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Archive for अगस्त 14th, 2010


स्वतंत्रता के पश्चात भी हमारी पुलिस व्यवस्था व न्याय व्यवस्था में सुधार होने के बजाए कितनी गिरावट आई है उसका तजा तरीन उदहारण बाराबंकी जनपद में कृष्णा नाम की युवती की हत्या में आठ लोगों को कारागार में जाकर अपनी जमानत करानी पड़ी थी। मृतका कृष्णा के मामले की विवेचना पांच पुलिस उपनिरीक्षकों ने की थी। पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों के दिशा निर्देश में हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी गैर जिम्मेदार तरीके से विवेचना हुई। आरोप पत्र मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के यहाँ दाखिल हुआ जिस पर उन्होंने संज्ञान लेकर वाद को सत्र न्यायलय सुनवाई हेतु प्रेषित कर दिया। सत्र न्यायधीश महोदय ने उक्त वाद को अतिरिक्त सत्र न्यायधीश कोर्ट नंबर 8 में सुनवाई हेतु भेजा किन्तु अचानक 21 जून 2010 को मृतका कृष्णा न्यायलय के समक्ष उपस्थित हुई और अपने को जीवित होने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। इस उदहारण से हम आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारी व्यवस्थाएं कितनी शर्मनाक हालत में पहुँच चुकी हैं। जिसकी हत्या नहीं हुई है उसकी हत्या के आरोप में लोग जेल जा रहे हैं। देश भर में हत्या जैसे गंभीर मामलों में विवेचना थानों में बैठकर ही लिख दी जाती है। यह भी पता लागने की कोशिश नहीं की जाती है कि जिस लाश को वह जिस व्यक्ति की कह रहे हैं उसकी है या नहीं।
पुलिस उपनिरीक्षकों और उनके पर्यवेक्षण अधिकारीयों को हमारी न्यायिक व्यवस्था दण्डित करने में असमर्थ है क्योंकि हम सब अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए तरह-तरह के बहाने खोज लेते हैं।

दूसरी तरफ देश में राष्ट्रमंडल खेल होने वाले हैं और अपने पैसे खर्च कर के अपनी गुलामी के दिनों की याद ताजा कर रहे हैं तो वहीँ 2012 के ओलम्पिक खेलों में जुटे ब्रिटेन ने अपने नागरिकों को सलाह दी है कि वह न भारतीयों को छुवें न करीब जायें। अब आप ही सोचिये कि हमारी मानसिकताएं क्या हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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