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शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र  कम्युनिस्ट  कवि  गीतकार थे ------------दिनेश शंकर शैलेन्द्र

शैलेन्द्र कम्युनिस्ट कवि गीतकार थे ————दिनेश शंकर शैलेन्द्र

साहिर लुधियानवी -आओ कोई ख्वाब बुनें

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कांति मोहन सोज़ -लाल है परचम,नीचे हंसिया

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अज़ीमुल्ला खान ------1857का राष्ट्र गीत

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सूर्य कान्त त्रिपाठी 'निराला' -अमीरों की हवेली

सूर्य कान्त त्रिपाठी ‘निराला’ -अमीरों की हवेली

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 इंजीनियर अली का साक्षात्कार करते हुए
पाकिस्तान के कराची स्तिथ शहर के बाशिंदे तथा आइडियल कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलॉजी के प्राचार्य श्री इंजिनियर अली बाराबंकी आये हुए हैं . उनसे एक साक्षात्कार पाकिस्तान के सन्दर्भ में लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने लिया जो इस प्रकार है :
प्रश्न : पाकिस्तानी आवाम भारत के सम्बन्ध में क्या सोचती है ? 
उत्तर : पाकिस्तान में असल में दो तबके हैं एक वह तबका जो 1947 के बाद विभाजन का दर्द लेकर गया था और दूसरा तबका वहां पहले से रह रहे लोगों का है . दोनों तबकों की राय अलग अलग है. भारत से गए लोगों की एक राय यह है कि दोनों मुल्कों की सरहदें एक हों, “सिंध-गंगा का मिलन हो ” क्योंकि वह भारत को भी अपना मुल्क समझते हैं.खानदानो का बंटवारा हो गया है. आधा खानदान एक तरफ है आधा दूसरी तरफ यह अस्वाभाविक है कि दरिया और समंदर का मिलन न हो . मै पाकिस्तान में पैदा हुआ 60 वर्षों के बाद अब अपने पुरखों के वतन को देखने का मौका मिला.
                   अब जब मै चला जाऊंगा तो फिर तड़पता रह जाऊंगा. अपने पुरखों के वतन को देखने के लिए. हम लोग शादी-ब्याह, ख़ुशी-गम , बीमारी-अजारी में शिरकत नहीं कर पाते हैं और एक दुसरे को देखने के लिए तड़पते रह जाते हैं . जहाँ तक हमारी तरह के अवाम की जातीय राय है कि भारत की अवाम बहुत मिलनसार, बहुत मोहब्बत करने वाले लोग, भाईचारे के जज्बे से लबरेज लोग हैं एक बात समझ में नहीं आती कि दोनों हुकूमतें आपस में एख्तिलाब क्यों रखती हैं ? दोनों मुल्कों के अवाम के दिल एक साथ धड़कते हैं. इसमें मजहब का कोई अमल दखल नहीं, लेकिन इनके जज्बात को हुकूमतें नहीं समझती. वहां पुराने मुकामी लोगों की राय है की भारत बहुत अच्छा मुल्क है यहाँ कानून की बालादस्ती है, भाईचारा है, मोहब्बत है, उनकी राय मेरी राय से अलग नहीं है. मेरी इस मुल्क के बारे मे इसलिए राय है कि मेरे तमाम रिश्तेदार इस मुल्क में बसते हैं और वह भारत के तमाम हालात से अगाही हासिल होती रहती है और हम लोगों की राय से पुराने बाशिंदे लोग परिचित होते रहते हैं इसके अलावा प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी वह मुतासिर होते हैं. लेकिन कुछ भारतीय फिल्मो को देखने के बाद वहां लोग समझते हैं कि भारत में गुंडाराज है हालाँकि ऐसा नहीं है.
               पाकिस्तान के बाशिंदों को यह कहानी समझाई गयी है कि कश्मीर उनका है इसलिए कश्मीर उनको मिलना चाहिए किन्तु कश्मीर के सम्बन्ध में एक तबके की राय है कश्मीर अगर पाकिस्तान में होता तो वह अपनी बदहाली को रोता जैसे कुछ वर्षों पूर्व पूर्वी पाकिस्तान की हो गयी थी और जिन्हें पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश होना पड़ा था.
प्रश्न 2 : पाकिस्तान में अवाम के लोग सामान्यता कितनी शादियाँ करते हैं ?
 
उत्तर : सामान्य जन एक शादी करते हैं किन्तु बढेरा ( जमींदार और सरमायादार ) कई शादियाँ करते हैं और शादी के बगैर कई खवातीन रखते हैं.
प्रश्न 3: पाकिस्तान में सामान्यत : कितने बच्चे एक व्यक्ति के होते हैं ?
उत्तर : गुरबत के कारन आम अवाम के ज्यादा बच्चे होते हैं लेकिन मिडिल क्लास में एक बेटा, एक बेटी या एक बेटा दो बेटी होती हैं . उच्च तबके में जैसे बढेरा, वह खानदान में की गयी शादी से एक या दो, तीन बच्चे पैदा करता है अन्य खवातीन से वह शादी तो करता है किन्तु बच्चे पैदा नहीं होने देता है.
प्रश्न 4: मजहब के हिसाब से पाकिस्तान में कितने लोग जीते हैं ?
उत्तर : अख्सरियत शदीद मजहबी जज़्बात तो रखती हैं लेकिन इस्लाम के बारे में कोई जानकारी नहीं रखती है. जो उनके बड़े करते आ रहे हैं वाही यह कर रहे हैं.
प्रश्न 5: इस्लाम अमन. प्यार, इंसानियत का मज़हब है ? लेकिन क्या ऐसा आचरण पाकिस्तान में देखने को मिलता है ?
उत्तर : बिलकुल हकीकत यही है कि इस्लाम अमन, प्यार, इंसानियत का मज़हब है बल्कि यूँ कहा जाए कि हर मज़हब अमन, इंसानियत, प्यार का मजहब है लेकिन पाकिस्तान में मज़हब के ठेकेदार मुल्लाओं की अलग-अलग जंग है यह इनकी जातीय जंग है जो मज़हब की आड में खेली जा रही है. मुल्ला आपस में एक दुसरे को काफिर कहते हैं. जबकि दुनिया का कोई मज़हब के नाम पर इंसानियत के खिलाफ हरगिज़ नहीं जा सकता है. मज़हब के नाम पर मुल्लाओं की ठेकेदारी है. मज़हब के नाम पर मासूम बच्चों का कत्लेआम पेशावर स्कूल में किया गया क्या यही इस्लाम है या यूँ समझिये पाकिस्तानी शायर की जुबान से-
 है जाम के शीशा कोई महफूज़ नहीं है 
पत्थर भी मेरे दौर के अबदाद तलब हैं 
मुल्क के हालात वहां की शायरी में देखिये
अपने असलाफ अपनी झूठी अना के लिए 
नस्ल-ए-आदम में तफरीक करते रहे 
अब गिरोहों में खलक-ए-अल्लाह बंट गई
जाति है कौम है मुल्क है रंग है 
एक आदम की औलाद में जंग है 
एक भाई ऐश में मदहोश है 
दुसरे भाई पर ज़िन्दगी तंग है 
एक भाई सर से लहू है रंग 
दुसरे भाई के हाथ में संग है 
ऐसे भी गम चेहरे पर लिखे हुए 
डॉ ज़फर आलम, इंजिनियर अली और रणधीर सिंह सुमन
 

 लोकसंघर्ष पत्रिका के सितंबर 2015 अंक में प्रकाश्य

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