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Archive for अक्टूबर 5th, 2010


एक रिर्पोट देख कर सांसदों के बारे में मुझे अपनी पहले की धारण को लगता है परिवर्तित करना पड़ेगा। पहले हम ही क्या, सभी यह विचार करते होंगे कि सांसद बड़ा बवाली, बहुत उत्तेजक, हंगामें बाज़ नारेबाज़, कुर्सियाँ, माइक भंजक, फ़ाइले फाड़ने वाला, राष्ट्रपति को अभिभाषण न पढ़ने देने वाला, काग़ज के गोले फेकने वाला, ‘वेल‘ मे जाकर अक्खाड़े बाज़ी करने वाला होता है। अब मालूम हुआ कि इनमें से 35 फ़ीसदी शन्ति स्वभाव के हैं। बेचारे कुछ बोलते ही नहीं, न कबूतर बाज़ हैं, न ही प्रश्न पूछने के लिए रक़म पैदा करते हैं। वोट देने के लिए ‘बिकते‘ हैं या नहीं? यह नहीं कह सकता। सरकार बनाने या गिराने के मौक़ों पर यह ‘चांस‘ मिलता है।
स्वतंत्र संस्था पी0आर0एस0 लेजिस्लेटिव रिर्सच नें हाल ही में ख़त्म हुए मानसून सत्र की समीक्षा की, इसके मुताबिक, दोनो सदनों में ‘शान्त‘ बैठे रहने वाले सदस्यों की संख्या औसतन 35 फ़ीसदी है। मुद्दे उठाना, सवाल पूछना तो दूर की बात हैं, किसी चर्चा-परिचर्चा में भी यह हिस्सा नहीं लेते एक मतदाता यह सोचकर इन्हें भेजता है कि सांसद जी वहाँ जाकर क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान कराएँगे, मगर यहाँ आकर बस यह मूक-दर्शक बन जाते हैं, अगर बोलते भी हैं तो अपने वेतन-भत्ते बढ़वाने के मुद्दे पर। लगता है कि इन पर ‘परमानन्द माधवम‘ की कृपा भी नहीं होती, जिस से ‘मूकम् करोति वाचालम‘ वाली स्थिति वैदा हो जाती।
अब मैं एक बात और सोचता हूँ, इस आदत में अच्छे पहलू भी हैं- पुरानी मसल है कि “TALK IS SILVER BUT SILENCE IS GOLD” इस हिसाब से तो यह ‘सेाने‘ वाले हुए। रिर्पोट ने यह नहीं बताया कि यह ‘सोने‘ के कितने माहिर हैं।
यहाँ पर ‘हाली‘ का एक शेर याद आ गया, इसमें ‘वाक़याते दह्र‘ का अर्थ ‘दुनिया की घटनायें‘, और ‘गोयाई‘ का अर्थ है बोलने की आदत-

कर दिया चुप वाक़्याते-दह्र नें,
भी कभी हम में भी गोयाई बहुत।

अब देखना ये पड़ेगा कि यह सांसद चुप क्यों रहते हैं? क्या पहले कभी बोलते भी थे? या जब से चुने गये तब से अब तक इनकी यही स्थिति बनी रही? इस मामले में एक मध्य मार्ग भी है, वह यह कि जो ज़्यादा बोलते है, कम बोलें जो नहीं बोलते हैं, वह कुछ बोलें ज़रुर। हिन्दी कवि नें यही सीख दी है-

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

डा. एस.एम. हैदर
लो क सं घ र्ष !

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पूरे मामले में राज्य सरकार अपने कर्तव्यों को निभाने में कितनी कमजोर रही इसका आकलन इस बात से कर सकते हैं कि 21 अप्रैल को घटना होती है और 27 अप्रैल को मुख्यमंत्री हुड्डा मिर्चपुर गाँव का दौरा करने का वक्त निकाल पाते हैं। जबकि कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित को एकजुट करने के अभियान में जुटे राहुल गाँधी 29 अप्रैल को मिर्चपुर गाँव के दौर पर पहुँचते हैं। राहुल गाँधी के प्रस्तावित दौरे के मद्देनजर ही मुख्यमंत्री हुड्डा ने मिर्चपुर गाँव का दौरा कर तमाम भारी भरकम घोषणाएँ कर डालीं, ताकि स्थिति को सुधारते हुए राहुल गांधी के समक्ष अच्छी तस्वीर पेश की जा सके। मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली से साफ है कि वे आला कमान और खाप पंचायतों के दबाव में अपने फैसले कर रहे हैं, नहीं तो इस बात की वजह नहीं बनती है कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा खाप पंचायतों को सामाजिक संस्था करार देते हुए,उन्हें जायज ठहराते, जबकि खाप पंचायतों के फैसले बड़े पैमाने पर कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर रहे हैं।
मिर्चपुर घटना के बाद दलित अधिकारों से जुड़े संगठनों ने 20 मई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और एक स्वर में खाप पंचायतों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उस पर प्रतिबंध लगाने की माँग की। गौरतलब है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें कभी झूठी शान और इज्जत के नाम पर प्रेमी युवक-युवतियों की हत्या का फरमान जारी करती हैं, तो कभी गोत्र विवाद दिखाकर पति-पत्नी को भाई-बहन बनाने का हुक्म देने के चलते चर्चा में रहती हैं। यही नहीं दलितों के सामूहिक उत्पीड़न के मामले में खाप पंचायतें अहम किरदार के रूप में दिखाई देती हैं। खाप पंचायतों का निर्णायक और असरदार भूमिका में होना लोकतांत्रिक राजनीति की विफलता के सिवाय कुछ नहीं है। अफसोस की बात तो यह है कि गोत्र विवाद के मुद्दे पर राजनेता खाप पंचायतों के पक्ष में बयानबाजी करते हुए पाए गए। जिसे भारतीय लोकतंत्र की मर्यादाओं के लिहाज से शर्मनाक ही कहा जाएगा।
दलितों का उत्पीड़न जारी है। इसमें आजादी के बाद का लंबा समय बीतने के बाद से कोई खास बदलाव नहीं आया है। क्योंकि बदलाव की सियासत को अवसरवादिता और वोट बैंक की राजनीति ने हड़प लिया है। दलित उत्पीड़न के ताजा मामलों में एक खास प्रवृत्ति देखी जा रही है। जिसके तहत उन दलितों को निशाना बनाया जा रहा है, जो आर्थिक रूप से मजबूत होने की प्रक्रिया में हैं। हरियाणा का मिर्चपुर गाँव भी ऐसा है, जहाँ गाँव के बाल्मीकि परिवारों ने अपने पुराने पेशे को छोड़ दिया है। बाल्मीकि परिवारों के बच्चे पढ़ाई लिखाई कर रहे हैं। जिस लड़की की मौत हुई है, वह विकलांग होने के बावजूद संघर्ष के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए थी। कहने का मतलब साफ है कि एक वर्ग जो कल तक सामंती शोषण का शिकार रहा है, सिर उठाकर जीने की कोशिश कर रहा था, यही बात गाँव के दबंगों को नापसंद थी। मिर्चपुर हमले में जो बातें सामने आईं उसमें घरों में रखी पानी की टंकियों को तोड़ दिया गया या उन्हें तालाब में फेंक दिया गया, घर के कीमती सामानों जैसे फ्रिज, कूलर, टीवी और मोटरसाइकिल आदि साधनों को आग के हवाले कर दिया गया। आगजनी के पीछे का संघर्ष केवल प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित हमला था जो बाल्मीकि परिवारों की आर्थिक बहाली के उपायों पर चोट करने के लिए किया गया था। हरियाणा में दलित उत्पीड़न यह बताने के लिए काफी हैं कि वहाँ पर कानून-व्यवस्था खाप पंचायतों के पक्ष में खड़ी है। कुल मिलाकर आजादी के बाद हरियाणा में बन रहे हालात न केवल दलितों के उत्पीड़न के लिहाज से बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की मजबूती के लिहाज से चिंताजनक हैं, क्योंकि देश का संविधान सभी को अवसर और रोजगार के चयन की स्वतंत्रता के साथ जीवन की सुरक्षा की गारंटी देता है। बावजूद इसके राजनीति और इससे निर्देशित सरकारें जनता के
संवैधानिक हितों की रक्षा कर पाने में विफल हो रही हैं।

-ऋषि कुमार सिंह
संपर्कः 09313129941
लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित

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