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Archive for सितम्बर, 2010


(हिंसा करने से पहले हमारी तरफ देखें, हम आपके हैं )

बाबरी मस्जिद प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने अपना फैसला दे दिया। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। सहमति और असहमति प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। असहमति वाले लोगों के लिए द्वार माननीय उच्चतम न्यायलय के लिए खुले हैं लेकिन जब किसी भी विवादस्पद मामले में न्याय पाने के लिए जब हम न्यायलय पहुँचते हैं तो उसके फैसले का सम्मान करना हम सभी नागरिको का कर्तव्य है लेकिन कुछ वर्षों से शरारती व अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग करके हिंसा फ़ैलाने का काम भी जारी रहा है। जब हम हिंसा का प्रयोग करने लगते हैं, तब देश की एकता और अखंडता को निश्चित रूप से चाहे अनचाहे चोट पहुंचाते हैं।
हमारे देश में भाषा, जाति, प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय के सवाल उठा कर देश को कमजोर करने का कार्य सदियों से जारी रहा है। इसी प्रकरण के सवाल पर सैकड़ों करोडो रुपये फैसला सुनाने के नाम पर व कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए खर्च किये जा चुके हैं, जब इस खर्चे का फ़ाइनल हिसाब-किताब आएगा तो उसमें भी घोटाले नजर आयेंगे लेकिन हमारे आपके बीच में अब यह फैसला होना है कि हम कितनी मजबूती से अपनी सांप्रदायिक एकता व सद्भाव को बचाए व बनाये रखते हें।
आइये हम आप मिलकर फैसले का सम्मान करें –

चाहे अल्लाहू कहो , चाहे जय श्री राम !
प्यार फैलना चाहिए , जब लें रब का नाम !!

मस्जिद – मंदिर तो हुए , पत्थर से ता’मीर !
इंसां का दिल : राम की , अल्लाह् की जागीर !!

– राजेन्द्र स्वर्णकार

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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परिंदों में फिरकापरस्ती क्यों नहीं होती-
कभी मंदिर पर जा बैठे कभी मस्जिद पर जा बैठे

माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ का फैसला बाबरी मस्जिद प्रकरण पर आगामी 30 सितम्बर को आने जा रहा है। समाज में कुछ तत्वों द्वारा तरह-तरह की अफवाहें उड़ा कर धर्म के नाम पर जहर फैलाया जा रहा है। कोई भी धर्म हिंसा करने की बात नहीं करता है किन्तु उसके प्रचारकगण तरह-तरह से अपने बाहुबल प्रदर्शन करने का प्रयोग धर्म के नाम पर करने लगते हैं। माननीय उच्च न्यायलय का फैसला अन्य फैसलों की तरह एक फैसला ही है, लेकिन जिस तरह से तैयारियां की जा रही हैं। उससे यह लगता है कि न्यायलय का यह फैसला सामान्य प्रक्रिया का अंग नहीं है। दोनों पक्षों को चाहिए की न्यायलय के फैसले का सम्मान करें। असहमत होने पर न्यायिक प्रक्रिया को अपनाये अन्यथा जरा सा भी हो-हंगामा धर्म को बदनाम ही करेगा।
धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य। काल और परिस्तिथियों के अनुसार जो भी चीजें मानव जाति या सम्पूर्ण जगत को बचाए बनाये रखने में सहायक होती हैं, वही धर्म है। धर्म के प्रचारकों ने अगर धर्म के आधार पर लोगों के मन में घृणा, राग, द्वेष पैदा करते हैं, वह धर्म नहीं हो सकता है। हमने जाति, लिंग, नस्ल, धर्म के आधार पर इंसानी रिश्तों को मानवीय संवेदनाओ को कलंकित करने का कार्य करते हैं तो वहीँ से हम पूरी मानव सभ्यता के साथ खिलवाड़ करते हैं।

आइये हम सब मिलकर और उन्नति शील भारत के निर्माण के लिए सभी जातियों, सभी धर्मों को एकता के सूत्र में बाँधते हुए माननीय उच्च न्यायलय के फैसले का स्वागत करें, सम्मान करें।
आज जरूरत इस बात की है कि रवीन्द्र प्रभात जी की इन पंक्तियों को सार्थक न होने दें।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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संयुक्त राष्ट्र महासभा को ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने संबधित करते हुए कहा कि 9/11 की घटना अमेरिकी साजिश का परिणाम है। अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए और एशियाई मुल्कों के ऊपर अपना शिकंजा कसने के लिए किया था। इस घटना में 2700 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
अहमदीनेजाद ने आरोप लगाया कि इजराइली यहूदी शासन को बरकरार रखने और मध्य-पूर्व के मुद्दे को भटकाने के लिए अमरीका ने ये साजिश रची। अहमदीनेजाद ने यहां तक कहा कि आत्मघाती हमलावरों को अमरीकी प्रशासन की ओर से मदद दी गई। उन्होंने कहा कि जिस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को आत्मघाती हमलावरों ने विमान से टकरा कर जमीदोंज कर दिया उसके मलबे से अमरीकी पासपोर्ट मिले जबकि हमलावरों का कोई सुराग नहीं मिला।
अहमदीनेजाद ने कहा कि ईराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में हुए अभियानों में मारे गए हजारों लोगों के सामने यह आंकड़ा नगण्य है।
अहमदीनेजाद के भाषण के दौरान ही अमेरिका के 33 समर्थक देश उठ कर चले गए। गौरतलब बात यह है कि ईराक के ऊपर हमला करने से पूर्व अमेरिकन साम्राज्यवाद ने तरह-तरह के दावे किये थे कि ईराक में परमाणु हथियार और रासायनिक हथियार बनाये जा रहे हैं और उनका भण्डारण किया जा रहा है लेकिन आज जब अमेरिकन सेनाओ की वापसी तक हो गयी लेकिन अमेरिकन दावों की पुष्टि आज तक नहीं हुई।
अमेरिकन या अन्य साम्राज्यवादी देशों की बातें उस मिलावटखोर, मुनाफाखोर बनिये की तरह होती हैं जो हर वक्त ईश्वर की सौगंध खा कर अपने माल को बेचने के लिए तरह-तरह की झूठी कसमें खाता रहता है, अमेरिकन या साम्राज्यवादी तत्व अर्धविकसित व विकसित देशों को गुलाम बनाये रखने के लिए उनके ऊपर तरह-तरह के आरोप लगाये रखते हैं और अपनी लूट आधारित व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। इससे पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया में जितने नरसंहार किये हैं वह भले ही इतिहास की बात हो गयी है लेकिन मानवता साम्राज्यवादियों के आगे हमेशा कराहती ही रही है। वियतनाम, ईराक, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन सहित कितने ही मुल्कों अमेरिकन साम्राज्यवाद ने तबाह व बर्बाद कर डाला है। इससे लगता है कि अहमदीनेजाद की बातों में कहीं न कहीं दम जरूर है।

इसके पूर्व फरवरी 2010 में अहमदीनेजाद ने कहा था कि

The West’s ultimate goal is not Iran, but India and China, Iran’s President Mahmoud Ahmadinejad was quoted as saying by Irinn.

He named the wish to undermine China’s and India’s rapidly growing economies as the causes of the West’s interest.

He named the recent concentration of NATO forces around India and unrests in Pakistan as an argument.

Presently, the West experiences a rapid downturn in the economy and the leaders of the Western countries have decided to conceal reality from their peoples, he said at today’s news conference.

Ahmadinejad said that NATO almost completely surrounded Russia and once Russia will understand this.

“Russia should respond to the deployment of NATO forces along its borders,” he said।

thepepoleofpakistan

यह भी यथार्थ के नजदीक उनका बयान था।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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यह बात बहुतों को नही मालूम है कि गांधी जी को प्रथम समाजवादी क्रान्ति से, जो 1917 में हुई, पूरी हमदर्दी थी, इस क्रान्ति ने सभी राष्ट्र-मुक्ति आन्दोलनों को अपना सहयोग दिया। गांधी की मुख्य सोच केवल यही नहीं थी कि उन्हें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाए, यह तो उनके अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का पहला चरण था, अन्य उद्देश्य थे- भूख, बेरोजगारी तथा विकराल अभावग्रस्तता का उन्मूलन। वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था ही बेरोज़गारी और मानवीय पतन का कारण है। गांधी का इस पर विश्वास था कि सामन्तवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर इसका दूसरा रास्ता खोजा जाए, यदि मानव जाति को डूबने से बचाना है, शोषण, असमानता, बेरोजगारी, हिंसा और युद्ध से मुक्ति दिलाना है। गांधी जी राजनैतिक सन्धि हेतु जब लंदन गए और वहाँ की एक श्रमिक बस्ती में जाकर रहे तब उन्होंने खुले आम यह कहा कि भारत में ब्रिटिश सामानों का जो बहिष्कार हो रहा है उसके निहितार्थ इंग्लैंड के श्रमिक समझने की क्षमता रखते हैं।
डा0 एम0एस0 स्वीमीनाथन जो एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हैं और जिनकी पहचान भारत में हरित क्रान्ति से जुड़ी है (उन हलकों में विवादास्पद हैं जो उस आर्गैनिक फारमिंग का समर्थन करते जो केमिकल तथा कीट नाशक दवाओं से मुक्त हों, उनका मत है कि उस भार से किसान पस्त हैं और उनके कर्जे बढ़ रहे हैं तथा ज़मीन व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं) उन्होंने ब्लूूम वर्ग यू0टी0वी0 पर अपने एक साक्षात्कार में जो 20 जनवरी 2010 को रिले किया गया उसमें गांधी जी की राजनैतिक प्राथमिकताओं को याद किया, इस बात पर भी दुःख प्रकट किया कि पिछले दशक में संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य उपलब्धता व पोषकों हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए थे भारत उनकी आधी उपलब्धि भी नहीं प्राप्त कर सका, जबकि वियतनाम और चीन ने उन्हें प्राप्त कर लिया। यह भी चेतावनी दी कि खाद्य वस्तुओं की असुरक्षा तथा उनके दामों में बेतहाशा बृद्धि आम-जनता के लिए असंतोष का कारण बनेगी।
इस बढ़ी हुई आयु में किसी अन्य राजनैतिक नेता को नहीं, केवल महात्मा गांधी को फासीवादी और दक्षिण पंथियों ने अपना निशाना बनाया तथा उनकी हत्या कर दी, इसलिए कि वे उनकी राजनैतिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को भारत में अपने साम्राज्यवादी भविष्य के एजेण्डे के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे थे। अब हत्यारे या उनके वैचारिक सहायक इसकी जो भी व्याख्या करें। बहरहाल बँटवारे के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की पुनर्संरचना को, जाते हुए साम्राज्यवादी थोप रहे थे तथा इसमें दोनो धार्मिक समूहों की राजनैतिक शक्तियों का सहारा ले रहे थे और धार्मिक हत्याओं हेतु उनको प्रशिक्षित किया जा रहा था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि आज के क़ब्ज़े वाले देशों तथा कल के लक्षित देशों में किया जा रहा है।
गांधी के सहयोग से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले, ग्रामीण व नगरीय कामगारों, दलितों के मसीहा, भारत के
संविधान के निर्माता डा0 बी0आर0 अम्बेडकर जिन्होंने संयुक्त राज्य की कोलम्बियाँ यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की थी, जब
गांधी जी की हत्या की गई तो असीमित पीड़ा के साथ अपनी भावनाओं को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया ‘‘महात्मा गांधी हम से सब से ज्यादा क़रीब थे‘‘ इस श्रद्धांजलि ने इस शरीफ़ लेकिन समझौता न करने वाले क्रान्तिकारी के जीवन का निचोड़ पेश कर दिया। 20वीं सदी के अनेक नेतृत्व करने वालों के साथ-साथ गांधी ने केवल भारतीय जन-मानस को ही राजनैतिक प्रेरणा नहीं दी वरन् वह, संसार के विभिन्न भागों में होने वाले आन्दोलनों के भी प्रणेता बने ताकि उस राजनैतिक साम्राज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिसकी संरचना ही इसलिए की गई थी ताकि श्रमिकों व कामगारों के राजनैतिक आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का हनन किया जाय।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
( समाप्त )

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एक क्रान्तिकारी की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके शिष्य कैसे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग उभरे एवं वह महात्मा गांधी के पद चिन्हों पर चले। अमेरिकी इतिहास के एक बहुत बड़े आन्दोलन का उन्होंने नेतृत्व किया। उन्होंने यू0एस0 के मिलिट्रीवाद का विरोध तथा अमेरिका के अफ्रीकी लोगों की मुक्ति का आन्दोलन चलाया। उनका मत था कि सेना का अन्याय वहाँ के कामकाजी लोगों के खिलाफ हैं, यह मानवता के विरुद्ध है तथा नस्लवाद एवं शोषण को बढ़ावा देता है। महात्मा गांधी का मत था कि एक ऐसे देश में जहाँ लाखों भूखे हांे, खाना ही प्रथम आवश्यकता है। वे कहते थे कि धार्मिक-दर्शन पूरी मानवता के सम्मान का उपदेश देता है, इसमें संस्कृतियों के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है। मार्टिन लूथर किंग इस बात पर जोर देते हैं ‘‘कोई भी धर्म जो मनुष्य की आत्मा की तो चिंता करे और उस गंदी बस्ती की चिंता न करे जिसमें आत्मा पैदा हुई और जहाँ की आर्थिक दशाओं ने उसे लँगड़ा कर रखा है, वह धर्म बीमार है उसे खून देने की जरूरत है’’ राजनैतिक प्रशिक्षण के आलोक में गांधी ने राजनैतिक रणनीति के तौर पर सविनय अवज्ञा, असहयोग, आन्दोलन तथा सत्याग्रह को चुना। भारतीय आन्दोेलन पर भी इस का यह प्रभाव पड़ा कि यहाँ लाखों लोग इस जनसंघर्ष में कूद पड़े जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपना शासन चलाना मुश्किल हो गया। वर्तमान में बोलोविया की स्थिति पर अगर ग़ौर करें तो वहाँ के देशी लोगों ने एक बड़ा असहयोग आंदोलन चलाकर, राजनैतिक और आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए वहाँ का तख़्ता पलट दिया था।
अब देखिए, दूसरी ओर भारत में मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों ने ‘आपरेशन ग्रीन हन्ट‘ का कोई विरोध नहीं किया। बहुत बड़ा ‘पैरा मिलिट्री‘ अभियान मध्य एवं पूर्वी भारत के देशी आदिवासियों एवं किसानो के ख़िलाफ़ छेड़ दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘सल्वा जुडुम‘ को बन्द करने के निर्देश दिए थे। जिसकी वित्तीय सहायता मध्य एवं पूर्वी भारत में भारतीय एवं विदेशी मल्टीनेशनल कार्पोरेट खान उत्खनन जगत करता था, जिनका उद्देश्य था उस जमीन को खाली करा लेना जो मिनरल पदार्थों से परिपूर्ण है तथा यह हज़ारों एकड़ जमीन वहाँ के आदिवासियों और किसानो के क़ब्ज़े में पुराने ज़माने से रही है तथा उस पर वह खेती करते चले आ रहे हैं। औद्योगिक स्वार्थों के तहत उस ज़मीन पर बड़े पैमाने पर क़ब्ज़े किए गए तथा गरीब बस्तियों को उजाड़ा गया। कुछ लोगों ने इस ज़्यादती को ‘आन्तरिक उपनिवेशवाद‘ की संज्ञा दी है। कृषि एवं उद्योग के बीच ‘बैलेंस‘ बनाने हेतु अगर गांधी होते तो क्या करते? आज का हाल तो यह है कि कुछ गंाधीवादी जो यहाँ के आदिवासियों एवं कृषकों के हित में काम कर रहे थे वे निशाना बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
गांधी जी की ग़लत तस्वीर पेश की गई, उन्होंने औद्यीगीकरण तथा आर्थिक विकास का कभी विरोध नहीं किया। उनका नज़रिया यह था कि जो भी बड़ी या छोटी इन्डस्ट्री हो उसका मुुख्य उद्देश्य देहातों व शहरों में बेरोज़गारी का ख़त्म करना, होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण था कि भारी उद्योगों पर सामाजिक कन्ट्रोल हो, प्रबंधन के सभी सेक्टरों में श्रमिकों की भागीदारी हो और उन्नत कृषि तकनीक हेतु भारी प्रयास किए जाएँ। उनका इस बात पर ज़ोर था कि ग्रामीण ढाँचागत विकास के तहत साफ़ पानी, सफ़ाई, स्वास्थ्य, साक्षरता, शिक्षा, तथा आधारभूत निवास को त्वरित प्राथमिकता दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी और माओत्सेतुंग के प्रोग्रामों में बहुत सी समानताएँ हैं। ख़ास तौर से उन देशों में जो उपनिवेशवाद के कारण ऐतिहासिक रूप से तबाह हुए, जहाँ खेतियाँ बर्बाद हुईं, वहाँ आर्थिक उत्थान का आरम्भ कैसे किया जाए, हालाँकि दोनों के तरीक़ों में अन्तर था। माओ एक ऐसे राष्ट्रवादी थे जिनकी चिंताएँ चीन-वासियों हेतु थीं। महात्मा गांधी हालाँकि भारतीय समाज के विशिष्ट हालात को बखूबी समझते थे फिर भी उनकी चिंताएँ समस्त मानवता के लिए थीं। 20वीं सदी के राजनैतिक आन्दोलनों की पूरी समझ रखते थे तथा वे एक राजनैतिक यर्थाथवादी भी थे। महात्मा गांधी ने ‘सेलेक्टेड वकर््स‘ तीसरे खण्ड में ‘रिकान्सट्रकशन प्रोग्राम‘ के अन्तर्गत, जो 1941 में, फिर संशोघित 1945 में प्रकाशित हुआ ‘इकोनामिक इक्वैलिटी‘ के शीर्षक से पैरा 13 में यह कह कर सावधान किया, ‘‘जब तक धनवानों एवं लाखों भूूखों के बीच एक बड़ी खाई बनी रहेगी, एक हिंसा रहित सरकारी-तंत्र का स्थापित होना असंभव है। जब तक नई दिल्ली के बड़े-बड़े महलों एवं गरीब श्रमिक वर्ग की दुखदायी झोपड़ पट्टियों का अन्तर बाकी रहेगा एक न एक दिन हिंसक और खूनी क्रान्ति निश्चित है। जब तक कि धनी वर्ग स्वेच्छा से अपनी सम्पदा और शक्ति को आम भलाई के कामों मंे न लगा दे।
गांधी आज कल के भारतीय एवं अन्य स्थानों के राजनैतिक वर्ग के स्तर तथा व्यक्तिगत स्तर पर स्व-चरित्र के उदाहरण पेश करने पर ज़ोर देते थे। विलासिता पूर्ण, अविवेकी, निर्लज्ज जीवन बिताने हेतु, जीवन भर के लिए ज़रूरत से अधिक सामान एवं धन-सम्पदा एकत्र करना तथा दूसरी ओर एक बड़े समूह का इन सब से वचिंत होना, गांधी जी के विचार में अत्यंत घातक था। वे चाहते थे कि देशवासी सादा, सरल, नैतिक जीवन का ढंग अपनाएँ क्योंकि आज के भारतीय राजनैतिक वर्ग अथवा अन्य का आचरण इसके विपरीत है। अनेक देशों के सरकारी तंत्र भी क़र्ज लेते-लेते इसी चक्रव्यूह में फँसते हैं जिससे उनमें रहने वाले समाज पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
यह बात निर्विवाद है कि महात्मा गांधी के राजनैतिक संघर्ष का एक मानवीय पहलू भी था, जिसके कारण उन्हें पिछाड़ पाना कठिन था। उन्हों ने व्यक्ति के बजाय समाज की नाइंसाफियों तथा उस राजनैतिक प्रणाली पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा जो मानव को दासता की ओर ले जाता है। उनके पास आगे बढ़ने और पीछे पिछड़ने का राजनैतिक कौशल तथा राजनैतिक अनुभवों की गहरी समझ थी। उपनिवेशवाद के खिलाफ़ किसी भी आन्दोलन को इतना अधिक सहयोग एवं विभिन्न विचार धाराओं के लोगों का समर्थन नहीं मिला जितना उनके आन्दोलन को।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

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समस्त संसार में ये पूर्वानुमानों के दौर हैं। अनेक क्षेत्रों में हम आर्थिक और वित्तीय गिरावट देख रहे हैं जिसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी साम्राज्यवाद के ऐतिहासिक विकास में निहित है। साथ ही साथ मानवीय इतिहास में वह महायुद्ध भी हैं, जिनका उद्देश्य था सभी महाद्वीपों के स्वतंत्र राष्ट्रों को नव उपनिवेश बनाना और बरबाद करना, देशों के बजट, उनके आर्थिक क्षेत्रों व बाजारों को छीनना, प्रत्यक्ष रूप से उस नागरिक आबादी के खात्मे को लक्ष्य बनाना जिसे वे उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।
अनेक देशों पर सैनिक आक्रमण हुए तथा कब्जे भी हुए जैसे फिलिस्तीन, कांगो, पूर्व योगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, यमन, हैती और वे देश भी जिनको धमकियाँ दी जा रही हैं या आगे जिन पर कार्यवाही होना है जैसे ईरान, रूस, चीन। इन बातों के बावजूद आज तक विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, फासिस्टवाद की समस्या के हल के लिए कोई गंभीर राजनैतिक प्रयास नहीं हुए, हालाँकि राजनैतिक आंदोलनों तथा जमीनी मुठभेड़ों के साहस जोर पकड़ते रहे हैं। बहरहाल नतीजा यह निकला कि एक के बाद एक देश सैनिक हमलों से या तो बर्बाद कर दिए गए या फिर आन्तरिक फासिस्टों के आगे नत-मस्तक हुए। इस प्रकार से सैनिक आक्रमण के साथ-साथ घातक प्रोपोगण्डा जो इस समय विश्व स्तर पर हो रहा है उसके खिलाफ नागरिकों को शिक्षित करने में हमारी वैचारिक विफलता जिम्मेदार है और नागरिकों तथा समाज के दीर्घ कालिक राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए यह बात घातक भी है। यही बात उन सरकारों के लिए भी है जो ऐतिहासिक क्रांतियों के बाद स्थापित हुईं और जिनके सामथ्र्य को कमजोर कर दिया गया।
अन्य समाजों या संघों के साथ-साथ भारत एवं इसमें रहने वाले एक बार फिर वैश्विक तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय वरदान बन गए हैं। भारत सरकार की तीन कमेटियों ने भी यह रिपोर्ट दी है कि भारत की तिहाई आबादी से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं और असंगठित कार्य क्षेत्र के लगभग 700 मिलियन श्रमिक प्रतिदिन एक डालर से कम पर और अनेक ऐसे भी हैं जो लगभग बीस रूपये रोज पर जो आधे डालर से कम हैं, जिन्दगी गुजारते हैं। इन हालात के तहत एक चैथी कमेटी ‘‘कृषि सुधार और भूमि सुधार के अधूरे कार्य‘‘ ने भूमि अधिग्रहण की राज्य की नीतियों की आलोचना की है और कहा है यह सब विदेशी तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ पहुँचाने के लिए है। यह भी कहा कि वैधानिक अनुशासनहीनता, गरीबी और हिंसा की जो साइकिल है उसका कारण है राज्य का नव उदारवाद का आर्थिक एजेन्डा और उन कानूनों का संशोधन जिनके द्वारा देशी जनजातियों तथा कृषकों के लिए बहुत समय से उन जमीनों को सुरक्षित कर दिया गया था। जिनमें वे खेती करते थे और जिन्हें उनसे छीना नहीं जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की अनुमान आधारित फारवर्ड टेªडिंग जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक निषिद्ध थी अब सरकारों ने महज राजनैतिक रंगों के दिखावे के लिए उनकी इजाजत दे दी ताकि फ्री-मार्केट एवं अंधाधुंध विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। यहाँ तक कि कृषि-व्यापार कम्पनियों के फायदे के लिए खाद्य-पदार्थों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भारत को बरबाद करने के लिए की गई। जबकि यह देश हजारों वर्षों से एक कृषि क्षेत्र के रूप में जाना जाता था अनेक प्रकार से खाद्यान्न पैदा किए जाते थे। जहाँ ‘सरप्लस’ की स्थिति होती थी। अब ‘इस्लामी आतंक’ को भी इन्हीं बातों से जोड़ा गया। अनेक क्रूरताओं का जिक्र करें तो देखते हैं कि तमाम बेकुसूर मार डाले जाते हैं बाद में पता चलता हैं कि इनके लिए झूठी कहानियाँ गढ़ी गई थीं तमाम लोगों को बेवजह फाँसा जाता है, इन बातों को अक्सर बचाव पक्ष के वकीलों ने खोला।
मानव जाति को इन तमाम क्रूरताओं से मुक्ति दिलाने हेतु जब हम रणनीति तलाश करते हैं तो 20वीं सदी के तमाम आन्दोलनों में से, इस समय हम को महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राजनैतिक संघर्ष को याद करना चाहिए। उन्होंने भारतीय आर्थिक क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के दखल का सख्ती से विरोध किया था। विश्व स्तर पर उनकी चिंताएँ इस बात से जाहिर होती हंै कि जब ब्रिटिश सरकार ने यूरोपीय यहूदीवाद से साठ-गाँठ के तहत ‘बालफोर डिक्लेरेशन’ फिलिस्तीन को उपनिवेश बनाने हेतु लागू करना चाहा तो गांधी जी ने उसका विरोध किया। मानव जाति की बरबादी के खिलाफ उनकी आलोचनाएँ जो उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के कारण र्हुइं तथा अन्यायी राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेकने के लिए राजनैतिक प्रशिक्षण हेतु उनकी रणनीति, बहुलवादी संघर्ष, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आदि सभी बातें उन लोगों के लिए अब भी उपयुक्त हैं जो इस, 21वीं सदी में मानव समाज की नई संरचना के उपायों की तलाश में लगे हैं।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता के महान युद्ध की विफलता के बाद जिसमें 10 मिलियन भारतीयों की हत्या ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने की थी, उपनिवेश वाद की विरोधी ताकतें भी कुछ न कर सकी थीं, महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छिटकी हुई उग्र घटनाएँ ब्रिटिश शासन को नहीं हरा सकतीं। इसके लिए सतत राजनैतिक जागरूकता की शिक्षा,तथा मुख्य मुद्दों पर बहुजन संघर्ष की जरूरत है और यह भी जरूरी बताया कि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक असहयोग हो कि नाइंसाफी का शासन पंगु हो जाए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने विदेशी राजनैतिक एवं आर्थिक ढाँचे को
ध्वस्त कर दिया, जिससे हम ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ तक पहुँच गए।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

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बाबरी मस्जिद प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहबाद खंडपीठ लखनऊ को अब अपना निर्णय 28 सितम्बर को उद्घोषित करना होगा। ऐसे आदेश माननीय उच्चतम न्यायलय ने जारी किये हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कस्बों, शहरों से लेकर दूर-दराज तक के इलाकों में बैरिकेटिंग कर दी है। जगह-जगह फ्लैग मार्च व युद्धाभ्यास हो रहा है। सांप्रदायिक राजनीतिक दल तरह-तरह की अफवाहें फैलाने में लगे हुए हैं उसके बाद भी प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव व एकता चट्टान की तरह खड़ी हुई है। प्रदेश सरकार या तो बुरी तरह से डरी हुई है। इस प्रकरण से या समाज को कोई अद्भुद सन्देश देना चाहती है। इस प्रकरण पर इसके पहले भी निर्णय आए हैं। पूरे देश में कोई भी झगडा-झंझट नहीं हुआ है लेकिन झगडा-झंझट तब हुआ है, जब राज्य सरकार व केंद्र सरकार की मशीनरी दंगाइयों के साथ कंधे से कंधा मिला रहे थे। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पश्चात बहुत सारे अधिकारी- कर्मचारी दंगाइयों से हाथ मिला रहे थे। कुछ ऐसी ही स्तिथि पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इस तरह की हरकतों से देश की एकता और अखंडता कमजोर होती है। माननीय उच्च न्यायलय को फैसला देना है। दोनों पक्ष कह चुके हैं कि सद्भाव मुख्य है। हमारी एकता को बनाए रखना ही प्रमुख है लेकिन वोटों के सौदागर इसमें अफवाहें फैला कर राजनीति कर रहे हैं और सरकार की भी स्तिथि साफ़ नहीं है। तैयारियों से ऐसा लगता है कि सरकार अब 28 को युद्ध लड़ेगी।

अयोध्या में सद्भाव का एक द्रश्य यह भी है : –

(फोटो साभार: हिन्दुस्तान)

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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जम्मू एंड कश्मीर हालात पिछले कुछ दिनों से अत्यधिक बिगड़े हुए हैं। जिसका राजनीतिक समाधान होना अतिआवश्यक है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से एक नेता ने कहा कि हमको आजादी चाहिए। यह बात पिछले कुछ वर्षों में साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इस प्रदेश की जनता में कूट-कूट कर भरा गया है लेकिन ऐसे तत्वों के साथ सामान्य जन नहीं है। हमारी व्यवस्था की असफलताएं ऐसे तत्वों को पल्लवित होने में मदद करती हैं। इन अलगावादी तत्वों से यह पूछने की आवश्यकता है कि वह किसके गुलाम हैं जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और उसके बाद पकिस्तान पूरी तरह से अमेरिकन साम्राज्यवादियो के साथ रहा और आज उसकी राजनीतिक, आर्थिक स्तिथि अत्यधिक ख़राब है। जम्मू एंड कश्मीर का भी अर्थ तंत्र काफी अच्छा नहीं है। काफी हिस्सा बर्फीला होने के कारण रोजगार के अवसर काम हैं। पर्यटन से ही मुख्य आय होती है जो सीमा पार की गतिविधियों से कम होती जा रही है। दूसरी तरफ गुलाम कश्मीर जिसके हालात जम्मू एंड कश्मीर से भी बदतर हैं।
अमेरिकन साम्राज्यवाद का पुराना सपना है कि जम्मू एंड कश्मीर को भारत और पकिस्तान से अलग कर वहां पर सैनिक समुच्चय स्थापित करने का किन्तु उसका सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। भारतीय नागरिको की उदारतावादी नीति के कारण कश्मीर के उच्च इलाकों पर अमेरिकन सैनिको की तैनाती से वह भारत, चाइना सहित कई मुल्कों के ऊपर अपना अघोषित नियंत्रण कर सकता है। आज जब भारत की विदेश नीति से लेकर सभी नीतियों में परिवर्तन हुए हैं तो उसका लाभ साम्राज्यवादी शक्तियों को भी हो रहा है जिसका प्रतिबिम्ब मुख्य रूप से जम्मू एंड कश्मीर में दिखाई देता है।
जरूरत इस बात की है कि यह एक राजनीतिक समस्या है वहां की जनता से सद्भावपूर्ण तरीके से एक अच्छी व्यवस्था देकर संवाद कायम करने की है। संवाद से ही अच्छा रास्ता निकलेगा। सेना, कर्फ्यू, फायरिंग कोई विकल्प नहीं होते हैं। इससे कुछ समय के लिए शांति तो कायम की जा सकती है लेकिन स्थायी शांति नहीं।
साम्राज्यवादी शक्तियों के भारतीय सन्देश वाहक इस समस्या को हिन्दू और मुसलमान के चश्मे से ही देखते हैं और उनको देखना भी चाहिए पहले वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए हिन्दू और मुसलमान, हिंदी और उर्दू का विवाद उठाते रहे हैं और आज भी वह कश्मीर के सवाल को साम्राज्यवादी शक्तियों को फ्रायदा देने के लिए तरह-तरह के राग अलाप रहे हैं। मैं नहीं समझता कि संविधान के अनुच्छेद 370 के प्राविधानो से भारतीय संघ के अन्य नागरिको का कोई नुकसान होता है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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उत्तर प्रदेश में देश के सबसे बड़े त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है। सदस्य ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक के सदस्यों का चुनाव होना है। गाँव-गाँव में सूबे से ही कच्ची दारु, देशी दारु व अंग्रेजी शराब की मांग मतदाताओं द्वारा आम तौर पर की जा रही है। जिसकी पूर्ति प्रत्याशी कर रहे हैं। चुनाव के पूर्व से ही प्रत्याशियों ने लोगों के खेत जोतने से लेकर फसल कटाई तक निशुल्क की है। बरसात के इस मौसम में हो रहे चुनाव में दारु, मुर्गा, पैसा जम कर खर्च किया जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चे नारा भी लगा रहे हैं। जो इस पोस्ट की हेडिंग है, प्रत्याशी भी आपूर्ति करने में पीछे नहीं हैं। वहीँ मतदाता पीने और खाने में कमजोर नहीं हैं। कुछ बस्तियों में एक प्रत्याशी खिला-पिला कर जाता है। उसके जाते ही दूसरा प्रत्याशी आ जाता है और मतदाता उसकी दारु पीने लगते हैं और खाने लगते हैं।
इस चुनाव में देवर-भौजाई, पिता-पुत्र, भाई-भाई, देवरानी-जेठानी सहित सभी रिश्तों को भूल कर एक दूसरे के मुकाबले प्रत्याशी खड़े हुए हैं। इस चुनाव में एक बात यह भी उभर कर आ रही है कि 24 सितम्बर को आने वाले फैसले का ज्यादा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों पर नहीं पड़ेगा। मत प्राप्त करने के लिए दोनों धर्मों के लोग एक दूसरे के प्रति अत्यधिक उदार हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है।
वहीँ भ्रष्टाचार के गंगा स्नान में पंचायत चुनाव से जुड़े हुए सरकारी कर्मचारी भी जम कर स्नान कर रहे हैं। जिला पंचायत नोडुस प्रमाण पत्र लेने के लिए 150 रुपये की रसीद दी जाती है और प्रत्याशी से 200 रुपये लिए जाते हैं और इस तरह से पंचायत क्षेत्र पंचायत तहसील नोडुस प्रमाण पत्र की अलग-अलग फीस हैं और सहयोग राशि अलग-अलग है। नामांकन फार्म भी ब्लैक में बेचा जा रहा है। वहीँ नोटरी अधिवक्ताओं को भी लाभ हो रहा है वह भी मनमाने तरीके से अपनी-अपनी फीस वसूल रहे हैं।
यह उत्तर प्रदेश में चल रहे पंचायत चुनाव की एक तस्वीर है। आगे और भी तस्वीरें आएँगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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शिवपुरी के भदरवास रेलवे स्टेशन पर खड़ी इंटरसिटी यात्री ट्रेन को सामने से आ रही मालगाड़ी ने जोरदार टक्कर मारी जिससे 15 यात्रियों की मृत्यु हो गयी, 50 यात्री गंभीर रूप से घायल हैं। दोनों ट्रेनों के ड्राईवर घटनास्थल से भाग गए हैं। रेलवे उच्च अधिकारीयों का कहना है कि मालगाड़ी के ड्राईवर ने सिग्नल की अनदेखी की है या सिग्नल फ़ेल हो जाने के कारण उक्त दुर्घटना घटी है।
रेल विभाग ने ड्राईवर व गार्ड से 24-24 घंटे लगातार कार्य लिया जा रहा है। रेलवे को संचालित करने में ट्राफिक स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है उसकी अत्यधिक कमी है। रेलवे की संरक्षा नहीं की जा रही है जिससे आये-दिन सिग्नल आदि फ़ेल हो जाते हैं।
रेल मंत्री ममता बनर्जी के पास रेल विभाग के कार्य को देखने के लिए समय नहीं है। उनका सारा ध्यान अपने गृह प्रदेश पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार को हटाने में लगा रहता है। केंद्र सरकार राजनीतिक रूप से मजबूरियों की सरकार है। वह ममता बनर्जी को रेल मंत्री पद से हटा भी नहीं सकता है। ममता बनर्जी के क्रियाकलापों से यह महसूस होता है कि वह रेलमंत्री की बजाए यात्रियों के लिए यमराज मंत्री हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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