मुखौटे भाजपा को दलितों के एक बड़े समुदाय का मत व समर्थन प्राप्त हुआ. गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री पद पर राज इसलिए भी किया कि दलितों, पिछड़ों व सवर्णों के जो आर्थिक टकराव थे उस आर्थिक टकराव को उन्होंने मुस्लिम विरोध में बदल दिया था. इस बार संसदीय चुनाव में मुस्लिम विरोध के नाम पर दलितों, पिछड़ों व सवर्णों का एक हिन्दुवत्व वादी बड़ा समूह तैयार हुआ व उसने हर-हर मोदी करते हुए शुद्ध नागपुरी विचारधारा को शासन सत्ता दिला दी.
                सत्ता प्राप्ति के बाद नागपुर को यह महसूस होने लगा कि हिन्दुवत्व की विचारधारा बहुसंख्यक आबादी को ग्राह हो गयी है तो आरक्षण की भी समीक्षा कर उसके आधार को आर्थिक कर दिया जाए जिससे दलितों, पिछड़ों, आदिवासी, जनजातियों को सैकड़ों वर्ष पूर्व सेवक की भूमिका में बदला जा सके इसीलिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की ओर से मिलने वाली स्कालरशिप की व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है. अगर इन तबकों को स्कालरशिप के नाम पर मिलने वाली आर्थिक मदद बंद हो जाये तो उच्च शिक्षा संस्थानों में इन समुदायों के छात्रों की संख्या स्वत: कम हो जाएगी.
       आज जब सरकारी नौकरियां समाप्त की जा रही हैं और एक विशाल प्राइवेट सेक्टर रोजगार का सृजन कर रहा है तो उसमें आरक्षण लागू करने की आवश्यकताएं महसूस की जा रही हैं और यह मांग समाज में उठनी प्रारंभ हो चुकी है ऐसे वक्त में सरकारी नौकरियों में आरक्षण बनाये रखने की बजाये उसके आधार को बदल देने की नागपुर की मनुस्मृति को लागू करने की पुन: कोशिश है.
जैसे-जैसे वंचित तबकों में खुशहाली आ रही है उतनी ही तेजी से नागपुर की विषाक्त विचारधारा के कारण मुस्लिम विरोध के नाम पर हिन्दुवत्व वादी विचारधारा बढ़ रही है. इसके लिए नागपुर मुख्यालय में बैठे हुए लोग इतिहास का नवीनीकरण कर रहे हैं. जिससे मुस्लिम विरोध के नाम पर इन तबकों में मत का प्रतिशत हिंदुवत्व के लिए बढ़ रहा है.
नागपुर में बैठे हुए लोग इतिहास के अर्धसत्यों को लेकर तरह-तरह की झूठी कहानियां गढ़ कर एक भ्रामक इतिहास भी तैयार कर रहे हैं. कर्नाटक में टीपू सुलतान के इतिहास का संप्रदायीकरण उसका विशेष उदहारण है. टीपू सुलतान ने अंग्रेजों को कई बार युद्ध में हराया. टीपू सुलतान के विरोध में अंग्रेजों के साथ मराठे, आयंकर ब्राह्मण, हैदराबाद रियासत के लोग थे जो अंग्रेजों के साथ मराठे व अयंकर ब्राहमण थे वह युद्ध में अगर मारे गए तो नागपुर मुख्यालय को इसको हिन्दू मुसलमान बना कर आज घडियाली आंसू रो रहा है. वह इतिहास को इस दृष्टि से नहीं देख रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ रहने वाले लोग मारे गए थे. नागपुर मुख्यालय की निष्ठां सदैव अंग्रेजों के साथ रही है. अंग्रेजों के साथ रहने वाले लोगों के युद्ध में मारे जाने के इतिहास को वह बदल रही है.
आरक्षण भारत के इतिहास को बदलने की एक आवश्यकता है. सभी नागरिकों को एक सामान करने में आगे बढे हुए लोगों को कुछ संतोष करना पड़ेगा जब दुनिया में हम खड़े होते हैं तो हमारे यहाँ पेड़ की छाल उबाल कर पीने लोग या गोबर से गेंहू निकाल कर खाने वाले लोग मौजूद होते हैं वहीँ दूसरी तरफ एक तबका मंगल व चाँद पर मकान बनाने की तैयारी कर रहा है. इस अंतर को समाप्त करने के लिए आरक्षण का सहारा लेना ही पड़ेगा और नागपुर मुख्यालय यह बात समझने में असमर्थ है. अरक्षित तबकों को वोट के लिए साथ भी रखेंगे और गला भी काटेंगे. मुस्लिम या अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के खिलाफ लड़ाई में आगे रखेंगे लेकिन हिन्दू मानेगे भी नहीं. मदिर में प्रवेश निषेध लिखा मिलेगा.
सुमन

टीपू सुल्तान मैसूर का शासक था. उसने ईस्ट इंडिया कंपनी को कई बार पराजित किया था और टीपू सुलतान के खिलाफ निज़ाम हैदराबाद व मराठा अंग्रेजों के साथ शामिल रहते थे. उसके बावजूद टीपू सुलतान हरा पाने में अंग्रेज असमर्थ थे और मजबूर होकर उन्होंने मंगलौर संधि कर ली थी. सबसे बड़ी बात यह है तत्कालीन अन्य शासक टीपू सुलतान की मदद अंग्रेजों के खिलाफ नहीं कर रहे थे. आज उसी टीपू सुलतान की चरित्र हत्या सम्बन्धी बहुत सारी कहानियां जो कई वर्षों से नागपुर की इतिहास की प्रयोगशाला में तैयार की जा रही थी. उनको सोशल मीडिया में काफी पहले से प्रकाशित किया जा रहा था. उसको कट्टरवादी मुसलमान तथा हिन्दुवों का विरोधी साबित करने के लिए नागपुरी कार्यकर्त्ता तरह-तरह की अफवाहबाजी फैला कर झूठ को सत्य बनाने का काम कर रहे हैं. टीपू सुलतान जब निजाम की गद्दारी के कारण 1799 में श्रीरंगपट्टनम में शहीद हुआ तो उसके हाथ की उँगलियों में पहनी हुई अंगूठी जिसमें राम लिखा हुआ था, एक अंग्रेज जनरल ने निकाल लिया था जिसकी नीलामी अभी कुछ वर्ष पूर्व इंग्लैंड में हुई है लेकिन संघी दुष्प्रचारक आज टीपू सुलतान को हिन्दू विरोधी साबित करने के लिए तरह-तरह की कहानियां फैला रहे हैं. टीपू सुल्तान को भारत में ब्रिटिश शासन से लोहा लेने के लिए जाना जाता है.
 टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज़ श्रीरंगपट्टनम से दो रॉकेट ब्रिटेन के ‘वूलविच संग्रहालय’ की आर्टिलरी गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए। सुल्तान ने 1782 में अपने पिता के निधन के बाद मैसूर की कमान संभाली थी और अपने अल्प समय के शासनकाल में ही विकास कार्यों की झड़ी लगा दी थी। उसने जल भंडारण के लिए कावेरी नदी के उस स्थान पर एक बाँध की नींव रखी, जहाँ आज ‘कृष्णराज सागर बाँध’ मौजूद है। टीपू ने अपने पिता द्वारा शुरू की गई ‘लाल बाग़ परियोजना’ को सफलतापूर्वक पूरा किया। टीपू निःसन्देह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था। उसने ‘आधुनिक कैलेण्डर’ की शुरुआत की और सिक्का ढुलाई तथा नाप-तोप की नई प्रणाली का प्रयोग किया। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में ‘स्वतन्त्रता का वृक्ष’ लगवाया.
समय रहते हुए यदि जागरूक लोग नहीं चेते तो निश्चित रूप से इस देश के इतिहास को संघी प्रयोगशाला हिन्दू और मुसलमान के आधार पर विभक्त कर देगी और मुस्लिम शासकों द्वारा किये गए अच्छे कार्यों को वह हिन्दू विरोध में बदल देगी. मुख्य कारण यह है कि संघी प्रयोगशाला के लोगों का चेहरा भारतीय इतिहास में ईस्ट इंडिया कंपनी या अंग्रेजों की चापलूसी करने का ही रहा है. इनके पास कोई नायक नहीं है इसलिए भारतीय इतिहास के महानायकों को यह लोग खलनायक की भूमिका में बदल देना चाहते हैं. इसके लिए इतिहास इन्हें माफ़ नहीं करेगा. कर्नाटक सरकार जब टीपू सुलतान का जन्मदिन मना रही है तो तथाकथित हिन्दुवत्व वादी इतिहास के इस महानायक की चरित्र हत्या कर रहे हैं. इन मुखौटाधारियों की पोल खुल चुकी है इसीलिए दिल्ली, बिहार में बुरी तरह पराजित होने के बावजूद कोई सबक नहीं ले रहे हैं.
सुमन

राजनाथ ने अपने बड़बोले मंत्रियों को नसीहतदी है. केंद्र सरकार के मंत्री जनरल वीके सिंह और किरण रिजीजू को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने हिदायत देते हुए कहा है कि गो हत्या, हरियाणा में दलितों की हत्या जैसे गंभीर मुद्दों पर सोच समझ कर बयान दे.

                  राजनाथ सिंह  भी संघ के प्रचारक रहे है और अब शायद भूल रहे है कि संघ की मूल विचारधारा  यही है जिसका जाप मंत्री या भाजापा के नेतागण कर लिया करते है. छुपी हुई बाते या छुपा हुआ एजेंडा कब तक छुपाए रखोगे, चाहे बाबरी मस्जिद को तोड़ने का मामला हो या गुजरात का नरसंघार छुपे  हुए एजेंडे  को लागू किया गया था और यह नेतागण खुशिया मना रहे थे और अदालतों  में इंकार कर रहे थे,  इनकी मुख्य समस्या संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमाऔर राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होना है”. संविधान के अनुसार बातें करनी हैं ताकि सत्ता का सुख मिलता रहे सत्तासुख के लिए केंद्र सरकार पर काबिज सत्तारूढ़ दल मुखौटे लगा कर दोहरे जीवन पद्यति को अपना रहा है.
संघ की मूल विचारधारा के अनुसार पिछड़ों दलितों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है और उसी समझ के अनुसार जब केंद्र में बैठे हुए नेतागण व अन्य नेता अपनी बात को जनता के सामने रखते हैं तो सही बात आ जाती है. मंडल कमीशन के आने के बाद पूरे देश में जो आरक्षण विरोधी आन्दोलन चला था उसको सुनियोजित तरीके से संघ के संगठन ने संचालित किया था. अल्पसंख्यकों के सवाल को लेकर 1984 के दंगे के पीछे जो कत्लेआम हुआ था वह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है.
ओडिशा के कंधमाल क्षेत्र में जो ईसाईयों का कत्लेआम हुआ था वह भी संघ की सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. आदिवासियों को, दलितों को, पिछड़ों को धर्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश वर्जित था और आज भी संघ द्वारा चलाई जा रही हिंदुवत्व वाली विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा है तो जगह-जगह इन तबकों पर हमले हो रहे हैं और इन हमलों के बीच में संघ का कहीं न कहीं अदृश्य हाथ नजर आता है.
सत्ता सुख भोगने के लिए गृह मंत्री  राजनाथ सिंह का मंत्रियों को समझाने या डांटने का कोई अर्थ नहीं है. बल्कि सत्तासुख के लिए कुछ देर के लिए इन घ्रणित एजेंडों को छुपाये रखने का ही मामला है. अगर पूरी ताकत के साथ देश के अन्दर इनको सत्ता प्राप्त होती है तो आने वाले दिनों में इनकी भाषा व चेहरा बड़ा भयानक होगा। इनकी कल्पना में स्वयं को शेर समझने की बाकी सभी शिकार हैं.

संघ का महान राष्ट्र

राष्ट्र और राष्ट्रवाद का ठेका राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास है. आज एक तरफ कल्पित रावण मर रहा था तो दूसरी तरफ 1925 दशहरे के दिन नया रावण जन्म ले रहा था. जन्म लेने के बाद जैसे वह युवा अवस्था में पहुंचा और फिर ताकतवर हुआ, तो उसके प्रचारक रहे मुख्यमंत्री ने कहा कि कार के नीचे कुत्ते का पिल्ला आ जाये तो उसमें ड्राईवर का क्या दोष. यह बात मुस्लिम समुदाय के सम्बन्ध में कही गयी थी उनका धर्म और संघ के प्रचारक का धर्म अलग-अलग हो सकता था लेकिन नागरिकता के हिसाब से दोनों भारतीय नागरिक थे. वहीँ, आज भारत के केन्द्रीय मंत्री वी.के सिंह ने हरियाणा में दलितों को जलाये जाने की घटना के सम्बन्ध में कहा कि कुत्ते को पत्थर मारता है तो केंद्र सरकार का उसमें क्या दोष है आज वही व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है, जो अल्पसंख्यकों को कुत्ते का पिल्ला समझता है और हिन्दू समाज में दलितों को कुत्ते का पिल्ला या कुत्ता समझने वाला व्यक्ति केंद्र सरकार में मंत्री है. दोनों ही व्यक्ति नागपुरी मुख्यालय से संचालित होने वाले हैं. उनकी विषाक्त विचारधारा का पोषण यह लोग करते हैं. आदमी को कुत्ता, कुत्ते का पिल्ला समझना इनकी मुख्य समझदारी है. यही बात नागपुर मुख्यालय अपने कार्यकर्ताओं को पढ़ाता रहता है. इंसान, इंसान नहीं है उसको जानवर में तब्दील करो और उसकी हत्या करने में कोई भी संकोच करने में परेशानी न हो.
वही लालू ने ट्वीट कर कहा, ‘जो वीके सिंह ने बोला वही बीजेपी का मूल विचार है। जो दलित-पिछड़ा को जितना अधिक गाली देगा, शोषण करेगा उसको संघ और बीजेपी उतना ही बड़ा नेता मानता है।’ जेडीयू के प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा, ‘हमलोग स्तब्ध हैं कि ऐसे लोगों को मोदी ने मंत्री बना रखा है। वीके सिंह अक्सर गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील बयान देते हैं। हमलोग को चुनावी मुद्दा बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि बीजेपी खुद बनवा रही है।’
नागपुरी मुख्यालय आदमी को जानवर बनाने की प्रयोगशाला है. अभी तक ज्ञात जानकारी के अनुसार वानर से वर्तमान मनुष्य बनने की प्रक्रिया है लेकिन ये पुरातनपंथी नरभक्षी विचारधारा आदमी को जानवर बना कर उस आदमी का वध करने के लिए तैयार है और कर रही है यही उसका मूलमंत्र है. सत्ता स्थापित करने के लिए अम्बेडकर के अन्दर शंकराचार्य की आत्मा दिखाई देती है और अम्बेडकर समर्थकों को शंकराचार्य के पास ले जाकर पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र की कहानी का यह वाक्य जो भेड़िया कहता है खरगोश को खाने के लिए कि “उदार चरितानाम वसुधैव कुटुम्बकम”. मतलब की बूढ़ा भेड़िया जब शिकार करने में असमर्थ हो जाता है और भोजन करने के लिए खरगोश को यह उपदेश देता है उसी तरीके से नरभक्षी प्रयोगशाला के लोग भेड़िये की तरह सारा संसार एक है का नारा दे रहे हैं, मतलब की वनवासी आदिवासी, दलित, पिछड़े भी हिन्दू हैं लेकिन कब तक जब तक वोट चाहिए. वोट मिलने के बाद आरक्षण ख़त्म, छुआछूत जारी. वैदिक काल के अनुसार जिन्दा जलाना, घर फूंक देना, बस्तियों को आग लगा देना का कार्यक्रम जारी रहेगा. हमारा देवता गौ मांस भक्षण कर सकता है लेकिन उसकी पूजा बंद नहीं होगी लेकिन तुमने अगर गाय को मारा तो गौ हत्या लगेगी और सबकुछ त्याग कर भीख मांग कर गुजारा करना होगा यह तो समझो नहीं तो जानवर के लिए तुम्हारी नस्ल को नष्ट कर दिया जायेगा. वोट तुम्हारा सत्ता हमारी जलने के लिए तैयार रहो.
रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष
एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामी जी के दर्शन हो गए. ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे. पाँवों में खड़ाऊँ. हाथ में सुनहरी मूठ की छड़ी. साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था.

मैंने पूछा- स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?

स्वामी जी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!

मैने कहा- स्वामी जी, मेरी काफ़ी उम्र है. आप मुझे ‘बच्चा’ क्यों कहते हैं?

स्वामी जी हँसे. बोले – बच्चा, तुम संसारी लोग होस्टल में साठ साल के बूढ़े बैरे को ‘छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को बच्चा कहते हैं. यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो. इसीलिए हम तुम्हें बच्चा कहते हैं. बुरा मत मानो. संबोधन मात्र है.

स्वामी जी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.

कहने लगे- बच्चा, धर्म-युद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.

मैंने कहा- स्वामी जी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?

स्वामी जी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.

मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?

वे बोले- विधर्मी कसाई.

मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?

स्वामी जी ने कहा- सो तो हैं. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.

मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!

स्वामी जी मेरी तरफ़ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हज़ारों गो-भक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो. पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.

स्वामी जी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जम कर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूँ.

स्वामी जी और बच्चा की बातचीत

-स्वामी जी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?

-नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.

तो क्या सभी गो भक्त भैंस का दूध पीते हैं?

हाँ, बच्चा, लगभग सभी.

तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.

यानी भैंस को हम माता….नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.

स्वामी जी, हर चुनाव के पहले गो-भक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई ख़ास बात है क्या?

बच्चा, जब चुनाव आता है, तम हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है- बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देश की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गो माता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मज़ा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहाँ जा रहे हो?

स्वामी जी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूँ.

यह क्या होता है, बच्चा?

स्वामी जी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूँ, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.

पर मनुष्य को कौन मार रहा है?

इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महँगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है, काला-बाज़ारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहाँ मनुष्य को मार रही है. बिहार के लोग भूखे मर रहे हैं.

-बिहार? बिहार शहर कहाँ है बच्चा?

-बिहार एक प्रदेश है, राज्य है.

– अपने जम्बूद्वीप में है न?

स्वामी जी, इसी देश में है, भारत में.

यानी आर्यावर्त में?

जी हाँ, ऐसा ही समझ लीजिए. स्वामी जी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!

नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं. हमसे यह नहीं होगा. एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है. वे लोग ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार ले लो. बच्चा, तुम मनुष्य को मरने दो. गौ की रक्षा करो. कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है. तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं. एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफ़ाख़ोर और काला-बाज़ारी से बुराई लेनी पड़ेगी. यह हमसे नहीं होगा. यही लोग तो गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं. हमारा मुँह धर्म ने बंद कर दिया है.

ख़ैर, छोड़िए मनुष्य को. गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए. एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूँ सूख रहे हैं. तभी एक गो माता आकर गेहूँ खाने लगती है. आप क्या करेंगे?

बच्चा? हम उसे डंडा मार कर भगा देंगे.

पर स्वामी जी, वह गोमाता है न. पूज्य है. बेटे के गेहूँ खाने आई है. आप हाथ जोड़ कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया. सब गेहूँ खा जा.

बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?

नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था.

सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूँ खा जाने दें.

पर स्वामी जी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में काग़ज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह जगह पिटती है!

बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है. हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं. यही सच्ची पूजा है. नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो.

स्वामी जी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और अब वह खूब देती है.
बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो. हम उनसे बहुत ऊँचे हैं. देवता इसीलिए सिर्फ़ हमारे यहाँ अवतार लेते हैं. दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है. हमारी गाय और गायों से भिन्न है.
स्वामी जी, और सब समस्याएँ छोड़ कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं?
इसी से सब हो जाएगा, बच्चा! अगर गो-रक्षा का क़ानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा. फिर बादल समय पर पानी बरसाएँगे, भूमि ख़ूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे. धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते. अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है.

स्वामी जी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, फिर भी समृद्ध हैं?

उनका भगवान दूसरा है बच्चा. उनका भगवान इस बात का ख़्याल नहीं करता.

और रूस जैसे समाजवादी दश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?

उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा. उन्हें दोष नहीं लगता.

यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है. वह हर बात का दंड देने लगता है.

तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है.

स्वामी जी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है. जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है. वह वेतन और महँगाई-भत्ता बढ़वाने के लिए हड़ताल करती है. जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है. और इधर आप गो रक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं. इसमें तुक क्या है?

बच्चा, इसमें तुक है. देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है. जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई बंद हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है.

स्वामी जी, किसकी तरफ़ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?

जनता की माँग का जिन पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ़ से. यही धर्म है. एक दृष्टांत देते हैं. एक दिन हज़ारों भूखे लोग व्यवसायी के गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़े. व्यवसायी हमारे पास आया. कहने लगा- स्वामीजी, कुछ करिए. ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूँजी लूट लेंगे. आप ही बचा सकते हैं. आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे. बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए. जब वे हज़ारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आए, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखायी और ज़ोर से कहा- किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया. वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी. विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं., हमारे धर्म को नष्ट करते हैं. हमें शर्म आऩी चाहिए. मैं इसी क्षण से यहाँ उपवास करता हूँ. मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा. बस बच्चा, वह जनता आपस में ही लड़ने लगी. मैंने उनका नारा बदल दिया. जव वे लड़ चुके, तब मैंने कहा- धन्य है इस देश की धर्म-प्राण जनता! धन्य है अनाज के व्यापारी सेठ अमुक जी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा ख़र्च देने को कहा है. बच्चा जिसका गोदाम लूटने वे भूखे जा रहे थे, उसकी जय बोलने लगे. बच्चा, यह है धर्म का प्रताप. अगर इस जनता को गो रक्षा-आंदोलन में न लगाएँगे यह बैंकों के राष्ट्रीयकरण का आंदोलन करेगी, तनख़्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफ़ाख़ोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन करेगा. उसे बीच में उलझाए रखना धर्म है, बच्चा.

स्वामी जी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की. एक बात और बताइए. कई राज्यों में गो रक्षा के लिए क़ानून है. बाक़ी में लागू हो जाएगा. तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा. आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे.

अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं. सिंह दुर्गा का वाहन है. उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं. यह अधर्म है. सब सरकस वालों के ख़िलाफ़ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे. फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है. मछली भगवान का प्रतीक है. हम मछुओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे. सरकार का मछली-पालन विभाग बंद करवाएँगे.

-स्वामी जी, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है. उसके लिए भी तो कुछ करना चाहिए.

-यह सब उसी के लिए तो कर रहे हैं, बच्चा! इस देश में उल्लू को कोई कष्ट नहीं है. वह मज़े में है.
इतने में गाड़ी आ गई. स्वामी जी उसमें बैठ कर चले गए. बच्चा, वहीं रह गया.
——————-हरिशंकर परसाई

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