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Archive for जुलाई, 2011

भारत में विकास के लिये सरकार, राजनेता, नौकरशाह विदेशी निवेश के लिये विभिन्न देशों की यात्राएं, रात्रिभोज व तरह-तरह के उपाय करते रहते हैं विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्री भी औद्योगिक विकास व अन्य डेवेलपमेंट के लिये विदेशी कंपनियों के प्रमुखों, विदेशी राजनेताओं को आमंत्रित करते रहते हैं व उनका स्वागत सत्कार भी बड़े पैमाने पर करते हैं किन्तु इसके विपरीत भारतीय मूल के उद्योगपति भारत में जितना निवेश करते हैं उससे कहीं ज्यादा विदेशों में पूँजी निवेश करते हैं जिसका एक छोटा सा उदहारण यह है कि 2010-11 में सुरेश रुइया ने 1.2 बिलियन डालर विदेश में और देश में 200 मिलियन डालर, मुकेश अम्बानी 2011 में 5 बिलियन विदेश में और 2.7 बिलियन डालर देश में, रतन टाटा 2009-10 में 4 बिलियन डालर विदेश में और देश में 200 मिलियन डालर, अनिल अम्बानी 3 बिलियन डालर विदेश में 400 मिलियन डालर देश में, सुनील मित्तल 16 बिलियन डालर विदेश में और 2 बिलियन डालर देश में निवेश किया है। इस तरह के आंकड़े देखने के बाद सिर्फ इतना कहना ही पर्याप्त है की हम हैं हिन्दुस्तानी …………? लिये कटोरा हाथ

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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भारत 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के सदमे से उबरा भी नहीं था कि दूरस्थ नार्वे में एक और भयावह आतंकी हमला हो गया। शुक्रवार 22 जुलाई को नार्वे की राजधानी ओस्लो के बीचो-बीच स्थित एक गगनचुंबी इमारत पर हमला हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री का दफ्तर है। कुछ खिड़कियों के कांच फूट गए और आसपास की कुछ इमारतों को मामूली नुकसान पहुंचा। इसके कुछ ही घंटों बाद, पुलिस की वर्दी पहने एक बंदूकधारी ने, सत्ताधरी लेबर पार्टी द्वारा उल्योवा द्वीप पर अपनी पार्टी के युवा समर्थकों के लिए आयोजित समर कैंप पर गोलीबारी की। इन दोनों आतंकी हमलों में, कुल मिलाकर, लगभग 100 निर्दोष लोग मारे गए।
इस कायराना हरकत के बारे में विस्तृत जानकारी सामने आने के पहले ही इसके लिए जिम्मेदार संगठनों के नामों का खुलासा कर दिया गया। हमेशा की तरह, मीडिया और आतंकवाद “विशेषज्ञों“ ने इसके लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया। पूर्वाग्रहग्रस्त टिप्पणीकारों, विशेषज्ञों और मीडिया के एक हिस्से ने नार्वे की घटना के लिए अलकायदा के नवनियुक्त प्रमुख आयमान अल जवाहरी को जिम्मेदार बताया। सैकड़ो बार यह दोहराया गया कि इस हमले के पीछे अल्कायदा के नेतृत्व वाले इस्लामिक जेहादी आतंकवादी हैं। ज्ञातव्य है कि नार्वे भी अफगानिस्तान में पश्चिमी गठबंधन सेनाओं द्वारा चलाए जा रहे अभियान में शामिल है।
बाद में यह सामने आया कि यह हमला नार्वे के ही एक नागरिक ने किया था। लगभग 32 साल का आंद्रेज बेहरिक बे्रविक एक किसान है और घोर दक्षिणपंथी है। वह बहुसंस्कृतिवाद, इस्लाम और मुसलमानों का कट्टर विरोधी है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसने नार्वे के प्रधानमंत्री की उदारवादी नीतियों के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए यह हरकत की। आंदे्रज, नव-नात्सीवादी व नस्लवादी है और मुसलमानों के प्रति घृणा से लबरेज है। उसका ब्लाग, उसकी अतिवादी सोच को प्रतिंिबंबित करता है। वह यूरोपियन यूनियन का विरोधी है, बहुसंस्कृतिवाद में यकीन नहीं रखता और नार्वे की परंपराओं और पहचान का महिमामंडन करता है। उसका यह मानना है कि मुसलमान अल्कायदा के समर्थक और आतंकवादी हैं।
इस त्रासद आतंकी हमले और उसके बाद हुए इसके “विश्लेषण“ ने एक बार फिर पूरी दुनिया और विशेषकर भारत जैसे देशों की विकृत सामाजिक सोच को रेखांकित किया है। पूरी दुनिया के साथ भारत में भी हर आतंकी हमले के लिए मुस्लिम आतंकी समूहों को दोषी बता दिया जाता है। कुरान की कुछ आयतों को संदर्भ से हटाकर उद्धत कर उनका इस्तेमाल इस्लाम के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दंक्षिणपंथी अलकायदा और तालिबान का जनक अमेरिका है। अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के लिए अल्कायदा को खड़ा किया था। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सोवियत सेनाएं, वहां अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार के निमंत्रण पर आई थीं परंतु अमेरिका तो अफगानिस्तान को रूस का वियतनाम बनाने पर तुला हुआ था। अमेरिका चाहता था कि रूस को अफगानिस्तान में उसी तरह मुंह की खानी पड़े जैसी उसने वियतनाम में खाई थी।
चूंकि वियतनाम में धूल चाटने के कारण अमेरिकी सेनाओं का मनोबल बहुत गिरा हुआ था इसलिए अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजने की बजाए दूसरा रास्ता चुना। सीआईए ने आईएसआई के साथ मिलकर पाकिस्तान में मदरसों की स्थापना की। इन मदरसों में युवा मुस्लिम युवकों को इस्लाम के अतिवादी संस्करण में रंगा जाने लगा। इसके लिए कुरान की उन आयतों का इस्तेमाल किया गया जो तत्समय नए-नए मुसलमान बने लोगों पर हो रहे हमलों के संदर्भ में कही गई थीं। इनमें नव-मुसलमानों का आव्हान किया गया था कि वे उन काफिरों से अपनी रक्षा करें जो उनपर हमले कर रहे थे। हिंसा का इस्तेमाल अंतिम अस्त्र के तौर पर करने की सलाह भी दी गई थी। अगर इन आयतों को उनके संदर्भ से अलग करके पढ़ा जाए तो ऐसा लगता है कि इस्लाम अपने मानने वालों को निर्दोषो के विरूद्ध अकारण हिंसा करने की षिक्षा देता है। जबकि सच यह है कि उक्त आयतें, युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गई थीं और उनमें भी रक्षात्मक लड़ाई लड़ने पर जोर दिया गया था। इस्लाम की असली शिक्षाओं को तोड़-मरोड़कर अमेरिका ने मदरसों को आतंकी तैयार करने के कारखानों में बदल दिया। अलकायदा भी अमेरिकी नीतियों के नतीजे में अस्तित्व में आया। ओसामा, जिसे अमेरिका ने ही चुना था, को अलकायदा का नेतृत्व सौंपा गया और उसे 800 करोड़ अमेरिकी डालर और 7000 टन हथियारों की मदद उपलब्ध कराई गई। अलकायदा व तालिबान के लड़ाकों का काम था अफगानिस्तान में रूसी फौजों से लड़ रहे तत्वों का साथ देना और उन्हें इतना ताकतवर बना देना कि वे सोवियत सेनाओं को अफगानिस्तान से बाहर धकेल सकें।
9/11 के बाद से अमेरिकी मीडिया ने बड़े पैमाने पर “इस्लामिक आतंकवाद“ शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह मुसलमानों और इस्लाम के दानवीकरण का प्रयास था जिसका उद्धेश्य था अफगानिस्तान और फिर ईरान पर हमला करने के लिए जमीन तैयार करना। भारत में भी कई छोटे-छोटे ओसामा उग आए। स्वामी दयानंद पाण्डे, असीमानंद व उनके साथियों के दिमाग में यह भर दिया गया कि वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के पवित्र युद्ध के महान योद्धा हैं और “बम के बदले बम“ की नीति पर चलकर वे अपने साहस का प्रदर्शन कर सकते हैं। भारत में भी इस्लाम और मुसलमानों को आतंकवाद का पर्याय मान लिया गया और ऐसे बम विस्फोटों के मामलों में भी, जो मस्जिदों के आसपास या ऐसे स्थानों पर हुए जहंा भारी संख्या में मुसलमान इकट्ठा थे, जांच एजेन्सियां मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर प्रताडि़त करने लगीं। 13 जुलाई 2011 के मुंबई हमले के बाद भी वही सब बातें पुनः दुहराई गईं। हम केवल उम्मीद कर सकते हंै कि जांच एजेन्सियां बिना किसी पूर्वाग्रह के इन हमलों की जांच करेंगी।
जहां तक यूरोप और अमेरिका का सवाल है, वहां के लिए आतंकवाद और आतंकवादी कोई नई चीज नहीं हैं। आईआरए ने अभी कुछ ही वर्ष पहले यह घोषणा की है कि वह आतंकवाद का सहारा लेना बंद कर रहा है। टिमोथी मेकवे ने ओकलेहोमा में बम विस्फोट कर 200 लोगों की जान ली थी। पूरी दुनिया में और विषेषकर यूरोप में असहिष्णु दक्षिणपंथी विचारधारा के उदय के पीछे अमेरिका का दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के रूप में उभरना है। अमेरिका दुनिया पर अपनी दादागिरी कायम करना चाहता है। अपने आर्थिक हितों, विषेषकर तेल के भंडारों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए, वह कुछ भी करने को तैयार है। नार्वे में हुए हालिया हमले से यह पता चलता है कि किस तरह लिप्सा से प्रेरित अमेरिकी रणनीति ऐसी विचारधारा का पोषण कर रही है जो हर “बाहरी“ व्यक्ति से घृणा करती है और सामाजिक मसलों में घोर असहिष्णु है। नार्वे का आतंकी बहुसंस्कृतिवाद का विरोधी था और सरकार की मुसलमानों के प्रति नीति उसे पसंद नहीं थी।
स्वीडन के दैनिक एक्सपो ने यह दावा किया है कि आंद्रेज, नोरडिस्क नामक एक नव-नात्सी संगठन का सदस्य है। यह संगठन राजनैतिक आतंकवाद का हामी है। वह ईसाई कट्टरपंथियों के प्रति भी झुकाव रखता है। उसके हमले का उद्धेश्य सरकार को यह चेतावनी देना था कि वह उदारवादी नीतियों पर चलने से बाज आए। वह नार्वे में बहुसंस्कृतिवाद के उदय और मुसलमानों का विरोधी था क्योंकि उसका मानना था कि वे अल्कायदा के समर्थक हैं।
पूरी दुनिया में आतंकी हमले करने वालों में अनेक समानताएं हैं। नार्वे में ईसाई कट्टरपंथी, अफ-पाक में इस्लामिक कट्टरपंथी और भारत में हिन्दू कट्टरपंथी आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं। पूरी दुनिया में उदारवादी मूल्यों और आमजनों की गरिमा और अधिकारों के संघर्ष का स्थान कट्टरपंथी सोच ले रही है। एक धर्म का कट्टरपंथी हमेशा और आवश्यक रूप से दूसरे धर्मों और उनके मानने वालों से नफरत करता है और यही नफरत उसे भयावह हिंसा करने के लिए प्रेरित करती है। दक्षिण एशिया और कुछ हद तक यूरोप में हम धार्मिक कट्टरपंथियों का नंगा नाच देख रहे हैं।
इसके बावजूद भी यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि सामूहिक सामाजिक सोच को इस्लाम और मुस्लिम विरोधी बना दिया गया है। आतंकवादी शब्द सुनते ही एक दाढी वाले मुसलमान का चेहरा सामने आ जाता है। यह मुख्यतः अमेरिका और सीआईए द्वारा मीडिया के जरिए किए गए दुष्प्रचार का नतीजा है। अधिकाँश गैर-मुस्लिम यह मानते हैं कि सभी आतंकवादी मुसलमान हैं। कुछ टिप्पणीकार कहते हैं कि मुसलमानों के आतंकी होने के पीछे इस्लामिक शिक्षाएं हैं वहीं दूसरे धर्मों के लोग राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं। यह वर्गीकरण कोरी बकवास है। गहराई से सोचने और विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका के कारण ही जेहादी आतंकवाद उभरा और इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जहर फैलाने के लिए भी अमेरिका ही जिम्मेदार है।
त्रासदी यह है कि एक कट्टरपंथ, दूसरे कट्टरपंथ को बढ़ावा देता है। अल्कायदा की कुत्सित हरकतों के नाम पर दूसरे धर्मों के अतिवादी और कट्टरपंथी हिंसा कर रहे हैं और उसे उचित बता रहे हैं। नार्वे की घटना के बाद तो कम से कम हमारी दुनिया को जाग जाना चाहिए। हमें समझना होगा कि आतंकवाद के पीछे आर्थिक-राजनैतिक कारण हैं। धर्म का आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं है। नार्वे के घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि आर्थिक संकट भी असहिष्णुता को जन्म देता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम आतंकवाद के असली स्त्रोत को ढूढें और उसे जड़ से खत्म करने का यत्न करें। इसके लिए यह जरूरी है कि हमारी दुनिया, अलग-अलग देषों का प्रजातांत्रिक समुदाय बने। किसी एक देश या कुछ देशों की दुनिया पर राज करने की महत्वाकांक्षा को कुचला जाना जरूरी है। हमें विश्व शान्ति की ओर भी कदम बढ़ाने होंगे। आतंकवाद के कारणों की सही समझ ही आतंकवाद के उन्मूलन की दिशा में पहला कदम होगी।

-राम पुनियानी

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अन्तराष्ट्रीय शायर, वैज्ञानिक, डाक्युमेंट्री फिल्म निर्माता व सामाजिक कार्यकर्ता श्री गौहर रजा से समसामयिक विषय पर लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने जंहगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट में जाकर विशेष साक्षात्कार लिया

प्रश्न : पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर : ब्रेख्त ने लिखा था और चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया। उन्होंने जनवाद के खिलाफ मत दिया क्योंकि वह जनवादी थे बंगाल के सन्दर्भ में यह लाईनें मुझे याद आयीं इस रियलिटी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि बंगाल की जनता सरकार से नाराज थी। उसकी वजह वामपंथ की गलतियाँ थी। जिसका सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक था। इससे जो कुछ हुआ है भयंकर है। भयंकर इसलिए है कि चुनाव के बाद एक महीने के अन्दर ही पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए।
बिना लगाम के बाजार के हाथों मुल्क बेचने की प्रक्रिया इतनी तेज व भयंकर है कि इससे पहले इस मुल्क को यह गति देखने को नहीं मिली। जब वामपंथ कमजोर होता है तब वह अपने अन्दर कमजोर ही नहीं होता है बल्कि बुर्जुवा पार्टियों के अन्दर जो वामपंथी असर होता है वह भी कमजोर हो जाता है और हमारे सामने सैकड़ों हजारो उदहारण है बी.टी डंकल से लेकर मोंसंटो वहां से लेकर परमाणु डील तक या छोटे दफ्तर से लेकर कैबिनेट मिनिस्टर तक एक लूट की स्तिथि पैदा हो गयी है और इसमें आम आदमी की आवाज जो वामपंथी विचारधारा के गले से निकलती थी वह पूरी तरह से दब गयी यह है हमारी गलतियों का नतीजा है बंगाल में।

प्रश्न: क्या मार्क्सवाद प्रासंगिक है ?

उत्तर : जहाँ तक मार्क्सवाद को मैं एक वैज्ञानिक विचारधारा मानता हूँ वैज्ञानिक विचारधारा कहने का मतलब यह है बदलाव। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ धर्म एक ऐसी चीज है जो नहीं बदलता है। जितना पुराना हो उतना ही बेहतर यह सिर्फ ससियेंस है जो जितनी नयी हो उतनी बेहतर।
विचारधारा का जहाँ तक ताल्लुक है। विचारधारा में बदलाव ही उसे ससियेंस बनता है। दुनिया में अभी भी पूँजीवाद व सामंतवाद मौजूद है इसलिए मूल कानून है आज भी मार्क्सवाद पूरे उतरते हैं लेकिन हर जगह की परिस्तिथियों के हिसाब से लागू किया जा सकता है। इसका उदहारण हम टेक्नोलॉजी से लें हमारे देश में छोटे खेत हैं जब हम ट्रक्टर की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते हैं तब हमें छोटे ट्रक्टर की जरूरत होती है जिन मुल्कों में बड़े-बड़े खेत होते हैं वहां बड़े ट्रक्टर की जरूरत होती है। बिलकुल यही बात मार्क्सवाद तक पूरी उतरती है मार्क्सवाद को देश की परिस्तिथियों की हिसाब से अप्लाई किया जाना चाहिए जो बातें बंगाल पर लागू होंगी, वह बातें शायद गुजरात व उत्तर प्रदेश पर सही न उतरें।
मशीनी तरीके मर्क्सिजम अप्लाई करने से हर चूक इन्कलाब को कई दशक पीछे धकेल देती है। यही हुआ है दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में जहाँ मार्क्सवाद धर्म की तरह इस्तेमाल किया गया वहां व्यक्ति या समूह धर्म की और मुड़ेगा मार्क्सवाद की तरफ नहीं।

प्रश्न: वामपंथ के नए मुद्दे क्या होने चाहिए ?

उत्तर: बदलाव की गुंजाइश हर वक्त है। बंगाल केरल की स्तिथि झकझोरने वाले हालात हैं। हमें यह समझना होगा कि पुराने तरीके से काम नहीं चलेगा नए तरीके से सोचना होगा और रचनात्मक होना होगा जो हम तीस चालीस दशक में थे रचनात्मक आन्दोलन की जरूरत है। नया कम्युनिस्ट पैदा करना होगा और जिन सवालों से हमने मुंह फेरा है। जिसमें प्रमुख सवाल है जाति का सवाल व साम्प्रदायिकता के सवाल पर चिंतन करना बहुत जरूरी है। अगर इस देश में फासिस्ज्म आयेगा वह साम्प्रदायिकता व जातिवाद के नाम से आएगा। इन दोनों मुद्दों को हमने नहीं समझा तो हम पिछड़ जायेंगे। हमारे पिछड़े देश की जनता को और पिछड़ना होगा। हमारे आस-पास के देशों में अमेरिका ने यह स्तिथि पैदा कर दी है कि लोकतंत्र न बचे जो हमारे लिये बहुत बड़ा खतरा है।
अगर इस देश में लोकतंत्र बचाना है तो उसकी भी जिम्मेदारी वामपंथ की है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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हिन्दुवात्वादी शक्तियां हमेशा सामाजिक सुचिता, सत्य व ईमानदारी का पाठ पढ़ाने से बाज नहीं आती हैं लेकिन स्वयं बगुला भगत की तरीके से हर तरह की लूट व खसोट करने में आगे रहती हैं. अभी-अभी कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने खनन घोटाले की रिपोट दी है जिसमें 1800 करोड़ रुपये का सीधा-सीधा घोटाला मुख्यमंत्री बी.एस येदुरप्पा, जी. जनार्दन रेड्डी पुर्व मुख्यमंत्री एच.डी कुमार स्वामी, कैबिनेट नेता मंत्री करुणाकर रेड्डी, मंत्री श्री रामुलु भाजपा विधायक बी. नागेन्द्र और इन सब के साथ इनके मौसेरे भाई कांग्रेसी राजसभा सांसद अनिल लाड शामिल हैं. मुख्यमंत्री येदुरप्पा के बेटे ने अपने बाप की कुर्सी से फायदा उठाते हुए सस्ती कीमत पर खान प्राप्त कर ली जिसे कुछ समय बाद ही 10 गुना कीमत पर खनन माफिया को बेच दी.
वोट फॉर नोट के मामले अडवाणी जी सी लेकर सुषमा स्वराज तक हल्ला गुल मचाते नजर आयेंगे लेकिन कर्नाटक में 1800 करोड़ रुपये के एक घोटाले पर यह सभी लोग चुप्पी साध लेते हैं. इन्ही हिन्दुवत्व वादी संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण साहब दूरदर्शन पर रुपया लेते नजर आये थे. इन सभी बगुला भगत की मुख्य विशेषता यह है कि इनके भ्रष्टाचारों से सहमत न हो वह पाकिस्तानी आदमी है, मुस्लिम तुष्टिकरण करता है, छद्म धर्मनिरपेक्ष है जैसे थोथे आरोप लगाना शुरू कर देते हैं. हमारे जनपद में एक हिन्दुवत्व वादी नेता जी के बच्चा नहीं पैदा हो रहा था तो उसमें भी उनको मुसलमानों का षड्यंत्र नजर आ रहा था. ऐसे तत्वों ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी बदनाम किया है और राजनीति की कुर्सी के लिये यह लोग किस हद तक नीचे गिर सकते हैं उसकी कोई सीमा रेखा नहीं है.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सीमा आजाद कब होगी आजाद ?

सीमा आजाद

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन केः जहाँ

चली है रस्म केः कोई न सर उठाके चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले

नजर चुरा के चले वो जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

आज मुल्क की हालत कमोबेश ऐसी ही है, जैसा फैज अपनी इस नज्म में बयान कर रहे हैं। हमारे शासकों ने जिन नीतियों पर अमल किया है, उनसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। आज ऐसी व्यवस्था है जहाँ साम्प्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कॉरपोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी, बाहुबली व माफिया सŸाा की शोभा बढ़ा रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं, देशभक्ति का तमगा पा रहे हैं, वहीं इनका विरोध करने वाले, सर उठाकर चलने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, उनके लिए उम्रकैद है, जेल की काल कोठरी है। उŸार प्रदेश की जेल की ऐसी ही काल कोठरी में लेखक, पत्रकार व मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद अपने पति विश्वविजय के साथ कैद हैं। इनकी कैद का डेढ़ साल पूरा होने वाला है। पर ये कब आजाद होंगे, इस काल कोठरी से कब बाहर आयेंगे, कोई नहीं बता सकता।

पिछले साल 6 फरवरी 2011 के दिन सीमा आजाद को विश्वविजय के साथ इलाहाबाद में गिरफ्तार किया गया था। वे दिल्ली पुस्तक मेले से लौट रही थीं। उनके पास मार्क्सवादी व वामपंथी साहित्य था। उनकी यह गिरफ्तारी गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून के तहत की गई। पुलिस का आरोप था कि इनके माओवादियों से सम्बन्ध हैं तथा ‘राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध’ भड़काने जैसी गैरकानूनी गतिविधियों व क्रियाकलाप में लिप्त हैं। तब हमारे लिए यह स्वाभाविक सवाल है कि क्या सीमा आजाद की गतिविधियाँं व क्रियाकलाप गैरकानूनी व संविधान विरुद्ध हैं ? पुलिस की कार्रवाई कहाँ तक न्यायसंगत है या फिर मात्र बदले की भावना से की गई कार्रवाई है ?

इस सम्बन्ध में जो तथ्य सामने आये हैं, उनका उल्लेख जरूरी है। सीमा आजाद द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ की सम्पादक तथा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पी यू सी एल) उŸार प्रदेश के संगठन सचिव के बतौर नागरिक अधिकार आंदोलनों से जुड़ी समाजिक कार्यकर्ता रही हैं। सीमा आजाद के पति छात्र आंदोलन और इंकलाबी छात्र मोर्चा के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। सीमा आजाद ने जिन विषयों को अपने लेखन, पत्रकारिता, अध्ययन तथा जाँच का आधार बनाया है, वे पूर्वी उŸार प्रदेश में मानवाधिकारों पर हो रहे हमले, दलितों खासतौर से मुसहर जाति की दयनीय स्थिति, पूर्वी उŸार प्रदेश में इन्सेफलाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी से हो रही मौतों व इस सम्बन्ध में प्रदेश सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति, औद्योगिक नगरी कानपुर के कपड़ा मजदूरों की दुर्दशा, प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना गंगा एक्सप्रेस द्वारा लाखों किसान जनता का विस्थापन आदि रहे हैं।

सीमा आजाद और विश्वविजय का कार्यक्षेत्र इलाहाबाद व कौसाम्बी जिले का कछारी क्षेत्र रहा है जहाँ माफिया, राजनेता व पुलिस की मिलीभगत से अवैध तरीके से बालू खनन तथा काले धन की अच्छी.खासी कमाई की जा रही है। इस गठजोड़ द्वारा खनन कार्यों में लगे मजदूरों का शोषण व दमन यहाँ का यथार्थ है। सीमा आजाद ने न सिर्फ इस अवैध खनन का विरोध किया बल्कि यहाँ हो रहे मानवाधिकार के उलंघन पर जोरदार तरीके से आवाज उठाया। सीमा आजाद और विश्वविजय ने सेज से लेकर ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ का भी लगातार विरोध किया और वैश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोला। अपनी गिरफ्तारी से कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ के विरुद्ध एक पुस्तिका प्रकाशित किया था जिसमें अरुंधती राय, गौतम नवलखा, प्रणय प्रसून बाजपेई आदि के लेख संकलित हैं।

ये ही सीमा आजाद और उनके साथी विश्वविजय के क्रियाकलाप और उनकी गतिविधियाँ हैं जिन्हे ‘राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध’ की संज्ञा देते हुए पुलिस.प्रशासन द्वारा इन्हें नक्सली व माओवादी होने के आधार के रूप में पेश किया जा रहा है। इनके माओवादी होने के लिए पुलिस ने कुछ और तर्क दिये हैं। जैसे, पुलिस का कहना है कि ये ‘कामरेड’ तथा ‘लाल सलाम’ का इस्तेमाल करते हैं जबकि सभी कम्युनिस्ट र्पािर्टयों तथा उनके संगठनों में ‘कामरेड’ संबोधन तथा ‘लाल सलाम’ अभिवादन के रूप में आमतौर पर इस्तेमाल होता है। इसी तरह का तर्क सीमा आजाद के पास से मिले वामपंथी व क्रान्तिकारी साहित्य को लेकर भी दिया गया, पर पुलिस यह बताने में असफल रही है कि वहाँ बरामद साहित्य में कौन सा प्रतिबंधित है।

ऐसे ही आरोप पुलिस द्वारा डॉ विनायक सेन पर भी लगाये गये थे तथा इनके पक्ष में पुलिस की ओर से जो तर्क पेश किये गये, वे बहुत मिलते.जुलते हैं। देखा जा रहा है कि सरकारों द्वारा नक्सलवाद व माओवाद लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने.कुचलने का हथकण्डा बन गया है तथा जन आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध भड़काने, राजद्रोह, देशद्रोह जैसे आरोप आम होते जा रहे है। छŸाीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा लोकतांत्रिक व मानवाधिकारों को दबाने का जो प्रयोग शुरू किया गया था, उŸार प्रदेश और अन्य राज्यों की सरकारों द्वारा उसी नुस्खे को अमल में लाया जा रहा है।

सीमा आजाद की जिन गतिविधियों को गैरकानूनी कहा जा रहा है, वे कहीं से भी भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिये गये अधिकारों के दायरे से बाहर नहीं जाती हैं बल्कि इनसे सीमा आजाद की जो छवि उभरती है वह आम जनता के हितों के लिए संघर्ष करने वाली लेखक, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता की है। बेशक ये गतिविधियाँ सŸाा और समाज के माफिया सरदारों व बाहुबलियों के हितों के विरुद्ध जाती हैं। इसीलिए लोकतांत्रिक समाज, मानवाधिकार संगठन, बुद्धिजीवी, लेखक आदि मानते हैं कि सीमा आजाद पर जो आरोप गढ़े गये हैं तथा गैरकानूनी गतिविधि ;निवारकद्ध कानून के तहत जो गिरफ्तारी की गई है, वह दमन के उद्देश्य से तथा बदले की भावना से की गई कार्रवाई है।

लेकिन यह सŸाा का भ्रम है कि दमन से वह विरोध की आवाज को दबा देगी। देखा गया है कि दमन ने हमेशा प्रतिरोध का रूप लिया है। ऐसा हम सीमा आजाद के संदर्भ में भी देखते हैं। पिछले दिनों हिन्दी कवि नीलाभ को लिखे अपने पत्र में सीमा आजाद ने अपने बारे में कहा है – ‘मै और विश्वविजय दोनों ने जेल से बाहर आने का इंतजार करते हुए अच्छा.खासा अनुभव हसिल किया है। एक बात हमने साफतौर महसूस किया है कि दमन आदमी को मजबूत, अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ तथा और अधिक संघर्षशील बनाता है। इस सम्बन्ध में दुनिया की सरकारें बड़े भ्रम में जीती हैं और हमारी सरकार भी। हमने महसूस किया है कि सामाजिक परिवर्तन की हमारी इच्छा को सरकार दबा नहीं सकती बल्कि सरकार के उत्पीड़न की इस तरह की कार्रवाई कालिदास की उस कथा की तरह है जिसमें सरकार पेड़ की उस डाल को ही काट रही है जिस पर वह बैठी है।’

सीमा आजाद जिन कारणों से डेढ़ साल से कैद है, वे कहीं से भी भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिये गये अधिकारों के दायरे से बाहर नहीं जाती। फिर यह कैद और इस पर हमारी लम्बी चुप्पी क्यों ? अखिरकार यह लड़ाई लड़ेगा कौन ?

14 जुलाई के ‘,में प्रकाशित

-कौशल किशोरkaushal kishor,कौशल किशोर

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना 1925 को जर्मन नाजीवादी विचारों से प्रेरित होकर हुई थी. राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाई में इस संगठन का कोई योगदान नही था इसके विपरीत यह संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मदद करता रहा और आज़ादी क बाद इस देश क महानायक महात्मा गाँधी की हत्या भी इस संगठन के लोगों के हाथों से हुई. साध्वी प्रगया की गिरफ्तारी क बाद हिंदूव्त्व वादी आतंकवाद का पर्दाफाश हुआ और स्वामी असीमनंद क अंतर्गत धारा 164 सी आर पी सी के बयान के बाद यह स्थिति और भी सॉफ हो गयी किी इस संगठन का हाथ आतंकवादी गतिविधियों में है मुंबई आतंकी घटना का दूसरा चरण उस समय होता है जब देश की स्तितियाँ ठीक ना हो मंट्रिगन घोटाले में फँस रहे हों. कालका मैल जैसी भीषण दुर्घटना हो चुकी ही ऐसे समय देश की जनता का ध्यान हटआअनए क लिए कुछ भी संभव है. अमेरिकन साम्राज्यवाद की दूसरी पसंद संघ है और संघ चाहता यह है किी हिंदू मुसलमान की राजनीति बढ़े जिससे उसकी मुख्य मुखौटा पार्टी को लाभ हो. दिग्विजय सिंह का बयान भी यह संकेत करता है की संघ क नेताओं की तरफ भी जाँच की जानी चाहिए और भारत सरकार को चाहिए इस बात की पुख़्ता जाँच कराए.

सुमन

लो क सं घ र्ष !

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नागरिक समाज की चिंता ?

‘‘भारतीय समाज के पास अभी तक कोई राजनैतिक मानस नहीं है। जातियों, राजनैतिक परिवर्तनों से अक्षुण्ण जीवनयापन आदि का लंबा अतीत उस पर मजबूती से हावी है।’’ राममनोहर लोहिया, ‘एंड पावर्टी’, 1950।
देश में बेकाबू हो चुके भ्रष्टाचार से चिंतित नागरिक समाज, (सिविल सोसायटी) के कुछ नुमाइंदों, जिन्हें नागरिक समाज एक्टिविस्ट कहा जाता है, ने मिलकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन, (आई0ए0सी0) की स्थापना की हैं। उसमंे शामिल नामों की सूची देख कर सामान्य नागरिक को आश्चर्य हो सकता है कि नागरिक समाज की भ्रष्टाचार को लेकर गहरी चिंता परस्पर उलट हस्तियों को एक मंच पर ले लाई है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर 5 अप्रैल 2011 को इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तत्वावधान में उसके वरिष्ठ सदस्य सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने आमरण अनशन शुरू किया, जिसे अगले ही दिन से मध्यवर्ग का अच्छा-खासा समर्थन मिलना शुरू हो गया। माँग थी कि सरकार, सरकारी लोकपाल विधेयक की जगह, आई0ए0सी0 के चुनींदा नागरिक समाज एक्टिविस्टों द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक को स्वीकार करे और उसके आधार पर संसद के आगामी मानसून सत्र में कानून बनाए। तत्काल एक संयुक्त समिति बनाने, जिसमें अध्यक्ष समेत आधे सदस्य नागरिक समाज के हों, की माँग भी रखी गई।
भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उद्देश्य से तैयार किया गया लोकपाल
विधेयक पिछले चार दशक से ज्यादा समय से लंबित चला आ रहा था। उस दिशा में जल्दी और प्रभावी कार्रवाई करने के लिए आई0ए0सी0 के नुमांइदे पिछले करीब साल भर से सरकार पर दबाव बना रहे थे और जनमत जुटा रहे थे। इसी साल गांधी के शहादत दिवस 30 जनवरी को उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली का आयोजन किया था और वहाँ से जंतर-मंतर तक जुलूस निकाला था। हालाँकि आयोजक और वक्ता वही सब लोग थे, जिन्होंने 5 अप्रैल को जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे का कार्यक्रम रखा, समर्थन और मीडिया कवरेज के हिसाब से रैली प्रभावशाली नहीं रही। 7 मार्च को अन्ना हजारे जन लोकपाल विधेयक तत्काल स्वीकार करने के तकाजे के साथ प्रधानमंत्री से मिले और माँग पूरी न होने की स्थिति में आमरण अनशन करने का अपना निर्णय उन्हें बताया। जाहिर है, उनकी और उनके साथियों की उसके बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय से बातचीत चलती रही होगी।
प्रधानमंत्री से मिलने और अनशन पर जाने के बीच दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा हमें नहीं मिल पाया। प्रधानमंत्री ने इस मामले में कांग्रेस के किन नेताओं से क्या बातचीत की, इसका ब्यौरा भी हमें नहीं मिला।
हजारे ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना कैरियर आपातकाल के दौरान अपने गाँव रालेगाँव सिद्धी में शराब-विरोधी अभियान चला कर शुरू किया था। उनका ‘तरुण मंडल’ पियक्कड़ों और शराब बेचने वालों को पेड़ से बाँधने और पीटने की सजा भी देता था, जिसके बारे में हजारे कहते हैं कि माँ भी अपने बच्चों की भलाई के लिए उन्हें जबरदस्ती कड़ुवी दवाई पिलाती है। गाँव वालों को साथ लेकर उन्होंने रालेगाँव सिद्धी को आदर्श हरित गाँव के रूप में विकसित किया। उनके प्रयोग की तरफ शोधकर्ताओं और विदेशी विद्वानों का ध्यान गया और उन्हें काफी प्रशंसा मिली। हमें उनके काम के बारे में ज्यादा विस्तार से डा0 राजीव लोचन शाह ने बताया जो 1991-94 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में हमारे साथ फेलो थे। उन्होंने अपनी शोध परियोजना में अन्ना हजारे के काम को शामिल किया था और अध्येताओं की संगोष्ठी में अपना पत्र पढ़ा था। वे रालेगाँव सिद्धी में अन्ना हजारे से मिल कर आए थे। हमने उस समय हजारे के प्रयोग और उसकी विधि के बारे में थोड़ा पता करने की कोशिश की थी।
प्राप्त जानकारी के बाद हजारे और उनके कामों में हमारा आकर्षण नहीं बन पाया। हमें लगा था कि फौजी अनुशासन से एक गाँव को तो ‘ठीक’ किया जा सकता है, उस विधि से पूरे देश को ठीक करने के लिए तानाशाही की जरूरत होगी, जो आमतौर पर फौजी ही होती है। हमने थोड़ी कोशिश उनकी समाज, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, शिक्षा, स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक संबंधी धारणाओं पर नजर डालने की भी की थी। हमें लगा कि ‘सबकी सहमति’ से बनाए जाने वाले ‘सर्वमान्य नियम व कानून’ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक धारणाओं से प्रेरित नहीं हैं न ही गांधी से, जिन्होंने आधुनिकता की एक देसी समझ बनाने की केाशिश की थी। हमें उनके आदर्श गाँव का माॅडल
विचारधारात्मक रूप से, लोहिया का शब्द लें तो, ‘पीछे देखँू’ लगा था। इधर नेट, (एच0टी0टी0पी0 कम्युनलिज्म डाट ब्लागस्पाट डाट काम) पर मुकुल शर्मा का एक अच्छा लेख ‘अन्ना हजारे एंड हिज पालिटिक्स: अथारिटेरियन, हायरारकिकल एंड लेडन विद डामीनेंट आईडियालोजी’ पढ़ने को मिला, जिसमें बताया गया है कि हजारे के प्रयोग में प्राधिकार, (अथारिटी) की मान्यता मूलभूत है। शायद तभी वे प्राधिकारवादी लोकपाल चाहते हैं।
जब हमने हजारे के बारे में जाना तो वे भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन, (बी0वी0जे0ए0) की शुरुआत कर चुके थे। महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने दो बार आमरण अनशन भी किया था। इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र में प्रभावी सूचना अधिकार कानून बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सामाजिक महत्व के कामों के लिए उन्हें पद्मश्री (1990) और पद्मभूषण (1992) सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। उनमें मेगसेसे पुरस्कार और विश्व बैंक का जिट गिल मेमोरियल अवार्ड भी शामिल है। हालाँकि एक बार उनका ‘होम करते हाथ जल’ चुका है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पी0बी0 सावंत ने एक न्यायिक जाँच में हजारे को अपने ट्रस्ट में 2 लाख रुपयों की हेरा-फेरी का दोषी पाया था। हाल में उनके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका में वही आरोप दोहराया गया है। याचिकाकर्ता को शायद नहीं मालूम कि आई0ए0सी0 दो-चार लाख के भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, करोड़ों-अरबों के स्कैमों के खिलाफ आंदोलनरत है!
हजारे ने अपनी छवि अराजनैतिक और सादगी पसंद गांधीवादी कार्यकर्ता की बनाई है। वह छवि जंतर-मंतर पर उनके काम आई। आयोजकों ने यह भलीभाँति समझ लिया कि सादगी और अस्तेय जैसे गुणों की छवि वाले व्यक्ति को आगे करके ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की विश्वसनीयता बनाई जा सकती है। अब जिस तरह से ‘भ्रष्ट तत्वों’ द्वारा ‘बदनीयती’ और ‘दुष्प्रचार’ के तहत शान्ति भूषण और प्रशांत भूषण पर सीडी और संपत्ति के आरोप लगाए हैं, उसे देख कर पता चलता है कि आमरण अनशन के लिए अन्ना हजारे का चुनाव कितना जरूरी था। उन्होंने अनशन के पहले दिन से ही मंच से बताना शुरू कर दिया था कि वे एक मंदिर की कोठरी में रहते हैं और उन्होंने कोई संपत्ति-संग्रह नहीं किया है। वे गर्व से कहते हैं कि उन्होंने समाज की भलाई के कामों के लिए करोड़ों रुपयों का इंतजाम और खर्च किया है, लेकिन उनका कोई बैंक बैलेंस नहीं है। दिन-रात संपत्ति संग्रह की हविस से परिचालित समाज में हजारे जैसे लोग गरीब नहीं, महात्मा कहलाते हैं। उस दौर में और भी, जहाँ संपत्ति-संग्रह की दौड़ में निवृत्तिमार्गी माने जाने वाले महात्माओं ने प्रवृत्तिमार्गी दुनियादारों से आगे निकलने की होड़ लगा रखी है। ऐसे में लोगों की नजर से यह सच्चाई ओझल रह जाना आश्चर्यजनक नहीं है कि ऐसे ‘महात्माओं’ के बैंक, वल्र्ड बैंक से लेकर भारत की सरकारों के खजाने तक व्याप्त होते हैं। जब चाहो, तब रकम निकाल लो।

यह अकारण नहीं है कि हजारे वर्ल्ड बैंक से लेकर एन0जी0ओ0 चलाने वालों और सरकारों के भी प्यारे हैं। उनका मानना है कि सरकारों को अपनी योजनाएँ प्रभावी रूप में लागू करने के लिए एन0जी0ओ0 कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए। भारत की सरकारें आजकल यही चाहती हैं। सभी नवउदारवादी, देश को खुशहाल बनाने के सरकारों के एन0जी0ओ0 परस्त रास्ते का स्वागत और समर्थन करते हैं। सभी गांधीवादी भी करने लग जाएँ तो सरकारें और नेता खुश होंगे ही। आपको ध्यान होगा, नवउदारवाद विरोधी वयोवृद्ध गांधीवादी सिद्धराज ढड्डा को सरकार ने पद्म पुरस्कार देने की घोषणा की थी। उन्होंने वह स्वीकार नहीं किया था। वे कर ही नहीं सकते थे, क्योंकि वे नवउदारवाद विरोधी थे। किसी राजनैतिक पार्टी के सदस्य वे भी नहीं थे। देश की आजादी के तुरंत बाद वे राजस्थान सरकार में उद्योग राज्य मंत्री रहे। लेकिन जल्दी ही सर्वाेदय आंदोलन से जुड़ गए और 98 साल की उम्र पर्यंत अराजनैतिक ही रहे। कहने का आशय है कि अराजनैतिक होने से ही कोई अच्छा या बुरा नहीं हो जाता है। अलबत्ता, अराजनैतिक होना अक्सर सरकारी होना हो जाता है। यह दोनों हाथों में लड्डू होने जैसी स्थिति है। जिस राजनीति को बुरा बता कर अराजनैतिक होते हैं, उसी के साथ भी होते हैं। आगे हम देखेंगे कि प्रचलित राजनीति के परोक्ष समर्थन की यह प्रवृत्ति नई राजनीति के उद्भव में अवरोध का काम करती है।
हजारे के अनशन पर बैठने पर दिल्ली और दिल्ली के बाहर से लोग जंतर-मंतर पहुँचने लगे। जिस तरह एक के बाद एक घोटाले सामने आए और प्रधानमंत्री समेत सरकार ने लीपापोती का रवैय्या अपनाया, लोगों में उसके खिलाफ आक्रोश जमा हुआ था। मीडिया भी फुर्सत में था। जो हजारे अभी तक अपने गाँव और प्रदेश में ही ज्यादा जाने जाते थे, मीडिया की मार्फत उनकी छवि पूरे देश और विदेश तक प्रसारित हो गई। रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी रैली की असफलता से डरे आयोजकों को विश्वास हो गया कि इस बार चोट सही निशाने पर बैठी है। आयोजक और मीडिया दोनों जोशो-खरोश से मैदान में जम गए। इलैक्ट्रोनिक मीडिया के लगभग सभी चैनल लाइव कवरेज देने लगे और प्रिंट मीडिया के वे अखबार भी, जो भ्रष्टाचार के नए और पहले से कहीं विकराल स्रोत नवउदारवाद के पक्के झंडा बरदार हैं, भ्रष्टाचार विरोधी ‘आंदोलन’ की खबरों से लबालब भर गए। भ्रष्टाचार को खत्म कर डालने का जैसे बिगुल बज गया। लगा पूरा देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध कमर कस कर खड़ा होने जा रहा है। एक अनशन-धरना को ‘आंदोलन’ बनते देर नहीं लगी!
दूसरे दिन शाम तक जंतर-मंतर पर हजारों का जमावड़ा हो गया। घरों पर बैठे लोग भी टी0वी0 चैनलों की मार्फत अनशन-स्थल से जुड़ गए। देश के कुछ अन्य शहरों से भी हजारे के समर्थन की खबरें आने लगीं। गाजे-बाजे निकल आए और लोग भ्रष्टाचार विरोध के मद में मस्त दिखाई दिए। ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन’ की खबरों से चैनलों की टी0आर0पी0 आसमान छूने लगी। कुछ दिन पहले विश्व कप क्रिकेट की जंग में ‘इंडिया’ की जीत के जश्न की तरह, मीडिया ने भ्रष्टाचार की जंग जीतने का भारी जश्न मना डाला। वही लोग थे, वही मीडिया था। ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’, ‘जे0पी0 के बाद सबसे बड़ा आंदोलन’, ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ इंडिया की जंग की जीत में कुछ ही पलों का फासला’ जैसे जुमलों के हाँके के आगे सरकार पनाह माँगती नजर आई।
मीडिया की पूर्ण समर्थक भूमिका से ऐसा माहौल बना कि बहुत-से सामाजिक, नागरिक संगठनों, लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, युवाओं, स्वतंत्रता सेनानियों, प्रोपफेशनलों, फिल्मी सितारों, स्कूली बच्चों, सामान्य मध्यवर्गीय नागरिकों, यहाँ तक कि कई बाबाओं का समर्थन जंतर-मंतर पर हाजिर हो गया। आर0एस0एस0 के प्रवक्ता राम माधव समर्थन का लिखित पत्र लेकर हजारे की हाजिरी में हाजिर हो गए। जुटान देख कर जैसे मीडिया जोश में आता है, उसी तरह नेता भी उत्साहित होते हैं। राजनैतिक पार्टियों और नेताओं को लगा कि उन्होंने हजारे के अनशन का समर्थन नहीं किया तो मीडिया और राजनीति में पिछड़ जाएँगे। ओमप्रकाश चैटाला भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन को अपना समर्थन देने जंतर-मंतर पहुँच गए। वामपंथी और विकल्पवादी भी पीछे नहीं रहे। हमें एक बारगी डबका हुआ कि इस बहाव में कहीं नक्सलवादी भी समर्थन की चिठ्ठी न भेज दें! कांग्रेस ने शुरू में हजारे को आर0एस0एस0 का एजेंट बताया, लेकिन अगले ही दिन समर्थन का रुख स्पष्ट कर दिया। मुख्य धारा राजनीति के अंतर्गत मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी के भ्रष्टाचार पर बयानबाजी और
धरना-प्रदर्शन करने में लगी थी। वह चाह रही थी कि भ्रष्टाचार बड़ा चुनावी मुद्दा बन जाए। उसका अभियान के साथ सबसे पहले जुटना स्वाभाविक था। भाजपा के समर्थन से वह सरकार न बिदक जाए, जिससे बात करने अथवा टूटने के बाद अनशन शुरू किया था, आयोजकों ने नेताओं को मंच पर बैठने से यह कह कर मना कर दिया कि ‘आंदोलन’ अराजनैतिक है। इससे समर्थकों के जोश में और भी वृद्धि हुई।
सरकारी लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाले मंत्री-समूह से शरद पवार के हटने पर जैसे साक्षात भ्रष्टाचार ही हट गया! ये वही शरद पवार हैं जो विश्व कप की जीत के जश्न में बतौर आई0सी0सी0 अध्यक्ष मीडिया और मध्यवर्ग को बड़े भले इंसान लग रहे थे। उस समय कोई कहने की हिम्मत दिखाता कि क्रिकेट भारत में भ्रष्टाचार का बड़ा खेल है और शरद पवार उसके एक बड़े ‘खिलाड़ी’, यही मीडिया और भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग उसे देशद्रोही कह कर दौड़ा लेता। थोड़ा-सा और पीछे जाएँ तो देख सकते हैं कि आज भ्रष्टाचारी का कलंक ढोने वाले काॅमनवेल्थ खेलों की तैयारी समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी खेलों के दौरान मीडिया और मध्यवर्ग के हीरो थे। ‘ईमानदार’ प्रधानमंत्री और उनकी दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री के तो थे ही। हमने धरनों-प्रदर्शनों, परचों, पुस्तिकाओं, लेखों, प्रेस वार्ताओं, संगोष्ठियों की मार्फत देश को काॅमनवैल्थ खेलों में होने वाले भ्रष्टाचार की सच्चाई बताने की लाख कोशिश की, लेकिन न मीडिया साथ आया, न मध्यवर्ग।
टीवी देखते हुए या अखबार पढ़ते हुए अभियान पर कोई भी प्रश्नात्मक टिप्पणी करना उसी तरह भत्र्सना को आमंत्रित करना था जिस तरह राममंदिर आंदोलन और उसकी फलश्रुति बाबरी मस्जिद ध्वंस की आलोचना में कुछ बोलने पर परिवारी-पड़ोसी बंधुओं के कोप का भाजन होना होता था। हमें भी प्रियजनों द्वारा झिड़का गया और जंतर-मंतर जाने के लिए ठेला गया। लेकिन हम नहीं जा पाए। अलबत्ता गंभीर सोच में जरूर पड़ गए कि जिस देश में नागरिक समाज से लेकर राजनैतिक पार्टियों तक इतने भ्रष्टाचार विरोधी हैं, चाहे भावना के स्तर पर ही, वहाँ इतना भ्रष्टाचार कैसे हो जाता है? हमने यह भी सोचा कि 1990 के बाद से आज तक हुए सिलसिलेवार घोटालों के बावजूद भ्रष्टाचार को यौवन प्रदान करने वाले नवउदारवाद का उत्तरोत्तर समर्थन करते जाने वाले लोग अचानक भ्रष्टाचार के खिलाफ क्यों खड़े हो गए हैं? मानो भ्रष्टाचार एक ऊपरी बला है, जिसे एक सख्त कानून के सींखचे में बंद कर दिया जा सकता है। हमें यह भी लगा कि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए स्वयं और सर्वोच्च शक्तिसंपन्न लोकपाल लाने के लिए मतवाले हुए लोगों को क्या एक क्षण के लिए भी यह लगता है कि देश में बेहैसियत और गरीब जनता के लिए मौजूदा कानून ही इतने सख्त हैं कि एक बार फँसने पर कोई साबुत बचकर नहीं निकलता?
हम कई बार कह चुके हैं कि भारतीय जीवन के प्रत्येक आयाम पर नवउदारवाद का जो शिकंजा कसा है, उसके लिए केवल राजनैतिक अभिजन जिम्मेदार नहीं हैं। भ्रष्टाचार की जाँच, रोकथाम और दंड देने के लिए बनी संस्थाएँ और कानून अगर सत्यानाश हो गए हैं तो उसकी जिम्मेदारी नागरिक समाज पर भी उतनी ही आयद होती है। नवउदारवाद को चलाए रखने के लिए एक चलन चल निकला है- मौजूदा संस्थाओं और कानूनों को प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के सतत् उद्यम की ओर से पीठ फेर कर, नई संस्था अथवा नया कानून बनाने का ऐलान कर दिया जाता है। एनजीओ भी लगातार नए कानून बनवाने के लिए दबाव बनाते रहते हैं।
हमने यह भी सोचा कि जब सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति का एक समूह, उन्हीं सब नागरिक समाज एक्टिविस्टों के साथ मिल कर, जो संयुक्त समिति में शामिल किए गए, जन लोकपाल विधेयक के मसौदे पर बैठकें और चर्चा कर रहा है, तो फिर अचानक आमरण अनशन की नौबत क्यों आ गई? जैसा कि सोनिया गांधी ने हजारे के 19 अप्रैल के पत्र के जवाब में अपने 20 अप्रैल के पत्र में लिखा है, खुद हजारे ने उस समूह में प्रस्तावित विधेयक के केवल दो बिंदुओं पर मतभेद होने की बात स्वीकार की। तो क्या वे दो मतभेद वहीं नहीं सुलझाए जा सकते थे? या नहीं सुलझा लिए जाने चाहिए थे? राष्ट्रीय सलाहकार समिति में तो नागरिक समाज की और भी कई महत्वपूर्ण हस्तियाँ शामिल हैं, जो निश्चित ही मतभेद सुलझाने में प्रभावी भूमिका निभातीं और शायद विधेयक को और अधिक कारगर बनाया जा सकता। अगर मंशा केवल भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक प्रभावी लोकपाल संस्था बनाने की थी, तो वह काम समिति में ज्यादा अच्छा हो सकता था। तब शायद वह सब झमेला भी नहीं खड़ा होता, जिसमें हजारे अपने बयानों के चलते और संयुक्त समिति के दो सबसे प्रभावशाली सदस्य शांति भूषण व प्रशांत भूषण सीडी और संपत्ति के चलते फँस गए हैं।

आयोजकों की असली मंशा और उसमें प्रधानमंत्री कार्यालय के साझे को लेकर हम कोई टिप्पणी फिलहाल नहीं करना चाहते। अपने को अभियान की समीक्षा तक ही सीमित रखते हैं। लेकिन जल्दी ही वह घड़ी आ सकती है जब हकीकत खुलने पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उद्वेलित हुए लोग अपने को ठगा हुआ महसूस करें। भले ही हमारे कुछ साथी कहें कि देश इस कदर गरमा गया है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अखबार कितना भी पंक्चर करने की कोशिश कर लें, अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।
हमने यह भी सोचा कि भारत का नागरिक समाज, राजनैतिक निरक्षरों की भीड़ बनता जा रहा है। वह तमाशा दर तमाशा में जीता है और एक तमाशा बन कर रह गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में अन्यथा प्रतिभाशाली माने जाने वाले नागरिक समाज के ज्यादातर नुमाइंदे, राजनैतिक चेतना से लगभग शून्य नजर आते हैं। उनमें संविधान, कानून और प्रशासन के गहरे जानकार भी शामिल हैं। हम आगे देखेंगे कि उनकी राजनैतिक समझदारी, अगर कोई है, घूम-फिर कर उसी ‘बुरी’ राजनीति से अनुशासित होती है, जिसके बरक्स अपने को अराजनैतिक बता कर वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं। टी0वी0, ट्वीटर और फेसबुक पर अभियान का अंध-समर्थन करने वाले ‘राजनीति विरोधियों’ में शायद ही किसी ने समर्थन की तेजी के साथ विधेयक के दोनों मसौदों का अध्ययन करके अपना मत बनाया हो। हजारे की मीडिया प्रदत्त छवि पर ही वे रीझ गए। जैसे आयोजकों का सरकार पर दबाव था कि पहले जन लोकपाल विधेयक स्वीकार करो और उसी का कानून बनाओ, उसी तरह समर्थकों का हल्ला था कि बिना किसी किंतु-परंतु के अभियान का समर्थन करो और भ्रष्टाचारियों को मिटाओ। ऐसे में उनसे भ्रष्टाचार की जटिल समस्या पर गंभीरतापूर्वक सोचने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती।
आगे बढ़ने से पहले हम बता दें, इस अभियान के बारे में हम आशावादी नहीं हैं। अलबत्ता उसकी समीक्षा जरूर करना चाहते हैं। एक अपेक्षा भी करते हैं कि अभियान के साथ अथवा बाद, भ्रष्टाचार की जटिल समस्या पर देश में गंभीर चिंतन और चर्चा शुरू हो जाए। यह 1968 में सोचे गए लोकपाल विधेयक से भी पहले से लंबित काम है, जो भारत के नागरिक समाज को करना है। किशन पटनायक ने 1988 के अपने एक लेख ‘भ्रष्टाचार की पड़ताल’ में लिखा है, ‘‘आजादी के बाद से सबसे अधिक चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है। गरीबी, बेरोजगारी, महँगाई, सीमा सुरक्षा या क्रिकेट से भी अधिक चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है। देश का कोई भी वर्ग नहीं है जो इससे विचलित नहीं है। फिर भी हमारे बुद्धिजीवियों ने इसको एक खोज का विषय नहीं बनाया।’’ (भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि, पृ. 175, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2006) यह अफसोस की बात है कि चार दिन के अनशन के बाद, आरोप-प्रत्यारोपों को जाने दें, नागरिक समाज के नुमांइदों में जो धाराप्रवाह बहस चल रही है, किशन पटनायक के ही शब्द लें, वह ‘‘भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसके कारण तथा प्रतिकार से संबध्ति’’ नहीं है। (वही) भारत में भ्रष्टाचार, कानून तोड़ कर ही नहीं होता, कानून को गच्चा देकर भी होता है। देश के संसाधनों की लूट को सरकारें कानूनी जामा पहना देती हैं। गैट से लेकर विदेशी विश्वविद्यालय कानूनों तक कानूनी भ्रष्टाचार का सिलसिला दशकों से अक्षुण्ण चल रहा है। गजानन माधव मुक्तिबोध साठ के दशक में लिखते हैं, ‘‘बुजुर्गों ने, सत्ताधारियों ने, समाजसंचालकों ने, आर्थिक शक्ति से संपन्न वर्गों ने, समाज के प्रत्येक स्तर पर प्रकट और अप्रकट, सूक्ष्म और स्थूल, भ्रष्टाचार का विधान कर रखा है। इस भ्रष्टाचार के कई रूप हैं। कभी वह कानून के रूप में प्रकट होता है, कभी कानून की आड़ में गैर-कानूनी रूप में। कानून या नियम तोे आर्थिक शक्ति से संपन्न प्रभावशाली लोगों की सुविधा के लिए हैं।’’ (एक साहित्यिक की डायरी, पृ. 34-35, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 1989) मुक्तिबोध का जिक्र हमने साभिप्राय किया है। उन्होंने अपनी महाकाव्यात्मक कविता ‘अँधेरे में’ में शासकवर्ग के एकजुट भ्रष्टाचारी चरित्र और चेहरे का अंतर्बाह्य स्पष्ट रूप में दिखाया है। उस चरित्र और चेहरे में मुक्तिबोध के बाद, खासकर पिछले दो दशकों में, जिस तेजी से निखार आया है, उसी तेजी के साथ वह भ्रष्टाचार के खिलाफ ताल ठोंक रहा है। अपने भ्रष्टाचार विरोध की ‘सच्चाई’ पर एक शब्द भी आलोचना का नहीं सुनना चाहता। पलटवार कर आलोचकों को भ्रष्टाचारी ताकतें बताता है। उसका यह आत्मविश्वास गौरतलब है। यहाँ एक बार फिर हम किशन पटनायक को उद्धृत करना चाहेंगे। अप्रैल 2001 के अपने ‘असहाय सत्य’ लेख में वे लिखते हैं, ‘‘उदारीकरण भ्रष्टाचार की शुरुआत नहीं करता है, लेकिन जब उदारीकरण के द्वारा विकासशील समाज के सारे स्वास्थ्य-प्रदायक तंतुओं को कमजोर कर दिया जाता है तब भ्रष्टाचार न सिर्फ बढ़ता है बल्कि नियंत्रण के बाहर हो जाता है। भारत में उदारीकरण का यह चरण आ चुका है। जब अधिकांश नागरिकों के जीवन में भविष्य की अनिश्चितता आ जाती है, चंद लोगों के लिए धनवृद्धि और खर्चवृद्धि की सीमा नहीं रह जाती, वर्गों और समूहों के बीच की गैर-बराबरियाँ निरंतर बढ़ती जाती हैं, सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने की छूट मिल जाती है, उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को देश के बाहर से निर्देश लेने होते हैं, जायज तरीकों से मिलने वाली आय और नाजायज कमाई की मात्रा में आकाश-पाताल का अंतर होता है, तब भ्रष्टाचार को रोकेगा कौन?’’ (राजनीति पर एक दृष्टि, पृ. 194) जैसा उत्साह और आशा भ्रष्टाचार विरोधी दर्शा रहे हैं, बल्कि कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी ‘जनजागरण’ ने लोकतंत्र संवर्द्धन की दिशा भी दिखा दी है, उसे यथार्थ मानें तो किशन पटनायक को विभ्रम का शिकार मानना होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। ग्रामीण रोजगार, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, जंगल का अधिकार आदि कानून और कार्यक्रमों के बावजूद, न देश के संसाधनों की लूटपाट में कमी आई है, न शिक्षा के निजीकरण-बाजारीकरण की मुहिम में। बल्कि पूँजीवादी-उपभोक्तावादी व्यवस्था की तरफ बढ़ते जाने के रास्ते और लक्ष्य उत्तरोत्तर स्पष्ट होते गए हैं। साथ में यह भी कि पूँजीवादी उपनिवेशवाद के दौर में शुरू किया गया मानव आबादियों के सफाए का सिलसिला अगले सौ-एक सालों में अपनी पूर्णता हासिल कर लेगा। ‘सर्वाइवल आॅफ फिटेस्ट’ अब प्राकृतिक सिद्धांत न होकर साभ्यतिक सिद्धांत बन चुका है।
16 अप्रैल 2011 के ‘इकाॅनाॅमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ (ई0पी0डब्ल्यू0) में वी कृष्ण अनंत का अभियान के समर्थन में ‘लोकपाल बिल कैंपेनः डेमोक्रेटिक एण्ड कंस्टीट्यूशनल’ लेख छपा है। आश्चर्य है ई0पी0डब्ल्यू0 जैसी गंभीर पत्रिका में इतना सपाट लेख प्रकाशित हुआ है। सी0बी0आई0 के पूर्व निदेशक आर0के0 राघवन का लेख ‘हजारे मूवमेंट एंड दि डेल्ही ड्रामा’ 22 अप्रैल के ‘दि हिंदू’ में आया है। लेख हजारे के समर्थन में प्रवचन और उद्बोधन की शैली में लिखा गया है। यह अक्सर होता है कि अखबारों में कुछ लेख पदनामों की ‘मेरिट’ पर छपते हैं। जैसे 21 अप्रैल के ‘इंडियन एक्सप्रैस’ में शीला दीक्षित के बेटे और उसी नाते सांसद संदीप दीक्षित का भ्रष्टाचार पर लेख प्रकाशित हुआ है। भ्रष्टाचार का खेल सिद्ध हो चुके काॅमनवैल्थ खेलों के वे बीचो बीच थे फिर भी भ्रष्टाचार पर उनका प्रवचन छपा है।
सरसरी तौर पर देखने से ही लग जाता है कि राघवन साहब का लेख उनके पदनाम और ‘दि हिंदू’ की अभियान-समर्थक लाइन के चलते छपा है। लेख हमें इसलिए रोचक लगा कि एक तो उसमें नेक (गुड) और बद (बैड) की दो आत्यंतिक कोटियाँ बनाई गई हैं। आधुनिक-पूर्व युगों में भी नेकी-बदी का ऐसा कड़ा विभाजन नहीं होता था, लेकिन राघवन उत्तर-आधुनिक युग में व्यक्तियों और प्रसंगों को स्याह-सफेद खाँचों में रख कर देख रहे हैं। लेख में, जाहिर है, हजारे और अभियान के समर्थकों को अच्छा ही अच्छा बताया गया है। संयुक्त समिति के दो सदस्यों पर ‘कीचड़ उछालने’ वाले तो बद हैं ही, हजारे, संयुक्त समिति के किसी अन्य सदस्य, अभियान, विधेयक, यहाँ तक कि मीडिया को किसी भी रूप में प्रश्नांकित करने वाले भी बदी की कोटि में डाले गए हैं।
रोचकता की दूसरी बात हमें यह लगी कि भारत के ज्यादातर अफसरान के भीतर अपनी श्रेष्ठता और परिपूर्णता पर रीझा हुआ एक तानाशाह बैठा होता हैे, जो मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई की लूट से मिली सुख-सुविधाओं पर फला-फूला होता है। जैसे अफसर पूरा ठीक होता है और सबको ठीक कर देता है, उसी तरह का प्रक्षेपण राघवन ने हजारे में किया है- उनकी निगाह में वे नीतिमयता के एकमात्र स्तंभ हैं और उनका जन लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार के रावण को फूँक देने वाला अचूक बाण। राघवन को राजनैतिक दखल बिल्कुल नहीं चाहिए। हजारे के उस कथन पर कि जन लोकपाल कानून संसद ही बनाएगी और वे उसे मानेंगे, राघवन ने उन्हें आगाह किया है कि सांसदों-विधायकों का भरोसा बिल्कुल न करें। उनकी यह आशा ‘अनरियलिस्टिक’ है कि सांसद-विधायक जन लोकपाल कानून का समर्थन करेंगे। नौकरशाहों की तानाशाही से तनी गर्दन नेताओं के सामने ही झुकती है। पहले अंग्रेजों के सामने झुकती थी। राघवन सेवा में रहते हुए राजनीति और नेताओं के खिलाफ नहीं बोल पाए। वे अब हजारे के बहाने अपना राजनीति और नेता-द्वेष निकाल रहे हैं।
नागरिक समाज: सीमाएँ और अंतर्विरोध

अभियान के प्रति जो कुछ विवादी स्वर उभरे, वे ज्यादातर कमजोर हैं। हम उन पर चर्चा करेंगे, लेकिन पहले इस अभियान के चरित्र/प्रकृति और वर्ग-आधार को समझना मुनासिब होगा। दरअसल, अभियान के उद्देश्य, तरीके और उसमें शामिल मुख्य व्यक्तियों और उनके वक्तव्यों के बारे में जो सवाल उठाए गए हैं, वे इसीलिए कमजोर पड़ते हैं कि आंदोलन के चरित्र को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा गया है।
विरोध की प्रतिक्रियाएँ फुटकर और तात्कालिक किस्म की हैं। इसी के चलते कुछ नेताओं और टिप्पणीकारों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संस्थाओं की दुहाई भी प्रामाणिक नहीं बन पाई है। ‘लोकतंत्र संवर्द्धक’ और ‘लोकतंत्र विनाशक’ की अतियों के बीच संतुलन साधने के कतिपय प्रयास भी लीपा-पोती ही ज्यादा लगते हैं। जिस तरह से, जैसा कि आगे देखेंगे, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग और जीत के दावों में दम नहीं है, उसी तरह उसके विरोधी और सामंजस्यवादी स्वरों में भी कमजोरी है।
देश की राजनीति में जब राजनैतिक विपक्ष नहीं बचता है, या बहुत कमजोर होता है, तो प्रचलित व्यवस्था से पैदा होने वाली समस्याओं और संकटों को लेकर नागरिक समाज अपनी सीमा से बढ़ कर सक्रिय व आंदोलित होता है। भारत में पिछले 20 सालों से यही स्थिति चल रही है। इस बीच सभी पार्टियों की मिली-जुली सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं, लेकिन सभी ने मनमोहन सिंह के एजेंडे यानी नई आर्थिक नीतियों के नाम से शुरू किए गए नवउदारवाद को ही आगे बढ़ाया है। माक्र्सवादी पार्टियों से कुछ अलग हट कर उम्मीद थी, लेकिन उनके नेताओं ने
आधिकारिक तौर पर घोषित कर दिया कि पूँजीवाद ही विकास का रास्ता है। यह सही है कि यह स्थिति बनने के अंतर्राष्ट्रीय कारण और दबाव भी हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी नागरिक समाज में उस पर एक सर्वानुमति बनती गई है।
नागरिक समाज को चिह्नित करें तो कह सकते हैं कि किसी भी देश का नागरिक समाज मोटे तौर पर मध्यवर्गीय होता है। हालाँकि एक वर्ग होने के बावजूद, वह एकरूप उपस्थिति नहीं होता उसमें आर्थिक भिन्नता के स्तरों-निम्न, मध्य और उच्च के अलावा सांस्कृतिक
धार्मिक-भाषिक-भौगोलिक आदि भिन्नता के स्तर भी विद्यमान होते हैं। नागरिक समाज की एक पहचान यह भी होती है कि वह अपनी आजीविका के लिए शारीरिक नहीं, दिमागी काम करता है। इसी नागरिक समाज के कुछ लोग राजनैतिक पार्टियों का नेतृत्व सँभालते हैं। नागरिक समाज के जो लोग सीधे राजनीति में नहीं जाते, परंतु समाज में बतौर जागरूक नागरिक की भूमिका निभाने के अभिलाषी होते हैं, उनकी दो कोटियाँ बनती हैं। पहली कोटि किसी राजनैतिक विचारधारा और पार्टी विशेष की संगति में या उससे संबद्ध संगठन संस्थाएँ चलाने वालों की होती है। इस लिहाज से देश में माक्र्सवादी पार्टियों और भाजपा से संबद्ध सबसे ज्यादा संगठन हैं। दोनों पार्टियों के समर्थकों सदस्यों की, ज्यादातर समय सत्ता में रहने वाली कांग्रेस से साँठ-गाँठ रही है। उन्हें लगता है कि वे कांग्रेस की कीमत पर अपने लक्ष्य- कम्युनिस्ट साम्यवादी क्रांति और संघी हिंदू राष्ट्रवाद – की मजबूती बढ़ा रहे हैं। जबकि ताकत कांग्रेस की ही ज्यादा बढ़ती रही है।
दूसरी कोटि राजनीति से परहेज बरतने वाले नागरिकों की होती है। आमतौर पर उन्हें ही नागरिक समाज एक्टिविस्ट कहा जाता है। ऐसे नागरिकों के भी अपने राजनैतिक रुझान होते ही हैं। इस कोटि में विभिन्न मुद्दों और समस्याओं पर नागरिक संगठन, संस्थाएँ, मंच, ट्रस्ट, सहकारी संस्थाएँ और एन0जी0ओ0 बना कर काम करने वाले नागरिक होते हैं। नवउदारवादी नीतियों से होने वाली तबाही के शिकार आदिवासी, किसान, कारीगर, असंगठित मजदूर, दुकानदार, छोटे व्यापारी समूहों के हितों की रक्षा के लिए सक्रिय अनेक जनांदोलन भी नागरिक समाज के नुमाइंदे ही चलाते हैं। हिंसक जनांदोलनों का संचालन भी उन्हीं के हाथ में होता है। अलबत्ता उनकी अपनी राजनैतिक विचारधारा और संगठन होते हैं। कुछ नागरिक समाज एक्टिविस्ट अपने काम में नाम और इनाम पाने के बाद सरकारों और राजनैतिक पार्टियों के सलाहकार भी बन जाते हैं। उनका नाम सरकार की समितियों और पैनलों में होता है। हालाँकि अराजनैतिक होने का उनका आग्रह तब भी बना रहता है।
नागरिक समाज से मुराद अक्सर पुरुष समाज से होती है, जबकि भारत सहित दुनिया में बहुत-सी स्त्रियाँ नागरिक समाज एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय हैं। भारत का मध्यवर्ग ज्यादातर अगड़ी सवर्ण जातियों से बना है, लिहाजा, नागरिक समाज एक्टिविस्ट भी, पुरुष और स्त्री दोनों, ज्यादातर अगड़ी सवर्ण जातियों के होते हैं। भारत में जिसे नागरिक समाज कहेंगे, उसमें विशाल निम्नवर्ग और निम्नमध्यवर्ग नहीं आता। भारत में मध्य और उच्चमध्यवर्ग को मिला कर जो नागरिक समाज बनता है, वह देश का शासक वर्ग भी होता है। शासकवर्ग के रूप में एक होने के साथ, वह ऊपर बताई गई भिन्नताओं के आधार पर कई तरह की मान्यताओं, धारणाओं और रुझानों का समुच्चय होता है। हालाँकि इससे यह सच्चाई निरस्त नहीं होती कि वह शासकवर्ग के रूप में एक होता है।
निम्नमध्यवर्ग की, जिसमें पिछड़ी और दलित जातियों तथा आदिवासियों की मध्यवर्ग की तुलना में ज्यादा संख्या होती है, बलवती लालसा होती है कि वे मध्यवर्ग के दायरे में अपनी जगह बना पाएँ। आरक्षण के चलते दलित और आदिवासियों को मध्यवर्ग में सीमित प्रवेश मिलता रहा है। लेकिन वे मध्यवर्ग के चरित्र में बदलाव नहीं ला सकते, क्योंकि वे अगड़ी सवर्ण जातियों वाले मध्य और उच्चमध्यवर्ग की जीवनशैली का अनुकरण करते हैं। इस अनुकरण में सबसे पहले श्रम और दो कदम पीछे के गरीब अतीत को हेय समझा जाता है। विशेषकर दलित, अगड़ों के अनुकरण की प्रवृत्ति और अस्मितावाद के द्वंद्व में फँसे रहते हैं। इसके चलते वे नागरिक समाज द्वारा चलाए जाने वाले अभियान या आंदोलन की तरफ कभी खिंचते हैं, कभी पीछे हटते हैं। कुल मिला कर भारत का नागरिक समाज, कई तरह की भिन्नताओं के बावजूद, शासकवर्ग के रूप में एकजुट होता हैै। यह उसका वर्ग-स्वार्थ पर आधरित वर्ग-चरित्र है।

 

इस रूप में नागरिक समाज और उसके एक्टिविज्म की, जाहिर है, अपनी सीमाएँ और अंतर्विरोध होते हैं। वह जितना ही ज्यादा सीमाओं को लाँघने का उपक्रम करता है, उतना ही ज्यादा अंतर्विरोधों का शिकार होता जाता है। जब तक अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग काम होता है, परेशानी खड़ी नहीं होती न आपस में, न सरकारों को। लेकिन किसी व्यापक मुद्दे पर एक साथ आने की बात आते ही नागरिक समाज एक्टिविज्म की सीमाएँ और अंतर्विरोध जल्दी ही उभर कर सामने आ जाते हैं। अगर अंदरखाने कुछ मीजान बना कर कोई अभियान शुरू कर दिया जाता है, तो उसमें तुरंत दरारें नजर आने लगती हैं। बहस आपस में ज्यादा होने लगती है और आंदोलन भटक जाता है। सरकारों को यह स्थिति माफिक आती है। वे मुद्दों को अपने ढंग से साधने की गुंजाइश निकाल लेती हैं। उस क्रम में नागरिक समाज एक्टिविस्ट भी सध जाते हैं। क्योंकि उन्हें आर-पार की राजनैतिक लड़ाई तो लड़नी नहीं होती है।
नागरिक समाज के किसी अभियान और उससे होने वाले काम का मूल्यांकन अक्सर नागरिक समाज के परिप्रेक्ष्य मंे न किया जाकर, राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में किया जाने लगता है। उस प्रयास में नागरिक समाज के चरित्र की अंतर्भूत सीमाओं और अंतर्विरोधों पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए गए और नागरिक समाज द्वारा समर्थित भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के समर्थन और आलोचना की बहस उसके नागरिक समाजीय चरित्र को नजरअंदाज करके चल रही है। भारत का समूचा नागरिक समाज संवैधनिक मूल्यों -लोकतंत्र, स्वतंत्रता, संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समाजवाद – से बँधा नहीं है। नागरिक समाज में संवैधानिक मूल्यों को लेकर एका और ईमानदारी होती तो न नवसाम्राज्यवाद यहाँ पैर पसार पाता, न सांप्रदायिक दंगे होते। एक ही देश में एैयाशी और बदहाली के दो ध्रुवांत नहीं बनते।
नागरिक समाज में अंधराष्ट्रवाद, तानाशाही, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, जातिवाद, वंशवाद, अलगाव जैसी भावनाएँ/धारणाएँ पैठी हैं तो वे नागरिक अभियानों में उभर कर आएँगी ही। दूसरे, जैसा कि हमने ऊपर कहा, जब राजनैतिक विपक्ष अनुपस्थित होता है तो नागरिक समाज जाने-अनजाने राजनैतिक बयानबाजी करने लगता है। इस अभियान में भी यह देखा जा सकता है। केवल समर्थकों में ही नहीं, नेतृत्व में भी आप देख सकते हैं कि एक छोर पर संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखने वाले शांति भूषण, संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण आदि हैं, तो दूसरे पर सब भ्रष्टाचारियों को फाँसी देने को उतावले बाबा रामदेव, जो राजनीति को भी ठीक कर देने का दावा ठोंकते हैं।
आई0ए0सी0 के नुमांइदों में एक चेतन भगत नाम का लोकप्रिय लेखक बताया जाने वाला शख्स भी है। काफी पहले हमने ‘दैनिक भास्कर’ अखबार में उनका नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में अत्यंत सतही लेख देखा था। जाहिर है, लेख अंग्रेजी से अनुवाद करके छापा गया था। पूछने पर बताया गया कि वे बहुत चर्चित लेखक हैं। उन्होंने हजारे की राजनैतिक बयान को लेकर हुई फजीहत के बावजूद हाल में गुजरात चैंबर्स आॅफ काॅमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के मंच से नरेंद्र मोदी की उनके सामने खुली चाटुकारी करते हुए उनसे राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाने की फरियाद की। उनके मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे नेताओं का अभाव है। आई0ए0सी0 में शामिल संवैधनिक मूल्यों में निष्ठा वाले नागरिक समाज एक्टिविस्टों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका जन लोकपाल कानून लाने का अभियान सांप्रदायिक फासीवाद समेत किसी भी तरह की तानाशाही का आसान वाहक न बन जाए। भीड़तंत्र, चाहे कुछ देर के लिए सही, तानाशाही की ही एक अभिव्यक्ति होता है और लंबे समय तक बना रह सकता है।
लोकपाल में हजारे सहित ज्यादातर सदस्य और समर्थक, भ्रष्टाचारियों का नाश करने वाला एक ‘तानाशाह’ देख रहे हैं। भारत के मध्यवर्ग के मानस में कभी किसी तानाशाह के आने और सबको ठीक कर देने की बलवती इच्छा बैठी रहती है। यह सही है कि राजनैतिक विपक्ष और चेतना के अभाव में नागरिक समाज के अभियान प्रमुखता और ताकत प्राप्त करेंगे। उनका लक्ष्य भी यही बनता जा रहा है। वे वैकल्पिक राजनीति के प्रयासों के साथ जुड़ने को तैयार नहीं हैं। बल्कि विकल्पवादियों को अपने पीछे लगा कर चलना चाहते हैं। ऐसे में नवउदारवाद की तानाशाही ही चलते रहनी है, जिसका सांप्रदायिक फासीवाद से मूल विरोध नहीं है।
टीम के अन्य सक्रिय सदस्य स्वामी अग्निवेश के बारे में हम पहले एक स्तंभ में जिक्र कर चुके हैं। दूत का काम करने वाले स्वामी अग्निवेश सरकारी देशभक्त हैं। वे आड़े समय सरकारों के काम आते हैं। जब गांधी की समाधि पर कुत्ता घुमाने के विरोध में कई वरिष्ठ सर्वोदयियों ने अमरीकी राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश के साथ होने से मना कर दिया था, तो स्वामी जी ही सरकार के काम आए थे। अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों की नागरिक समाज में भरमार है। एक मंच से किरण बेदी ने अरविंद केजरीवाल को छोटा गांधी कहा। शायद उनके दिमाग में रहा हो कि ‘बड़े गांधी’ ने अंग्रेजों से स्वराज माँगा था, केजरीवाल अपने नेताओं से माँग रहे हैं, तो गांधी से कुछ छोटे ही कहलाएँगे। हालाँकि ‘अंग्रेज अच्छे थे’ कहने के एवज में उन्हें गांधी से बड़ा भी माना जा सकता है! आपको याद होगा पिछले आम चुनाव में केजरीवाल की एन0जी0ओ0 ने ‘स्वराज अभियान’ के तहत पूरी दिल्ली को विशाल होर्डिंगों से पाट दिया था। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, अडवाणी जैसे बड़े नेताओं से होर्डिंगों पर लिख कर पूछा गया था कि क्या वे वोट के बदले स्वराज देंगे? सुना हेैं, अभियान के नाम पर एन0जी0ओ0 की झोली में काफी धन बरसा था। गांधी की वृद्धावस्था में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। क्या लगातार उनका अपमान करना भी जरूरी है? ‘धर्म से लेकर राजनीति तक को गरीबों से शुरू करना चाहिए’-उसके इस अपराध की सजा और कितनी दी जानी है?
आई0ए0सी0 में बाजारवाद के दो बाबा रामदेव और रविशंकर भी शामिल हैं। दोनों की हविस का कोई अंत नहीं है। बाबा रामदेव अपने उगाहे धन को ट्रस्ट का धन बताते हैं। वे सीधे बाजारवाद की पैदाइश हैं तो उनका ट्रस्ट आदर्शवादी दौर के हजारे के ट्रस्ट से उतना बड़ा होना ही है कि वे  स्विटजरलैंड में जमीन और अमरीका में कंपनी खरीदें। कुछ महीने पहले हमने बाबा रामदेव से ‘जनसत्ता’ में पत्र लिख कर दो सवाल पूछे थे। उनके इस बयान पर कि धर्म गुरुओं को भी अपने धन का हिसाब देना चाहिए, हमने पूछा था, धर्मगुरुओं, जिन्हें धर्म का धन मिला है, के पास इतना धन क्यों होना चाहिए कि हिसाब देने की नौबत आए? उनके स्विस बैंकों में जमा देश का काला धन वापस लाने के अभियान पर हमने पूछा था, वे उद्योगपतियों, नौकरशाहों, नेताओं, दलालों, बिल्डरों आदि से जो धन लेते हैं, क्या वह सदाचार की कमाई होता है? उनका या उनके शिष्यों का जवाब अभी तक नहीं आया है।
दूसरे श्री रविशंकर महाराज भी रामदेव की तरह मूलतः धर्म के धंधे में हैं, जो भारत में कभी मंदा नहीं पड़ता। उनकी माया का भी कोई पार नहीं है। इन  ट्रस्टबाजों ने एन0जी0ओ0 बाजों को भी पीछे छोड़ दिया है। पहले के बाबाओं को धर्म का धंधा करने के लिए यूरोप और अमरीका जाना पड़ता था। वे अब भी जाते हैं, लेकिन भारत में भी उन्हें एक विशाल मध्यवर्ग मिल गया है। इस मध्यवर्ग के पास धन और धन की निरंतर भूख है, लेकिन उसे खाने की भूख ठीक से नहीं लगती और नींद भी ठीक से नहीं आती। कल्पना कीजिए रामदेव और रविशंकर के बाद आने वाले बाबाओं का क्या वैभव होगा? धर्म के ध्ंाधे को भी कई बार आँच आ जाती है, इसलिए रामदेव उसे राजनीति के ध्ंाधे से जोड़ने में लगे हैं। अगर वे कामयाब होते हैं तो योगी आदित्यनाथ जैसों से भी ज्यादा सांप्रदायिक सिद्ध हो सकते हैं।

हजारे की हकीकत
आइए, अभियान के नायक अन्ना हजारे पर थोड़ी चर्चा करते हैं। उन्होंने अपनी छवि गांधीवादी की बनाई हुई है। मीडिया में उन्हें सीधे गांधीवादी, गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा गांधीवादी विचारक लिखा जाता है। लेकिन उनके विचारों और तरीके का गांधी के विचारों और तरीके से मेल नहीं बैठता। गांधी ने कभी स्टेज पर तस्वीरें और माइक लगा कर अनशन नहीं किया। न ही कभी किसी को फाँसी पर लटका देने और उनका माँस गिद्धों और कुत्तों को खिलाने का आह्नान किया। वैसे भी मुहावरा चील-कौओं को खिलाने का चलता है। गिद्धों और कुत्तों को खिलाने में प्रतिहिंसा का ज्वार स्वतः सिद्ध हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह थी कि गांधी अन्यायकारी व्यवस्था से लड़ने के साथ उसमें अपनी हिस्सेदारी खत्म करने का आह्नान भी करते थे। उसके लिए आत्मशोध और आत्मपरिष्करण की जरूरत होती है। हमने देखा कि जिस मध्यवर्ग ने यह हल्ला मचाया कि उसका भ्रष्ट व्यवस्था और उसे चलाने वाले भ्रष्ट नेताओं से मोहभंग हो गया है, कहीं भी यह संकेत नहीं आने दिया है कि ऐसी व्यवस्था में सहभागिता से भी उसका मोहभंग हुआ है?
दरअसल, पूँजीवादी-उपभोक्तावादी व्यवस्था, जिसके गांधी हठ की हद तक विरोधी थे, उन्हें अपने में शामिल करने के कई उपाय करती है। उनमें जाने-अनजाने गांधीवादी भी सहयोग करते हैं। हमारे युग की इस परिघटना पर गौर करने की जरूरत है कि गांधी को नवउदारवादियों, जो संप्रदायवादी भी हैं, और संप्रदायवादियों, जो नवउदारवादी भी हैं, की मिली-जुली विचारधारात्मक संरचना में उड़ेलने (ट्रांसफ्रयूज करने) की लगातार कोशिश की जा रही है। ज्यादातर माक्र्सवादियों, समाजवादियों, अंबेदकरवादियों, स्त्रीवादियों, यहाँ तक गांधीवादियों से दुत्कारे गए गांधी के साथ नवउदारवादियों और संप्रदायवादियों का यह बर्ताव आसान हो जाता है। इस अभियान में भी गांधी के साथ वैसा ही सुलूक हो रहा है। लेकिन कोई समर्थक यह देखने और कहने को तैयार नहीं है।
कहने को हजारे अपने को गांधी के चरणों की धूल भी नहीं मानते, लेकिन साथ ही उनका आग्रह है कि गांधी के साथ शिवाजी भी चाहिए। अपने समय में शिवाजी अच्छे थे और आज भी उनसे सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द की प्रेरणा ली जा सकती है। लेकिन प्राचीन अथवा मध्यकाल के किसी भी पात्र अथवा प्रसंग से आधुनिक काल में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समता के मूल्य ही प्रेरणा की कसौटी हो सकते हैं। ये मूल्य हमारे संविधान में निहित हैं। हमें उनसे भी बेहतर मूल्यों की चिंता और तलाश रहनी चाहिए, लेकिन संवैधानिक मूल्यों में आस्था की जमीन से ही वह संभव है। यह कहना गलत नहीं होगा कि हजारे के पास शिवाजी, शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की मार्फत आए हैं। खबरों के अनुसार उन्होंने संदीप पांडे से बाल ठाकरे के एक संस्करण राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों को प्रताडि़त करने के लिए प्रशंसा की है। ठाकरों, मोदियों और उनकी पार्टियों का भारत के संविधान के साथ कपट का रिश्ता है। हजारे की उपमाएँ और प्रतीक चैंकाने वाले हैं: ‘भ्रष्टाचारियों को फाँसी दे देनी चाहिए’, ‘उनका माँस गिद्धों और कुत्तों को खिला देना चाहिए’, ‘अभियान का विरोध करने वाले भ्रष्ट ताकतों के समर्थक हैं’, ‘फलों से लदे पेड़ों पर ही लोग पत्थर फेंकते हैं’! इनका गांधी की बोली-भाषा से दूर का भी रिश्ता नहीं है।
यहाँ ध्यान दिया जा सकता है कि हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में गांधी के साथ शिवाजी की जगह अंबेदकर अथवा लोहिया या दोनों का संदर्भ भी ला सकते थे। दोनों ने न केवल गांधी के विचार और तरीके की गंभीर समीक्षा की है, आजाद भारत में भ्रष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था के खिलाफ अथक संघर्ष भी किया है। लेकिन हजारे और उनके सहयोगी जानते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग फिर वास्तविक यानी राजनैतिक हो जाएगी- विभ्रम का जो तिलिस्म रचा गया है वह टूट जाएगा। इसीलिए राजनीति से यह नागरिक समाज रिश्ता नहीं रखना चाहता। ऐसा करने में वह गांधी का रिश्ता राजनीति से काट कर, उन्हें अपनी तरह का ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ बना देता है। गांधी के विचार और रास्ते को गलत मान कर अस्वीकृत किया जा सकता है। आजादी के बाद से ऐसा है भी। लेकिन जो विचार और रास्ता गांधी का नहीं है, उसे उनका बताना जाने-अनजाने कपट फैलाना है। हमने पिछले आम चुनाव में पूर्वी दिल्ली क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। केजरीवाल की तरह होर्डिंग तो हम एक भी नहीं लगा पाए, लेकिन एक परचा बाँटा था, जिस पर परिचय में
‘गांधीवादी समाजवादी’ लिख दिया था। उसका हमें आज तक अफसोस और पश्चाताप है। हम जो हैं वही रह कर अपना काम करें, काम में जान होगी तो करने वाले को लोग जान ही जाएँगे। न भी जानें, काम तो बचेगा ही। लोगों को भ्रमित करने की क्या जरूरत है? नेता बखूबी वह काम कर रहे हैं।
मोदी और नीतीश की प्रशंसा में हजारे ने कहा कि उनके ग्रामीण विकास के कार्यों के लिए वे उन्हें 50 प्रतिशत अंक देते हैं। बाकी के 50 प्रतिशत अंक तब देंगे जब वे जन लोकपाल विधेयक को समर्थन देंगे। सवाल है कि यदि उन्होंने पूरे 100 अंक पहले ही बाँट दिए हैं तो बाद में इस सफाई का क्या औचित्य रह जाता है कि वे सांप्रदायिकता का विरोध करते हैं। जाहिर है, हजारे सांप्रदायिकता का निर्गुण विरोध कर रहे हैं, जिसमें गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के नरसंहार का कृत्य शामिल नहीं है। उनकी यह सफाई तो ठीक हो सकती है कि सभी धर्मों के नुमांइदे अभियान के संस्थापक, समर्थक और भागीदार हैं। धरने में आर्कबिशप और मुफ़्ती साहब की मौजूदगी का हवाला भी ठीक है। लेकिन सवाल तो खुद हजारे का है। ठीक है आप अनापेक्षित समर्थन पाकर जोश में आ गए थे। उस जोश में आपको सबसे पहले प्रशंसा के पात्र नरेंद्र मोदी ही नजर आए? मान लेते हैं आप सांप्रदायिक मोदी को पसंद नहीं करते हैं। नवउदारवादी मोदी को तो पसंद करते हैं? जब नवउदारवाद के जनक मनमोहन सिंह को पसंद करते हैं तो उनके बच्चे मोदी को भी करेंगे। हमारे जैसे लोग तब भी आपका विरोध करेंगे। लोगों को यह बताने का प्रयास करेंगे कि नवउदारवाद के समर्थन के साथ भ्रष्टाचार का विरोध एक विभ्रम है, जो आई0ए0सी0, हजारे, मीडिया और मध्यवर्ग मिल कर फैला रहे हैं। इसकी कीमत केवल और केवल गरीबों को चुकानी है, उन आदर्शवादी युवाओं और नागरिकों को चुकानी है जो वाकई सच्ची प्रेरणा से समर्थन में निकल कर आए।
दरअसल, समस्या वही है। हजारे नागरिक समाज एक्टिविस्ट हैं, जहाँ नवउदारवादी विकास और मोदी को पसंद करने वालों की कमी नहीं है। मोदी और नीतीश का या अन्य भी किसी सरकार का ग्रामीण विकास का माॅडल गांधी के ग्राम स्वराज की
अवधारणा के विपरीत है। विकास के नवउदारवादी माॅडल के तहत गाँवों को शहर बनाने की जिद में स्लम बनाया जा रहा है। यह जो नरेगा मार्का ग्रामीण विकास और पंचायतीराज मार्का ग्रामीण सशक्तिकरण चल रहा है, इसका गांधी के आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के वैकल्पिक दर्शन से रिश्ता नहीं है। रिश्ता सामाजिक न्याय से भी नहीं है। कुछ समाजवादी साथियों ने नीतीश कुमार की बिहार विधानसभा चुनाव में दोबारा जीत पर कहा कि उन्होंने सामाजिक न्याय का अगला चरण पूरा किया है। यानी उन्होंने आरक्षण को अति दलितों और अति पिछड़ों तक पहुँचाया है। सामाजिक न्याय की संकल्पना मुख्यतः लोहिया और अंबेदकर की है। दोनों ने कहीं यह नहीं कहा है कि उच्च पूँजीवाद की पींगों के साथ सामाजिक न्याय का मकसद पूरा हो सकता है। दोनों ही उसे समाजवादी व्यवस्था और समाज की दिशा में ले जाने वाली एक जरूरी और सकारात्मक पहल मानते हैं, जहाँ मंजिल हासिल करने पर आरक्षण की जरूरत नहीं रहेगी। विभ्रम में जीने और फैलाने वालों को व्यवस्था पकड़ लेती है और आगे बढ़ाती है ताकि यथार्थ सामने न आने पाए।

दरअसल, हजारे का अपनी भूमिका से ज्यादा बढ़-चढ़ कर बात करने से गांधीवादी होने का लिफाफा फटना ही था, सादगी के लिफाफे की तरह, जिसके भीतर एक दिन में करोड़ों का वारा-न्यारा करने वाले प्रोफेशनल, एन0जी0ओ0बाज और बाबा बैठे हों। इतिहास की विद्वान मृदुला मुखर्जी ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (23 अप्रैल) के अपने लेख में हजारे को स्वतंत्रता आंदोलन के हवाले से गांधीवादी कसौटी पर अच्छी तरह ‘कस’ दिया है। लेकिन उनकी कमजोरी यही है कि वे मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को उस कसौटी पर कभी नहीं कसेंगी। जबकि वे हजारे से ज्यादा गांधीवादी होने का ढोंग करते हैं। तब वे अपने को बुद्धिजीवी बना लेंगी। अगर कहीं वाकई गांधी विचार की प्रेरणा से कुछ राजनैतिक काम हो रहा हो, तो उसकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाएगा। तब वे प्रगतिशील बन जाएँगी, जो गांधी कभी नहीं हो सकते।
हजारे ने सोनिया गांधी को पत्र लिखा है कि भ्रष्ट ताकतें जन लोकपाल विधेयक के काम को पटरी से उतारना चाहती हैं, वे सुनिश्चित करें कि ऐसा न हो। वे अपने, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के आगे कुछ भी नहीं देख पा रहे हैं। यह खुली सच्चाई भी नहीं कि जिन दिग्विजय सिंह और कपिल सिबल को भ्रष्ट ताकतें बता रहे हैं, उनकी मेंटर और कोई नहीं सोनिया गांधी ही हैं। क्या सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सदाचारी हैं? काॅमनवैल्थ खेलों के भ्रष्टाचार का भाँडा जब अपने वजन से खेलों के पूर्व ही फूट गया तो मनमोहन सिंह ने शुंगलु कमेटी का गठन किया था। यह कहते हुए कि खेल हो जाने दो, फिर देखेंगे। शुंगलु कमेटी की रपट आई है तो उसमें फँसी दिल्ली की मुख्यमंत्री उसकी सिफारिशों की जाँच कराने पर तुल गई हैं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने इस मामले में अभी तक जबान नहीं खोली है। जबकि 21 अप्रैल को ‘सिविल सोसायटी डे’ पर बड़े अफसरान के सामने मनमोहन सिंह ने भाषण किया कि देश के लोग अब भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करने वाले हैं। यानी अफसरों का भ्रष्टाचार! हजारे को सोनिया का जवाब मिल गया है कि वे ईमानदारी की पक्षधर हैं, और दुष्प्रचार की राजनीति के खिलाफ। यह पत्र पाकर हजारे की खुशी का ठिकाना नहीं है। उधर युवराज अपने को ईमानदारी का ऐसा समर्पित सिपाही बता रहे हैं जो, अन्ना हजारों की तरह ऊपरी नहीं, सड़ चुकी व्यवस्था का अंदरूनी इलाज करने में जुटा है! मजेदारी देखिए, वे अन्ना हजारों की तरह हीरो बनना नहीं चाहते। घवन्यार्थ हुआ कि ‘इस देश में हम ही ईमानदार और हम ही हीरो हैं।’
हजारे को शिकायत है कि उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को भ्रष्टाचार नहीं मिटाने देना चाहने वाली ताकतों द्वारा अन्य मुद्दों के साथ उलझाया जा रहा है। यह फिर उनकी लोकतंत्र-विरोधी मनोवृत्ति को दर्शाता है। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो फिर मंच पर भारत माता से लेकर उसके सपूतों की तस्वीरें लगाने की क्या जरूरत थी? गांधी ने तो कभी तस्वीरें नहीं लगाईं। आप उनके सपनों का भारत बनाने के लिए तो अनशन पर नहीं बैठे थे। न ही आपके किए उस दिशा में कुछ हो सकता है। वह काम तो जब होगा राजनीति से ही होगा। तस्वीरें लगानी ही थीं तो उन लोगों की लगाईं गई होतीं जिन्होंने उपनिवेशवादी दौर में कायम की गई इस भ्रष्ट व्यवस्था का आजादी के बाद निरंतर विरोध किया। या जिन्होंने नवउदारवाद, जो भ्रष्टाचार की दानवी कोख सिद्ध हुआ है, का शुरू से सुचिंतित और सतत विरोध किया। क्या हजारे और उनकी टीम को एक भी नेता, विचारक या नागरिक ऐसा नहीं मिला? क्या उनकी भारतमाता ऐसी अनुर्वर है?
भारत माता की तस्वीर के वहाँ क्या मायने हैं? क्या वह धरती माता है, जिसका आँचल धूल भरा और मैला है? जो क्षत-विक्षत अपने करोड़ों बच्चों की पालना में जार-बेजार है? करोड़ों में खेलने वाले हर क्षेत्र के प्रोफेशनल, नौकरशाह, नेता, एन0जी0ओ0बाज किस भारत माता के सपूत हैं? आर0एस0एस0 की भारत माता का विरोध करने वालों से भी पूछा जाना चाहिए है कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? है भी या नहीं? अभियान के दौरान हजारे के भीतर बैठा सावरकर वाया ठाकरे बार-बार बाहर आया है। वही उनसे राज ठाकरे, नरेंद्र मोदी और उनके हमजोली नीतीश कुमार की प्रशंसा कराता है। ग्रामीण विकास एक बहाना है। गाँवों के विकास की चिंता होती तो वे उन लोगों का नाम लेते जिन्होंने किसानों-आदिवासियों को बचाने के संघर्ष में अपना जीवन खपा दिया, जिनमें से कई अब हमारे बीच नहीं हैं।
बहस की सीमा

जो बहस चल रही है उसमें कोई यह नहीं समझ रहा है कि सत्ता ने, दो दशकों में नवउदारवाद विरोधी जितनी भी सच्ची ताकत किसी न किसी रूप में जुटी थी, उसे उसी के अखाड़े में कड़ी पटखनी दे दी है। दयनीय हालत यह है कि गतिरोध के शिकार कई महत्वपूर्ण जनांदोलन और वैकल्पिक राजनीति के दावेदार हजारे की गाड़ी में सवार होकर गति पाने का भ्रम पाले हुए हैं। वे यह भी नहीं देख पा रहे हैं कि जिन भ्रष्ट और दुष्प्रचारी तत्वों से हजारे के अभियान को बचाने की कोशिश में लगे हैं, हजारे उन्हीं के बुलावे पर यूपी जा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने उन्हें महाराष्ट्र नहीं बुलाया। क्योंकि वहाँ नवउदारवादी विकास ठीक पटरी पर चल रहा है, भले ही वह पिछले दशक का सबसे भ्रष्ट राज्य रहा हो। उन्होंने हजारे को यूपी बुलाया है, ताकि नवउदारवाद की पिछड़ी गति से राज्य को मुक्ति दिलाई जा सके। यूपी में नवउदारवादी गति के पिछड़ने का कारण जानना कठिन नहीं है-जब मुलायम सिंह होते हैं तो उन्हें समाजवाद को नवउदारवादी शीशे में उतारने का और जब मायावती होती हैं तो उन्हें दलितवाद को, वाया ब्राह्मणवाद, नवउदारवाद के शीशे में उतारने का महत्वपूर्ण काम करना होता है। कांग्रेस के पास ऐसा कोई कार्यभार नहीं है। यूपी जीतना सोनिया गांध्ी का सबसे बड़ा सपना है। उसे अगर अमर सिंह पूरा करेंगे तो ईमानदारी के समर्थन और दुष्प्रचार की राजनीति के विरोध की घोषणाओं के बावजूद वे उन्हें 10 जनपथ बुलाएँगी। वे बिल्कुल यह ध्यान नहीं देंगी कि भूषणों पर कीचड़ उछालने वाले अमर सिंह से महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी कितने खफा हैं?
संयुक्त समिति में कोई भी दलित, महिला और अल्पसंख्यक नहीं होने पर आपत्ति उठाई गई है। इसमें दो बातें ध्यान दी जा सकती हैं। पहली, यह आपत्ति सरकार के प्रति उठाई जानी चाहिए, जिसके साथ विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधि भी शामिल करने की माँग हो, न कि नागरिक समाज एक्टिविस्टों के प्रति। उनका वर्ग-चरित्र हमने ऊपर बता दिया है, जिसमें दलित, महिला और अल्पसंख्यक विरोध की कमी नहीं मिलती है। दूसरी, अब जिन्हें आरक्षण अथवा विशेष अवसर के तहत व्यवस्था/ सत्ता में भागीदारी मिलती है, वह मौजूदा पूँजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था, सत्ता में भागीदारी करने के लिए है, न कि एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था कायम करने के लिए, जिसमें ये विभेद और विषमताएँ न रहें। निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग यह स्पष्ट करती है कि दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक नेतृत्व नवउदारवाद के साथ है। यह तर्क कि जो मिलता है वह तो ले लिया जाए, अभी तक के अनुभव के आधर पर, नवउदारवादी नीतियों और उन्हें चलाने वाली सरकारों को ही मजबूत करता है।
अनशन के दौरान रघुवंश प्रसाद सिंह और मनमोहन सिंह ने लोकतंत्र और संसद की प्रतिष्ठा का सवाल उठाया। उनकी बात लोगों को पसंद नहीं आई। क्योंकि उनसे पलट कर पूछा जा सकता है कि अमरीका में अमरीकियों द्वारा अमरीका के लिए बनाए गए भारत-अमरीका परमाणु करार को संसद में जिस तरह से पारित कराया गया, उसके बाद संसद की कौन-सी गरिमा या प्रतिष्ठा की बात वे कर रहे हैं? दोनों उस ध्त्कर्म में अपनी पार्टियों सहित भागीदार थे। उसी तरह कल उन जनांदोलनकारियों और विकल्पवादियों की बात भी सुनने से लोग इनकार कर सकते हैं, जो इस अभियान और उससे जुड़े नुमाइंदों का हर हालत में समर्थन कर रहे हैं। एन0ए0पी0एम0 के तत्वाव्धान में कुछ संगठनों और महत्वपूर्ण नागरिक समाज एक्टिविस्टों के शांति भूषण और प्रशांत भूषण के समर्थन में जारी बयान का गलत संदेश जा सकता है। जब नागरिक समाज के लोग बढ़-बढ़ कर नेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, कंपनियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं तो उन्हें आरोप सहने का धैर्य भी रखना चाहिए। देश की गरीब जनता भी कुछ देखती और समझती है।
जहाँ तक दुष्प्रचार का सवाल है, नेता भी हमेशा निहित स्वार्थों द्वारा किए गए दुष्प्रचार की शिकायत करते हैं। हम समझते हैं दोनों मशहूर, हैसियतमंद और काबिल अधिवक्ता अपना बचाव करने और पक्ष रखने में पूरी तरह सक्षम हैं। बयान जारी करने वाले साथियों ने कहा ही है कि प्रशांत भूषण ने कई महत्वपूर्ण मामलों में जनहित याचिकाएँ दायर की हैं और वे संकट में जनांदोलनकारी संघर्षकर्ताओं की सहायता करते हैं। लेकिन उनकी सहायता का बदला यह बयान नहीं होना चाहिए था। हम भी चाहते हैं कि शांति भूषण और प्रशांत भूषण संयुक्त समिति में रहें। जब नेताओं को आरोपों के चलते नहीं हटना पड़ता तो नागरिक समाज एक्टिविस्ट ही क्यों हटेंगे? लेकिन अगर वे दोनों संयुक्त समिति में नहीं भी रहेंगे तो कोई विशेष अंतर नहीं पड़ने वाला है। जन लोकपाल विधेयक उन्होंने ही तैयार किया है। आगे की सहायता वे बाहर से भी कर सकते हैं। मकसद तो जन लोकपाल विधेयक है, दुष्प्रचारकों से उलझना नहीं।
शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने जब संयुक्त समिति के सदस्यों के तौर पर अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया तो साथ में कहना चाहिए था कि भ्रष्टाचार की व्यवस्था में, भले ही कानून-सम्मत ढंग से, यह संपत्ति हमारे पास जमा हुई है। यह हमारी गाढ़ी कमाई नहीं है, शासक वर्ग का प्रमुख सदस्य होने के नाते हमारे हिस्से आई है। मकान और प्लाट खरीदने के लिए जो भूषण परिवार ने किया है, वह सभी प्रोफेशनल और संपत्तिवान लोग करते हैं। हम जैसे वेतनभोगी भी मकान-प्लाॅट खरीदने-बेचने में वही करते हैं। भारत के नागरिक समाज ने अपने को प्राॅपर्टी डीलरों और बिल्डरों के हाथ बेच दिया है।
बयान जारी करने वाले साथियों का मानना है कि जन लोकपाल विधेयक अभियान लोकशक्ति की प्रभावशाली अभिव्यक्ति है, जिस पर चर्चा न करके लोकशक्ति के उभार से नाखुश कुछ तबके भारत के दो सर्वोत्तम जनहित अधिवक्ताओं का ‘चरित्र हनन’ करने में लगे हैं। निश्चित ही यह नहीं होना चाहिए। लेकिन बयान जारी करने वालों ने अभी तक खुद विधेयक के उन लोकतंत्र विरोधी प्रावधानों के बारे में अपनी राय नहीं दी है, जिनकी तरफ, औरों की जाने दें, के0एन0 पनिक्कर ने ध्यान आकर्षित किया है। (देखें, ‘जन लोकपालः एन अल्टरनेटिव व्यू’, ‘दि हिंदू’, 19 अप्रैल) अपने मौजूदा रूप में जन लोकपाल विधेयक अभिजात्यवादी-वर्चस्ववादी सोच का प्रतिफल है। हम अभियान की समीक्षा कर रहे हैं, लोकपाल अथवा जन लोकपाल विधेयक की नहीं। लोकपाल के चुनाव के लिए जिन विभूतियों – भारत रत्न, नोबल, मेगसेसे पुरस्कार पाने वाले, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के दो वरिष्ठतम न्यायधीश, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, भारत के नियंत्रक और महालेखा निरीक्षक, प्रमुख चुनाव आयुक्त, लोकपाल बोर्ड के निवर्तमान सदस्य और संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष की फेहरिस्त दी गई है उनमें केवल लोकसभा अध्यक्ष की फेहरिस्त ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुन कर आते हैं।
प्रशांत भूषण का कहना है कि तथाकथित निर्वाचित प्रधानमंत्राी और गृहमंत्री कमजोर सी0वी0सी0 नियुक्त कर देते हैं। यानी निर्वाचित होना ईमानदारी और जवाबदेही की कोई गारंटी नहीं है। आज की भारत की राजनीति में यह सही प्रतीत होता है। लेकिन इससे यह कहाँ सिद्ध हो जाता है कि जो निर्वाचित नहीं हैं, वे ईमानदार होते हैं? खटका प्रशांत भूषण को भी है। वे लिखते हैं, ‘‘लोकपाल सदस्यों को, मिसकंडक्ट करने पर सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय खण्डपीठ हटा सकती है।’’ (‘जन लोकपाल बिल: एडरेसिंग कंसन्र्स’, ‘दि हिंदू’ 15 अप्रैल 2011) क्या यह ज्यादा सही नहीं होगा कि मिसकंडक्ट करने पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ही हटाया जाए। उसके लिए सत्याग्रह भी है और चुनाव भी हैं। जाहिर है, राजनीति का मैदान भी। राजनीति बुरी है, आप उसमें नहीं जाना चाहते। बिल्कुल ठीक है। आप नागरिक समाज एक्टिविस्ट हैं। लेकिन राजनीति का स्थानापन्न होना चाहते हैं। यह संभव नहीं है। बल्कि आप मौजूदा राजनीति के इंस्ट्रमेंट बनते हैं। राजनैतिक शून्य पाकर भारत का नागरिक समाज अपनी सीमा से बाहर दावेदारी जता रहा है ताकि सत्ता में ज्यादा हिस्सेदारी पा सके। सत्ता के विरोध की ठेकेदारी भी प्यारी हिस्सेदारी बन जाती है।
ये महान विभूतियाँ शासकवर्ग के मुकुट हैं। यह साथियों का अपना लोकतंत्र-विवेक है कि इन मुकुटों में जड़े ‘जन’ और ‘लोक’ जैसे नगीने उन्हें रिझा रहे हैं! लेकिन एक और समस्या है। सभी साथी मानते हैं कि अगस्त में शुरू होने वाले मानसूत्र में जन लोकपाल कानून बन भी जाए, भ्रष्टाचार के विरोध का संघर्ष लंबा चलेगा। उस दौरान अगर बाबा रामदेव या चेतन भगत जैसों के खिलाफ ‘भ्रष्ट तत्वों’ ने किसी प्रकार का ‘दुष्प्रचार’ किया तो क्या साथी उनके समर्थन में भी बयान जारी करेंगे? यह नहीं भूलना चाहिए कि हजारे और उनके सहयोगियों के अभियान के उद्देश्य और तरीके पर सवाल उठाने वालों में ऐसे लोग भी हैं, नागरिक समाज में जिनका काम और साख इस पूरी टीम से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है। अगर हजारे को सवालों से ऐतराज था तो उन्हें खुद भ्रष्टाचार से इतर विषयों पर भाषण नहीं देना चाहिए था। बिना किसी प्रोवेकेशन के उन्होंने बार-बार ऐसा किया। उनके साथियों ने भी उन्हें अभी तक नहीं रोका है।

 

आइए फिर बहस पर लौटें। वह सवाल जो सबसे पहले बहस में पूछा जाना चाहिए था अभी तक उठाया ही नहीं गया है। कारों पर लगाए जाने वाले पोस्टरों और स्टीकरों पर लिखा गया था: ‘मनमोहन सिंह वोट चाहिए तो लोकपाल विधेयक लाओ’। 7 मार्च को हजारे के प्रधानमंत्राी से मिलने की सूचना तो हमें बाद में मिली। पहले ही दिन काॅलोनी में खड़ी एक कार पर चिपका आई0ए0सी0 का पोस्टर और स्टीकर पढ़ कर हमें पता चल गया कि यह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नहीं, नवउदारवाद का रास्ता प्रशस्त करने का अभियान है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के लिए इससे सस्ता सौदा नहीं हो सकता था-जन लोकपाल कानून के बदले वोट की गारंटी। सत्ता की नजर बड़ी टेढ़ी होती है। वह अपना फायदा तो पहले देखती ही है, किसी भी लेन-देन में दूसरे पक्ष को बदनाम कर सारा श्रेय खुद लेने की स्वाभाविक नीयत से परिचालित होती है। संयुक्त समिति के सदस्यों और खुद हजारे को जो सामना करना पड़ रहा है, वह दरअसल सत्ता की नीयत का ही नतीजा है। लोकपाल कानून आना है तो पूरा श्रेय सरकार को क्यों न मिले?
पोस्टर बताता है कि आयोजकों ने सत्ता के समर्थन की अपनी नीयत छिपाई नहीं थी। भले ही अभियान के समर्थक जान नहीं पाए हों। आयोजकों को छिपाने की और समर्थकों को जानने की शायद जरूरत भी नहीं थी। माने हुए को क्या जानना? जितने भी लोग जंतर-मंतर पर थे, और देश के दूसरे हिस्सों में अभियान का समर्थन कर रहे थे, उनका बहुलांश नवउदारवादी रास्ते को आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता मानता है। उनके सामने बार-बार यह सच्चाई आती है कि वह भ्रष्टाचार का रास्ता है। लेकिन वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर भी वे चाहते हैं, भ्रष्टाचार न हो। यह नागरिक समाज भ्रष्टाचार विरोध का अभियान चला कर अपनी आत्मा के दाग देता है। वह आप अपनी पीठ ठोंकता है कि एक सीमा के बाद वह भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा होता है। वह मनमोहन सिंह को ईमानदार बता कर अपने ईमानदार होने की तस्दीक करता है। जैसे देश को भ्रष्टाचार का घूरा बना देने वाले मनमोहन सिंह ईमानदार माने जाते हैं, उसी तरह उसमें खुशी-खुशी रहने वाला नागरिक समाज अपने को ईमानदार मानता है। विभ्रम की यह स्थिति यथार्थ को अलक्षित किए रखने के बखूबी काम आती है।
ऐसे नागरिक समाज के भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा होने का अर्थ, जाहिर है, अपने ही खिलोफ उठ खड़ा होना। आजादी के संघर्ष में अनेक भारतवासियों द्वारा अपनी शिक्षा, संपत्ति, घर, यहाँ तक कि प्राण त्याग देना परीकथाएँ नहीं हैं। कोई समाज जब कड़े निर्णय लेता है तो कोई बड़ा परिवर्तन घटित होता है। नवउदारवाद का पथ प्रशस्त करने के लिए मनमोहन सिंह के ‘कड़े निर्णयों’ का साझीदार मध्यवर्ग क्या सबकी खुशहाली का पथ प्रशस्त करने के लिए कड़े निर्णय ले सकता है? उस दिशा में सोचने को तैयार हो सकता है?

राजनैतिक मानस का निर्माण

नागरिक समाज एक्टिविज्म के बरक्स राजनैतिक समूह, संगठन अथवा पार्टी का एक स्पष्ट विचारात्मक आधार, संगठन और काम करने का तरीका होता है। उसीके आधार पर उनसे अपेक्षाएँ की जाती हैं और पूरा न होने पर उनकी आलोचना और विरोध किया जाता है। सीमाएँ और अंतर्विरोध राजनैतिक पार्टियों के भी होते हैं, जिन्हें वे निरंतर सुलझाने और समायोजित करने का प्रयास करती हैं। राजनैतिक विपक्ष का निरंतर दबाव सत्तारूढ़ पार्टी को संविधान-विरोधी और जनविरोधी होने से रोकता है। विपक्ष की राजनीति एक बेहतर विचारधारा और उस आधारित व्यवस्था का दावा पेश करती रहती है। लेकिन जब किसी देश की सभी पार्टियाँ एक जैसी राजनीति करने लगती हैं तो विपक्षी पार्टियों की औपचारिक मौजूदगी के बावजूद राजनैतिक प्रतिपक्ष नहीं बचता। तब वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने की जरूरत होती है। वह जरूरत नहीं पूरी हो पा रही है, तभी नागरिक समाज एक्टिविज्म की जगह बढ़ रही है। लेकिन, जैसा कि हमने ऊपर के विवेचन में देखा, उससे काम सरने वाला नहीं है। इस टीम के बदले कोई और टीम होती तो अभियान कुछ अलग ढंग का होता। उसकी सीमाएँ और अंतर्विरोध भी इसी तरह सामने आते। कुल मिला कर इस रास्ते पर संकट का समाधान नहीं मिलना है।
व्यापक आंदोलन राजनैतिक ही हो सकता है और नागरिक समाज के प्रयास कभी राजनीति की जगह नहीं ले सकते। नागरिक समाज राजनीति को ठीक नहीं कर सकता, ठीक राजनीति जरूर कर सकता है। नागरिक समाज एक्टिविस्टों के इरादे कितने भी नेक हों, राजनैतिक नहीं होने के कारण, वे राजनीति को प्रभावित नहीं कर पाते। उल्टा राजनीति उन्हें अपने पक्ष में प्रभावित कर लेती है। उनका राजनीति को पाठ, सबक सिखाने का हासिल अंततः प्रचलित राजनीति के समर्थन में निकलता है। कई बार इसके लिए नागरिक समाज एक्टिविस्टों में आपसी होड़ भी होती है। किशन पटनायक ने इस परिघटना की पहचान कर अराजनैतिक जनांदोलनों की जगह वैकल्पिक राजनैतिक आंदोलन का सूत्र सुझाया था। इस उद्देश्य से 1995 में कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी नेताओं द्वारा समाजवादी जन परिषद (सजप) की स्थापना की गई। लेकिन अराजनैतिक जनांदोलनों का दबाव ऐसा है कि सजप का राजनैतिक चरित्र खड़ा होना उत्तरोत्तर मुश्किल होता चला गया है। अब उसकी स्थापना में शामिल रहे कई नेता, नवउदारवाद के शिकंजे को मुकम्मल राजनैतिक चुनौती देने के लक्ष्य से 1948 की सोशलिस्ट पार्टी की पुनस्र्थापना करने जा रहे हैं।
राजनैतिक मानस बनाने का काम मुख्यधारा राजनीति के हवाले है, जिसे वह अपनी ताकत मजबूत करने के लिए अंजाम देती है। उनमें जो भी विचाराधारात्मक भिन्नताएँ हों, एक बात में एका होता है कि वे हाशिए के समाज को बाहर धकेल कर रखती हैं। हालाँकि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते उन्हें दावा सभी के कल्याण और उत्थान का करना होता है। उसके लिए वे हाशिए के समाज से नेतृत्व भी चुनते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हाशिए के समाज से स्वतंत्र नेतृत्व भी उभर कर आया है। लेकिन वह शासकवर्ग के दायरे में ही काम करता है। इस सबके बावजूद राजनैतिक पार्टियों की गतिविधियों से कुछ न कुछ राजनैतिक मानस निर्माण का काम होता है। लेकिन नागरिक समाज एक्टिविज्म और उसके अभियान अथवा आंदोलन, समाज का राजनैतिक मानस ही नहीं बनने देते। वे राजनैतिक मानस निर्माण की प्रक्रिया में रुकावट बन गए हैं।
समीक्षा लंबी हो गई है। अब समाप्त करें। शुरू में उद्धृत लोहिया के कथन की बाद के तीन वाक्य हैं, ‘‘वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम के तात्कालिक अनुभव ने उसे एक नई दिशा दी है। लेकिन साथ-साथ निष्ठा का अभाव भी बड़ी तेजी से आया है। लोगों के मस्तिष्क में राजनीति एवं स्वार्थ-साधन समानार्थक बनते जा रहे हैं।’’ गांधी ने समाज सुधार आंदोलनों की परंपरा को राजनीति के साथ जोड़ा और भारतीय समाज और मनुष्य की सभी वास्तविकताओं और समस्याओं की एक राजनैतिक समझदारी वकसित करने की कोशिश की। उनका राजनैतिक चिंतन यूरोप के पूँजीवादी-उदारवादी और समाजवादी साम्यवादी राजनैतिक चिंतन के बरक्स और आगे का है। हालाँकि उनके राजनैतिक चिंतन की निर्मिती में यूरोपीय चिंतन की पूँजीवाद विरोधी धाराओं का खुला स्वीकार और समावेश है। ‘हिंद स्वराज’ की संदर्भ-ग्रंथ सूची से यह स्पष्ट पता चलता है। उन्होंने तीसरी दुनिया की स्वतंत्र राजनैतिक पहल की एक मजबूत शुरुआत की। गांधी के मुताबिक राजनीति प्रकृति और समस्त जीवधारियों के साथ परस्परता के रिश्ते में मनुष्य के भौतिक कल्याण और आत्मोन्नयन का शास्त्र है। व्यक्ति, समुदाय, समाज, राष्ट्र, विचारधारा अथवा पार्टी विशेष की स्वार्थ-सिद्धि का जरिया नहीं। स्वतंत्र राजनैतिक चिंतन का कार्यभार उठाने में भारत का बौद्धिक नागरिक समाज अशक्त साबित हुआ है। नतीजतन, स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में शुरू हुआ राजनैतिक मानस की निर्मिती का कार्यभार भी पूरा नहीं हो पाया है।
यूरोपीय राजनैतिक चिंतन और व्यवहार के अनुकरण से शुरू होने वाली आजाद भारत की राजनीति की सभी धाराओं का संगम नवउदारवाद के महासागर में होना ही था। पूँजीवाद के इस नए अवतार में राजनीति की जरूरत ही नहीं बताई जाती है। तब राजनैतिक मानस की निर्मिती का अधूरा छूटा काम कैसे पूरा होगा? वह नहीं होगा तो मनमोहन सिंह का एजेंडा ही पूरा होगा। मनमेाहन सिंह एक व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति हैं। कल को यह एजेंडा आगे बढ़ाने वाले नरेंद्र मोदी हो सकते हैं। पीछे 6 साल अटल बिहारी वाजपेयी रह ही चुके हैं। पूँजीवाद ऊँचे दाँव खेल रहा है। आप देखते हैं वह अमेरिका और यूरोप में लड़खड़ा रहा है। लेकिन यह भी तो देखिए उसने तीसरी दुनिया के नागरिक समाज में पुनर्जीवन प्राप्त कर लिया है। भारत का नागरिक समाज भ्रष्टाचार को लेकर उद्वेलित है, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? साथी यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सारा उद्वेलन, पहले से ही तय करके, मनमोहन सिंह को वोट देने के लिए है। ताकि हांगकांग जैसी भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था भारत में भी हो जाए! जब नेताओं और नागरिक समाज दोनों में सहमति बन चुकी है कि राजनीति स्वार्थ-सिद्धि का दूसरा नाम है तो भ्रष्टाचार कैसे मिट सकता है? यह वैकल्पिक राजनीति के कर्ताओं को भी सोचना है और अराजनैतिक नागरिक समाज एक्टिविस्टों को भी।

प्रेम सिंह

 

मो.09873276726

 

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