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Archive for दिसम्बर 12th, 2009

16 नवम्बर 2009 की बात है। मैं अपने कमरे में पहुंचा, देखा सहारा न्यूज पर रात के 9ः38 बजे दिखाया जा रहा था कि 6 शेरों का एक झुंड भैंस के बच्चे पर टूट पड़ा, पास में नदी थी, जो उस नदी में जा गिरा। नदी में मगर, जिसके बारे में मुहावरा है-नदी में रहकर मगर बैर, वही मगर था जो अपना शिकार देख आगे बढ़ा और जबड़े में दबोच लिया। एक तरफ से शेर भैंस के उस बच्चे को पकड़कर खींच रहे थे, दूसरी तरफ जल का राजा मगर अपने शिकार को अपनी तरफ खींच रहा था। आखिर में हार मगर के हाथ लगा और शिकार झुंड के हाथ यानि शेर नहीं शेरों के हाथ।

दूर पर भैंसों का एक झुंड जो काफी बड़ा था बेबस व लाचार अपने बच्चे को निहार रहा था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह बच्चे को बचाये। बच्चा शेर का मुह का निवाला बनता इससे पहले एक भैंसा हिम्मत कर बैठा और बच्चे को छुड़ाने के लिए शेरों के झुंड पर टूट पड़ा। अकेले भैंसे आगे बढ़ता देख पहले तो कुछ डरी सहमी भैंसें भी आगे बढ़ीं फिर एक-एक कर सारी भैंसें शेरों के झुंड पर टूट पड़ीं। फिर क्या था, पहल करने वाले भैंसे की हिम्मत बढ़ी और उसने एक-एक कर शेरों को अपनी सींग पर एक-एक करके शेरों को उछालता रहा और शेर दुम दबाकर भागते रहे। हिम्मत न हुई किसी एक शेर की भी कि वह लौटकर भैंसे पर झुंड की किसी भैंस पर या फिर अपने शिकार पर पलटकर हमला करता।
देखा तो बहुतों ने होगा, इस दृश्य को टी0वी0 पर। कोई देखकर हंसता रहा होगा और हंसते हुए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया, किसी ने देखा होगा और यह समझा होगा कि यह जंगली जानवरों का खेल है, कोई बुद्धिमान होगा उसने सोचा होगा यही जंगल का कानून है, किसी ने सोचा होगा एकता में बल है। सचमुच एकता में बल है पर उससे आगे एक सोच और विकसित करनी होगी, एकता बनाने के लिए किसी को तो आगे बढ़ना होगा, किसी को तो अपनी जान जोखिम में डालनी होगी और सम्भव है कि अपनी कुर्बानी देनी होगी। जी हां, कुर्बानी! कुर्बानी और वह भी अपनी जान की। अगर आप एकता बनाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं तो एकता बनेगी और जरूर बनेगी और भैंसों की तरह हम कमजोर ही सही सब कमजोर मिलकर एक बड़ी ताकत बनेंगे और अपने बीच के कमजोर से कमजोर को बचाने में उसी तरह से कामयाब होंगे जिस तरह कमजोर भैंसें कामयाब हुईं, अपने कमजोर बच्चे को बचाने में।
कमजोरों, मज़लूमों, दलित, प्रताड़ित, भूख सताये हुओं, धनलोलुपों के शिकार बने, सरकारी तंत्र में पीछे जाने वाले लोगों जागो, उठो और एक होकर अपने अधिकारों को पाने की लड़ाई लड़ों, विजय तुम्हारी होगी और हम होंगें कामयाब एक दिन।

मुहम्मद शुऐब
एडवोकेट

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तेलंगाना को प्रदेश बनाने की बात के बाद पूरे देश में तमाम नए राज्यों को बनाने की बात उठ खड़ी हुई है क्षेत्रिय राजनीति कने वाले लोग छुद्र राज़नितज्ञ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने अपने प्रदेश का विभाजन करना चाहते हैं। प्रदेश विभाजन से उपजे हुए राजनेता मधु कोड़ा ने पूरे प्रदेश का अधिकांश बजट अपने खाते में जमा कर लिया था क्षेत्रिय राजनीति करने वाले नेता गण ख़ुद पूरे प्रदेश के मालिक नही हो सकते हैं तो वह चाहते हैं की प्रदेश का विभाजन करके किसी तरह मुख्यमंत्री हो जायें तो अपने पूरे परिवार के सदस्यों व नाते रिश्तेदारों के साथ प्रदेश का सम्पूर्ण बजट अपने खाते में कर लें। इन लोगों ने विकास, प्रगति शब्दों का नया अर्थ गढ़ डाला है जिसका मतलब है की अपने परिवार का विकास ही प्रदेश की जनता का विकास है । उत्तर प्रदेश में बहुत सारे जनपद व मंडल मुख्यालय बनाये गए हैं, विकास तो नही हुआ। हाँ, अफसरशाही व दलालों व छुद्र राजनेताओं की परिसंपत्तियों में हजारो गुना की वृद्धि हुई है यदि अफसर शाही और राजनेता समयबद्ध तरीके से काम करें तो नए जनपद मुख्यालय, मंडल मुख्यालय तथा प्रदेश विभाजन की आवश्यकता नही रहेगी । सरकार काम काज में बगैर धन दिए कोई भी पत्रावली आगे नही बढती है प्रशासनिक अफसरों ने प्रत्येक कार्य के लिए अपने दरें निश्चित कर रखी है जब तक उसका भुगतान नही होता है तब तक उनके हस्ताक्षर होना असम्भव है। दूर के ढोल सुहावने होते हैं और राजधानी बना देने से विकास नही होता है और नई राजधानी बनते ही दलालों प्रोपर्टी डीलरो, नगर नियोजकों का समूह विकास करने लगता है । वहां के मूल निवासी अपनी संपत्ति को उनके हाथों बेच कर , रिक्शा चलने से लेकर बर्तन माजने तक का कार्य उन्ही दलालों के घर में करना शुरू कर देते हैं । उनके परंपरागत कार्य छीने जाने की वजह से उनके घर की औरतें वैश्यावृत्ति अपनाने को मजबूर हो जाती हैं । प्रदेश विभाजन से कुछ स्वार्थी तत्वों को छोड़कर आम जनता को कोई लाभ नही होता है । आज जब महंगाई अपनी चरम सीमा पर है तब राजनेता अफसरशाही उसका कोई समाधान करने की बजाये प्रदेश विभाजन करवाने की जुगत में लगे हुए हैं। मूल समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए लोर्ड करज़न की नीति अपना कर अपना हित साध रहे है ।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

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