Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उसके सहयोगी संगठन धर्म जागरण मंच ने इन दिनों देश में धर्म परिवर्तन कराए जाने का एक अभियान छेड़ रखा है। कहीं मुस्लिम तो कहीं ईसाई समुदाय से संबंध रखने वाले गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को बीपीएल कार्ड बनावाए जाने अथवा नकद पैसे देकर उनका धर्म परिवर्तन कराए जाने की मुहिम को यह ‘घर वापसी’ का नाम दे रहे हैं। घर वापसी के इन योजनाकारों द्वारा यह बताया जा रहा है कि चूंकि हज़ारों वर्ष पूर्व भारत में रहने वाले मुसलमानों व ईसाईयों के पूर्वजों  द्वारा हिंदू धर्म त्यागकर इस्लाम व ईसाई धर्म स्वीकार किया गया था। लिहाज़ा अब इनके वंशजों की अपने ही मूल धर्म अर्थात् हिंदू धर्म में वापसी होनी चाहिए।  प्रोपेगंडा के तौर पर इन्होंने देश में कई स्थानों पर हवन आदि कर कुछ ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जिनके बारे में यह प्रचारित किया गया कि यह ‘घर वापसी’ के कार्यक्रम थे जिनमें सैकड़ों मुस्लिम परिवारों के सदस्यों ने पुन: हिंदू धर्म अपनाया। हालांकि बाद में इस कार्यक्रम में कथित रूप से ‘घर वापसी’ करने वाले कई लोगों द्वारा यह भी बताया गया कि उन्हें किस प्रकार नकद धनराशि का लालच देकर व उनके बीपीएल के पीले कार्ड बनवाने का भरोसा दिलाकर उन्हें हिंदू बनने तथा हवन में बैठने के लिए तैयार किया गया। हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजेंडों को राजनैतिक जामा पहनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद इस प्रकार की और भी कई सांप्रदायिकतापूर्ण विवादित बातें सुनाई दे रही हैं। परंतु धर्म परिवर्तन अथवा उनके शब्दों में ‘घर वापसी’ जैसे मुद्दे ने भारतीय मुसलमानों व ईसाईयों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि धर्मनिरपेक्ष संविधान पर संचालित होने वाली देश की सत्ता का चेहरा क्या अब धर्मनिरपेक्षता से अलग हटकर हिंदुत्ववादी होने जा रहा है? या फिर इस तरह की बातें प्रचारित करने के पीछे केवल यही मकसद है कि ऐसे विवादित बयान देकर तथा सांप्रदायिकता का वातावरण कायम रखकर देश के हिंदू मतों का ध्रुवीकरण कर सत्ता में स्थायी रूप से बने रहने के उपाय सुनिश्चित किए जा सकें?

घर वापसी के नायकों द्वारा कहा जा रहा है कि छठी शताब्दी के बाद भारत में आक्रमणकारी मुगल शासकों द्वारा बड़े पैमाने पर भय फैलाकर धर्म परिवर्तन कराया गया। यदि इनकी बातों को सही मान भी लिया जाए तो भी क्या हज़ारों वर्ष पूर्व आज के मुसलमानों के पूर्वजों द्वारा जो धर्म परिवर्तन किया गया था आज उनके वंशज अपने पूर्वजों के फैसलों का पश्चाताप करते हुए पुन: हिंदू धर्म में वापस जाने की कल्पना कर सकते हैं? इस विषय को और आसानी से समझने के लिए हमें वर्तमान सांसारिक जीवन के कुछ उदाहरणों से रूबरू होना पड़ेगा। मिसाल के तौर पर यदि किसी गांव का कोई व्यक्ति शहर में जाकर किसी कारोबार या नौकरी के माध्यम से अपना जीवकोपार्जन करता है और वह शहर में ही रहकर अपने बच्चो  की परवरिश,उसकी पढ़ाई-लिखाई करता है तथा उसे शहरी संस्कार देता है तो क्या भविष्य में उस शहर में परवरिश पाने वाले उसके बच्चो अपने पिता के स्थाई निवास यानी उसके गांव से कोई लगाव रखेंगे? ज़ाहिर है आज देश में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए गांवों से शहरों की ओर आए और वहीं बस गए। परिवार का वह बुज़ुर्ग भले ही अपने अंतिम समय में अपने गांव वापस क्यों न चला जाए परंतु उसकी अगली पीढ़ी शहर में ही रहकर अपना जीवन बसर करना मुनासिब समझती है। सिर्फ इसलिए कि उसके संस्कार शहरी हैं। इसी प्रकार जो भारतीय लोग विदेशों में जा बसते हैं और वहीं उनके बच्चो पैदा होते हैं वे बच्चो भारत में आकर रहना व बसना कतई पसंद नहीं करते। क्योंकि उनके संस्कार विदेशी हैं। एक विवाहित महिला अपने विवाह पूर्व के संस्कार नहीं छोडऩा चाहती क्योंकि उसका पालन-पोषण युवावस्था तक उसके अपने मायके में हुआ होता है। उसे वहीं के संस्कार अच्छे लगते हैं। इसी प्रकार गांव के बुज़ुर्गों को कभी-कभार किसी कारणवश शहर आना पड़े तो उन्हें शहर की तेज़रफ्तार  जि़ंदगी,यहां का शोर-शराबा,प्रदूषण,अफरा-तफरी का माहौल यह सब रास नहीं आता। क्योंकि उनके संस्कार गांव के शांतिपूर्ण,प्रदूषणमुक्त व परस्पर सहयोग व सद्भाव के हैं।

सवाल यह है कि जब बीस-पच्चीस  और सौ साल के संस्कारों को और वह भी सांसारिक जीवन के संस्कारों को आप बदल नहीं सकते फिर आज सैकड़ों और हज़ारों वर्ष पूर्व विरासत में मिले धार्मिक संस्कारों को कैसे बदला जा सकता है? और वह भी ऐसे धार्मिक संस्कार जिनकी घुट्टी प्रत्येक धर्म के माता-पिता द्वारा अपने बच्चो को पैदा होते ही पिलानी शुरु कर दी जाती हो? शहर में रहने वाले किसी जीन्सधारी युवक से यदि आप कहें कि वह अपने दादा की तरह लुंगी या धोती पहनने लगे तो क्या वह युवक उस लिबास को धारण कर सकेगा? कतई नहीं। क्या आज बच्चो को स्लेट व तख्ती  पर पुन: पढ़ाया जा सकता है? हरगिज़ नहीं। कहने का तात्पर्य यह कि समाज का कोई भी वर्ग पीछे मुड़कर न तो देखना पसंद करता है और न ही इसकी कोई ज़रूरत है। फिर आखिर  घर वापसी के नाम पर धर्म परिवर्तन कराए जाने के पाखंड का मकसद यदि सत्ता पर नियंत्रण नहीं तो और क्या है? इसी घर वापसी से जुड़ा एक और सवाल घर वापसी के इन योजनाकारों से यह भी है कि आखिर इसकी सीमाएं निर्धारित करने का अधिकार किसको किसने दिया? क्या सिर्फ मुसलमानों और ईसाईयों की ही घर वापसी से हिंदू धर्म का उत्थान हो जाएगा? आखिर सिख धर्म भी तो हिंदू धर्म की ही एक शाखा  है। सिखों के पहले गुरु नानक देव जी के पिता कालू राम जी भी तो हिंदू ही थे? फिर आखिर सिखों की घर वापसी कराए जाने का साहस क्यों नहीं किया जाता? महात्मा बुद्ध भी हिंदू परिवार में जन्मे थे। आज उनके करोड़ों अनुयायी बौद्ध धर्म का अनुसरण करते दिखाई दे रहे हैं। कई देशों में बौद्ध धर्म के लोग बहुसंख्या  में हैं। क्या यह सांस्कृतिक राष्ट्रवादी उनकी घरवापसी के भी प्रयास कभी करेंगे? चलिए यह बातें तो फिर भी सैकड़ों साल पुरानी हो चुकी हैं। परंतु अभी कुछ ही दशक पूर्व संघ के मुख्यालय नागपुर के ही एक विशाल पार्क में बाबासाहब डा0 भीमराव अंबेडकर के लाखों समर्थकों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया गया था। क्या उनकी घर वापसी भी कराई जाएगी? और एक सवाल यह भी कि क्या सिख धर्म की उत्पत्ति,बौद्ध धर्म का अस्तित्व में आना, देश के लाखों दलितों द्वारा बौद्ध धर्म में शामिल होना इस सब के पीछे भी क्या किसी आक्रांता मु$गल शासक की तलवार का योगदान था? क्या इन लोगों ने भी भयवश या लालचवश इन गैर हिंदू धर्मों का दामन थामा था?

कुल मिलाकर घर वापसी के नाम पर छेड़ी गई यह मुहिम महज़ एक प्रोपेगंडा रूपी राजनैतिक मुहिम है जो हिंदू धर्म के सीधे-सादे व शरीफ लोगों के बीच में स्वयं को हिंदू धर्म का शुभचिंतक जताने व चेताने के लिए छेड़ी गई है। कभी इन्हें पांच व दस बच्चो  पैदा कर हिंदू धर्म को बचाने जैसी भावनात्मक अपील कर इन को जागृत करने के नाम पर स्वयं को हिंदू धर्म का हितैषी दिखाने का प्रयास किया जाता है तो कभी मुसलमानों के चार पत्नियां व चालीस बच्चो होने जैसे झूठी अफवाहें फैलाकर हिंदू धर्म के लोगों में अपनी पैठ मज़बूत की जाती है। आश्यर्च की बात तो यह है कि हिंदुत्व का दंभ भरने वाले इन्हीं तथाकथित हिंदुत्ववादी नेताओं में ऐसे कई नेता मिलेंगे जिनके बेटों व बेटियों ने मुस्लिम परिवारों में शादियां रचा रखी हैं। गोया व्यक्तिगत रूप से तो यह अपना पारिवारिक वातावरण सौहाद्र्रपूर्ण रखना चाहते हैं जबकि मात्र हिंदू वोट बैंक की खातिर समाज को धर्म के आधार पर विभाजित करने में लगे रहते हैं। अन्यथा यदि इनका मिशन घर वापसी वास्तव में हिंदू धर्म के कल्याण अथवा हिंदू हितों के लिए उठाया गया कदम होता तो इन्हें अपने इस मिशन की शुरुआत गऱीब मुसलमानों अथवा ईसाईयों को पैसों की लालच देकर या उनके पीले कार्ड बनवाने की बात करके नहीं बल्कि सबसे पहले इन्हें अपनी पार्टी के केंद्रीय मंत्रियों नजमा हेपतुल्ला,मुख़्तार  अब्बास नकवी तथा शाहनवाज़ हुसैन जैसे पार्टी नेता की तथाकथित ‘घर वापसी’ कराकर करनी चाहिए न कि गरीबों के बीच अपना पाखंडपूर्ण ‘घर वापसी’ का दुष्प्रचार करके? देश के लोगों को ऐसे दुष्प्रचारों से सचेत रहने की ज़रूरत है। देश का तथा देश के सभी धर्मों व समुदाय के लोगों का कल्याण तथा राष्ट्र की प्रगति इसी में निहित है कि सभी देशवासी मिलजुल कर रहें,एक-दूसरे के धर्मों व उनकी धार्मिक भावनाओं तथा उनके धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करें। घर वापसी जैसे ढोंग तथा नाटक से किसी को भयभीत होने या घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह मुहिम हकीकत से कोसों दूर है। और इस मुहिम को महज़ एक फसाना अथवा राजनीति से परिपूर्ण स्क्रिप्ट ही समझा जाना चाहिए।

-तनवीर जाफरी

 

कोल्हापुर के साबरमल इलाके में 16 फरवरी, सोमवार की सुबह भाकपा महाराष्ट्र के पूर्व राज्य सचिव, केन्द्रीय कन्ट्रोल कमीशन के सचिव और राष्ट्रीय परिषद सदस्य
इस हमले का महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में जोरदार विरोध हुआ और समाज के सभी तबकों से आने वाले जाने माने लोगों एवं बुद्धिजीवियों ने इस हमले की निंदा की। समाज ghoshna patra1के प्रबुद्ध लोगों ने इसे प्रगतिशील विचारों पर हमला बताते हुए इसकी ना केवल कड़े शब्दों में निन्दा की बल्कि महाराष्ट्र और देश में स्वतंत्र, प्रगतिशील और जन समर्थक विचारों वाले लोगों पर बढ़ रही हमले की इन घटनाओं को महाराष्ट्र और देश के लिए एक खतरे की घण्टी बताया।
बुद्धिजीवियों ने इस घटना में सरकार की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठाते हुए धर्मान्ध एवं सांप्रदायिक शक्तियों के बढ़ते हुए आतंक को रेखांकित किया और इस घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त की। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना था कि जिन शक्तियों ने नरेन्द्र दाभोलकर जैसे तर्कशील विचारक के विचारों को खत्म करने की कोशिश की, इस हमले के पीछे भी उन्ही शक्तियों का हाथ है। इसे पूरे सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली घटना बताते हुए अनेक प्रबुद्धजनों ने कहा कि गोविंद पानसरे अंधश्रद्धा उन्मूलन, सामाजिक न्याय और जनपक्षीय सवालों के लिए और सांप्रदायिकता के खिलाफ आजीवन लड़ने वाले व्यक्ति हैं और वर्तमान दौर में ऐसे संघर्षशील व्यक्ति पर हमले का अर्थ जनपक्षीय संघर्ष और जनवादी एवं धर्मनिरपेक्ष परंपरा पर हमला है। हाॅल ही में पानसरे जन विरोधी टोल टैक्स के खिलाफ अभियान चला रहे थे जिसके लिए उन्हे कईं बार धमकियाँ भी मिली थीं। इसके अलावा दो दिन पहले ही पानसरे ने एक कार्यक्रम में गांधी के हत्यारे गोड्से और उनका समर्थन करने वाले लोगों की कड़े शब्दों में निन्दा की थी। कार्यक्रम के बाद एक टीवी चैनल को दिये गए साक्षात्कार में उन्होंने पुरजोर शब्दों में प्रतिक्रियावादी आतंक की निन्दा करते हुए कहा था कि जो लोग तर्क का जवाब तर्क से नहीं दे सकते हैं वे ही तर्क का जवाब गोली से देते हैं और अंत में वे भी ऐसे ही किसी उन्मादी द्वारा चलाई गई गोली का शिकार हो गए। इसके अतिरिक्त पानसरे हेमंत करकरे की हत्या पर उनके द्वारा किए गए कुछ खुलासों को लेकर भी दक्षिणपंथियों के निशाने पर थे। राज्य सरकार इस पूरी घटना को केवल उनके टोल टैक्स अभियान से जोड़कर दुनिया के सामने पेश कर रही है। परंतु उसी राज्य में राज ठाकरे ने टोल टैक्स के खिलाफ अभियान चलाया और उत्तर प्रदेश में राकेश टिकैत और कई अन्य राज्यों में विभिन्न लोग ऐसे आंदोलनों की अगुवाई कर चुके हैं लेकिन उन पर कोई ऐसे हमले नहीं हुए। दरअसल यह उन दक्षिणपंथी आतंकवादियों की करतूत है जिनका सच हेमंत करकरे ने उजागर किया था और जिन्होंने दाभोलकर की हत्या की और अभी तक आजाद घूम रहे हैं।
कामरेड गोविंद पानसरे के द्वारा दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ चलाए जा रहे अथक अभियानों के कारण ही वे हमेशा प्रतिक्रियावादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। इन घोर दक्षिणपंथी ताकतों और कारपोरेट लूट के बीच व्यावसायिक गठजोड़ भी जगजाहिर है और इस हमले को देखते हुए दोनों के बीच साजिशपूर्ण गठजोड़ से भी इंकार नही किया जा सकता है। इस हमले की विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं ने कड़ी निन्दा की है। एनसीपी के नेता शरद पवार ने हमले पर नाराजगी जाहिर करते हुए हमलावरों को तुरंत पकड़ने की माँग की। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चैहान ने इसे दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा धर्मनिरपेक्षता और जनवाद पर हमला बताया। इस घटना के बाद महाराष्ट्र और देशभर में प्रगतिशील लोगों में गुस्सा फूट पड़ा और हमले के विरोध में जगह जगह पर प्रदर्शन हुए।
इस हमले के विरोध में स्वतःस्फूर्त तरीके से पूरा कोल्हापुर शहर बंद हो गया हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आई। 16 फरवरी को कामरेड पानसरे पर हुए हमले के विरोध से फूटे आक्रोश और प्रतिरोध आंदोलनों के साथ ही हिंदुत्ववादी संगठनों पर रोक की मांग से पूरी महाराष्ट्र सरकार हिल उठी है। 16 फरवरी को जहाँ कोल्हापुर बंद हो गया और लोग सड़कों पर उतर आए और लोगों ने गृहमंत्री का घेराव किया तो वहीं 17 फरवरी को भी इस हमले के विरोध में पूरा शहर विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए मानो सड़क पर उतर गया था। लडेंगे-जीतेंगे का नारा लिखे कामरेड गोविंद पानसरे की तस्वीर हाथों में लिए हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे लोगों से नगर का सारा जन जीवन ही मानो अस्त व्यस्त हो गया था। इसी प्रकार के प्रदर्शन महाराष्ट्र और देश के अन्य नगरों में भी हुए। मुम्बई में कम से कम तीन स्थानों पर वाम जनवादी दलों और जन संगठनों से जुड़े हुए लोगों ने सड़कों को जाम किया और भाजपा और संघी सरकार के विरोध में नारेबाजी की।
औरंगाबाद
औरंगाबाद में पैठण गेट पर प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन के बाद जिलाधिकारी कार्यालय पर मोर्चा निकाला गया। इस प्रदर्शन में भाकपा के राज्य सचिव भालचंद्र कांगो, राम बाहेती, बुद्धिनाथ बराल, माकपा के पंडित मुंडे, सीटू के उद्धव भवलकर, भारिपा-बहुजन महासंघ के अविनाश डोलस, एड.बी.एच. गायकवाड, एड. रमेश भाई खंडागले, पंडितराव तुपे, पैंथर्स रिपब्लिकन पार्टी के नेता गंगाधर गाडे, आप के साथी सुभाष लोमटे, एड. नरेंद्र कापड़िया, उमाकांत राठौड, अभय टाकसाल, मधुकर खिल्लारे, विनोद फरकाडे., अशफाक सलामी, जयश्री गायकवाड़ समेत सैकड़ों कार्यकर्ता शामिल थे।
पुणे
कम्युनिस्ट पार्टी नेता गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी पर हुए हमले के खिलाफ विभिन्न संगठनों ने जिलाधिकारी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। इसके बाद एक प्रतिनिधि मंडल ने जिलाधिकारी सौरभ राव को ज्ञापन सौंपा।
फड़णवीस सरकार मुर्दाबाद, हम सब पानसरे, अपराधियों का सर्मथन करने वाली पुलिस हाय-हाय, जैसे नारों के साथ कार्यकर्ताओं ने पानसरे पर हमले का विरोध जताया। इस दौरान अजीत अभयंकर, सुनिति सुर, प्रा. म. ना. कांबले, अनूप अवस्थी, विठ्ठल सातव, अलका जोशी, किरण मोघे, मुक्ता मनोहर, विद्या बाल, किशोर ढमाले, मनीषा गुप्ते, संतोष म्हस्के, तृप्ति देसाई आदि मौजूद थे। अभ्यंकर ने बताया कि 19 फरवरी को शाम 5 बजे मंडई से रैली निकालकर हमले का विरोध किया जाएगा। इस वक्त गोविंद पानसरे की ‘शिवाजी कोण होता‘ पुस्तक की स्क्रीनिंग भी की जाएगी।
गोविंद पानसरे पर हुए हमले के विरोध में पूरे महाराष्ट्र में लोगों में गुस्सा फूट पड़ा है और वे सड़कों पर उतर आए सोलापुर, औरंगाबाद, नान्देड़, बीड़, पुणे, नागपुर, अहमदनगर, मुम्बई, नासिक शहर और देहात के अलावा महाराष्ट्र का कोई भी जिला ऐसा नहीं था जहाँ पर इस हमले का प्रतिकार नहीं किया गया हो। कामरेड गोविंद पानसरे पर हमले के विरोध में पूरा कोल्हापुर शहर मानो ठप्प ही हो गया था। शहर में जब महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री पानसरे और उनकी पत्नी उमा पानसरे का हालचाल लेने पहँुचे तो हमले के कारण गुस्साए हजारों लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इसके अलावा केरल से लेकर जम्मू कश्मीर तक देश के विभिन्न राज्यों में अनेक जन संगठनों ने बयानों द्वारा अथवा सड़क पर उतरकर इस हमले की तीव्र निन्दा की। दिल्ली
गोविन्द पानसरे पर हुए जानलेवा हमले के खिलाफ पूरे देश में एआईएसएफ द्वारा प्रतिरोध जारी है। इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार का पुतला फूँककर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ने प्रतिरोध में एक कड़ी जोड़ी। इसके अलावा एआईएसएफ, एआईवायएफ और भाकपा सहित कई अन्य वाम संगठनों ने दिल्ली के महाराष्ट्र सदन पर प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व विश्वजीत कुमार, अमित कुमार, संजीव कुमार राणा, अमीक जमई एवं आनन्द शर्मा ने किया।
पानसरे की मृत्यु की खबर प्राप्त होने के बाद फिर से लोगों का आक्रोश फूट पड़ा और दिल्ली से लेकर केरल तक विरोध प्रदर्शनों की मानो झड़ी ही लग गई। एआईएसएफ और एआईवायएफ ने नई दिल्ली के नार्थ ब्लाॅक में गृहमंत्रालय पर प्रदर्शन किया जहाँ से उन्हें गिरफ्तार करके संसद मार्ग थाने भेज दिया गया था।
गोविंद पानसरे व उनकी पत्नी उमा पानसरे पर अज्ञात बंदूकधारियों ने जानलेवा हमला किया। चार दिनों तक जीवन और मृत्यु के बीच जूझते कामरेड गोविंद पानसरे की 20 तारीख को मृत्यु हो गई। हमले के दो दिन बाद जब ऐसा लग रहा था कि पानसरे मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो अचानक आस्तर आधार अस्पताल के डाॅक्टरों ने उन्हें आगे के इलाज के लिए मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाने का फैसला किया। पानसरे को हवाई एम्बुलेंस के द्वारा मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाया गया। पंरतु मुम्बई पहुँचने पर भी उनकी जान नहीं बचाई जा सकी और एक सांप्रदायिक फासिस्ट हमले में जनवाद और धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाला एक अथक योद्धा शहीद हो गया।
-महेश राठी
मोबाइल: 0989153484
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2015 में प्रकाशित

गत 20 फरवरी को,जब कामरेड गोविंद पंसारे की मृत्यु की दुखद खबर आई, तो मुझे ऐसा लगा मानो एक बड़ा स्तंभ ढह गया हो.एक ऐसा स्तंभ जो महाराष्ट्र के सामाजिक आंदोलनों का शक्ति स्त्रोत था। मेरे दिमाग में जो पहला प्रश्न आया वह यह था कि उन्हें किसने मारा होगा और इस तरह के साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति की जान लेने के पीछे क्या कारण हो सकता है। ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पहलेए सुबह की सैर के वक्त उन्हें गोली मार दी गई थी। पंसारे ने जीवनभर हिंदुत्ववादियों और रूढि़वादी सोच के खिलाफ संघर्ष किया। पिछले माह, कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए उन्होंने भाजपा द्वारा गोडसे को राष्ट्रवादी बताकर उसका महिमामंडन किया जाने का मुद्दा उठाया था। पंसारे ने श्रोताओं को याद दिलाया कि गोडसे, आरएसएस का सदस्य था। इस पर श्रोताओं का एक हिस्सा उत्तेजित हो गया।
उन्हें’सनातन संस्था’ नाम के एक संगठन के कोप का शिकार भी होना पड़ा था। पंसारे का कहना था कि यह संस्था हिंदू युवकों को अतिवादी बना रही है। यह वही संगठन है, ठाणे और गोवा में हुए बम धमाकों में जिसकी भूमिका की जांच चल रही है। पंसारे ने खुलकर इस संस्था को चुनौती दी, जिसके बाद संस्था द्वारा उनके खिलाफ मानहानि का दावा भी किया गया।
डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के कुछ माह बाद, पंसारे को एक पत्र के जरिये धमकी दी गई थी। पत्र में लिखा था’तुमचा दाभोलकर करेन’ ;तुम्हारे साथ वही होगा, जो दाभोलकर के साथ हुआ। उन्हें ऐसी कई धमकियां मिलीं परंतु वे उनसे डरे नहीं और उन्होंने मानवाधिकारों और तर्कवाद के समर्थन में अपना अभियान जारी रखा। वे समाज के सांप्रदायिकीकरण के विरूद्ध अनवरत लड़ते रहे। शिवाजी के चरित्र के उनके विश्लेषण के कारण भी पंसारे,अतिवादियों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। जब 15 फरवरी को उन पर हमले की खबर मिली तो मुझे अनायास पिछले साल पुणे में उनके द्वारा शिवाजी पर दिये गये भाषण की याद हो आई। खचाखच भरे हाल में पंसारे ने शिवाजी के जीवन और कार्यों पर अत्यंत विस्तार से और बड़े ही मनोरंजक तरीके से प्रकाश डाला था। श्रोताओं ने उनके भाषण को बहुत रूचि से सुना और उनकी बहुत तारीफ हुई।
शिवाजी की जो छवि वे प्रस्तुत करते थेए वह ‘जानता राजा’ ;सर्वज्ञानी राजा जैसे शिवाजी पर आधारित नाटकों और सांप्रदायिक तत्वों द्वारा शिवाजी के कार्यकलापों की व्याख्या से एकदम अलग थी। सांप्रदायिक तत्व, शिवाजी को एक मुस्लिम.विरोधी राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह कहा जाता है कि अगर शिवाजी न होते तो हिंदुओं का जबरदस्ती खतना कर उन्हें मुसलमान बना दिया जाता। पंसारे ने गहन अनुसंधान कर शिवाजी का असली चरित्र अपनी पुस्तक ‘शिवाजी कौन होता’ में प्रस्तुत की। यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इसके कई संस्करण निकल चुके हैं और यह कई भाषाओं में अनुदित की जा चुकी है। अब तक इसकी लगभग डेढ़ लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। अपने भाषण में पंसारे ने अत्यंत तार्किक तरीके से यह बताया कि किस तरह शिवाजी सभी धर्मों का आदर करते थे, उनके कई अंगरक्षक मुसलमान थे, जिनमें से एक का नाम रूस्तम.ए.जमां था, उनके राजनीतिक सचिव मौलाना हैदर अली थे और शिवाजी की सेना के एक.तिहाई सिपाही मुसलमान थे। शिवाजी के तोपखाने के मुखिया का नाम था इब्राहिम खान। उनके सेना के कई बड़े अधिकारी मुसलमान थे जिन्हें आज भी महाराष्ट्र में बडे़ प्रेम और सम्मान के साथ याद किया जाता है।
एक साम्यवादी द्वारा एक सामंती शासक की प्रशंसा! यह विरोधाभास क्यों, इस प्रश्न का उत्तर अपने भाषण में उन्होंने जो बातें कहीं, उससे स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि शिवाजी अपनी रैयत की बेहतरी के प्रति बहुत चिंतित रहते थे। उन्होंने किसानों और कामगारों पर करों का बोझ कम किया था। पंसारे जोर देकर कहते थे कि शिवाजी, महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे। वे बताते थे कि किस प्रकार शिवाजी ने कल्याण के मुस्लिम राजा की बहू को सम्मानपूर्वक वापस भिजवा दिया था। कल्याण के राजा को हराने के बादए शिवाजी के सैनिक लूट के माल के साथ राजा की बहू को भी अगवा कर ले आये थे। यह किस्सा महाराष्ट्र में बहुत लोकप्रिय है। परंतु हिंदुत्व चिंतक सावरकर, कल्याण के राजा की बहू को सम्मानपूर्वक उसके घर वापस भेजने के लिए शिवाजी की आलोचना करते हैं। सावरकर का कहना था कि उस मुस्लिम महिला को मुक्त कर शिवाजी ने मुस्लिम राजाओं द्वारा हिंदू महिलाओं के अपमान का बदला लेने का मौका खो दिया था!
पंसारे स्वयं यह स्वीकार करते थे कि शिवाजी की उनकी जीवनी ने उनके विचारों को आम लोगों तक पहुंचाने में बहुत मदद की। वे बहुत साधारण परिवार में जन्मे थे और उन्होंने अपना जीवन अखबार बेचने से शुरू किया था। शिवाजी पर उनकी अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक के अलावाए उन्होंने ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण’,छत्रपति शाहू महाराज, संविधान का अनुच्छेद 370 और मंडल आयोग जैसे विषयों पर भी लेखन किया था। इससे यह साफ है कि उनका अल्पसंख्यकों के अधिकारो,जातिवाद आदि जैसे मुद्दों से भी गहरा जुड़ाव था। वे जनांदोलनों से भी जुड़े थे और कोल्हापुर में टोल टैक्स के मुद्दे पर चल रहे आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका थी।
कामरेड पंसारे ने स्वयं को मार्क्स और लेनिन की विचारधारा की व्याख्या तक सीमित नहीं रखा। यद्यपि वे प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट थे परंतु शिवाजी, शाहू महाराज और जोतिराव फुले भी उनके विचारधारात्मक पथप्रदर्शक थे। वे यह मानते थे कि शाहू महाराज और फुले ने समाज में समानता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वे स्वयं भी जातिवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करते थे और इन विषयों पर अपने प्रबुद्ध विचार लोगों के सामने रखते थे। एक तरह से उन्होंने भारतीय वामपंथियों की एक बहुत बड़ी कमी की पूर्ति करने की कोशिश की। प्रश्न यह है कि साम्यवादी आंदोलन ने जातिगत मुद्दों पर क्या रूख अपनाया ? पंसारे जैसे कम्युनिस्टों ने जाति के मुद्दे पर फोकस किया और दलित.ओबीसी वर्गों के प्रतीकों.जिनमें शाहू महाराज, जोतिराव फुले व आंबेडकर शामिल हैं.से स्वयं को जोड़ा। परंतु दुर्भाग्यवश,वामपंथी आंदोलन ने इन मुद्दों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। भारत जैसे जातिवाद से ग्रस्त समाज में कोई भी सामाजिक आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसमें जाति के कारक को समुचित महत्व न दिया जाए। उनके जीवन से हम यह सीख सकते हैं कि भारत में सामाजिक परिवर्तनकामियों को अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाने चाहिए।
पंसारे पर हुए हमले ने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की याद फिर से ताजा कर दी है। दक्षिणपंथी ताकतें अपने एजेंडे को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उनकी हिम्मत बहुत बढ़ चुकी है। दाभोलकर और पंसारे असाधारण सामाजिक कार्यकर्ता थे। दोनों तर्कवादी थे, अंधविश्वासों के विरोधी थे और जमीन पर काम करते थे। दोनों पर हमला मोटरसाईकिल पर सवार बंदूकधारियों ने तब किया जब वे सुबह की सैर कर रहे थे। दोनों को उनकी हत्या के पहले सनातन संस्था और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों की ओर से धमकियां मिलीं थीं।
कामरेड पंसारे की हत्या के बाद पूरे महाराष्ट्र में गुस्से की एक लहर दौड़ गई। राज्य में अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए। ये विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रतीक थे कि आमजन उन्हें अपना साथी और हितरक्षक मानते थे। क्या हमारे देश के सामाजिक आंदोलनों के कर्ताधर्ताए कामरेड पंसारे के अभियान को आगे ले जायेंगे? यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-राम पुनियानी

असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान
मैं अपने इस व्याख्यान की शुरूआत, अपने अभिन्न मित्र डाॅ. अस़गर अली इंजीनियर को श्रद्धांजलि देकर करना चाहूंगा, जिनके साथ लगभग दो दशक तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला। डाॅ. इंजीनियर एक बेमिसाल अध्येता-कार्यकर्ता थे। वे एक ऐसे मानवीय समाज के निर्माण के स्वप्न के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, जो विविधता के मूल्यों का आदर और अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करे।
इस संदर्भ में वे उन चंद लोगों में से थे जिन्हें सबसे पहले यह एहसास हुआ कि सांप्रदायिकता की विघटनकारी राजनीति, देश और समाज के लिए कितनी घातक है। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के कारकों के अध्ययन और विष्लेषण की परंपरा शुरू की। वे हर सांप्रदायिक दंगे का अत्यंत गंभीरता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया करते थे। बोहरा समाज, जिससे वे थे, में सुधार लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस्लाम की शिक्षाओं की उनकी व्याख्या के लिए उन्हें दुनियाभर में जाना जाता है। अगर हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो शान्ति, सद्भाव, सहिष्णुता और करूणा पर आधारित हो, तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
राष्ट्र के रूप में हम आज कहां खड़े हैं? भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?
आमचुनाव में मोदी की जीत कई कारणों से हुई। उन्हें भारतीय उद्योग जगत का पूर्ण समर्थन मिला, लाखों की संख्या में आरएसएस के जुनूनी कार्यकर्ताओं ने उनके चुनाव अभियान को मजबूती दी, कार्पोरेट द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उनका महिमामंडन किया और ‘‘गुजरात के विकास के माॅडल’’ को एक आदर्श के रूप मे प्रचारित किया। समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत किया गया और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव व अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के जरिये, कांग्रेस की साख मिट्टी में मिला दी गई। इस आंदोलन का अंत, आप के गठन के साथ हुआ।
मोदी का ‘अच्छे दिन‘ लाने का वायदा हवा हो गया है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आने के बावजूद, भारत में महंगाई बढ़ती जा रही है। लोगों के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना मुष्किल होता जा रहा है। मोदी ने वायदा किया था कि विदेशों में जमा कालाधन, छः माह के भीतर वापस लाया जायेगा और हम सब अपने बैंक खातों में 15-15 लाख रूपये जमा देखकर चकित हो जायेंगे। यह वायदा भुला दिया गया है। जहां तक सुशासन का सवाल है, मोदी की दृष्टि में शायद उसका अर्थ अपने हाथों में सत्ता केंद्रित करना है। केबिनेट प्रणाली की जगह, देश  पर एक व्यक्ति का एकाधिकारी शासन कायम हो गया है। भारत सरकार के सचिवों कोे निर्देश दिया गया है कि वे सीधे प्रधानमंत्री के संपर्क में रहें। मंत्रियों की तो मानो कोई अहमियत ही नहीं रह गई है।
स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना कठिन होता जा रहा है। ‘ग्रीन पीस’ सरकार की इस नीति का प्रमुख शिकार बनी है। पिछली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याण योजनाओं को एक-एक कर बंद किया जा रहा है। वे कुबेरपति, जिन्होंने मोदी के चुनाव अभियान को प्रायोजित किया था, अपने खजाने भरने में जुटे हुए हैं। पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को परे रखकर, उन्हें देश का अंधाधुंध औद्योगिकरण करने की खुली छूट दे दी गई है। नये प्रधानमंत्री को न भूतो न भविष्यति नेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उनके चारों ओर एक आभामंडल का निर्माण करने की कोशिश हो रही है।
इन सब नीतियों और कार्यक्रमों से सबसे अधिक नुकसान समाज के कमजोर वर्गों को उठाना पड़ रहा है। ‘श्रम कानूनों मंे सुधार’ के नाम पर श्रमिकों को जो भी थोड़ी-बहुत सुरक्षा प्राप्त थी, उससे भी उन्हें वंचित करने की तैयारी हो रही है। उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण करना आसान बना दिया गया है। किसानों से येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। गरीबों के लिए चल रही समाज कल्याण योजनाओं व भोजन और स्वास्थ्य के अधिकार को खत्म करने की तैयारी है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का सिलसिला जारी है। एक केंदीय  मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं को हरामजादे बता दिया। एक अन्य भगवाधारी भाजपा नेता, नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बता रहे हैं और हिंदू महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। हिंदुत्ववादी, महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का महिमामंडन कर रहे हैं। वे हमेशा से गोडसे के प्रशसक थे परंतु नई सरकार आने के बाद से उनकी हिम्मत बढ़ गई है। क्रिसमस पर ‘सुशासन दिवस’ मनाने की घोषणा कर इस त्योहार के महत्व को कम करने की कोशिश की गई। ऐसी मांग की जा रही है कि हिंदू धर्मगं्रथ गीता को देश की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये। चर्चों और मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं। अनेक नेता बिना किसी संकोच या डर के चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम सब हिंदू हैं और भारत, एक हिंदू राष्ट्र है।
इस सबके बीच नरेन्द्र मोदी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। शायद इसलिए क्योंकि जो कुछ हो रहा है, वह भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस के एजेन्डे का हिस्सा है। संघ का मूल लक्ष्य देश को संकीर्ण हिन्दू राष्ट्रवाद की ओर ले जाना है। हिन्दू राष्ट्रवाद, मुस्लिम अतिवाद और ईसाई कट्टरवाद से मिलती-जुलती अवधारणा है। इस संदर्भ में यह याद रखना समीचीन होगा कि भारत में ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ की धाराओं का जन्म, भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। सन् 1888 में सामंतों और राजाओं-नवाबों ने मिलकर युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में मध्यम वर्ग और उच्च जातियों का श्रेष्ठि तबका भी इस संगठन से जुड़ गया। इसी संगठन के गर्भ से उत्पन्न हुए मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा, जो अपने-अपने धर्म का झंडा उठाए हुए थे।
हिन्दू महासभा के सावरकर ने सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना प्रस्तुत की और सन् 1925 में गठित आरएसएस ने इसे अपना लक्ष्य बना लिया। उसने लोगों के दिमागों में यह जहर भरना शुरू किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले ईसाई और मुसलमान विदेशी हैं। यह विचार महात्मा गांधी, भगतसिंह व डाॅ. अम्बेडकर की समावेशी राष्ट्रवाद की अवधारणा के धुर विपरीत था।
हमें यह याद रखना चाहिए कि साम्प्रदायिक संगठनों ने स्वाधीनता संग्राम से सुरक्षित दूरी बनाए रखी और जब देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्षरत था तब ये संगठन देश में घृणा फैलाकर दंगे करवाने में जुटे हुए थे। साम्प्रदायिक हिंसा की आग शनैः-शनैः तेज होती गई और इसके कारण राष्ट्र के रूप में हमें भारी नुकसान झेलना पड़ा।  साम्प्रदायिकता के दानव ने ही देश का विभाजन करवाया और नई सीमा के दोनों ओर के करोड़ों लोगों को घोर पीड़ा और संत्रास के दौर से गुजरना पड़ा।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों की उनकी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने में साम्प्रदायिक संगठनों ने काफी मदद की। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक संगठन शामिल थे। आरएसएस की विचारधारा में रचे-बसे उसके प्रचारक नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। यह व्यापक भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद का पहला बड़ा आक्रमण था।
जहां एक ओर आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम को नजरअंदाज किया वहीं दूसरी ओर उसने अपने स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्रवाद की संकीर्ण विचारधारा की घुट्टी पिलाई। इन स्वयंसेवकों ने समय के साथ पुलिस, नौकरशाही और राज्यतंत्र के अन्य हिस्सों में घुसपैठ कर ली। आरएसएस ने अपने अनुषांगिक संगठनों का एक बहुत बड़ा ढांचा खड़ा किया। इनमें शामिल हैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विष्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल। संघ के स्वयंसेवकों के परिवारों की महिलाओं ने राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन बनाया।
आरएसएस लगातार ‘पहचान’ से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। ‘गौरक्षा‘ और ‘मुसलमानों के भारतीयकरण‘ के अभियानों के जरिए अल्पसंख्यकों को आतंकित किया जाता रहा है और व्यापक समाज में यह संदेश पहुंचाया जाता रहा है कि मुसलमान, भारतीय नहीं हैं और देश के प्रति उनकी वफादारी संदिग्ध है।
सन् 1980 का दशक आते-आते हिन्दुत्व ब्रिगेड के मुंहजुबानी प्रचार, मीडिया के एक हिस्से के उससे जुड़ाव और इतिहास की स्कूली पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन के नतीजे में समाज के बहुत बड़े तबके में मुसलमानों के प्रति संदेह और घृणा का भाव उत्पन्न हो गया। हिन्दुत्ववादी ताकतों ने ही बहुत बेशर्मी से बाबरी मस्जिद को ढहाया। उसके पहले, आडवानी ने रथ यात्रा निकाली, जो अपने पीछे खून की लकीर छोड़ती गई।
इसके बाद साम्प्रदायिक हिंसा में और बढ़ोत्तरी हुई। हिन्दू ‘पहचान‘ को देश की एकमात्र वैध पहचान घोषित कर दिया गया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण इतना बढ़ गया कि 1992-93 में मुंबई, सूरत और भोपाल में भयावह खूनखराबा हुआ। गुजरात में सन् 2002 में हुई साम्प्रदायिक विभीषिका के बारे में तो हम सब जानते ही हैं।
सन् 1980 के दशक का अंत आते-आते साम्प्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों के अलावा ईसाईयों को भी अपने निशाने पर ले लिया। यह कहा जाने लगा कि वे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। आदिवासी इलाकों में हिंसा भड़क उठी और इसके नतीजे में सन् 1999 में पाॅस्टर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला दिया गया। सन् 2008 में कंधमाल में अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
यह सब उस सोच का नतीजा था, जिसे संघ चिंतक एम. एस. गोलवलकर ने आकार दिया था। उनका दावा था कि भारत हमेश से हिन्दू राष्ट्र है व धार्मिक अल्पसंख्यकों को यहां या तो बहुसंख्यकों की दया पर जीना होगा और या फिर उन्हें नागरिक के तौर पर उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।
सन् 2014 में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई। इसके पहले, सन् 1998 में वह सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी। उस समय भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं था इसलिए वह अपना एजेन्डा खुलकर लागू नहीं कर सकी। परंतु फिर भी उसने सफलतापूर्वक स्कूली पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और पुरोहिताई व ज्योतिष जैसे अवैज्ञानिक विषयों को कालेजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करवाया। उसने हवा का रूख भांपने के लिए संविधान का पुनरावलोकन करने के लिए एक समिति का गठन भी किया।
अब, जबकि भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है, वह बिना किसी लागलपेट के अपना एजेन्डा लागू कर रही है। लगभग सारे राष्ट्रीय संस्थानों में साम्प्रदायिक सोच वाले लोगोें का कब्जा हो गया है। प्रोफेसर के. सुदर्शन राव, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, का कहना है कि जाति व्यवस्था से देश बहुत लाभान्वित हुआ है। वे महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता में भी विष्वास करते हैं। यह अलग बात है कि इतिहासविदों की जमात में राव को बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। नई सरकार संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन दे रही है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद किया जा रहा है कि संस्कृत कभी आमजनों की भाषा नहीं रही है।
हमारा संविधान सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन दे। इसके ठीक उलट, सरकार विज्ञान में रूढि़वादी और अतार्किक परिकल्पनाओं को ठूंस रही है। हमें अब बताया जा रहा है कि प्राचीन भारत में 200 फीट लंबे विमान थे और प्लास्टिक सर्जरी होती थी। इस महिमामंडन का उद्धेष्यशायद यह साबित करना है कि भारत, हजारों साल पहले विज्ञान के क्षेत्र में इतना उन्नत था जितना कि आज भी विष्व के विकसित देश नहीं हैं। निःसंदेह, भारत के चरक, सुश्रुत और आर्यभट्ट जैसे प्राचीन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कीं थीं परंतु यह मानना मूर्खता होगी कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, आज के विज्ञान से भी अधिक विकसित था। यह, दरअसल, भारतीयों में श्रेष्ठता का दंभ भरने का बचकाना प्रयास है।
किसी भी प्रजातंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अपने हिन्दुत्ववादी एजेन्डे के तहत, भाजपा सरकार संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष‘ व ‘समाजवादी‘ शब्दों को हटाने की कवायद कर रही है। उसे अल्पसंख्यकों की आशंकाओं और चिंताओं की तनिक भी परवाह नहीं है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्य गंभीर खतरे में हैं। हम आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जब भारतीय संविधान के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है।
हम अगर अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। हमें इस खतरे का मुकाबला करने के लिए कई कदम उठाने होंगे। हमें दलितों, महिलाओं, श्रमिकों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हकों के लिए लड़ना होगा। हमें अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समान विचारों वाले संगठनों के साथ गठबंधन कर, एक मंच पर आना होगा। प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों में एकता, समय की मांग है। हमें हाथों में हाथ डाल, एक साथ आगे बढ़ना होगा। गैर-सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का गठबंधन बनाकर, सांप्रदायिक शक्तियों को अलग-थलग करना होगा।
हिंदू राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति, फासीवादी और धार्मिक कट्टरपंथी शासन व्यवस्था का मिलजुला स्वरूप है। इस तरह के सन में प्रजातांत्रिक स्वतंत्रताएं सिकुड़ती जाती हैं। इसकी शुरूआत भी हो गई है। कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और कुछ नई पुस्तकें, जिनमें दीनानाथ बत्रा की किताबें शामिल हैं, को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
अब समय आ गया है कि हम सोशल, प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अपने लिए जगह बनायें। हमें विविधता, बहुवाद और उदारवादी मूल्यों को प्रोत्साहन देना है। ये ही हमें मानवीय, प्रजातांत्रिक समाज का निर्माण करने में मदद करेंगे।
-राम पुनियानी

एक गुजराती (गाँधी) ने देश को आज़ादी दिलवाई ,दूसरे गुजराती (मोदी) ने पुनः देश को गुलामी की तरफ धक्का देने की शुरूआत कर दी –

पढ़िए कैसे————-
अमेरिकी सीक्रेट सर्विस को ओबामा के प्रवास के मद्देनज़र निम्नाकित जो सुविधाए दी जा रही है इसे देख कर मुझे अपने आपको आजाद देश का भारतीय कहने में शर्म आ रही है !1) 24 और 25 जनवरी से कोई भी भारतीय सेन्ट्रल दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकेगा ,यहाँ के चप्पे चप्पे पर अमेरिकी सुरक्षा गार्ड ही रहेंगे!
2) 24 जनवरी से सेन्ट्रल दिल्ली की हर सरकारी ईमारत को बंद रखा जायेगा इन सभी सरकारी इमारतों में अमेरिकी सुरक्षा अधिकारी और स्नाइपर्स तैनात रहेंगे ,मतलब हमारे देश के सरकारी नौकरों की भी अब कोई इज्ज़त नहीं रखा केंद्र सरकार ने!

3) 24 जनवरी से ही इंडिया गेट ,रफ़ी मार्ग ,जनपथ के सभी रास्तों को आम जनता के लिए बंद कर दिया जायेगा ,इन मार्गों पर विदेशी अमरीकीयों का कब्ज़ा होगा !

4) वायुमार्ग भी प्रभावित रहेंगे ,भारतीय थल के साथ इन तीन दिनों तक अमेरिकियो का कब्ज़ा भारतीय आकाश पर भी रहेगा जिससे की अगर ओबामा को आपातकालीन स्थिति में भागना पड़े तो अमेरिकी वायुसेना को कोई दिक्कत ना हो
5)प्रस्तावित आगरा यात्रा को ध्यान में रखते हुए इस मार्ग पर रुकने खाने पीने के सभी होटल ढाबे बंद करवा दिए जायेंगे !

यानी की हम लोग अपने ही देश में इन तीन दिनों तक मोदी की मेहरबानी से अमरीकियों के गुलाम रहेंगे,
अब आप थोडा जेहन पर जोर डालिए अब मोदी जी अमेरिका गए थे तो क्या वहां अमेरिका में भी ऐसा स्वागत और सुरक्षा का इन्तेजाम उनके लिए किया गया …..

1) मोदी को एरपोर्ट पर लेने ओबामा तो दूर की बात कोई बड़ा अमेरिकी नेता या अफसर तक नहीं आया….

2) मोदी की गाड़ी एयरपोर्ट से होटल तक बाकी आम अमेरिकी लोगो की गाडियों के बीच ट्राफिक में चल रही थी….

तो भगतों एक बार और ताली बजाओ ….- यह फेसबुक साभार –
29 सितंबर २०११को जेएफके एयरपोर्ट पर करीब 2 बजे एयर इंडिया की फ्लाइट उड़ान भरने के लिए तैयार थी। उत्तेजित सुरक्षाकर्मियों ने क्रू को प्लेन का दरवाजा खोलने के लिए मजबूर कर दिया और बताया कि वे एक यात्री की तलाशी लेना चाहते हैं। उन्होंने जब प्लेन के भीतर कहा कि वे कलाम की तलाशी लेना चाहते हैं तो एयर इंडिया के अधिकारियों ने विरोध किया और बताया कि वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं। इसके बाद उन्होंने थोड़ी नरमी दिखाई, लेकिन कलाम के जूते और जैकेट लेकर चले गए।
देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।

आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
शाहरुख खान को अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर रोके रखने पर एसएम कृष्णा ने आज कहा कि किसी भी हस्ती को रोके रखना, और बाद में माफी मांग लेने को अमेरिका ने आदत बना लिया है।
इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित।
वे आए तो हमने सिर पे बैठाला हम गए तो लतियाया ……
वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारियों के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

जम्मू.कश्मीर में हाल ;दिसंबर 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट जनादेश प्राप्त नहीं हुआ है। जहां पीडीपी अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, वहीं भाजपा, मतों का खासा हिस्सा प्राप्त कर, दूसरे स्थान पर रही। यह दिलचस्प है कि भाजपा को अधिकांश सीटें और मत, राज्य के हिंदू.बहुल जम्मू क्षेत्र से प्राप्त हुए। दोनों अन्य पार्टियां.नेशनल कान्फ्रेन्स व कांग्रेस.दुविधा में हैं। वे यह तय नहीं कर पा रही हैं कि वे सरकार बनाने के लिए किसे समर्थन दें।
भाजपाए संघ परिवार की सदस्य है और संघ परिवार का अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है। मोदी सरकार के पिछले छः महीनों के कार्यकाल में यह और साफ हो गया है कि हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए भाजपा और उसके साथी संगठन किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इन दिनों वे समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने में जोरशोर से जुटे हुए हैं। भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ वक्तव्यों ;गीता को राष्ट्रीय पुस्तक बनाया जाये, जो राम के पुत्र नहीं हैं वे हरामजादे हैंए गोडसे राष्ट्रवादी था, आक्रामक घरवापसी अभियानए ष्पीकेष् फिल्म का इस आधार पर विरोध कि वह लव जिहाद को प्रोत्साहन देती है आदि से यह स्पष्ट है कि भाजपा का पितृसंगठन आरएसएसए हिंदू राष्ट्र के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध है और भारतीय संविधान के मूल्य व धार्मिक अल्पसंख्यक, उसके निशाने पर हैं। इस पृष्ठभूमि में यह आंकलन आवश्यक हो गया है कि यदि भाजपा कश्मीर की सरकार का हिस्सा बनती है तो उसके कश्मीर व कश्मीरियों के लिए क्या निहितार्थ होंगे?
इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि हम कश्मीर के उथलपुथल भरे इतिहास पर एक नजर डालें। विभाजन के समय कश्मीर के महाराजा ने यह निर्णय लिया कि वे स्वतंत्र रहेंगे और पंडित प्रेमनाथ डोगरा जैसे “प्रजा परिषद” ;भारतीय जनसंघ का पूर्ववर्ती संगठन” नेताओं ने कश्मीर के भारत में विलय का इस आधार पर विरोध किया कि चूंकि कश्मीर के शासक एक हिंदू ;राजा हरिसिंह हैं इसलिए उसे धर्मनिरपेक्ष भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों ने हमला कर दिया और भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद कश्मीर के राजा ने भारत के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 अस्तित्व में आया।
अनुच्छेद 370 के अंतर्गतए कश्मीर को एक विशेष दर्जा दिया गया और रक्षाए संचार,मुद्रा व विदेशी मामलों को छोड़कर,अन्य सभी मसलों में उसे पूर्ण स्वायत्तता दी गई। आरएसएस,कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने का विरोधी था। हिंदू महासभा के एक नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारत और कश्मीर के बीच हस्ताक्षरित संधि का विरोध किया और यह मांग की कि कश्मीर का भारत में तुरंत पूर्ण विलय किया जाना चाहिए। उसी दौरान, भारत ने सांप्रदायिकता का घिनौना चेहरा देखा जब आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक और हिंदू महासभा के सक्रिय कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। इस बीच आरएसएस व हिंदू महासभा, अनुच्छेद 370 के विरूद्ध आक्रामक अभियान चलाते रहे। इस सब से कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला विचलित हो गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहना शुरू कर दिया कि कश्मीर ने भारत का हिस्सा बनकर शायद गलती की है। इस निर्णय का आधार, भारत का धर्मनिरपेक्ष चरित्र था और महात्मा गांधी की हत्या व आरएसएस के आक्रामक अभियान से अब्दुल्ला को ऐसा लगने लगा कि भारत में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का क्षरण हो रहा है। उन्होंने जब यह बात बार.बार कही तो उन्हें राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इससे कश्मीरियों के मन में भारत के प्रति अलगाव का भाव उभरा। आरएसएस अपना अभियान चलाता रहा और उसके दबाव के कारणए शनैः शनैः,कश्मीर की स्वायत्ता को कमजोर किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था कश्मीर के प्रधानमंत्री पद को मुख्यमंत्री व सदर.ए.रियासत को राज्यपाल का नाम दिया जाना।
कश्मीरियों में बढ़ते अलगाव की भावना का पाकिस्तान ने पूरा लाभ उठाया और अमरीका की सहायता से क्षेत्र में उग्रवाद को बढ़ावा व समर्थन देना शुरू कर दिया। सन् 1980 के दशक में,अल्कायदा के लड़ाकों ने कश्मीर में घुसपैठ कर ली और इसके साथ ही वहां के उग्रवाद ने सांप्रदायिक मोड़ ले लिया। मकबूल भट्ट को फांसी दिये जाने से हालात और खराब हो गये। कश्मीरी पंडित स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे और राज्य के हिंदुत्ववादी राज्यपाल जगमोहन की प्रेरणा व प्रोत्साहन से वे बड़ी संख्या में घाटी छोड़कर जाने लगे। इस मुद्दे का आरएसएस ने जमकर इस्तेमाल किया और इसे सांप्रदायिक रंग दे दिया। सच यह है कि कश्मीरियत वेदांत, बौद्ध धर्म और सूफी इस्लाम की मिलीजुली संस्कृति है। शेख अब्दुल्ला ने राज्य में व्यापक भू.सुधार किये थे और वे कश्मीर के समाज को प्रजातांत्रिक बनाने के प्रति प्रतिबद्ध थे।
लंबे समय तक चले उग्रवाद और भारतीय सेना की घाटी में उपस्थिति ने कश्मीरियों के घावों को और गहरा किया है। एक समय था जब आरएसएस यह मांग करता था कि जम्मू को एक अलग राज्य बना दिया जाए, लद्दाख को केन्द्रशासित प्रदेश घोषित कर दिया जाए और घाटी में से एक हिस्से को अलग कर उसे केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा देकर कश्मीरी पंडितों के लिए आरक्षित कर दिया जाए। ये बातें भाजपा भी कहती आई है लेकिन केवल तभी तक जब वह सत्ता में नहीं थी। परंतु इस तरह की मांगए पार्टी की साम्प्रदायिक विचारधारा की पोल खोलती है। इस चुनाव में भी भाजपा ने हिन्दू जम्मू विरूद्ध मुस्लिम घाटी का नारा देकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया और उसके जरिए चुनाव में लाभ प्राप्त किया। यह साफ है कि भाजपा को चुनाव में सफलताए समाज को विभाजित कर मिली है। अमरनाथ यात्रा के मुद्दे का इस्तेमाल भी कश्मीरी समाज को ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया। अपनी अवसरवादिता का बेहतरीन नमूना पेश करते हुए मोदी एण्ड कंपनी ने चुनाव प्रचार के दौरान अनुच्छेद 370 के बारे में गोलमोल बातें कहीं। जबकि इस मामले में उनका रूख स्पष्ट है।
कश्मीर में भाजपा को जनसमर्थन हासिल होना कश्मीरियत के लिए एक बड़ा झटका है। इससे अनुच्छेद 370 को रद्द करने के आक्रामक अभियान और हिन्दू राष्ट्र के एजेन्डे को गति मिलेगी। जिन भी अन्य राज्यों में भाजपा ने अन्य दलों के साथ मिलकर सरकारें बनाई हैं वहां का अनुभव यह रहा है कि पार्टी शुरू में तो एक सांझा कार्यक्रम के आधार पर सरकार बना लेती है परंतु बाद में धीरे.धीरे अपने सहयोगियों को कमजोर करती जाती है और अंततः सत्ता पर पूरा कब्जा कर लेती है। कश्मीर को आज जरूरत एक प्रतिनिधि सरकार की है जो संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान करे और हिन्दू.मुस्लिम एकता को बढ़ावा दे.एक ऐसी सरकार की, जो कश्मीर के इतिहास की बेशकीमती विरासत, कश्मीरियत, को जिन्दा रखे।
कश्मीर आज एक दोराहे पर खड़ा है। उग्रवादियों की हरकतों और सेना की ज्यादतियों के चलते घाटी के लोगों ने बहुत कुछ सहा है। अगर भाजपा कश्मीर में सत्ता में आती है तो राज्य में हालात और बिगड़ेंगे। राज्य की अगली सरकार को कश्मीरी पंडितों और कश्मीर के युवाओं की समस्याओं पर ध्यान देना होगा। उसे विकास का ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिससे युवाओं को रोजगार मिले, पंडितों की शिकायतें दूर होंए राज्य में शांति रहे और पर्यटक व वापस आएं। राज्य में साम्प्रदायिकता के बढ़ते ज्वार को नियंत्रित करना अति आवश्यक है। यदि राज्य में विभिन्न समुदायों में एकता और सद्भाव रहेगा तो अलगाववाद व उग्रवाद अपने आप समाप्त हो जाएंगे। इसके लिए यह जरूरी होगा कि नई सरकार समावेशी राजनीति करे न कि विघटनकारी और विभाजनकारी एजेन्डे को इस धरती के स्वर्ग पर लादे।
-राम पुनियानी

आखिर ये तन खाक मिलेगा

हाथ में कूँड़ी बगल में सोटा, चारो दिसा जागीरी में.
आखिर ये तन खाक मिलेगा, कहां फिरत मगरूरी में ॥
बीएसई सेंसेक्स 854.86 (-3.07%) पॉइंट की गिरावट के साथ 26,987.46 पर बंद हुआ । निफ्टी में भी 251.05 (-3.00%) पॉइंट की गिरावट रही। निफ्टी 8,127.35 पर बंद हुआ। बाजार की इस बड़ी गिरावट ने छोटे, बड़े सभी निवेशकों में हड़कंप मचा दिया है।
इस बीच 5 सालों में पहली बार तेल का मूल्य 50 डॉलर से नीचे पहुंच गया है । करीब 6 महीनों से तेल की कीमत में गिरावट का सिलसिला जारी है इससे आर्थिक मंदी के संकट का डर सताने लगा है। तेल की कीमतों में गिरावट के कारण न सिर्फ एनर्जी स्टॉकों बल्कि समूचे स्टॉक मार्केट में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है।दुनिया भर के बाजारों में अफरातफरी मची है-सार्वजनिक क्षेत्र को बेच कर उद्योगपतियों के हाथों को मजबूत करने के लिए वर्तमान केंद्र सरकार पूरी तरीके से प्रयासरत है . बीमा, बैंक रेल, डाक , स्टील के कारखानों सहित जहाँ भी सरकार के पास अपना कुछ है उसको हर संभव तरीके से किसी न किसी उद्योगपति को देने की तैयारियों  पर युद्ध स्तर पर काम चल रहा है . कुछ वर्षों पूर्व यूरोप से लेकर अमेरिका तक आर्थिक मंदी का शिकार हुए थे उस समय भारत में सार्वजानिक क्षेत्र की वजह से आर्थिक मंदी का असर मामूली ही आया था लेकिन इस बार कॉर्पोरेट सेक्टर की प्रिय सरकार इन क्षेत्रों के अतिरिक्त किसानो की या जनता के पास जामीन नाम की जो चीज है उसको छीनने के लिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया जा चूका है और उद्योगपतियों के काले धन से देश के निवासियों के पास जो जमीनें मकान, दुकान है उसको छीनने के एक कानूनी तरीका भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के माध्यम से किया जाना शुरू हो गया है. जनता से यह कहा जायेगा कि आपकी जमीन और मकान के ऊपर अदानी साहब रेशमी रुमाल का कारखाना लगाने वाले हैं इसलिए यह रुपया लो . मकान व जमीन छोड़ दो अन्यथा पुलिस और पी एस सी की बन्दूखें कानून व्यवस्था के नाम पर तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का वध कर देंगी .
                नागपुर मुख्यालय एक धार्मिक राष्ट्र बनाने का नारा देकर सम्पूर्ण नागरिकों को यह सिखाना चाहता है कि  “आखिर ये तन खाक मिलेगा, कहां फिरत मगरूरी में ” यही  उसका हिन्दुवत्व है . उद्योगपतियों के गुलाम बनाने के लिए नागपुर मुख्यालय प्रयत्नशील रहा है और इसके लिए वह घ्रणा – द्वेष का व्यापार कर रहा है .

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 1,001 other followers