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Archive for मार्च, 2011


विकीलीक्स के अभिलेख यह रहस्योद्घाटन करते हैं कि यू0एस0 भारतीय हितों के विरुद्ध कार्य करता आ रहा है। सच्चाई यही है कि वह भारत का विश्वसनीय मित्र नहीं है। भारत की वर्तमान सरकार के लिए सतर्क होने का यह उचित समय है। अमरीका के समीप हो जाने से रूस ने हमसे और दूरी बना ली है और चीन अब भारत का विरोधी बन गया है जो हमारे देश के लिए खतरनाक बात है।

मौजूदा समय मंे विकीलीक्स अमरीकी हितों के खि़लाफ़ खतरे की घंटी बन गई है। 77000 अभिलेखों की जो पहली खेप है वह अफ़ग़ानिस्तान मे अमरीका के सैनिक अभियान से संबधित है। यह अभिलेख देखकर लोग आश्चर्य चकित हुए कि अमरीका के नेतृत्व वाली सैन्य शक्तियों ने अफ़ग़ानिस्तान में कितनी क्रूरताएँ कीं। 400,000 अभिलेखों की दूसरी कि़स्त इराक में अमरीकी सेना की मौजूदगी से सबंधित है। इसमें फिर इराकी जनता के साथ अमानवीय व्यवहार की सत्यता सामने आ गई। तीसरी खेप में बहुत अधिक अभिलेख थे। इन वर्गीकृत अमरीकी राजनयिक केबलों द्वारा यह राज़ सामने आया कि विदेशी सरकारों और इनके नेतृत्व करने वालों के विरोध में क्या भ्रष्ट आचरण किए गए? भ्रष्टाचार के इन आरोपों के कारण ये विदेशी सरकारें और राजनीतिज्ञ गम्भीर झंझावतोें में घिर गए। इन स्पष्ट सूचनाओं ने अमरीकी प्रशासन व उसकी विदेश नीति को भी कठिनाइयों में डाल दिया।
इन रिपोर्टों में जो देश और उनके राजनीतिज्ञ सामने आए, वे हैं- रूस, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्य, कुछ दूसरे क्षेत्र जैसे पूर्वी एशिया जिसमें भारत भी शामिल है। यूरोप में तैनात अमरीकी राजनयिकों ने वहाँ से वाशिंगटन को कुछ ऐसी सारगर्मित आरोपों की विस्तृत रिपोर्टें भेजीं जिनसे बड़ी किरकिरी हुई। शुरू में पाकिस्तान के अमरीका से संबंध ही विकीलीक्स के केन्द्र बिन्दु थे, अब भारत-अमरीका संबंध भी इसके अन्तर्गत आ गए। भारत से सबंधित जो अभिलेख विकीलीक्स के हाथ लगे उनमंे केवल भारतीय महानुभावों के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने की बात ही नहीं, बल्कि यह भी ज्ञात हुआ कि भारत की अफ़ग़ानिस्तान, इराक तथा ईरान के संबंध में क्या अन्दुरूनी नीति थी।
विकीलीक्स के अभिलेखांे की खेप में भारत का विश्व में भरोसेमन्द तथा सम्मानित शक्ति होने का चापलूसी पूर्ण नक्शा खींचा गया जो अपने पड़ोसी पाकिस्तान के सताने से परेशान रहता है। इन पंक्तियों के लिखते समय तक विकीलीक्स द्वारा जारी 243 अभिलेखों मंे भारत का संक्षिप्त विवरण दिया गया। इनमें से कोई भी दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास से नहीं आया। (परन्तु विकीलीक्स का कथन है कि उक्त दूतावास से जारी 3000 से
अधिक केबल उसके पास हैंै) मध्य पूर्व के दो केबल इस क्षेत्र में भारत के पक्ष मंे हैं।
अनेक घटनाओं में भारतीय दृष्टिकोण से चार ऐसी हैं जो सनसनी पूर्ण हैं। पहली यह कि बुश प्रशासन की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर इराक में भारतीय सेना भेजने हेतु दबाव डाला गया। जुलाई 2003 मंे सरकार ने इससे इन्कार कर दिया। परन्तु दिल्ली में अनेक आवाजे़ं ऐसी थीं जो अमरीकी अनुरोध को स्वीकार करने पर बल दे रही थीं। भारतीय राजनैतिक नेतृत्व, नौकरशाहों तथा नीति निर्धारण के जो मामले दिल्ली के अमरीकी दूतावास तथा वाशिंगटन बीच के थे, इनसे संबधित राजनयिक केबलों पर भी विकीलीक्स नें अपनी पकड़ बना ली थी।
हेडली जो शिकागो में था या उसकी पत्नी तक पहुँच हेतु चिदम्बरम ने अनुरोध किया हालाँकि इससे कुछ नतीजा नहीं निकला। चिदम्बरम का कहना था कि क्या जी0ओ0आई0 आॅफीसर समय के अन्दर प्रश्नावली के अनुसार पूछताछ कर सकता है? चिदम्बरम का यह भी कहना था कि उनके मन में यह भावना थी कि अकेला हेडली ऐसा नही कर सकता, लेकिन यह भी स्वीकारा कि इस हेतु उनके पास कोई साक्ष्य नहीं था कि यहाँ उसके ‘स्लीपिंग सेल्स’ हैं, सम्भवतः इन्हीं में से 13 फरवरी के पूना बम काण्ड में किसी का हाथ रहा होगा। मालूम ही है कि शिकागो आधारित पाकिस्तानी-अमरीकी डैविड कोलमैन हेडली, 2008 के मुंबई काण्ड में लश्करे तैय्यबा एवं पाकिस्तानी जासूसी एजेंसियों के साथ साजि़श रचकर हमले का आरोपी है।
विकीलीक्स विसिल ब्लोअर वेबसाइट के चैथाई मिलियन अमरीकी दस्तावेज़ों की गुप्त सूचनाओं में से 3038 वे वर्गीकृत केबल हैं जो नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की हैं। ‘लीक’ हुए दस्तावेज़ों के 5087 केबल भारत से संबंधित हैं।
1966 से इस वर्ष के फरवरी तक संसार के देशों के 274 दूतावासों एवं वाशिंगटन के स्टेट डिपार्टमेन्ट के मध्य गुप्त सूचनाओं के आदान प्रदान में 15652 ऐसे गुप्त केबल हैं जो वर्गीकृत हैं। विकीलीक्स द्वारा जारी कूटनीतिक केबलों के अनुसार संसार में फैलाने से पूर्व भारत में जैव-रासायनिक आक्रमण द्वारा भंयकर बीमारियाँ जैसे ‘एन्थ्रेक्स’ के फैला देने का लक्ष्य है।
भारत मंे सामाजिक सद्भावना एवं आर्थिक समृद्धि को बर्बाद करने हेतु आतंकवादी अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अब ‘बायोटेक प्रगति’ का सहारा लेते हुए जैव-रासायनिक अस्त्रों का प्रयोग करके विकराल संहार कर सकते हैं, यह चेतावनी भी इन्हीं केबलों ने दी हैं। 26/11/2008 का जो आक्रमण मुंबई मंे पाकिस्तान स्थित लश्करे तैय्यबा द्वारा हुआ उससे पूर्व एवं बाद दिल्ली के राजनयिकों द्वारा भेजे गए संदेश, इसकी भयावहता एवं भारतीय मुसलमानों का कट्टरता की ओर अग्रसर होने के वर्णन पर केन्द्रित हैं।
एक संदेश आशावादी है- यह कि भारत की 150 मिलियन मुस्लिम आबादी का चरमपंथ के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। यहाँ के जागृत लोकतंत्र, प्रगतिशील अर्थ व्यवस्था तथा समावेशी संस्कृति में मुस्लिमों को मुख्य धारा में शामिल होने तथा उन्नति के रास्तों पर जाने हेतु बल प्रदान किया है तथा अलग-अलग रहने की मानसिकता को कम किया है।
केबल यह भी कहता है- यद्यपि मुस्लिम समाज यहाँ अन्य वर्गों की अपेक्षा उच्च दर की गरीबी से ग्रस्त है तथा भेदभाव का शिकार बन गया है फिर भी बड़ी संख्या में वे भारतीय तंत्र के प्रति वफ़ादार हैं और राजनैतिक एवं आर्थिक मामलांे में भागीदार बन कर मुख्य धारा में रहते हैं। यह भी पता चला है कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के परवर्ती काल में अमरीका व भारत के बीच जो बातचीत का दौर चला वह आसान नहीं था। दिल्ली से भेजे गए 3038 राजनयिक केबलों में विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के भी संदेश थे जो वेबसाइट द्वारा लीक हुए। विकीलीक्स द्वारा जारी चैथाई मिलियन गुप्त अमरीकी अभिलेखों में 5087 भारत से
सबंधित हैं।

केबल के अनुसार अहमदीनेजाद के दौरे के बारे में मेनन ने बताया कि वे हवाई अड्डे पर 16ः30 पर उतरे, भारतीय राष्ट्रपति से जाकर 45 मिनट तक बात की, फिर प्रधानमंत्री के साथ डिनर एवं मीटिंग में सम्मिलित हुए जिसमें मेनन भी थें। इस मीटिंग में मेनन ने भी हालात बताए। फिर अहमदीनेजाद ने ऐसी दुनिया की बात की जो ईरानी दृष्टिकोण से विकसित हुई है और यह ईरान के पक्ष में बढ़ती रहेगी। मेनन ने स्वीकार किया कि ‘‘मैं नहीं जानता था कि अहमदीनेजाद काफ़ी आदर्शवादी हैं’’ मेनन ने यह बात भी नोट की कि वे अमेरिका पर स्पष्ट रूप से आक्रामक नहीं हुए, उन्होंने विचार ज़ाहिर किया कि अमरीका ने ईराक को अस्थिर किया है और वह वहाँ से जल्दी ही हटेगा। जब स्पष्ट करने को कहा गया तो मेनन के अनुसार वे कुछ नर्म पड़े। अफ़ग़ानिस्तान के संबंध में उन्होंने कहा कि वहाँ हामिद करज़ई का कोई विकल्प नहीं है ओर कहा कि काबुल की सरकार को मज़बूत किया जाना चाहिए। ईराक़ में ज़्यादा कानून व्यवस्था पर ज़ोर दिया और मालिकी सरकार को अच्छा बताया। मेनन ने यह भी बताया कि उनकी बातों मे गर्मी और गंध नहीं थी।
मेनन को उनकी आत्म प्रशंसा एवं आत्म संदर्भ का तरीक़ा देखकर थोड़ी घबराहट हुई, मुख्य रूप से उस समय जब तेल मूल्य पर बात हुई और उन्होंने डींग मारने के अंदाज़ में कहा कि ये मूल्य तो ऊँचे बने रहेंगे। अहमदीनेजाद ने चीन सहित दूसरे देशों को सख़्त सुस्त कहा, चीन के बारे में कहा कि उसने अपना तमाम धन अमरीकी डालरों के रूप में रख छोड़ा है, कुछ भी बाक़ी नहीं बचाया। इससे मेनन ने नतीज़ा निकाला कि वे दूसरे देशों से हमारे बारे में भी बुरा बोलते होंगे। मेनन ने यह भी ध्यान दिया कि उन्होंने इस्राईल के बारे में प्रत्यक्ष आक्रामकता नहीं दिखाई। न तो उन्होंने इस्राईली ‘सेटलाइट’ के भारतीय ‘लाँच’ का जिक्र किया, न ही भारत अमरीकी संबंधों का। मेनन का यह आँकलन था कि कुल मिलाकर दिल्ली में वे अपने गृहदेश के लोगों को दिखाने का कार्य कर रहे थे, और वोटरों को यह प्रदर्शित कर रहे थे कि वे दौरे कर के दूसरे देशों से सम्पर्क साधने में सक्ष्म हैं। केबल के अनुसार मेनन ने अमरीका को सतर्क किया कि वह खुले रूप से यह निर्देश न दे कि वह क्या करे क्या नहीं। इस सरकार को ऐसा दिखना चाहिए कि वह स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण कर रही है और अमरीका से निर्देश नहीं लेती।
विकीलीक्स के वेबसाइट के एक और विस्फोटक रहस्योद्घाटन में, जो 2005 मंे एक अमरीकी राजनयिक द्वारा भेजा गया, रेडक्रास को यह कहते हुए दिखाया गया कि कश्मीरी जेलों में बन्द कै़दियों पर ज़ुल्म करने वालों को भारतीय सरकार ने माफ़ कर दिया। एक अन्य केबल में भारत में अमरीकी राजूदत रोमर द्वारा कांग्रेस लीडर राहुल गांधी को यह कहते हुए दिखाया गया कि हिन्दू चरमपंथ, लश्कर लड़ाकों से ज़्यादा बड़ा खतरा है।
3 अगस्त 2009 के केबल में रोमर के अनुसार राहुल गांधी एक लंच मीटिंग में यह कहते हुए दिखाए गए हैं कि ‘‘यद्यपि इसके साक्ष्य है कि मुस्लिमों के कुछ तत्व लश्करे तैय्यबा को सहयोग देते हैं, परन्तु उभरते हुए हिन्दू कट्टरवादियों से बड़ा खतरा है, जो मुस्लिमों से धार्मिक तनाव और राजनैतिक टकराव पैदा करतेे हैं’’ केबल ने बताया कि गांधी ने यह जवाब उस समय दिया जब राजदूत ने उनसे क्षेत्र में लश्कर की गतिविधियों पर प्रश्न किया और खतरे के बारे में पूछा। रोमर के अनुसार राहुल ने कहा ‘‘पाकिस्तान की ओर से या भारत के इस्लामी ग्रुप द्वारा जो आतंकी आक्रमण हो रहे हैं उनकी प्रतिक्रिया में देशी चरमपंथी फ्ऱन्टों की तरफ़ से बढ़ रहा खतरा चिंता का विषय है जिस पर बराबर ध्यान रखने की आवश्कयता है। केबल के अनुसार कांग्रेस लीडर ने रोमर से अनेक राजनैतिक विषयों, सामाजिक चैलेंज, और अगले पाँच साल मंे कांग्रेस के सामने आने वाले चुनावी बिन्दुओं पर भी विचार विर्मश किया, तथा गांधी ने गुजरात के भाजपाई मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा धु्रवीकरण करके तनाव पैदा करने के मामलों को भी सदंर्भित किया। विकीलीक्स द्वारा जारी किए गए चैथाई मिलियन अमरीकी केबलों मंे इस बात का भी पर्दा फ़ाश किया गया कि बहुत से मामले किस प्रकार गुप्त ढंग से अमरीका ने अंजाम दिए, इनमंे यह भी था कि टर्की मंे अफ़ग़ानिस्तान के मामले पर एक महत्वपूर्ण बैठक की गई परन्तु भारत को इससे दूर रखा गया।
विकीलीक्स द्वारा सूचनाओं की लाई गई मौजूदा लहर ने भारत अमरीकी संबंधों को ख़तरे में डाल दिया है, इसमें अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी किलिंटन को यह कहते हुए दिखाया गया कि भारत ‘स्व-नियुक्त’ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अग्रिम धावक बन रहा है जिससे वह इसका स्थायी सदस्य बन सके। इस संबंध में हिलेरी ने गुप्त सूचनाएँ एकत्र करने के निर्देश दिए। वर्तमान लीक की गई सूचनाओं से अमरीकी हितों तथा मित्रों से संबंधों में दरार पड़ने के दृष्टिगत उसने भारत को पहले ही चेतावनी दी है, तथा बताया कि 2006-10 के मध्य की सूचनाओं में दोनांे देशों के बीच हुई परमाणु डील के संबंध में विप्लवकारी प्रभाव वाली बातें हो सकती हैं। एक अन्य अभिलेख में अमीरात के क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन ज़ायद के संदर्भ से एम0बी0 जेड केबल ने बताया कि उन्होंने पाकिस्तान को एफ0 16 फाइटर जेट की आपूर्ति के अमरीकी निर्णय का यह तर्क देकर समर्थन किया कि इससे शक्ति संतुलन पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत शक्तिशाली स्थायित्व का लोकतंत्र है, अतः पाकिस्तान तो ख़तरे में पड़ सकता है, परन्तु भारत को कोई खतरा नहीं है।
भारत-अमरीका के बीच असैनिक परमाणु सहयोग के मामले में परमाणु आपूर्ति ग्रुप की पूर्ण मीटिंग में सदस्यों की क्या योजना थी, इस सम्बन्ध में भी केबल ने जानने का प्रयास किया तथा यह भी कि सी0टी0बी0टी0 में सम्मिलित किए जाने या इसके पुष्टीकरण हेतु मेम्बरों के क्या विचार भारत के बारे में हैं।
एक केबल के अनुसार अपने विदेशों में तैनात ओवरसीज आफीसर्स से इस प्रकार की सूचनाएँ एकत्र करके भेजने हेतु कहा गया- आफिस और संगठनों के पदनाम, नाम, बिजनेस कार्ड पर दर्ज सूचनाएँ, टेलीफोन, सेलफोन, पेज़र तथा फैक्स के नम्बर, इन्टरनेट, इन्ट्रानेट हैंडिल, इन्टरनेट ई-मेल के पते, वेबसाइट पहचान यू.आर.एल., क्रेडिट कार्ड एकाउण्ट नम्बर आदि, वर्क शेड्यूल और अन्य जरूरी जीवन वृत्त
सम्बंधी सूचनाएँ।
इनमें ये सूचनाएँ भी हैं कि शिवसेना एवं आर.एस.एस. के बीच खींचातानी है जो आर.एस.एस. का मातृ संगठन तथा भाजपा का सहमित्र है, यह खींचातानी प्रवासी उत्तर भारतीयों के मुम्बई में प्रवास के अधिकार को लेकर है। शिवसेना ने खुलकर बिहार एवं उत्तर प्रदेश के प्रवासियों पर आक्रामक रुख अपना रखा है।
बिहार के एक दौरे के समय प्रेस से बात करते हुए राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों के पक्ष में, जो मुम्बई में कार्यरत हैं, कहा कि सेना अप्रासंागिक है तथा सभी भारतीयों को भारत भर में आजादी से निवास करने का अधिकार है।
आतंकी घटनाओं पर केबल द्वारा राय प्रकट करते हुए भारतीय अधिकारियों की इस सम्बन्ध में तैयारी की कमी पर फोकस किया गया। भारत सरकार के इस आश्वासन पर कि वह दोहरे आतंकवाद से मुकाबला करने में सक्षम है, अविश्वसनीय करार दिया गया।

-सी0 आदिकेशवन
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

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गुजरात में देशी-विदेशी पूँजी निवेश आकर्षित करने के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाए जा रहे ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का पाँचवा संस्करण पिछले दिनों पूरा हो गया। खबरों के मुताबिक इसमें रिकॉर्ड 7936 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए जिससे लगभग 20-83 लाख करोड़ से ज्यादा के पँूजी निवेश की संभावना है। निजीकरण को विकास का पर्याय बताने वाली अंग्रेजी मीडिया से लेकर अपनी भाषा से हिंदुत्व की सेवा करने वाले हिंदी अखबारों ने इसे मोदी के विकास के गुजरात माडल की उपलब्धि बताते हुए उन्हें 21वीं सदी में भारत को महाशक्ति बनाने के लिए सबसे उपयुक्त रहनुमा घोषित कर दिया।
गौरतलब है कि ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का अभियान भाजपा ने यू0पी0ए0-प्रथम के शासनकाल के मध्य में मोदी के मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक छवि को बदल कर उन्हें विकासवादी चेहरा देने के लिए शुरू किया था ताकि भाजपा यू0पी0ए0 के कथित विकासवादी नारों से उसी के हथियार से मुकाबला कर सके। इस लिहाज से ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को किसी आर्थिक आयोजन के बजाए आजाद भारत के सबसे वीभत्स राज्य प्रायोजित साम्प्रदायिक जनसंहार के खलनायक, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय तक ने ‘रोम के जलने के दौरान बाँसुरी बजाने वाले नीरो’ की संज्ञा दी हो, के मेकओवर की कोशिशों के पाँच साल पूरे होने के बतौर देखना होगा। इस पूरी परिघटना को राजनैतिक नजरिए से इसलिए भी समझना जरूरी है कि मोदी के ‘गुजरात माॅडल’ को विकास के मानक और प्रतीक के बतौर स्थापित किए जाने का मतलब भारतीय लोकतंत्र को टिकाए रखने वाले सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ धर्मनिरपेक्षता से समझौता कर के राज्य को अल्पसंख्यकों के जान-माल के रक्षक के बजाए उनके नस्लीय सफाए के औजार में तब्दील कर देने और इस मानवताविरोधी अपराध को, आवारा पँूजी के निवेश से बनने वाले विशेष आर्थिक क्षेत्रों जैसे ढाँचे खडे़ कर के, जायज ठहराने के तर्क को वैधता मिलना है।
इसलिए नरेंद्र मोदी के इस मेकओवर के प्रयास को सिर्फ एक बदनाम राजनीतिज्ञ को एक अच्छी छवि में ढालने के उपक्रम के बतौर ही नहीं देखा जा सकता, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी
अवधारणाओं के साथ उसके कर्णधारों द्वारा रोज-रोज किए जाने वाले विश्वासघातों के इस दौर में नरेंद्र मोदी, शासकवर्ग द्वारा पूरी राज्य व्यवस्था को अपने अनुकूल मेकओवर करने की कोशिशों के प्रतीक बन जाते हैं।
इसीलिए हम देखते हैं कि मोदी के ‘गुजरात माॅडल’ की प्रशंसक सिर्फ भाजपा शासित राज्यों की सरकारें ही नहीं हैं, बल्कि कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की
अध्यक्षता वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष और उदारीकरण आधारित विकास के पैरोकार मोंटेक सिंह अहलुवालिया से लेकर उड़ीसा के आदिवासियों को विस्थापित कर के बेशकीमती खनिजों को काओर्पोरेट निगमों को कौडि़यों के दाम बेचने पर उतारू बीजद सरकार तथा विदर्भ को किसानों की मृत्युभूमि बना देने वाली एन0सी0पी0 सरकार तक में इसके समर्थक दिखते हैं, जो गाहे-बगाहे सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर भी करते रहे हैं। जिसमें ताजा नाम हरियाणा की कांग्रेस सरकार के वित्त मंत्री अजय सिंह यादव का है जिन्होंने पिछले दिनों बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस में ‘गुजरात मॅाडल’ को हरियाणा के लिए अनुकरणीय बताया।
दरअसल नरेंद्र मोदी के विकास का ‘गुजरात मॅाडल’ इस वैचारिकी से संचालित है कि विकास सिर्फ और सिर्फ फासीवादी निजाम में ही सम्भव है। यानी अगर आपको विकास चाहिए तो फिर राज्य से सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की माँग मत करिए, किसी सोहराबुद्दीन या इशरत जहाँ के फर्जी एंकाउंटर पर सवाल मत उठाइए और अगर आपको इन मुद्दों पर न्याय चाहिए तो हमारे राज्य से बाहर के किसी न्यायालय मंे शरण लीजिए। अब चूँकि राज्य से सुरक्षा और न्याय की गारंटी की सबसे ज्यादा जरूरत स्वाभाविक तौर पर अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और दलितों को ही होती है, इसलिए विकास के इस मॅाडल में एक छुपा हुआ निहितार्थ यह भी है कि ये सारे कमजोर तबके विकास में रुकावट हैं। इसलिए, विकास करना है तो इनका सफाया सबसे पहली शर्त है, जिसे राज्य खुद अपनी मशीनरी से अंजाम दे सकता है। नरेंद्र मोदी के विकास के ‘गुजरात माॅडल’ का यही निहितार्थ गैर भाजपा दलों और सरकारों को उसका उपासक बनाता है। आखिर उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखण्ड और आंध्र प्रदेश की गैर भाजपाई राज्य मशीनरियाँ विकास के नाम पर किसका और कैसे सफाया कर रही हैं, यह किससे छिपा हुआ है।
दरअसल विकास का ‘गुजरात माडल’ किसी स्त्री विरोधी अश्लील भोजपुरी गाने जैसा एक द्विअर्थी हथियार है, जिससे आप किसी स्त्री का शाब्दिक बलात्कार भी कर सकते हैं और सवाल उठने पर उसकी कोई दूसरी व्याख्या दे कर अपने को पाक-साफ भी घोषित कर सकते हैं। भगवा ब्रिगेड इस हथियार का अपने सबसे उन्नत प्रयोगशाला गुजरात से सैकडों मील दूर पूर्वोत्तर के नेपाल से सटे तराई इलाकों में कैसे इस्तेमाल करता है, इसका सटीक उदाहरण है। जहाँ भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के संगठन हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता जुलूसों के दौरान मुस्लिम मुहल्लों से गुजरते वक्त त्रिशूल लहराते हुए ‘यू0पी0 अब गुजरात बनेगा-पूर्वांचल शुरुआत करेगा’ के नारे लगा कर लोगों को दहशतजदा करते हैं, और जब कोई उनसे इसका मतलब पूछता है तब उनका जवाब होता है कि वे पूर्वांचल में गुजरात की तरह विकास करना चाहते हैं।

-शाहनवाज आलम

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सार्वजनिक जीवन में हम कई बार ऐसी बातें सुनते हैं जो अशिष्ट, गरिमाहीन व मुँह का स्वाद कसैला कर देने वाली होती हैं। आर0एस0एस0 के पूर्व सरसंघचालक के0 सुदर्शन का बयान (नवंबर 2010) इसी श्रेणी में आता है। सुदर्शन ने कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी विदेशी एजेन्ट हैं, उनकी अपनी सास व पति की हत्याओं में भूमिका थी व यह भी कि राजीव गांधी उनसे संबंध विच्छेद करना चाहते थे। मीडिया के बड़े हिस्से ने सुदर्शन के गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्यों को कोई अहमियत नहीं दी और केवल चंद स्तंभकारों ने उन्हें टिप्पणी करने के लायक समझा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए। कुछ लोगों ने अदालतों में मामले भी दायर किए। आर0एस0एस0 ने सुदर्शन के इन वक्तव्यों से स्वयं को दूर कर लिया। संघी पृष्ठभूमि वाले भाजपा नेता तरुण विजय ने यह घोषणा की कि सुदर्शन के आरोपों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि उनके वक्तव्यों से भाजपा को अलग करते हुए भी, तरुण विजय, सुदर्शन की बुद्धिमत्ता व विद्वता की तारीफ करना नहीं भूले। कुल मिलाकर, संघ परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सुदर्शन के वक्तव्यों से स्वयं को अलग तो कर लिया परंतु अपने पूर्व प्रमुख व संघ के सबसे पुराने नेताओं में से एक की उन्होंने आलोचना भी नहीं की। और तो और, सुदर्शन की विद्वता की शान में कसीदे भी काढ़े गए।
संघ परिवार द्वारा सुदर्शन की आलोचना न करने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सुदर्शन की जुबान नहीं फिसली थी। उन्होंने जो कुछ कहा, संघ उसमें विश्वास करता है, उसे सही मानता है और इसीलिए, संघ ने सुदर्शन की निंदा नहीं की।
कुछ लोग सुदर्शन के वक्तव्यों को एक कुंठित बूढे़ की बकवास भले ही मानें परंतु सच यह है कि सुदर्शन के उद्गार, दरअसल, आर0एस0एस0 की सोच को प्रतिबिंबित करते हैं। ये संघ के ही विचार हैं।
समाज को सांप्रदायिक चश्मे से देखना, आर0एस0एस0 की मूल विचारधारा का महत्वपूर्ण अंग है। सांप्रदायिक चश्मे से झाँकने पर लोगों की भौतिक व अन्य आवश्यकताएँ केवल और केवल धर्म के दृष्टिकोण से दिखलाई देती हैं। इस विचारधारा के अनुसार, सभी हिन्दुओं के हित एक से हैं व इसी तरह, सभी मुसलमानों व ईसाइयों के भी एक से हित हैं। चूँकि हर समुदाय के हित एक से हैं अतः जाहिर तौर पर, अलग-अलग समुदायों के हित अलग-अलग हैं। यह विचारधारा कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल एक दूसरे से अलग हैं वरन् एक-दूसरे के विरोधाभाषी व विपरीत भी हैं।
इस विचारधारा के अनुसार, एक हिन्दू उद्योगपति व हिन्दू भिखारी के हित समान हैं! मुस्लिम जमींदारों और मुस्लिम सफाई कर्मियों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी तरह, अगर हम इस
विचारधारा के पैरोकारों की मानें तो पुराने समय में हिन्दू राजा और हिन्दू गरीब, शूद्र, किसान एक ही नाव में सवार थे। प्राचीन व मध्यकालीन भारत में पूरा हिन्दू समुदाय एक था और अन्य समुदायों से सतत संघर्षरत था। सारे हिन्दू राजा एक दूसरे से अतिशय पे्रम करते थे और शूद्रों और हिन्दू गरीब किसानों को अक्सर अपने महलों में खाने पर निमंत्रित करते रहते थे।
सांप्रदायिक विचारधारा- चाहे वह किसी भी धर्म से संबद्ध हो- समाज को ऊपर से नीचे की ओर विभाजक रेखाएँ खींचकर, हिस्सों में बाँटती है। वह समाज के विभिन्न आर्थिक स्तरों- धनी, मध्यम, निम्न व अति दरिद्र- को मान्यता नहीं देती। उसके अनुसार महत्व केवल धर्म-आधारित लंबवत् विभाजन का है, आर्थिक स्थिति पर आधारित क्षैतिज विभाजन का नहीं। यह विचारधारा पहचान से जुड़े मुद्दों पर जोर देती है और दुनियावी समस्याओं को नजरअंदाज करती है। सामाजिक व आर्थिक कारकों से जन्मी अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था से इस विचारधारा को कोई लेना-देना नहीं है। धर्म के नाम पर, जन्म-आधारित विशेषाधिकारों का संरक्षण इस विचारधारा का लक्ष्य है। चूँकि धर्म, आस्था और विश्वास पर आधारित होता है इसलिए एक शक्तिशाली शस्त्र के रूप में उसका इस्तेमाल करना आसान होता है। यह उपयोग सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। सांप्रदायिक संगठन, धर्म का दुरुपयोग जनोन्माद भड़काने के लिए करते हैं ताकि वे अपने राजनैतिक हित सिद्ध कर सकें।
धर्म-आधारित राजनीति के सभी खिलाड़ी यही खेल खेलते हैं।
भारत में मुस्लिम व हिन्दू – दोनांे सांप्रदायिक धाराएँ – उस प्रजातांत्रिक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के विरोध स्वरूप उभरीं, जो सभी भारतीयों को एक निगाह से देखती थी। सांप्रदायिक राजनीति को समर्थन मिला श्रेष्ठि वर्ग से, जमींदारों से, राजाओं-नवाबों व उनसे जुड़े पुरोहित वर्ग से और शहरी
मध्यम वर्ग से। सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि विभिन्न सांप्रदायिक
विचारधाराएँ परस्पर विरोधी हैं परंतु सच यह है कि उन सभी की जडे़ं एक हंै, उनके मूल्य समान हैं, वे एक से तर्कों व सोच से संचालित होती हैं। इन विचारधाराओं के पोषक व प्रणेता अक्सर उच्च सामाजिक हैसियत वाले लोग होते हैं जो केवल पहचान से जुडे़ मुद्दों की बात करते हैं। इसके विपरीत, दो जून की रोटी कमाने के लिए संघर्षरत वर्ग, अपनी दुनियावी समस्याओं में उलझा रहता है।
इस वैचारिक भिन्नता की झलक हम गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में देख सकते हैं। गौतम बुद्ध ने जाति प्रथा की मुख़ालिफत की। वे समाज के दुख-दर्द, वंचित वर्गों की तकलीफों की बात करते थे। उनके प्रभाव को कम करने के लिए, योजनाबद्ध ढंग से दुनिया को माया बताने का अभियान चलाया गया (जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यम्)। बौद्ध धर्म पर हमला, आर्थिक शोषण पर आधारित जातिप्रथा के मजबूत होने का प्रतीक भी था। मध्यकाल में अधिकांश शासकों ने- चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न रहे हों- पुरोहित वर्ग को संरक्षण दिया (हिन्दू राजाओं के मामले में राजगुरू, मुस्लिम बादशाहों के दरबारों के शाही इमाम और यूरोप में राजाओं व पोप के बीच संधियाँ)। पुरोहित वर्ग, हमेशा से यथास्थितिवादी व कर्मकांडी रहा है।
इसके विपरीत, सभी धर्मों के संतांे ने धर्मों में निहित नैतिक मूल्यों पर जोर दिया और इन नैतिक मूल्यों से सभी धर्मों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की। संतों को इहलोक की समस्याओं की ज्यादा चिंता थी, परलोक की कम। कबीर कहते हैं “पाहन पूजे हरि मिलंे, तो मैं पूजूँ पहाड़“। कबीर के अनुसार, भगवान की मूर्ति से चक्की ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे मुल्ला को भी नहीं बख्शते, शोषकों व शोषितों के हितों का विरोधाभास, पुरोहित वर्ग व संतों की शिक्षाओं में अंतर से साफ हो जाता है।
हमारे देश की आजादी की लड़ाई के दौरान, हिन्दू व मुस्लिम सांप्रदायिक संगठनों ने एकसा दृष्टिकोण अपनाया। दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया और दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ हो रहे सामाजिक परिवर्तन का विरोध किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व आर.एस.एस. स्वाधीनता आंदोलन से इसलिए दूर रहे क्योंकि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल अंग्रेजी राज से छुटकारा पाना नहीं था। इसका लक्ष्य देश में सामाजिक, आर्थिक व लैंगिक न्याय का सूत्रपात करना भी था।
इस पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी के प्रति आर0एस0एस0 के बैरभाव को समझा जा सकता है। अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी के शीर्ष पर विराजमान सोनिया गांधी में संघ एक भारतीय नागरिक को नहीं देखता, वह एक ईसाई महिला को देखता है। संघ की विचारधारा में रचे-बसे सुदर्शन की सोनिया गांधी के बारे में टिप्पणियाँ, आर0एस0एस0 की सोच का प्रकटीकरण मात्र हैं। सुदर्शन लगभग पाँच दशकों से संघ से जुड़े हुए हैं और दस वर्ष तक संघ के प्रमुख रहे हैं। भला संघ की सोच को उनसे बेहतर कौन जान सकता है?
उन साम्प्रदायिक संगठनों, जिनका लक्ष्य धर्म-आधारित राज्य की स्थापना है, की असली सोच और उसके प्रकटीकरण के बीच अंतर होना अवश्यंभावी है। आर0एस0एस0 का लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है और अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त प्रजातंत्र का इस्तेमाल करना चाहता है। स्पष्टतः ऐसा करने के लिए उसे अत्यंत सावधानी व धूर्तता से काम लेना पड़ता है। संघ के स्वयंसेवक वही और केवल वही कहते हैं जो संघ चाहता है, परंतु संघ उनके वक्तव्यों का खुलकर अनुमोदन नहीं कर सकता क्योंकि इससे प्रजातात्रिक मान्यताओं का हनन होगा। गांधी हत्या (नाथूराम गोड्से), पास्टर स्टेन्स की हत्या (दारासिंह), मंगलौर पब कांड (श्रीराम सेना) आदि जैसे मामलों में भी ठीक यही हुआ था। आर0एस0एस0 प्रजातंत्र को खत्म करना चाहता है परंतु वह ऐसा कह नहीं सकता। इस समस्या से निपटने के लिए संघ की रणनीति यह है कि उसके समर्थक व कार्यकर्ता जब भी कोई विवादास्पद बात कहते हैं या कोई गैर-कानूनी हरकत करते हैं तो संघ ऊपरी तौर पर स्वयं को उनसे अलग कर लेता है परंतु उनके प्रति पूरे सम्मान के साथ!

-राम पुनियानी

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विशेष – फै़ज़ अहमद फै़ज़

अविकसित देश के नाते भारत के सामने आज अनेक समस्याएँ हैं। समाज में विघटनकारी और साम्प्रदायिक ताकतें आक्रामक मुद्रा में हैं, देश का समूचासांस्कृतिक तानाबाना टूट गया है। दूसरी ओर अमरीकी साम्राज्यवाद के अनुयायी के रूप में हमारे शासकों ने काम करना आरंभ कर दिया है। ऐसी अवस्था में फ़ैज़ का नजरिया हमारे लिए रोशनी का काम दे सकता है। फैज के व्यक्तित्व में जो बाग़ीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र।
आज के संदर्भ में हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए भाषण की याद आ रही है, यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिन समस्याओं की ओर इस भाषण में ध्यान खींचा गया था वे आज भी राजनीति से लेकर संस्कृति तक प्रधान समस्याएँ बनी हुई हैं। फैज ने कहा था इस युग की दोप्रधान समस्याएँ हैं-उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फैज ने कहा था ‘हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है, क्योंकि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश, साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरुरी है।’ फैज ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा ‘‘तमाम युद्धों के अंत की तरह, लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक बुर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग में अहं का उन्माद उफनने लगा था। खुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मजे में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन, अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव, रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ ‘कला के लिए कला’ के उद्बोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।’’ हिन्दी में भी नई कविता के दौर में यही सब दिखाई देता है और रूपवादी शिल्प और कला के लिए कला का नारा भी दिया गया था। यह जमाना था 1951-52 का। साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की मीमांसा करते हुए फैज ने लिखा कि प्रगतिशील साहित्यांदोलन की प्रेरणा के दो बड़े कारक हैं, ‘पहली तो वह राजनैतिक प्रेरणा है जो इन्हें सोवियत समाजवादी क्रांति से मिली और दूसरे माक्र्सवादी विचारों से मिला विचारधारात्मक दिशा-निर्देश।’ आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढाँचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो ख़याल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया। फैज इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा, ‘युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग, विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग, उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग, बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का जमाना।
तीसरी दुनिया की जनता के लिए, एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमरीकी लोगों के लिए, कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए, किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जाएँगे-‘वह बेहतरीन वक्त था, वह बदतरीन वक्त था।’ अपने दो-दो विश्वयुद्धों से थके हुए साम्राज्यवाद का कमजोर पड़ते जाना, सोवियत सीमाओं का विस्तार लेता और एकजुट होता समाजवादी खेमा, संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के आंदोलनों का उदय और उनकी सफलताएँ, सभी कुछ एक साहसी नई दुनिया का वादा कर रहे थे जहाँ स्वतंत्रता, शांति और न्याय उपलब्ध हो सकता था, पर हमारी बदकिस्मती से ऐसा नहीं था।’
परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- ‘आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आजाद करते हुए अमरीका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साए की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने दुनिया झूल रही है, उतनी पहले कभी न थी।’ राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फैज ने लिखा- ‘स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढोल नगाड़ों के शोर के साथ अमरीकी शासन तंत्र ने यहाँ वहाँ ढेर सारे निरंकुश राजाओं, सुल्तानों, खून के प्यासे अधिनायक, तानाशाहों, बेदिमाग दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों, जिस पर भी हाथ रख सकें, को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है। यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमरीकी विदाई के साथ कुछ वक्त के लिए रुक सी गई थी।
फिर रोनाल्ड रीगन के जमाने से हम अमरीकियों और उनके नस्लवादी साथियों को यहाँ-वहाँ भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में बिखरे बारूद के ढेरों के आसपास देख रहे हैं।’ अमरीका द्वारा संचालित शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में स्वतंत्र सत्ताओं के उदय के साथ पैदा हुई परिस्थितियों ने समाज, साहित्य, संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए फैज ने लिखा है- ‘नए शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग, सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गई है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने, उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक की तमाम सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनैतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीकों से हटाने की जरूरत है। एक अन्य निबंध ‘अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ’ में फैज ने भारत जैसे अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि इन देशों की बुनियादी समस्या है सांस्कृतिक एकीकरण की। इस प्रसंग में लिखा सांस्कृतिक एकीकरण, का अर्थ है-नीचे से ऊपर तक एकीकरण, जिसका अर्थ है विविध राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जनसमूह को एक से सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह है कि उपनिवेशवाद से आजादी तक के गुणात्मक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है।
फ़ैज के अनुसार अविकसित देशों की पहली सांस्कृतिक समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार हैं, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करें।
दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचनाओं का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुद्ध हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुद्धिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं।
तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं। ’फैज ने इन्हें नवीन’ सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की समस्याओं के रूप में देखा।-

-जगदीश्वर चतुर्वेदी

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मायावती की पुलिस का दरोगा पुलिसिया अंदाज में संबोधित करते हुए

प्रदेश में मायावती की सरकार समाज के हर तबकों का इलाज लाठी और गोली से कर रही है। उसके पीछे उसका तर्क यह होता है कि कानून और व्यवस्था हर हालत में बनाये रखा जायेगा किन्तु उसी कानून और व्यवस्था को बनांये रखने में उसका दोहरा चरित्र भी दिखाई देता है। जाट आन्दोलन को मुख्यमंत्री मायावती का समर्थन प्राप्त होने से कानून और व्यवस्था कि कोई समस्या नहीं थी और दिल्ली जाने वाली रेलवे लाईनो को प्रदेश सरकार के कुशल नेतृत्व में जाटों ने बंद कर रखा था। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद प्रदेश सरकार ने कोई हस्ताक्षेप नहीं किया।
वहीँ 23 मार्च को शहीद दिवस भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की स्मृति में आजमगढ़ में आयोजित हुआ जिसको मायावती की सरकार के दरोगा ने आयोजनकर्ताओं को गन्दी-गन्दी गालियाँ दी व लातों से मारा। इप्टा के सदस्य जब कलेक्ट्रेट चौक पर पहुंचे और वहां पर जब साथी लोग अपना कार्यक्रम देने लगे तो इतने में सिविल लाइन चौकी के दरोगा ने आकर शहादत दिवस के क्रायक्रम में वाद्य बजा रहे साथी को अपने पैर से मारा और कहा कि यहाँ पर कुछ नही करना है इसके साथ ही मोती एवं एनी सत्यो के साथ अभद्र व्यवहार किया ।परन्तु इसके बावजूद इप्टा के साथी वहां पर कार्यक्रम कर के गये |
भगत सिंह तुम जिन्दा हो हम सबके अरमानो में ,भगत तुम हमारे दोस्त हो ,इन्कलाब जिन्दा बाद ,साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारों से भारतीय जन नाट्य संघ आजमगढ़ द्वारा भगतसिंह के शहादत दिवस पर नुक्कड़ गीतों और नाटको के जरिये अपनी श्रद्धांजली अर्पित किया, इसके उपरान्त इप्टा द्वारा नुक्कड़ नाटको और गीतों का कार्यक्रम किया गया।
कार्यक्रम में सभा को सम्बोधित करते हुए पत्रकार सुनील दत्ता ने कहा कि भगतसिंह को पूर्वाग्रहों से नही ,तर्क से जानना होगा -वे क्रन्तिकारी थे, आतंकवादी नही – तभी उन्होंने सांडर्स -वध को ग्लोरिफाई नही किया और असेम्बली में बम फोड़ते समय यह सावधानी भी रखी कि किसी की जान न जाये ,गुलामी के शासन में जो अंग्रेज करते थे वो आज की सरकारों की पुलिस कर रही है , मोती ने कहा कि क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है |

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,”लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.”
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है। विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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फ्रांस द्वारा लीबिया में खेली जा रही खून की होली का एक द्रश्य
भारत में बहुसंख्यक आबादी का रंगों का त्योहार होली। होली आपसी भाईचारे समाज में समृद्धि का प्रतीक है। भारतीय जनमानस एक दूसरे के ऊपर रंग व गुलाल, अबीर लगा कर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाता है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि इस त्योहार में विरोधियों से भी बैर भाव समाप्त कर लेना चाहिए।
शांति के पुजारियों के महानायक अमेरिका और उसके पिछलग्गू फ्रांस व इंग्लैंड ने शांति स्थापित करने के लिये लीबिया में टोमाहॉक मिसाइलें 112 रक्षा ठिकानो पर दागी हैं। वहीँ लीबिया ने फ्रांस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है लेकिन फ्रांस ने उसका खंडन किया है। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने इसके पूर्व ईराक, अफगानिस्तान सहित पकिस्तान में भी शांति स्थापित कर रहे हैं। पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में हजारो लोग मारे जा चुके हैं। शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। मिस्र, ट्युनेसिया , बहरीन में अमेरिकन साम्राज्यवादी का पहले से कब्ज़ा है। उस परीक्षेत्र में लीबिया अमेरिकन साम्राज्यवाद का विरोध करता था। लीबिया को सबक सिखाने के लिये इन देशों ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत पहले अलकायदा के माध्यम से अशांति फैलवायी। और जब पूर्वी लीबिया पर हथियारबंद विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया। लीबियाई सरकार ने विद्रोहियों से पुन: पूर्वी लीबिया को मुक्त करा लिया तो खिसियाये साम्राज्यवादी मुल्कों ने सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी। साम्राज्यवादी हमलों में अब तक 50 लोग मारे जा चुके हैं व्यापक रूप से नुकसान हुआ है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य लीबिया के तेल पर कब्ज़ा करना है। शांति लोकतंत्र न्याय विश्व बंधुत्व से इन शांति के पुजारियों का कोई लेना देना नहीं है। मानव रक्त से ही इनकी प्यास बुझती है। खून की होली खेलने का कार्य इन देशों का मुख्य शगल रहा है। हमारे देश को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस तरह से लूटा है उस इतिहास को पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने भी हमारे देश के कुछ हिस्से को काफी अरसे तक गुलाम बनाये रखा था। शांति के नाम पर खून की होली जारी है। दुनिया का कोई भी मुल्क इस होली को रोकने में समर्थ नहीं है और न ही किसी देश की संप्रभुता का कोई मतलब इन देशों की नजर में है। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने निर्माण काल से ही इन देशो की कठपुतली रहा है और आज भी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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विश्व के सबसे ताकतवर और घृणित साम्राज्यवाद अर्थात् अमरीका के ऊपर एक बेजान और अदना-से नेट हमलावर ने जैसा सांघातिक आक्रमण किया है वह संभवतः अमरीका के लिए इतिहास का अब तक का सर्वाधिक शर्मिंदगी भरा आघात साबित हुआ है। विश्व की अनेक सरकारों, देशों, नागरिकों, शासकों और यहाँ तक कि सभ्यताओं को तहस-नहस करने की असीम नंगई प्रदर्शित करते रहने वाला अमरीकी साम्राज्यवाद आज इस अदना-से नेट हमलावर की करनी से खुद इस कदर हिल उठा है- मानो वह ब्रह्मांड में अपने पथ से भटक कर आवारा विचरण करने वाले किसी क्षुद्रतम उल्का पिंड से छू गया हो। कहने की जरुरत नहीं कि आप भलीभाँति जानते हैं कि वह अदना-सा नेट हमलावर विकीलीक्स नामक इंटरनेट सेवा का संस्थापक और आस्ट्रेलिया निवासी जूलियन असांजे है। लेकिन ये अंसाजे महोदय अब अदना-सा प्राणी नहीं रह गए हैं। वे उस संसार में जिसे सूचनाओं का महाकाश कहा जाता है, एक ऐसा भीमकाय रुप ग्रहण कर चुके हैं जिस पर आज के सर्वाधिक शक्तिशाली अमरीकी साम्राज्यवाद की सीधे हाथ डालने के नाम पर रुह काँप रही है।
लेकिन आज हम क्या देखते हैं कि नेट संसार का यह भीमकाय प्राणी अर्थात् असांजे महोदय कुछ समय पहले तक चूहे की तरह एक ऐसे जाल में फँसे नजर आ रहे थे जिसकी हमारे जैसे परंपरागत एशियाई समाज में तो कम से कम अत्यंत घिनौने रूप में पहचान होती है। वह है बलात्कार का आरोप। कहते हैं असांजे महोदय परम प्रसिद्धि हासिल करने के बाद संस्थाओं के बुलावे पर लेक्चर देने स्वीडन की यात्रा पर गए। उसी दौरान वहाँ वे दो स्वीडिश महिलाओं के साथ हम बिस्तर हुए जिसे बाद में इन महिलाओं ने इसे अपने साथ बलात्कार किए जाने का कृत्य बताकर असांजे महोदय के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा दीं। फिर क्या था, असांजे महोदय को किसी पगलाए कुत्ते की तरह पीछा किया जाने लगा। कहते हैं, यह घिनौना जाल अमरीका की सर्वाधिक खूँखार और बदनाम जासूसी संस्था सी0आई0ए0 ने बिछाया था और असांजे महोदय को इस घिनौने आरोप के तहत गिरफ्तार करने का भयंकर दबाव भी उसी का था। काफी लुकने-छिपने के बाद अंततः असांजे महोदय के पास अपने को ब्रिटिश पुलिस के हवाले करने के सिवाय कोई चारा नहीं रहा। हालाँकि ‘सूचनाओं के महाकाश’ अर्थात् नेट की दुनिया के योद्धाओं ने असांजे महोदय के समर्थन में ऐसी भारी ब्यूह रचना की कि सी0आई0ए0 के जबर्दस्त दबाव के बावजूद उन्हें जमानत पर छोड़ना पड़ा।
यह गर्हित घटनाक्रम क्या हमें पुराने समय के हिंदी के एक सर्वाधिक पढ़े जाने वाले उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की याद ताजा नहीं करा देता है? लेकिन जरा ठहरिए! यह सवाल मैं किससे पूछ रहा हूँ? अपने समय की आज की उस पढ़ी-लिखी पीढ़ी से जिसका बहुलांश नेट की इसी असीम दुनिया की नागरिकता लेने के अंध-दौड़ में शामिल है और जिसका भारतीय साहित्य और संस्कृति से नाममात्र का रिश्ता रह गया है। वह भला देवकी नंदन खत्री के नाम और उनके उन उपन्यासों को क्यों कर जानने लगेगी जिनके पुनर्प्रकाशन का रिवाज भी जमाना पहले बंद हो चुका है? बहरहाल, मैं यहाँ आज की अत्याधुनिक दुनिया के इस गर्हित घटनाक्रम के लिए बीते जमाने के उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की याद इसलिए नहीं करा रहा हूँ कि युवा पीढ़ी उनकी ओर आकर्षित हो। यदि ऐसा होता है तो हिंदी प्रकाशकों के लिए तो कम से कम भारी मुनाफे का अवसर तो पैदा हो ही सकता है। यह तुलना मैं इसलिए कर रहा हूँ कि लोग यह देखें कि हर युग में षड्यंत्रकारी सत्ताएँ अपने राज्य-शत्रुओं से निबटने के लिए कितने घिनौने स्तर की ब्यूह रचनाएँ रच सकती हैं- यह इस विकीलीक्स प्रकरण से साफ जाहिर होता प्रतीत होता है। देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों में विष-कन्याओं की रोमांचकारी उपस्थिति ने भी उन तिलस्मी उपन्यासों की पठनीयता और लोकप्रियता में भारी इजाफा किया था। अमरीकी साम्राज्यवाद के कुख्यात सी0आई0ए0 एजेंटों के तर्ज पर खत्री रचित उपन्यासों की तरह मध्ययुगीन सम्राटों की निजी शासन-व्यवस्था में भी हम ऐय्यारों की एक पूरी सुगठित टोली पाते हैं जो राज्य शत्रुओं को तथा उनके षड्यंत्रों को नेस्तनाबूद कर देने के लिए किसी भी तौर तरीकों को अपनाने से बाज नहीं आती। उन्हीें में से एक तरीका था विष कन्याएँ पालना और उनके सांघातिक नागफाँस में फाँस कर राज्य शत्रुओं का निश्चित अंत करवाना। विष कन्याएँ परम सुंदरियाँ हुआ करती थीं और चपल-चतुर भी। वे राज्य पोषित थीं और उनकी परवरिश-प्रशिक्षण पर भारी राशि खर्च होती थी। ऐय्यारों को जब लगने लगता कि राज्य-शत्रु को घेरना अब उनके वश में नहीं रह गया है तब वे अंतिम और अचूक हथियार के रूप में विष कन्याओं को आगे बढ़ा देते थे। कहने की जरुरत नहीं कि विष कन्याएँ किन क्रियाओं द्वारा शत्रु के निश्चित नाश का खेल खेलती होंगी।
विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के मामले में क्या हम ठीक यही चीज नहीं पाते हैं? कहते हैं कि सी0आई0ए0 के हथकंडे में एक ‘हनी ट्रैप’ भी शामिल है। जाहिर है, सी0आई0ए0 के एजेंटों का जब सीधे-सीधे अमरीकी साम्राज्यवाद के शत्रुओं पर हाथ डालना संभव नहीं हो पाता होगा तो वे आखिरी हथियार के रुप में इसी ‘हनी ट्रैप’ का सहारा लेते होंगे। जैसा कि नाम से ही आभास होता है यह ‘हनी ट्रैप’ सी0आई0ए0 द्वारा तैयार किया गया सुरा-सुंदरियों का ही वह मोहक-मारक जाल है जिसमें फँसकर शत्रु को एकबारगी ‘नंगा’ होने की शर्मिदंगी से उबर पाना कठिन हो जाता होगा। विकीलीक्स द्वारा अमरीकी साम्राज्यवाद के पापों-अपराधों का रहस्योद्घाटन किए जाने और आगे और भी अधिक किए जाने की संभावना से आज अमरीकी प्रशासन दुनिया के सामने पूरी तरह से ‘नंगा’ हो चुका है और अपनी इस नग्नता को ढकने के लिए वह जिस ‘नंगई’ पर उतर आया है उसने उसकी नग्नता की वीभत्सता में और इजाफा ही किया है। दुनिया ने अमरीकी नंगई का यह नमूना विकीलीक्स के मालिक जूलियन अंसाजे की दो स्वीडिश महिलाओं के साथ तथाकथित बलात्कार के आरोपों में गिरफ्तारी के रूप में देखा है। हम यह कतई नहीं कहेंगे कि वे दोनों महिलाएँ सी.आई.ए. द्वारा पालित-पोषित ‘विष कन्याएँ’ ही हैं लेकिन विश्व मीडिया में इस प्रकरण पर अधिकांशतः जो टिप्पणियाँ, व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई हैं वे यही आभास देती लगती हैं कि असांजे महोदय को सी0आई0ए0 रचित ‘हनी ट्रैप’ में फँसाया गया है। यह एक तीर से दो शिकार करने की अमरीकी साम्राज्यवाद की घिनौनी चाल को प्रदर्शित करती है। एक तो यह कि दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्यवाद को ‘नंगा’ करने की धृष्टता करने वाले इस शत्रु को ऐसी जगह लाकर मारो जिससे शर्म के मारे वह अपनी गर्दन न उठा सके। दूसरा यह कि इस तथाकथित बलात्कारी शत्रु की ऐसे देश में गिरफ्तारी कराना जो अमरीका के साथ प्रत्यर्पण संधि से बँधा हो और जिसे बाद में अमरीका में घसीट कर लाया जा सके और उसका मुँह हमेशा के लिए बंद किया जा सके।
यह तो कहिए कि अमरीकी साम्राज्यवाद का यह शत्रु अर्थात् जूलियन असांजे नेट ब्रह्मांड का ऐसा महाबली निकला जिसकी असीम ताकतों को परखने में सी0आई0ए0 से भारी चूक हो गई। दरअसल, इस तरह के सांघातिक और प्रबलतम नेट प्रहार से अमरीकी साम्राज्यवाद का अपने सम्पूर्ण इतिहास में यह पहला ही सामना था जिसके आगे उसके कुख्यात सी0आई0ए0 एजेंटों के तमाम क्रूरतम और घृणास्पद फंदे रेत के ठेर साबित हो गए। असांजे महोदय के नेट योद्धाओं ने इस घिनौने और कुटिलतम ‘‘हनी ट्रैप’’ के विरुद्ध ऐसी एकजुटता प्रदर्शित की कि न सिर्फ विकीलीक्स का यह मालिक कैद से बाहर आ गया बल्कि सिर उठाकर यह कहने की स्थिति में भी कि यह बलात्कार का नहीं, आपसी सहमति से किए गए एक सामान्य कृत्य (योरोपीयन मानदंड के अनुसार) का मामला है।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। दुनिया में ऐसे लाखों लोग जिनमें हमारे देश के खाए-पिए-अघाए लोग भी शामिल हैं, अब तक तमाम अमरीकी बदमाशियों से आँख चुराए रहकर इसलिए उसके तीव्र मोहपाश में फँसे रहते हैं कि अंततः एक नई दुनिया और नई सभ्यता का अवतार यह अमरीकी धरती ही है, इस अमरीकी ‘नंगई’ के उजागर होने के बाद अपने ‘अवतार’ के बारे में अब क्या सोचेंगे? हम नहीं कह सकते कि जूलियन असांजे की तरफ से लगातार मिल रही धमकियों से महा आतंकित अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके कुख्यात सी.आई.ए. एजेंट बौखलाहट में अभी और कितने घिनौने और पतित हथकंडे अपनाएँगे। लेकिन यह तो तय है कि ‘हनी ट्रैप’ के प्रकरण ने कुछ बातें बिल्कुल साफ कर दी हैं-आईने की तरह। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, षड्यंत्रकारी सत्ताएँ चाहे वे किसी भी युग की क्यों न हों, अपने मूल चरित्र में एक समान होती हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद को चाहे जिस कारण नई दुनिया और नई सभ्यता के अवतार से अभिहित किया जाता हो, दरअसल उन मध्य युगीन सम्राटों, साम्राज्यों का ही आधुनिकतम रूप है जिनके यहाँ विष कन्याओं का निरघिन खेल खेलने से तनिक गुरेज नहीं किया जाता था। जूलियन असांजे ने लाखों अमरीकी गुप्त सूचनाएँ प्राप्त कर और उनका अल्पांश ही नेट पर जारी कर जितना नंगा किया है सी0आई0ए0 ने ‘हनी ट्रैप’ का पतित खेल रचकर अमरीकी साम्राज्यवाद की उस नग्नता की वीभत्सता के विस्तार का काम ही किया है। सैकड़ों साल के अंतराल के बाद नई दुनिया का एक आधुनिकतम ‘अवतार’ मध्य युगीन सत्ता, साम्राज्यों की नग्नता को भी मात देने में बाजी मार ले सकता है, यह बात तो देवकी नंदन खत्री के कल्पना लोक को छू तक नहीं सकी होगी।

-सुमन्त

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प्रकृति की सुनामी का एक द्रश्य

जापान में दुनिया का पांचवे सबसे बड़े भूकंप के बाद आई सुनामी में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। 1300 मील लम्बे तटवर्ती इलाके में 33 फूट तक ऊँची लहरों ने व्यापक तबाही मचाई है। सुनामी के कारण कई रिफ़ायनरीज़ में आग लग गयी। कई सौ अरब रुपये की परिसंपत्तियां नष्ट हो गयीं। जनजीवन ध्वस्त हो गया। लोकसंघर्ष परिवार अपनी संवेदना प्रकट करता है।

राज्य की सुनामी

वहीँ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राज्य की सुनामी के तहत लखनऊ के डी.आई.जी डी.के.ठाकुर ने राज्य की सुनामी आनंद सिंह भदौरिया के ऊपर उतारी। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डी.के. ठाकुर ने गिरफ्तारी के बाद आनंद सिंह भदौरिया को हजरतगंज में लाठियों से पीट कर सड़क पर लातों से रौंदा जिससे उत्तर प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के पुलिस अधिकारीयों का वास्तविक चेहरा जनता के सामने आया। कहने के लिये हम आप लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं लेकिन वास्तव में राज्य का असली स्वरूप जब सामने आता है तो वह बड़ा वीभत्स होता है। इन स्तिथियों के बाद भारत सरकार में दम है कि इस पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई कर सके। जनता के साथ पुलिस का व्यवहार यह होता है, वहीँ अभी कुछ दिन पहले राज्य के एक पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री का जूता साफ़ करते नजर आये थे। अगर बात मुख्यमंत्री की आ जाए तो महाबलशाली डी.आई.जी डी.के.ठाकुर उनकी चप्पलें साफ़ करते नजर आयेंगे। इन घ्रणित चेहरों का इलाज भारतीय लोकतंत्र में नहीं है ।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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यह डॉक्टर रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ की कविता का दूसरा पक्ष है, जो आज के बदलते परिवेश में पल रहे नन्हें मुन्ने, प्यारे-प्यारे बच्चों के मन की बात को सरल और बेहद सरल तरीके से अभिव्यक्ति देते हैं। जो बच्चों को एक ही पाठ में याद हो जाती हैं। उनकी यह सरल, निश्छलता और हृदय की पवित्रता उनकी इन बाल कविताओं में पग-पग पर छलकता है।
‘नन्हें सुमन’ संग्रह का मुख पृष्ठ ही भीतर की बात खोलने में समर्थ है। यह आकर्षक होने के साथ इस गुणवत्ता से पूरित है। कुत्ता, भालू, बन्दर व बिल्ली, तितली तथा सुरम्य प्रकृति आदि बच्चों के पुराने प्रिय विषय रहे हैं और आज भी हैं। इनका बदलते परिवेश में चित्रण किया गया है। किन्तु आधुनिक परिवेश जिसको लेकर ये कविताएँ बच्चों के ज्यादा निकट पहुँचती हैं उनका एक भी चित्र मुख पृष्ठ पर नहीं है। यथा लैपटाप, मोबाइल, स्कूली बस आदि, यद्धपि इन पर उनकी कविताएँ भी हैं।

बिना सहारे औ सीढ़ी के, झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता। गली मुहल्लों और छतों पर, खों-खों करके बहुत डराता। लैपटॉप को लेकर वे कहते हैं:- इस बस्ते में क्या है भइया, हमें खोलकर दिखलाओ। कहाँ चले तुम इसको लेकर, कुछ हमको भी बतलाओ।।

उल्लू, बगुला, चंदामामा और फलों का राजा आम, लीची, जैसे फलों पर भी उनकी कविताएँ हैं और बच्चों की प्यारी-प्यारी दुनिया इन्हीं चीजों से बनी है।
जाहिर है ‘मयंक’ जी ने अपनी 65 कविताओं के माध्यम से उतने तो नहीं किन्तु 40 नये कोनों में जरूर झाँका है। इस संग्रह को नये और आधुनिक परिवेश में आ रही नित्य नई वस्तुओं के कौतुकपूर्ण मनोहारी वर्णन के लिए अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।

-विनयदास
(समीक्षक)
मो0: 9935323168

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