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Archive for जून, 2011

अमरीका ने एलान कर दिया है कि ‘दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी’ और अलकायदा का नेता ओसामा बिन लादेन मारा गया। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मानें तो अमरीकी फौजियों की एक इलीट टुकड़ी ने ओसामा बिन लादेन को एक आपरेशन में इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में मार गिराया है। ओबामा के मुताबिक, यह एक अमरीकी आपरेशन था जो सीधे उनके निर्देशन में चला।

अमरीकी टी.वी. चैनलों और समाचार माध्यमों के मुताबिक, इस खबर के बाद से अमरीका में जश्न का माहौल है। यही नहीं, ब्रिटेन से लेकर आस्ट्रेलिया तक के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की ओर से खुशी और बधाई के सन्देश चैनलों पर गूँज रहे हैं।
भारतीय न्यूज चैनल भी अमरीकी प्रतिष्ठान के हवाले से आ रही खबरों को पूरे उत्साह के साथ दोहराने में लगे हैं। हमेशा की तरह विजेता के बतौर अमरीकी वीरता और पराक्रम की कहानियाँ मिर्च मसाला लगाकर सुनाई जा रही हैं। इस सबके बीच सिर्फ अब यही बाकी बच गया है कि मारे गए ओसामा की छाती पर पैर रखे और हाथों में बंदूक लिए ओबामा की तस्वीरें नहीं दिखाई गई हैं।
लेकिन सच बात यह है कि कहानी बहुत सरल और सीधी है। न्यूज चैनलों पर मत जाइए, उनका तो काम है कि कहानी में सनसनी, सस्पेंस और ड्रामा डालने के लिए एक से एक पेंच और ट्विस्ट घुसाएँ।
यह ठीक है कि ओसामा बिन लादेन मारा गया, लेकिन उसका यह अंत पहले दिन से ही तय था। सच तो यह है कि अगर वह अब तक जिन्दा था तो इसकी वजह भी यह थी कि उसे और उससे भी ज्यादा उसके नाम के आतंक को खुद अमरीका ने जिन्दा रखा था। आखिर यह “जिहादी आतंकवाद” के खिलाफ “वैश्विक युद्ध” का सवाल था।
अमरीका को ओसामा के नाम और आतंक की जरूरत कई कारणों से थी। ओसामा को पकड़ने और अल कायदा को खत्म करने के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला किया गया। इसके लिए उसे बहुत बहाना नहीं बनाना पड़ा। साथ ही, पाकिस्तान में घुसपैठ बढ़ाने का मौका मिला। इसके साथ ही मध्य एशिया में पैर जमाने को जगह मिली। इराक पर हमले के लिए जमीन तैयार करने में बहुत कसरत नहीं करनी पड़ी।
साफ है कि इस सबके लिए ओसामा का जिन्दा रहना बहुत जरूरी था। वैसे भी अमरीका बिना एक वैश्विक दुश्मन के नहीं रह सकता है। इस दुश्मन के नाम पर ही अमरीकी सैन्य औद्योगिक गठजोड़ का खरबों डालर का कारोबार चलता है। आश्चर्य नहीं कि अमरीका ने शीत युद्ध के बाद ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की फर्जी सैद्धांतिकी के आधार पर ओसामा बिन लादेन के रूप में एक वैश्विक दुश्मन खड़ा किया।
अन्यथा यह सच किससे छुपा है कि ओसामा और उसके साथियों को जेहाद के नारे के साथ खड़ा करने में अमरीका की सबसे बड़ी भूमिका थी? लेकिन अब अमरीका को ओसामा की जरूरत नहीं रह गई थी। न सशरीर और न ही आतंक के एक प्रतीक के रूप में, कारण यह कि अब अमरीका अफगानिस्तान से सम्मानजनक तरीके से निकलना चाहता है। वह यह लड़ाई नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि सैन्य तौर पर भी हार रहा था।
ओबामा ने बहुत पहले ही घोषित कर दिया था कि उनकी प्राथमिकता अफगानिस्तान की लड़ाई को जल्दी से जल्दी जीतकर वहाँ से बाहर निकलना है। लेकिन पिछले तीन सालों में यह साफ हो चुका था कि अमरीका अफगानिस्तान में जीतने नहीं जा रहा है। उल्टे उसे और खासकर नाटो के सैनिकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। सबसे बड़ी बात अमरीका को यह भी लगने लगा था कि अफगानिस्तान से कुछ खास मिलने वाला भी नहीं है। मतलब न वहाँ तेल है और न ही कोई और बेशकीमती खनिज, फिर वहाँ रुकने से क्या फायदा? लेकिन अमरीका को वहाँ से निकलने के लिए ‘जीत’ जरूरी थी। यह ‘जीत’ इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि अगले साल अमरीका में राष्ट्रपति के चुनाव हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ महीनों से ओबामा की लोकप्रियता लगातार ढलान पर थी। उनके दोबारा जीत के लिए कुछ ड्रामैटिक होना जरूरी था। इसके लिए ओसामा बिन लादेन से उम्दा प्रत्याशी और कोई नहीं था।
जाहिर है कि ओबामा की ‘जीत’ के लिए लादेन का मरना जरूरी था, और लादेन मारा गया। कहानी खत्म, बच्चों बजाओ ताली!

-आनन्द प्रधान
मो0:- 09818305418

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28 मार्च 1979 को अमेरिका के पेनसिल्वानिया इलाके में थ्री माइल आइलैण्ड में परमाणु हादसा हुआ। बीस मील के दायरे में रहने वाली करीब 6 लाख आबादी की से इलाका खाली करवाया गया। हादसे में हुई मौतों पर कोई अधिकृत विश्वसनीय बयान भले न दिया गया हो लेकिन परमाणु संयंत्र के नजदीक रहने वाली आबादी में अनेक खतरनाक बीमारियों के बढ़ने की अनेक गैर सरकारी रिपोर्टें आयी हैं। परमाणु विकिरण युक्त 40 हजार गैलन पानी को नजदीकी नदी में छोड़ देने पर अमेरिकी प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की जनता में खूब थू-थू हुई। अमेरिका भी परमाणु सुरक्षा के मामले में अपनी अचूक व्यवस्था का भरपूर दम भरता था। थ्री माइल आइलैण्ड के परमाणु हादसे के बाद अमेरिका ने अपने मुल्क में कोई नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया।

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चेर्नोबिल हादसे को इस वर्ष की 26 अप्रैल को 25 वर्ष हो गए। तत्कालीन सोवियत संघ के उक्रेनियन गणराज्य में हुए उस हादसे में कितने लोग मारे गए, इसके आँकड़े आश्चर्यजनक हद तक विरोधाभासी हैं। कुछ सूत्र चेर्नोबिल के हादसे से मात्र 31 लोगों की मौत हुई मानते हैं, कुछ तीन से चार हजार और कुछ के मुताबिक चेर्नोबिल से हुए रेडिएशन की वजह से 1986 से 2004 के बीच 9 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। रेडिएशन से प्रभावित करीब सवा लाख हेक्टेयर जमीन को हादसे के बाद से अब तक, और आगे भी न जाने कितने वर्षों तक के लिए किसी भी तरह की जैव उपस्थिति के लिए खतरनाक घोषित कर दिया है।
चेर्नोबिल दुनिया के अति सुरक्षित कहे जाने वाले परमाणु संयंत्रों में से एक था। सोवियत संघ की आपातकालीन सुरक्षा का आलम ये था कि संयंत्र के पास मौजूद समूचे प्रिपयात शहर की आबादी को उन्होंने महज कुछ ही घंटों के भीतर खाली करवा लिया था।

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और सन् 2011 की 11 मार्च को जापान में सूनामी और भूकंपों की तबाही झेल रहे जापान को फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में दुर्घटना का कहर झेलना पड़ा। जापान में इसका इंसानों के जीवन और स्वास्थ्य पर कितना असर हुआ है, ये तथ्य तो अभी बाहर नहीं आये हैं। जो जानें गयीं, उनमें कितनों के लिए भूकंप को, कितनों के लिए सूनामी को और कितनों के लिए परमाणु हादसे को जिम्मेदार माना जा सकता है, ये एक अलग ही कवायद है। लेकिन इतना तो स्थापित हो ही गया कि जापान, जो धरती और समंदर की करवटों और मिजाज को बहुत अच्छे से जानता है और जिसकी सुरक्षा व्यवस्था भी विश्व के अन्य विकसित देशों से कम नहीं थी, वो भी अपने परमाणु संयंत्र को दुर्घटना से नहीं बचा सका।
……
अमेरिका, सोवियत संघ और जापान – तीनों ही देश तकनीकी और विज्ञान के मामले में दुनिया के अग्रणी और अत्यंत सक्षम देशों में से हैं। तीनों ही देशों में श्रेष्ठ तकनीकी, श्रेष्ठ वैज्ञानिक और राज्य की पूरी मशीनरी का साथ होने के बावजूद परमाणु संयंत्रों में दुर्घटनाओं को टाला नहीं जा सका।
अन्य देशों की प्रतिक्रियाएँ और फ्रांस की फुकुशिमा के हादसे के बाद तो पोलैण्ड, इटली, स्विट्जरलैण्ड, जर्मनी सहित दुनिया के अनेक देशों ने अपने देशों में प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को स्थगित कर दिया है। अकेले योरप में ही सब मिलाकर करीब 150 रिएक्टर हैं जिनमें से आधे बिजली बनाने के काम में आते हैं। स्विट्जरलैण्ड ने अपने उन पाँच रिएक्टरों को बदलकर नये रिएक्टर लगाने का निर्णय रोक लिया है जिनकी उम्र पूरी हो गई थी। इटली चेर्नोबिल हादसे के बाद से ही परमाणु ऊर्जा से तौबा किये बैठा है। उसने अपना आखिरी परमाणु रिएक्टर भी 1990 में बंद कर दिया था। हालाँकि अपनी ऊर्जा जरूरतों का 10 प्रतिशत अभी भी वो परमाणु ऊर्जा से पूरा करता है लेकिन वो ऊर्जा वो खुद न पैदा करके आयात करता है। वैसे इटली भी वापस परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के बारे में पुनर्विचार कर ही रहा था लेकिन जापान के हादसे ने उन विचारों को भी स्थगित कर दिया। योरप में आॅस्ट्रिया परमाणु ऊर्जा से पूरी तरह मुक्त देश है लेकिन इससे वो सुरक्षित होने का भ्रम नहीं पाल सकता। आस-पड़ोस के देशों के परमाणु संयंत्रों में होने वाली दुर्घटना का असर वहाँ पड़ेगा ही पड़ेगा। इसलिए आॅस्ट्रिया सभी देशों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वो परमाणु ऊर्जा के विकल्प की तलाश करें न कि परमाणु ऊर्जा के विनाशकारी स्वरूप को कम करके आँकने की।
हाँ, फ्रांस की प्रतिक्रिया जरूर इन सब की तुलना में अधिक ढुलमुल रही। फ्रांस, दरअसल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के बाद षिखर पर दूसरे सर्वोच्च स्थान पर है। उसके पास 19 परमाणु संयंत्र हैं जिनमें 58 रिएक्टर काम करते हैं और उनसे फ्रांस की करीब 80 प्रतिशत ऊर्जा पैदा होती है। इस रास्ते पर सरपट दौड़ रहे फ्रांस के साथ ऐसा नहीं है कि वहाँ कभी कोई परमाणु दुर्घटना न घटी हो। स्तर 4 की दो बड़ी परमाणु दुर्घटनाएँ वहाँ 1969 और 1980 में घट चुकी हैं। उनके अलावा भी 2008 में एक ही हफ्ते में दो बार अरेवा के ही परमाणु संयंत्रों में यूरेनियम रिसाव की दुर्घटनाएँ हुईं। एक बार तो यूरेनियम टब से निकलकर भूजल में जाकर मिल गया और दूसरी बार पाइप फटने से यूरेनियम रिसाव हुआ। जाँच अधिकारियों ने पाया कि पाइप बरसों पुराना था और उसका लगाा रहना लापरवाही का नतीजा था। अरेवा के अधिकारियों ने माना कि गलती पकड़े जाने से पहले तक उससे 120 से 750 ग्राम यूरेनियम का रिसाव हो चुका होगा। इसी तरह दूसरे मामले में यूरेनियम का रिसाव हुआ और वो पास की दो नदियों और भूजल में जाकर मिल गया। परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों ने तत्काल दोनों नदियों और आसपास के कुओं के पानी का उपयोग बंद करवाया। खेतों में पौधों को पानी देना भी बंद कर दिया गया। खुद अरेवा कंपनी ने इस दुर्घटना को गंभीर मानते हुए अपने प्लांट डाइरेक्टर को नौकरी से हटा दिया लेकिन आधिकारिक तौर पर उसने इसे स्तर 1 की परमाणु दुर्घटना मानने पर जोर दिया और कहा कि इससे किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। हालाँकि दुर्घटना के स्तर का सही संदर्भ यह जानने पर बनता है कि स्तर 1 की दुर्घटनाएँ फ्रांस में 2006 में 114 हुई थीं और 2007 में 86।
परमाणु संयंत्र बनाने, यूरेनियम उत्खनन करने, परमाणु कचरे को ठिकाने लगााने आदि में वहाँ की अरेवा कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। अरेवा कंपनी की मालिक फ्रांस की सरकार है। भारत में पिछले दिनों आये फ्रांस के राष्ट्रपति ने घूमने-फिरने, हाथ मिलाने, राजनयिक भोजन करने के अलावा जो एक काम पूरी मुस्तैदी से किया था, वो था अरेवा कंपनी द्वारा महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर परमाणु संयंत्र के लिए परमाणु रिएक्टर अरेवा की ओर से तैयार करने का करार। बेशक तब तक फुकुशिमा नहीं हुआ था, लेकिन चार साल से जैतापुर क्षेत्र के लोग तो उस परमाणु परियोजना का विरोध कर ही रहे थे। विरोध और भी स्तरों पर जारी था। दिल्ली में हस्ताक्षर अभियान चला, वामपंथी सांसदों ने मामला उठाया। एक स्वतंत्र दल ने वहाँ के लोगों से मिलकर और परियोजना के तकनीकी पहलुओं को लेकर एक रिपोर्ट जनता के बीच प्रसारित की। फिर फुकुशिमा हुआ। भारत सरकार ने जापान के लिए संवेदनाएँ इत्यादि प्रकट करने के बाद कहा कि जैतापुर परमाणु संयंत्र किसी भी हालत में नहीं रुकेगा।
जैतापुर में विरोध क्यों?
फुकुशिमा के हादसे के बाद भी भारत सरकार जैतापुर में 10000 मेगावाट क्षमता वाला परमाणु संयंत्र लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने को भी तैयार नहीं है। एक ही स्थान पर स्थापित होने वाला ये दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र होगा। जल्दबाजी में, बगैर जरूरी जानकारियों को इकट्ठा और विश्लेषित किये ये परमाणु ऊर्जा संयंत्र वहाँ के ग्रामीण निवासियों पर थोप दिया गया है। पहले तो स्थानीय लोगों को कुछ हजार रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा लेकर टरकाना चाहा लेकिन जब स्थानीय लोगों ने जमीन छोड़ने से इन्कार किया तो मुआवजे की राशि बढ़ाकर पिछले साल 4.5 लाख रुपये और बाद में 10 लाख रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ा दी गयी, लेकिन प्रभावितों में से इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ किसी ने मुआवजा नही लिया। दूसरी तरफ अधिकारी ये दोहराते रहे कि वो जमीन तो बंजर है, खाली पड़ी है और 50-60 प्रतिशत जमीन का तो कोई दावेदार भी नहीं है, इसलिए परियोजना निर्माण में कोई बाधा नहीं है। सरकार की एक एजेंसी द्वारा किये गए एक अध्ययन के बाद कहा गया कि वहाँ मछुआरों का कोई गाँव ही नहीं है जबकि जब विरोध करने वाले लोगों पर पुलिस दमन हुआ तो वो मछुआरों के गाँव सखरी नाटे में ही हुआ, जो आदमी मारा गया, वो भी मछुआरा ही था।
परियोजना से प्रभावित होने वाले सभी गाँवों की ग्राम पंचायतों ने बाकायदा प्रस्ताव पारित करके परियोजना का विरोध किया है और वहाँ के लोग पिछले पाँच बरसों से अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। कुछ परिवारों को छोड़कर बाकी लगभग सभी परिवारों ने सरकार द्वारा दिये जा रहे मुआवजे को नहीं लिया है फिर भी राष्ट्रीय हित का बहाना लेकर सरकार ने उनकी जमीनों पर भूमि अधिग्रहण कानून के अनुच्छेद 17 का इस्तेमाल करके आपातकाल प्रावधान के तहत परियोजना के लिए लोगों की 953 हेक्टेयर कब्जा कर लिया है। लेकिन लोगों के विरोध और उनके सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रही है। इस परियोजना के पहले जो अध्ययन होने चाहिए थे, वो पूरे होने के पहले, और आसपास के जनजीवन, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों पर परमाणु ऊर्जा के होने वाले असरों को जाँचने के पहले ही जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया। इसमें उन लोगों का कोई ध्यान भी नहीं रखा गया जो जमीनों के मालिक भले न हों तो भी जिनका जीवन मुख्य रूप से मछलीपालन जैसी समुद्र से जुड़ी हुई गतिविधियों पर निर्भर रहता है। बेशक परियोजना के स्थानीय विरोध की वजह लोगों की परमाणु ऊर्जा के खतरों के बारे में जागरूकता नहीं, बल्कि उनका सरकारी वादों के प्रति संदेह और अपनी आजीविका के उजड़ने का खतरा प्रमुख रहा होगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उससे आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा के सर्वग्रासी और भस्मासुरी स्वरूप की भी जानकारी हासिल कर ली है। पिछले 4-5 वर्षों से जैतापुर के आसपास के लोग जाकर तारापुर के पड़ोसी गाँवों के निवासियों से मिल रहे थे और जानकारियाँ ले रहे थे उनसे जो खुद लगभग 50 बरस पहले के भुक्तभोगी रहे हैं। तारापुर वालों के बताये वो जानते हैं कि जो सरकार बिजली बनाने और फिर सस्ती बिजली देने का झुनझुना उन्हें पकड़ा रही है वो तारापुर में भी कर चुकी है और तारापुर के आसपास रह रहे लोगों को अभी भी 8-8 घंटे की बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। तारापुर प्रभावितों ने उन्हें सरकारी भ्रष्टाचार से तो आगाह किया ही, साथ ही आजीविका के साधनों पर परमाणु ऊर्जा के पड़ने वाले असरों के बारे में भी बताया कि किस तरह तारापुर संयंत्र से समुद्र में मिलाये जाने वाले पानी ने मछलियों की उपलब्धता को काफी हद तक घटाया है, लोगों में चर्मरोग व अन्य बीमारियाँ फैली हैं…. और उनमें से कोई जनता की मदद करने नहीं आया जो पहले जमीन लेने के लिए मान-मनुहार कर रहे थे।
प्रस्तावित जैतापुर परमाणु संयंत्र से प्रभावित गाँवों के लोग अब ये जानते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के असर सिर्फ जमीन पर ही नहीं, हवा और पानी पर भी होते हैं और कई पीढि़यों तक खत्म नहीं होते। इन्हीं सब चीजों को जानते-समझते लोगों का विरोध लगातार जारी रहा। अनेक बार छुटपुट मुठभेड़ें भी हुईं लेकिन प्रधानमंत्री के बयान से पुलिस-प्रशासन को जैसे जैतापुर से परमाणु ऊर्जा विरोधियों को खदेड़ने की हरी झण्डी मिल गयी। दमन तेज हुआ और 18 अप्रैल 2011 को एक मछुआरे तबरेज सयेकर की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई। वो 600-700 लोगों की उस भीड़ का हिस्सा था जो जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र का विरोध करने के लिए सखरी नाटे गाँव में इकट्ठा हुई थी। वो महज मछुआरा था, उसकी कोई जमीन नहीं जा रही थी। गाँववालों का और उसके परिवारवालों का इल्जाम है कि पहली गोली जब उसे लगी तब वो जीवित था और पुलिस ने उसे अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मारा। उसे दिल, जिगर और किडनी के पास तीन गोलियाँ लगीं पायी गयीं।
उसके बाद भी सरकार का अडि़यल रवैया जारी रहा। देशभर में हो रहे विरोध की परवाह न करते हुए 23 अप्रैल 2011 को परमाणु संयंत्र के विरोध में तारापुर से जैतापुर यात्रा को पुलिस ने रोक दिया और लोकतांत्रिक तरीके से शान्तिपूर्ण विरोध कर रहे यात्रा में शामिल वैज्ञानिकों, पूर्व न्यायाधीशों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। करीब 200 लोगों के इस यात्रा जत्थे में भारतीय सेना के पूर्व एडमिरल एल. रामदास, मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी. जी. कोल्से पाटिल, जस्टिस पी. बी. सावंत, इंजीनीयर व वैज्ञानिक अशोक राव, सौम्या दत्ता, सामाजिक कार्यकर्ता गैब्रिएला डाइट्रिच, एडवोकेट मिहिर देसाई, प्रोफेसर बनवारीलाल शर्मा, वैशाली पाटिल, पत्रकार ज्योति पुनवानी, मानसी पिंगले समेत अनेक मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों को जैतापुर तक नहीं जाने दिया गया। ये जिन बसों में जा रहे थे, उनके मालिकों को डराया धमकाया गया जिससे बस ड्राइवर बीच रास्ते में ही इन यात्रियों को छोड़ भाग निकले। एडमिरल एल. रामदास की अपील पर जैतापुर परियोजना को रद्द करने की माँग लेकर हजारों फैक्स प्रधानमंत्री कार्यालय को किए गए। लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, वैज्ञानिकों और परमाणु ऊर्जा का अमनपूर्वक विरोध कर रहे लोगों की आवाज को भारत सरकार ने आसानी से अब तक अनसुना किया हुआ है।
सवाल केवल पर्यावरण या लोगों की आज की आजीविका या मुआवजे भर का ही नहीं है। परमाणु संयंत्र के साथ सुरक्षा और खतरों के दीर्घकालीन मुद्दे जुड़े होते हैं। परमाणु ऊर्जा बनाने के पहले उससे बनने वाले कचरे के इंतजाम की योजना बनानी जरूरी है। जो संयंत्र लगाया जा रहा है उसे सुरक्षा के पैमानों पर पूरी तरह से जाँचना जरूरी है और सबसे जरूरी है कि जिन लोगों को विस्थापित किया जा रहा है उन्हें पूरी जानकारी हांे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता हो। जैतापुर के मामले में सब कुछ उल्टे तरीके से किया जा रहा है। फ्रांस की जिस ‘अरेवा’ कंपनी के बनाये संयंत्र को जैतापुर में स्थापित करने की कवायद की जा रही है, उसकी डिजाइन को सार्वजनिक नहीं किया गया है जबकि उसी तरह के उसी कंपनी के बनाये संयंत्रों पर योरप और अमेरिका की सरकारी एजेंसियों ने सवाल उठाये हैं। जैतापुर संयंत्र की मौजूदा अनुमानित लागत 328.6 अरब रुपये बतायी जा रही है जो परियोजना बनने तक और भी बढ़ जाएगी। परमाणु ऊर्जा के सवाल पर गोपनीयता का बहाना अपनाया जा रहा है। ये अब तक नहीं बताया जा रहा है कि इससे बनने वाली ऊर्जा की लागत क्या होगी, किस कीमत पर उसे बेचा-खरीदा जाएगा, किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में संयंत्र निर्माता कंपनी की और सरकार की जिम्मेदारियाँ क्या होंगी, अपराध निर्धारण के क्या प्रावधान होंगे, आदि ऐसे सवाल जिनसे लोगों को पता चले कि परमाणु ऊर्जा वाकई उनके लिए व पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है या फायदेमंद! और अब तो संसद ने न्यूक्लियर लाएबिलिटी विधेयक भी पारित कर दिया है जिससे किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में परमाणु संयंत्र सप्लाइ करने वाली कंपनी को नहीं बल्कि देश के भीतर उसका संचालन करने वाली कंपनी को जिम्मेदारी भुगतना होगी जो भारत में एन.पी.सी.आई.एल. है। भारत में परमाणु संयंत्रों को चलाने के लिए 1987 में एन.पी.सी.आई.एल. या न्यूक्लियर पाॅवर काॅपोरेशन आॅफ इंडिया लि. नाम की कंपनी बनायी गई। कहने को तो ये भारत सरकार की पब्लिक सेक्टर कंपनी है लेकिन जैसे सरकार भी कहने भर के लिए भारत सरकार कहलाती है, काम तो वो अमेरिकी हितों के ही करती है, वैसे ही ये कंपनी भी कहने भर को सार्वजनिक उपक्रम है, काम तो उसका भी अन्य काॅर्पोरेट कंपनियों की ही तरह मुनाफा कमाना है।
एनपीसीआईएल बनाने के भी पहले भारत सरकार ने 1983 में एक परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड बनाया था जिसका मुख्य कार्य परमाणु ऊर्जा से ताल्लुक रखने वाले मसलों में नियमन व सुरक्षा के पहलुओं पर नजर रखना है। इस बोर्ड के नब्बे के दशक के मध्य में अध्यक्ष रहे डाॅ. ए. गोपालकृष्णन ने जैतापुर के परमाणु संयंत्र के असुरक्षित होने के बारे में अपनी चिंताएँ प्रकट करते हुए फरवरी 2011 में एक लेख के जरिए ये सवाल उठाये कि जब भारत में बने प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर की लागत आज के मूल्य के मुताबिक करीब 8 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की है तो भारत सरकार फ्रांस की अरेवा कंपनी से योरपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर क्यों खरीद रही है जिसका दुनिया में न तो अब तक कहीं परीक्षण हुआ है और जिसकी लागत भी 20 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट पड़ेगी।
इसके जवाब में एनपीसीआईएल की ओर से डाॅ. गोपालकृष्णन का मखौल उड़ाते हुए जवाब दिया गया कि दुनिया में बहुत सारी जगहों पर ऐसे रिएक्टर लगे हैं जिनका पूर्व में कोई परीक्षण नहीं हुआ था। खुद भारत के ऐसे अनेक रिएक्टरों की मिसाल उन्होंने दी। उन्होंने कहा कि रिएक्टर जब तक लगेगा नहीं तब तक उसका परीक्षण कैसे होगा।
एनपीसीआईएल जैसी विशेषज्ञों-वैज्ञानिकों से भरी पड़ी कंपनी से एक आम नागरिक के तौर पर कोई भी ये जानना चाहेगा कि क्या परीक्षण के लिए थोड़ी कम क्षमता वाले रिएक्टर से काम नहीं चल सकता था जो सीधे दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र (10000 मेगावाट) परीक्षण के लिए भारत ले आए? या क्या अरेवा कंपनी के अपने देश फ्रांस में इसके परीक्षण के लिए कोई जगह नहीं बची थी? या बहादुरी के मामले में भारत को ऐसी कोई मिसाल कायम करके दिखानी है कि देखो, हम दुनिया का सबसे बड़ा अ-परीक्षित परमाणु संयंत्र लगाने की भी हिम्मत रखते हैं !
भारत में परमाणु दुर्घटना क्यों नहीं हो सकती???
भारत में 20 परमाणु संयंत्र काम कर रहे हैं और पाँच निर्माणाधीन हैं। सरकार कितनी तेजी से परमाणु ऊर्जा के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है , ये इससे स्पष्ट है कि उसके पास भविष्य के लिए 40 रिएक्टरों की योजनाएँ व प्रस्ताव मौजूद हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी किस्म की विकसित की गई तकनीक के साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जो भी कदम बढ़ाये थे, वे पिछले दौर में अमेरिका के साथ किये गए 123 समझौते के साथ पिछड़ गए हैं। अब हम एक तरह से मजबूर हैं कि हमारे वैज्ञानिक दूसरों के इशारों पर काम करें। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने फ्रांस, आॅस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देशों से 10-10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देश में स्थापित करेगा। ये हमारे देश की नयी विदेश नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीशों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है। फ्रांस की अरेवा कंपनी से लिये जाने वाले 10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर उसी करार की नतीजा है।
जब हम अपनी जानी-पहचानी, घरेलू तौर पर विकसित की गई तकनीक के साथ काम करते थे तब भी मानवीय भूलें होती थीं। अब एक अपरीक्षित और अपरिचित मशीन हमारे वैज्ञानिक सँभालेंगे तो गलतियों की गुंजायश भी ज्यादा हो सकती है। पहले भी भारत में राजस्थान के परमाणु संयंत्र में 1992 में 4 टन विकिरणयुक्त पानी बह गया था और तारापुर में भी 1992 में 12 क्यूरीज रेडियोध्र्मिता फैली थी।
तो भारत के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है जिससे इस देश के उच्च शिक्षित प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि भारत के जैतापुर परमाणु संयंत्र में ऐसी कोई दुर्घटना कभी नहीं घटेगी, इसलिए संयंत्र का काम आगे बढ़ाना चाहिए।
विशेषज्ञों की दिव्य बातें
जाहिर है ऐसा विश्वास प्रधानमंत्री को उनके विशेषज्ञ ही दिला सकते हैं। जैतापुर परमाणु संयंत्र से जुड़े एक भौतिकविद् और कोल्हापुर के डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय के कुलपति । डॉ. एस. एच. पवार ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि जापान में 8.9 तीव्रता का जो भूकंप आया था, उससे सूनामी की लहरें पैदा हुईं लेकिन भूकंप से फुकुशिमा के परमाणु संयंत्र का कुछ नहीं बिगड़ा। परमाणु संयंत्र में जो विस्फोट हुआ, वो पानी के रिएक्टर में घुस जाने की वजह से जो बिजली गुल हुई और उससे जो परमाणु ईंधन को ठंडा करने का जो सिस्टम था, वो फेल हो गया, इसलिए विस्फोट हुआ।
दूसरी दिव्य ज्ञान की बात उन्होंने ये बतायी कि जैतापुर समुद्र की सतह से करीब 72 फीट की ऊँचाई पर है जिससे अगर कभी महाराष्ट्र में सूनामी आती भी है तो ‘उनके ख्याल से’ वो इतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाएगी।
तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने ये कही कि भारत को परमाणु विकिरणों से निपटने की तैयारी को तेज करना चाहिए। हमें ऐसे लोग तैयार करने चाहिए जो परनाणु विकिरणों से पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपट सकें। डाॅ. पवार ने ये भी बताया कि इसके लिए उनके विश्वविद्यालय ने अभी से ही कोर्सेस भी खोल दिए हैं।
डाॅ. पवार के ये कथन किसी और व्याख्या की जरूरत नहीं छोड़ते। इन्हें पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि चूँकि फुकुशिमा में रिएक्टर में विस्फोट भूकंप से नहीं हुआ बल्कि भूकंप से जो सूनामी उठी और सूनामी से जो पानी घुसा और उससे जो बिजली की आपूर्ति में रुकावट आयी, उससे विस्फोट हुआ। और इसीलिए भले ही जैतापुर में भूकंप आयें लेकिन यहाँ ‘डाॅ. पवार के ख्याल से’ कभी सूनामी तो आएगी नहीं इसलिए यहाँ कभी बिजली आपूर्ति अवरुद्ध नहीं होगी और इसीलिए यहाँ कभी विस्फोट भी नहीं होगा। ऐसा लगता है कि सूनामी ने तो जैसे डाॅ. पवार से ही वादा किया है कि वो 72 फीट ऊँचाई तक कभी नहीं आएगी। डाॅ. पवार के इंटरव्यू से ऐसा भी लगता है कि वैसे कोई दुर्घटना कभी होगी नहीं लेकिन फिर भी अगर कुछ गड़बड़ हो ही जाती है तो विकिरण प्रभावितों का इलाज और देखभाल करने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने के नये कोर्सेस विश्वविद्यालय ने चालू कर ही दिए हैं। डाॅ. पवार के इन अत्यंत बुद्धिमानीपूर्ण कथनों को एनपीसीआईएल ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान की तरह चस्पा कर रखा है।
खुद सरकारी भूगर्भीय सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि जैतापुर भूकम्प संवेदी इलाके में मौजूद है और गुजरे 20 वर्षों में इस क्षेत्र में 92 छोटे-बड़े भूकंप आ चुके हैं। और फिर भारत के जो राजनेता हैं, जो ठेकेदार हैं, जो अफसरशाही है, वो क्या किसी से कम है? जो खेल के सामान में, जेल के सामान में, फौज के सामान में, पुल के, सड़क के, दवाई के, पानी के या किसी भी क्षेत्र में कमीशन लेकर घटिया सामान चलवा सकते हैं, जो जमीन पर ही नहीं, आकाशीय स्पेक्ट्रमों में भी और खेतों में ही नहीं गोदामों में भी भ्रष्टाचार की पताका फहरा सकते हैं, वे जैतापुर में भला क्यों नहीं ऐसा करेंगे। और अगर किया तो क्या वो हादसा किसी पुल या पानी की टंकी के गिर जाने जितना ही कहा जा सकता है?
कचरा भी खतरा
परमाणु ईंधन से अगर आपने बिजली बना भी ली तो भी परमाणु ईंधन के बाद बचने वाले कचरे को ठिकाने की समस्या तो फिर भी बनी ही रहती है। अप्रैल, 2010 में अमेरिकी राष्ट्रति बराक ओबामा ने जाॅर्ज बुश के जमाने से चले आ रहे इस तर्क का इस्तेमाल 47 देशों के वाशिंगटन परमाणु सम्मेलन में किया कि परमाणु हथियारों के आतंकवादी समूहों के हाथ लग जाने का खतरा सबसे बड़ा है। हालाँकि जाॅर्ज बुश ने किसी एक मौके पर देशवासियों के नाम संदेश में आतंकवाद के साथ-साथ परमाणु कचरे को भी मानवता और अमेरिका के लिए बड़ा संकट बताया था। ओबामा ने परमाणु खतरे के संकट का जिक्र भले टाल दिया लेकिन उससे संकट कहीं भी टला नहीं है। बल्कि अमेरिका में नेवादा इलाके में जहाँ परमाणु कचरे को युक्का पर्वत के नीचे दफन करने की योजना पूर्व में बनी थी, उसे भी ओबामा प्रशासन ने रोक दिया है। इसका सीधा मतलब ये है कि अमेरिका के पास भी अभी तक कोई दूरगामी नीति नहीं है कि वो अपने परमाणु कचरे से कैसे पीछा छुड़ाएगा।
ये परमाणु कचरा भीषण विकिरण समाये रहता है और इसकी देखभाल हजारों बरसों तक करना जरूरी होती है। कुछ रेडियोधर्मी तत्वों के परमाणु संयोजन तो विघटित होने में लाखों वर्षों का समय भी लेते हैं। हर परमाणु संयंत्र से निकलने वाले कचरे को और इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन को मोटी-मोटी दीवारों वाले कंटेनरों में सील कर जमीन के भीतर गहरे रखा जाता है और ये एहतियात बरतनी होती है कि उनसे किसी किस्म का रिसाव न हो। अगर रिसाव होता है तो वह भूगर्भीय जल के साथ मिलकर असीमित तबाही मचा सकता है। रिसाव के कुछ हादसे हुए भी है लेकिन इस तरह के हादसों को छिपाया जाता है क्योंकि इनके पीछे कंपनियों का अस्तित्व टिका रहता है।
प्राथमिकता क्या है?
सवाल सिर्फ इतना है कि हमारी प्राथमिकता क्या है? वैज्ञानिक तरक्की और इंसान के अस्तित्व में से अगर चुनने का मौका आये तो क्या चुनेंगे? परमाणु ऊर्जा के लिए क्या हम उन्हीं जिंदगियों को दाँव पर लगाने को तैयार हैं जिनकी जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए हमें ऊर्जा चाहिए। जापान के प्रधानमंत्री ने हाल में कहा है कि परमाणु ऊर्जा के बारे में उन्हें पूरी तरह नये सिरे से सोचना शुरू करना होगा।
वैसे भी यह एक मिथ्या प्रचार है कि परमाणु ऊर्जा प्रदूषणरहित होती है या वो सस्ती होती है। पुरानी कहावत है कि सस्ता है तो क्या जहर खा लें ! और ये तो सस्ता भी हर्गिज नहीं। परमाणु संयंत्र के परमाणु कचरे का निपटारा किसी भी और प्रदूषण से ज्यादा खतरनाक होता है और अगर इस कचरे के निपटान की लागत व परमाणु संयंत्र की उम्र खत्म होने के बाद उसके ध्वंस (डीकमीशनिंग) की लागत भी परमाणु संयंत्र में जोड़ दी जाए तो ये किसी भी अन्य जरिये से ज्यादा महँगी पड़ती है।
जहाँ तक ऊर्जा की कमी का सवाल है, ये ऊर्जा की उपलब्धता से कम और उसके असमान वितरण से अधिक जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों वैज्ञानिक डाॅ. विवेक मोंटेरो ने इसका खुलासा करते हुए बताया कि मुंबई में एक 27 मंजिला मकान है जिसमें एक परिवार रहता है और इसमें हैलीपैड, स्वीमिंग पूल आदि तरह-तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। इस बंगले में प्रति माह 6 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। ये बंगला अंबानी परिवार का है। दूसरी तरफ शोलापुर में रहने वाले दस हजार परिवारों की कुल मासिक खपत भी 6 लाख यूनिट की है। अगर देश में बिजली की कमी है तो दस हजार परिवारों जितनी बिजली खर्च करने वाले अंबानी परिवार को तो सजा मिलनी चाहिए लेकिन उल्टे अंबानी को इतनी ज्यादा बिजली खर्च करने पर सरकार की ओर से कुल बिल पर 10 प्रतिशत की छूट भी मिलती है।
जर्मनी में उन संयंत्रों को डीकमीशन करने पर भी विचार चल रहा है जो पहले से मौजूद हैं। बहुत से देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों पर शोध को प्रोत्साहन पहले से ही दे रहे हैं। वैसे भी परमाणु ऊर्जा में भी पानी की खपत बेतहाशा होती है क्योंकि रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए मुख्य रूप से पानी ही इस्तेमाल किया जाता है। पानी की उपलब्धता के कारण ही परमाणु संयंत्र समुंदर या नदी के किनारे लगाये जाते हैं ताकि पानी की कमी न पड़े लेकिन इसी वजह से परमाणु संयंत्रों पर वो सारे खतरे बढ़ भी जाते हैं जो नदी में बाढ़ से हो सकते हैं या समुद्र में तूफान, सूनामी से। जैतापुर परमाणु संयंत्र में रोज करीब 5500 करोड़ लीटर पानी चाहिए होगा जिसे इस्तेमाल के बाद वापस समुद्र में फेंका जाएगा जिससे समुद्र का पूरा जैव संतुलन भी बिगड़ सकता है।
बेशक परमाणु संयंत्र से होने वाले रिसाव या दुर्घटना से लोग एक झटके में नहीं मारे जाते जैसे परमाणु बम से मरते हैं लेकिन परमाणु संयंत्र से जो विकिरण फैलता है वो परमाणु बम से फैलने वाले विकिरण की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। और हजारों-लाखों वर्षों तक उसका विकिरण समाप्त नहीं होता। अगर हिरोशिमा-नागासाकी ने हमें ये सिखाया था कि हम परमाणु बम से तौबा करें वैसे ही फुकुशिमा से हमें ये सीख लेना चाहिए कि परमाणु ऊर्जा थोड़ी-बहुत विज्ञान समझने या प्रयोगशालाओं के भीतर प्रयोग करने के लिए ही ठीक है। जब तक हमें ये न पता हो कि किसी काम के परिणाम को हम कैसे सँभालेंगे, हम उसे कैसे शुरू कर सकते हैं। और परमाणु ऊर्जा में सिर्फ ऊर्जा नहीं, बल्कि भीषण विकिरण और विकिरणयुक्त कचरा भी है। जैतापुर संयंत्र को रोकना जनता, पर्यावरण और इंसानियत – तीनों के लिए जरूरी है। जनता के पक्ष में इसके दीर्घकालीन वैज्ञानिक व राजनीतिक मायने भी होंगे।

-विनीत तिवारी

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इसे इतिहास की एक भारी विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो अमरीकी ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद न्यूयार्क के ‘ग्राउंड जीरो’ पर एकत्रित होकर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे उन्हीं अमरीकियों को यह भरोसा दिलाने के लिए कि वह भी शुद्ध ‘अमरीकी’ हैं, राष्ट्रपति ओबामा को कुछ ही समय पूर्व अपना जन्म प्रमाणपत्र पेश करना पड़ा था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ओबामा की ख्याति ओसामा की हत्या के पूर्व तक कितनी गिरी हुई थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत सहित कुछ ही देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के हमारे धुरंधर धोनी के बराबर भी वह खड़े दिखाई नहीं देते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि ओसामा की हत्या की उनकी अपनी योजना की कामयाबी के बाद अमरीका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों क्लिंटन तथा बुश सहित दुनिया के ढेर सारे राष्ट्राध्यक्षों/राजनेताओं की ओर से राष्ट्रपति ओबामा की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं।
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस सर्वशक्तिमान अमरीकी राष्ट्रपति को अपनी अमरीकी नागरिकता तक को साबित करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी और जो लोकप्रियता के मामले में धोनी से भी नीचे के पायदान पर खड़ा था, वह कितने बुरे दिनों और शर्मनाक स्थिति का सामना कर रहा था और अपनी इन्हीं गिरी हुई स्थितियों में राष्ट्रपति ओबामा को तकरीबन आठ माह बाद होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी अपने को तैयार रखना था। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन भारी दुष्वारियों की कीचड़ में गहरे धँसे राष्ट्रपति ओबामा को इससे उबरने के लिए किसी ‘जादू की छड़ी’ की कितनी सख्त आवश्यकता थी? और, देखा जाए तो अपने नेवी सील्स कमांडो द्वारा निहत्थे ओसामा की हत्या का लाइव दृश्य देखे जाने के तुरंत बाद राष्ट्रपति ओबामा ने दंभपूर्वक जो वाक्य कहे-‘‘न्याय हो गया’’- वह ठीक उसी जादू की छड़ी की प्राप्ति की एक तरह से अभिव्यक्ति थी। अन्यथा, अमरीकी राष्ट्रपति की नजर में ‘न्याय’ की अवधारणा कैसी है, इसका क्रूरतम् और निर्लज्जतम मिसाल तो उसने उसी पाकिस्तान की धरती पर ओसामा की हत्या किए जाने के कुछ माह पूर्व ही दे दिए थे। गुप्तचर सेवा के दो दुस्साहसिक अमरीकियों द्वारा दो पाकिस्तानी नागरिकों को सरेआम गोली मार कर हत्या किए जाने की जघन्य घटना से पूरा पाकिस्तानी जनमानस स्तब्ध था। यह किसी भी देश की संप्रभु सरकार की नैसर्गिक न्याय प्रक्रिया का स्वाभाविक तकाजा है कि वह अपने नागरिकों के हत्यारे चाहे वे विश्व के सबसे ताकतवर देश के नागरिक ही क्यों न हों, को कानून के कटघरे में लाकर न्यायोचित सजा दिलाने के अपने अधिकार का दृढ़तापूर्वक पालन करे। दुनिया ने देखा कि पाकिस्तान की सरकार उन दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों के साथ ठीक यही तो कर रही थी। लेकिन न्याय का दंभ भरने और दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले ओबामा प्रशासन को यह कतई मंजूर न हुआ। उसने पाकिस्तान सरकार के हाथों को इस नंगई और निर्ममता के साथ मरोड़ना शुरू कर दिया कि उसे दोनों हत्यारों को अपनी न्याय प्रक्रिया से गुजारे बिना छोड़ देना पड़ा।
यह ठीक है कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों अमरीकियों तथा विश्व व अन्य कई देशों के नागरिकों की जघन्य हत्या का कसूरवार था- वह मौत की सजा पाने से कम का हकदार नहीं था। लेकिन पूरे विश्व ने जब यह जाना, स्वयं अमरीकी प्रशासन की स्वीकारोक्ति द्वारा, कि धावा बोलने वाले अमरीकी सैनिक यदि चाहते तो बिल्कुल निहत्था और नितांत प्रतिरोधविहीन ओसामा को बड़ी आसानी से बंदी बनाया जा सकता था, बजाय इसके उन्होंने उसे वहीं ढेर कर दिया तो यह समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन में एक तरह से जुगुप्सा जगा देने वाली बात थी। यह तो आधुनिक इतिहास में मानवता के सबसे बड़े अपराधी हिटलर के लापता हत्यारे सहयोगियों को पकड़े जाने पर भी न हुआ था। उन्हें उनके पनाहगाहों में धावा बोलकर ढेर नहीं किया गया था बल्कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में उन्हें घसीट लाया गया और न्याय प्रक्रिया की लंबी अवधि से गुजरते हुए अंततः उन्हें फाँसी के तख्ते तक पहुँचाया गया।
लेकिन अपने समय के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा को ओसामा बिन लादेन के साथ ऐसा करना था भी क्या? पहली बात तो यह कि आतंकवादी ओसामा हिटलर की तरह किसी देश का कोई स्वायत्त शासक नहीं था। वह अफगानिस्तान में सोवियत फौजों के खिलाफ अमरीकी लड़ाई में स्वयं अमरीका द्वारा खड़े किए गए भाड़े के सैनिकों के एक गिरोह का तथाकथित धार्मिक उन्मादी सरदार था। दूसरी बात यह कि अमरीकी धन और हथियारों से सींच कर ही वह तैयार किया गया और अंततः अमरीकियों के ही खून का प्यासा बन बैठा। जिस लापता भस्मासुर अर्थात् ओसामा बिन लादेन को वर्षों से अमरीकी प्रशासन तलाश रहा था वह दरअसल लापता था ही नहीं। जैसा कि लादेन के खिलाफ 4 ‘हेलिकाप्टरों, 40 मिनट और 25 सैन्य कमांडो की इस दुर्दांत अमरीकी कार्रवाई- जिसका कूटनाम दिया गया जेरोनिमो ई0के0आई0ए0, की पूरी अन्र्तवस्तु को बारीकी से देखने से साफ जाहिर है। कहा जाता है कि पाकिस्तान के अत्यंत सामरिक महत्व के शहर एबटाबाद में जिस आलीशान हवेली में धावा बोल कर ओसामा की हत्या की गई थी, धावा बोलने वाले अमरीकी कंमाडों वैसी ही हवेली का निर्माण कर काफी दिनों तक ‘आपरेशन ओसामा’ का रिहर्सल करते रहे थे। यह बात स्वयं अमरीकी पक्ष की तरफ से जाहिर की गई है। लेकिन जो बात छिपा ली गई है क्या लगता नहीं है कि वह ठीक वही बात है जो इस पूरी कार्रवाई से अपने आप साफ झलकती नजर आती है।
2001 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर को जमींदोज किए जाने के बाद अमरीका को अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की तकरीबन 10 वर्षों से तलाश थी। इस तलाश में उसके साथ पाकिस्तान भी साझीदार था। इसके एवज में अमरीका को अपनी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी लड़ाई में इस तथाकथित विश्वस्त सहयोगी को प्रतिवर्ष अकूत धन देने पड़ते थे। कहते हैं कि इस वर्ष ही पाकिस्तान अपनी इस सहयोगी भूमिका के लिए 3 अरब डालर अमरीका से वसूलने वाला था। पूरे दो दशक बीतने के बाद ओसामा रविवार की आधी रात को जब मार गिराया गया तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई के ये शब्द खासे मायने रखते हैं, ‘‘अमरीकियों ने लादेन को लोगान में नहीं पाया और न ही वह उन्हें कंधार में मिला या काबुल में, उन्हें वह पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला।’’ और बेहद तड़प के साथ उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना। हम झुलसते रहे और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया।’’
करजई के इस तड़प भरे वक्तव्य के गहरे निहितार्थ हैं। यानी अमरीका को चाहिए था एक ऐसा सबल बहाना जिसका वास्ता देकर वह अफगानिस्तान में अपनी फौजी उपस्थिति और आए दिन तथाकथित आतंकवादी अड्डों के सफाया के नाम पर ड्रोन हमलों में निरीह नागरिकों की हत्या के अपने घिनौने कृत्य को जायज ठहरा सके। पाकिस्तान को भी चाहिए था एक ऐसा हथियार जिसका आतंक दिखाकर अपने दिवालिया अर्थतंत्र के लिए अकूत अमरीकी धन के निरंतर आमद की व्यवस्था को बनाए रख सके। जाहिर है, अमरीका और पाकिस्तान दोनों के अत्यंत पाप भरे इन स्वार्थों की पूर्ति के लिए सबसे अचूक उपाय था ओसामा बिन लादेन के अस्तित्व को लंबे समय तक बनाए रखना। अपनी-अपनी सरकारों के निर्देश पर सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के चतुर नक्शानवीसों ने मिलकर ही ओसामा के लिए वह नक्शा बनाए होंगे जिसके घेरे में अपने मारे जाने के दिन तक सुरक्षित पनाह पाता रहा था। करजई का इशारा भी कि ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना, और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया है’’, इसी नापाक नक्शे को बेपर्दा करता जान पड़ता है। ओसामा तो लगता है सर्वशक्तिमान अमरीका को हिला देने वाले 9/11 कांड के बाद से ही सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के इस संयुक्त नक्शे के घेरे में आ चुका था और जिसकी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई को अच्छी तरह से भनक मिल चुकी थी।
यह तो कहिए कि विश्व में आई आर्थिक सुनामी में अमरीकी अर्थतंत्र के ढहने के साथ-साथ राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता भी तेजी से लुढ़कने लगी थी और इस खास कारण ने ओबामा को भारी बेचैनी मंे डाल दिया। जैसा कि बताया जा चुका है, संसार का यह सबसे ताकतवर राष्ट्रपति धोनी जैसे शख्स से भी लोकप्रियता के मामलों में पिट गया था तो फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति में बने रहकर ओबामा पुनः अगला राष्ट्रपति चुने जाने का ख़्वाब क्या खाक देखते! यहीं पर चाहिए थी ओबामा को अभी और इसी वक्त एक ऐसी ‘जादू की छड़ी’ जो उनकी लुढ़कती लोकप्रियता पर चमत्कारिक रूप से रोक तो लगा ही दे आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत की गारंटी भी दिला सके। फिर क्या था, यहीं से उस रंगमंच और उस पर खेले जाने वाले नाटक के निर्माण की कथा शुरू हो जाती है जिसके घोर घिनौने प्रदर्शन के स्तब्धकारी रोमांच से दुनिया अभी भी उबर नहीं पाई है।
कथा यह गढ़ी गई कि नाटक के अंतिम प्रदर्शन अर्थात् ‘आॅपरेशन ओसामा’ के मामले में बेचारे पाकिस्तान को बिल्कुल नामालूम सी स्थिति में रखा गया था। यह इसलिए भी जरूरी था कि यदि यह जरा भी उजागर हो जाय कि इस नाटक के कथानक की तैयारी में सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 दोनों की बराबर की भागीदारी थी तो पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र को तो अपने ही नागरिकों के प्रचंड क्रोध की ज्वाला में भस्म हो जाना तय था। अगर यह सच नहीं होता तो अमरीकी नेवी सील्स कमांडो के वीर बाँकुरों की उस अत्यंत सुरक्षित और आई0एस0आई0 द्वारा संरक्षित एबटाबाद की हवेली में सीधे उतरते नानी मर गई होतीं। और, अमरीकी प्रशासन भला इस भारी जोखिम में अपने सैनिकों को डालता ही क्यों जिसके लिए अफगानिस्तान की धरती पर बेपनाह ड्रोन हमलों में अनगिनत बेगुनाह लोगों की हत्या एक सामान्य घटना से अधिक शायद ही और कुछ रह गया हो! यहाँ तो मामला ओसामा जैसे दुनिया के सबसे घिनौने आतंकवादी का था जिसके पनाहगाह पर सीधे ड्रोन हमला करके उसे मारने की कार्रवाई पर शायद ही कोई भारी हंगामा खड़ा होता और यदि इस ड्रोन हमले में ओसामा के साथ-साथ उसके आसपास के मकानों में रहने वाले भी मारे गए होते तो भी अमरीका के लिए यह कोई भारी शर्मिंदगी की बात नहीं होती।
लेकिन यहाँ तो पर्दा उठने के पहले रंगमंच के एक-एक कोने को मानो प्रशिक्षित कुत्तों की तरह अमरीकी कमांडो को सुंघा दिया गया था और आॅपरेशन ओसामा के कई-कई रिहर्सल भी करा दिए गए थे। ऐन वक्त पर पाकिस्तान की तरफ से ‘मैदान साफ है’ की हरी झंडी दिखा दी गई थी। पाकिस्तानी पक्ष का अरज तो बस इतना ही था कि ‘माई बाप’! इस पूरे कांड में पाकिस्तान के गायब रहने के ढोंग को फैलाने में कोई चूक न होने पाए।’ अमरीकी प्रशासन ने सचमुच इस ढोंग को प्रचारित/प्रसारित करने में कोई कोताही नहीं बरती।
अंततः राष्ट्रपति बराक ओबामा के शब्दों में ‘न्याय हो गया।’ इसी के साथ दुनिया ने यह भी देख लिया कि जो अमरीकी ओबामा नाम से आजिज आने लगे थे आज वे ही न्यूयार्क की सड़कों पर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे। अर्थात् कहना यह पड़ेगा कि ओबामा का ‘आॅपरेशन जादू की छड़ी’ पूरी तरह कामयाब रहा। मगर दुनिया के समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन-मस्तिष्क को बुरी तरह से मथ रहे इस प्रचंड प्रश्न का ओबामा क्या जवाब देंगे कि निहत्थे ओसामा को न्याय के कटघरे में खड़ा करके उससे उसके गुनाहों की स्वीकृति सुनने और अंततः उसे सभ्य तरीके से फाँसी तक ले जाने के बजाय उसे वहीं ढेर कर देने की कायरतापूर्ण कार्रवाई क्यों की गई? किस ‘न्याय’ के तहत, पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र, साथ ही उसकी पूरी न्याय प्रणाली की बाँह निर्ममतापूर्वक मरोड़ते हुए अपने दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों को उड़ा ले जाया गया, राष्ट्रपति ओबामा से दुनिया भर के न्यायप्रिय लोगों का एक सवाल यह भी है और जब तक इन बातों का ठोस जवाब नहीं मिल जाता तब तक कहना यह पड़ेगा कि ‘‘श्रीमान ओबामा यह न्याय नहीं न्याय का ढकोसला है!’’

-सुमन्त
मो0:- 09835055021

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पिछले करीब चार महीने से पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल से दो नतीजे निकल रहे हैं। एक यह कि अरब देशों की जनता परिवर्तन चाहती है, खुद मुख्तारी की चाहत उसे बार-बार सड़कों पर आने के लिए प्रेरित कर रही है। दूसरा यह कि अमरीका अपनी और अपने क्षेत्रीय सूबेदारों की पूरी ताकत से अरब जनता की आकांक्षाओं को कुचल रहा है। इसी से जुड़ा निष्कर्ष यह भी है कि लोकतंत्र, मानवाधिकारों और मानवीय सहायता का अमरीकी राग भेडि़ए के मुँह से राम-राम से अधिक कुछ नहीं।
पिछले फरवरी में ट्यूनीशिया में जनअसंतोष की आग जिस तरह भड़की, और उसके बाद एक के बाद एक अरब देशों में फैलने लगी, उसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। उसके लिए 1500 साल पीछे चलते हैं। पैगम्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के काल में और खासतौर से 632 में उनके निधन के बाद जिस तरह इस्लाम फैला, उससे पहले या बाद में किसी धर्म का फैलाव उस गति से नहीं हुआ। महज दो साल में येरूशलम पर मुसलमानों का कब्जा हो गया। विराट और वैभवशाली फारसी साम्राज्य ध्वस्त हो गया। 639 और 642 के बीच मिस्र पर इस्लाम का झण्डा फहराने लगा। आने वाले वर्षों में उत्तरी अफ्रीका, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, फ्रांस और यूनान के बड़े इलाके पर मुसलमान छा गए। उस समय के पतनशील समाज इस्लाम की चुम्बकीय शक्ति से खिंचे बिना नहीं रह सके।
उसके बाद अब परिवर्तन की हवाएँ अरब वादियों और रेगिस्तानों में चल रही हैं। शाहों, सुल्तानों और तानाशाहों की कुर्सियाँ हिलने लगी हैं। इसकी शुरुआत हुई फरवरी में त्यूनीशिया से। एक फल विक्रेता के आत्मदाह की घटना ने जंगल में चिनगारी का काम किया। प्रायः इस्लाम को तलवार से जोड़ने का प्रचार होता है, लेकिन त्यूनीनिशया की जनता ने नितांत गांधीवादी तरीके से बेनअली का तख्ता पलट दिया। त्यूनीशिया की देखा-देखी मिस्र की जनता भी सड़कों पर आ गई। निहत्थी, अहिंसक मिस्री जनता ने अमरीका, इस्राइल ओर यहूदी धन कुबेरों की लाॅबी के चहेते मुबारक को उखाड़ फेंका। जनशक्ति का सैलाब इतना प्रचंड था कि अमरीकी इशारे पर चलने वाले फौजी कमांडर मुबारक के पक्ष में हस्तक्षेप का साहस नहींे कर पाए। मुबारक को भागना पड़ा और अब मिस्री इस्टैबलिशमेंट अपनी खाल बचाने के लिए उन्हें सजाए मौत देने पर विचार कर रहा है। मुबारक तो गए, जिन्हें अली बाबा कहा जा रहा है। 40 चोरों की हुकूमत बदस्तूर बनी हुई है। मिस्र पर फौज का राज चल रहा है और फौज की निष्ठा अमरीका के साथ है। जिस लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए लाखों मिस्री सड़कों पर आए, वह फिलहाल पीछे छूट चुका है। चुनाव हुए भी तो उसके नतीजे पूर्व निर्धारित होंगे।
त्यूनीशिया और मिस्र के बाद यमन, बहरीन और लीबिया में सुगबुगाहट शुरू हुई। यमन मंे कम, बहरीन और लीबिया में अमेरिका का गंदा खेल खुलकर सामने आया। पहले यमन करीब दो दशक पहले तक यमन दो संप्रभु देशों उत्तरी और दक्षिणी यमन में बँटा हुआ था। दक्षिणी यमन पर अंग्रेजों का अधिकार लम्बे समय तक रहा। उससे पहले उत्तरी यमन आजाद हुआ। उत्तरी यमन पर सऊदी अरब, ब्रिटेन और अमरीका का प्रभाव रहा। दक्षिणी यमन ने माक्र्सवादी रास्ता अख्तियार किया। वहाँ सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों से सहायता आने लगी। एक-एक कर यूरोपीय देशों में कम्युनिस्ट सरकारों का पतन होने लगा और सोवियत संघ स्वयं विघटित हो गया तो यमन कहाँ तक बचता। विलय के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। यमन के राष्ट्रपति सालेह की अलोकप्रियता जग जाहिर है। एक-दो बार कुर्सी छोड़ देने का संकेत भी वे दे चुके हैं, लेकिन वास्तव में उनके हटने के आसार नहीं है। यमन में अलकायदा की खासी मौजूदगी बताई जा रही है। यह सालेह के लिए आॅक्सीजन सिद्ध हो रही है। सऊदी अरब और अमरीका चाहते हैं कि सालेह बने रहें। सालेह के बाद उत्पन्न होने वाली स्थिति उन्हें परेशान कर रही है। असुरिक्षत सऊदी शाह और उनका संरक्षक अमरीका अलकायदा से निपटने में जनता का सहयोग नहीं लेना चाहते हंै। सच्चाई यह है कि उन्हें अलकायदा से ज्यादा जनता से भय है।
अमरीकी पाखण्ड का वीभत्सतम चेहरा दिखाई पड़ा बहरीन में, हालाँकि बहरीन शिया बहुल है और उस पर सरकार है सुन्नियों की, लेकिन जब बहरीनी जनता ने प्रदर्शन शुरू किया तब शिया-सुन्नी विवाद जैसी कोई चीज नहीं थी। कभी इशारे से कभी खुलकर ये भावनाएँ बाद में भड़काई गईं। सेक्युलर आन्दोलन को शिया-सुन्नी के चश्मे से देखा जाने लगा। हालत बिगड़ने लगी तो सऊदी अरब ने बहरीन में सेना तैनात कर दी। सऊदी अरब और अमरीका ने बहरीन में लोकतंत्र को पहले राउण्ड में पराजित कर दिया। सऊदी अमरीकी एकजुटता का कारण यह है कि दोनों देश लोकतंत्र के लिए यथास्थिति नहीं तोड़ना चाहते। सऊदी निजाम लोकतंत्र का, सिद्धांत के तौर पर विरोध करता है और अमरीका की लोकतंत्र की परिभाषा सुविधानुसार बनती-बिगड़ती रहती है। बहरीन में अमरीका का नौसैनिक अड्डा है। वहाँ की पुलिस और सेना में पाकिस्तानियों की अच्छी-खासी संख्या है।
बहरीन की शाही सरकार को भरोसा है कि वह करीब 10 लाख की आबादी में 70 फीसदी शियों को नियंत्रित करने मंे सफल रहेगी। सऊदी सैनिक हस्तक्षेप ने अल्पसंख्यक सरकार को मजबूती प्रदान की है। बहरीनी सेना की निष्ठा जनता नहीं, सरकार के प्रति है। मिस्र और त्यूनीशिया की सेनाओं में आम नागरिक था और इस तरह वे जनता के दबाव में थीं।
बहरीन में सऊदी अरब को खतरा जनता से है। वह नहीं चाहता कि सऊदी जनता भी अपने शाहों के खिलाफ उठ खड़ी होने के लिए प्रेरित हो। अगर बहरीन में लोकतंत्र आया तो सरकार शियों की बनेगी। वह सरकार सऊदी प्रभाव को नहीं स्वीकार करने वाली। बल्कि उस पर शिया ईरान का वर्चस्व कायम हो सकता है। दूसरा परिणाम यह हो सकता है कि बहरीन में शियों की जीत से सऊदी अरब के शियों का हौसला बढ़े। यह तय है कि लोकतंत्र की लड़ाई फतह करने के बाद बहरीनी अवाम बहुत सारे फैसले अपनी मर्जी से करेंगे। अमरीकी नौसैनिक अड्डे का वजूद खतरे में पड़ सकता है। कर्नल नासिर का मिस्र हो या कद्दाफी का लीबिया, अरब देशों में जब-जब पश्चिम परस्त शाहों, तानाशाहों का राज खत्म हुआ है, ब्रिटिश अमरीकी अड्डे भी खत्म हुए है। अमरीका लोकतंत्र की खातिर बहरीन में अपने अड्डे को खतरे में नहीं पड़ने देगा।
अमरीका और उसके साथी देशों का सबसे हिंसक रूप दिखाई पड़ा लीबिया में। उसकी मदद कर रहे हैं क्षेत्रीय सूबेदार। सबसे पहले 22 सदस्यीय अरब लीग ने प्रस्ताव पास किया कि कद्दाफी के विरोधियों तक मानवीय सहायता पहुँचाने और नागरिकों को नुकसान से बचाने के लिए लीबिया पर कद्दाफी की वायुसेना की उड़ाने रोकी जाएँ। बहरीन में जनता को फौजी बूटों से कुचलने वालों के दिल में लीबियाई जनता के लिए इस कदर प्यार पैदा हो गया। जिन अरब शासकों के हाथ अपनी ही जनता के खून से रँगे हुए है, उन्होंने लीबिया के अवाम को बचाने के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ घोषित करने का अभियान चला दिया। इसी के आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव नं0 1793 पास किया, जिसमें कद्दाफी के नियंत्रण से बाहर वाले इलाकों के नागरिकों की लीबियाई वायुसेना से रक्षा के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ स्थापित करने का निश्चय व्यक्त किया गया। यह प्रस्ताव एक राय से नहीं पास हुआ। दो स्थाई सदस्यों रूस और चीन के साथ भारत, जर्मनी और ब्राजील ने भी अनुपस्थिति दर्ज कराई।
इस आपत्तिजनक प्रस्ताव का एजेण्डा सीमित था- नागरिकों की रक्षा के लिए ‘नो फ्लाई जोन’ की स्थापना। अर्थात अगर लीबियाई सरकार के विमान पूर्वी क्षेत्र में जमे कद्दाफी विरोधियों पर बमबारी करेंगे या मानवीय सहायता पहुँचने से रोकेंगे तो उन्हें ऐसा नहीं करने दिया जाएगा। लेकिन प्रस्ताव पास होने के तुरन्त बाद अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन ने ‘मानवीय सहायता’ की नकाब उतार फेंकी और कुछ दिन बाद ही कद्दाफी के ठिकानों पर बमबारी शुरू हो गई। ‘नो फ्लाई जोन‘ से बढ़ कर राजधानी त्रिपोली में कद्दाफी के आवास और अन्य स्थानों पर बम गिराए जाने लगे और अब सत्ता परिर्वतन पर जोर दिया जा रहा है। यह सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में नहीं था। यह लक्ष्य है अमरीका और उसके पिछलग्गुओं का। इन पिछलग्गुओं के चेहरे देखिए। सबसे पहले जिन 6 सदस्यों वाली जी0सी0सी0 (गल्फ कोआपोशन कौंसिल) ने कद्दाफी के खिलाफ झण्डा उठाया था, उसके सदस्य हैं सऊदी अरब, बहरीन, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात। अमरीका के इन संरक्षित देशों का लोकतंत्र और मानवाधिकारों से दूर दराज का कोई रिश्ता नहीं है। जी0सी0सी0 के बाद अरब लीग ने प्रस्ताव पास किया। उसमें एकता नहीं थी। अरब लीग के महासचिव मूसा सऊदी लाइन पर नहीं चल रहे थे। उन्हें डरा धमका कर खामोश कर दिया गया।
लीबिया में सामरिक हितों ने मानवाधिकारों और निर्दाेष नागरिकों के लिए चिंता पैदा की। लीबिया दुनिया का 16वाँ सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। अफ्रीकी उत्पादकों में उसका स्थान तीसरा है। अफ्रीकी महाद्वीप मंे तेल का सबसे बड़ा भण्डार लीबिया के पास है। उसके कुल तेल का 85 प्रतिशत निर्यात यूरोप को होता है। तेल के ज्यादातर स्रोत पूर्वी लीबिया मंे हैं, जहाँ कद्दाफी विरोधियों का प्रभाव है। ये दौलत मानवाधिकारों के लिए प्रेम पैदा कर रही है। अमरीकी प्रतिनिधि सभा की प्राकृतिक संपदा समिति के प्रभावशाली सदस्य एडवर्ड मर्की ने एक इण्टरव्यू में कहा, ‘‘हम तेल की वजह से लीबिया मंे हैं।’’ सीनेटर जेम्स बेब भी इसी तरह की बात कह चुके हैं। लीबिया मंे कद्दाफी की जगह किसी कठपुतली शासक को बहाल करने की कोशिशों का सबब यह है कि कद्दाफी सऊदी अरब के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करते। कद्दाफी अरब जगत में सऊदी शासकों के नेतृत्व में चल रहे अमरीकी शतरंजी खेल को बाधित करते रहें हैं। सऊदी रियालों की मोहताजी से पूरी तरह मुक्त, स्वतंत्र आर्थिक आधार वाले कद्दाफी की सिफत ही यह है कि वह अमरीका व सऊदी अरब का मोहरा नहीं बन सकते।
एक नया नासिर या सालादीन बनने की महत्वाकांक्षाओं ने कद्दाफी को आयरिश रिपब्लिकन आर्मी, जर्मनी की रेड आर्मी, उग्रवादियों और क्रान्तिकारी फलस्तीनियों का संरक्षक बनने, मिस्र, सीरिया और त्यूनीशिया के साथ महासंघ बनाने और परमाणु ताकत हासिल करने के लिए प्रेरित किया। जिसके लिए उन्होंने अपनी ही तरह के लफ्फाज जुल्फिकार अली भुट्टो और फिर बेनजीर भुट्टो से दोस्ती की, अमरीका व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं वाले स्वप्नजीवियों को पसंद नहीं करता।
लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए अमरीका की कपटपूर्ण अविश्वसनीय नीति अरब जगत मंे कई बार सामने आ चुकी है। इराक पर प्रथम अमरीकी आक्रमण के बाद सद्दाम हुसैन ने हजारों कुर्दों को रासायनिक अस्त्रों से मार डाला। तब कुर्दों के लिए कोई नहीं तड़पा। सी0आई0ए0 ने सद्दाम हुसैन को पाला-पोसा, उसका ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया और फिर फाँसी दे दी। इराक में भी तेल के कुओं पर काबिज होने की साजिश थी। एक दिलचस्प वाकि़या याद आता है। इराक की राजधानी बगदाद में अमरीकी सेना के पहुँचने के समय लूट-पाट का दौर चल रहा था। अमरीका ने उसे नहीं रोका। अमरीकी सेना ने सबसे पहले तेल मंत्रालय पर नियंत्रण स्थापित किया। इराक से लगे ईरान में भी अमरीका यही खेल खेल रहा था। मुसद्दिक का तख्ता पलट दिया गया क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। मुसद्दिक की जगह शाह पहलवी को पदस्थ किया गया। करीब 25 साल तक ईरान मंे शाह की अमरीका परस्त सरकार रही। 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामी क्रान्ति उस सरकार को लील गई।
कथित इस्लामी आतंकवाद का चर्चा अक्सर होता है। पिछले 30 वर्षों में इसका मुख्य पोषणकर्ता अमरीका ही है। लोकतंत्र की तरह आतंकवाद के प्रति भी अमरीका नाकाबिले एतबार है। जिस ओसामा बिन लादेन को मार कर अमरीका फूला नहीं समा रहा, वह अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी फौजी कार्रवाई में अमरीका का ही हमसफर था। यकीन नहीं होता कि आतंकवाद को शिकस्त देने के लिए अमरीका ने ओसामा को खत्म किया।
ओसामा सी0आई0ए0 और आई0एस0आई0 के बीच रिश्तों की पूरी कहानी तभी सामने आ पाएगी, जब वुडवर्ड जैसा कोई अमरीकी पत्रकार गोपनीय दस्तावेजों तक पहुँच जाए, मियाद पूरी होने पर सभी दस्तावेज प्रकाशित कर दिए जाएँ या विकीलीक्स कुछ कमाल कर दें। क्या आई0एस0आई0 का ओसामा की मौजूदगी से नावाकि़फ रहना वाकई मुमकिन है? क्या सी0आई0ए0 को अभी तक नहीं मालूम था कि ओसामा कहाँ छिपा हुआ है? राष्ट्रपति ओबामा को पुनर्निर्वाचन में मदद करने के लिए अब ओसामा को मारा गया? ओबामा की अफगान नीति पर अमल के रास्ते को आसान करने के लिए यह कार्रवाई की गई? अमरीका नाक बचा कर अफगानिस्तान से निकल सके, इसलिए यह महान उपलब्धि प्रदर्शित की गई? क्या आई0एस0आई0 ने वास्तव में कार्रवाई में सी0आई0ए0 की सहायता नहीं की?
ये सारे सवाल इसलिए उठ रहें हैं कि 11 सितम्बर 2001 को अमरीका पर हमले के पहले अमरीका को एक मौका मिला था, जब वह ओसामा को मार या पकड़ सकता था। लेकिन वह खामोश रहा। पाकिस्तानी पत्रकार अमीर-मीर अपनी किताब ‘द ट्रू फेस आॅफ जेहादीज: इनसाइड पाकिस्तान्स नेटवर्क ऑफ़ टेरर’’ में लिखते हैं, ‘पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को हैरत है कि 11 सितम्बर 2001 के हमले के एक साल पहले जब सुनहरा मौका आया, तब सी0आई0ए0 ने ओसामा को क्यों नहीं पकड़ा। तब अलकायदा का बीमार चीफ आपरेशन कराने क्वेटा से दुबई स्थित अमरीकी हास्पिटल गया था। वहाँ ओसामा ने एक सी0आई0ए0 अधिकारी से भी भेंट की थी। फ्रांसीसी दैनिक ‘ ल फिगारो’ में छपी एक रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए पाकिस्तानी खुफिया सूत्रों का कहना है कि तब तक ओसामा दुनिया के सबसे वाण्टेड आतंकवादियों की सूची में आ चुका था। ओसामा 4 से 14 जुलाई 2000 तक दुबई के अस्पताल में रहा।
‘ल फिगारो’ की रिपोर्ट के मुताबिक क्वेटा से दुबई पहुँचने के बाद बिन लादेन को अस्पताल ले जाया गया। उनके साथ व्यक्तिगत डाक्टर और वफादार सहयोगी (यह अमन अलजवाहिरी हो सकते हैं, लेकिन सूत्र पूरे भरोसे से यह नहीं कह रहे), चार बाडीगार्ड और एक पुरूष, अल्जीरियाई नर्स को अस्पताल ले जाया गया। बिन लादेन के अस्पताल में रहने के दौरान उनके पारिवारीजन और प्रमुख सऊदी उनसे मिलने आए। एक स्थानीय सी0आई0ए0 एजेंट को, जिसे दुबई में अनेक लोग जानते हैं, हाॅस्पिटल के लिफ्ट से ओसामा के रूम की ओर जाते देखा गया। कुछ दिन बाद सी0आई0ए0 एजेंट ने कुछ दोस्तों के सामने डींग मारी कि मैं तो ओसामा से मिल कर आ रहा हूँ, अधिकृत सूत्रों का कहना है कि 15 जुलाई को ओसामा के क्वेटा रवाना होने के बाद इस सी0आई0ए0 एजेंट को मुख्यालय बुला लिया गया।
इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है कि अमरीका ने मोस्ट वाण्टेड ओसामा पर तब हाथ क्यों नही डाला? अमरीका इस आतंकवादी सरगना को छुट्टा छोड़े रख कर किन सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहता था? अब जब उसे मार दिया गया है, क्या वे उद्देश्य पूरे हो चुके हैं?
आज अमरीका सुप्रीम पावर है। उसके अतंर्राष्ट्रीय व्यापारिक और सामरिक हित हैं। दुनिया भर में उसकी फौजी मौजूदगी है। उसकी कंपनियों का साम्राज्य है। लोकतंत्र, मानवाधिकार आतंकवाद, अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सहयोग की परिभाषा इन हितों के अनुरूप की जाती है।

-प्रदीप कुमार

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डॉ वाई.एस सचान की जिला कारागार लखनऊ में सुनियोजित हत्या है। डॉ बी.पी सिंह की हत्या के बाद प्रदेश के दो मंत्री अनंत मिश्रा व बाबु सिंह कुशवाहा को मंत्रिपद से हटा दिया गया था और तभी यह भी प्रकाश में आया था कि सत्तारूढ़ दल के कई महाबली डॉ बी.पी सिंह की हत्या में शामिल थे। उन लोगों को गिरफ्तार करने से सत्तारूढ़ दल की काफी छीछालेदर होती उस छेछालेदार से बचने के लिये आम तौर से पुलिसिया हथकंडे से अन्य व्यक्तियों को अभियुक्त बनाया जाता रहा है लेकिन यह भी सत्य है कि परिवार कल्याण विभाग में हो रहे करोडो रुपये के घोटालों की सभी जानकारी डॉ वाई.एस सचान को थी और जब उनको बलि का बकरा बनाया जाने लगा तो उन्होंने अपना मुंह खोलने का निश्चय किया होगा। जिला कारागार लखनऊ में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उनके शरीर पर 9 एंटीपोस्टमार्टम इंजरीज पाई गयी हैं जो स्वयं किसी व्यक्ति द्वारा अपने को घायल करना संभव नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार डॉ सचान की मौत दिन में 11 बजे से 12 बजे के बीच में हुई है जिससे यह भी साबित होता है कि कारागार प्रशासन की जानकारी में उनको प्रताड़ित किया गया और प्रताड़ितकर्ताओं की बात न मानने के कारण उनको हमेशा-हमेशा के लिये मौत की नींद में सुला दिया गया। सरकारी विभागों में अरबों रुपयों की कमीशन बाजी होती रहती है और राजनीति के क्षितिज पर रहने वाले लोगों का भी उसमें हिस्सा होता है इसलिए मुख्य अपराधियों के खिलाफ कार्यवाई करने में वह लोग रोड़े अटकाते हैं डॉ सचान के मामले में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर से लेकर उच्च पुलिस अधिकारीयों ने तरह-तरह के बयान बदले हैं जिससे उनकी ही स्तिथि हास्यस्पद हो गयी है। परिस्तिथि जन्य साक्ष्य सीधी-साधी हत्या बता रहे हैं लेकिन पुलिस विभाग और सरकार आत्महत्या बता रही है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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उत्तर प्रदेश में डॉ बी.पी सिंह की हत्या के अभियुक्त डॉ वाई.एस सचान कि हत्या जिला कारागार लखनऊ में कर दी गयी। उत्तर प्रदेश शासन के अधिकारियो ने प्रथम द्रष्टया आत्महत्या का मामला माना है जिसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट लखनऊ के गोसाईंगंज थाने में दर्ज की गयी है। डॉ सचान का शव कारागार के अस्पताल की दूसरी मंजिल पर निर्माणाधीन शौचालय में पाया गया था। डॉ सचान का शव बेल्ट से लटका हुआ था। हाथों की नसें कटी हुई थीं और शव के ऊपर चोटों के भी निशान थे। मेडिकोलीगल विशेषज्ञों के अनुसार कोई भी व्यक्ति हाथ की नसें काट कर फांसी नहीं लगा सकता है अगर फांसी लगाएगा तो हाथ की नसें नहीं काट सकता है। शव की दशा देख कर ही प्रथम द्रष्टया आत्महत्या का मामला न होकर हत्या का सीधा-सीधा मामला है। उत्तर प्रदेश में हाई प्रोफाइल मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टर शासन और प्रशासन की मंशा के अनुरूप हेर-फेर करते हैं। जिसका ताजातरीन उदहारण लखीमपुर निघासन थाने की पुलिस द्वारा की गयी हत्या के पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दिखाई दी।
डॉ वाई.एस सचान सी.एम.ओ परिवार कल्याण डॉ बी.पी सिंह की हत्या के आरोपी थे। विवेचना चल रही थी करोडो रुपये के घोटाले सामने आ रहे थे। सत्तारूढ़ दल के कई नेताओं का नाम सामने आ रहा था और डॉ सचान की हत्या कारागार में हो जाती है। इससे पूर्व 2006 में कविता चौधरी हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त रवीन्द्र प्रधान की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी थी। आतंकवाद के आरोप में कारगार में निरुद्ध आरोपी शकील की जहर देकर हत्या हो गयी थी। अन्नु त्रिपाठी की हत्या वाराणसी जेल में हुई थी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में कारागारों की स्तिथि बहुत बुरी है। उत्तर प्रदेश में 2008 में 295 मौतें हुई थी। गंभीर अपराधों में कानून न्याय का कोई अर्थ नहीं रहता है। बड़े अधिकारीयों और नेताओं को बचाने के लिये लोगों को बलि का बकरा बनाया जाता है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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असरारुल हक़-मजाज़
(19.10.1911-05.12.1955)

मजाज़ 19 अक्टूबर 1911 ई0 को यू0पी0 के मशहूर कस्बा रुदौली, जिला बाराबंकी के एक इल्म दोस्त ज़मींदार ख़ानदान में पैदा हुए। उनके वालिद चैधरी सिराजुल हक़ क्वींस कालेज लखनऊ में उस्ताद थे। इस के बाद वह महकमए रजिस्टेªशन में मुलाजि़म हो गए और रीजनल इन्सपेक्टर और असिस्टेन्ट रजिस्ट्रार के ओहदे पर पहुँच कर रिटायर हुए। दौराने मुलाजिमत उनका तबादला आगरा और अलीगढ़ भी हुआ जहाँ का कयाम मजाज़ की जि़न्दगी में बहुत अहमियत रखता है। मजाज़ ने हाईस्कूल का इम्तिहान अमीनाबाद स्कूल लखनऊ से पास किया। वालिद के आगरा तबादला हो जाने से वह उनके साथ आगरा चले आए और 1929 ई0 में सेंट जान्स कालेज आगरा में एफ़0एस0सी0 में दाखिला ले लिया। यहाँ कालेज में मुईन अहसन जज़्बी और आले अहमद सुरूर का साथ रहा। इस के अलावा मैकश अकबरावादी और फ़ानी बदायूँनी की सोहबत का इन पर गहरा असर हुआ। वालिद के तबादले की वजह से इन्हें अलीगढ़ आना पड़ा, यहाँ 1935 ई0 में उन्होंने एम0ए0 में दाखिला लिया, लेकिन तालीम मुकम्मल करने से पहले ही इन्हें आल इण्डिया रेडियो देहली में मुलाजि़मत मिल गई और वह देहली चले आए। अलीगढ़ मंे हयात उल्ला अंसारी, सिब्ते इसन, अख़्तर हुसैन रायपूरी, मसूद अख़्तर जमाल, सआदत हसन मिन्टू, असमत चुग़ताई और सरदार जाफरी वगैरह इनके साथियों में थे। यह वह जमाना था जब आजादी की तहरीक अपने शबाब पर थी और ये सब आजादी के सरफ़रोशों और इन्क़लाब के अलम-बरदारों में थे। इसी जमाने में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की इब्तिदा हुई। सोशलिज़्म से मुतास्सिर ये सब नौजवान तरक़्की पसंद तहरीक में शामिल हो गए। मजाज़ ने कुछ अरसा बाद रेडियो की मुलाजि़मत छोड़ दी और लखनऊ चले आए जो उस वक़्त तरक़्की पसंद तहरीक का मरकज़ था और जहाँ, रशीद जहाँ, हयात उल्ला अंसारी, सरदार जाफ़री सब जमा हो चुके थे। हयात उल्ला अंसारी हफ़्तावार अखबार ‘हिन्दोस्तान’ और सिब्ते-हसन व सरदार जाफ़री ‘परचम’ निकालते थे। मजाज़ भी परचम की इदारत में शामिल हो गए।
मजाज़ शदीद तौर पर हस्सास और जज़्बाती इंसान थे, इन की शायरी और दिलचस्प जुमलों से तो सब लुत्फ़ अन्दोज़ होते थे लेकिन उनके कर्ब को समझने वाला कोई नहीं था। तरक़्क़ी पसंद तहरीक के साथियों और उन से बेहिसाब मोहब्बत करने वाले लोगों ने भी सिर्फ़ उन्हें खूबसूरत और जि़न्दगी से भरपूर शेर कहने वाला समझा। उनके अंदर जो शिकस्त की आवाज़ थी, उसको कोई नहीं सुन सका। आखि़र बर्दाश्त ने जवाब दे दिया और 1940 ई0 में उन पर जुनून का पहला दौरा पड़ा। पहले दौरे से ठीक हुए तो बंबई (मुम्बई) इन्फ़ारमेशन आॅफिस में मुलाजि़मत कर ली, वहाँ दिल नहीं लगा तो देहली हार्डिंग लायब्रेरी में नौकर हो गए। 1945 ई0 में दूसरा दौरा पड़ा और 1950 ई0 के क़रीब तीसरा। इन सब के बावजूद जब वह ठीक हो जाते तो फिर रौनक़े महफि़ल बन जाते और चाहने वालों की भीड़ में मोहब्बत और इनक़्लाब के नग़मे सुनाते।
3 दिसम्बर 1955 को स्टुडेन्ट्स उर्दू कन्वेंशन की वजह से मजाज़ के बहुत से पुराने साथी सरदार जाफ़री, असमत चुग़ताई, नियाज़ हैदर, साहिर लुधयानवी, डाॅक्टर अब्दुल अलीम, प्रोफ़ेसर एहतेशाम हुसैन जमा थे। रात-सफे़द बारादरी के मुशायरे में मजाज़ ने लहक-लहक कर दो ग़ज़लें सुनाईं। कोई नहीं जानता था कि यह मजाज़ की जि़न्दगी का आखि़री मुशायरा है। 4 दिसम्बर 1955 ई0 की रात में उन पर दिमाग़ी फ़ालिज का हमला हुआ। उन्हें इलाज के लिए बलरामपुर अस्पताल में दाखि़ल किया गया, लेकिन उर्दू शायरी का यह सूरज 5 दिसम्बर 1955 ई0 की उदास रात में 10 बजकर 22 मिनट पर हमेशा के लिए डूब गया। सरदार जाफ़री, असमत चुग़ताई, एहतेशाम हुसैन और बहुत से अदीब व शायर उनके सरहाने मौजूद थे। 6 दिसम्बर 1955 ई0 को पेपर मिल कालोनी, निशातगंज के क़ब्रिस्तान में उन के दोस्तों, अज़ीज़ों और हज़ारों मद्दाहों ने उन्हें सुपुर्दे-ख़ाक कर दिया।
मजाज़ के इन्तेकाल को 50 साल से ज़ायद गुज़र चुके हैं, लेकिन उस आवाज़ का असर, उसकी शखि़्सयत की तरहदारी, उसकी शायरी की रजामियत और हौसलामंदी आज भी उसी तरह है। मजाज़ की यह खुसूसियत है कि वह अपने अहद की आवाज़ भी हैं और आने वाले ज़माने की आवाज़ भी। जब तक इन्सानियत जुल्म, नाइंसाफी, दहशतगर्दी और ऊँच नीच का शिकार है, जब तक नौजवान अपनी मोहब्बत और अपनी जिन्दगी की ताबीर के लिए आवारा है, जब तक ‘चमन-बन्दियये-दौराँ’ के लिए खूने दिल नज़्र करने की जरूरत है, मजाज़ के कलाम की कशिश बाक़ी रहेगी।
मजाज़ तरक़्क़ी पसंद शोअरा में ऐसे शायर थे जिन्हें सब पसंद करते थे और जिन से सब मोहब्बत करते थे। अगर एक तरफ़ सज्जाद ज़हीर, फै़ज़ अहमद फ़ैज़ और सरदार जाफ़री उनके मद्दाह थे तो दूसरी तरफ़ क्लासिकी शायरी के नुमाइन्दा शायर नवाब जाफ़र अली खाँ, असर लखनवी और सालिक लखनवी उन की शायरी के मोतरिफ़ थे, जिस का बुनियादी सबब यह था कि उन्होंने पूरे क्लासिकी रचाव और ज़बान के रख-रखाव के साथ शायरी की। उन की फिक्र नई है लेकिन रोजमर्रा और ज़बान का जादू वही है। वह तरक़्क़ी पसंद तहरीक के नुमाइंदा शायरों मंे थे। जिन्दगी की बदलती हुई क़दरों और असरी तकाज़ों पर उन की गहरी निगाह थी। मजाज़ की शायरी रूमानियत या इन्क़लाबी रूमानियत की मिसाल बाद में है पहले वह अपने अहद की मिससियत की अलामत है। वह उस वक़्त की जि़न्दगी, तहज़ीब, तज़ादात, जद्दो-जेहद, उस वक़्त की घुटन, तशनगी, हिरमाँ-नसीबी और बेबसी की अलामत है।
मजाज़ की शायरी की एक खुसूसियत इसमें जि़न्दगी की ताज़गी और गर्मी है। वह जाती तौर पर नाकामियों और घुटन का शिकार रहे, लेकिन उनकी शायरी कभी मायूसी और यासियत का शिकार नहीं हुई। जि़न्दगी के बारे में उनका रवैया हमेशा खुश-आइंद रहा। इसीलिए उन्होंने लिखा था:-

खूने दिल की कोई क़ीमत जो नहीं है तो न हो,
खूने दिल नज़रे चमन-बन्दीए दौराँ कर दे।

यही हौसला और अज़्म उनकी शायरी की ताक़त है और इसी ने उन्हें असरी मिस्सियत का मुसव्विर बना दिया है। मजाज़ के यहाँ जमालियाती एहसास और फि़करी इज़हार में जो जमालियाती कैफि़यत है, वह उनके अहद के कम शायरों में मिलेगी। उनकी नज़्में-रात और रेल, मुसाफि़र, ख़्वाबे सहर, जज़्बे और एहसास की ऐसी तसवीरें हैं, जो हर दिल में एक बेहतर जि़न्दगी की तमन्ना बेदार करती हैं। यह सिर्फ़ मजाज़ हैं, जो पहले जश्ने-आज़ादी के जोशों खरोश में जब ‘‘ज़माना रक़्स में है,जि़न्दगी ग़ज़ल ख्वाँ है’’ की सूरत थी, वह आने वाली जि़म्मेदारियों का यह कहकर एहसास दिलाते हैं कि ‘‘यह इन्तहा नहीं, आग़ाजे कारे मरदाँ है’’।
मजाज़ की शायरी हमेशा जि़न्दगी की खूबसूरती और ताज़गी का एहसास दिलाती है, मजाज़ का ये शेर-

तेरे माथे पे ये आँचल, बहुत ही खूब है लेकिन,
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

आज भी जि़न्दगी की जद्दो-जहद में औरत की बराबरी और उसके निसाई हुस्न, दोनो का एहसास दिलाता है। मजाज़ ने इन्क़लाब और तब्दीली के नग़मे भी लिखे हैं, लेकिन वह किसी एक इन्क़लाब के नग़मा-ख़्वाँ नहीं, वह जि़न्दगी के नग़मा-ख़्वाँ हैं, और उस के हुस्न, दिलकशी और मसर्रत के लिए, हमेशा एक ताज़ा इन्क़लाब की तमन्ना करते हैं।

आओ, मिलकर इन्क़लाबे ताजह़तर पैदा करें,
दहर पर इस तरह छा जाएँ कि सब देखा करें।

मजाज़ की यह आवाज़ आज भी उसी तरह दिलकश, उसी तरह खूबसूरत और दिल-आवेज़ है, और मुस्करा कर आने वाले ज़माने से कह रही है-

जो हो सके, हमें पामाल करके आगे बढ़,
न हो सके तो, हमारा जवाब पैदा कर।

-प्रोफे़सर शारिब रुदौलवी
उर्दू से लिप्यन्तरण- डॉ0एस0एम0 हैदर
लेखक मो0:- 09839009226

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“कामायनी” के प्रकाशन को 75 वर्ष होने को हैं

महानतम रुसी कहानीकार ऐंटन चेखव के मुहावरे में कहें तो कामायनी समूचे छायावादी आन्दोलन का- प्रधान हस्ताक्षर -हैं | जिसके प्रकाशन को अब 75 वर्ष होने को जा रहे है |निःसंदेह कामायनी का रचनाकाल दूसरे विश्व -युद्ध से पहले का है |किन्तु किसी भी युद्धकाल में असहाय मानवता की जो भयावह स्थिति होती है ,उसका पूर्ण बोध प्रसाद जी की चेतना में अंतर्भूत था |ऋग्वेद की सुपरिचित कथा मनु -श्रद्धा के बहाने से प्रसाद जी ने सभ्यता के विनाश ( जल -प्रलय ) की भूमि पर नई सृष्टि के उदय का जो काव्य -रूपक रचा है , वह विश्व- साहित्य की अमूल्य निधि है | कामायनी के उद्देश्य को उसी के रचनाकार के शब्दों में देखिये —-

“वह कामायनी जगत की
मंगल -कामना अकेली |”

तो आइये ,कामायनी के प्रकाशन के इस अमृत -महोत्सव में हम आप को सादर आमंत्रित करते है | इस लिए कि हिंदी आलोचना में अबतक के मूल्याकनो के प्रकाश में हम सभी उन अनछुए रचना- तत्वों और मूल्याकन -मानदंडो को सामने ला सकें ,जो अब तक साहित्यिक परिदृश्य से बाहर है |
कामायनी की संरचना में प्रसाद जी ने उदभावना का वंही सहारा लिया है ,जंहा वह सहज रूप में आवश्यक है | भारतीय मिथकों ,दार्शनिक -पद्धतियों और इतिहास के संरचना -तत्वों का कवि ने अदभुत संयोजन किया है |प्रसाद जी वैदिक कर्मकांड के मानवीय पक्षों का समर्थन करते है ,उसके पाषंड का नही | यंहा वह बौद्ध- दर्शन के करुणावाद से व्यापक रूप में प्रभावित हैं |इस प्रभाव की अनुगूजे उनकी अनेक कविताओं और नाटकों में भी है |
कामायनी की संरचना में पशुबलि की क्रूरता को लाना कवि की व्यापक उदारता का परिचायक है | प्राचीन भारत के दो महानतम समाज सुधारको तीर्थंकर महावीर और तथागत बुद्ध के गौरवपूर्ण अवदानो से प्रसाद जी अनन्य रूप में प्रभावित रहे | सत्ता के मद में चूर शासको और निठल्ले पुरोहितो का गठबधन भी कवि के ध्यान में था | साम्राज्यवाद की विश्व -व्यापी ,दबंगई का तत्कालीन स्वरूप भी प्रसाद की चेतना में था | मनु के चरित्र में तानाशाही की इस निरंकुश प्रवृत्ति को ,शासक की प्रवृत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए |

सुनील दत्ता – डॉ राम दरश सिंह
पत्रकार कवि- आलोचक

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येरुशलम।। आपने कभी सुना है कि किसी कुत्ते को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। लेकिन इस्राइल में ऐसा हुआ है। वहां की एक धार्मिक अदालत ने एक कुत्ते को मौत की सजा सुनाई है। कुत्ते को ये सजा इसलिए दी गई है क्योंकि अदालत को लगा कि एक धर्मनिरपेक्ष वकील ने कुत्ते की शक्ल में पुनर्जन्म ले लिया है।

इस वकील ने 20 साल पहले एक केस की पैरवी के दौरान जजों की तौहीन की थी। यह कुत्ता अदालत की परिसर में घुसने की कोशिश कर रहा था, तो वहां मौजूद एक जज को सालों पहले की एक घटना याद आ गई जब एक अन्य जज ने बदतमीज वकील को श्राप दिया था कि वह कुत्ते के रूप में पुनर्जन्म लेगा। जज को लगा कि कुत्ते में उसी श्राप दिए हुए वकील की रूह है और उसने उसे गिरफ्तार करवा कर सजा सुना दी।

कुत्ते को पत्थरों से मारने की सजा को लागू करने की जिम्मेदारी जज ने पड़ोस के बच्चों को सौंप दी। लेकिन सौभाग्य से सजा मिलने से पहले ही कुत्ता वहां से किसी तरह से भाग खड़ा हुआ। येरुशलम सिटी काउंसिल के मेंबर और सामाजिक कार्यकर्ता राशेल अज़ारिया ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल को चिट्ठी लिखकर जज के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। जानवरों के लिए काम करने वाले एक संगठन ने जज के खिलाफ पुलिस से शिकायत भी दर्ज कराई है।

नवभारत
timessay

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पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा बुरी तरह हार गया। देशभर में इस पराजय को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। ज्यादातर लोग जो पश्चिम बंगाल के बाहर रहते हैं वे इस पराजय को सही ढंग से समझ नहीं पा रहे हैं। स्वयं वामपंथी संगठनों में विभ्रम की स्थिति है। कायदे से इस पराजय का वामदलों को गंभीरता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए। पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरे राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा है। यह स्वयं में इस बात का संकेत है कि 34 सालों के वामशासन में कानून-व्यवस्था की स्थिति किस तरह खराब हुई है।
पश्चिम बंगाल में जब प्रचार कार्य प्रारम्भ हुआ था तो यह साफ लग रहा था कि इस बार वाम मोर्चा चुनाव नहीं जीत पाएगा। आम जनता तकरीबन मन बना चुकी थी । परिवर्तन का नारा आम लोगों के दिलो-दिमाग में बैठ गया था। आम लोगों में वामदलों की साख गिरी है। दूसरी ओर मीडिया का चौतरफा वाम विरोधी प्रचार अभियान चल रहा है। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में वाम का जनाधार और भी घटा है।
सवाल उठता है कि इतनी बुरी तरह वाम मोर्चा पराजित क्यों हुआ? इसका प्रधान कारण है वामदलों का सच न बोल पाना। वामदलों की कार्यप्रणाली में असत्य घुस आया है। पार्टी और प्रशासन की कार्यप्रणाली में असत्य का वर्चस्व इस कदर बढ़ गया कि सही और गलत में अंतर खत्म हो गया है। सन् 2006 में वाम मोर्चे ने उन्नत वाम मोर्चा के नारे के आधार पर विधानसभा चुनाव जीता था और उस समय तीन-चैथाई बहुमत हासिल किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी और प्रशासन में बनी हुई गड़बडि़यों को दुरूस्त करने के बजाय राज्य प्रशासन को पार्टी वर्चस्व के मातहत कर दिया गया । प्रशासनिक निष्पक्षता खत्म हो गई। प्रशासन पंगु होकर रह गया। प्रशासनिक निष्पक्षता, सक्रियता, संवाद और पारदर्शिता का अभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला गया। राज्य में धीरे-धीरे आलोचनात्मक लोकतांत्रिक सामाजिक परिवेश संकुचित होता चला गया और आज स्थिति इस कदर भयावह हो उठी है कि वामपंथी कतारों में दरारें आ गई हैं। वामपंथ के प्रति आस्थाएँ डगमगाने लगी हैं। जो वामपंथी हैं वे शर्मिन्दगी महसूस करने लगे हैं। सन् 2006 में विधानसभा चुनाव के मौके पर जो वायदे किए गए उनमें से एक भी वायदा वाम सरकार पूरा नहीं कर पाई। सन् 2006 की जीत ने वामदलों में अहंकार पैदा किया और आम जनता के साथ अलगाव बढ़ता चला गया।
पिछले दिनों अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह 4 दिन आमरण अनशन किया और उसका अहर्निश टीवी चैनलों से व्यापक प्रचार हुआ उसने वामदलों के भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बना दिया। इस बार के
विधानसभा चुनाव में वामदलों के लिए भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं था। वे ममता बनर्जी के रेल मंत्रालय की अक्षमताओं का ही रोना रोते रहे। जबकि रेल मंत्रालय का राज्य से कोई लेना-देना नहीं था। इसके विपरीत ममता बनर्जी ने वामदलों और खासकर सी0पी0आई0एम0 के भ्रष्टाचार को व्यापक मुद्दा बनाया। कम्युनिस्ट भ्रष्ट होते हैं यह बात आम लोगों के मन में बिठाने में वे सफल रही हैं। माकपा के भ्रष्ट कैडर, दबंगई और उत्पीड़न को व्यापक कवरेज के साथ पेश किया। फलतः अन्य सभी मसले हाशिए पर चले गए। विगत 34 सालों में देश के अन्य शहरों में जिस तरह के तेज परिवर्तन घटित हुए हैं, विकास हुआ है, वैसे परिवर्तन पश्चिम बंगाल में दूर-दूर तक नजर नहीं आते। एक अच्छे प्रशासन का आदर्श नमूना पेश करने में राज्य प्रशासन असफल रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, परिवहन, बिजली, पानी आदि के क्षेत्र में लगातार गिरावट आई है। राज्य का प्रत्येक क्षेत्र में स्तर गिरा है। यह स्थिति तब हुई है जब वाममोर्चे को तकरीबन दो-तिहाई बहुमत से शासन का अवसर मिला था। आर्थिक तौर पर राज्य के माली हालात ठीक नहीं हैं। ऐसी स्थिति में आम लोगों और बुद्धिजीवियों में असंतोष का फूट पड़ना स्वाभाविक है।
हमारे यहाँ जनतंत्र है, पार्टीतंत्र नहीं है। समाज को पार्टीतंत्र के आधार पर चलाने का खामियाजा सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी भोग रही है। वहाँ पर कम्युनिस्ट पार्टी को अब कोई देखना पसंद नहीं करता। सोवियत संघ में कोई प्रतिवादी जन आन्दोलन नहीं था और कम्युनिस्ट पार्टी अपने ही अन्तर्विरोधों और आपसी कलह में खत्म हो गई। पार्टी को बुनियादी तौर पर अपने दल के वर्चस्व के बजाय संविधान के अनुसार निष्पक्ष प्रशासन संचालन के तंत्र को विकसित करना चाहिए। आज स्थिति यह है कि जो व्यक्ति पार्टी के साथ नहीं है अथवा पार्टी के इशारे पर काम नहीं करता उसको तरह-तरह से अपमानित और उपेक्षित किया जाता है। सामाजिक अछूत की तरह उससे व्यवहार किया जाता है। यह फासीवादी कार्यप्रणाली का संकेत है।
वाममोर्चे और खासकर मा0क0पा0 को अपनी असफलता के लिए बहाने नहीं खोजने चाहिए। माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है जनतंत्र को आत्मसात न कर पाना। जनतंत्र का वे इस्तेमाल और सत्ता प्राप्ति के लिए दुरूपयोग करना जानते हैं किंतु लोकतांत्रिक व्यवहार, कार्यपद्धति, मूल्यों और संरचनाओं को वे अपने व्यवहार में लागू करने में असफल रहे हैं। पार्टी की कतारों में ऊपर से नीचे तक असहिष्णुता, संवेदनहीनता और स्वैराचार बढ़ा है। मसलन् सूचना अधिकार कानून के तहत कोई भी सूचना राज्य का कोई भी विभाग मुहैय्या नहीं कराता। पार्टी आदेश के बिना थानों में एफ0आई0आर0 तक दर्ज नहीं होती।
वाम मोर्चे की पराजय के कारणों को लेकर वामदलों को तदर्थ ढ़ंग से निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। साथ ही स्टीरियोटाइप समीक्षा और मुहावरों में सोचना बंद कर देना चाहिए। मसलन्, जनता से वाम मोर्चा कट गया था, यह स्टीरियोटाइप कथन है, वे कौन से कारण और घटनाएँ हैं जिनके कारण जनता से अलगाव पैदा हुआ? वे कौन सी गलतियाँ हैं और वे कौन लोग हैं जिनकी कार्यप्रणाली ने वाम मोर्चे को आम जनता से काट दिया, इन सबकी पहचान की जानी चाहिए। ममता बनर्जी की जीत साधारण जीत नहीं है। इससे कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। पश्चिम बंगाल में मा0क0पा0 यदि तदर्थ ढंग से सोचती है और पराजय के सतही निष्कर्ष निकालती है तो यह कम्युनिस्ट आंदोलन की कु-सेवा होगी। गाँवों में वाम मोर्चे की पराजय के पीछे दो बड़े कारण हैं, पहला, विकास योजनाओं का आधे-अधूरेमन से क्रियान्वयन । दूसरा, गाँवों में कंगारू अदालतों की मानवाधिकार हनन की बढ़ती हुई घटनाएँ और पार्टी की दबंगई का आतंक। इन दो घटनाओं ने गाँवों में वाम मोर्चे को व्यापक क्षति पहुँचाई है। बुनियादी तौर पर वाम मोर्चा विगत 34 सालों में मानवाधिकारचेतना पैदा करने में असफल रहा और आम जीवन में नागरिक अधिकारों को उसने राजनैतिक बहस का मुद्दा ही नहीं बनने दिया। मानवाधिकारों की अवज्ञा में राज्य प्रशासन और पार्टीतंत्र जिस तरह सक्रिय रहा है उसने राज्य में कम्युनिस्ट आंदोलन के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। कम्युनिस्ट आंदोलन के भारत में प्रसार के लिए जरूरी है कि कम्युनिस्ट पार्टियाँ यह महसूस करें और मानें कि भारत में लोकतंत्र है और लोकतांत्रिक संस्थानों में व्यक्तिगत पहलकदमी और
मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। पश्चिम बंगाल में 34 साल एक छत्र शासन करने के बाद भी मा0क0पा0 और अन्य वामदलों में मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता नहीं बढ़ी है। नागरिक समाज के मुद्दे केन्द्र में नहीं आ पाए हैं। पुराने समाजवादी ढंग से देखने और सोचने का तरीका नहीं बदला है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल तक शासन करने के बाद भी वामदल अपनी न्यूनतम लोकतांत्रिक साख नहीं बचा पाए हैं। इसी प्रसंग में वामपंथी बुद्धिजीवियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वामपंथी बुद्धिजीवियों को पार्टी नीतियों की रक्षा के नाम पर असत्य बोलने से बचना चाहिए।
बुद्धिजीवी सत्य भक्त होता है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, दल, विचारधारा आदि का भक्त नहीं होता। सत्य के प्रति आग्रह उसे ज्यादा से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाता है। सत्य और मानवता की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में तपकर ही बुद्धिजीवी अपने सामाजिक अनुभवों को सृजित करता है। कालजयी रचनाएँ दे पाता है। जनता के बृहत्तर तबकों की सेवा कर पाता है, सारे समाज का सिरमौर बनता है।
बुद्धिजीवी गतिशील और सर्जक होता है। वह मानवीय चेतना का रचयिता है। बुद्धिजीवी स्वभावतः लोकतांत्रिक होता है, लोकतंत्र ही उसकी आत्मा है। लोकतंत्र की आत्मा के बिना बुद्धिजीवी होना संभव नहीं है। लोकतंत्र के उसूलों के साथ समझौता करना उसकी प्रकृति के विरुद्ध है। लोकतांत्रिक मूल्य, लोकतांत्रिक संविधान, लोकतांत्रिक संरचनाओं में उसकी आस्था और विश्वास ही उसकी सम्पदा है यदि वह इनमें से किसी के भी साथ दगाबाजी करता है अथवा लोकतंत्र के रास्ते से जरा भी विचलित होता है तो उसे गंभीर कष्ट उठाने पड़ते हैं। साथ ही समाज को भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। बुद्धिजीवी का सत्य के साथ किया गया समझौता सामाजिक दगाबाजी है।
यह दुर्भाग्य है कि हम दगाबाज बुद्धिजीवी और ईमानदार बुद्धिजीवी में अंतर भूल गए हैं। ईमानदार बुद्धिजीवी वह है जो अपने अंदर के सत्य और न्यायबोध को बेधड़क, निस्संकोच भाव से व्यक्त करता है। यह ऐसा बुद्धिजीवी है जो अपने सत्य को अर्जित करने के लिए किसी भी किस्म के भौतिक लाभ के जंजाल में नहीं फँसता। किसी भी किस्म का प्रलोभन उसे सत्य की अभिव्यक्ति से रोकता नहीं है, वह निडर भाव से न्याय के पक्ष में खड़ा रहता है। अपने जीवन के व्यावहारिक कार्यों की पूर्ति के लिए सत्य का दुरुपयोग नहीं करता। सत्य के लिए जोखिम उठाता है, सत्य पर दाँव लगाता है, यहाँ तक कि सत्य के लिए बलि चढ़ जाता है। तरह-तरह के उत्पीड़न और उपेक्षाओं को सहता है। वह हमेशा राज्य के विपक्ष में रहता है और यथास्थितिवाद का विरोध करता है।
यह सच है कि किसी भी किस्म का बड़ा परिवर्तन अथवा क्रांति बगैर बुद्धिजीवियों के हस्तक्षेप के नहीं हुई है। यह भी सच है कि किसी भी किस्म की प्रतिक्रांति भी बगैर बुद्धिजीवियों की भूमिका के नहीं हुई है। बुद्धिजीवीवर्ग ही किसी आंदोलन के माता-पिता, और बेटी -बेटा, पड़ोसी और मित्र होता है। बुद्धिजीवी की समाज में विशिष्ट भूमिका होती है उसे शक्लविहीन पेशेवराना रूपों में संकुचित करने की जरूरत नहीं है। वह अपने वर्ग का सक्षम सदस्य होता है, अपने कार्य-व्यापार में समर्थ होता है। व्यक्ति के तौर पर बुद्धिजीवी संदेश को अभिव्यक्त करता है, संदेश को बनाने या धारण करने की उसके पास फैकल्टी होती है जिसे वह अभिव्यक्ति देता है। यह अभिव्यक्ति उसके एटीट्यूट्स, दार्शनिक नजरिए के साथ-साथ जनता में व्यक्त होती है।
रुढि़यों और कठमुल्लेपन से लड़े बिना बुद्धिजीवी अपनी भूमिका नहीं निभा सकता। ये रुढि़याँ और कठमुल्लापन किसी भी तरह के हों, बुद्धिजीवी कभी भी इन्हें चुनौती दिए बगैर अपनी सामाजिक भूमिका अदा नहीं कर सकता। इसबार विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर वाम बुद्धिजीवियों ने ममता बनर्जी का साथ दिया है। पहलीबार वामपंथी बुद्धिजीवियों ने व्यापक स्तर पर वामपंथी कठमुल्लेपन और रुढि़वादिता को चुनौती दी है। पहलीबार वामपंथी चिन्तन के सर्वसत्तावादी रुझानों को निशाना बनाकर सवाल किए हैं, इससे बुद्धिजीवीवर्ग में वामपंथी कठमुल्लापन कमजोर होगा। इससे स्वतंत्रता और न्याय के लक्ष्य को अर्जित करने, उसके लिए संघर्ष की भावना नए सिरे से जन्म लेगी। पुरानी वामपंथी प्रतिबद्धता के मानक टूटेंगे और प्रतिबद्धता के मानक के तौर पर मानवाधिकारों की स्वीकृति पैदा होगी। स्वतंत्रता और न्याय को प्रतिष्ठा मिलेगी। पुराने किस्म की वामपंथी प्रतिबद्धता विचारधारा और वर्ग विशेष के हितों से बँधी थी, यह बंधन और प्रतिबद्धता संकुचित और एकायामी थी। इसमें मानवता और मानवाधिकारों का बोध नहीं था। वह पार्टी बोध से संचालित प्रतिबद्धता थी। जबकि नए किस्म की प्रतिबद्धता का आधार स्वतंत्रता और न्याय है। यह बहुआयामी प्रतिबद्धता है। स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर जब लिखेंगे अथवा संघर्ष करेंगे तो पुराने सभी विमर्श उलट-पलट जाएँगे। पुरानी वामपंथी प्रतिबद्धता जिन्दगी की अधूरी सच्चाई को सामने लाती है। जबकि स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर निर्मित यथार्थ ज्यादा व्यापक, वैविध्यपूर्ण, जटिल और मानवीय होता है।
वामपंथी बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता की मुश्किल यह है कि वे अंदर कुछ बोलते हैं और बाहर कुछ बोलते हैं। प्राइवेट जीवन में, पार्टी के अंदर बुद्धिजीवी कुछ बोलता है और बाहर कुछ बोलता है। उसके प्राइवेट और सार्वजनिक में भेद रहता है। यह उसके जीवन और विचार का दुरंगापन है। बुद्धिजीवी के विचारों और नजरिए में दुरंगापन नहीं पारदर्शिता होनी चाहिए। जब आप सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक सवालों से दो चार होते हैं तो उस समय प्राइवेट जैसी कोई चीज नहीं होती। उस समय बुद्धिजीवी पब्लिक या जनता का बुद्धिजीवी होता है, जनता के बुद्धिजीवी की भूमिका अदा करता है। बुद्धिजीवी का काम यह नहीं है कि अपनी ऑडिएंस को संतुष्ट करने वाली, आनंद देने, मजा देने वाली बातें कहे। इसके विपरीत बुद्धिजीवी का काम है अप्रिय सत्य का उद्घाटन करना, ऐसी बात को कहना जिसे ऑडिएंस नापसंद करती है। इसी अर्थ में बुद्धिजीवी किसी न किसी नजरिए का समाज में प्रतिनिधित्व करता है। सभी किस्म की बाधाओं के बावजूद अपनी जनता का प्रतिनिधित्व करता है। बुद्धिजीवी जब सामाजिक प्रतिनिधित्व करता है तो उसे प्रतिबद्धता, जोखिम, साहस से काम लेना होता है और असुरक्षा का सामना करना होता है।
बुद्धिजीवी कभी भी घरेलूपन के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता। भाई-चारे और मित्रता के नाते स्वतंत्रता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को त्यागता नहीं है। बुद्धिजीवी का सामान्य स्वभाव यही होता है कि वह साफतौर पर कहता है वह क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता। बुद्धिजीवी अपने कर्म के जरिए स्वतंत्रता पैदा करता है। वह मैलोड्रामा के जरिए स्वतंत्रता पैदा नहीं कर सकता।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0 09331762360

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