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बाराबंकी। दिल्ली में तीन किसान विरोधी कानूनों को रद्द कराने के लिए चल रहे आन्दोलन के समर्थन में आॅल इण्डिया स्टूडेन्टस फेडरेशन व अखिल भारतीय नौजवान सभा ने जुलूस निकाला।
प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए स्टूडेन्स फेडरेशन के जिलाध्यक्ष महेन्द्र यादव ने कहा कि किसानों के समर्थन में छात्र नौजवान भी आन्दोलन करेंगे और इस देश विरोधी, जनता विरोधी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। नौजवान सभा के जिलाध्यक्ष आशीष शुक्ला ने सरकार को ललकारते हुए कहा कि यह सरकार किसान मजदूर विरोधी सरकार है, गोदी मीडिया द्वारा हिप्टोनाइज अंध भक्त मतदाताओं द्वारा चुनी गई, अल्पमत की सरकार है, सरकार के मुखिया अडानी, अम्बानी के नौकर की भूमिका में रहते हैं और कार्पोरेट सेक्टर की यह गुलाम सरकार है। अन्त में राष्ट्रपति को सम्बोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से दिया गया, जिसकी प्रमुख मांगे किसान विरोधी काले कानूनों को रद्द किया जाये, नई शिक्षा नीति 2020 वापस लिया जाये, भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून बनाया जाये, बिजली कम्पनी विधेयक 2020 तत्काल वापस लिया जाए, श्रम कानूनों में संशोधन वापस लिया जाए तथा फर्जी मुकदमें वापस लिये जाए।
प्रदर्शनकारियों में नौजवान सभा के उपाध्यक्ष संदीप तिवारी, स्टूडेंस फेडरेशन के कोषाध्यक्ष अंकित यादव, दीपक शर्मा, प्रतीक शुक्ला, सचिन वर्मा, अंकुल वर्मा, श्याम सिंह आदि प्रमुख छात्र व नौजवान नेता थे।
प्रदर्शनकारी छाया चैराहे से पुलिस लाइन चौराहे होते हुए पटेल चैराहा से जिलाधिकारी कार्यालय सरकार विरोधी गनन भेंदी नारे लगाते हुए पहुंचे, जहां पर अतिरिक्त जिलाधिकारी संदीप गुप्ता ने ज्ञापन लिया।

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क्या हम कम बातें कर सकते हैं? मोदी के उत्थान में असली भूमिका प्रगतिशील और  धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की है | hastakshep | हस्तक्षेप

मौजूदा किसान आंदोलन की दिशा

प्रेम सिंह

किसान संसार का अन्नदाता है लेकिन आज की व्यवस्था में वह स्वयं प्राय: दाने-दाने को तरस जाता है. उसकी कमाई से कस्बों से लेकर नगरों में लोग फलते-फूलते हैं पर उसके हिस्से में आपदाएं ही आती हैं. सूखे की मार से फसल सूख जाती है. बाढ़ से खेत डूब जाते हैं. लेकिन दोनों से बड़ी आपदा तब आती है जब साल भर की मेहनत से घर आई फसल की कीमत इतनी कम मिलती है कि लागत-खर्च भी नहीं निकलता. … अगर आज किसान बदहाल है तो इसके लिए पूरी तरह सरकारों की किसान-विरोधी नीतियां ही जिम्मेदार हैं जो गावों को उजाड़ कर महानगरों के एक हिस्से को अलकापुरी बनाने में लगी हैं. … देश के पायेदान पर गांव हैं और नगरों के पायेदान पर गांवों से उजाड़े गए लोगों का निवास होता है. (‘खेती-किसानी की नई नीति’, सच्चिदानंद सिन्हा, समाजवादी जन परिषद्, 2004)

पिछले तीन दशकों से देश में शिक्षा से लेकर रक्षा तक, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से लेकर छोटे-मंझोले-खुदरा व्यवसाय तक, सरकारी कार्यालयों से लेकर संसद भवन तक और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से लेकर साहित्य-कला-संस्कृति केंद्रों तक को निगम पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत समाहित करने की प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में कृषि जैसा विशाल क्षेत्र इस प्रक्रिया के बहार नहीं रह सकता. संवैधानिक समाजवाद की जगह निगम पूंजीवाद की किली गाड़ने वाले मनमोहन सिंह ने बतौर वित्तमंत्री, और बाद में बतौर प्रधानमंत्री, इस प्रक्रिया को शास्त्रीय ढंग से चलाया. विद्वान अर्थशास्त्री और कुछ हद तक आज़ादी के संघर्ष की मंच रही कांग्रेस पार्टी से संबद्ध होने के चलते उनकी आंखें हमेशा खुली रहती थीं. कवि-ह्रदय अटलबिहारी वाजपेयी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कभी आंखें मीच लेते थे, कभी खोल लेते थे. नरेंद्र मोदी आंख बंद करके निगम पूंजीवाद की प्रक्रिया को अंधी गति प्रदान करने वाले प्रधानमंत्री हैं. वे सत्ता की चौसर पर कारपोरेट घरानों के पक्ष में ब्लाइंड बाजियां खेलते और ताली पीटते हैं. इस रूप में अपनी भूमिका की धमाकेदार घोषणा उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही कर दी थी – कांग्रेस ने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के पक्ष में कुछ संशोधन किए थे. मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही उन संशोधनों को अध्यादेश लाकर पूंजीपतियों के पक्ष में निरस्त करने की पुरजोर कोशिश की.

केंद्र सरकार द्वारा कोरोना महामारी के समय लाए गए तीन कृषि-संबंधी अध्यादेश – कृषि-उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, मूल्य का आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश 2020, आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश 2020 – उपर्युक्त प्रक्रिया और उसमें मोदी की विशिष्ट भूमिका की संगती में हैं. दरअसल, उपनिवेशवादी व्यवस्था के तहत ही कृषि को योजनाबद्ध ढंग से ईस्ट इंडिया कंपनी/इंग्लैंड के व्यापारिक हितों के अधीन बनाने का काम किया गया था. नतीज़तन, खेती ‘उत्तम’ के दर्जे से गिर कर ‘अधम’ की कोटि में आती चली गई. आज़ादी के बाद भी विकास के लिए कृषि/गांव को उद्योग/शहर का उपनिवेश बना कर रखा गया. हालांकि संविधान में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों की रोशनी में समतामूलक समाज कायम करने के संकल्प के चलते उपनिवेशवादी दौर जैसी खुली लूट की छूट नहीं थी. उद्योग (इंडस्ट्री) के मातहत होने के बावजूद कृषि-क्षेत्र ने आर्थिक संकट/मंदी में बार-बार देश की अर्थव्यवस्था को सम्हाला. अब मोदी और उनकी सरकार कृषि को पूरी तरह कारपोरेट घरानों के हवाले करने पर आमादा है. कारपोरेट घराने मुनाफे का कोई भी सौदा नहीं चूकते. नवउदारवादी नीतियों के रहते विशाल कृषि-क्षेत्र उनकी मुनाफे की भूख का शिकार होने के लिए अभिशप्त है.

छोटी पूंजी के छोटे व्यावसाइयों के बल पर पले-बढ़े आरएसएस/भाजपा बड़ी पूंजी की पवित्र गाय की तरह पूजा करने में लगे हैं. मोदी-भागवत नीत आरएसएस/भाजपा ने कारपोरेट घरानों को और कारपोरेट घरानों ने आरएसएस/भाजपा को मालामाल कर दिया है. जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा नज़र आता है, वे भ्रम फ़ैलाने में लगे रहते हैं कि वास्तव में कारपोरेट-हित में बनाए गए श्रम और कृषि-कानून मज़दूरों/किसानों को भी मालामाल कर देंगे! बड़ी पूंजी की पूजा का मामला आरएसएस/भाजपा तक सीमित नहीं है. कोई अर्थशास्त्री, राजनेता, यहां तक कि मजदूर/किसान नेता भी अड़ कर यह सच्चाई नहीं कहता कि कारपोरेट घरानों की बड़ी पूंजी राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों, कृषि और सस्ते श्रम की लूट का प्रतिफल है. यह लूट उन्होंने देश के शासक-वर्ग की सहमती और सहयोग से की है. फर्क यह है कि पहले कारपोरेट घराने पार्टियों/नेताओं की गोद में बैठने का उद्यम करते थे, अब पार्टी और नेता कारपोरेट घरानों की गोद में बैठ गए हैं. भारत में ‘गोदी मीडिया’ ही नहीं, ‘गोदी राजनीति’ भी अपने चरम पर है.

बड़ी पूंजी की पूजा के नशे की तासीर देखनी हो तो आरएसएस/भाजपा और उसके समर्थकों का व्यवहार देखिए. किसान कहते हैं कृषि-कानून उनके हित में नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री कहते हैं इन कानूनों में किसानों के लिए अधिकार, अवसर और संभावनाओं की भरमार है. किसान खुद के फैसले के तहत महीनों तक कृषि कानूनों के विरोध में धरना-प्रदर्शन करते हैं और ‘दिल्ली चलो’ की घोषणा करके संविधान दिवस (26 नवंबर) के दिन राजधानी में दस्तक देने के लिए कूच करते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री लगातार प्रचार करते हैं कि किसानों को विपक्ष द्वारा भ्रमित किया गया है – ऐसा विपक्ष जिसने 70 सालों तक किसानों के साथ छल किया है. किसानों को प्रतिगामी और मरणोन्मुख तबका तो सैद्धांतिक रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा में भी माना जाता है; लेकिन मोदी और उनके अंध-समर्थक उन्हें बिना सोच-समझ रखने वाला प्राणी प्रचारित कर रहे हैं.     

मोदी और उनकी सरकार की शिकायत है कि कृषि-कानूनों के खिलाफ केवल पंजाब के किसान हैं, गोया पंजाब भारत का प्रांत नहीं है. कहना तो यह चाहिए कि पंजाब के किसानों ने अध्यादेश पारित होने के दिन से ही उनके विरोध में आंदोलन करके पूरे देश को रास्ता दिखाया है. पंजाब के किसानों की शायद इस हिमाकत से कुपित होकर उन्हें ‘खालिस्तानी’ बता दिया गया है. देश के संसाधनों/उपक्रमों को कारपोरेट घरानों/बहुराष्ट्रीय कंपनियों को औने-पौने दामों पर बेचने में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाला शासक-वर्ग किसान-मंडी के बिचौलियों के बारे में ऐसे बात करता है, गोया वे जघन्य अपराध में लिप्त कोई गुट है! बड़ी पूंजी की पूजा का नशा जब सिर चढ़ कर बोलता है तो हर सिख खालिस्तानी, हर मुसलमान आतंकवादी, हर मानवाधिकार कार्यकर्ता अर्बन नक्सल और हर मोदी-विरोधी पाकिस्तानी नज़र आता है. प्रधानमंत्री का आरोप है कि लोगों के बीच भ्रम और भय फ़ैलाने का नया ट्रेंड देखने में आ रहा हैं. लेकिन उन्हें देखना चाहिए कि उन्होंने खुद पिछले सात सालों से एक अभूतपूर्व ट्रेंड चलाया हुआ है – कारपोरेट-हित के एक के बाद एक तमाम फैसलों का यह शोर मचा कर बचाव करना कि देश में पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ.

किसान पुलिस द्वारा लगाए गए विकट अवरोधों, पानी की बौछारों और आंसू गैस का सामना करते हुए संविधान दिवस पर दिल्ली के प्रमुख बॉर्डरों तक पहुंच गए. लेकिन पुलिस ने उन्हें दिल्ली में नहीं घुसने दिया. दबाव बनने पर केंद्र और दिल्ली सरकारों के बीच बनी सहमति के तहत किसानों को पुलिस के घेरे में बुराड़ी मैदान में जमा होने की अनुमति दी गई. लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार जंतर-मंतर पहुंच कर प्रदर्शन करने की मांग पर अडिग किसानों ने बुराड़ी मैदान में ‘कैद’ होने से इनकार कर दिया. उन्होंने दिल्ली के सिंघु और टीकरी बॉर्डरों पर धरना दिया हुआ है. उधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान कृषि कानूनों के विरोध में गाजीपुर बॉर्डर पर धरना देकर बैठे हैं. सरकार और पंजाब के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच 1 दिसंबर को हुई बातचीत पहले हुई 13 नवंबर की बातचीत की तरह बेनतीजा रही है. अब 3 दिसंबर को फिर बातचीत होगी, जिसकी आगे जारी रहने की उम्मीद है. किसानों ने अपना धरना उठाया नहीं है. वे 6 महीने के राशन के इंतजाम के साथ आए हैं, और अपनी मांगों के पूरा होने से पहले वापस नहीं लौटेंने का संकल्प दोहराते हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी दर्ज़ा देने की मांग तो है ही, साथ में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग भी है. आंदोलन की यह खूबी उल्लेखनीय है कि वह पूरी तरह शांतिपूर्ण और शालीन है, और उसके नेता सरकार के साथ बातचीत में भरोसा करने वाले हैं.    

सरकार अभी या आगे चल कर किसानों की मांगें मानेगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आंदोलनकारी किसान एक समुचित राजनैतिक चेतना का धरातल हासिल करने के इच्छुक हैं या नहीं. जिस तरह से दुनिया और देश में तेजी से बदलाव आ रहे हैं, खेती से संबद्ध कानूनों, संचालन-तंत्र (लोजिस्टिक्स) और संस्थाओं आदि में बदलाव लाना जरूरी है. आज के भारत में खेती को उद्योग के  ऊपर या समकक्ष स्थापित नहीं किया जा सकता. उसके लिए गांधी के ग्राम-स्वराज और लोहिया के चौखम्भा राज्य की विकेंद्रीकरण पर आधारित अवधारणा पर लौटना होगा. देश का प्रबुद्ध प्रगतिशील तबका ही यह ‘पिछड़ा’ काम हाथ में नहीं लेने देगा. खेती को सेवा-क्षेत्र के बराबर महत्व भी नहीं दिया जा सकता. अभी की स्थिति में इतना ही हो सकता है कि बदलाव संवैधानिक समाजवादी व्यवस्था के तहत हों, न कि निगम पूंजीवादी व्यवस्था के तहत. किसान खुद पहल करके पूरे देश में को-आपरेटिव इकाइयां कायम कर सकते हैं, जहां ताज़ा, गुणवत्ता-युक्त खाद्य सामान उचित दर पर उपलब्ध हो सके. इससे उसकी आमदनी और रोजगार बढ़ेगा. देश भर के किसान संगठन इसमें भूमिका निभा सकते हैं.      

किसान देश का सबसे बड़ा मतदाता समूह है. किसान का वजूद खेत मज़दूरों, जो अधिकांशत: दलित जातियों के होते हैं, और कारीगरों (लोहार, बढ़ई, नाई, धोबी, तेली, जुलाहा आदि) जो अति पिछड़ी जातियों के होते हैं, से मिल कर पूरा होता है. भारत के आदिवासी आदिकिसान भी हैं. खेती से जुड़ी इस विशाल आबादी में महिलाओं की मेहनत पुरुषों से ज्यादा नहीं तो बराबर की होती है. जातिवाद, पुरुष सत्तावाद और छुआछूत की मानसिकता से मुक्त होकर ही किसान निगम पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एकजुट और लंबी लड़ाई लड़ सकता है. आपसी भाई-चारा और सामुदायिकता का विचार/व्यवहार उसे विरासत में मिला हुआ है. निगम पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज में सांप्रदायिकता का जो ज़हर फैलाया जा रहा है, उसकी काट किसान ही कर सकता है. आज़ादी के संघर्ष में किसान शुरू से ही साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना का दुविधा-रहित वाहक था, जबकि सामंत और नवोदित मध्य-वर्ग के ज्यादातर लोग अंत तक दुविधा-ग्रस्त बने रहे. आंदोलन में शरीक कई किसानों के वक्तव्यों से पता चलता है कि वे देश पर कसे जा रहे नव-साम्राज्यवादी शिकंजे के प्रति सचेत हैं. किसानों की यह राजनीतिक चेतना स्वतंत्रता, संप्रभुता, स्वावलंबन की पुनर्बहाली के लिए जरूरी नव-साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का आधार हो सकती है.      

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

बाराबंकी। सरकार किसानों की आय दोगुना कर रही है, वहीं भूसा आठ रूपये किलो है और धान नौ रूपये किलो बिक रहा है । मोदी और योगी  किसानों व मजदूरों को उनके तथाकथित विकास के नाम पर आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही है। आल इण्डिया किसान सभा द्वारा निकाले गये प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसानों को राष्ट्रीय मार्ग पर निकलने से रोकने के लिए सरकार ने सड़कें खोद डाली है, और जगह-जगह पानी की बौछार किसानों पर कर रही है। किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसानों का संघर्ष जारी रहेगा चाहे उसके लिए जो भी कुरबानी देनी पड़े, किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि जनपद में किसानों के धान तौले नहीं जा रहे हैं जिसमें जिला प्रशासन और बड़े व्यापारियों की सांठगांठ है। वही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि पार्टी किसान संघर्ष के लिए हमेशा मदद करती रही है और आगे भी जारी रहेगी पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि यह ऐसी सरकार है कि बुआई के समय खाद का संकट, कीटनाशक दवाईयों का संकट और जब फसल तैयार हो तो उसका कोई खरीददार नहीं होता है और किसान बरबाद हो जाता है। किसान सभा का जुलूस डाॅ0 कौसर हुसैन के नेतृत्व में छाया चैराहे से होते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक गया जहां राष्ट्रपति के नाम सम्बोधित ज्ञापन सौंपा गया, प्रदर्शनकारियों में प्रमुख लोग अंशू लता मिश्रा, नैमिष कुमार सिंह, नीरज वर्मा, स्वप्निल वर्मा, आर्यन वर्मा, मुकेश वर्मा, निर्मल वर्मा, सचिन वर्मा, सुरेश यादव, दलसिंगार, राजकुमार, राम नरेश, राजेश सिंह, आशीष तिवारी, महेन्द्र यादव, प्रतीक शुक्ला आदि लोग रहे।

D. Raja: Age, Biography, Education, Wife, Caste, Net Worth & More - Oneindia

लक्ष्मी विलास बैंक, 94 वर्षीय तमिलनाडु आधारित निजी बैंक पिछले कुछ वर्षों से जेट एयरवेज, रिलिगेयर, कॉक्स और किंग्स, कॉफी डे जैसे ज्ञात डिफाल्टर्स को दिए गए कुप्रबंधन और बुरे ऋण के कारण पिछले कुछ वर्षों से नुकसान कर रहा है, नीरव मोदी, रिलायंस हाउसिंग फाइनेंस, आदि । भ्रष्ट  शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय रिजर्व बैंक ने घोषणा की है कि बैंक सिंगापुर के डीबीएस बैंक को सौंपा जाएगा ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव डी राजा ने खा कि लक्ष्मी विलास बैंक को न सौंपे विदेशी बैंक को  न सौपें और बैंक के जमाकर्ताओं और ग्राहकों के साथ-साथ बैंक के खुदरा निवेशकों के बड़े हित में बैंक को एक सार्वजनिक क्षेत्र बैंक में विलय करना वांछनीय है जैसा कि अतीत में कई मामलों में किया गया है । विदेशी निवेशकों को खुश करने के लिए सरकार के एजेंडे के विदेशी बैंक स्मैक को बैंक सौंपते हुए । एलवीबी के स्थगन की घोषणा करने के एक घंटे के भीतर भारतीय रिजर्व बैंक ने डीबीएस बैंक में विलय करने के प्रस्ताव के किया  है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पहले से ही तय किया गया था । इतनी जल्दी क्यों किसी को साफ नहीं होती । सरकार को इस मामले से पूरी तरह पूछताछ करनी चाहिए और डीबीएस बैंक को एलवीबी का सौंपना बंद करना चाहिए ।स्थानीय मुखर और आत्मनिर्भर के बारे में छत के ऊपर से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जोर से घोषणा करते रहते हैं । लेकिन वास्तव में वे यही करते हैं । मोदी सरकार की इन देशद्रोही विनाशकारी नीतियों के खिलाफ कामकाजी और किसान लड़ रहे हैं । 26 नवंबर 2020 को आम हड़ताल और किसान आंदोलन भी होगा ।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  सभी वर्गों से अपील करती है कि इन संघर्षों को एक बड़ी सफल बनाने के लिए पूर्ण एकजुटता और समर्थन करें । निजी क्षेत्र के कर्जदाता लक्ष्मी विलास बैंक (LVB) और सिंगापुर स्थित डीबीएस होल्डिंग्स की भारतीय शाखा के विलय में बैंकिंग क्षेत्र के संगठनों को गड़बड़झाला लग रहा है। बैंक के शेयरधारकों, आम नागरिकों और कई बैंकिंग यूनियन का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक  ने जिस तरह से डीबीएस इंडिया को लक्ष्मी विलास बैंक मुफ्त में देने का फैसला किया है, उसमें कई झोल हो सकते हैं। ऑल इंडिया बैंक इंप्लॉईज एसोसिएशनके महासचिव सीएच वेंकटचलम ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के नेतृत्व में एलवीबी के डीबीएस इंडिया में विलय की जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें बड़ा झोल नजर आ रहा है।  इस विलय को लेकर जिस जल्दबाजी में दिख रहा है, उसमें घोटाले की आशंका भी दिखाई दे रही है। बैंक के एक लाख से अधिक शेयरधारकों को विलय योजना पर प्रतिक्रिया देने के लिए महज तीन दिनों का वक्त दिया गया है।

आरबीआइ ने मंगलवार को कहा कि विलय के अस्तित्व में आने के बाद एलवीबी का परिचालन बंद समझा जाएगा।

 

  • हाजरा बेगम का जन्म 10 दिसंबर 1910को सहारनपुर उ प्र में हुआ था। उनके पिता मुमताजुल्ला खान मेरठ में मैजिस्ट्रेट थे। उनकी माॅ का नाम नातिका बेगम था। परिवार धनी और आधुनिक विचारों का था। उन दोनों के दो लड़के और चार लड़कियां थीं और परिवार के कई सदस्य इंगलैंड रह आए थे।हाजरा की पढ़ाई नौ साल की उम्र तक घर में ही उर्दू, फारसी और अंग्रेजी में हुई। 1918 में इंफ्लुएंजा की महामारी फैल गई। उस वक्त उनके पिता बस्ती में डिप्टी कलेक्टर थे। हाजरा ने खुद अपनी आंखों से नदी को लाशें से पटा हुआ देखा था और कौवों और कुत्तों को लाशें नोचते हुए देखा था।1919 में हाजरा को क्वीन्स काॅलेज, लाहौर में दाखिल करा दिया गया। वह काॅलेज चीफ काॅलेज के समकक्ष था और दोनों ही राजकुमरियों और नवाबजादियों के लिए खुला था। हाजरा का परिवार चूंकि रामपुर नवाब से संबंधित था इसलिए उसे दाखिला मिल गया। हाजरा सभी विषयों में फर्स्ट क्लास आती रही। उसे साहित्य और खेलकूद से बड़ा लगाव था।हाजरा काॅलेज लाइब्रेरी में लगभग सारी किताबें पढ़ गई थी। उसे प्रेमचंद की एक कहानी ‘बूढ़ी काकी’ बड़ी पसंद आई। लेकिन काॅलेज का वातावरण कुलीन और फैशन-पसंद था जहां इस तरह की गतिविधियां खास पसंद नहीं की जाती थीं।1924 में हाजरा नौंवी क्लास में थी। उसी वक्त एक रूसी महिला का व्याख्यान आयोजित किया गया औरछात्राओं केा रोका गया। हाजरा ने पहली बार वहीं ‘बोल्शेविक’ शब्द सुना। व्याख्याता बोल्शेविकों के खिलाफ जहर उगल रही थी। एक बार काॅलेज में ईद की छुट्टी नहीं हुई। इसके खिलाफ हाजरा के नेतृत्व में लड़कियों ने हड़ताल कर दी। सामाजिक सक्रियता का हाजरा का यह पहला अनुभव था। हाजरा पर रविन्द्रनाथ और प्रेमचंद का गहरा प्रभाव पड़ा।हाजरा ने 1926 में मैट्रिक पास किया। 1920 में उसकी मां की मृत्यु हो गई और मैट्रिक पास करने से पहलेसौतेली मां की भी मृत्यु हो गई। भाई-बहनों की देखभाल के लिए उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। वह ‘स्त्री-स्वतंत्रत की समर्थक के रूप में प्रसिद्ध होने लगी। वह उर्दू-फारसी में हाजरा बेगम-असाधारण कम्युनिस्ट महिला नेता काफी लिखने लगीं। उसे वह समझ में नहीं आता कि हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते क्यों हैं क्योंकि वह हिन्दुओं के साथ काफी रह चुकी थी। उसने पर्दा करना छोड़ दिया था। 1928 में हाजरा की शादी पुलिस डिप्टी सुपरिंटेंडेंट अब्दुल जमील खान से हुई। 1931 में हाजरा को एक पुत्र हुआ।राजनीति की ओर झुकाव हाजरा के मामू के लड़के महमूद जफर 7 वर्षों बाद इंगलैंड से लौटे और खादी पोशाक अपना ली। पहले तो हाजरा और अन्य सबों को बड़ा धक्का लगा। महमूमद ने इंगलैंड में खादी और खादी की विचारधारा पूरी तरह अपना ली थी। हाजरा दो महीनों तक महमूद के साथ मसूरी रही औरमहमूद ने आधुनिक राष्ट्रीय और क्रांतिकारी विषयों से हाजरा को पूरी तरह अवगत कराया। हाजरा मेंराष्ट्रीयता की भावनाएं जाग पड़ीं। उसने भी खद्दर की साड़ी पहनना शुरू कर दिया। एक पुलिस अफसर की पत्नी के लिए ऐसा करना बहुत बड़ी बात थी।चारों ओर चर्चा होने लगे। 1931 में चारों ओर ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ तथा अन्य नारे लग रहे थे। सत्याग्रह और जन-आंदोलन हो रहे थे। एक जगह लोग ऐसे नारे लगाते हुए नमक बना रहे थे। हाजरा खुद डी.एस.पी. की कार चला रही थी। उनके मना करने पर भी हाजरा ने कार रोक दी। 1932 में हाजरा पिता के पासमेरठ गई। उस वक्त कम्युनिस्टों पर सुप्रसिद्ध मेरठ षड्यंत्र केस चल रहा था। उनमें एक अभियुक्त थे लेस्टर हचिन्सन। हचिन्सन उसी मकान के दूसरे हिस्से में ठहरे हुए थे। उन्हें जमानत मिल चुकी थी। महमूद और हाजरा के बड़े भाई विलायत से लौटे थे और वहीं थे। पिता के मना करने पर भी हाजरा सबकी बातें सुना करती।हाजरा ने कन्युनिज्म की बातें सुनीं और हचिन्सन और बेन ब्रैडले के बारे में पिता से उलटी बातें सुनीं।मेरठ में एक महिला क्लब में भी दार्शनिक एवं राजनैतिक बातें होने लगीं। गर्मियों में हाजरा देहरादून चली गईं। उसके बाद वह पति के पास लौटने में देर करने लगी। दोनों के जीवन के रास्ते अलग होने लगे। दो-तीन महीनों बाद उसने पति को त्याग दिया।अगस्त 1932 में हाजरा पिता के पास लौट गई। महमूद को छोड़ सभी उसका विरोध कर रहे थे। कुछ समय उसने अलीगढ़ में स्कूल में बच्चों को पढ़ाया। फिर माॅन्टेसरी प्रशिक्षण के लिए इंगलैंड जाना तय किया। 1933 में आधा जेवर बेचकर अपने बच्चों को लेकर वह इंगलैंड पहुंच गई।इंगलैंड में हाजरा हैम्पस्टेड के मांटेसरी काॅलेज में भर्ती हो गई। उनका छोटा भाई भी पोटर््समाउथ में नौसेना प्रशिक्षण ले रहा था। बच्चे को भी स्कूल में दाखिल करा दिया। काॅलेज में कई लड़कियां नाजी अत्याचारों का शिकार देख और सह चुकी थीं। हाजरा को नाजीवाद के बारे में जानकारी मिलने लगी।इंगलैंड पहुंचने के तीसरे दिन ही सज्जद जहीर से मुलाकात हो गई। राजनीति संबंधी बातें हुईं। 1934 मेंबिहार में हुए भूकम्प के लिए राहत-कार्य लंदन में किया। 1934 की गर्मियों में वे सोवियत रूस गईं औरकई सारे शहरों की यात्रा की। वहां चल रहे युगांतकारी परिवर्तनों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। लंदन में वे‘मार्क्स वादी भारतीय विद्यार्थियों के ग्रुप’ में शामिल हो गई। ग्रेट ब्रिटेन कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने वाले प्रथम भारतीयों मे वे एक थीं। उन्होंने अपना कोर्स दो वर्षों में पूरा किया। वे बहुत आर्थिक तंगी की हालत में वहां रहा करतीं।हाजरा ब्रसेल्स में आयोजित फासिज्म और युद्ध संबंधी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भी शामिल हुईं। सम्मेलन में एक बिंदु पर ‘साम्राज्यवाद’ शब्द शामिल नहीं करने पर उन्होंने अपने साथियों के साथ वाॅक-आउट भी किया।वे के.एम. अशरफ, जेड.ए. अहमद और सज्जाद जहीर के साथ भारत लौंटीं। वे 1935 में भारत लौर्टी और उन्होंने लखनऊ के करामत हुसैन मुस्लिम गल्र्स काॅलेज के जूनियर स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। लखनऊ में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में डाॅ. जेड.ए.अहमद आए और पं. नेहरू से मिले। वे हैदराबाद की अपनी नौकरी, काॅलेज में प्रिंसिपल का काम, छोड़कर नेहरू के अनुरोध पर 1936 में इलाहाबाद आ गए। फिर हाजरा भी अपना काम छोड़ इलाहाबाद आ गईं। वे दोनों एक-दूसरे से वर्षों से परिचित थे। उन दोनों ने शादी कर ली और कांग्रेस में सक्रिय काम करने लगे।हाजरा और जेड.ए. अहमद का विवाह सज्जाद जहीर के पिताजी सर सैयद वजीर हसन की कोठी पर हुआ जो लखनऊ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। उर्दू के मशहूर शायर रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी’ और डाॅ. अशरफ उपस्थिति रहे।विवाह के बाद चूंकि जेड.ए. अहमद को कांग्रेस दफ्तर से केवल 75/रु. ही मिलते थे इसलिए हाजरा ने एकअंग्रेजी स्कूल में 75/रु. माहवार पर टीचर का काम ले लिया। इस प्रकार उनका काम चलने लगा। हाजरा नेकिसानों और मजदूरों में बहुत काम किया। कांग्रेस ने उन्हें असेम्बली के लिए मुस्लिम महिला चुनाव-क्षेत्र से खड़ा करना चाहा लेकिन हाजरा राजी नहीं हुई। हाजरा ने प्रभा नामक पत्रिका का छह महीने संपादन किया। 1939 में हाजरा के एक पुत्री हुई। जिसका नाम सलीमा था। 1940 में हाजरा बेगम अख्लि भारतीय वीमेन्स काॅेन्फ्रेस ;ए. आई.डब्ल्यू.सी की संगठन मंत्री रहीं।कुछ समय लाहौर और प्रयाग में स्कूल में पढ़ाने का काम करने के बाद वे मजदूरों और किसानों में काम करने लगीं।1936 से वे प्रगतिशील लेखक संघ ;पी.डब्ल्यू.ए.के साथ सक्रिय कार्य करने लगीं। वे ए.आई.डब्ल्यू.सी. मेंनिरंतर सक्रिय रहीं। उन्होंने इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के कुलियों को संगठित कर 1937 मे इलाहाबाद रेलवे कुली यूनियन का गठन किया। उन्होंने कानपुर की महिला मजदूरों, आजमगढ़ की महिला बुनकरों, रायबरेली की किसान महिलाओं तथा अन्य तबकों के बीच  सक्रिय कार्य किया।हाजरा बेगम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के फैजपुर ;1936, हरिपुरा ;1938और रामगढ़ ;1940 अधिवेशनों में सक्रिय हिस्सा लिया। 1930 के दशक में उन्होंने किसान और प्रभा नामक पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने 1946-47 के दौरान ए.आई.डब्ल्यू.सी. की उर्दू और हिन्दी पत्रिका रोशनी का संपादन भी किया।1940 में हाजरा अपनी बेटी सलीमा को लेकर लाहौर चली गईं। वहीं से पार्टी का गुप्त रूप से काम करने लगीं। पार्टी महासचिव ने उन्हें पंजाब में कम्युनिस्ट पार्टी की संचालिका नियुक्त किया। जब जेड.ए. अहमद को 1940 में देवली कैम्प में बंद कर दिया गया तो एक बार हाजरा अपनी बेटी के साथ उनसे मिलने गईं। बेटी को तो ‘दो मिनट’ मिलने दिया गया लेकिन हाजरा को अंदर नहीं जाने दिया गया।दो मिनट आधा घंटा में बदल गया। सभी कैदी बच्ची को देख बड़े खुश हुए। कई तो फूट-फूट कर रोने लगे।1942 में पंजाब में पेरिन भरूचा तथा हाजरा के नेतृत्व में लड़कियों का एक ग्रुप बनकर तैयार हो गया। पी.सी. जोशी ने उन्हें राजनैतिक शिक्षा देने का काम हाजरा बेगम को सौंपा।हाजरा बेगम 1940 के दशक में पूर्वी उत्तरप्रदेश में सामंती अत्याचारों के खिलाफ महिलाओं के बीच आंदोलन जोर पकड़ने लगा। 1947 में रतनपुरा तथा अन्य इलाकों में महिलाएं लाठी-डंडा लेकर शामिल होने लगीं।इनमें हाजरा बेगम ने रात-दिन मेहनतकरके उन्हें संगठित किया।हाजरा बेगम ने यू.पी. में पार्टी की स्थापना में भी भाग लिया।महिला आत्मरक्षा समिति 1940 के दशक में बंगाल,पंजाब, दिल्ली तथा अन्य स्थानों मे एक महिला जन-संगठन का गठन किया गया जिसक नाम था ‘महिलाआत्मरक्षा समिति’। हाजरा बेगम बताती हैं कि पंजाब महिला आत्मरक्षा लीग सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए खाद्य संकट, सूखा तथा अन्य संकटों के बारे में जन-जागृति पैदा किया करता था।द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यह अभियान विशेष तौर पर तेज हुअ। एक गीत का शीर्षक था ‘ना तेल, ना डिब्बियां, साणु कीं लभेया’ अर्थात् न तेल है और न ही तेल का कनस्तर, हमें क्या मिला? हाजरा बेगम ए.आई.डब्ल्यू.सी में काम किया करती थीं। वह एक बड़ा संगठन था लेकिन वैचारिक रूप से हाजरा बेगम-असाधारण कम्युनिस्ट महिला नेता थी । जल्द ही उसके अंदर विचारधारा का संघर्ष आरंभ हो गया।संगठन कुलीन महिलाओं का संगठन बनता जा रहा था और गरीब तथा निचले तबके की महिलाओं से दूर होता जा रहा था। हाजरा समेत अन्य कम्युनिस्ट महिलाओं ने इसे एक स्वस्थ्य राजनैतिक-वैचरिक दिशा देने का प्रयत्न किया। कम्युनिस्ट पार्टी में जैसा कि हम कह आएं हैं हाजरा ब्रिटेन में ही कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन चुकी थीं। वापस लौटने पर कुछ ही समय बाद वे और जेड.ए. अहमद दोनों ही पार्टी के पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गए। हाजरा इलाहाबाद में सी.एस. पी. ;कांग्रेस सोशिलिस्ट पार्टी में भीकाम करने लगीं। इलाहाबाद की सी.एस.पी. ;कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के युवा नेताओं में हाजरा, अहमद, अशरफ और राममनोहर लोहिया शामिल थे। उस वक्त हाजरा कम्युनिस्ट पार्टी के मुट्ठीभर महिला सदस्यों में थीं। 1949-51 के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबंदी लगा दी गई और हाजरा अंडरग्राउंड चली गईं।‘बी.टी.आर.’ लाइन का दौर जेड.ए. अहमद को इस दौर में ‘बी.टी.आर.’ नेतृत्व द्वारा काफी जलील किया गया। उन्हें शारीरिक कामों तक सीमित कर दिया गया। वे खाना पकाने और बर्तन मांजने का काम करने लगे!इतना ही नहीं, ‘बी.टी.आर.’ ने हाजरा बेगम को आदेश दिया कि जेड.ए. अहमद को तलाक दे दो क्योंकि वह सुधारवादी और संशोधनवादी बन गया है! लेकिन दोनों ने यह आदेश मानने से इंकार कर दिया।1952 में उन्होंने विएना में संपन्न विश्व शांति सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसके अलावा उन्होंने 1953 में कोपनहेगन में फेडरेशन के सम्मेलन तथा 1955 में लुसाने में ‘माताओं के विश्व सम्मेलन’ में भाग लिया।एन.एफ.आई.डब्ल्यू. की स्थापना हाजरा बेगम एन.एआई.डब्ल्यू की संस्थापकों में थीं। 1943 में ही उन्होंनेपार्टी नेतृत्व के सामने प्रस्तावित किया था कि पार्टी का एक अलग महिला मोर्चा होना चाहिए। इस प्रश्न पर उनका अन्य कई साथियों से मतभेद था। बंगाल से उन्हें काफी समर्थन मिला। उन्होंने कहा कि हमारे पास एक अखिल भारतीय महिला संगठन हो जो कम्युनिस्ट महिला संगठन नहीं हो। इसमें मजदूर, किसान, निम्न मध्यवर्ग, टीचरों,तबकों से महिलाएं हों और इस पर रानियों-महारानियों का प्रभुत्व न हो। उन्होंने कहा कि मध्यम वर्गें की महिलाएं मजदूर और कामकाजी महिलाओं की समस्याएं नहीं समझती हैं।कोपनहेगन सम्मेलन की तैयारी के लिए दिल्ली के बंगाली मार्केट में राष्ट्रीय तैयारी सम्मेलन की तैयारी समिति का कार्यालय स्थापित किया गया। 9 मई 1953 को एक राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया। माॅडर्न स्कूल में एक प्रदर्शनी भी लगाई गईं। 25 महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल चुना गया। वे सभी ‘‘भारत एयरवेज’ से गए, जो एक चार्टर्ड प्लेन पर जिसमें सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था। जो पहले भी हवाई यात्रा कर चुके थे वे भी कलकत्ता से कोपनहेगन की यह यात्रा नहीं भूले। हाजरा बेगम के अनुसार, यात्रा को तीन रातें और दो दिन लगे। हवाई जहाज चिड़िया के समान फुदक रहा था। वह कई सारे शहर होता हुआ गुजरा। इन शहरों से यात्री भर लिए जाते जो कई बार जमीन पर ही सो जाते!प्रतिनिधिमंडल एक सप्ताह पहले ही पहुंच गया। इसलिए उनके रहने का कोई इंतजाम नहीं था। किसी तरह उनका इंतजाम ‘ग्रीष्म स्कूलों’ में किया गया जहां नहाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। सदस्यों को बिना काम के अजीब-सा लग रहा था। सम्मेलन के आयोजकों ने कहा कि आप चिंता क्यों कर रही हैं? आप सभी साड़ियों में है। सारे देश में लोग पूछ रहे हैं कि आप यहां क्यों आई हैं? सम्मेलन प्रचार तो आरंभ हो चुका है!कोपनहेगन कांग्रेस ने ‘‘महिलाओं के अधिकारों संबंधी घोषणा’ स्वीकृत की। इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों का व्यापक दायरा प्रस्तुत किया गया। इनमें काम के अधिकारों, तथा व्यापार, कामकाज, प्रशासन, पुरूषों के साथ बराबरी, इसका विस्तृत वर्णन दिया गया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने ही सर्वप्रथम कार्यशील महिलाओं समेत भूमि के स्वामित्व की बात शामिल की।वापस लौटने पर एक समन्वय समिति गठित की गई जिसकी हाजरा बेगम और अनुसूया ज्ञानचंद संयोजक थीं और एनी मैस्केरीन अध्यक्ष। इसकी परिणाति अखिल भारतीय महिला सम्मेलन ;कलकत्ता, 4-6 जून 1954 के रूप में हुई। हाजरा बेगम संयुक्त सचिवों में चुनी गई। हाजरा बेगम से 1965 तक एन.एफ.आई.डब्ल्यू के नेतृत्व का हिस्सा रहीं। उन्होंने 1961 में काहिरा में एफ्रो-एशियाई महिला सम्मेलन में भाग लिया।हाजरा बेगम भा.क.पा. की उर्दू केंद्रीय मासिक पत्रिका ‘कम्युनिस्ट जायजा’ की संपादकमंडल में थी। वे दो बार पार्टी की केंद्रीय कंट्रोल कमिशन में चुनी गई। वे संगठन के अनुशासन की पक्की थीं। उन्होंने पार्टी अखबार ‘कौमी जंग’ के लिए भी बहुत लिखा। हाजरा बेगम की मृत्यु 20 जनवरी 2003 को लंबी बीमारी के बाद हो गई।

हमने अभी दो चुनाव नतीजे देखें हैं। एक अमेरिका में निरंकुश जन विरोधी, कारपोरेट समर्थक, नस्लवादी दक्षिणपंथी तानाशाह डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डमोक्रेट जो बाइडेन के हाथों मात। इसे उन सभी दक्षिणपंथी पार्टियों और उनके नेताओं को संदेश देना चाहिए, जो सत्ता हासिल करने के क्रम में लोगों को नस्ल, धर्म, समुदाय और रंग के आधार पर बांटने का प्रयास करते हैं। ट्रंप पर अमेरिकी लोकतंत्र के तीन स्तंभों आजादी, काननू का राज और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को बर्बाद करने का आरोप है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव  डी राजा नेकहा कि दूसरा चुनाव भारतीय राज्य बिहार में हुआ, जहां धर्मनिरपेक्ष, जनवादी ताकतों के एक गठजोड ने सांप्रदायिक विद्वेष, आरएसएस-भाजपा की हिंदुत्व मशीनरी के गठजोड और उनके सहयोगी जदयू को लगभग मात दे दी थी। हालांकि, एनडीए ने नीतीश कुमार, जिन्होने 2020 के विधानसभा को अपने बूट टांगने की घोषणा की थी, को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने नियंत्रण वाले सभी संसाधनों का इस्तेमाल करके सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की।दोनों चुनावों ने कईं सबक सिखायें हैं और पूरी दुनिया में खासतौर पर भारत में वाम, जनवादी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए अवसरों और चुनौतियों के नये द्वार खोले हैं। इन दो घटनाओं ने उन कईं विद्वानों के मत को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया जिन्होंने विचारधारा और विचारधारा आधारित राजनीति के खत्म होने की घोषणा की थी।अमेरिकी चुनावों के बारे में उल्लेखनीय तथ्य वाम झुकाव वाले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रहे बर्नी सैंडर्स द्वारा चलाए गए अभियान द्वारा वाम-प्रगतिशील मतदाताओं की लामबंदी था जिसने मिशिगन और जाॅर्जिया जैसे प्रमुख राज्यों में जीत दर्ज कराने के साथ जो बाइडन को राष्ट्रपति पद पर कब्जा करने में मदद की। भारत में, वामपंथियों ने बिहार में महागठबंधन को आवंटित 29 सीटों में से 16 पर जीत हासिल करके अपनी सार्थकता साबित की, हालांकि कई पर्यवेक्षकों ने बताया कि वामपंथियों की सीट का हिस्सा जमीन पर उनकी ताकत और जनसंपर्क से बहुत कम था। यह परिणामों से स्पष्ट हो गया है। फिर भी, वाम दलों, भाकपा, भाकपा ;एमद्ध और भाकपा ;एमएलद्ध ने आरएसएस-भाजपा के सत्ता में आने के गंभीर खतरे के कारण महागठबंधन के साथ गठजोड किया। वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ दृढता से खड़े रहे।डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका में उनके बडे पद ने अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर काफी संकट खडा किया और अमेरिका को नस्लीय और वर्गीय आधार पर बांटा। जो बाइडेन की जीत और उनके कार्यक्रम पर डेमोक्रेटस के वामपथियों यथा बर्नी सैंडर्स और अलेक्सेड्रिया ओकासियो काॅर्टेज ने करीबी निगाह रखी। वे बाइडेन प्रशासन पर भी करीबी निगाह रखेंगे। दुनिया आशा करती है कि वे सभी राष्ट्रों की बेहतरी के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय स्थिर व्यवस्था की तरफ जाने के लिए काम करेंगे, जो शान्ति और विकास को सुनिश्चित करेगा।भारत में वामपंथ का कार्यक्रम देश में बेआवाजों, हाशिये पर पडे, दबे कुचलों और मेहनकशों की आवाज बनना है। यह निश्चितता के साथ दावा किया जा सकता है कि जब से आरएसएस-भाजपा गठबंधन ने भारत में सत्ता पर कब्जा किया है, वह वामपंथी ही रहे हैं जिन्होंने उनकी सभी विभाजनकारी, जनविरोधी नीतियों और चालों का विरोध किया और वे लोकप्रिय आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे हैं। देश के दलितों और महिलाओं के साथ भेदभाव है, एक समुदाय को राष्ट्र विरोधी की तरह पेश करना अथवा सरकार की किसान विरोधी, मजदूर विरोधी, छात्र विरोधी नीतियों के खिलाफ वामपंथ ने देश में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ आंदोलनों का नेतृत्व किया है और बिहार में वामपंथ का शानदार प्रदर्शन उसी का नतीजा है।इन जीतों ने जनता में वामपंथ से आशाओं में बढोतरी की है। उभरते हुए हालात ने भारत में वामपंथ के सामने कईं चुनौतियां रख दी हैं। जो बाइडेन की जीत और बिहार में महागठबंधन के प्रभावी प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि 2008 की वित्तीय मंदी के बाद से उभरे दक्षिणपंथी ताकतों के उभार को रोका जा सकता है यदि प्रगतिशील और जनवादी ताकतें जनता के अधिकारों और लोकतंत्र के सवाल पर एक साथ आयें। यद्यपि, ट्रंप ने बाइडेन को कडी टक्कर दी और भाजपा बिहार में एक प्रमुख ताकत बनकर उभरी है, तो यह कहा जा सकता है कि जनता को सांपद्रायिक, जाति और नस्ल के आधार ध्रुवीकरण और विखंडन को खत्म करने के लिए प्रगतिशील ताकतों को अधिक काम करने की जरूरत है।भारत में कारपोरेट समर्थक भाजपा अपने गठबंधन सहयोगी से अधिक सीटें पाकर और सभी सीटों और क्षेत्रों में अधिक उपस्थिति दर्ज कर अब अखिल भारतीय पार्टी होने का दाव करेगी। हालांकि, यह साफ है कि भाजपा का कार्यक्रम भारतीय गणराज्य को हिंदू राष्ट्र में बदलने का है। वह पहले ही देश में धर्म, क्षेत्र और जातियों और राज्यों के आधार पर विभाजन कर चुकी है।वामपंथ को उत्तर भारत के एक प्रमुख राज्य बिहार में महत्वपूर्ण सीट और वोट में इजाफे के बाद धर्मनिरपेक्ष-जनवादी ताकतों की बडी और व्यापक एकता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। ना केवल बिहार में बल्कि पूरे देश में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के धर्मनिरपेक्ष-जनवादी दलों को उनकी विचारधारा और राजनीतिक अवस्थिति का गंभीर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। वे दक्षिणपंथी अथवा दक्षिणपंथी मध्यमार्ग की राह नही ले सकते हैं। यदि वे वाम मध्यमार्गी लाइन नहीं लेते हैं तो भी उन्हें कम से कम मध्यमार्गी स्थिति में ही बने रहना चाहिए। उन्हें उनकी नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की अवस्थिति का आत्मावलोकन करना चाहिए जोकि देश को मौजूदा विनाशक स्थिति में ले गयी है और देश को एक मंदी की तरफ धकेल रही है।वामपंथ को स्वतंत्र रूप से और अन्य धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतों के साथ भी विनाशकारी एजेंडे के खिलाफ उन लोगों द्वारा किए गए विनाश के खिलाफ संघर्ष को तेज करना चाहिए। वामपंथियों का कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि वे देश भर में भाजपा की जनविरोधी और ध्रुवीकरण की नीतियों के खिलाफ लोकप्रिय आंदोलनों को एक साथ लाएं और उन्हें मजबूत करें। वामपंथ को भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जन समर्थक ताकतों को बांधने वाला वह तत्व होना चाहिए जो वर्ग, जाति और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ अधिक जज्बे और संवेदनशीलता के साथ बढ़ रहा है।

CPI leader atul anjan appeal nitish kumar to left nda | अतुल अंजान ने नीतीश  कुमार से की NDA छोड़ने की अपील, तेजस्वी को दी उन्हें मनाने की सलाह | Hindi  News,

भारतीय जनता पार्टी की ओर से जम्मू कश्मीर के राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितियों पर उठाए जा रहे सवालों का आज स्वयं भाजपा को देश को जवाब देने की जरूरत है। भाजपा को देश को बताना होगा कि मुफ्ती महबूबा की पीडीपी पार्टी की सभी नीतियों की जानकारी होने के बावजूद भी उसके साथ सरकार क्यों बनाई। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए भाजपा को देश से माफी मांगनी चाहिए।

यह बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अनजान ने कहा   एक बयान जारी करते हुए कहा कि एक बार फिर भाजपा तिरंगा अभियान की बात कर राज्य में सांप्रदायिक माहौल खड़ा करना चाहती है। महबूबा मुफ्ती के साथ भाजपा के उपमुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर के झंडे को सलामी दे रहे थे और सरकार चला रहे थे, तब उन्हें तथाकथित राष्ट्र विरोध नहीं दिखाई दिया जो आज विपक्ष पर अनर्गल हमला कर रहे हैं। अनजान ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियों को बर्बाद करने में सबसे बड़ा योगदान महबूबा मुफ्ती और भाजपा की मिली जुली सरकार का रहा है। इसी दौर में सबसे ज्यादा आतंकवादी घटनाएं राज्य में हुईं तथा राज्य और केंद्र की सरकार खामोश तमाशाई बनी रही। इन परिस्थितियों में भाजपा को देश से माफी मांगनी चाहिए।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 85वर्षीय नेता कामरेड योगेन्द्र सिंह का निधन हो गया है 2012 में बाराबंकी विधान सभा के  यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे इनके पिता स्वर्गीय मुनेश्वर बक्श भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे .पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि उनके निधन से कम्युनिस्ट पार्टी की अपूर्णीय क्षति हुई है .पार्टी के जिला सचिव ब्रजमोहन वर्मा ने कहा कि वह जीवन भर कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय रहे .किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने बताया कि वह माती के किसान आन्दोलन में भी सक्रिय योगदान दिया पार्टी शोकसंतप्त परिवार के प्रति संवेदना एवं एकजुटता व्यक्त करती है

 


हरीश चंद्र तिवारी का जन्म मसवानपुर, नजदीक पनकी, कानपुर जिले में 5 सितंबर 1915 को एक
शिक्षित परिवार में हुआ था। यह परिवार बस्ती जिले का था। हरीश उन कम्युनिस्टों में थे जिन्होंने ए.आई.एस.
एफ. के स्थापना सम्मेलन ;1936 में भाग लिया था। उनके पिता पं. रामचंद्र तिवारी नजीबाबाद में स्कूल हेडमास्टर थे। हरीश ने कानपुर से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। आगे पढ़ने के लिए उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ में दाखिला लिया।
हाई स्कूल में पढ़ते वक्त ही उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य इकट्ठा करना आरंभ किया। एक दिन वे ‘इंकलाब
जिन्दाबाद’ जैसे क्रांतिकारी नारे लगते हुए शहर घूमते रहे, इस आशा में कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेगी! चूंकि
उनके पिता समाज में एक सम्मानजनक व्यक्ति थे, हरीश को सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। लेकिन हरीश नहीं माने। उन्हें उनके चाचा श्री शिवमंदन तिवारी के कठोर अनुशासन में पढ़ाई करने कानपुर भेज दिया गया। उसके बाद वे लखनऊ चले गए। यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान वे महत्वपूर्ण छात्र नेता के रूप में उभर आए। वे पूरी तरह ईमानदार और समर्पित नेता एवं व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वहां से उन्होंने बी.ए. पास किया। वे हिन्दी, उर्दू तथा इंगलिश तीनों ही भाषाओं में पारंगत थे।
ए.आई.एस.एफ. के संस्थापकों में ;1936 जैसा कि सुविदित है ए.आई.एस. एफ. की स्थापना अगस्त 1936 में
लखनऊ में संपन्न अखिल भारतीय विद्यार्थी सम्मेलन में हुई थी। हरीश तिवारी ने इस सम्मेलन के आयोजित
करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यहां यह नोट किया जाना आवश्यक है कि कांग्रेस का अधिवेशन मई
1936 में लखनऊ में ही हुआ था। कांग्रेस के इस अधिवेशन के दौरान ही हरीश तिवारी, बदिउद्दीन, बलराम सिंह
और पी.एन भार्गव ने जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की और उन्हें अखिल भारतीय स्टूडेंट्स फेडरेशन के निर्माण
के लिए सम्मेलन आयोजित करने की योजना से अवगत कराया। नेहरू बड़े उत्साहित हुए और सम्मेलन का
उद्घाटन करने के लिए सहमत हो गए। महात्मा गांधी ने भी इस विचार का समर्थन किया। इस प्रकार कांग्रेस
के अधिवेशन ने विभिन्न विद्यार्थी तथा अन्य नेताओं को आपस में सलाह करने का अवसर दिया।
यह हरीश तिवारी ही थे जिन्हें बाद में नेहरू को औपचारिक रूप में आमंत्रित करने तथा लाने का जिम्मा
सौंपा गया था। हरीश ने ए.आई.एस. एफ. के संस्थापना सम्मेलन में सक्रिय हिस्सा लिया। इस प्रकार वे ए.आई.
एस.एफ. के संस्थापकों में थे। वे उत्तरप्रदेश तथा भारत के विद्यार्थी आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता एवंसंगठनकर्ता थे।
1938-39 में हरीश ने लखनऊ विश्वविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव पद का चुनाव लड़ा। जी.एल. बंसल ने अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। हरीश के समर्थन में सक्रिय चुनाव कार्य करने वालों में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के भावी प्रोफेसर डॉ. पी.डी. श्रीमाली भी थे। इस बारे में उन्होंने सविस्तार लिखा है। ए.आई.एस.एफ. के शफीक नकवी भी थे। हरीश भारी मतों से चुनाव जीत गए। 1942 में गांधीजी और कांग्रेस के आवाहन पर ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन फूट पड़ा। लखनऊ में हरीश तिवारी तथा अन्य ने 1942 के आंदोलन के लिए विद्यार्थियों का संगठित किया। विद्यार्थियों का एक विशाल जुलूस चल पड़ा। ‘मंकी ब्रिज’ ;आज हनुमान सेतु के पास पुलिस ने हमला कर दिया और बर्बर लाठी-चार्ज किया। हरीश को बुरी तरह पीटा गया और उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए।

हरीश 1940 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वह कठिन दौर था। द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़
चुका था। पार्टी ने पहले ही राष्ट्रीय मोर्चे के गठन का नारा दिया था। हरीश अभी विद्यार्थी ही थेः दिन में वे
यूनिवर्सिटी में पढ़ाई किया करते, रात में पार्टी के अंडरग्राउंड कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय काम करते। उन्होंने
लखनऊ में पार्टी संगठन खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
इस समय हरीश की मुलाकात श्रीनारायण तिवारी से हुई जो एक पुराने क्रांतिकारी थे और अमीनाबाद में टोपियों
की दूकान चलाया करते थे। वहां एक ‘अम्माजी’ बैठा करतीं जो सबों की अम्माजी थीं! वे आगंतुकों को चाय,
पानी, खाना, बहस के लिए जगह वगैरह का इंतजाम किया करतीं। आस-पास कई चाय की दूकानें बैठकों
और बहसों के लिए अच्छी जगह थी। हरीश का नेटवर्क इस इलाके में बड़ा ही प्रभावशाली था। श्री नारायण तिवारी
के जरिए हरीश का संपर्क ट्रेड यूनियन आंदोलन से हुआ। हरीश तिवारी अपने व्यक्ति एवंसामाजिक जीवन में कुछ सिधान्तों  का बड़ी ही दृढ़ता से पालन किया करते।
वे अपना सारा ध्यान पार्टी कार्य पर केंद्रित करते और कभी भी पदों के पीछे नहीं भागते। हालांकि वे अच्छे
खाते-पीते परिवार से थे लेकिन उन्होंने परिवार से कोई सहायता लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने सिर्फ पार्टी वेतन पर ही गुजारा करना तय किया जो उस वक्त मात्र 30 रु. था।
ट्रेड यूनियन गतिविधियांः
निम्बकर अवार्ड के लिए संघर्ष हरीश तिवारी ने 1940 में बिजली मजदूर यूनियन का गठन लखनऊ में
किया। इसमें उनका सहयोग कालाकांकेर के कुंवर ब्रजेश सिंह, बाबूलाल, ए.पी. तिवारी तथा अन्य
साथियों ने किया। आगे यह यूनियन मार्टिन बर्न की सभी कंपनियों की यूनियनों की फेडरेशन बन गई।
इसी समय ;1940 में हरीश नागपुर में संपन्न ए.आई.एस.एफ. के सम्मेलन में इसके संयुक्त सचिव बनाए
गए। उन्होंने बिजली तथा अन्य मजदूरों का न्यूनतम वेतन तय करने लिए प्रदेशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया।
आखिरकार सरकार ने एक कमिटि का गठन किया जो ‘‘निम्बकर अवार्ड’’ कहलाया।
निम्बकर कमिटि या अवार्ड इससे पहले, तीस के दशक में आर.जी. रेगे कमेटी कहलाती थी। तीस और चालीस
के दशकों में यू.पी. में हरीश तिवारी तथा अन्य साथियों ने मजदूरों का न्यूनतम वेतन करने तथा अन्य मांगों
को लेकर आंदोलन चलाया। इसका परिणाम ‘‘निम्बकर अवार्ड’’ के रूप में हुआ। आर.एस. निम्बकर ए.
आई.टी.यू.सी. उच्च नेताओं में थे। उन्हें समिति में मजदूर पक्ष प्रस्तुत करने का जिम्मा सरकार की ओर से दिया गया। आगे चलकर ने समिति के अध्यक्ष तब बने। समिति ने काफी विस्तार से विभिन्न मांगों पर विचार किया और श्रम एवं औद्योगिक कानूनों में महत्वपूर्ण सुधार किए। साथ ही उत्तरप्रदेश में मजदूरों के वेतन में साढ़े बारह प्रतिशतकी बढ़ोतरी भी की। यह एक बहुत बड़ी जीत थी।
इस पूरे घटनाक्रम में हरीश तिवारी ने निरंतर योगदान दिया और संघर्ष किया। उनका योगदान इतना
प्रभावशाली साबित हुआ कि आम मजदूरों के बीच ‘निम्बकर अवार्ड’‘हरीश तिवारी अवार्ड’ के नाम से
विख्यात हो गया!
हरीश ने बीडी, कपड़ा, चमड़ा, सैनिक इंजीनियरिंग, प्लाईवुड, सरकारी कर्मचारियों एवं मजदूरों के बीच निरंतर
काम किया। मजदूरों के बीच हरीश के लिए विशेष गीतों और कविताओं की रचनाओं की रचना भी की गई!
1945-46 के दौरान बनारस में हरीश तिवारी की मुलाकात प्रेमलता तिवारी से हुई। वे भी पार्टी की सक्रिय
कार्यकर्ता थीं और अग्रवाल कॉलेज की प्रिंसिपल थीं। प्रेमलता ने अंडरग्राउंड पार्टी गतिविधियों में हिस्सा लिया।
1954 में हरीश और प्रेमलता ने अत्यंत गरीबी की हालात में विवाह कर लिया। लेकिन उन्होंने आपस में काम
बांटकर पार्टी का काम जारी रखा। तीन ‘टी’  तिवारी, टाइपराइटर, टोबैको!
टाईपराइटर हरीश तिवारी के जीवन का अभिन्न अंग बन गया था। वे साथियों और मजदूरों के बीच ‘थ्री टी’
के नाम से सुप्रसिद्ध हो गए। एक तो वे खुद ‘तिवारी‘ थे अर्थात ज् से शुरू होते
थे फिर मजदूरों के बीच संपर्क स्थापित करने में तम्बाकू बड़ा सुविधाजनक था। और टाइपराइटर
हमेशा उनके साथ चिपका रहा करता था! जब भी कुछ लिखना होता, पत्र या दस्तावेज, टाइपराइटर निकल
आता-फिर चाहे कमरा हो या आम सभा! वे एक ही उंगली से टाईप किया करते लेकिन बड़ी तेजी से। वे कभी
थकते नहीं। बिजली मजदूरों के नेता हरीश तिवारी यू.पी. तथा अखिल भारतीय पैमाने पर 1950-60 के
दशकों में बिजली मजदूरों के सर्वोच्च नेताओं में थे। उन्होंने तमलिनाडु के एस.सी. कृष्णन और महाराष्ट्र के ए.बी.
बर्धन के साथ मिलकर बिजली मजदूरों का अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अखिल भारतीय बिजली कर्मचारी फेडरेशन की स्थापना की गई। डॉ. वी. वी.गिरी की अध्यक्षता में पुराने फेडरेशन
को ही पुनर्जीवित किया गया। हरीश तिवारी संगठन के सहायक महासचिव बनाए गए।
वे एटक की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य चुने गए, साथ ही इसके कोषाध्यक्ष भी। उन्होंने वर्ल्ड
फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन की मीटिंगों में भी हिस्सा लिया।
हरीश तिवारी पार्टी में फूट पड़ने के बाद पार्टी और टी.यू. आंदोलन की कई जटिलताओं से गुजरे। उन्होंने यू.पी. में
28 स्पिनिंग मिलों में संगठन खड़ाकिया।
हरीश ने 1978 में एक विशाल मजदूर आंदोलन के दौरान इप्टा के साथियों से मजदूरों के बारे में ड्रामा
तथा गीत के लिए अनुरोध किया और उन्हें प्रोत्साहित किया। इसका परिणाम था‘‘क्या बदला है?’’ नामक एक ड्रामा जो सुप्रसिद्ध हुआ और कई बार मंचित किया गया। सज्जाद जहीर तथा डॉ. राशिद जहां भी जुड़े हुए थे। एक प्रकार से इसने आगे चलकर राज्य-स्तरीय टी.यू. कार्यालय के निर्माण में भीयोगदान दिया। हरीश तिवारी साहित्य
तथा पठन-पाठन में गहन दिलचस्पी रखा करते थे।
हरीश तिवारी को उच्च कोटि के जाने-माने नेताओं के बीच काम करना पड़ता था। एस.एस. युसुफ, रूस्तम
सैटिन, जेड.ए. अहमद, रमेश सिन्हा, अली सरदार जाफरी, सरजू पांडे, झारखंडे राय, जयबहादुर सिंह आदि।
फिर भी उन्होंने अपने ही ढंग से अपनी एक अलग पहचान बना ली।
वे 1978 में भंटिंडा में संपन्न भाकपा की कांग्रेस में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में चुने गए। वे राज्य पार्टी
सेक्रेटारिएट में भी चुने गए। हरीश तिवारी की मृत्यु 10 दिसंबर 1988 को लंबी बीमारी के बाद हो गई। मजदूर वर्ग और पार्टी के लिए यह बहुत बड़ी क्षति थी। उनके शोक-जुलूस में हजारों मजदूर तथा अन्य शामिल हुए। वे एक समझौताहीन,अनुशासित और आदर्श कम्युनिस्ट थे।

Image may contain: text that says "एटक शताब्दी समारोह 31 अक्टूवर, 1920-2020 AITUC 1920 2020 A Saga of Struggle and Sacrifice एटक का अतीत, वर्तमान और भविष्य अमरजीत कौर मनसचिव, एक ऑल इंडिया ट्रेड युनियन काँग्रेस प्रकारन"
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31 अक्टूबर 2020 को भारत के पहले केंद्रीय मजदूर संगठन
ष्ऑल इंडिया ट्रेड युनियन काँग्रेसष् के गौरवशाली सौ साल पूरे हुए। एटक
की स्थापना 31 अक्टूबर 1920 को मुंबई मे हुई। इस स्थापना
सम्मेलन में देश के सभी राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर
शामिल हुए थे। यह वह समय था जब देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के
खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था। जलियांवाला बाग कांड अभी
ताजा था जिसमें एक अँग्रेज आर्मी जनरल ने, बैसाखी मना रहे निहत्थे
लोगों पर अंधाधुंद गोलियां बरसा कर दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतार
दिया था। महात्मा गांधी ने तुरंत इस के बाद ब्रिटिश सरकार से असहयोग
और नागरिक अवज्ञा आंदोलन का आवाहन किया था। उस में जनता के
सभी तबके – देहात के किसान, शहरों क३
में वर्गचेतना दर्शाती हैं। पहला महायु( शुरू होने तक यह सिलसिला जारी
रहा।
1905 मे ब्रिटिश हुकूमत ने बढ़ते आंदोलन मे फूट डालने के इरादे
से बंगाल का विभाजन किया। नतीजा उलटा ही हुआ। मज़दूर और भी
तेजी से लामबंद होने लगे और अपनी संघटित ताकत स्वतंत्रता आन्दोलन
में उतारने लगे। हडतालों की लहर फिर उभरने लगी। इसमे उल्लेखनीय
छः दिन की हडताल है जो लोकमान्य तिलक को छः साल की की सजा
सुनाने के विरोध में मुंबई के मजदूरों ने 24 हे 28 जुलाई, 1908 में
की। मजदूर अंग्रेज पुलिस व अंग्रेज आर्मी से भीड़ गए।
लेनिन ने इस हड़ताल के बारे में लिखा, ष्भारतीय सर्वहारा वर्ग पहले
से ही सचेत और राजनीतिक जन संघर्ष छेड़ने के लिए पर्याप्त रूप से
परिपक्व हो चुका है, और यह मामला भारत में एंग्लो-रशियन तरीकों से
खेला जाता हैष्।
1914 से मजदूर वर्ग कई नये३
जैसा कानूनद्ध के खिलाफ हडताल हुई, जो राष्ट्रीय आंदोलन पर बहुत बड़ा
असर था। 1920 के पहले छः महिनों मे 200 हडताल हुईं जिसमें 15
लाख मजदूरों ने हिस्सा लिया। 1920 में मांगों में काम के घंटे दस हों
और महंगाई भत्ता मिलें आदि मांगे प्रमुख थी।
जुलाई 1920 से दिसम्बर 1920 तक 97 हडताले हुइंर् जिसमें
सिर्फ 31 नाकामयाब हुईं। बाकी सभी हडतालों से मजदूरों ने कुछ न कुछ
हासिल किया।
1920 में और कुछ युनियनों का गठन हुआ – जैसे जमशेदपूर लेबर
एसोसिएशन, अहमदाबाद वर्कर्स युनियन, इंडियन कोलियरी एम्प्लॉईज
एसोसिएशन, बंगाल-नागपूर रेलवे, इंडियन लेबर युनियन, ऑल इंडिया
पोस्टल त्डै युनियन, इंपीरियल बैंक स्टाफ एसोसिएशन, बर्मा लेबर
एसोसिएशन, हावड़ा लेबर युनियन, ओडिया लेबर युनियन, बंगाल अॅन्ड
नॉर्थ वेस्टर्न रेलवेमेन्स एसोसिएशन, ठठब् – प् रेलवे ३
अली जिन्ना, मिसेस अॅनी बेसंट, वि. जी. पटेल, बी. पी. वाडिया, जोसेफ
बाप्तिस्ता, लालूभाई सामलदास, जमनादास, द्वारकादास, बी. डब्ल्यू.
वाडिया, आर. आर. करंदीकर, कर्नल जे. सी. वेजवुड, जो ब्रिटिश ट्रेड
युनियन कौन्सिल के प्रतिनिधि के तौर पर सम्मेलन में शरीक हुए। 43 ऐसी
युनियन थी जो परिषद मे हिस्सा नही ले पाई लेकिन उन्होने सम्मेलन के
प्रति अपनी सहमति घोषित की थी।
लाला लाजपत राय ने बंबई शहर में 10,000 कार्यकर्ताओं के जुलूस
का नेतृत्व किया। लाला लाजपत राय ने कहा था, वर्तमान के लिए हमारी
सबसे बड़ी जरूरत संगठन, आंदोलन और कार्यकर्ताओं को शिक्षित करना
है। हमें अपने कार्यकर्ताओं को संगठित करना होगा, उन्हें उनके वर्ग के प्रति
जागरूक करना होगा और उन्हें एक समान राष्ट्र के तरीकों और हित के
बारे में शिक्षित करना होगा ”।
उन्होंने यह भी कहा कि ष्श्रम आ३
बदौलत कई कानून हासिल किये गये – जैसे वर्कमेन्स कम्पनशेसन एक्ट
1923, ट्रेड युनियन एक्ट 1926 के कानून। तब तक भी एटक का
नेतृत्व मध्यमवर्ग या बु(ीजिवीयों के हाथों में ही था। वे परोपकार की भावना
से एटक में हिस्सा लिया करते थे। साथ ही, जो मार्क्सवाद और समाजवाद
में रूचि रखते थे वे भी युनियन बनाने मे दिलचस्पी ले रहे थे। एस. ए. डांगे
ने 1922 में “सोशलिस्ट” नाम से एक अंग्रेजी प्रकाशन प्रकाशित करना
शुरू किया।
1927 में पहली बार एटक ने अधिकृत रीत से अपनी संलग्न युनियन्स
को मई दिन मनाने का आवाहन किया। 1928 से 1931 के दरम्यान
मजदूर वर्ग राजनीत के क्षेत्र में बहुत सक्रिय रहा। समाजवादी विचारधारा
के लोग स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण बनते जा रहे थे। एटक के करीब
करीब सभी संम्मेलनों में आंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधी हिस्सा लेते थे या भाईचारे
के संदेश देते ३
के हिस्सा थे, उनकी खुद की काम की जगह पर मांगे तो थी तथा विदेशो
में जहां मजदूर नात्झी-फांसीवाद के शिकार हो रहे थे, उन्हे भी सहारा देना
था।
एटक ने विश्व फेडरेशन ऑफ ट्रेड युनियन्स ;ॅथ्ज्न्द्ध की स्थापना में
अहम भूमिका निभाई। फरवरी, 1945 में लंदन मे तैयारी के लिए एक
अंर्तराष्ट्रीय सभा का आयोजन किया गया, जिस में विश्व के कोने कोने
के 67 करोड़ मजदूरों के 204 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। एटक के
प्रतिनिधि एस. ए. डांगे, आर. के. खेडगीकर तथा सुधींद्र प्रामाणिक थे। इस
सभा ने मजदूरों का एक मांगपत्र तैयार किया। आखिरकार 3 अॅक्टूबर,
1945 को ॅथ्ज्न् की स्थापना हुई।
1947 में भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। मजदूर वर्ग ने साम्राज्यवादी
शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। एटक के नेतृत्व में मजदूरों के
अधिकारों के लिए आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के लगभ्३
चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। दुनियाभर के लोगों के लिए ये उपलब्धियां
पूर्ववत हैं, उनके विकास, अर्थव्यवस्थाओं और विकास के लिए राष्ट्रों की
संप्रभुता को खतरा है।
अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी का साम्राज्यवादी डिजाइन द्वारा प्राकृतिक संसाध्
ानों पर कब्जा करने, बाजार बनाने और उस पर कब्जा करने, अधिकतम
मुनाफा अर्जित करने और दुनियाभर में अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए
आर्थिक रणनीति विकसित की जा रही है। किसी भी विरोध को विभाजित
करने, उसे समाप्त करने और दबाने की प्रवृत्ति उस डिजाइन का हिस्सा है।
शासक वर्गों के समर्थन के साथ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फासीवाद
रूझान बढ़ रहे हैं। एक देश से दूसरे देश इस तरह की योजना और
कार्यवाहियों का लक्ष्य मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया साम्राज्यवादी शक्तियों
के नीतिगत फ्रेम वर्क में रहे हैं।
भारत सरकार अंतर्राष्टी३
लगाने के नाम पर डिमोनेटाइजेशन, जीएसटी ने देश का आर्थिक परिदृश्य
बिगाड़ दिया है और सरकार की अक्षमता को उजागर किया है।
शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजीकरण के माध्यम से स्कूल और
कॉलेजों की शिक्षा पर हमले तेज हो गये हैं। शिक्षा के निजीकरण की नीतियों
के विरोध और छात्रों और शिक्षकों के असंतोष की आवाज एवं विचारों को
रौंदा जा रहा है।
लेखक कलाकार, रंगमंच के व्यक्ति, पत्रकार, स्वतंत्र विचारक और
बुद्विजीवी सभी पर हमले हो रहे हैं। भारतीय संविधान में निहित मूल
सि(ांतों को कमजोर करते हुए विपक्ष को चुप कराने की राजनीति अक्रामक
तरीके से लागू की जा रही है। लोकतांत्रिक मुल्यों, आस्था, धर्म, भाषा, जीने
के तरीकों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विविधता पर आधारित
संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत गंभीर खतरे में है।
श्रम संघ जो सामूहिकतावा३
मानवीय समस्या से लोगों को निजात दिलाने से अधिक अपने शोषण
और लाभ हेतु इस आपदा के अवसर का दुरूपयोग करने में लगा है। इस
अवधि में गैर लोकतांत्रिक और अमानवीय शासन की मजबूती हेतु शासन
निरंकुश एवं तानाशाहीपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा है। ऐसा कई अन्य देशों
में भी देखने को मिला है परंतु भारत की सरकार दुनिया की सबसे खराब
उदाहरण के रूप में सामने आयी है। रोजी के लिए पलायन किये प्रवासी
मजदूरों, छात्रों, तीर्थयात्रियों और अन्य नागरिकों जो इलाज के लिए घरों
से दूर बाहर यात्रा पर थे या अस्पताल में थे उन्हें अचानक 4 घंटा के
सूचना पर पूर्ण बंदी कर उन्हें अपने घर वापसी तक का मौका दिये बिना
कू्रर यातना का शिकार बनाया गया। इस अचानक पूर्ण बंदी ;लॉकडाउनद्ध
के कारण लाखों लोगों की नौकरी, आजीविका यहां तक कि उनका रहने
का आश्रय तक छीन लिया गया एवं भूखे-प्यासे उनके नसीब पर छोड़
दिया गया। अपने घरों को लौटने को मजबूर साधन विहीन लोगों ने जीवन
जोखिम में डाल सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल
पड़ने पर उन्हें भयानक यातना का भी शिकार बनाया गया। बच्चे, बूढ़ों,
गर्भवती महिलाओं सहित परिवार के लाखों लोग निकल पड़े एवं उनकी
दयनीय हालत पर तरस के बदले उन्हें पीटा गया, अपमानित किया गया
और उन पर रसायनिक छिड़काव, चेहरे पर काली स्याही से ‘मैं लॉकडाउन
ब्रेकर हूं’ लिखे जाने का अमानवीय कार्य हुए। उनमें से सैंकड़ों लोग भूख,
अभाव, बीमारी में चिकित्सा की कमी, शरीर में पानी की कमी के शिकार
होने व आत्महत्या से मर गए। अनकही पीड़ा को और परिवार के कमाउ
सदस्य खोने की स्थिति एवं लॉकडाउन में शासन-प्रशासन की कमियों ने
जनआवाम को भारी नुकसान पहुंचाया।
मोदी सरकार ने 19 दिसंबर को बीमारी की प्रारंभिक खबर आने से
मार्च 2020 तक के चार माह में बीमारी की गंभीरता का संज्ञान लेकर,
स्वास्थ्य एवं उपचार की आपात स्थिति से निपटने की तैयारी के बदले
नागरिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने वाले डीएमए ;आपदा प्रबंधन अधि्
ानियमद्ध लगाने का रास्ता चुना। अचानक बंदी के क्रम में डीएमए का
उपयोग करना वास्तव में सरकार की एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा
था जिसके द्वारा जनता को नियंत्रित करने के लिए इसे कानून व्यवस्था का

महामारी मजदूर वर्ग के संघर्ष के मादा को कम नहीं कर सकता है।
चिकित्सकों की सलाह को मानते हुए संयुक्त मई दिवस आयोजन सहित
कई आंदोलन किये गये हैं। 22 मई का राष्ट्रव्यापी विरोध, 3 जुलाई का
प्रतिरोध-दिवस, 9 अगस्त ;भारत बचाओ दिवस के रूप मेंद्ध, 23 सितंबर
राष्टीय विरोध दिवस आदि संघर्षों के आयोजन किये गये। केंद्रीय श्रम संघों
के हर अभियानों में भागीदारी बढ़ती गई। प्रतिरोध बढ़ रहे हैं। इस अवधि में
कोयला, बीपीसीएल, स्कीम वर्कर्स की हड़ताल की कार्रवाई आयोजित की
गई। रक्षा क्षेत्र में अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान समझौता प्रक्रिया
के क्रम में स्थगित किया गया है। ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के बीच
कार्रवाई की एकता विकसित हो रही है जो स्वागत योग्य दिशा है।
2 अक्तूबर को वेबिनार पर आयोजित केंद्रीय श्रम संघों के राष्ट्रीय
कन्वेंशन में 26 नवम्बर 2020 को एक दिवसीय राष्ट्रीय आम हड़ताल
की घोषणा की व्यापक सफलता का कार्यक्रम सामने है। हमें एटक के
शताब्दी वर्ष के अवसर पर ट्रेड यूनियनों की एकता और मजदूर, किसान
तथा आम जनता के साथ संघर्षों एवं कार्रवाईयों में एकजुटता का जमीनी
स्तर पर विस्तार का लक्ष्य पूरा करने के लिए संकल्प के साथ आसन्न
अभूतपूर्व चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम सांगठनिक शक्ति के रूप
में मजदूर वर्ग की एकता का निर्माण का लक्ष्य पूरा करना है।
हमें न्याय और समानता पर आधारित शोषणविहीन समाज के निर्माण
के संर्धष को आगे बढ़ाते हुए एटक के स्थापना के समय घोषित लक्ष्य की
पूर्ति हेतु मजदूर आंदोलन के इतिहास एवं एटक के 100 वर्षों के अनुभवों
से शिक्षा लेते हुए इस लक्ष्य की प्राप्ति की ओर आगे बढ़ने का संकल्प लेना
है।
दुनिया के मेहनतकशों एक हों
न्याय और समानता पर आधारित शोषणविहीन समाज निर्माण हेतु
मज़दूर वर्ग, किसान, छात्र, युवा-बेरोजगार एवं बु(जीवियों की
एकता जिंदाबाद।

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