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Archive for जून 8th, 2009

सुधियों की अमराई में ,
है शांत तृषित अभिलाषा।
कतिपय अतृप्त इच्छाएं
व्याकुल पाने को भाषा॥

मेरा यह सागर मंथन,
अमृत का शोध नही है।
सर्वश्व समर्पण है ये
आहों का बोध नही है॥

सुस्मृति आसव से चालक
पड़ता ,जीवन का प्याला।
कालिमा समेट ले मन में,
ज्यों तय आसवृ उजाला

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

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तुम गंध में न बसते हो
तुम रूप में न मिलते हो।
साधना समर्पित मेरी ,
पाषाण न तुम हिलते हो॥

मेरे सपनो की छाया
अब मुझे जलाती रहती ।
कुछ गरल छलक जाता है,
आशा है गाती रहती॥

मानस की स्नेहलता को
सींचा हमने सिसकन से ।
पर वह टूटी मुरझाकर
आडम्बर की चितवन से॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

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