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तिरंगा यात्रा के नाम ……

बापू जी के लिए सदा
जिनके दरवाजे बंद रहे
जो रहे गुलामी के सिजदा
अव भारत के जयचंद रहे
उन जयचंदों को ढूंढ-ढूंढ
भगवा पहनाए जाते हैं
जिम्मेदारी के तख्तों पर
अब गद्दार बैठाये जाते हैं

– बृजलाल भट्ट “बृजेश”

तिरंगा यात्रा के नाम ……

बेकार जवाहरलाल जवानी
जेलय मा बर्बाद किहिन
नादानी भगत सुभाष किहिन
होशियारी-गद्दारी भगवत व गोलवलकर किहिन
हमका देयाखव जल भा नद्दी, रेता बनिगेन
मौका देखेन रेता बनिगेन
मौका देखेन न्याता बनिगेन
मौका देखेन पिट्ठू बनिगेन
बरवारन के सरदार अहिन
अब गाँधी से भी बेसी बनिगेन
कुरता सिलवायन गेरुआ का
बनिगेन सदस्य उपमंडल के
अब हमका डेरू काहे का
जब लीडर मियां शाह जैन बने

– बृजलाल भट्ट “बृजेश”

आपातकाल.तब और अब

 

भारतीय जनता पार्टीए कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगाती है कि उसने सन 1975 में आपातकाल लागू कर देश में प्रजातंत्र को समाप्त किया था। गत 25 जून कोए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि इस दिन को ष्आपातकाल विरोधी दिवसष् के रूप में मनाया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बात जोड़ते हुए फरमायाए ष्ष्क्या आपको जून 25.26ए 1975 याद हैण्ण्ण्वह प्रजातंत्र की सबसे अंधेरी रात थी। प्रजातंत्र ही हमारी ताकत है और हमें अपने प्रजातांत्रिक ढांचे को मज़बूत बनाना होगाष्ष्। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपातकालए हमारे प्रजातांत्रिक इतिहास का सबसे स्याह और शर्मनाक अध्याय था। परंतु प्रश्न यह है कि क्या आज भी हम अघोषित आपातकाल में नहीं जी रहे हैंघ्
भाजपा के वरिष्ठ नेता एलण्केण् आडवाणी ने पिछले साल ही चेतावनी भरे स्वर में कहा था कि भविष्य में देश में आपातकाल लागू होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। उनके शब्द थेए ष्ष्संवैधानिक व कानूनी प्रावधानों के होते हुए भीए वर्तमान में प्रजातंत्र को कुचलने वाली ताकतें पहले से कहीं अधिक मज़बूत हैं।ष्ष्
सन 1975 का आपातकाल
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत दिनांक 25 जूनए 1975 को देश में आपातकाल लागू किया थाए जो 21 महीनों तक जारी रहा। यह भारतीय प्रजातंत्र पर एक काला धब्बा था। राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा और आर्थिक स्थिति में गिरावट को आपातकाल लागू करने का कारण बताया गया। तथ्य यह है कि श्रीमती गांधी ने अपनी सत्ता को बनाए रखने और अपने राजनैतिक विरोधियों का सफाया करने के लिए आपातकाल लागू किया था। आपातकाल में प्रधानमंत्री के हाथों में सत्ता के संपूर्ण सूत्र आ गए थे और उन्हें तानाशाहीपूर्ण ढंग से शासन करने की आज़ादी मिल गई थी। प्रजातंत्र को निलंबित कर दिया गया थाय वाक् स्वातंत्र्यए अभिव्यक्ति स्वातंत्र्यए प्राण व दैहिक स्वातंत्र्य व संघ बनाने का स्वातंत्र्य जैसे मूल अधिकार छीन लिए गए थेय मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और समाचारपत्र केवल सरकार द्वारा स्वीकृत सामग्री को ही प्रकशित कर सकते थे। किताबों और पत्रिकाओं पर भी इसी तरह के प्रतिबंध लागू कर दिए गए थे। अगर कोई पत्रकारए शिक्षाविद या विचारक ऐसा कुछ भी लिखता या कहता थाए जो सरकारी नीतियों या सरकार के विचारों से मेल नहीं खाता थाए तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाती थी। मीसा के अंतर्गत सत्ताधारी दल के राजनीतिक विरोधियों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था। इससे पूरे समाज में भय का वातावरण पैदा हो गया था।
कुल मिलाकरए आपातकाल में मीडिया पर सेंसरशिप थी और सत्ताधारियों के विरूद्ध कोई भी बात कहने या लिखने पर प्रतिबंध था। आपातकाल के बाद हुए चुनावों ने यह साबित किया कि भारत में प्रजातंत्र की जड़ें मज़बूत थीं और यहां के लोगों को अपनी स्वतंत्रताओं का हनन बर्दाश्त नहीं था।
परंतु क्या यह कहना सही होगा कि देश में अब कभी दूसरा आपातकाल लागू नहीं होगाघ् क्या आज मनमाने ढंग से लोगों की गिरफ्तारियां नहीं हो रहीं हैंघ् क्या फिल्मोंए किताबों और समाचारों को सेंसर नहीं किया जा रहा हैघ् क्या देश में भय का वातावरण व्याप्त नहीं हैघ् क्या मूल अधिकारों का उल्लंघन नहीं हो रहा हैघ् आज लेखकोंए फिल्म निर्माताओंए दलितों व अल्पसंख्यकों पर जिस तरह के हमले हो रहे हैंए उनके चलते क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि देश में अघोषित आपातकाल लागू है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले
मीडिया पर सेंसरशिपए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है। विचारों और सोच की विविधताए किसी भी प्रगतिशील समाज की निशानी होती है। प्रजातंत्र में बुद्धिजीवियों को अपनी बात रखने का पूरा मौका और स्वतंत्रता उपलब्ध रहती है। इसके विपरीतए सेंसरशिप का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना होता है जिसमें लोग अपने मन की बात कहने में डरते हैं। भारत में कट्टरपंथी हिन्दू संगठनए योजनाबद्ध तरीके से तार्किकता की आवाज़ का गला घोंटने में जुटे हुए हैं। लेखकों को धमकियां दी जा रही हैं और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया जा रहा है। इसका अर्थ है नए विचारों को सामने आने से रोकना। उदाहरणार्थए तमिल लेखक पेरूमल मुरूगन को उनकी पुस्तक ष्वन पार्ट वूमेनष् के प्रकाशन के बाद लेखन कार्य छोड़ना पड़ा। उनकी पुस्तक एक निस्संतान दंपत्ति के बारे में है और यह कहती है कि प्राचीन भारत में विवाहित महिला को किसी दूसरे पुरूष के साथ शारीरिक संबंध स्थापित कर संतान प्राप्ति का अधिकार था। यह अधिकार ऐसी स्थिति में उपलब्ध थाए जब दंपत्ति को किसी कारण संतान न हो रही हो। उनकी पुस्तक के प्रकाशन के बाद बवाल मच गया। उन्हें इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे फेसबुक पर लेखक बतौर अपना मृत्युलेख लिखें और उन्हें अपनी पुस्तक को बाज़ार से वापिस लेना पड़ा।
इस घटना से यह स्पष्ट है कि महिलाओं की स्वतंत्रता की बात करने वालों की इस देश में आज भी खैर नहीं है। यही बात उन दलित बुद्धिजीवियों के बारे में भी सही है जो जातिगत दमन को चुनौती देते हैं। कर्नाटक में दलित लेखक हुचंगी प्रसाद को उनके ष्हिन्दू.विरोधीष् लेखन को लेकर सार्वजनिक रूप से पीटा गयाए उनके चेहरे पर सिंदूर पोत दिया गया और उनसे यह कहा गया कि वे दलित के रूप में इसलिए पैदा हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपने पिछले जन्म में पाप किए थे। हुचंगी प्रसाद ने ष्ओडाला किच्चूष् शीर्षक की एक पुस्तक लिखी थीए जिसमें भारत की जाति व्यवस्था की निंदा की गई थी।
महाविद्यालय और विश्वविद्यालयए शिक्षण के केन्द्र हैं जहां विद्यार्थियों को वैचारिक विभिन्नताओं से परिचित करवाया जाता है। परन्तु एबीव्हीपी और विहिप जैसी संस्थाओं काए उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रभाव इस हद तक बढ़ गया है कि अकादमिक स्वतंत्रता गंभीर खतरे में आ गई है। भारतीय जनता पार्टी की विद्यार्थी शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ;एबीव्हीपीद्ध ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में सन 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों पर आधारित एक डाक्यूमेंटरी का प्रदर्शन इस आधार पर नहीं होने दिया कि वह ष्हिन्दू विरोधीष् है। एक अन्य घटना मेंए ष्लव जिहादष् पर एक संगोष्ठी का आयोजन करने पर लखनऊ विश्वविद्यालय ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ;मालेद्ध के विद्यार्थी संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की उत्तरप्रदेश शाखा के अध्यक्ष को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया। इस संगोष्ठी में जब सीपीआई ;एमएलद्ध की पोलित ब्यूरो सदस्या कविता कृष्णन अपनी बात रख रहीं थींए तब कार्यक्रम स्थल पर एबीव्हीपी के कार्यकर्ता जबरन घुस आए और उन्होंने कृष्णन के साथ हाथापाई की। राजस्थान में राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ के आदेश पर एक प्राध्यापक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। उन पर यह आरोप है कि उन्होंने एक संगोष्ठी में हिन्दू देवी.देवताओं का अपमान करने वाली बातें कहीं। यह आरएसएस और एबीव्हीपी को पंसद नहीं आया और उनके नेताओं ने उच्च शिक्षा मंत्री को ज्ञापन देकर प्राध्यापक के खिलाफ कार्यवाही की मांग की।
भय का वातावरण
इन घटनाओं से यह साफ है कि आज देश में ऐसा वातावरण बन गया है कि राज्य की विचारधारा से भिन्न या उसके विरूद्ध कोई बात कहने वालों का क्रूरतापूर्वक दमन किया जाता है। जब किसी की आवाज़ को इस तरह से कुचला जाता है तो देश में भय और असुरक्षा का वातावरण बनता है। समाज को आतंकित करने के लिए गौहत्याए लव जिहाद व राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। दादरी में एक निर्दोष व्यक्ति को अपने घर में गौमांस रखने के झूठे आरोप में पीट.पीटकर जान से मार दिया गया। इसी तरहए मवेशी ले जा रहे ट्रकों के मुसलमान चालकों के साथ मारपीट और उनकी हत्याएं आम हैं। यह न केवल लोगों के अपनी पसंद का भोजन करने के अधिकार पर हमला है वरन एक समुदाय विशेष को आतंकित करने का प्रयास भी है।
हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के युवा शोधार्थी रोहित वेमूला पर विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा झूठे मामले लाद दिए जाने के बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली। वे अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे और यह संस्था विश्वविद्यालय में एबीव्हीपी की विरोधी थी। रोहित और उनके साथियों ने याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के विरोध में एक रैली का आयोजन भी किया था। उन्हें एबीव्हीपी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने ष्ष्राष्ट्र विरोधीष्ष् करार दे दिया। जेएनयू के विद्यार्थी कन्हैया कुमार पर एबीव्हीपी से जुड़े विद्यार्थियों ने हमला किया। यह कहा गया कि कन्हैया कुमारए राष्ट्रद्रोही हैं और उन्होंने राष्ट्र विरोधी नारे लगाए थे। ऐसा भी आरोपित है कि एबीव्हीपी ने ऐसे किसी भी व्यक्ति को पांच लाख रूपए का इनाम देने की घोषणा कीए जो कन्हैया कुमार की जीभ काट ले या उसे गोली मार दे। इसके पहलेए कन्हैया कुमार पर दिल्ली की एक अदालत के प्रांगण में हमला किया गया था। जेएनयू को राष्ट्र विरोधियों का अड्डा बताया गया और उसके शिक्षकों को अन्य विश्वविद्यालयों में भाषण आदि देने से रोका जा रहा है।
जानेमाने लेखकों और तार्किकतावादियों नरेन्द्र दाभोलकरए गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की हत्याओं से भी देश में भय का वातावरण बना। इन तीनों को दिनदहाड़े मौत के घाट उतार दिया गया और इनकी हत्याओं की जांच बहुत धीमी गति से चल रही है। उनकी हत्याओं का इस्तेमाल अन्य लेखकों को डराने धमकाने के लिए किया जा रहा है। जब जानेमाने नाटककार गिरीश कर्नाड ने मांग की कि बेंगलूरू के अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे का नामकरण टीपू सुल्तान पर किया जाए तो उन्हें धमकी दी गई कि उनके साथ वही होगा जो कलबुर्गी के साथ हुआ था। वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले को सनातन संस्था के दक्षिणपंथी नेता प्रसाद अत्तवर की ओर से लगातार धमकियां मिल रही हैं। प्रकाश अत्तवर ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा कि जो लोग हिन्दू धर्म का मखौल उड़ायेंगेए वे कलबुर्गी की तरह अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे। प्रकाश अत्तवर श्रीराम सेने के पूर्व जिलाध्यक्ष हैं और मेंगलोर में सन 2009 में पब पर हुए हमले के मामले में आरोपी हैं।
सन 1975 में सरकार ने असहमति को कुचलने के लिए कई संस्थाओं और राजनैतिक संगठनों पर प्रतिबंध लगाया था। आजए सरकार ऐसे संगठनों को कुचलने पर आमादा है जो हाशिए पर पड़े समूहों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं या राज्य की नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। ऐसे कई एनजीओ को एफसीआरए के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में या तो प्रतिबंधित कर दिया गया है या उनके लाईसेंस रद्द कर दिए गए हैं। ग्रीनपीस और सबरंग ट्रस्ट सरकार की इस तानाशाहीपूर्ण कार्यवाही के शिकार हुए हैं।
समाज में भय उत्पन्न करने और उसे सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए अंतर्जातीय विवाहों के विरूद्ध मुहिम चलाई जा रही है। अंतर्जातीय विवाहों को हिन्दुत्व संगठन ष्लव जिहादष् बताते हैं। विहिप और बजरंग दलए हिन्दू परिवारों से समय.समय पर अपील करते रहते हैं कि वे अपनी लड़कियों पर ष्नियंत्रणष् रखें ताकि मुस्लिम पुरूश उन्हें अपने ष्जालष् में न फंसा सकें। अगर कोई मुस्लिम युवक किसी हिन्दू युवती से विवाह करना चाहता है तो उसके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया जाता है। असल में यह दो वयस्क व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन के संबंध में स्वयं निर्णय लेने के अधिकार का हनन है। यह नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है। इस मुद्दे पर इतना जुनून पैदा कर दिया गया है कि अलग.अलग धर्मों के युवक.युवतियों के बीच थोड़ा सा मेलमिलाप भी अब किसी को बर्दाश्त नहीं है। बजरंग दल के सदस्यों द्वारा एक मुस्लिम युवक को खंभे से बांधकर सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह अपनी एक सहकर्मी हिन्दू महिला को अपनी गाड़ी से कहीं छोड़ने गया था। एक अन्य मामले मेंए कर्नाटक के मांड्या में अशिता और शकील को धमकियां दी गईं। वे दोनों आपस में विवाह करना चाहते थे और उनके परिवारों को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।
जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार
आपातकाल का सबसे भयावह पक्ष था सरकार द्वारा अकारण और अंधाधुंध गिरफ्तारियां और अपने विरोधियों को जेल में डालने का अभियान। आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी और उनके जैसे आदिवासियों के
भू.अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले अन्य कार्यकर्ताओं का जो हाल हुआ हैए उससे समाज को यह संदेश जाता है कि राज्य अपने विरोधियों को किसी भी तरह से चुप करने में तनिक भी संकोच नहीं करेगा। ऐसी ही एक अन्य घटना में दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में 14 महीनों तक जेल में रहना पड़ा। वे ऑपरेशन ग्रीनहंट और आदिवासियों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या के विरूद्ध अभियान चला रहे थे।
भारत की जेलों में सैंकड़ों मुस्लिम युवक बंद हैंए जिनके मुकदमे अदालतों में विचाराधीन हैं। यद्यपि मुसलमान देश की आबादी का मात्र 14ण्2 प्रतिशत हैं तथापि जेलों में बंद व्यक्तियों में उनका प्रतिशत 26ण्4 है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रपट में मुसलमानों और आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ों में मार डारने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की है। यह विडंबनापूर्ण है कि जहां हाशिए पर पड़े समुदायों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है वहीं योगी आदित्यनाथ और साध्वी प्राची जैसे हिन्दुत्ववादी नेताओं के खिलाफए इस तथ्य के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है कि वे खुलेआम अन्य धर्मों और उनके मानने वालों के खिलाफ घृणा और शत्रुता का भाव पैदा कर रहे हैं। ये सब संसद सदस्य हैं और उन्होंने संविधान की रक्षा करने की शपथ ली है। इसके बावजूदए न तो उन्हें कोई सज़ा दी जा रही है और ना ही सत्ताधारी दल द्वारा उनकी आलोचना हो रही है।
निष्कर्ष
इस सबसे यह साफ है कि देश में आज भी मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। सन 1975 के घोषित आपातकाल और आज के अघोषित आपातकाल में अंतर केवल इतना ही है कि जहां 1975 में राज्य ने प्रजातंत्र और मूलाधिकारों को कुचलने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल किया था वहीं अब यह काम हिन्दुत्व संगठन कर रहे हैंए जिन्हें राज्य का पूरा समर्थन और सहयोग हासिल है। सन 1975 में आपातकाल संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत लगाया गया था और उसके विरूद्ध संवैधानिक उपचार उपलब्ध थे। परंतु वर्तमान आपातकाल का कोई संवैधानिक आधार नहीं है और इसे समाप्त करना इसलिए और मुश्किल है क्योंकि इसे सरकार तंत्र सीधे लागू नहीं कर रहा है। आज हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हमारे प्रजातंत्र के समक्ष उपस्थित इस खतरे से हम अपने देश की रक्षा कैसे करेंघ् हमारे सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं। देश के नागरिकों को अपने अधिकारों के उल्लंघन के प्रति सतत सावधान रहना होगा और सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाना होगा कि वह जवाबदेही से काम करे और देश में कानून का शासन स्थापित करे। नागरिकों को संविधान में उन्हें दिए गए अधिकारों से परिचित करवाया जाना चाहिए और उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि किस तरह कुछ ताकतें उन्हें इन अधिकारों से वंचित कर रही हैं। भारत के सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार है और उन्हें अपने इस अधिकार का इस्तेमालए अपने विरोध को स्वर देने के लिए करना चाहिए।

-नेहा दाभाड़े

मोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित सामाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहाँ पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी, के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनैतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहाँ ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर सवर्ण कही जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थी। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनैतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनैतिक सुधार।
इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वे थे। अब वे राजनैतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनैतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनैतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ अवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन मुलायम, लालू या नीतीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में
सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग आंदोलन के नाम पर सिर्फ सवर्णों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धि हो गई हो और वे इसके बल पर सत्ता तक पहुँच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गई। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनैतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया। जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीड़ित की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनैतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिए से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिस पर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनैतिक बहसों को केंद्रित किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी।
दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनैतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाइयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी। उसका मुसलमानों या ईसाइयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक
धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनैतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गाँव-गाँव तक पहुँचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गाँव-गाँव और पिछड़ी जातियों तक पहुँचाया। जहाँ स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढाँचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहाँ गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए
विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थीं, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है। इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता चलाती है तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी इस पर उनका लाजवाब तर्क था कि ब्राह्मणों को राजनीति में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया। इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। इसीलिए सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नीतीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णों की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल राजनीति ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूँढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीति ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक,आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।
-राजीव कुमार यादव
 मोबाइल: 09452800752
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित
इप्टा के सचिव राकेश से लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन
भाजपा और आरएसएस में भारतीय व राष्ट्रीय
लगा जरूर होता है लेकिन कोई भारतीय या राष्ट्रीय उनकी सोच और समझ है नहीं. देखा जाए तो इसके बहुत सारे प्रमाण हैं इसके प्रमाण चाहे गोलवलकर के हो, चाहे इटली में मुसोलिनी से मिलना हो, चाहे हिटलर का राष्ट्रवाद हो उसका टू कॉपी (उसकी प्रतिलिपि) अब तो फोटोकॉपी का ज़माना है जो हिटलर का नाजीवाद है वही इनकी हिन्दू संस्कृति है. यह कभी किसी रूप में फिर किसी अन्य रूप में परिभाषित करते हैं. हिटलर के लिए यहूदी नंबर एक के दुश्मन थे. दूसरे नंबर पर कम्युनिस्ट थे. तीसरे पढने लिखने वाले और विवेक की कैफियत रखने वाले लोग उनके दुश्मन थे. उनकी तर्ज पर यहाँ यहूदी नहीं हैं तो मुसलमान नंबर एक पर है और कम्युनिस्ट. संसदीय लोग हों, कम्युनिस्ट जीते या न जीते लेकिन यहाँ और वहां भी यह किया था कि तर्क व बड़ा विवेक मार्क्सवाद ने तैयार किया है इसलिए वह इनके स्वाभाविक रूप से विरोधी हैं.
यह उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है. वह अपने क्रियाकलापों को अंजाम देने के लिए नए-नए नारे गढ़ते रहते हैं. सबसे पहले यह 1925 से शुरुवात करते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सोच आजादी की लड़ाई के लिए नहीं थी और वीर सावरकर आजादी की लड़ाई में फंसे और अटल 16 साल की उम्र में.  इसके दस्तावेज हैं कि इन दोनों लोगों ने उस समय की अंग्रेज हुकूमत से माफ़ी मांगी थी.
उनकी कोशिश है कि अब दोनों को आजादी का महान योद्धा माना जाए. वीर सावरकर ने जो संकल्प लेकर घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार का सहयोग करेंगे वह उनके नायक हैं. उनको भी स्थान दिया जा चुका है. यह उनकी एक सोची समझी नीति है. आजादी के बाद उन्होंने पहला निशाना 1948 में गाँधी को बनाया और नेहरु भी उस वक्त खुले में घूमते थे और धर्म विरोधी थे. जितना गाँधी धर्म को मानते थे हिन्दू धर्म और वर्णाश्रम को भी मानते थे लेकिन ऐसा आदमी सांप्रदायिक नहीं था इसीलिए उन्हें निशाना बनाया. दुबारा फिर करवट बदली और संघियों ने गौरक्षा और गौहत्या को मुद्दा बनाया. फिर मुद्दे की तलाश में राम जन्म भूमि का मुद्दा मिला. इसके लिए वह शुरू से काम कर रहे थे. वह लोगों के मन की नियत को पकड़ने की कोशिश की. उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर खोले और साम्प्रदायिक शिक्षा की शुरुवात की. यह सारा काम करते हुए समाज में राजनीतिक पैठ नहीं बन पा रही थी. 1966 के बाद कांग्रेस से मोह भंग होने के बाद भी उनको राजनीतिक मान्यता नहीं मिल पाई. 1975 आपातकाल लागू हुआ तब जेपी के साथ उन्होंने एक रिस्क लिया कि उन्होंने अस्मिता पर दांव लगा दिया. उन्होंने खुद को जनता पार्टी के रूप में अपने अस्तित्व का विलय कर दिया. जब उनकी पैठ सब जगह हो गयी तो उनका पहला राजनैतिक बड़ा अस्तित्व था और उसके बाद जनता दल और जनता पार्टी के विघटन जब तो गया तब 1989 तक आते आते उनका राजनीतिक अस्तित्व सीमित रहा.
राम जन्म भूमि को मुद्दे को एक बड़े मुद्दे के रूप में उछाला और वहां से उग्र हिन्दुवाद जो शुरू किया उसकी परिणीती 2014 के पहले मोदी गुजरात में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया और जो कामकाज हुआ और फिर मोदी के समर्थन में पूरा कारपोरेट जगत, मीडिया जुटा और प्रधानमंत्री बना दिया और अब नये नारों की तलाश में निकले हैं. अब धर्म के मुद्दे और राम के मुद्दे अब उनके लिए बासी हो चुके हैं और ऐसी ताकतें भी चाहे अनचाहे जुड़ जाती हैं जो उनके साथ नहीं होनी चाहिए. कट्टर सांप्रदायिक विरोधी भी उनके साथ रिश्ता बना लेते हैं.
              हिटलर का फासीवाद जहाँ से पकड़ा उनको राष्ट्रवाद का नया सूत्र मिला और जो भी है उसे उग्र से उग्र कर रहे हैं. जो इसमें विरोध में तर्क करता है उसपर हमलावर होते हैं जो वर्षों वर्ष में जो तमाम संस्थाएं, विश्व विद्यालय आदि को नष्ट करने का काम कर रहे हैं जिसमें तमाम संस्थाओं में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय एक बड़ा उदहारण है इस हमले में यद्यपि हिन्दू संस्कृति के सबसे ख़राब पक्ष वो लेते हैं जो पक्ष इस देश के दलितों आदिवासियों के विरोध में रहता है उसमें अम्बेडकर को भी सम्मिलित करने, शहीद भगत सिंह व विवेकानंद को भी समायोजित करते हैं जबकि यह सब धार्मिक कट्टरता के प्रबल विरोधी रहे हैं. यह उनकी आगे की रणनीति का हिस्सा है. अब जितने लोग तर्क और विवेक से मुकाबला करेंगे. यह बड़ी लड़ाई होगी और जहाँ ये एक राजनैतिक लड़ाई से ज्यादा सांस्कृतिक लड़ाई होगी जो एक मैदान से ज्यादा लोगों के दिमागों में लड़ी जा रही है.
इप्टा के सचिव राकेश से लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन व विनय कुमार सिंह की बातचीत के आधार पर 

पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनाव का पहला चरण पूरा हो चूका है. जंगल महल क्षेत्र की 18 विधान सभा सीटों पर मतदान हो चूका है. मतदान लगभग 82 प्रतिशत हुआ है. मतदान के प्रतिशत बढ़ने पर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं. ममता विरोधियों का मानना है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को नुकसान होगा. बंगाल के बुद्धिजीवी तबके का मानना है कि वाम मोर्चे के 35 साल के लगातार शासन के बाद जो गुंडागर्दी बढ़ी थी, ममता बनर्जी की पार्टी ने सभी रेकॉर्डों को ध्वस्त करते हुए पांच सालों के अन्दर गुंडागर्दी का नया रिकॉर्ड बना दिया है. विवेकानंद फ्लाईओवर के गिरने के बाद भ्रष्टाचार के संस्थागत होने का परिणाम सामने आया है. यह भी जानकारी में आ रहा है कि हर क्षेत्र की सप्लाई के ऊपर तृणमूल कांग्रेस का कब्ज़ा है. चुनाव में वाम मोर्चा व कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं तो वहीँ तृणमूल कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी एक सोची समझी रणनीति के तहत अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा जनता को दिखाने के लिए सीधे-सीधे तृणमूल कांग्रेस के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप तो करती है लेकिन भाजपा की स्तिथि बंगाल में वोट कटवा पार्टी के रूप में विकसित हो रही है. बंगाल के एक बुद्धिजीवी ने बातचीत में बताया कि भाजपा को वोट देने का मतलब है तृणमूल कांग्रेस की मदद करना.
बंगाल ने विकास हुवा हो या नही लेकिन गुंडागर्दी का उद्दोग जरुर बढ़ा है  माकपा के राज्य सचिव डॉ सूर्यकांत मिश्र ने कहा था  कि पूरे राज्य में अराजकता की स्थिति बनी हुई है. राज्य में गुटों के बीच झड़प और विस्फोट की घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बम निर्माण ही राज्य का लघु और कुटीर उद्योग बन गया है. बंगाल से राज्यसभा सदस्य रहे अहमद सईद ‘मलिहाबादी’ ने सीधे तौर पर कहा कि ममता के सरकार में आने का मतलब है की बंगाल के अन्दर मोदी की सरकार को कायम करना है और बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस केंद्र में सत्तारूढ़ दल की मदद में रहेगी.तृणमूल कांग्रेस व भाजपा बंगाल में नूराकुश्ती लड़ रही है.

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कुशासन के कारण बहुत बुद्धिजीवियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के विरोध में है और उसकी कोशिश है कि तृणमूल कांग्रेस को आगे सरकार बनाने का मौका न मिले वहीँ, जनता के विभिन्न तबकों से बातचीत के बाद यह बात उभर कर आ रही है कि तृणमूल कांग्रेस का शासन में आना आसान नहीं है और जिस तरह से स्तिथियाँ बदल रहीं हैंउससे लगता है कि छठे चरण तक  का मतदान आते-आते तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत कम होते-होते उसको सत्ता से बेदखल कर सकता है.
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

 “Perhaps the most glaring tendency of the Government system of high class education has been the
virtual monopoly of all the higher offices under them by the Brahmins.” -Mahatma Jotirao Phule

एक ऐसा समय जब देश भारतरत्न भीमराव अंबेडकर की सवा सौंवी जयंती मना रहा है, ब्राह्मणवादी सवर्ण पुरुष संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ अंबेडकर पर अपनी झूठी श्रद्धा प्रदर्शित कर रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंबेडकर की प्रतिमा के सामने अगरबत्ती सुलगा रहे हैं, कार्पोरेटी पूँजी-प्रेरित नव-ब्राह्मणवादी-मनुवाद अत्यंत उग्र हो उठा है और नई सरकार के बनते ही दलितों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं तथा उनके उत्पीड़न की नित नई-नई, बर्बर और नृशंस घटनाएँ सामने आ रही हैं। दलितों के इसी उत्पीड़न की श्रृंखला में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के लाइफ साइंस के पी.एच.डी. शोधार्थी 26 वर्षीय छात्र रोहिथ वेमुला की आत्महत्या भी शामिल है। वास्तव में यह आत्महत्या नहीं एक प्रतिभाशाली छात्र की सांस्थानिक ब्राह्मणवादी हत्या है जिसके साथ विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर वीआईपी भाजपा नेताओं के नाम तक जुड़े हैं। यह दलित उत्पीड़न की अन्य घटनाओं से इसलिए अलहदा है क्योंकि रोहिथ वेमुला की आत्महत्या के प्रेरक तत्वों में सरकार के दो केंद्रीय मंत्रियों की संलिप्तता देखी जा रही है।
रोहिथ वेमुला की अत्महत्या के मुद्दे पर भी मोदी सरकार में अजीब नाटकीयता देखी गई। रोहिथ ने आत्महत्या की 17 जनवरी को और 22 जनवरी तक मानव संसाधन विकास मंत्री, भाजपा के प्रवक्ता, विश्वविद्यालय प्रशासन सभी टालमटोल करते रहे। किन्तु जब आत्महत्या का विरोध राष्ट्रव्यापी हो गया और सरकार अपनी दलित, पिछड़ा, आदिवासी विरोधी नीतियों के कारण चारों तरफ से घिरने लगी तो मोदी सेना बचाव की मुद्रा में आ गई। रोहिथ की आत्महत्या करने के बाद से चार दिन तक चुप रहने के पश्चात् जब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ के छठे दीक्षांत समारोह में भाषण दे रहे थे तो कार्यक्रम में उपस्थित दलित छात्रों ने ‘नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद, नरेंद्र मोदी वापस जाओ’ के नारे लगाए। तब प्रधानमंत्री ने अपनी चुप्पी तोड़ी और क्षतिपूर्ति के नाम पर कहा कि ‘माँ भारती ने अपना एक लाल खो दिया मैं उसका दर्द समझ सकता हूँ।’ प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान से सरकारी नीतियों का राग और भी बिगड़ गया क्योंकि संघ निर्देशित भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक बड़ी जमात रोहिथ वेमुला को राष्ट्रविरोधी सिद्ध करने पर तुली थी क्योंकि रोहिथ अंबेडकरवादी छात्र संगठन ‘अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन’ (ए0एस0ए0) का सदस्य था जो कि छात्रों का एक प्रगतिशील संगठन है।
रोहिथ की आत्महत्या एक अकस्मात घटी हुई घटना नहीं है। उसे एक लंबे समय से प्रताडि़त किया जा रहा था। भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों की प्रशासनिक और प्राध्यापकीय संरचना एकांगी और सवर्ण वर्चस्व वाली है। इनमें जो जातिवाद व्याप्त है उसका रूप षड्यंत्री, बौद्धिक और चातुर्य भरा है। इनमें दलित छात्रों का उत्पीड़न, निष्कासन या उनकी आत्महत्या कोई नई बात नहीं है। यहाँ उनके साथ एक समय अमरीकी विश्वविद्यालयों में अश्वेत छात्रों से होने वाले व्यवहार से भी बदतर व्यवहार होता है। क्योंकि ब्राह्मणवाद रंगभेद की तरह स्पष्ट नहीं है। यह जाहिरा तौर पर लोकतान्त्रिक और पठन-पाठन की सांस्कृतिक-शैक्षिक प्रैक्टिस में व्यस्त दीखता है लेकिन भीतर से षड्यंत्रपूर्ण और शातिराना है। भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में ब्राह्मणवादी वर्चस्व होने के कारण, सवर्ण समुदाय इन्हें अपने ढंग से नियंत्रित करता है। जहाँ एससी/एसटी/ओबीसी प्राध्यापकों की अल्पता के अनुपात में ही इन वर्गों के छात्रों के लिए प्रताड़नाएँ और मुश्किलें भी हैं। जहाँ उन्हें तरह-तरह से अपमानित, प्रताडि़त और हतोत्साहित किया जाता है। उनकी क्षमता पर प्रश्न खड़े किए जाते हैं। उनकी सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि पर तंज कसे जाते हैं और उनके कैरियर पर हमेशा परशुराम के परशु की धार लटकी रहती है। वर्तमान में भारत के 46 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी-एसटी, ओबीसी कुलपतियों की संख्या केवल दो है जिनमें से एक सामान्य श्रेणी से चयनित हुआ है। ऐसे में इन वर्गों के छात्रों का भारतीय शिक्षा संस्थानों में कोई पुरसाहाल नहीं होता। इस सवर्णवादी वर्चस्व की परिणति एससी-एसटी, ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न के रूप में होती है। यह उत्पीड़न तब और बढ़ जाता है जब इस वर्ग के किसी छात्र में अतिरिक्त प्रतिभा होती है।
रोहिथ वेमुला मूल रूप से गुराजाला, गुंटूर (आंध्र प्रदेश) का निवासी था जो एक अनुसूचित जाति (माला) के अत्यंत निर्धन परिवार से ताल्लुक रखता था। रोहिथ के पिता एक प्राइवेट अस्पताल में सिक्युरिटी गार्ड हैं और उसकी माँ घर पर ही सिलाई का काम करके गुजारा करती है। रोहिथ बचपन से ही पढ़ने में तेज और प्रतिभाशाली था। वह अपनी हजारों साल की पीढि़यों में केंद्रीय विश्वविद्यालय देखने वाला पहला व्यक्ति था। उसे विज्ञान पसंद था इसलिए वह विज्ञान विषय में ही शोध (पी.एच.डी.) कर रहा था। अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है कि वह ‘कार्ल सेगान’ जैसा विज्ञान लेखक बनना चाहता था। रोहिथ ने पढ़ाई करने के लिए बचपन से ही बहुत संघर्ष किया। किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके उसने अपनी पढ़ाई को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। उसने एक कुरियर ब्वाय के रूप में भी काम किया था। रोहिथ ने हिन्दू डिग्री कॉलेज से बीएससी 80 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की थी। उसके बाद उसने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में छठवीं रैंक हासिल कर एमएससी में सामान्य श्रेणी की मेरिट से प्रवेश लिया था। 2012 में रोहिथ ने सी0एस0आई0आर0 की परीक्षा में 90वीं रैंक लाकर जूनियर रिसर्च ‘फेलोशिप भी प्राप्त की। किन्तु उसकी असाधारण प्रतिभा को नजरअंदाज करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी शोधवृत्ति सात महीने से रोक रखी थी। जिसका उल्लेख उसने अपनी आत्महत्या से पूर्व लिखे गए पत्र में किया है। उसकी माँ अपने गाँव में गर्व से बताती थी कि उसका बेटा केंद्रीय विष्वविद्यालय में पी0एच0डी0 कर रहा है और उसे 25000 रुपये प्रतिमाह शोधवृत्ति मिलती है। लेकिन दुर्भाग्य से उस माँ का प्रतिभाशाली बेटा एक सवर्णवादी राजनैतिक षड्यंत्र और उत्पीड़न का शिकार होकर स्वयं को काल के हाथों में सौंप देता है और एक दिन उसकी माँ अपने अभिशापित जीवन के सबसे बुरे दिन उसकी लाश लेने पोस्टमार्टम हाउस जाती है।
रोहिथ वेमुला एक अच्छा शोधार्थी होने के साथ-साथ अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का सदस्य भी था। ध्यातव्य है कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन ने ही छात्र संघ का चुनाव जीता था। रोहिथ को एक लंबे समय से विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा टारगेट किया जा रहा था। जबकि नियमानुसार किसी भी निलंबित
शोधार्थी की ‘फेलोशिप नहीं रोकी जा सकती, जुलाई से ही उसकी शोधवृत्ति (25000 रुपये प्रति माह) रोक दी गई थी। उसके साथियों का कहना है कि वह विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष छात्रों के मुद्दे उत्साह के साथ उठाता था इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन की निगाहों में खटकता था। याकूब मेमन को दी गई फाँसी और दिल्ली विश्वविद्यालय में डाक्युमेंट्री ‘मुजफ्फरपुर बाकी है’ की स्क्रीनिंग पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बच्चा संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के द्वारा किए गए हमले के विरोध में रोहिथ ने ए0एस0ए सदस्यों के साथ 3 अगस्त को विश्वविद्यालय में प्रदर्शन किया था। जिसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के विश्वविद्यालय
अध्यक्ष नंदानम सुशील कुमार से उनका कुछ विवाद हुआ था जिस पर एन. सुशील कुमार ने फेसबुक पर लिखी गई एक टिप्पणी में ए0एस0ए0 सदस्यों को ‘गुंडा’ कहा था। इस टिप्पणी पर आपत्ति दर्ज करने के बाद सुशील कुमार ने विश्वविद्यालय सुरक्षा अधिकारी के सामने ए0एस0ए सदस्यों से लिखित माफी माँगी थी। लेकिन अगले दिन सुशील कुमार ने स्वयं को अस्पताल में भर्ती करवा दिया और रोहिथ तथा चार अन्य ए0एस0ए0 सदस्यों पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उसको पीटा जिसकी वजह से वह गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इस पर विश्वविद्यालय द्वारा 5 अगस्त को मुख्य अनुशास्ता प्रो. आलोक पाण्डेय द्वारा की गई जाँच में ए0एस0ए0 सदस्यों को क्लीन चिट दे दी गई। लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पुलिस में भी रिपोर्ट की जिसके फलस्वरूप उन सभी पर मार-पीट का मुकदमा दर्ज किया गया। उन दिनों विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर0पी0 शर्मा थे। किन्तु कुछ दिनों के पश्चात विश्वविद्यालय के कुलपति बदल गए और नए कुलपति प्रो. पी. अप्पा राव बने। हैदराबाद के भाजपा उपाध्यक्ष नंदानम दिवाकर द्वारा जोर देने पर 17 अगस्त को मोदी सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय कैंपस को ‘चरमपंथी’, ‘जातिवादी’ और ‘राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अड्डा बताया। अपने पत्र में उन्होंने माँग रखी कि विश्वविद्यालय में ऐसी गतिविधियों में लिप्त छात्रों पर कार्रवाई कर उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया जाय। इन्हीं घटनाक्रमों के बीच रोहिथ समेत पाँच छात्रों को विश्वविद्यालय से निलंबित कर दिया गया। ये पाँचों छात्र दलित थे। 3 जनवरी को इन सभी को हॉस्टल, पुस्तकालय आदि स्थानों से भी बाहर कर विश्वविद्यालय द्वारा उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। पाँचों छात्र बाहर खुले में अपने सामान के साथ रहकर प्रदर्शन करने लगे। विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों ने उनका साथ दिया और उनके प्रदर्शन में हिस्सा लिया। 17 जनवरी को अपने एक मित्र उमा के कमरे पर, जो ए0एस0ए0 का कार्यालय भी था रोहिथ वेमुला ने ए0एस0ए0 के झंडे से फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। झंडे पर भारत रत्न भीमराव अंबेडकर की तस्वीर थी। रोहिथ का सुसाइड नोट (जो मूल अंग्रेजी में है) इस प्रकार है-
“गुड मॉर्निंग,
जब आप ये पत्र पढ़ेंगे तो मैं आपके आस-पास नहीं होऊँगा। मुझसे नाराज मत होना। मैं जानता हूँ तुम में से कुछ ने सचमुच मेरा बहुत खयाल रखा, मुझे प्यार किया और मेरे साथ बहुत अच्छा बर्ताव किया। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। यह केवल मैं स्वयं था जिससे मुझे सदैव समस्या थी। मैंने अपनी आत्मा और देह के मध्य एक निरंतर चैड़ी होती खाई महसूस की। मैं हमेशा से ही एक लेखक बनना चाहता था और मैं एक दानव बन गया। मैं हमेशा एक लेखक होना चाहता था। एक विज्ञान-लेखक, ठीक कार्ल सेगान की भाँति। लेकिन अंत में, यह एक पत्र ही है जो मैं लिख पा रहा हूँ।
मैंने विज्ञान, सितारों और प्रकृति से प्यार किया, और फिर लोगों से, बिना यह जाने कि लोग प्रकृति से कब के अलग हो चुके हैं। हमारी भावनाएँ दोयम दर्जे की हैं। हमारा प्रेम कृत्रिम है। हमारा विश्वास रँगा हुआ है। हमारी मौलिकता केवल बनावटी कला से वैध है। यकीनन यह बहुत मुश्किल हो गया है कि हम बिना चोट खाए किसी को प्यार कर पाएँ। व्यक्ति के मूल्य उसकी तात्कालिक पहचान और निकटतम संभावनाओं से बदल चुके थे। एक वोट से। एक संख्या से। एक चीज से। किसी आदमी से कभी एक मस्तिष्क की तरह व्यवहार नहीं किया गया था। एक शानदार वस्तु जो स्टारडस्ट से बनी है। प्रत्येक क्षेत्र में, पढ़ाई में, गलियों में, राजनीति में और जीने-मरने में।
मैं इस तरह का पत्र पहली बार लिख रहा हूँ। मेरा पहला अवसर है एक अंतिम पत्र लिखने का। मुझे माफ करना अगर मैं कोई मतलब निकालने में नाकाम हो जाऊँ।
मुमकिन है कि मैं इस दुनिया को समझने में लगातार गलत रहा होऊँ। प्यार, तकलीफ, जीवन और मृत्यु को समझने में। किसी तरह की जल्दबाजी नहीं थी। लेकिन मैं हमेशा भागता रहा। एक जीवन की शुरुआत करने से निराश। कुछ लोगों के लिए जिंदगी मुसलसल एक अभिशाप है। मेरा जन्म ही मेरे लिए एक भयानक हादसा है। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं सकता। मेरे अतीत का एक अभागा बच्चा।
इस समय मैं पीड़ा में नहीं हूँ। दुखी भी नहीं हूँ। मैं केवल खाली हो चुका हूँ। अपने आप से उदासीन। यह बेहद तकलीफ देह है। और इसीलिए मैं यह कर रहा हूँ। मेरे जाने के बाद शायद लोग मुझे कायर की उपाधि दें। स्वार्थी और मूर्ख कहें। लेकिन मैं इन चीजों को लेकर परेशान नहीं हूँ कि मेरे बाद लोग मुझे क्या कहेंगे। मैं मरने के बाद के किस्सों में, भूतों-प्रेतों में यकीन नहीं रखता। अगर कोई चीज है जिसका मुझे यकीन है तो वो यह कि, मैं सितारों की सैर कर सकता हूँ और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूँ।
अगर आप, जो इस पत्र को पढ़ रहे हैं, मेरे लिए कुछ कर सकते हैं तो, मुझे मेरी सात महीने की ‘फेलोशिप मिलनी बाकी है, पूरे एक लाख पचहत्तर हजार रुपये। कृपया यह मेरे परिवार तक पहुँचा दी जाय। मुझे चालीस हजार रुपये रामजी को देने हैं। उसने कभी मुझसे वापस नहीं माँगे। लेकिन इन्हीं रुपयों में से उसे भी जरूर दिए जाएँ।
मेरा अंतिम संस्कार शांतिपूर्ण और हमवार ढंग से किया जाय। इस तरह से कि मैं केवल प्रकट हुआ और चला गया। मेरे लिए आँसू मत बहाना। यह जानिए कि मैं जिंदा रहने से कहीं ज्यादा खुश मरने पर हूँ। “परछाइयों से सितारों तक।”
उमा भाई, मुझे माफ करना कि मैंने यह सब करने के लिए तुम्हारा कमरा इस्तेमाल किया। मेरे अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन (ए0एस0ए0) परिवार, मुझे माफ करना कि मैंने तुम सब को तकलीफ दी। तुम सबने मुझे बहुत प्यार किया। मेरी कामना है कि तुम सब का भविष्य उज्ज्वल हो। आखिरी बार, जय भीम!
मैं औपचारिकताएँ लिखना भूल गया। मेरी आत्महत्या के लिए किसी को जिम्मेदार न ठहराया जाय। किसी ने भी मुझे यह सब करने के लिए उकसाया नहीं, न तो शब्दों से न हरकतों से। यह मेरा फैसला है और सिर्फ मैं इसके लिए जिम्मेदार हूँ। मेरे दोस्तों और दुश्मनों को इसके लिए परेशान न किया जाय, जब मैं चला जाऊँ।”
रोहित के सुसाइड नोट से हमें पता चलता है कि वह कितना संवेदनशील और प्रतिभाशाली स्कॉलर (अध्येता) था। एक ऐसा वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाला छात्र जिसे आत्मा-परमात्मा में यकीन नहीं था बल्कि विज्ञान और सितारों में जबर्दस्त दिलचस्पी थी। एक ऐसा रोमानी व्यक्तित्व जिसे विश्वास था कि मनुष्य का निर्माण सौरमण्डल के तारों की भस्म से हुआ है और उसी मनुष्य से मनुष्य की तरह नहीं पेश आया जा रहा है। लेकिन इस बेहतरीन प्रतिभा को, जिसने सदियों का संताप सहन कर, हजारों साल की यातनाओं को अपने कंधों पर ढोकर, इक्कीसवीं सदी के भारत में- अंबेडकर के भारत में, मेहनत, मजदूरी करके ‘कार्ल सेगान’ जैसा ब्रह्मांडविद् विज्ञान लेखक बनने का सपना देखा था, इस देश की क्रूर और अमानवीय सवर्णवादी, ब्राह्मणवादी व्यवस्था अजगर की भाँति निगल गई। ऐसा केवल दलितों के साथ ही क्यों होता है?
रोहिथ ने कुलपति पी. अप्पा राव को पहले भी एक पत्र में लिखा था कि वे दलित छात्रों को प्रवेश के समय 10-10 मिलीग्राम सोडियम अजाइड (घातक रासायनिक विष) दे दिया करें जिससे उन्हें और उनके कैंपस को शांति मिल जाय। साथ ही यह भी लिखा था कि वे विश्वविद्यालय के सभी दलित छात्रों के हॉस्टल-कमरों में एक-एक ढंग की रस्सी पहुँचा दें जिससे उन्हें फाँसी लगाने में आसानी रहे। उसने अपने जैसे छात्रों के लिए कुलपति से ‘इच्छामृत्यु’ की माँग की थी।  रोहिथ ने कुलपति को लिखा कि ‘डोनाल्ड ट्रंप’ भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जो कि भाजपा और आरएसएस का बगलबच्चा संगठन है इन दिनों सत्ता के घमंड में चूर है और उसके हौंसले बढ़े हुए हैं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र-संघ के चुनाव में एबीवीपी बुरी तरह हार गई थी। अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के जीतने से एबीवीपी खुन्नस में था। इसीलिए सत्ता समर्थित एक छात्र-नेता ने रोहिथ को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया। लेकिन इससे पूर्व छात्रों की राजनीति में बढ़़ी राजनैतिक मछलियों की ऐसी उछल-कूद नहीं देखी गई थी। यद्यपि देखा जाय तो रोहिथ को प्रताडि़त करने में मनुवादी मोदी सरकार के दो केंद्रीय मंत्रियों ने ही नहीं सवर्ण नौकरशाही ने भी पूरी दिलचस्पी दिखाई। इससे पता चलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन पर भी कितना अधिक राजनैतिक दबाव था। ये वे भारतीय विश्व विद्यालय हैं जिन्हें स्वायत्त कहा जाता है। प्रकारांतर से भारतीय लोकतन्त्र का पर्याय ही सवर्णतंत्र है। स्मृति ईरानी को नॉननेट फेलोशिप के मुद्दे पर देश भर के छात्रों को उत्तर देने में भले ही चार महीने से अधिक समय लग गया लेकिन रोहिथ को विश्वविद्यालय से निलंबित करने के लिए उनके सचिवों ने एमएचआरडी शास्त्री भवन से पाँच पत्र लिखे। सचिव स्तर के ये अफसर भी सवर्ण ही होंगे इसलिए एक दलित छात्र की जान लेने में उन्हें कैसा संकोच होता। उनके बच्चे तो कहीं विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे होंगे।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जो पाँच पत्र लिखे गए हैं उनमें से पहला एक ई-मेल है जो हैदराबाद केंद्रीय विश्व विद्यालय के रजिस्ट्रार के नाम संबोधित है और जिसे अंडर सेक्रेटरी ‘रामजी पाण्डेय’ ने भेजा है। इसमें मोदी सरकार के मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की सिफारिश का जिक्र है। दूसरे पत्र में 24 सितंबर दिनांक अंकित है जिसे डिप्टी सेक्रेटरी सुबोध कुमार घिल्डियाल ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को भेजा है। इस पत्र में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का हवाला दिया गया है। तीसरा समान पत्र भी डिप्टी सेक्रेटरी सुबोध कुमार घिल्डियाल ने 6 अक्तूबर को हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम भेजा। 20 अक्तूबर को हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में मानव संसाधन विकास मंत्रालय से चैथा पत्र भेजा गया। यह पत्र संयुक्त सचिव सुखबीर सिंह संधू ने कुलपति को संबोधित करके भेजा। पाँचवा और निर्णायक पत्र पुनः ब्राह्मण अंडर सेक्रेट्री रामजी पाण्डेय ने 19 नवंबर को कुलपति को संबोधित करके भेजा। इस पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक इस मामले में कोई उत्तर क्यों नहीं दिया गया है? इस प्रकार एक अदना एबीवीपी छात्रनेता से लेकर वीआईपी मंत्री और आला दर्जे के नौकरशाह तक इस कांड में शरीक हैं। जिसमें एक ब्राह्मण सचिव ने अतिरिक्त स्फूर्ति दिखाई है। इन सब के हाथ एक प्रतिभाशाली दलित रिसर्च स्कॉलर के खून से रंगे हुए हैं। तिस पर भी मोदी सरकार की अत्यंत प्रिय, चुनाव हारी हुई, इंटर पास, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इस पूरे मामले का बचाव करने की निहायत घृणित और बेशर्मी भरी कोशिश की और रोहिथ की आत्महत्या को जातीय उत्पीड़न से अलग बताया। उनसे यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या वे एक सवर्ण छात्र के साथ भी ऐसा करने की जुर्रत कर पातीं? प्रधानमंत्री मोदी ने भी लखनऊ में एक भाषण के दौरान इस पूरे प्रकरण पर घडि़याली संवेदना प्रकट की लेकिन दोषियों पर किसी तरह की कार्रवाई करने से अभी तक बच रहे हैं। यदि वे सचमुच एक दलित माँ के बेटे हैं तो अपने मंत्रियों का इस्तीफा क्यों नहीं लेते? जबकि सब कुछ पूरी तरह स्पष्ट है कि यह मोदी सरकार द्वारा समर्थित एक ब्राह्मणवादी, सांस्थानिक हत्या है।
सवर्ण मीडिया से ऐसे मामलों पर किसी तरह की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी लेकिन जब देश की जनता ने इस घटना को पूरी सजगता और रोष के साथ सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों के साथ सामने रखा तो मीडिया ने भी उसका अपनी राजनैतिक निष्ठा के साथ सकारात्मक-नकारात्मक अनुसरण किया। इसका क्या अर्थ निकाला जाय कि दलितों का इस देश में कोई नहीं है? क्या संघ का अंबेडकर प्रेम केवल एक छल और धूर्तता है? क्या प्रधानमंत्री की अंबेडकर की प्रतिमा के सामने सुलगाई गईं अगरबत्तियाँ केवल एक कुत्सित प्रपंच है? देश की दलित जनता के लिए, प्रधानमंत्री में क्या अपने मंत्रियों से इस्तीफा लेने का साहस भी नहीं है? जिनके नाम से उन्होंने हाल ही में हुए बिहार चुनाव में यह कहते हुए वोट माँगे थे कि वे एक दलित माँ के बेटे हैं। वस्तुतः स्वयं को पिछड़ा बताने वाले प्रधानमंत्री ने लगभग दो वर्ष के शासन में यह सिद्ध कर दिया कि वह ब्राह्मणवादी कठपुतली मात्र हंै। सरकार के कई बड़े मंत्रियों ने इस बार भी पूर्व जैसे ही कुंठित बयान दिए। हरियाणा में दो दलित बच्चों को जिंदा जलाए जाने पर सरकार के मंत्री वी.के. सिंह ने दलितों को कुत्ता कहा था। अबकी सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि जो लोग रोहिथ वेमुला की आत्महत्या पर विरोध, प्रदर्शन कर रहे हैं वे व्यवस्था का पीछा करने वाले कुत्ते हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे गैरजिम्मेदार और कुंठित बयान कभी नहीं दिए गए। यह बयान देश की उस दलित जनता की पीड़ा पर दिए गए जिन्होंने मोदी सरकार बनाने के लिए अपना अस्सी फीसदी वोट 2014 के आम चुनावों में दिया है।
रोहिथ वेमुला की माँ को आठ लाख रुपयों की सहायता राशि की पेशकश की गई थी लेकिन रोहिथ की माँ ने यह कहकर इस राशि को ठुकरा दिया कि जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी आठ लाख तो क्या वह आठ करोड़ रूपये भी नहीं लेंगी। उसे यह बताया जाय कि उसके होनहार बेटे की जान क्यों और किसने ली? रोहिथ वेमुला की सांस्थानिक ब्राह्मणवादी हत्या ने एक बार फिर से भारतीय जातिव्यवस्था की सड़ी परतें उघाड़ दी हैं। यह सुशिक्षित, भद्रजनों का जातिवाद है। यह प्रोफेसरों, कुलपतियों, नौकरशाहों और कैबिनेट मंत्रियों का जातिवाद है। यहाँ पर एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि यदि रोहिथ वेमुला के स्थान पर एक सवर्ण छात्र होता तो क्या तब भी यह सारी मशीनरी इसी तरह काम करती? इक्कीसवीं सदी में ब्राह्मणवाद और भी खूँखार हो गया है। पौराणिक द्रोणाचार्य ने तो केवल एकलव्य का अंगूठा ही माँगा था जिससे वह उनके प्रिय क्षत्रिय शिष्य अर्जुन की बराबरी न कर ले, लेकिन उत्तर, आधुनिक द्रोणाचार्यों ने एकलव्यों को फाँसी पर लटकने पर मजबूर कर दिया है। रोहिथ वेमुला की मौत के बहाने से ही सही, हमें भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त विषैले ब्राह्मणवाद से लेकर कार्पोरेटी पूँजी के बेलगाम घोड़े पर सवार सत्ता में आ गए इस नव-ब्राह्मणवाद की नकेल भी कसनी होगी। तभी हम भारत रत्न भीमराव अंबेडकर की सवा सौंवी जयंती मनाने के लायक होंगे।
-संतोष अर्श
लोकसंघर्ष पत्रिका  के मार्च 2016  अंक में प्रकाशित

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