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Archive for फ़रवरी, 2010

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रंगो की होली तो सब खेलते हैं।
खून जिगर भी बहाओं तो जानूँ।।
प्रेम के रंग में मन भी रंग जाए बन्धू।
कोई ऐसी होली मनाओं तो जानूँ।।
दो बदन मिलना केाई जरूरी नहीं।
दिल से दिल को मिलाओं तो जानूँ।।
ठुमरी वो फगुआ तो गाते सभी हैं।
प्रेम का गीत कोई सुनाओ तो जानूँ।।
मुहब्बत बढ़े और मिट जाए नफरत।
कोई रीति ऐसी चला ओ तो जानूँ।।
रूला देना हँसते को है रस्में दुनिया।
रोते हुए की हँसाओ तो जानूँ।।
है आसान गुलशन को वीरान करना।
उजड़े चमन को बसाओ तो जानूँ
अपना चमन प्यारे अपना चमन है।
दिलोजान इस पर लुटाओं तो जानूँ।।
मिट जाए जिससे दिलो का अँधेरा।
कोई शम्मा ऐसी जलाओं तो जानूँ।।
ऐशो इशरत में तो साथ देती है दुनिया।
मुसीबत में भी काम आओ तो जानूँ।।
मुस्कराना तो आता है सबको खुशी में।
अश्कें गम पीके भी मुस्कराओ तो जानूँ।।
अपनों वो गैरों की खुशियों के खातिर।?
जमील अपनी हस्ती मिटाओं तो जानूँ

-मोहम्मद जमील शास्त्री

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। सभी चिट्ठाकार बंधुओं को परिवार सहित होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

सुमन
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सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री कमल नयन काबरा की शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘आम आदमी – बजट और उदारीकरण’ प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित हो रही है जिसकी कीमत 250 रुपये है उसी पुस्तक के कुछ अंश नेट पर प्रकाशित किये जा रहे हैं।

-सुमन

भारत सरकार के सालना बजट के प्रावधान और उनके साथ जुड़ी नीतियाँ प्रत्यक्ष प्रभाव से देश की आबादी में अपेक्षाकृत अल्पांश को प्रभावित कर पाती हैं। इनमें से भी सभी का कुल मिलाकर बजट से भला ही हो, सम्भव नहीं हैं। आज की घड़ी न ही यह सम्भव है कि बजट के लाभों और उसकी लागत का न्यायपूर्ण वितरण हो । प्रगतिशील सार्वजनिक व्यय नीति (अर्थात अपेक्षाकृत निर्बल तबकों पर तुलनात्मक रूप से ज्यादा खर्च हो अपेक्षाकृत सबल लोगों के मुकाबले) की कभी चर्चा तक याद नहीं आती है। प्रगतिशील कर प्रणाली, अर्थात अपेक्षाकृत धनी लोगों के अनुपात से ज्यादा कर-राशि उठाई जाये तथा अपेक्षाकृत कम आय और सम्पत्तिवान तबकों से अनुपात कम, काफी चर्चित रही है। किन्तु मेेरी जानकारी के तहत किसी व्यवस्थित और विश्वस्तरीय अध्ययन ने भारतीय कर प्रणाली को प्रगतिशीलता का रूतवा नहीं दिया है। इन मुद्दो के अलावा किसी भी दीर्घकालीन जनोन्मुखी बजट-विमर्श में एक अन्य मुद्दा काफी ध्यान देने काबिल होता है। बजट में क्या-क्या शामिल हो सकता है, इसकी अनेक सम्भावनाएँ होती हैं। कुछ नुक्तों के शुमार करने का अर्थ है अन्य सम्भावित विकल्पों की अस्वीकृति। इसी साल की बात नहीं, अब तक किसी भी बजट के नामंजूर,नाशुमार तत्वों चलने से जितने बहुलांश भारतीयों को जितनी फौरी और दीर्घकालिन हानि उठानी पड़ी है, वह निस्सन्देह बजट प्रभावों की जद मंे आने वाले लोगों की संख्या और उनके हितार्थो से बेशुमार ज्यादा हैं। भारतीय राष्ट्र-राज्य के शक्ति-सन्तुलन में कोई ऐसा बदलाव नहीं आया है और न ही ऐसे बदलावों की दस्तक सुनाई देने के शुभ संकेत भी हमारी फिजां में हैं कि सन् 2009-10 के बजट से कोई आशा की जा सकती हैं।

किन्तु हमारे परिवेश तथा राष्ट्रीय जीवन में अनेक ऐसे तत्व उभर रहें हैं जो ऐसे बदलाव की बयार के लिए कोई छोटी-बड़ी खिड़की तो खोलें। कम से कम 2007 में जारी विश्व पूँजीवाद के पिछले आठ दशकों के बाद आये संकट को तो हमारे बजटकारों ने भी चीन्हा हैं। कहा जा रहा है धनी पूँजीवादी देशों के कर्तव्यों के कुप्रभाव ’अकारण’ हम पर भी लाद दिए गये है। जिस किस्म के भूमण्डलीकरण का ’स्वेच्छा’ से और डंके की चोट पर उसके गुणगान करते हुए वरण किया गया था, और इस बजट तथा सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण में अब भी उसकी शान में कसीदे पढ़े जा रहें हैं, आज उसी के दुष्प्रभावों से निजात पाने की इस साल के बजट की सबसे बड़ी चुनौती, पहला बड़ा काम माना गया है। इस दुष्प्रभाव की मुख्य पहचान नौ प्रतिशत सालाना आर्थिक उत्पादन से घटकर 6 से 7 प्रतिशत तक आना माना जा रहा है। खासकर इसके असर से भगोड़ी पूँजी का ’अपने पनहि’ करना, यानी खतरे के असर क्षितिज पर आते ही नौ दो ग्यारह हो जाना, निर्यातकों की आय घटना, शेयर कीमतों का औंधे मुँह गिरना, विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी, कल-कारखानोें की उत्पादन बढ़त दर की गिरावट, भारतीय मुद्रा की अस्थिरता, आयात में कमी, माँग में कमी, व्यापक स्तर पर छँटनी, नयी नौकरियों के लाले पड़ने आदि के रूप में मंदी के बहुमुखी कुप्रभावों की चर्चा की गयी है। किन्तु मंदी से निपटने के सारे उपाय कम्पनियों और निर्यातकों के घटतें मुनाफे या सचमुच की हानि को पाटने से सम्बन्धित रहे है।जिनकी देश और विदेश में नौकरियाँ गयी हैं, जिनके परिवारों के मनी आर्डर कम और हल्के हो गये हैं या बन्द हो गये हैं, जिन कारीगरों, लघु उद्यमियों के रोजगार छिन गये हैं या बन्दी की कगार पर है, उनके लिए प्रत्यक्ष रूप से सहायक सरकारी कदमों के स्थान पर मुख्यतः अप्रत्यक्ष प्रयास बड़े उद्यमियों-निर्यातकों आदि के माध्यम से किए गये हैं। जब माँग का टूटा हो, पुरानी मशीनें अप्रयुक्त या अर्द्ध-प्रयुक्त हों, तो मात्र कम ब्याज दर से आकर्षित होकर कौन निवेश करना चाहेगा? वैसे हमारा ग्रहस्थ क्षेत्र, यानी प्रधान रूप से मध्यम आय तबका ही मुख्य बचतकर्ता है और बैंकों का बचत खाता सर्वाधिक प्रचलित बचत का तरीका। इतनी कम ब्याज दर, कि वह उपभोग की कीमतें बढ़त दर की मात्र एक-तिहाइ के लगभग हो, यानी उनका वास्तविक मोल ऋणात्मक हो, कैन नये उद्यम की ओखली में सिर देना चाहेगा? सामान्य स्थिति में भी असमावेशित-लोग सीमान्त स्तर पर होते हैं, मंदी के दौर में तो तिहरी मार के शिकार होते हैं। मंदी की मार, छूटती-घटती नौकरियों का देश और जले पर नमक के समान हैं। सरकारी राहत पैकेज में भी जगह नहीं मिलना।

कमलनयन काबरा
(क्रमश:)

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महायुद्ध

यूरोप में लड़ी गयी दो लड़ाइयों को विश्वयुद्ध संज्ञा दी जाती है- प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध। किंतु ज्यादा सही बात यह है कि दुनियां का प्रथम महायुद्ध सं0 रा0 अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में शुरू किया। यह युद्ध लातिन अमेेरिका कब्जाने के लिये स्पेन से लड़ा गया। स्पेन-अमेरिका युद्ध 1898 हुआ, जिसमें जीर्णशीर्ण स्पेन का राजतंत्र हार गया। फिर तो लातिन अमेरिका में यूरोप का प्रभाव घटता गया और वह धीरे-धीरे पूरी तरह सं0 रा0 अमेरिका के प्रभाव में आ गया। इसने प्रशांत महासागर के हवाई द्वीप पर कब्जा किया और फिलीपींस को भी दबाया। इस तरह पश्चिमी गोलार्द्ध से यूरो को निकाल बाहर कर अमेरिका ने उसे अपना गलियारा बनाया।
लातिन अमेरिकी देशों का शोषण-दोहन करने के लिये उसने एक मनरो सिद्धांत अपनाया, जिसके अंतर्गत वहां यूरोपियन देशों का हस्तक्षेप अवांछित करार दिया गया। सर्वविदित है, यूरोप के दोनों ही विश्वयुद्धों में अमेरिकी नीति मुनाफा कमाने की रही।
अलबत्ता द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत सोवियत यूनियन जब विश्वशक्ति के रूप में उभरा और समाजवादी अर्थव्यवस्था समानांतर विश्वव्यवस्था के रूप में सामने आयी तो अमेरिका के साम्राज्यवादी मंसूबो पर पाबंदी लगी।
सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की 19वीं कांग्रेस में समाजवादी निर्माण की समस्याओं पर प्रस्तुत अपने आलेख में स्तालिन ने स्पष्ट कियाः ’’ अब दुनिया में युद्ध नहीं होगा।’’ इसका कारण बताते हुए स्तालिन ने कहाः ’’सोवियत यूनियन युद्ध नहीं करेगा, क्योंकि वह शांति का पक्षधर है और अमेरिका सोवियत पर हमला करने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि तब उसके सामने उसका अस्तित्व मिट जाने का वास्तविक खतरा उपस्थित होगा। स्तालिन की यह भविष्यवाणी सोवियत यूनियन की अमोध सामरिक ताकत पर आधारित थी। हमने देखा कि जब तक सोवियत यूनियन अस्तित्व में था तब तक सिर्फ शीतयुद्ध चलता रहा, किंतु वास्तविक युद्ध कभी नहीं हुआ।
सोवियत यूनियन के विघटन के बाद ही खाड़ी युद्ध प्रारंभ हुआ और योगोस्लाविया, इराक और अफगानिस्तान में वास्तविक युद्धों का अटूट सिलसिला चल पड़ा। अमेरिकी साम्राज्यवादी मंसूबा इस कदर बढ़ा कि उसने एकधू्रवीय विश्व अर्थव्यवस्था बनाने की एकतरफा घोषणा कर दी। वाशिंगटन कंसेंशन वास्तविक रूप में विश्व अर्थव्यवस्था का अमेरिकीकरण अभियान है। अंधाधुंध सट्टेबाजी के चलते वित्तीय संस्थानों का फेल होना और व्याप्त मौजूदा विश्वमंदी ने इस अभियान पर प्रश्न चिन्ह लगाया है और दुनिया को इसके दुष्परिणामों से सावधान किया है। राष्ट्रपति ओबामा के स्टेट आफ यूनियन को संबोधित ताजा संबोधन में अमेरिकी प्रभुत्व पुर्नस्थापित करने की छटपटाहट झलकती हैं। ओबामा को नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है, पर यह तो उसकी घोषणाओं के महज आश्वासनों पर आधारित पाक मंशा है।ओबामा ने राष्ट्रपति पद संभालने के साथ प्रिज्म कैम्प बंद करने, इसरायल, फिलिस्तीनी वार्ता प्रारंभ करने, अलकायदा आतंक के अलावा क्यूबा के साथ संबंध सुधारनें की इच्छा प्रकट की थीं। ओबामा की इन घोषणाओं से दुनियां के शांतिकामी लोगों में आशा का संचार हुआ था। लगता है, ओबामा यह सब भूलते जा रहे है।
पूँजीवाद युद्ध केा जन्म देता है। गुजरी सदी के सभी युद्ध अतिरिक्त माल का बाजार ढूढ़ने के निमित्त लड़े गयो। वर्तमान वैश्वीकरण माल खपाने और मुनाफा कमाने की साम्राज्यवादी योजना का नाम है। तीसरी दुनिया के नवआजाद देशों ने अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र का निर्माण किया। फलतः साम्रज्यवादी देशों का बाजार सिकुड़ गया। 1980 आते-आते उन देशों में मंदी छा गयी। इस मंदी से निबटने के लिये नव आजाद देशों के स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को तोड़ना जरूरी था। तभी उनके मालों की लिये नया बाजार मिल सकता था। इसके लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक की मार्फत विकासमान देशों पर उदारीकरण और निजीकरण की शर्त थोपी थी। यहां यह भी ध्यातव्य है कि पूँजी और माल के बेरोकटोक मुक्त वैश्विक प्रवाह की वकालत की गयी, वहीं दूसरी तरफ श्रमिकों की आवाजाही पर रोक लगायी गयी। अमेरिका और यूरोपियन देशों में भारतीय श्रमिकों पर हमले हुएं। उन्हें देश निकाला गया। इस तरह विकसित औद्योगिक देशों के हित में पक्षपातपूर्ण साम्राज्यवादी वैश्वीकरण चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप देश के अन्दर और देशों के बीच गरीबी और अमीरी का फासला विस्फोटक सीमा तक फैल गया।
यद्यपि विकसित देशों में व्याप्त मौजूदा मंदी और वित्तीय संकट ने एकध्रुवीय दुनिया बनाने के मसूबे को तोड़ दिया है, फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक-सामरिक ताकत का विश्वव्यापी प्रभुत्व बरकरार है। और यह भी कि यूरोपियन यूनियन, शंघाई कोआपरेशन, ब्रिक वार्ता, (ब्राजील$रशिया$इ्रडिया$चायना) एवं अन्य क्षेत्रीय संगठनों ने दुनिया की बहुध्रुवीय बना दिया है, फिर भी मिलिटरी फैक्ट से बंधा मौजूदा अन्तराष्ट्रीय बाजार और विश्व अर्थ व्यवस्था का वास्तविक नियामक समूह-7 बना हुआ हैं। समूह-7 के देश असमान पक्षपातपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि (एन पी टी) के माध्यम से स्वयं तो परमाणु हथियारो का जखीरा रखते है, किंतु दूसरों को परमाणु विकसित करने के अधिकार से रोकते है। जलवायु परिवर्तन की मसले पर कोपनहेगन सम्मलन में अमेरिका सहित विकसित देशों ने एकतरफा कार्बन उत्सर्जन कम करने की कानूनी बाध्यता से अपने को मुक्त कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ इसने विकासमान देशों के कार्बन उत्सर्जन की मानिटरिंग और नियमन करने का अधिकार प्राप्त कर लिया है। जाहिर है, ऐसे उपायों से अमेरिका को आर्थिक चुनौती देनेवालो की धार कुंद हुई हैं।
ऐसे में पूँजी के वैश्विक आक्रमण से मानवता की हिफाजत की जिम्मेदारी मजदूर वर्ग पर आती है। विश्व पूँजी के बढ़ते आक्रमण को श्रमिकों की एकजुट अंतराष्ट्ीय कार्रवाई लगाम दे सकती है। भारत के प्रमुख केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों ने हाल के दिनों में तात्कालिक महत्व के पाँच मुद्दों पर संयुक्त कार्रवाईयां की है। यह ट्रेड यूनियनों की नयी एकता का सुखद संदेश हैं। 14 सितम्बर का दिल्ली संयुक्त कनवेंशन, 28 अक्टूबर की राष्ट्व्यापी संयुक्त रैलियां और 16 दिसम्बर को संसद के समक्ष विराट धरना ने मजदूर वर्ग में एकता का नया उत्साह पैदा किया है। सभी संकेत बताते हैं कि 5 मार्च को होनेवाला राष्ट्व्यापी सत्याग्रह ऐतिहासिक होगा। उस दिन दस लाख से ज्यादा मजदूर एवं कर्मचारी सत्याग्रह करके अपनी गिरफतारी देंगे। हमें आशा करनी चाहिए कि विश्व साम्राज्यवाद के विरूद्ध यह मजदूर वर्गीय कार्यवाई आगे आनेवाले दिनों में और भी ज्यादा व्यापक होगी।

-सत्य नारायण ठाकुर
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“जेहाद का अभिप्राय इस्लामी आतंकवादी संगठनों द्वारा भारत राष्ट्र के विरूद्ध इस राष्ट्र के नौजवानों को गुमराह कर भारत में आतंकवादी उपायों द्वारा इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना करना है। “

यह कथन उत्तर प्रदेश के एस.टी.ऍफ़ के पुलिस उपाध्यक्ष श्री चिरंजीव नाथ सिन्हा का है। यह कथन उनका व्यक्तिगत नहीं है अपितु उत्तर प्रदेश की सरकार की सोंच का प्रतीक है और इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में विभिन्न वादों की विवेचना की जा रही है । श्री सिन्हा का यह कथन न्यायलय में सशपथ बयान के रूप में दर्ज हुआ है।

सुमन
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बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु पर महात्मा बुद्ध ने जो भी चिंतन किया हो और निर्वाण या मोक्ष का हल तलाश किया हो, वास्तव में अब भी हम को यह सोचना है कि यह अभिशाप है या वरदान? प्रकृति, प्रबंधन के एक बड़े चैखटे में रखकर अगर हम देखें तो कह सकते हैं कि विनाश भी विकास या निर्माण का एक सोपान है। यह एक सतत् प्रक्रिया है।
जार्ज फर्नाडिस पूर्व केन्द्रीय रक्षा मंत्री तथा पूर्व राजग संयोजक इस समय उपरोक्त तीनों से संघर्षरत हैं। जार्ज ने अपने जीवन में बड़े संघर्ष किये हैं, एक समय तक ईमानदार कहे जाने वाले, ताबूत घोटाले के संदर्भ में बहुत बेईमान भी कहे गये, जो भी हो। कहा गया कि इस समय 25 करोड़ की सम्पत्ति के मालिक हैं और 25 वर्ष बाद पत्नी लैला कबीर तथा इकलौते बेटे शान फर्नाडिस उनकी सेवा के लिये आ गये हैं। अल्जाइमर्स से ग्रस्त होने के कारण जार्ज अपनी याददाश्त पूरी तरह से खो चुके हैं। जार्ज के भाई, मित्र और शुभचिंतक जिनमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री अजय सिंह तथा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वेंकट चैलैया भी हैं कहते हैं कि उनके आवास का मुख्य दरवाजा बन्द है, कोई नहीं जानता वह कहां और कैसे हैं पत्नी ने इनका खण्डन किया है।
इस समाचार को देखकर मुझे याद आया कि अनेक वर्षो पूर्व काशीराम की भी यही स्थिति थी जब उनकी माँ, भाईयों से मायावती का विवाद हुआ था तथा बात कोर्ट कचहरी तक पहुंची थी।
जार्ज फर्नाडिस अपनी जवानी में एक बड़े तेज तर्रार नेता थे, लेकिन जीवन के सत्य से कोई मुंह चुरा नहीं सकता, जो आया है वह जायेगा, जो स्वस्थ्य है वह बीमार भी होगा, जो आज जवान है वह कल बूढ़ा भी होगा, फिर अकड़ घमण्ड कब तक? धन बल कब तक साथ रहेगा, अतः विकास हेतु प्रयास अवश्या जारी रखे, साफ सुथरा जीवन व्यतीत करें अगर जवानी की नींद में ज्यादा मस्त न हो तो बुढ़ापे में डरेंगे भी नहीं, ऐसा न करें जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देखकर रोया।

डॉक्टर एस.एम हैदर

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मानव धर्म की सेवा करने वालों के अधर्मी कार्य

मेडिकल कौंसिल आफ इण्डिया द्वारा निर्णय लिया गया है कि अब दवा कम्पनियों द्वारा डाक्टरों को रिश्वत के तौर पर अपनी दवा की सेल प्रमोशन के लिए दिए जाने वाले तोहफों पर रोक लगाई जायेगी।

यह देर से उठाया जाने वाला एक अच्छा कदम है क्योंकि सफेदपोश कहलाए जाने वाले समाज के इस सम्मानित तबके के अंदर व्यवसायिक प्रवृत्ति इस दर्जे तक हो गई थी कि वह अपने धर्म व फर्ज को भूलकर हर समय दवा कम्पनियों के इशारें पर चलने लगा था। दवा कम्पनियों के इशारे पर चलने लगा था। दवा कम्पनियों ने परस्पर पनपती अपनी प्रतिस्पर्धाता के चलते गिरावट के सारे पैमाने तोड़ डाले हैं। डाक्टरों को गिफ्ट देने का सिस्टम तो बहुत पुराना है अब तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए डाक्टरों को उनकी सैर तफरीह व शौक के सभी संसाधन दवा निर्माता मुहैया कराते हैं।
नाम न छापने की शर्त पर एक बड़ी दवा कम्पनी के एक बड़े सेल्स अधिकारी ने बताया कि उनको सेल्स लाइन में ट्रेनिंग देते समय 3 सी फार्मूला बताया जाता है जिसके मुताबिक पहले वह किसी भी डाक्टर को अपनी दवा के बारे में बताकर उसे कन्वेन्स करने का प्रयास करते हैं यदि इस सी के प्रयोग किया जाता है जिसके अंतर्गत डाक्टर को कामर्फिनस किया जाता है, अर्यात उस यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि जो दवा उसके पेन पर इसरा किसी कम्पनी की चढ़ी हुई है उससे यह केमिकल र्फामूले में बेहतर है। र्याद यह दोनों सी के र्फामूले काम न आए तो फिर अन्तिम सी र्फामूले का प्रयोग किया जाता है। उसका अर्थ यह है कि डाक्टर को कमपीलीट बनाना यानि उसे भ्रस्टाचार में लित्त कर देना। अब यह भ्रष्टाचार भी कई प्रकार का होजा है। एक भ्रस्टाचार यह है कि डाक्टर को उसके क्लिीनिक या घर उपयोग के आनेवाली वस्तओं को गिफ्ट में उसे मेंटकर के उससे मनमाफिक सेल करवाना। दूसरा प्रकार भ्रष्टाचार का यह होता है कि डाक्टर को साल में एक या दो बार देश या विदेश के किसी शहर में सपरिवार सैर सपाटा कराने का खर्चा उपलब्ध कराना और एक और भ्रष्टाचार अब दवा कंपनियों ने यह अभी चन्द वर्षो से आजमाना प्रारम्भ किया है कि डाक्टर को जिन्दा मांस का तोहफा दिया जाता है यानि सेक्स गिफ्ट। इसी के चलते दवा कम्पनियों ने अब बड़े पैमाने पर अच्छी मोटी पगार देकर सुन्दर लड़कियों की तैनाती कर ली है ताकि डाक्टरों से मर्जी की सेल इनके माध्यम से निकलवायी जा सके।
समाज के इस सफेदपोश तबके को लोग पृथ्वी पर भगवान का दर्जा देते हैं शायद इसलिए कि जीवन बचाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है परन्तु अपनी डिग्री लेते समय मानवता की सेवा करने की शपथ लेने वाले यह लोग अपनी व्यवसायी प्रवृत्ति व आर्थिक हवस के चलते अपने फर्ज पेशे के धर्म व इंसानियत सभी को भुलाकर केवल दोनों हाथों से धनोपार्जन में जुट जाते हैं।
मेडिकल कौंसिल ने इस ओर कदम बढ़ाकर एक अच्छा काम किया है। सरकार को भी डाक्टरों के रवैये में तबदीली लाने के लिए दवा कम्पनियों पर अपना अंकुश और मजबूत करना चाहिए।

-मोहम्मद तारिक खान

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‘हो सकता यह आन्दोलन सही मकसद के लिए किया जा रहा हो। शायद यही वजह है कि इसे लोगों का भी समर्थन मिल रहा है । यदि ऐसा है तो इसमें समस्या क्या है।’

– माननीय उच्चतम न्यायालय

माननीय उच्चतम न्यायालय ने नक्सल आन्दोलन पर यह टिपण्णी करते हुए कहा कि इस पर सरकारों का रूख ठीक नहीं है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ के गोपाढ गाँव में 10 आदिवासियों की हत्या सुरक्षा बालों द्वारा करने की जनहित याचिका की सुनवाई कर रहे माननीय न्यायमूर्ति बी.सुदर्शन रेड्डी तथा माननीय न्यायमूर्ति सुरेन्द्र सिंह निज्जर की खंडपीठ ने व्यक्त किये।
उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रमुख श्री करमवीर सिंह अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक श्री ब्रजलाल (कानून व्यवस्था ) अपराधियों का कुछ कर नहीं पा रहे हैं। थानों में पुलिस पिटाई से मौते हो रही हैं। वर्तमान में पुलिस की कार्यप्रणाली अपराधी गिरोहों जैसी हो गयी है तो दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां भी व्यापक रूप से की जा रही है। मानव अधिकार कार्यकर्ता इनके गलत कार्यों का विरोध करते हैं इसलिए इनके मुख्य निशाने पर हैं । नक्सली साहित्य को उत्तर प्रदेश सरकार अभी परिभाषित नहीं कर पायी है किन्तु नक्सली साहित्य की बरामदगी के आधार पर आए दिन गिरफ्तारियां हो रही हैं। जिन मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के ऊपर फर्जी देशद्रोह के मुक़दमे कायम किये जा रहे हैं वही जनता की निगाहों में असली देशप्रेमी हैं । भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर, आर्थिक अपराधों के संगठित स्वरूप में दिखने वाले सुसंगठित निकाय क्या वास्तव में देश प्रेमी हैं ?

सुमन
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देश-विदेश में भौतिक विकास तो हुआ, लोग शिक्षित भी हुए, सुख-सुविधायें बढ़ी परन्तु मानवता न जाने कहाँ सो गई, इधर तबड़तोड़ कई हृदय-विदारक घटनायें घट गई, डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की गालिब की यह पंक्ति अब भी फरयाद कर रही है:-
आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना ?
अब घटनाओं पर जरा नजर डलिये-
पुणे में आतंकी हमला-11 मरे, 40 जनवरी-यह हमला कोरे गाँव स्थित जर्मन बेकरी पर हुआ- शक इण्डियन मुजाहिद्दीन पर भी और हेडली पर भी- मेरा यह कहना है कि अत्याचार, जुल्म, हत्याएं किसी की भी हों, कहीं भी हों, किसी ने की हों, इन पर दुख करना चाहिये तथा इनकी अत्याधिक र्भत्सना की जानी चाहिये, परन्तु दुख इस बात का है कि जिम्मेदार वर्ग से जो प्रतिक्रियाएं आनी चाहिए वह नहीं आईं।
दूसरी घटना-झाण ग्राम व लालगढ़ के धर्मपुर में सुरक्षा बलों के तीन शिविरों पर पुलिस कैम्प पर पहले-30 जवान शहीद-पांच दिन बाद फिर-बिहार के जमुई जिले के फुलवारिया गाँव में नक्सलियों ने 12 लोगों को मौत के घाट उतारा-इन घटनाओं में भी इंसान मारे गये, परन्तु प्रतिक्रियाएं सुनने को नहीं मिलीं।
आतंकवादी घटना पर चार दिन बाद यह कहा गया है कि इस धमाके में डेविड हेडली का हाथ होने के सुराग मिले हैं, उसने इससे पूर्व पुणे का दौरा भी किया था। अब पाकिस्तान की भी एक खबर पर गौर करें-पाकिस्तान की एक अदालत ने पांच अमेरिकी मुस्लिमों की अपील खारिज कर दी। इन पांचों पर इण्टरनेट के माध्यम से आतंकियों से सम्पर्क करने और हमलों की साजिश रचने का आरोप है। वर्जीनिया के इन आरोपियों को सरगोधा इलाके से गिरफ्तार किया गया था। आप को याद होगा कि सी0बी0आई0 की एक विशेष टीम अमेरिका इसलिये गई थी कि हेडली से पूछताछ करे परन्तु उसे हेडली से मिलने की इजाजत नहीं दी गई टीम बैरंग वापस आई। बुद्धजीवी इन सब बातों पर समग्र रूप से विचार करें और इस शेर पर राय दें कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि:-

मरगे आशिक पर फ़रिश्ता मौत का बदनाम था।
वह हँसी रोके हुए बैठा था जिसका काम था।

-डा0एस0एम0 हैदर

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अमेरिका के राजनीतिक कलैंडर में राष्ट्पतियों द्वारा स्टेट आँफ यूनियन का संबोधन परंपरागत रूप से बड़े पैमाने पर उत्साह के साथ सुना जाता है। टेलीविजन एवं अन्य माध्यमों से इसका व्यापक प्रचार किया जाता है। इस सम्बोधन में राष्ट्पति अपनी प्राथमिकताएं घोषित करते है। इसमें अन्तराष्ट्रीय मुद्दे प्रधान होते है। इस बार राष्ट्पति बराक ओबामा ने जब 27 जनवरी 2010 को स्टेट्स आँफ यूनियन को संबोधित किया तो वे काफी उत्तेजित दिखें। उन्होने अन्तराष्ट्रीय मुद्दो की चर्चा तक नहीं की। उन्होने अपना जोशीला भाषण घरेलू मुद्दों तक सीमित रखाः
’’मैं अमेरिका के लिये दूसरा स्थान स्वीकार नहीं कर सकता। चाहे जितनी मेहनत करनी पड़ें। चाहे यह जितना भी असुविधाजनक हो, यह समय उन समस्याओं के हल के लियें गंभीर होने का है, जो हमारे विकास में बाधा पैदा करते है।’’
उन्होने भारत, चीन और जर्मनी का नाम लेते हुए कहा कि ये देश किसी का इंतजार किये बगैर आगे बढ़ रहे हैं। इसलिये
अमरिका को भी दूनिया में अपना शिखर स्थान कायम रखने के लिये इंतजार किये बगैर आगे बढ़ना होगा।
ओबामा अपने संबोधन में नौकरियों की आउटसोर्सिग करने वाली अमेरिकी कंपनियों को चेताया कि टैक्सों में की गयी उनकी रियायतें खत्म कर दी जायेंगीं। उन्ही कंपनियों को रियायतें दी जायेंगी जो अमेरिका में ही नौकरियों का सृजन करती हैं।
अमेरिका दुनिया में दूसरा स्थान स्वीकार नहीं कर सकता। अमेरिका दुनिया में अपना शिखर स्थान कायम रखने के लिये कुछ भी कर सकता है। राष्ट्पति बराक ओबामा ने जिस भाव-भंगिमा के साथ भाषण दिया उससे जान फिस्के (1842-1901) की याद एकबार फिर ताजा हो गयी। जान ओजस्वी भाषणकर्ता और तेजस्वी लेखक थे। जिसने अमेरिकी इतिहास में प्रकट नियति (Manitest Destiny) का सिधांत निरूपित किया। उसने कहा संयुक्त राज्य अमेरिका के लिये केवल पश्चिमी गोलार्द्ध में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व में प्रभुत्वपूर्ण नेतृत्व एवं शासन करने की नियति है। फिस्के अपने भाषण के प्रारम्भ में किसी भोज के मौके पर प्रस्तावित किये गये टोस्ट का यह किस्सा सुनाता था-यह टोस्ट संयुक्त राज्य अमेरिका के लिये है, जो उत्तर में उत्तरी ध्रुव से, दक्षिणी ध्रुव से, पूर्व में उदय होते सूर्य में और पश्चिम में अस्त होते सूर्य से अपनी सीमायें बनाता हैं। श्रोताओं द्वारा इस महत्वाकांक्षा की जोर दार तालियों से स्वागत होता था। यह जान फिस्के था, जिसने सर्वप्रथम आंग्ल-सैक्शन सर्वश्रेष्ठता का सिद्वांत विकसित किया।
यह ध्यान देने की बात है कि जार्ज वाशिंगटन से लेकर थियोडोर रूजबेल्ट तक जो राष्ट्पति हुए, उनमें आठ फौजी जनरल थे। जार्ज वाशिंगटन स्वाधीनता संग्राम में अमेरिकी सेना के प्रधान सेनापति थे। वे अमेरिका के प्रथम राष्ट्पति बने और लगातार देा बार पद पर रहे। बाद के दिनो में ऐंड्यू जैक्सन, टेलर, फैंकलिन, रूजबेल्ट, आर्थर, बैंजालिमि, काकिनली, आइजनआवर आदि बड़े सैनिक अफसर थे, जो राष्ट्पति बनें। इन लोगों ने बड़े-बडे़ सैनिक अभियानों का नेतृत्व किया था।
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दूसरे देशों की भूमि दखल करना और उनके घरेलू मामले में हस्तक्षेप करने की लंबी परम्परा है। सन् 1776 में जब संयुक्ता राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा हुई थी तो अतलांतिक महासागर के तट पर 133 उपनिवेशों का क्षेत्रफल केवल 386,000 वर्ग मील थां। सैनिक कार्रवाई के बाद वार्सेल्स संधि (1783) और लूईसियाना पर कब्जा कर लेने के बाद 1803 में क्षेत्रफल दुना हो गया। फलोरिडा को 1818 में, टेक्सास को 1836 में एकतरफा संयुक्त राज्य में मिला लिया गया। टेक्सास मैक्सिको का अंग था। अमेरिका ने इस देश की आधी भूमि अर्थात 558,400 वर्ग मील की विशाल भूमि हथिया ली। 1847 में ओरगान के विशाल भू-भाग 285,000 पर कब्जा कर लिया। 1867 में अलास्का को खरीदने की संधि हुई जिसके जरिये 577,400 वर्ग मील का विशाल भूखंड अमेरिका को मात्र 72 लाख डालर में मिल गया। इस तरह 1776 के मुकाबले 1880 में संयुक्त राज्य अमेरिका की जमीन दस गुना बढ़ गयी थी।
यही नहीं औद्योगिक क्षेत्र में भयंकर विकास हुआ। 1870 के मुकाबले शताब्दी के अन्तिम दशक आते-आते लोहे का उत्पादन आठ गुना, इस्पात का उत्पादन 150 गुना और कोयले का उत्पादन आठ गुना बढ़ गया। हर प्रकार के औद्योगिक उत्पादन का स्तर चार गुना उचां हो गया । 1,40,000 मील रेलवे लाइन बिछायी गयी। इसी भांति खेती का भी तेज विकास हुआ। दो मूल अनाजों गेहूँ और मक्का की उपज दूनी हो गयी। अमेरिका अनाज और माँस की आपूर्ति करने वाला दूनिया का प्रथम देश बन गया। 1870 से 1900 इस्वी की बीच विज्ञान और औद्योगिक तकनीकी अविष्कार के 6,76,000फरमूले निबंधित किये गये थे। यूरोप की विशाल पूंजी संयुक्त राज्य अमेरिका में जमा हो रही थी।
1882 में अधिक उत्पादन का संकट पैदा हुआ है। इससे 30 लाख मजदूर बेकार हो गए। पुरुष मजदूरों को कार्यदिवस 15 घंटे प्रतिदिन था। महिलाओं के लिए यह 10 से 12 घंटे प्रतिदिन था। किन्तु पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की मजदूरी आधी थी। मजदूरों की औसत आयु मात्र 30 वर्ष थी एक मजदूर की वार्षिक आय मात्र 559 डॉलर था, जबकि जीव-निर्वाह व्यय उन दिनों 735 डॉलर था। पूंजीपतियों के विशाल मुनाफे के सामने मजदूरों की यह दर्दनाक स्तिथि थी।
इस प्रकार अमेरिका को विशाल भूखंड और अपार अतिरिक्त पूँजी प्राप्त हुई। इस अतिरिक्त पूँजी और उन्नत तकनीक ने साम्राज्यवादी मंसूबे को जन्म दिया। थियोडोर रूजवेल्ट ने कहा: “हम अपनी सीमाओं के अंतर्गत एक बड़ी भीड़ के रूप में बैठे नहीं रह सकते और अपने को केवल धनी कबाडियों की भीड़ नहीं बना सकते, जो इस बात की परवाह नहीं करते कि बहार क्या हो रहा है ?” (शिकागो हैमिल्टन क्लब में १० अप्रैल १८९९ को दिया गया भाषण )
यह अतिरिक्त पूँजी के निर्यात का उछाल का समाये था। इसके साथ ही समुद्री शक्ति (SEA POWER) का सिधांत का चला। नौसेना + मालवाहक जहाज + सैनिक अड्डा=समुद्र्शक्ति (N+MM+NB=SP) Navy+Merchant Marine+ Naval Bases= Sea Power

-सत्य नारायण ठाकुर

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पहले जमाने नवाबो व राजा महाराजाओं व बादशाहों को मुर्गों तीतर व बटेरें लडाने का शोक था और इन्हें बडी ही खातिर दारी के साथ पाल पास कर तैयार किया जाता था। आजकाल यही काम संसार में एक छत्र राज करने वाले अमरीका के द्वारा किया जा रहा है और अपने आर्थिक उद्देश्यो के लिए वह बराबर दो राष्ट्रों को पहले पाल पास कर सैन्य साजो सामानों से लैस कर के बाद में व्हाइट हाउस में बैठ कर कम्प्यूटर पर सैटेलाइट के माध्यम से अपने मुर्गो की भिडन्त का नजारा लेकर लुप्त अंदाज होता है।
सोवियत यूनियन के विद्यालय के पश्चात अन्तराष्ट्रीय स्तर पर एक छत्र वर्चस्व स्थापित करने वाले राष्ट्र अमरीका का किरदार इस समय एक शौकीन मिजाज नवाबे राजा या बादशाह सलामत की तरह हैं। पुराने जमाने के बादशाह व नवाब अपने मनोरंजन के लिए मुर्गे तीतर व बटेरें लडाया करते थे और बाकायदा बडे बडे मुकाबले आयोजित किए जाते थे कुछ राजा महाराजा पहलवान पालते थे उनकी खुराक का पूरा खर्चा वह उठाते थो फिर उन्हे लडा कर आनन्द मय होते थे चाहे रूस्तम व सोहराब हों या गामा पहलवान सभी राजा महाराजाओं व बादशाहों के पाले पास थे।
आजकल यही काम विश्व का राजा अमरीका करता दिखलायी दे रहा है। परन्तु यह काम वह अपने मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के लिए कर रहा है। कारण यह कि विश्व के सैन्य बाजार में उसकी तूती बोलती है। शस्त्रों के मामले में वह अब विश्व में नम्बर वन है पहले उसको कडा मुकाबला सोवियत यूनियन से करना पडता था परन्तू अस्सी के दशक के अन्त में सोवियत चुनौती देने वाला कोई नही बचा। फ्रांस चीन ब्रिटेन और कुछ हद तक उसका दस्तक पत्र इजराइल सैन्य बाजार में अपनी उपस्थित बनाए तो हुए है। परन्तु अमरीका का वर्चस्व पूरी तरह से इस क्षेत्र में कायम है।
स्पष्ट है कि अपने ग्राहक बनाए रखने के लिए उसे युद्ध का वातावरण को तैयार करना रहता है जो वह खूबी के साथ विगत दो इहाइयों से सफलता पूर्वक करता चला आ रहा है। इससे पूर्व द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब अपने प्रतिद्वन्दी जापान व जर्मनी को ठंडा कर देने के बाद अमरीका ने पहले कोरिया में अपने नापाक इरादों का ठिकाना बनाया और लम्बे अर्शे तक कोरिया में उसने अशांति का वातावरण पैदा कर अपने सैन्य कौशल का प्रदर्शन कर शस्त्र बाजार में अपनी धाक जमाई। फिर वियतनाम में उसने अपना दूसरा ठिकाना बनाया और यहां की नए नए शस्त्रों का प्रदर्शन कर उसने अपनी अर्थ व्यवस्था को चमकाया उसे यह कारोबार तब बन्द करना पडता है। जब जनहानि से त्रस्त अमरीकी नागरिक आक्रोशित होकर सडको पर निकल पडते हैं।
-मोहम्मद तारिक खान

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