Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for दिसम्बर, 2010



भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय में स्थित शिव पार्वती मंदिर को इन्ही लोगो ने तोड़ डाला। मंदिर और हिन्दू धर्म के ठेकेदार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके अनुवांशिक संगठन भाजपा ने शिव पार्वती मंदिर को तोड़ कर वहां पर मीडिया सेंटर बनाने जा रहे हैं। यदि यही हरकत किसी अन्य ने की होती तो अब तक यह संघी गला फाड़-फाड़ कर हल्ला गुल मचा रहे होते इनके चाटुकार पत्रकार बड़े-बड़े आलेख लिख रहे होते। समाचार चैनलों पर हिन्दुवों को उकसाने के लिए इनके नेता विलाप कर रहे होते। अगर कहीं अल्पसंख्यक समुदाय की हवा इधर आ गयी होती तो यह अफगानिस्तान से लेकर मिश्र होते हुए पकिस्तान बंगलादेश तक तलवार भांज रहे होते लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने 30000 मंदिर गुजरात में तुडवाये तो आर एस एस का हिन्दुवत्व नरेंद्र मोदी का यशोगान कर रहा था।
महात्मा गाँधी की हत्या के बाद मानववादी समाजवाद के प्रणेता पंडित श्री दीन दयाल उपाध्याय की हत्या भी इन्ही संघियों ने की थी। अजमेर शरीफ बमकांड के अभियुक्त सुनील जोशी की भी हत्या अब इन्ही संघियों ने कर दी है। सुनील जोशी के पकडे जाने से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आतंकवादी स्वरूप का पर्दाफाश हो जाता और असली चेहरा जनता के सामने आ जाता। अपने आतंकवादी स्वरूप को छिपाने के लिए संघ के लोग सुनील जोशी की हत्या करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई । कंधमाल गुजरात के नरसंहारों से लेकर सिख नरसंहार तक इन हिन्दुवत्व वादी शक्तियों का चेहरा नरपिशाच जैसा हो गया है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »



लोकतांत्रिक देशों में लिंगभेद के आधार पर कोई फैसला नहीं होता है लेकिन वास्तव में अधिकांश फैसले पुरुषवादी मानसिकता के तहत होते हैं। भारत में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती, पार्वती जैसे विश्लेषण से विभूषित किया जाता है लेकिन सच यह भी है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों की बुरी दशा है और एक बड़ी संख्या में स्त्रियों को देह व्यापार जैसे कार्यों में जबरदस्ती लगाया गया है। स्त्रियों की दुर्दशा का अभी महत्वपूर्ण मामला बिहार में देखने को आया है। 2005 में राष्ट्रीय जनता दल से विधायक चुनी गयी बीमा भारती को उनके पति अवधेश मंडल ने बुरी तरह मारा पीटा की उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है। घटना के समय विधायक के अंगरक्षक तमाशा देखते रहे। इस समय भी बीमा भारती सत्तारूढ़ दल जनता दल (यू) की विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार उनका हाल-चाल लेने के लिए अस्पताल भी गए।
अपने देश में महिलाओं के आरक्षण के तहत जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर सदस्य ग्राम पंचायत तक महिलाएं निर्वाचित होकर पदासीन होती हैं वहीँ संसद तथा विधान सभाओं में निर्वाचित होकर मंत्री बनती हैं। देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं। इन में कितनी निर्वाचित महिलाओं की पिटाई आये दिन उनके पति करते होंगे और वह बेचारी समाज में अपनी पदीय विवशता के कारण अपनी बात को भी नहीं कह सकती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा दीक्षा इस तरह से निर्धारित कि जाए की उस में लिंग भेद समाप्त हो अन्यथा हम आप नारे लगते रहेंगे और महिलाओं कि दशा में कोई सुधार नहीं होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »


सत्तारूढ़ दल के लठैत

यूपी पुलिस के दामन में दाग ही दाग हैं। आम तौर पर उसकी छवि जनता के खिलाफ बर्बर गिरोह के रूप में उभरती है, जिसे वर्दी की आड़ में कुछ भी करने की आजादी है। भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की साथ गाँठ चलती रहती है। सत्ता के इशारे पर खाकी वर्दी कुछ भी करने को तैयार रहती है।
-जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1967 में की गयी टिप्पणी)

भारत में राजा महाराजाओं के पास शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुश्तैनी व परंपरागत लठैत होते थे जो राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कार्य करते थे। वह लठैत लोग कभी-कभी डकैती, बलात्कार, आगजनी जैसे अपराध भी करते रहते थे। ये लठैत लोग लौकी, तुरोई से लेकर बहुमूल्य चीजें नागरिकों से जबरदस्ती छीन लेते थे। नागरिक उनके खिलाफ कुछ कर नहीं पाते थे। कभी कभी लठैत और उनके सरदार राजा की भी संपत्तियों में भी सेंधमारी कर लेते थे लेकिन राजा द्वारा उसकी अनदेखी कर दी जाती थी। उसी तर्ज पर गाँव देहात में आज भी भारतीय पुलिस व्यवस्था काम कर रही है और राज्य उसके कुकृत्यों की अनदेखी कर रहा है। आज किसी की हत्या करानी हो तो एनकाउन्टर विशेषज्ञ से मिल लीजिये ट्रांस्पेरेंसी इन्टरनेशनल के सर्वे के अनुसार भारतीय पुलिस 214 करोड़ रुपये जनता से अवैध वसूली करती है। उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती घोटाला, फायर ब्रिगेड में पम्प घोटाला सहित अनेकों घोटाले पुलिस के उच्चाधिकारियों ने किये किन्तु कोई दंडात्मक कार्यवाई उनके खिलाफ अभी तक संभव नहीं हो पायी है।
पुलिस का वर्तमान समय में प्रमुख कार्य यह है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं को हर संभव तरीके से खुश रखो और मनचाहे तरीके से नागरिकों को लूटो, कोई कार्यवाई नहीं हो सकती है। न्याय, संविधान, विधि का शासन सब खोखले नारे हैं। जिला पंचायत के चुनाव में पुलिस विभाग के अधिकारियों ने जिस तरह जिला पंचायत सदस्यों को डरा, धमका कर, बाद में देख लेने की धमकी देकर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने में अहम् भूमिका अदा की है और अब ब्लाक प्रमुख पद पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने के लिए पुलिस अधिकारी स्टार प्रचारकों की भूमिका में नजर आ रहे हैं। बाराबंकी जनपद के रामनगर ब्लाक में अनुसूचित जाति की क्षेत्र पंचायत सदस्य श्रीमती रामदुलारी के लड़के योगेश का अपहरण सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी संजय तिवारी ने कर लिया था लेकिन पुलिस प्रशासन ने कोई कार्यवाई न करके संजय तिवारी के हौसलों को और बुलंद किया और स्थानीय पुलिस अधिकारी उनके चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि पुलिसिया लठैतों के काले कारनामो से नागरिको को बचाने के लिए एक अलग व्यवस्था कायम करने की है जिससे वर्दी पहने अपराधियों को दण्डित कराया जा सके।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »


न हम संसद हैं और न ही हम लोकतंत्र का स्वांग भरते हैं

भारत में अधिकांश राजनीतिक दल के नेतागण मजदूर और किसान के लिए हैरान व परेशान रहते हैं, उनके सारे वक्तव्य मजदूर और किसानो की उन्नति के लिए होते हैं। इन राजनीतिक दलों दवारा उनके कल्याण के लिए नए-नए नियम बनाये जाते हैं। जिसका प्रभाव ये पड़ा है कि मजदूर और किसान भूख से व्याकुल होकर आत्महत्याएं कर लेता है वहीँ दूसरी ओर पूंजीपतियों के कल्याण के लिए कोई भी राजनीतिक दल खुल कर उनके समर्थन में कानून बनाने की बात नहीं करता है। पर 1947 में अगर कोई पूँजीपति का व्यवसाय 100 करोड़ रुपये का था तो उसके व्यवसाय में करोड़ गुना तक की वृद्धि हुई है।
संसद के अन्दर उद्योगिक घरानों से लाभ लेने वाले सांसद गण हमेशा उनके पक्ष में विधि के निर्माण कार्य करते हैं जिसके एवज में उद्योगिक घराने हजारो हजार करोड़ रुपये अपने उनके राजनीतिक दलों को देते हैं जो चुनाव के समय मतदातों को लुभाने में खर्च किये जाते हैं। सामान्य दिनों में बड़े नेताओं की सभाओं का सारा खर्च उद्योगिक घराने ही उठाते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को ओबलाइज करने के लिए भी पैसा उद्योगिक घराने ही उपलब्ध करते हैं। बड़े नेताओं के रहने खाने से लेकर सभी प्रकार का खर्च भी उद्योगिक घराने उठाते हैं। सांसद और विधान सभाओं में उनके द्वारा वित्त पोषित सदस्य उनके हितों के अनुरूप कार्य करते हैं। अब तो सदस्य विधान परिषद् से लेकर जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में भी राजनीतिक दल हजारो करोड़ रुपये मतदाताओं को खरीदने के लिए देते हैं।
कहने के लिए लोकतंत्र है। संसद जनता द्वारा चुनी गयी है, लेकिन यह सत्य नहीं है यहाँ तो उद्योगिक घरानों के लोग नए तरह मुखौटे लगाये हुए बैठे हैं, जो इस देश के मजदूर, किसान की श्रमशक्ति को कैसे छीना जाए उसके लिए विधि का निर्माण करते हैं। छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा, बिहार, महाराष्ट्र, मणिपुर तक की प्राकृतिक संपदाओं को कैसे उद्योगिक घराने को सौंप दिया जाए उसके लिए प्रयास करते हैं। वहां के मूल निवासियों का सब कुछ छीन कर इन उद्योगिक कंपनियों के साम्राज्य में वृद्धि करने के लिए भी तरह-तरह के कानून बनाये जाते हैं। संसद हो या लोकतंत्र सब उद्योगिक घरानों की कठपुतलियाँ हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »



हरदीप पूरी मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारीयों के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
अभी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अभी हाल में अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।
हमारे देश का इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया ऐसी घटनाओ पर ख़ामोशी अख्तियार कर लेता है लेकिन अगर यही हरकत चीन या किसी एशियाई मुल्क में हुई होती तो पूरे देश में उस देश के खिलाफ प्रचार अभियान चल रहा होता। आखिर इस चुप्पी का राज क्या है ?

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »



एयरलाईन खोलने के लिए मुझसे रिश्वत मांगी गयी। मेरे एक मित्र ने कहा कि इस व्यवसाय में आना चाहते हो तो दे दो 15 करोड़ की रिश्वत। लेकिन मैंने उन्हें मना करते हुए कहा कि अगर मैं रिश्वत दे दूंगा, तो मुझे नींद नहीं आएगी।

– रतन टाटा ( चेयरमैन, टाटा संस )

टाटा जी का पूरा साम्राज्य घूस देने पर ही टिका हुआ है तमाम टैक्सों की चोरी से लेकर नौकरशाही को उपहार देकर भ्रष्ट बनाने का कार्य आपका आर्थिक साम्राज्य करता है। अमेरिका की ओबामा की पार्टी से लेकर भारत में कांग्रेस भाजपा तक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से चंदा रूपी आप घूस देते हैं और उसी घूस के तहत तमाम सारे अपराधों से मुक्ति पाते हैं। यदि ईमानदारी से विभिन्न मामलों की जांच करा ली जाये तो आप पर हजारो आर्थिक मुकदमें होंगे। जिसमें कई जन्मो की सजा हो सकती है लेकिन तुलसीदास जी लिख गए हैं – समरत को नहि दोष गोसाईं॥

यह सच है कि व्यावसायिक कम्पनियां रिश्वत देकर अपना काम करवा रही हैं। लेकिन उन्हें काम करवाने के लिए रिश्वत नहीं देनी चाहिए। आम आदमी की तुलना में उनके लिए यह ज्यादा आसान होगा।
-राहुल बजाज ( सांसद एवं चेयरमैन, बजाज ग्रुप)

भ्रष्टाचारियों का उपदेश है यह आप के आर्थिक साम्राज्य को किसी समय में कांग्रेस का भरपूर समर्थन प्राप्त था। बीच में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का भी अपूर्व समर्थन प्राप्त था जिसके कारण नियमो उपनियमो की धज्जियां उड़ा कर साम्राज्य खड़ा हुआ है। कौन सा कार्य आप के आर्थिक साम्राज्य में नहीं होता है।

देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है। देश से यह दूर हो जाएगा तो सारी समस्याएं हल हो जायेंगी। भ्रष्टाचार राजनितिक समस्या है न की सामाजिक समस्या ।
-बाबा रामदेव ( योग गुरु व पतंजलि के संस्थापक )

यह भ्रष्टाचारी उवाच है आप आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माता व व्यापारी हैं। दवाओं में मानव हड्डियों का इस्तेमाल करते थे। बवाल होने पर बड़ी सफाई दी। उस समय इनके द्वारा उत्पादित दवाओं में लेबेल के ऊपर उसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री का वर्णन नहीं होता था। इनका औषधि व्यापार भ्रष्टाचार रहित है यह बात उसी तरीके से सत्य है जिस तरीके से रात को सूरज निकला था।
वर्तमान समय में भारत के ये तीन बड़े झूठ हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »


साहित्य जगत के नामचीन कवि, कथाकार विनोद दास मुम्बई से, प्रखर समीक्षक व कथाशिल्पी विनयदास की अयोध्या मुद्दा बनाम राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण पर एक बेबाक बातचीत-
युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, केदारनाथ अग्रवाल सम्मान जैसे अनेकशः पुरस्कारों से सम्मानित कवि विनोद दास ‘खिलाफ हवा से गुजरते हुए,’ ‘वर्णमाला से बाहर,’ ‘कविता का वैभव’ (समीक्षा) ‘भारतीय सिनेमा का अन्तःकरण,’ ‘बतरस’ (इन्टरव्यू) जैसी पुस्तकों के रचयिता हैं। उनकी काव्य चेतना पर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लघुशोध तथा उनकी फिल्म पुस्तक पर नागपुर यूनिवर्सिटी से लघु शोध प्रबन्ध भी हो चुके हैं।
विनयदास-साठ वर्षों के लम्बे अन्तराल से अयोध्या मन्दिर-मस्जिद मुद्दे पर उच्च न्यायालय के 30 सितम्बर 2010 के फैसले को किस हद तक कानूनी माना जा सकता है क्योंकि फैसले का मुख्य आधार आस्था है? इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
विनोददास-जहाँ तक मुझे लगता है यह एक राजनैतिक फैसला है। इस फैसले में न्याय की जो बुनियादी संरचना है उसका पालन नहीं हुआ है, क्योंकि यह फैसला आस्था के आधार पर दिया गया है न कि दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि यहाँ पर रामलला मंदिर के कोई पोख्ता प्रमाण भी नहीं मिले हैं।
विनयदास-अभी तक मुसलमानों का कहना था, हमें न्यायालय का फैसला मान्य होगा। किन्तु फैसला आने के बाद वे इसे मानने से अब मुकर रहे हैं। इस सन्दर्भ में आपकी क्या राय है?
विनोददास-मुसलमान कहाँ मुकरे हैं। इस फैसले के बाद उन्होंने अद्भुत धैर्य का परिचय दिया है। फिर इसे अभी एक कोर्ट ने कहा है। यह फैसला उन्हें न्याय के आधार पर नहीं लगता है। इसके लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खुला है। विश्वास है शायद उन्हें वहाँ न्याय मिल सके। उन्हें इस फैसले के विरोध में आगे जाना ही चाहिए।
विनयदास- न्यायिक प्रक्रिया और आस्था में आप कैसा और कितना सम्बन्ध देखते हैं?
विनोददास- जाहिर है आस्था मनुष्य की एक निजी सोच है, निजी व्यवस्था है, जबकि कानून एक सामाजिक व्यवस्था है। हर नागरिक की अलग-अलग आस्थाएँ हैं। मेरी समझ से आस्था का प्रश्न वैयक्तिक है जबकि कानून सामाजिक समानता, सामाजिक समरसता के सिद्धान्त पर बना है। अतः मैं न्याय के पक्ष में हूँ न कि आस्था के।
विनयदास- अयोध्या मन्दिर मस्जिद के फैसले पर कम्युनिस्ट ज्यादातर चुप रहे। क्या वे इस फैसले से असन्तुष्ट और इस मुद्दे को न हल होने देने के पक्ष में है।
विनोददास- कम्युनिस्ट चुप कहाँ हंै? फिर कम्युनिस्ट से आपका आशय क्या है? इसका विरोध कमोबेश सभी कम्युनिस्टों ने किया है। वे इस फैसले के स्थाई समाधान में विश्वास रखते हैं न कि इसके अस्थाई और तात्कालिक समाधान में। वे इसे नासूर नहीं बनने देना चाहते हैं। हो सकता है एक पक्ष जो अभी आपको शान्त दिखाई देता है आगे चलकर वह बम-सा विस्फोट कर जाए। जिससे पूरे समाज में अशान्ति फैल जाए।
विनयदास- सुन्नी वक्फ बोर्ड इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाना चाहता है। यदि वह उच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार नहीं कर सका, तो क्या वह उच्चतम न्यायालय के निर्णय को, जो इसी से मिलता-जुलता हुआ तो क्या वह उसे स्वीकार कर लेगा।
विनोददास- अगर वे ऐसा कर रहें हैं तो बुरा क्या कर रहे है? अगर वे ऐसा कह रहे है तो हमें उन पर विश्वास करना चाहिए।
विनयदास- मन्दिर स्थल की खुदाई में जो ध्वंसावशेष मिले हैं उसे पुरातत्व विदों ने जाँच के बाद मन्दिर के पक्ष के अवशेष बताए हैं फिर मस्जिद का सवाल ही कहाँ?
विनोददास- मेरी समझ में जो पुरातात्विक अवशेष मिले हैं वे मन्दिर के पक्ष में नहीं हैं। यदि वहाँ मन्दिर होता तो हड्डियाँ न मिलतीं और वहाँ पर कब्रें न मिलतीं। इससे लगता है वहाँ मन्दिर नहीं था।
विनयदास- विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल, आदि विभिन्न हिन्दू संगठन भी इस फैसले पर मुसलमानों के असन्तोषजनक प्रतिक्रिया स्वरूप अब असन्तोष व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं राम मन्दिर-अयोध्या प्रकरण को हम शाहबानो फैसले की तर्ज पर पार्लियामेन्ट में ले जाएँगे। जब पार्लियामेन्ट उनके लिए कानून बदल सकती है, संशोधित कर सकती है तो हमारे लिए क्यों नहीं?
विनोददास- पार्लियामेन्ट कानून बना सकती है। जिसके आधार पर फैसला लिया जा सकता है। मगर वह फैसला दे नहीं सकती फैसला अन्ततः न्यायालय को ही करना होगा। जो लोग ऐसा कह रहे हैं उन्हें कानून के प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। अशोक सिंघल आई0पी0एस0 रह चुके हैं जब वे ऐसी बात कह रहे हैं तो इसे हमारे देश का दुर्भाग्य ही समझें।
विनयदास- क्या आपको नहीं लगता कि न्यायालय का फैसला न्याय की प्रक्रिया से कम और सामाजिक समरसता के सिद्धान्त से अधिक प्रेरित है। इस कारण से देश में एक बड़ा तूफान आने से बच गया।
विनोददास- आपकी बात बिल्कुल ठीक है। इस दृष्टि से देखें तो यह फैसला एक हद तक संतोषजनक कहा जा सकता है। इसमें सभी को सन्तुष्ट करने की कोशिश की गई है। इसमें सामाजिक समरसता का ध्यान रखा गया है मगर कानूनी प्रक्रिया का नहीं।

-विनयदास
मोबाइल: 09235574885

Read Full Post »


अयोध्या के विवादित पुरास्थल का उत्खनन आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया (ए0एस0आई0) द्वारा 2002-2003 में किया गया। यह उत्खनन लगभग पाँच महीनें में सम्पन्न हो गया।
उत्खनन के लगभग समाप्ति के दिनों में 10 जून से 15 जून 2003 तक तथा दूसरी बार ए0एस0आई0 की अन्तिम रिपोर्ट जमा हो जाने के बाद 27 सितम्बर से 29 सितम्बर 2003 तक धनेश्वर मण्डल, रिटायर्ड प्रोफेसर डिपार्टमेन्ट आफ ऐनशियंट हिस्ट्री, कल्चर एण्ड आर्कियोलाजी, यूनिवर्सिटी आफ इलाहाबाद ने अयोध्या जाकर मामले का बारीकी से अध्ययन एवं स्थलीय निरीक्षण किया तथा तथ्यों को एक पक्ष की तरफ़ से शपथ-पत्र के रूप में 5 दिसम्बर 2005 को न्यायालय के समक्ष दाखिल किया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ए0एस0आई0 की दो जिल्दों की मोटी-मोटी अंतिम उत्खनन रिपोर्ट केवल पन्द्रह दिनों में ही प्रकाशित हो गई।
प्रोफेसर मण्डल के बयान की एक पुस्तिका ‘एक पुरातत्ववेत्ता का हलफनामा-जनता के दरबार में’ के शीर्षक से, मई 2006 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा0) लि0 रानी झाँसी रोड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। इसी के आधार पर संक्षेप में कुछ तथ्य एवं अंश प्रस्तुत हैं-सबसे पहले यह बताते चलंे कि प्रो0 मंडल की टिप्पणियाँ तीन स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं प्रथम-उत्खनित स्थान का व्यक्तिगत सर्वेक्षण, द्वितीय-ए0एस0आई0 द्वारा प्रस्तुत दो जिल्दों की रिपोर्ट, तृतीय-उत्खनन से सम्बंधित डे-टू-डे रजिस्टर।
प्रो0 मंडल ने अपने बयान में ए0एस0आई0 की कार्य-विधि एवं रिपोर्ट पर अत्यन्त गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं, इस सम्बन्ध में यह अंश देखिए:-
‘‘उत्खनन में मान्यता प्राप्त पुरातत्विक विधियों का समुचित उपयोग नहीं हुआ है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि स्तरीकरण, पुरातात्विक, उत्खनन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधि है। इस विधि के अनुसार स्तर अथवा परत को आधार बनाकर उत्खनन किया जाता है न कि गहरान ;क्म्च्ज्भ्द्ध को। गहरान आधारित उत्खनन वस्तुतः पुरातत्विक उत्खनन नहीं अपितु पुरातत्व की दृष्टि से उसका विनाश है’’
वे यह भी लिखते हैं-
‘‘स्तरीकरण एवं कालक्रम से मैं सहमत नहीं हूँ।’’ उनके अनुसार इन दोनों में पहले का महत्व अधिक है, क्योंकि दूसरा, पहले पर निर्भर है। एक अध्याय का उल्लेख करके बताया कि उसमें ‘‘स्तरीकरण से सम्बंधित तथ्यों का नितांत अभाव है। पूरा का पूरा अध्याय कालक्रम के ब्योरे से भरा है, वह भी प्रमाणित तथ्यों पर आधारित नहीं।’’
यह उत्खनन क्षैतिज है, इसमें 5-5 मीटर की 90 ‘‘ट्रेंच’’ खोदी गईं। ट्रेंच जी-7 के बारे में प्रोफेसर साहब लिखते हैं कि यह ‘‘पुरास्थल की पूरी कहानी कहता है। यह एक खुली किताब है। इसका हर परत किताब के पन्नों की तरह है। जो पढ़ सके पढ़ ले।’’
ए0एस0आई0 की रिपोर्ट ने 18 परतों के जमाव को पुरातत्विक जमाव माना है परन्तु प्रो0 मंडल इसे दो कोटि में विभाजित करके दूसरे जमाव को प्राकृतिक जमाव मानते हैं, और इसे भी दो भागों बसावटी एवं गैर बसावटी में विभाजित करते हैं, फिर बताते हैं कि लम्बे अर्से तक जगह वीरान रही, फिर बाढ़ से कुछ परतंे बनीं तत्पश्चात आबादी हुई। जगह को ऊँचा करते रहने के भी प्रमाण मिले। श्री बी0बी0 लाल द्वारा खुदाई के हवाले से बताते हैं कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहा है जिसकी सुरक्षा में ‘फोर्टीफिकेशन वाल’ का भी अवशेष मिला था। प्रो0 मंडल का यह कहना है-‘‘संभावना है कि बाढ़ प्रकोप से सुरक्षा प्रदान करने हेतु ही इस स्थल को बार-बार ऊँचा करने की आवश्यकता पड़ी। इस घटनाक्रम में एक समय ऐसा भी आया कि बाढ़ के कारण यहाँ के लोगो को बाध्य होकर एक लम्बे समय के लिए यह स्थान ही त्याग देना पड़ा।’’
कालक्रम के सम्बन्ध में प्रो0 मंडल ने बताया कि ए0एस0आई0 ने अपनी रिपोर्ट में 18परतों के जमाव को नौ कालों में इस प्रकार विभाजित किया है-
NBPW, SUNGA, KUSHANA, GUPTA, POST GUPTA RAJPUT, EARLY MEDIEVAL SULTANATE, MEDIEVAL, MUGHAL rFkk LATE & POST MUGHAL कालक्रम की इस निरंतरता से प्रो0 मंडल सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार- ‘‘चार कालों के पश्चात यह पुरास्थल एक लम्बे समय के लिए वीरान हो गया। कालों की निरंतरता भंग हुई। इस सम्बन्ध में सांस्कृतिक अन्तराल का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध है।’’ चैथे अर्थात गुप्त काल में (4-6 शताब्दी ए0डी0) दो बार बाढ़ आई, दूसरी बाढ़ के बाद यह स्थान लम्बे समय तक त्याग दिया गया। इस बाढ़ जमाव के ऊपर-‘‘जिस संस्कृति के अवशेष मिलते हैं, वे इस्लामिक काल के हैं। ह्युमस जमाव के ऊपर के परतों से गलेज्ड वेयर, ग्लेज्ड टाइल्स, जानवरों की हड्डियाँ तथा चूना एवं सुर्खी से निर्मित फर्शों के अवशेष का मिलना इस तथ्य के अकाट्य प्रमाण हंै।’’
गुप्तकाल के बाद ही, जमाव के ऊपर तेरहवीं सदी (अर्थात सल्तनत काल) के साक्ष्य मिले हैं। अतः 9 के बजाय पूरे जमाव को 5 कालों में ही विभक्त किया जाना चाहिए अर्थात गुप्तकाल के बाद एक लम्बा अन्तराल, फिर इस्लामिक काल। यहाँ मुग़लकाल का आरम्भ, बाबरी मस्जिद निर्माण के साथ होता है।
पुरास्थल के पश्चिमी किनारे पर उत्तर दक्षिण दिशा मुखी 50 मीटर लम्बी, अकेली दीवार नं0 16 है। इसमें ताकों के भी अवशेष हैं, यहाँ-‘‘तीन ताकों के शीर्ष मेहराबदार होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती।’’ (पृष्ठ-25)
‘‘इस अकेली दीवार में, संभवतः मेहराबदार ताको़ं का सम्बद्ध होना स्पष्ट रूप से ईदगाह की ओर संकेत करते हैं। (पृष्ठ-26)
स्तम्भों तथा दीवार आदि पर अनेक पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर विस्तृत बहस के निष्कर्ष के रूप में प्रो0 मंडल का यह कथन महत्वपूर्ण है-
‘‘साक्ष्यों के आलोक में यहाँ मंदिर की परिकल्पना निश्चित रूप से निराधार प्रमाणित होती है।‘‘ (पृष्ठ-25)
यह भी बताया कि खुदाई के अनेक साक्ष्य छुपाए गए। डे-टू-डे रजिस्टर में प्रविष्टियाँ एक माह बाद क्यों की गई?
अभी तक जो चर्चा हुई वह प्रो0 मंडल के हलफनामे की प्रकाशित 46 पृष्ठ की पुस्तिका पर आधारित है। अब अलग से यह बात भी बताने योग्य है कि खुदाई के समय केन्द्र में एन0डी0ए0/भाजपा सरकार थी तथा ए0एस0आई0 जिस केन्द्रीय मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है, उसके मंत्री श्री जगमोहन थे।

विजय प्रताप सिंह (एडवोकेट)
मोबाइल- 09415461192

Read Full Post »


हमें भी इन्साफ चाहिए

उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने माननीय उच्चतम न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर कर हाईकोर्ट के प्रति सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। प्रदेश की सबसे बड़ी अदालत के प्रति माननीय उच्चतम न्यायलय ने कई भ्रष्टाचार से सम्बंधित कई अहम् टिप्पणियां की थी। जिसमें यह कहा गया था कि न्यायधीशों के बेटे वहीँ वकालत कर करोडो रुपये की परिसंपत्तियां बना रहे हैं, वहां कुछ सड़ने की बू आ रही है। वहीँ इलाहाबाद बार एशोसिएशन ने टिप्पणियों के प्रति अपना अघोषित समर्थन भी व्यक्त किया है। सामान्यत: कहीं न कहीं पारदर्शिता न होने के कारण भ्रष्टाचार की बू आम जन भी महसूस करते हैं। वकालत के व्यवसाय में ज्ञान व तर्क दूर कर चेहरा देख कर फैसला करने के मामले अक्सर देखे जाते हैं।
ज्ञातव्य है कि बहराइच जनपद के एक मामले में उच्च न्यायलय इलाहाबाद ने क्षेत्राधिकार न होने के बाद भी अंतरिम आदेश पारित कर दिए थे जिसको उच्च न्यायलय इलाहाबाद की खंडपीठ लखनऊ ने आदेश को स्थगित कर दिया था। उसके विरुद्ध रजा नाम के व्यक्ति ने माननीय उच्चतम न्यायलय में एस.एल.पी दाखिल की थी। जिसपर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में गंभीर टिप्पणिया की थी।
जिस भी देश में आम जनता न्याय पाने में असमर्थ रहती है वहां पर अव्यवस्था का दौर प्रारंभ होता है। इस समय देश में आम जन अपने को न्याय पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है। इसलिए अव्यवस्था का दौर जारी है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति व महाभियोग दोनों जटिल प्रक्रियाएं हैं। पंच परमेश्वर की कुर्सी पर बैठ कर उनके सम्बन्ध में भ्रष्टाचार की शिकायत आना ही शर्मनाक है लेकिन आये दिन परस्पर विरोधी निर्णय न्याय की गरिमा को बढ़ा नहीं रहे हैं। समीक्षा याचिका प्रदेश की सबसे बड़ी न्यायालय ने किया है लेकिन जरूरत इस बात की थी कि समीक्षा याचिका दाखिल करने से पूर्व बहुत सारी चीजों को चुस्त दुरुस्त कर दिया जाता तो शायद टिप्पणियां स्वयं ही प्रभावहीन हो जातीं। अभी तक नारा था न्याय चला निर्धन से मिलने शायद अब यह नारा हो जाए न्याय चला अब न्याय मांगने।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »


सुश्री नीरा यादव कारगार में

उत्तर प्रदेश में फायर ब्रिगेड में पम्प घोटाला, पुस्तक घोटाला, पुलिस भर्ती घोटाला, खाद्यान्न घोटाला सहित हजारों चर्चित घोटाले हैं जिसकी जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन या पुलिस विभाग की अन्य एजेंसियां करती हैं। कुछ दिनों तक अखबारों की सुर्ख़ियों में घोटाले चर्चित रहते हैं और उसके बाद घोटालों की फाइलें आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति के अभाव में अलमारियों में बंद हो जाती हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव अखंड प्रताप सिंह आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल जाना पड़ा वहीँ अब प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव सुश्री नीरा यादव को सी.बी.आई अदालत ने चार साल की सजा सुनाई है। जांच एजेंसी का स्वतन्त्र अस्तित्व न होने के कारण प्रदेश या केंद्र सरकार जांच पूरी होने के बाद भी आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति नहीं देते हैं जिससे जांच में लाखो रुपये खर्च होने के बाद भी परिणाम शून्य ही रहता है यदि शिकायत दर्ज करने वाली एजेंसी स्वतन्त्र हो तो वह जांच उपरांत आरोप पत्र न्यायलय में सीधे दाखिल करे तो भ्रष्ट अधिकारीयों को अपने आर्थिक अपराधों की सजा मिले। हद तो वहां हो जाती है कि सम्बंधित भ्रष्ट अफसर जिसकी जांच एजेंसी के यहाँ विचाराधीन होती है। उसी का वह अधिकारी हो जाता है। इस समय पूरे प्रदेश में खाद्यान्न से लेकर मनरेगा की योजनाओ में घोटाले ही घोटाले हैं और अधिकांश नौकरशाह विकास योजनाओ का धन लूटने में लगे हुए हैं। निर्माण करने वाले विभागों में तो खुले आम विकास का धन हड़प कर लिया जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि आर्थिक अपराधों में लिप्त राजनेता, नौकरशाह व दलाल वर्ग के खिलाफ सकारात्मक कार्यवाई के लिए एक स्वायत्तशासी जांच एजेंसी का गठन किया जाए अन्यथा ये जांच एजेंसियां घोटालों की कब्रगाह ही होंगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »

« Newer Posts - Older Posts »