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Archive for जून 14th, 2009


मिलकर भी मिल सका जो ,
मन खोज रहा है उसको।
सव विश्व खलित धाराएं
अपना कह दूँ मैं किसको

याचक नयनो का पानी
अवगुण्ठन में मुसकाता
कल्याणरूप , चिरसुंदर
तुम सत्ययही कह जाता॥

पृथ्वी का आँचल भीगा
तरुनीलहर ममता में।
निर्दयता की गाथायें
अम्बरपट की समता में॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेलराही

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जो है अप्राप्य इस जग में ,
वह अभिलाषा है मन की।
मन-मख,विरहाग्नि जलाकर
आहुति दे रहा स्वयं की॥

अपने से स्वयं पराजित ,
होकर भी मैं जीता हूँ ।
अभिशाप समझ कर के भी
मैं स्मृति – मदिरा पीता हूँ ॥

दुर्दिन की घाटी भी अब
विश्वाश भरी लहराए।
उस संधि -पत्र की नौका
कुछ डूबी सी उतराए॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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