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Archive for जून 9th, 2009


आंसू की इस नगरी में,

दुःख हर क्षण पहरा देता।

साम्राज्य एक है मेरा ,

साँसों से कहला देता॥

मधुमय बसंत पतझड़ है,

मैं जीवन काट रहा हूँ ।

अब अश्रु जलधि में दुःख के,

मैं मोती छांट रहा हूँ॥

आंसू की जलधारा में,

युग तपन मृदुल है शेष ।

माधुरी समाहित होकर,

उज्जवल सत् और विशेष ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह ‘राही’

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पथ कतिपय ललित कलाएं
सम्मोहन से भर देती।
निरश्य शून्य में भटके
छवि व्यथित जीव कर देती॥

अति विकल प्रतीक्षा गति ने
छाया को क्रम दे डाला ।
साँसों के क्रम में भर दी,
सम्पूर्ण जगत की ज्वाला॥

मन के द्वारे तक आकार
हर लहर लौट जाती है।
प्रति सुख की छाया को भी
वह राख बना जाती है॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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चेतनते व्याधि बनी तू
नीख विवेक के तल में।
लेकर अतीत का संबल,
अवसाद घेर ले पल में॥

मेरे मानस की पीडा,
है मधुर स्वरों में गाती।
आंसू में कंचन बनकर
पीड़ा से होड़ लगाती॥

मन की असीम व्याकुलता
कब त्राण पा सकी जग में ।
विश्वाश सुमन कुचले है,
हंस-हंस कर चलते मग में ॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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