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Archive for जून 16th, 2009

चितिमय निखिल चराचर की,

विभूति ,मैंने अपना ली।

अंतस के तल में मैंने

विरहा की ज्योति जला ली॥

जो अग्नि प्रज्ज़वलित कर दी,

वह शांत अश्रु करते है॥

अब आंसू के जीवन में –

हम तिरते ही रहते है।

जीवन से लगन नही है,

इति से भी मिलन नही है ॥

अब कौन लोक है मेरा ?

चिंतन का विषय नही है॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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रजनी के झिलमिल तारे

शशि छवि से आहत होकर।

दुःख भरी कहानी कहते,

नयनो में पानी लाकर॥

वे पंथ भूलते आए,

विस्मृत गंतव्य हमारा ।

उलझी साँसे सुलझाते

बीतेगा जीवन सारा ॥

रागिनी ह्रदय से निकली ,

adro se मृदु गीतांजलि ।

सुस्मृति -धागों में गुंथित ,

भावो की लघु पुष्पांजलि ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही ”

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