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Archive for अप्रैल 21st, 2011


देश में जब भी कोई विस्फोट या आतंकी वारदात होती है तो भय और आक्रोश का माहौल पैदा हो जाता है। खास तौर पर उस भाग में जहाँ उग्रवाद या आतंकवाद की कोई समस्या नहीं है। घटना जिस शहर में होती है विशेष रूप से उस इलाके की भावनाएँ भड़की हुई होती हैं घटना के बाद खुफिया तन्त्र और सुरक्षा एजेन्सियों की विफलता पर जनता मंे रोष होता है, सरकार की जवाबदेही और आतंकवाद से निबटने में उसकी इच्छा शक्ति पर सवाल उठने लगते हैं। देश की जनता घटना को अंजाम देने वाले आतंकियों और उनके संगठन के बारे में जानना चाहती है, जाहिर सी बात है कि अपनी इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिए वह लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ मीडिया की ओर आकृष्ट होती है। इलेक्ट्रानिक चैनलों पर सनसनीख़ेज़ जानकारियाँ तुरन्त मिलने लगती हैं परन्तु ग्रामीण अंचलों में जहाँ दो तिहाई भारत बसता है, के लोग शायद इतने खुश किस्मत नहीं हैं। आकाशवाणी समाचारों में ऐसी घटनाओं की विस्तृत या यूँ कहा जाए कि अपुष्ट सूत्रों के हवालों से जन उपयोग की खबरों का प्रायः अभाव ही रहता है। इसी वजह से इस क्षेत्र के लोगों की समाचार पत्रों पर निर्भरता बढ़ जाती है। निजी सूत्रों के अतिरिक्त विश्वस्त सूत्रों, विशेषज्ञों, जानकारों, खुफिया एवं सुरक्षा
अधिकारियों को उद्धृत करते हुए उत्तेजनात्मक खबरों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह दैनिक समाचार पत्रों का बेसब्री से इन्तजार रहता है। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ के इस महत्वपूर्ण अंग में कई बार जनता तक सच्ची और रचनात्मक खबरें पहुँचाने के दायित्व के निर्वाह से ज्यादा बाजारवाद के तकाजों को पूरा करने की चेष्टा और पूरे घटनाक्रम को एक खास दिशा देने की कवायद नजर आती है। इसी के चलते तथ्यात्मक समाचारों में स्पष्ट भिन्नता और अनुमानित समाचारों में अद्भुत समानता देखने को मिलती है।
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता मन्दिर के सामने 7 दिसम्बर सन् 2010 की शाम कपूर आरती आरम्भ होने से ठीक पहले होने वाले धमाके ने मासूम स्वस्तिका की जान ले ली और बाद में गम्भीर रूप से घायल इतालवी नागरिक की भी अस्पताल में मृत्यु हो गईं। इस घटना के बाद वाराणसी से प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्रों के अगले संस्करणों में इस घटना से सम्बन्धित समाचारों पर एक नजर डाली जाय तो उक्त कथन की पुष्टि होती है। विस्फोट में जान गँवाने वाली एक साल से भी छोटी बच्ची को आने वाली चोटों के समाचार कुछ इस प्रकार
थे:-………धमाकों मे एक वर्षीय बच्ची तारिका शर्मा की मृत्यु हो गई। (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)……. इसमें एक साल की स्वस्तिका की मौत हो गई उसकी कमर से नीचे का पूरा हिस्सा उड़ गया था।
(अमर उजाला 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)………. एक पत्थर का टुकड़ा तेजी से स्वस्तिका के सिर पर लगा, खून का फौव्वारा फूट पड़ा, भगदड़ मच गई। माँ जब तक उसे लेकर पार्क पहुँचती उसकी मृत्यु हो गई। (दैनिक जागरण, 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 7)….. इसी प्रकार घटना स्थल पर सी0सी0 कैमरा था अथवा नहीं, दो अलग-अलग अधिकारियों के हवाले से परस्पर विरोधी समाचार प्रकाशित हुए तो घटनास्थल पर पाए जाने वाले अवशेषों को लेकर भी समाचारों मंे समानता देखने को नहीं मिलती। ए0डी0एम0 अटल कुमार राय ने बताया कि अधिकारी घटनास्थल के सी0सी0, पी0डी0 फुटेज की जाँच कर रहे हैं। (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ 10)……… शुक्रवार को उन्होंने (ए0डी0जी0 कानून व्यवस्था वृजलाल) पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि शीतला घाट पर सी0सी0 कैमरे नहीं थे। इस लिए घटना से पहले और बाद के फुटेज जुटा कर छान बीन की जा रही है (दैनिक जागरण 11 दिसम्बर पृष्ठ नं0 9) घटनास्थल पर पाए जाने वाले अवशेषों के सम्बन्ध में श्री अटल कुमार राय के हवाले से अमर उजाला लिखता है…….. राय ने बताया कि आगरा से फोरेन्सिक विशेषज्ञों के एक दल ने घटना स्थल के नमूने लिए है। इस बार मौके से छोटे से वायर और प्लास्टिक के टुकड़े के अलावा कोई भी अवशेष नहीं मिला जिसके आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)……. आतंकी विस्फोट की जाँच के दौरान तार के एक टुकड़े से सुराग की तलाश की जा रही है………। एजेन्सियाँ इस विस्फोट के बाद मौके पर अवशेष न मिलने पर हैरत में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 7)।
वाराणसी विस्फोट के बाद संजरपुर लगातार सुर्खियों में रहा। 19 दिसम्बर 2008 की बटाला हाउस घटना के बाद से ही यहाँ के लोग हर आतंकी वारदात के बाद संजरपुर और आजमगढ़ को घसीटे जाने को लेकर आशंकित रहते हैं। यह आशंका स्वाभाविक भी है क्योंकि पूना जर्मन बैकरी धमाके के पश्चात जनपद के कुछ लापता युवकों का नाम उछाला गया था। गत सितम्बर में दिल्ली जामा मस्जिद गोलाबारी काण्ड को भी इण्डियन मुजाहिदीन से जोड़ते हुए आतिफ और साजिद की शहादत के बदले के तौर पर प्रस्तुत किया गया था। बनारस विस्फोट के बाद भी इण्डियन मुजाहिदीन के ईमेल के साथ ही मीडिया में संजरपुर के सम्बन्ध में खबरें छपने लगीं। यहाँ के वातावरण और ग्राम वासियों की प्रतिक्रिया को लेकर जो समाचार छपे वे कुछ इस प्रकार थे…………… ग्रामीणों के चेहरे के भाव ऊपर से पूरी तरह सामान्य पर अन्दर से असहज। ग्रामीणों ने कहा कि विस्फोट कहीं भी हो मगर उसके तार आजमगढ़ के संजरपुर से जोड़ दिए जाएँ तो हमारे लिए कोई चैकाने वाली बात नहीं। अब तो हम लोग यह सब सुनने के आदी हो गए हैं। (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर आज़मगढ़)…………… सुबह-शाम गुलज़ार रहने वाले संजरपुर के चट्टी चैराहों पर सन्नाटा छा गया। दहशत का आलम यह है कि अभिभावक अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ 2 अपना शहर आज़मगढ़)। हिन्दुस्तान में इस विषय पर उस दिन कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई थी। शायद यही कारण था कि प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अगले दिन हिन्दुस्तान टीम के हवाले से जो रिपोर्ट छपी उसका शीर्षक था पुलिसिया भय से संजरपुर वासी कर रहे पलायन। पत्र आगे लिखता है…….. बनारस विस्फोट में नाम जुड़ने से लोगों के माथे पर चिन्ता की लकीरें खिंच गईं यहाँ के निवासी पलायन कर रहे हैं। गुलजार रहने वाली चट्टी चैराहों पर सन्नाटा पसरा जा रहा है। लोग घरों मंे इस तरह दुबके हैं जैसे कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो (हिन्दुस्तान 10 दिसम्बर पृष्ठ नं0 3 आजमगढ़)।

लगभग सभी समाचार पत्रों में यह खबर भी छपी थी कि गाँव में प्रवेश करने वाले वाहनों को देख कर ग्रामवासी सहम जाते हैं। शायद पत्रकार बन्धुओं ने इसका अर्थ यह निकाला कि ए0टी0एस0 या किसी सुरक्षा एजेंसी के लोगों के आने की आशंका को लेकर सन्देह और भय के कारण ऐसा होता है। परन्तु इस असहजता का एक बड़ा कारण आरोपी युवकों और गाँव के प्रति स्वयं मीडिया का रवैया भी रहा है। ग्रामवासियों में यह आम धारणा है कि पत्रकार बन्धु कितनी ही लुभावनी और सहानुभूतिपूर्ण बातें करें पर छपने वाले समाचार एक पक्षीय और समुदाय विशेष के लोगों की छवि को धूमिल करने वाले ही होते हैं।
बनारस धमाके के बाद जब कुछ पत्रकारांे ने ए0टी0एस0 वालों से गाँव में आने के बाबत सवाल किया तो कई लोगों ने उन्हें बताया कि मंगलवार 7 दिसम्बर को दिन में 10-11 बजे के बीच चार से पाँच अज्ञात लोग जो किसी एजेन्सी से सम्बन्धित लगते थे संजरपुर बाजार में घूमते हुए देखे गए थे। उनके पास कुछ फोटो भी थे। परन्तु किसी समाचार पत्र ने बनारस धमाके से पहले इन अज्ञात लोगों की गतिविधियों का समाचार नहीं प्रकाशित किया। बटाला हाउस काण्ड के बाद से कई अवसरों पर ऐसे समाचार प्रकाशित हुए जो मनगढ़ंत, घोर आपत्तिजनक और वास्तविकता से कोसों दूर थे। गाँव के लोग उस समाचार को अब भी नहीं भुला पा रहें हैं जिसमें कहा गया था कि आतिफ और सैफ के बैंक खातों से बहुत ही अल्प अवधि में तीन करोड़ रूपयों का लेन देन हुआ है। हालाँकि यह समाचार बिल्कुल ही निराधार और झूठा था और इस आशय का प्रमाण भी पत्रकारों को दिया गया परन्तु किसी ने अब तक इसका खण्डन नहीं किया। शायद इन्हीं कारणों से पत्रकार ग्रामवासियों का विश्वास नहीं जीत पा रहें हैं और ग्रामवासी जब उन्हें देखकर असहज होते हैं तो पत्रकार उसका अलग अर्थ निकालते हैं………………….।
ये वे समाचार थे जिन्हें देखा और परखा जा सकता है तथा इनकी सत्यता को प्रमाणित भी किया जा सकता है इसी वजह से हमने इन्हें तथ्यात्मक समाचारों की श्रेणी में रखा है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इनमें स्पष्ट भिन्नता मौजूद है जिसे बहुत आसानी के साथ महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर वे समाचार हैं जिनका सम्बन्ध घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और उनके संगठन से है। यह जाँच का विषय है और जब तक कोई स्पष्ट संकेत न मिल जाय कोई भी समाचार सम्भावना और अनुमान की परिधि से बाहर नहीं जाना चाहिए। परन्तु समाचार माध्यमों ने इस लक्ष्मण रेखा को बार-बार पार किया है। वाराणसी धमाके के बाद भी आई0एम0 संजरपुर और आजमगढ़ को लेकर जिस तरह भावनात्मक समाचारों का प्रकाशन देखने को मिला वह बटाला हाउस काण्ड के पश्चात शुरू हुए मीडिया ट्रायल के विस्तार जैसा लगता है। 7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे
दशाश्वमेध घाट पर विस्फोट होता है। कथित रूप से आधे घंटे के बाद 7 बजे शाम को घटना की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 का ईमेल आता है। इसी ईमेल के आधार पर मुम्बई पुलिस आयुक्त संजीव दयाल की पत्रकार वार्ता के अंश सभी समाचार पत्रों में घटना के तीसरे दिन 9 दिसम्बर को प्रकाशित हुए जिसमें उनका कहना था…………. बनारस धमाके की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 के आका इकबाल भटकल और रियाज भटकल पाक में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)।……….. लेकिन निश्चित तौर पर इण्डियन मुजाहिदीन के मुख्य खिलाड़ी पाकिस्तान में बैठे हैं और वहीं से आतंक का खेल चला रहे हैं। यह पूछने पर कि मुख्य खिलाड़ी से उनके क्या मायने हैं? दयाल ने कहा निश्चित तौर पर भटकल बन्धुओं से (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6)। मुम्बई पुलिस आयुक्त का इण्डियन मुजाहिदीन और भटकल बन्धुओं पर इस आरोप का आधार आई0एम0 द्वारा भेजा गया ई-मेल था। हालाँकि ई-मेल जाँच की दिशा को भटकाने के लिए भी भेजा जा सकता है। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले घटना से सम्बन्धित अन्य समाचारों पर, जिनका सिलसिला विस्फोट के अगले दिन से ही शुरू हो गया, इण्डियन मुजाहिदीन का ई-मेल उसका स्रोत नहीं हो सकता।
7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे शाम को विस्फोट के बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन में मुश्किल से चार घण्टे का समय रह जाता है। चारांे ओर अफरा-तफरी और अफवाहांे का माहौल है। इण्डियन मुजाहिदीन के ई-मेल के अलावा कोई दूसरा सुराग नहीं है और उस ई-मेल की प्रमाणिकता की जाँच अभी होना बाकी है। घटना स्थल पर कोई अवशेष न पाए जाने के कारण जाँच का रुख भी तय नहीं हो पा रहा है ऐसी स्थिति में जब कि समाचारों के प्रकाशन में चार घण्टे से भी कम समय है, फिर भी अगले दिन के समाचार पत्रों में घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित कई संगठनों का नाम आया, उस में इण्डियन मुजाहिदीन के साथ आजमगढ़ की ओर भी उँगली उठाई गई। खास बात यह है कि उन्हीं संगठनों को शक के दायरे में रखा गया जिनसे मुस्लिम समुदाय पर ही आरोप आता हो। ………………. वैसे तो हाल फिलहाल अधिकारी हूजी और सिमी पर शक कर रहे हैं परन्तु इसमें लश्कर के हाथ होने का भी सन्देह है (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 15)। उसी दिन के दैनिक जागरण में आजमगढ़! पूर्वांचल (पृष्ठ 7) पर दो बड़ी खबरें छपीं। एक का शीर्षक है, ‘‘आतंकियों का ठिकाना रहा है आजमगढ़’’ और दूसरे का (शक की सुईं जनपद के फरार आतंकियों पर) पत्र आगे लिखता है………………… रात 9 बजे जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने वाराणसी मंे हिरासत में लिया हैं और जो कागजात उनके पास से मिले हैं, उससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि विस्फोट के तार आजमगढ़ से जुड़े हैं। सूचनाओं के बाद ए0टी0एस0 की एक टीम आजमगढ़ के लिए रवाना हो चुकी है। अमर उजाला की उसी दिन पृष्ठ नं0 14 पर हेड लाइन है-छः आतंकी अब भी फरार, कचहरी ब्लास्ट के आरोपी हैं दो आतंकी, इसी के साथ पिछले कुछ धमाकों और आजमगढ़ के गिरफ्तार और लापता युवकों की खबरें भी हैं। परन्तु उन धमाकांे का उल्लेख कहीं नहीं किया गया है जिनमें पहले सिमी. या हूजी जैसे संगठनों पर आरोप लगा था और अन्धाधुन्ध तरीके से मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन बाद में अभिनव भारत, सनातन संस्थान तथा संघ व उससे जुड़े अन्य संगठनों के सदस्यों के नाम प्रकाश में आए। उनमें से कई अब जेल में हैं और कई लापता। एक समाचार और, जो प्रमुखता से सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ वह था भाजपा के बनारस बन्द का। भाजपा की यह प्रतिक्रिया जिस तीव्रता के साथ आई उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह इसके लिए पहले से तैयार थी। इतने कम समय में घटना की पूरी जानकारी जुटा पाना आसान नहीं वह भी आतंकी विस्फोट जैसे गम्भीर मुद्दे पर।

यदि हम इसके बाद के समाचारों को देखें तो यह आभास होता है कि इण्डियन मुजाहिदीन के बहाने से संजरपुर और आजमगढ़ को टारगेट करने का एक अभियान चल पड़ा है। हालाँकि पहले ही दिन जिस प्रकार से आजमगढ़ का नाम आया उससे यह लगने लगा था कि कोई अज्ञात शाक्ति जाँच की दिशा को आजमगढ़ की ओर मोड़ने का प्रयास कर रही है। वह सिलसिला कुछ इस प्रकार आगे बढ़ता है:- ‘‘आजमगढ़ से जुड़ रहे हैं वाराणसी विस्फोट के तार, दिल्ली पुलिस को शक विस्फोट में फरार आतंकी डाॅ0 शहनवाज और असदुल्ला पर’’ शीर्षक से अमर उजाला लिखता है…………. ए0टी0एस0 ने दिल्ली पुलिस की थ्योरी को जाँच में शामिल कर लिया है (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6) उसी दिन के हिन्दुस्तान ने सीधे डाॅ0 शाहनवाज या अन्य किसी पर शक की सूईं नहीं घुमाई, परन्तु ‘‘नजरें फिर इण्डियन मुजाहिदीन पर’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में डाॅ0 शाहनवाज के नाम को हाई लाइट करने का प्रयास अवश्य मालूम होता है। पत्र लिखता है- 9 आरोपित पहले की वारदातों के बाद एजेंसियों के हत्थे चढ़ चुके हैं लेकिन डाॅ0 शाहनवाज सहित 7 आरोपित सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं………….।

गिरफ्तार किया गया मो0 सैफ डाॅ0 शाहनवाज का छोटा भाई है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में जो जानकारी है उसके अनुसार 2006 में बिहार के सीवान जिले से बी0यू0एम0एस0 की डिग्री प्राप्त कर लखनऊ के मेयो अस्पताल में काम कर चुका है लेकिन 13 सितम्बर 2008 को दिल्ली ब्लास्ट के बाद से फरार है (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 3 आजमगढ़)। 9 दिसम्बर को दैनिक जागरण ने अपने पहले पृष्ठ पर जो खबर छापी है उसमें तो लगभग डाॅ0 शाहनवाज को बनारस विस्फोट का आरोपी बना ही दिया है। समाचार पढ़ने पर किसी को भी यही आभास होगा कि मामला हल हो चुका है बस आधिकारिक घोषणा ही बाकी है। शीर्षक है- शाहनवाज का नाम आते ही सक्ते में संजरपुर, खुफिया एजेंसियों ने शक की सुईं यहाँ के डाॅ0 शाहनवाज की तरफ घुमाई है। हालाँकि यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया कि शाहनवाज कौन और कहाँ का रहने वाला है।………. वैसे खुफिया सूत्रों की मानें तो डाॅ0 शाहनवाज ही मंगलवार की शाम वाराणसी में गंगा आरती के समय हुए विस्फोट का सूत्रधार है और वह संजरपुर का ही रहने वाला है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में आई0बी0 के हवाले से वाराणसी विस्फोट के पहले और बाद में भी यह समाचार छप चुका है कि वह शारजह पहुँच गया है। कितनी विचित्र बात है कि यहाँ उसके सम्पर्क सूत्रों का पता लगाने से पहले ही उसे सूत्रधार घोषित कर दिया गया। इस प्रकार के समाचार जाँच एजेंसियों के लिए निमन्त्रण जैसे लगते हैं कि कहीं भटकने की जरूरत नहीं है। संजरपुर और आजमगढ़ चले आइए गुत्थी सुलझ जाएगी। इन समाचारों की विश्वसनीयता का अन्दाजा दैनिक जागरण में प्रदेश सरकार के हवाले से प्रकाशित उस समाचार से किया जा सकता है जिसका शीर्षक है ‘‘अहम सुराग के लिए जी तोड़ मशक्कत’’, पत्र आगे लिखता है……… प्रदेश सरकार ने माना कि वाराणसी में मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट को लेकर उसे कोई सुराग नहीं मिल पाया है………… घटना को अंजाम देने वाले संगठन की पहचान नहीं हो सकी है…….. घटनास्थल से बैटरी रिमोट कंट्रोल डिवाइस एवं छर्रे भी नहीं मिले हैं…………. बृजलाल ने पत्रकारों को बताया कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है जिससे पुख्ता तौर पर किसी आतंकी संगठन का नाम लेकर कहा जा सके कि उसने घटना को अंजाम दिया है……….. रासायनिक जाँच करके यह पता लगाया जाएगा कि विस्फोट को अंजाम देने वाला आतंकी संगठन कौन सा हो सकता है।………. वाराणसी विस्फोट के पीछे डाॅ0 शाहनवाज की भूमिका होने के बाबत पूछे गए सवाल पर उन्हांेने कहा कि विस्फोट में डाॅ0 शाहनवाज शामिल था या नहीं इस बारे मंे अभी तक कोई सुबूत नहीं मिले हैं और न ही ए0टी0एस0 ने पूछ-ताछ के लिए किसी को उठाया है (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर पृष्ठ 11)।
ए0डी0जी0 उ0प्र0 के उपर्युक्त स्पष्ट बयान से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि किसी संगठन, व्यक्ति या स्थान विशेष का नाम लेकर उस समय तक प्रकाशित सभी समाचार आधारहीन थे। इसे मात्र कयास या अनुमान ही कहा जा सकता है। परन्तु इस आशय की खबरों को लेकर जिस प्रकार सभी अखबारों में समानता पाई जाती है उस पर सवाल उठना लाजिमी है कि वे अधिकारी, सुरक्षा एजेंसियाँ या खुफिया सूत्र कौन से हैं जिनको उद्धृत करके यह एक तरफा समाचार प्रकाशित हुए और लगभग सभी समाचार पत्रों में इन्हीं सूत्रों के हवाले से छपे। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य कुछ शक्तियाँ हैं जो लगातार समाचार माध्यमों को एक ही प्रकार के इनपुट्स देती रही हैं ताकि जाँच कोे एक खास दिशा दी जा सके। 9 दिसम्बर को इन सभी समाचार पत्रों ने वाराणसी विस्फोट पर सम्पादकीय भी लिखे हैं जो काफी संतुलित हैं।
इसकी सराहना इस लिए भी की जानी चाहिए कि इसमें ए0डी0जी0 कानून व्यवस्था के बयान की झलक भी है और निष्पक्ष जाँच के लिए प्रेरित करने की सामग्री भी। इसके बावजूद डाॅ0 शाहनवाज, संजरपुर और आजमगढ़ को लक्ष्य बनाकर छपने वाली खबरों का सिलसिला जारी रहा। अमर उजाला 10 दिसम्बर पृष्ठ 2 आजमगढ़ में ‘‘शाहनवाज संग तीन अन्य संदिग्धों की तलाश’’ शीर्षक से लिखता है………. मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट के मामले में आजमगढ़ के डाॅ0 शाहनवाज के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी होने के बाद से यहाँ उसके सम्पर्कों की तलाश शुरू हो गई है। गुरुवार की शाम तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है जिनसे किसी अज्ञात स्थान पर पूछ ताछ चल रही है।
(धमाके में आई0एम0 के स्लीपर एजेन्ट का इस्तेमाल सम्भव) शीर्षक से हिन्दुस्तान (10 दिसम्बर पृष्ठ 10) लिखता हैं…………. वाराणसी में हुए बम धमाके को लेकर खुफिया विभाग (आई0बी0) के हाथ पूरी तरह खाली हैं। आई0बी0 को अभी पुख्ता तौर पर यह पता नहीं है कि बम धमाके को अंजाम किस आतंकी संगठन ने दिया है और उसका उद्देश्य क्या है।…………. कामन वेल्थ खेलों से पहले मिले इनपुट्स के आधार पर दिल्ली पुलिस के अधिकारी मान रहे हैं कि इसके पीछे इण्डियन मुजाहिद (आई0एम0) का हाथ हैं, हालाँकि इस मामले में अभी तक दिल्ली पुलिस के हाथ में कुछ नहीं है।

अगर इन सभी समाचारों का विश्लेषण किया जाय तो कई प्रकार के सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि डॉक्टर शाहनवाज और असदुल्ला को धमाके से जोड़ने का आधार क्या है? यदि इण्डियन मुजाहिदीन के ईमेल को आधार माना जाय तो आरोप रियाज भटकल और इकबाल भटकल पर जाता है जैसा कि मुम्बई पुलिस आयुक्त के बयान से जाहिर होता है। दिल्ली पुलिस को कामन वेल्थ खेलों से पहले अगर कोई इनपुट्स मिले थे तो उँगली इण्डियन मुजाहिदीन पर जरूर उठती है परन्तु उक्त दोनांे युवकों को इस आधार पर जिम्मेदार मानने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। इसके अतिरिक्त देश की सुरक्षा से जुड़ी इस महत्वपूर्ण जानकारी से दिल्ली पुलिस ने उ0प्र0 पुलिस को उस समय आगाह क्यों नहीं किया? दिल्ली पुलिस की बगैर किसी सुबूत के डाॅ0 शाहनवाज और असदुल्ला का नाम धमाके से जोड़ने में दिलचस्पी के अपने कारण हो सकते हैं। बटाला हाउस काण्ड को लेकर उठने वाले सवाल और बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उसे फर्जी मुठभेड़ों की सूची में शामिल किए जाने पर अपने केस को पुख्ता बनाने के लिए, वहाँ आरोपी बनाए गए युवकों के खिलाफ उनके आतंकवादी

गतिविधियों में लिप्त होने के नवीन पूरक साक्ष्यों की जरूरत है। वाराणसी विस्फोट में डाॅ0 शाहनवाज या असदुल्ला को आरोपी बनाए जाने की सूरत मंे उसकी राह आसान हो सकती है। इसके अलावा अमर उजाला में चण्डीगढ़ से आशीष शर्मा की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है (कराँची में रियाज और शारजाह में शहनवाज ने मिल कर रची साजिश) ब्लास्ट के पीछे गजनी माड्यूल, रिपोर्ट में कहा गया है……… बनारस ब्लास्ट के पीछे मुजाहिदीन (आई0एम0) के नए माड्यूल ‘‘गजनी’’ का हाथ है……….इस बात के संकेत बनारस की जाँच कर रहे एक अधिकारी ने दिए हैं। उनके मुताबिक बटाला हाउस इन्काउन्टर के दौरान पकड़े गए आतंकी सैफ ने बताया था कि आई0एम0 ने भारत मंे तबाही मचाने के लिए तीन माड्यूल बनाए थे। एक महाराष्ट्र और गुजरात के लिए, दूसरा साउथ के लिए और तीसरा उत्तर भारत के लिए। पहले दो को ध्वस्त करने मंे गुजरात और महाराष्ट्र पुलिस ने सफलता प्राप्त कर ली थी लेकिन तीसरे सबसे महत्वपूर्ण गजनी का सुराग नहीं लग पाया था।
इसे आपरेट करने की जिम्मेदारी आजमगढ़ के डाॅ0 शाहनवाज के पास थी…..अधिकारी का यह भी कहना है कि बनारस धमाके से पहले करीब 25 सदस्यों ने रेकी की थी इनमें वे भी शामिल हैं जो अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद से फरार चल रहे हैं (अमर उजाला 13 दिसम्बर पृष्ठ 18)। इस रिपोर्ट में भी डाॅ0 शाहनवाज को कटघरे मेें खड़ा किया गया है परन्तु रियाज भटकल के साथ। ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की थ्योरी और मुम्बई पुलिस आयुक्त के बयान में सामंजस्य उत्पन्न करने का प्रयास करने वाली इस रिपोर्ट से मात्र बनारस धमाके का मामला ही हल नहीं हो जाता बल्कि उत्तर भारत में यदि भविष्य में ऐसी कोई वारदात होती है तो उसकी जिम्मेदारी आसानी से इण्डियन मुजाहिदीन के इसी गजनी माड्यूल के सिर थोपी जा सकती है। रिपोर्ट मंे जिस गजनी माड्यूल का सुराग उस समय न मिल पाने की बात कही गई है उसका नाम गुजरात पुलिस महा निदेशक द्वारा उसी समय लिया गया था जब उन्होंने आई0एम0 के अस्तित्व और उसे सिमी से जोड़ने का (सिमी के पहले एस. और बाद के आई को निकालकर) नाटकीय प्रस्तुतीकरण किया था।
बनारस धमाके के बाद इण्डियन मुजाहिदीन समेत जिन संगठनों पर शक जाहिर करते हुए अधिकारियों, सुरक्षा एजेंसियों तथा खुफिया सूत्रों के हवाले से समाचार प्रकाशित एवं प्रसारित हुए उसमें आतंकवादियों का सम्बन्ध मुस्लिम समुदाय से होना ही जाहिर होता है। साधारण नागरिक के लिए इसमें एक बड़ा सवाल है। सम्भवतः इसके तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं। पहला यह कि घटना के तुरन्त बाद आई0एम0 ने ईमेल भेज कर विस्फोट की जिम्मेदारी कबूल की और इससे जुड़े आतंकियों का सम्बन्ध इसी समुदाय से माना जाता है। हालाँकि इस संगठन के अस्तित्व को लेकर लगातार संदेह व्यक्त किया जाता रहा है। दूसरा कारण विस्फोट का एक हिन्दू धर्म स्थल पर होना और तीसरा निहित कारणों से सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों में बैठे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों की कारस्तानी तथा धु्रवीकरण की राजनीति। जहाँ तक इण्डियन मुजाहिदीन द्वारा ईमेल भेजकर घटना की जिम्मेदारी लेने का सवाल है तो इसमें इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जाँच की दिशा को एक खास रुख देने के लिए किसी और ने इण्डियन मुजाहिदीन के नाम से यह ईमेल भेजा हो। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब विस्फोट करने वालों ने ऐसे प्रयास किए हैं जिससे आरोप मुस्लिम युवकों पर लगने का मार्ग प्रशस्त हो सके। नांदेड़ में बम बनाते हुए बजरंग दल के कार्यालय में हुए विस्फोट में उसके कार्यकर्ताओं की मौत के बाद वहाँ से नकली दाढ़ी, टोपी और ऐसे वस्त्रों का बरामद होना जो आम तौर से मुस्लिम समुदाय में प्रचलित है ऐसे ही षड्यन्त्र का एक हिस्सा था। मालेगाँव बम धमाके में जिस बाइक का प्रयोग किया गया और जाँच के बाद जिसका सम्बन्ध प्रज्ञा सिंह ठाकुर से स्थापित हुआ उस पर ऐसे स्टीकर चिपकाए गए थे जिससे विस्फोट में सिमी का हाथ होना साबित हो। आतंकी इस प्रयास में उस समय सफल भी रहे थे। कानपुर में बम बनाते समय हुए धमाके में विश्व हिन्दू परिषद के सदस्यों का मारा जाना और भारी मात्रा में गोला बारूद का बरामद होना एक महत्वपूर्ण संकेत था कि उ0प्र0 में भी हिन्दूवादी संगठनों से जुड़े अतिवादी सोच के लोग सक्रिय हैं और इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दे सकते हंै। यह घटना चूँकि उ0प्र0 में ही हुई थी इस लिहाज से पिछले धमाकों के अवलोक में इसको अवश्य शामिल किया जाना चाहिए था। परन्तु किसी भी समाचार पत्र में यह देखने को नहीं मिला। इसी प्रकार यह मान लेना कि बनारस विस्फोट एक हिन्दू धर्म स्थल पर धार्मिक अनुष्ठान के दौरान हुआ इसलिए इसमें सनातन संस्थान, अभिनव भारत या संघ से जुड़े अन्य संगठनों के चरम पंथियों का हाथ नहीं हो सकता। इसी वजह से शक सिर्फ इण्डियन मुजाहिदीन, हूजी या लश्कर जैसे संगठनों पर किया जाना चाहिए तो यह तर्क मान्य नहीं हो सकत

यदि मक्का मस्जिद में ठीक जुमा की नमाज के समय हुए धमाकों का आरोप मुस्लिम युवकों पर आ सकता है और उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है। अजमेर शरीफ दरगाह में रमजान के महीने में अफ़्तार के समय हुए धमाके के आरोप में मुस्लिम नौजवानों को हिरासत में लिया जा सकता है। मालेगाँव जैसे मुस्लिम बाहुल्य नगर मंे आतंकी विस्फोट के बाद उसी समुदाय के लोगों को मुल्जिम बनाया जा सकता है तो दशाश्वमेध घाट पर हुए आतंकी विस्फोट मंे पहले की आतंकी वारदातों में शामिल हिन्दू संगठनों को शक के दायरे से बाहर रखने का औचित्य क्या है? वाराणसी घटना के बाद एक बार भी किसी ऐसे संगठन के सम्बन्ध में कोई भी खबर प्रकाशित नहीं हुई जिसमें उन पर शक की बात कही गई हो। अब इस बात को स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि आतंकवाद की कोई आस्था नहीं होती। आतंकवादी न ही हिन्दू होता है न मुसलमान। वह सिर्फ आतंकवादी होता है। नफरत फैलाना और मासूमों का खून करना ही उसका मकसद होता है वह यह काम मस्जिद-मन्दिर, मधुशाला या बाजार कहीं भी कर सकता है।

किसी आतंकवादी घटना के पश्चात् मीडिया के, एक ही समुदाय से जुड़े संगठनों के प्रति आक्रामक रवैये के पीछे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया विभाग, स्वयं मीडिया से जुड़े साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग और मीडिया के बाजारवादी सिद्धान्त के साथ-साथ धु्रवीकरण की राजनीति भी है। मक्का मस्जिद हैदराबाद, अजमेर शरीफ दरगाह और मालेगाँव धमाकों के तुरन्त बाद भी इस प्रकार का माहौल बनाया गया था। समझौता एक्स0 धमाकों के रहस्यों पर से पर्दा उठने के बाद तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ रहा है। इन सभी धमाकों में मुस्लिम युवकांे को आरोपी बनाकर षड्यंत्रों का खुलासा कर लेने का दावा किया गया था। गवाह और सुबूत होने की बात भी कही गई थी। निश्चित रूप से सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों में बैठे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों का उन्हें भरपूर सहयोग प्राप्त था। महाराष्ट्र ए0टी0एस0 प्रमुख के0पी0 रघुबंशी पर कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बचाने का आरोप लगता रहा है। आतंकी विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार कर्नल पुरोहित से उनकी घनिष्टता भी कोई ढकी छुपी बात नहीं रह गई है। गुजरात में पुलिस कमिश्नर बंजारा समेत कई अधिकारी फर्जी मुठभेड़ में आतंकवादी बताकर मुस्लिम युवकों और युवतियों की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। यदि सघन जाँच की जाए तो यह सूची काफी लम्बी हो सकती है। निःसन्देह उच्चतम स्तर पर इस तिकड़ी को राजनैतिक समर्थन भी प्राप्त था। कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के बाद संघ और भाजपा ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। स्वर्गीय हेमन्त कर्करे की खुलेआम आलोचना ही नहीं की गई बल्कि प्रत्यक्ष रूप से जाँच को प्रभावित करने की गरज से उन पर दबाव भी डाला गया। हिन्दूवादी संगठनों की तरफ से उन्हें मुसलसल धमकियाँ भी मिलती रहीं। सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं पर सभी आतंकवादी मुसलमान जरूर हैं जैसे बयान देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी के गुस्से को शान्त करने के लिए प्रधानमंत्री के सलाहकार ने उनसे मुलाकात भी की थी। यह सारी कवायद इसलिए थी कि असली आतंकवादी को कानून के शिकंजे से बाहर निकालकर आरोप मुस्लिम युवकों पर ही बना रहे और पूरे मुस्लिम समुदाय को दानव के रूप में प्रस्तुत कर हिन्दुओं में असुरक्षा की भावना को जागृत किया जाए। इस प्रकार राजनैतिक धु्रवीकरण के लिए वातावरण तैयार किया जा सके। वाराणसी विस्फोट के बाद जिस तरह से इण्डियन मुजाहिदीन, डा0 शाहनवाज व असदुल्ला के साथ अन्य संगठनों का नाम बार-बार लिया गया, चाहे वे

अधिकारियों व खुफिया सूत्रों के हवाले से हांे या मीडिया में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों की अपने दिमाग की उपज। वाराणसी विस्फोट के बाद उसी प्रकार का वातावरण निर्मित करने की कोशिश की गई, इससे यह सन्देह अवश्य पैदा होता है कि कहीं फिर वही कहानी दुहराने का षड्यन्त्र तो नहीं रचा जा रहा है जो इससे पूर्व हैदराबाद, अजमेर, मालेगाँव और समझौता एक्स0 धमाकों के बाद किया गया था और इन्हीं धमाकों में संघ के प्रचारक इन्दे्रश कुमार जैसे लोगों के शामिल होने के समाचारों से जनता का ध्यान हटाने की साजिश हो रही है।

-मसीहुद्दीन संजरी

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