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Archive for जुलाई, 2012

चन्द्रशेखर आजाद
( जन्म दिन 23 जुलाई 1906 )


क्रांतिकारी ही नही बल्कि क्रान्त्कारियो का नायक बनने के लिए ऊँची शिक्षा — दीक्षा कि जरूरत नही है , बल्कि उसके लिए क्रान्ति के प्रति अगाध विश्वास के साथ अदम्य साहस और अभूतपूर्व त्याग बलिदान कि जरूरत है शिक्षा व ज्ञान में पहुंच रखने वाले क्रान्तिकारियो साथियो से सिद्धांत व ज्ञान को सीखते रहने की जरूरत है | इसका सबसे बड़ा सबूत महान राष्ट्र भक्त क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद है | शिक्षा ज्ञान कि कमी के वावजूद वे
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी व आर्मी के नायक बने रहे | गरीबी में जन्मे और गरीबी में पले– बढे आजाद ने अपनी निजं कि गरीबी दूर करने की जगह राष्ट्र को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का व्रत लिया | किशोरावस्था से ही इस रास्ते पर आगे बढे | अदम्य साहस और त्याग के साथ आगे बढे | आजाद का जीवन उन सभी के लिए स्मरणीय है जो आज भी राष्ट्र कि उस क्रांतिकारी आजादी का सपना सजोये है , जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने देखा था |

23 जुलाई के दिन पैदा हुए चन्द्रशेखर आजाद , इसी दिन पैदा ही लोकमान्य तिलक से 50 वर्ष छोटे थे | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी संघर्ष के सेनानायको में चन्द्रशेखर आजाद का नाम अग्रणी है | वे उत्कट देशभक्त असीम त्याग , अपरिमित शौर्य , अदभुत साहस और अनुभवी सैन्य — नेतृत्त्व की साकार प्रतिमा थे |
पण्डित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका1 गाँव में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था।अलीराजपुर जिले मध्य प्रदेश के भावरा नामक ग्राम मे रहने का भी गौरव प्राप्त हुआ | भावरा ग्राम मध्य प्रदेश के आदिवासी मूल झाबुआ जिले में है | सीताराम तिवारी गाँव की सीमा पर एक झोपड़ी में रहते थे | आजीविका के लिए एक बाग़ में रखवाली करते थे| वे अत्यंत निर्धन थे | चन्द्रशेखर उनकी पांचवी संतान थे | तीन संताने अल्पायु रही | इस पांचवी संतान का पालन — पोषण उनकी माता ने अत्यंत कष्ट से निर्धनता में किया | निर्भीकता चन्द्रशेखर के स्वाभाव में जन्मजात थी |
एक दिन वे घर से अचानक बिना किसी को बताये बनारस जा पहुचे | संस्कृत सीखने की अपनी इच्छा अपने साथियो पर प्राय: व्यक्त किया करते थे | अत: बनारस पहुचकर एक मठ में संस्कृत का अध्ययन करने लगे घर की दयनीय आर्थिक स्थिति और संस्कृत पढने की अभिलाषा ही उन्हें बनारस खीच लायी थी |
देश में सर्वत्र असहयोग आन्दोलन का वातावरण था | विदेशी कपड़ो का बहिष्कार की भारत — भर में धूम थी | 1921 में च्न्र्शेख्र 14 वर्ष के किशोर थे | इस किशोर अवस्था में वे स्वेदेशी आन्दोलन में आ गये | भावरा की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला बना दिया था | इसी वर्ष के अन्त में ब्रिटेन के युवराज दयक आफ विद्स्र भारत यात्रा पर आये | कांग्रेस ने उनके आगमन का विरोध किया सर्वत्र हड़ताल रखी गयी |
सरकार ने अपना दमन चक्र प्राम्भ किया | गांधी को छ: महीने का कारावास मिला |चन्द्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया | इसी अपराध में इस किशोर पर मुकदमा चला | सुनवाई के दौरान चन्द्रशेखर ने जो उत्तर दिया वे इतिहास की धरोहर है
| न्यायाधीश ने पूछा तुम्हारा नाम ? आजाद ,पिता का नाम
नाम ? स्वतंत्र ,तुम्हारा निवास ? जेलखाना | चन्द्रशेखर के इन निर्भीक उत्तरों से न्यायाधीश क्रुद्ध हो उठे | उन्होंने इस बालक को 15 कोड़ो की सजा सुनाई गयी | उनके साथियो को जिले के कारागृह में भेजा गया | वह सिपाही नगे
बदन पर कोड़े बरसा रहे थे और वे ” वन्देमातरम ” के नारे लगा रहे थे | अन्त में मूर्क्षित होकर गिर पड़े | काशी के इतिहास में वह एक अविस्मरनीय घटना है | सारी काशी नगरी आततायी सरकार से टक्कर लेने वाले उस किशोर को देखने व उसका प्रेम से अभिवादन करने के लिए उमड़ पड़ी | अनेको भाषण हुए आजाद को मंच पर लाया गया | छोटे से आजाद को मेज पर खड़ा किया गया उनका सारा शरीर फूलो के हारो से ढक गया | उस दिन चन्द्रशेखर तिवारी से चन्द्रशेखर आजाद हो गये | चौरी — चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया और महात्मा गांधी के अहिसंक मार्ग से उनकी आस्था डिगने लगी | इसी समय प्रख्यात शचीन्द्रनाथ सान्याल
संयुक्त प्रांत में क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | श्री सान्याल ” हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक दल तैयार किया | प्रणवेश चटर्जी इस सभा के सदस्य थे | उनका ध्यान चन्द्रशेखर आजाद की ओर गया | चन्द्रशेखर आजाद विद्यापीठ की पढ़ाई छोडकर पुन: संस्कृत पढने लगे थे | संभवत: मठ में स्वतंत्रता संघर्ष के अनुकूल वातावरण रहा होगा |, चटर्जी ने मंथननाथ गुप्त को आजाद इस सभा सदस्य बनाने का काम सौपा गया| आजाद सदस्य बनना स्वीकार करलिए | शीघ्र ही वे अपनी योगता के कारण अन्तरंग समिति के सदस्य भी बना लिए गये |
चंदशेखर आजाद ने इस संस्था में नए कार्यकर्ताओं को जोड़ा | इस संस्था काउद्देश्य न केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना था , अपितु शोषण रहित प्रजातंत्रकी स्थापना करना भी था | संगठन का विस्तार हो रहा था पर धन की कमी का संकट बढ़ता जा रहा था | संगठन के सारे खर्च थोड़े — से चंदे के भरोसे कैसे चलते | इस लिए डकैती आवश्यक लगने लगी | 1925 में दल के नेताओं की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ जाने वाले पैसेंजर ट्रेन में रक्खे सरकारी खजाने को लुटने का प्रस्ताव रखा | 9 अगस्त 1925 को योजना को मूर्त रूप देने का निश्चय हुआ | गाडी को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के समीप रोककर लुटने की योजना बनी | योजनानुसार राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी ने द्दितीय श्रेणी व चन्द्रशेखर आजाद , केशव चक्रवर्ती , मुरैलाल , मुकुंदीलाल , बनवारी लाल , रामप्रसाद बिस्मिल व मंथन नाथ गुप्त ने तृतीय श्रेणी के टिकट लिए | राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी काकोरी स्टेशन से चदे | गाडी छूटते ही उन्होंने जंजीर खीचकर गाडी रोक दी | क्रान्तिकारियो ने 20 — 25 मिनट में गाडी में रखा खजाना लूट लिया | रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खा और चन्द्रशेखर आजाद समेत कुल 10 लोगो ने इसमें भागीदारी की |
सरकार ने सुरागो के जरिये क्रान्तिकारियो को पकड़ना शुरू किया | फिर कई लोगो के मुखबिर हो जाने से सरकार का काम आसान हो गया | 25 क्रान्तिकारियो पर मुकदमा चला | इसमें चन्द्रशेखर आजाद का नाम था | पर चन्द्रशेखर आजाद काकोरी केस के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे , जो अन्त तक पकडे नही जा सके फरवरी 1931 में अंतिम सहादत से पहले कभी पुलिस उनकी छाया तक नही छू पाई | उन्होंने कोर्ट ले जाते समय पुलिस की सशस्त्र व सज्जित गाडी पर आक्रमण करने जैसी साहसी योजनाये बनाई | परन्तु दुर्भाग्य से वे सफल नही हो सके |संगठन को काकोरी काण्ड की धर — पकड से जबर्दस्त झटका लगा | आजाद काफी समय अज्ञात वास में रहे | झांसी और ओरछा रियासत के जंगलो में भटकते रहे | अब वे हरीशंकर ब्रम्हचारी थे | झांसी में उन्होंने क्रान्ति दल की एक शाखा भी स्थापित की| भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , भगवानदास माहौर , सदाशिव राव मलकापुरकर विश्वनाथ राव , शिव वर्मा , जयदेव कपूर , प्रो. नंदकिशोर निगम , विजय कुमार सिन्हा , यशपाल , कुंदन लाल , काशीराम , राजेन्द्रपाल , सुरेन्द्र पाण्डेय , भगवती चरण बोहरा , दुर्गा भाभी , शुशीला दीदी , डाक्टर गया प्रसाद हंसराज वायरलेस सुखदवराज प्रकाशवती महावीर सिंह , बटुकेश्वरदत्त विमल प्रसाद जैन आदि अनेक इस नव गठित क्रांतिकारी दल के सदस्य थे |अब इस दल का नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशंन एंड आर्मी रखा गया | दल की 7 सदस्यी केन्द्रीय समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद थे | वही इस आर्मी ( सेना ) के सेनापति थे | उन्होंने अनेक स्थानों पर अपनी सेना के केंद्र स्थापित किए | साइमन कमिशन के विरोध में पूरे प्रदर्शन के अवसर पर लाला लाजपत राय की पुलिस की मार के कारण मृत्यु हो गयी | जिसके प्रतिशोध के लिए सांडर्स की हत्या की योजना रची गयी | इस योजना का नेतृत्त्व चन्द्रशेखर के हाथो में था | सांडर्स हेड कांस्टेबल चानन सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर पुलिस थाने से निकला | निकलते ही दो क्रान्त्रिकारियो ने गोली चलाकर उसे नीचे गिरा दिया | चानन सिंह ने भागते हुए सायकिल सवारों का पीछा किया | वे दयानंद आर्ट्स कालेज हास्टल के दरवाजे से अंदर घुसे | उन्होंने चानन सिंह से पीछा न करने की प्रार्थना की | उसके न मानने पर चन्द्रशेखर ने उसे गोली से उड़ा दिया | जिस समय भगत सिंह और राजगुरु पुलिस थाने पर हमला कर रहे थे | चन्द्रशेखर भी थोड़ी दूरी पर खड़े थे | पुलिस ने छात्रावास को चारो तरफ से घेर लिया | सम्पूर्ण लाहौर में गुप्तचर फैला दिया | रेलवे स्टेशन पर पुलिस का गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था इतने सख्त बन्दोबस्त के वावजूद दूसरे दिन लाहौर शहर में स्थान — स्थान पर दीवारों पर पर्चे चिपके हुए थे | जिन पर लाल स्याही से लिखा हुआ था की ”सांडर्स मारा गया ” ” लाला जी का बदला ले लिया गया ” क्रान्ति चिरायु हो | सांडर्स — वध के लिए अंग्रेजी शासन किसी को भी नही पकड सका | भगत सिंह और राजगुरु दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकलकर कलकत्ता पहुच गये | आजाद भी लाहौर से बाहर आ गये ||
9 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय विधान सभा में बम — विस्फोट की ऐतिहासिक घटना घटित हुई | यह साहसी कार्य सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया था | बम — विस्फोट के विषय में दल में पूर्ण विचार – विमर्श हुआ था | दल का प्रत्येक व्यक्ति जानता था की दोनों पकडे जायेंगे और उन्हें फांसी होगी |
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वंय गिरफ्तारी दी | क्योंकि वे न्यायालय को क्रान्ति के प्रचार माध्यम बनाना चाहते थे | इस संदर्भ में सरकार चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने का पूर्ण प्रयत्न किया परन्तु आजाद व यशपाल तथा अन्य 7 साथी फरार ही रहे |क्रान्तिकारियो द्वारा 23 दिसम्बर 1929 को गवर्नर इरविन की विशेष गाडी के नीचे बम विस्फोट किया गया | गांधी ने ” कल्ट आफ द बम ” नामक लेख लिखकर इसका विरोध किया | जिसके उत्तर में 26 जनवरी 1930 को ” फिलासफी आफ द बम ” पर्चा बाटा गया इसके लेखक यशपाल व भगवती चरण बोहरा थे | परन्तु सारी व्यवस्था चन्द्रशेखर आजाद की थी | जीवन के आखरी दिनों में उनका मन कुछ बेचैन — सा रहने लगा था | उनके मित्र गिरफ्तार हो गये थे और जो शेष थे , वे विशवास पात्र नही रहे | उनके ऐसे ही मित्रो में एक थे वीरभद्र तिवारी जिनके विश्वासघात से 27 फरवरी 1931 का दिन भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए काला दिन बनकर आया | उसी दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यशाही से सशत्र टक्कर लेते हुए अजेय सेनानी आजाद ने अपनी प्राण आहुति दी |27 फरवरी को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आजाद की मौजूदगी की सूचना क्रांतिकारी से पुलिस मुखबिर बने वीरभद्र ने पुलिस को दी पुलिस अधीक्षक नाट बाबर ने पुलिस दल के साथ पार्क के चारो ओर से घेरा डाल दिया दोनों तरफ से जबर्दस्त गोली चली आजाद का निशाना अचूक था | इन्ही की गोली से डी. एस . पी . विशेश्वर सिंह का जबड़ा भी टूट गया | आजाद पर चारो ओर से गोली की बौछार होने लगी | तब भी लगभग 20 मिनट तक वे साहस से लड़ते रहे |
इतने सिपाही और इतना असलहा होने के वावजूद वे उन्हें पकड नही सके | अनेक गोलिया उनके शरीर में घुस चूकि थी और वे जमीन पर गिर पड़े | तब उन्होंने स्वंय एक गोली अपने सीने में दाग ल़ी | ” आजाद हमेशा कहा करते थे ” मैं जीते — जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथ नही लगूंगा | और उन्होंने अपनी यह प्रतिज्ञा पूर्ण की | शहादत के बाद शोक सभा में पुरुषोत्तम दास , कमला नेहरु मंगलदेव सिंह , शिव बिनायक मिश्र , श्रीमती प्रतिभा शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि के भाषण हुए | अमर क्रान्ति कारी शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी श्रीमती प्रतिभा ने भाषण में कहा ” खुदीराम बोस की भस्म लोगो ने तावीज में रखकर अपने बच्चो को पहना दी थी | उसी भावना से मैं आजाद की भस्म लेने आई हूँ
जनता का आदर और उत्साह देखकर सरकार ने शहीद स्थल के उस वृक्ष को काट डाला स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघवदास ने उसी जगह पुन: पेड़ लगा दिया | डा. भगवानदास माहौर लिखते है — हमारे दल में कुछ लोग प्रेमगीत लिखा और गाया करते थे | उस पर चिडकर आजाद ने कहा , इस जीवन में कहा है प्रेम — वेम ? मेरी कविता सुनो ——
दुश्मन की गोलियों का
हम सामना करंगे |
आजाद ही रहे है ,
आजाद ही रहेंगे |
और सचमुच वे जीवन भर आजाद ही रहे आजाद रहकर उन्होंने देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया .

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण प्रतिफल और उसका आर्थिक सम्पूर्ण समय में फैला हुआ एकछत्र विश्व बाजार का विघटन समझा जाना चाहिए। इसने विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के आम संकट को और भी आगे गहरा कर दिया है।
द्वितीय विश्व युद्ध स्वयं ही संकट की उपज था। दोनों पूँजीवादी गठबंधनों में प्रत्येक ने, जिसने अपने सींग युद्ध में भिड़ाए के, सोचा था कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ देंगे और विश्व प्रभुत्व हासिल कर लेंगे। संकट के उबड़ने का उन्होंने यही रास्ता निकाला। संयुक्त राज्य अमेरिका ने आशा की थी कि वह इस दौर में अपने अत्यंत भयंकर प्रतिद्वंद्वी जर्मनी और जापान को कार्य परिक्यि के किल बाहर कर देगा, विदेश व्यापार और दुनिया के कच्चे माल के श्रोतों पर कब्जा कर लोग और इस तरह विश्व प्रभुत्व स्थापित कर लेगा।
किन्तु युद्ध ने इस आशा को उचित नहीं ठहराया। यह सही है कि तीनो बड़े पूँजीवादी देशों, सं0रा0अ0, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रतियोगी के रूप में जर्मनी और जापान को कार्य परिधि से निकाल बाहर कर दिया गया। किन्तु ठीक उसी समय चीन औ अन्य योरपीय गणतंत्रों ने पूँजीवाद व्यवस्था से नाता तोड़ लिया और सोवियत संघ के साथ मिलकर पूँजीवादी शिविर के मुकाबले एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर का निर्माण कर लिया। दो परस्पर विरोधी शिविरों के अस्तित्व का आर्थिक परिणाम यह हुआ कि संसार भर में छाया हुआ एक ध्रुव विश्व बाजार विघटित हो गया और इसलिए आज हमारे सामने दो समानांतर विश्व बाजार है जो एक दूसरे से टकराता भी है।
यह भी देखना चाहिए कि संयुक्त राज्य, ब्रिटेन और फ्रांस ने स्वयं ही, निश्चय ही स्वयं न चाहते हुए भी, नया समानांतर विश्व बाजार के बनाने और मजबूत करने में योगदान किया। उन्होंने सोवियत यूनियन, चीन, और योरपीय नवादी गणतंत्रों जो मार्शल प्लान में शामिल नहीं हुए, पर आर्थिक नाकेबंदी थोपी यह सोचते हुए कि इनका इस प्रकार गला घोंट देंगे। परिणाम यद्यपि यह हुआ कि इनका गला घोंटा नहीं गया, बकि नया विश्व बाजार मजबूत हुआ।
लेकिन बुनियादी बात निश्चय ही आर्थिक नाकेबंदी नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि युद्ध के सम से ही ये देश आर्थिक तौर पर आर्थिक सहयोग और परस्पर सहायता में जुड़ गये थे। इस प्रकार के सहयोग के अनुभव के साबित किया कि एक भी पूँजीवादी देश इतने प्रभावकारी दंग से सुयोग्य तकनीकी सहायता इन जनवादी गणतंत्रों को नहीं दे सकते थे। जैसा सोवियत संघ करते हैं। यहाँ विचार बिन्दु यह नहीं है कि यह सहायता यथासंभव सस्ता और अपेक्षाकृत उन्नत तकनीकी की है। मुख्य विचार बिन्दु यह है कि इस सहयता की तह में एक दूसरे को मदद करने और सबों की आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने की सच्ची अभिलाषा है। इसी का सुफल है इन देशों में हो रही तेज औद्योगिक प्रगति। यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि औद्योगिक प्रगति की इस गति से जल्दी ही ये देश न केवल इस स्थिति में पहुँच जायेंगे कि इन्हें दूसरे देशों से आयात करने की जरूरत नहीं रह जायगी, बल्कि तब इन देशों को अपने अतिरिक्त माल की खपत के लिए बाहरी बाजार की दरकार होगी।
इसके साथ ही बड़े पूँजीवादी देशों (सं0रा0अ0, ब्रिटेन, फ्रांस) द्वारा दुनिया के श्रोतों का शोषण का दायरा ब़ेगा नहीं, बल्कि घटेगा। उनका व्यापार क्षत्र विस्तावितर नहीं होगा बल्कि सिकुड़ेगा। विश्व बाजार में बिक्री के उनके अवसर कम होंगे और उनके उद्योग उनकी क्षमता से नीचे काम करेंगे। सही में विश्व बाजार के विघटन के संदर्भ में विश्व पूँजीवाद के सामान्य संकट के गहराने का यही अर्थ है।
यह पूँजीपतियों द्वारा स्वयं ही महसूस किया जा रहा है। उनके लिए सोवियं संघ, चीन जैसे बाजारों के खाने का नुकसान सहन करना कष्ट दायक होगा। वे मार्शल प्लान, कोरिया युद्ध, उन्मत शस्थीकरण, औद्योगिक सैन्यीकरण आदि तरकों से उन नुकसानों की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह उसी प्रकार है जैसे डूबता आदमी तिनके का सहारा लेता है। इस परिस्थिति ने अर्थ शास्त्रियों के समक्ष दो प्रश्न उपस्थित कर दिये हैं :
क.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व स्तालिन द्वारा प्रतिपादित पूंजीवाद के सामान्य संकट के समय बाजार के सापेक्ष स्थाभित्व’’ का सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
ख.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि पूंजीवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद अपने समग्र रूप में पूँजीवादपहले की अपेक्षा तेजी से विकास कर रहा है’’ सन 1916 के बसंत में लेनिन द्वारा प्रतिपादित सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
मैं सोचता हूं कि ऐसा नहीं हो सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न नई परिस्थिति के मद्देनजर इन दोनो सिद्घांत (thesis) के बारे में समझा जाना चाहिए कि अब इनकी प्रमाणिकता समाप्त हो गयी है।

लेखक – जोजेफ स्तालिन
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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आजादी की ईच्छा का विस्फोट

‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूं। आप इसे हृदयपटल पर अंकित कर लीजिए और हर शवास के साथ उसका जाप कीजिए। वह मंत्र है – ‘करो या मरो’। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आंखों से अपने देश का सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा कांग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निशचय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बंधन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिंदा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।’’ (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए गए गांधीजी के भाषण का अंश)
डॉ. राममनोहर लोहिया ने 2 मार्च 1946 को भारत के वायसराय लार्ड लिनलिथगो को एक लंबा पत्र लिखा था। वह पत्र महत्वपूर्ण है और गांधीजी ने उसकी सराहना की थी। पत्र ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर और षड़यंत्रकारी चरित्र को सामने लाता है। लोहिया ने वह पत्र जेल से लिखा गया था। भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत भूमिका निभाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार कर लिया गया था। पहले लाहौर किले में और फिर आगरा में उन्हें कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानुषिक यंत्रणाएं दीं। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। इस बीच उनके पिता का निधन हुआ, लेकिन लोहिया ने छुट्टी पर जेल से बाहर आना गवारा नहीं किया।
वायसराय ने कांग्रेस नेताओं पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सषस्त्र बगावत की योजना बनाने और आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने वाली जनता पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। उस समय के तीव्र वैश्विक घटनाक्रम और बहस के बीच वायसराय यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि ब्रिटिष शासन अत्यंत न्यायप्रिय व्यवस्था है और उसका विरोध करने वाली कांग्रेस व भारतीय जनता हिंसक और निरंकुश। आजादी मिलने में केवल साल-दो साल बचा था, लेकिन वायसराय ऐसा जता रहे थे मानो भारत पर हमेशा के लिए शासन करने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार है!
पत्र में लोहिया ने वायसराय के आरोपों का खंडन करते हुए निहत्थी जनता पर ब्रिटिश हुकूमत के भीषण अत्याचारों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि आंदोलन का दमन करते वक्त देश में कई जलियांवाला बाग घटित हुए, लेकिन भारत की जनता ने दैवीय साहस का परिचय देते हुए अपनी आजादी का अहिंसक संघर्ष किया। लोहिया ने वायसराय के उस बयान को भी गलत बताया जिसमें उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में एक हजार से भी कम लोगों के मारे जाने की बात कही। लोहिया ने वायसराय को कहा कि उन्होंने असलियत में पचास हजार देशभक्तों को मारा है। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें देश में स्वतंत्र घूमने की छूट मिले तो वे इसका प्रमाण सरकार को दे सकते हैं। लोहिया ने पत्र में लिखा, ‘‘श्रीमान लिनलिथगो, मैं आपको विशवास दिलाता हूं कि यदि हमने सशस्त्र बगावत की योजना बनाई होती, लोगों से हिंसा अपनाने के लिए कहा होता तो आज गांधीजी स्वतंत्र जनता और उसकी सरकार से आपके प्राणदंड को रुकवाने के लिए कोशिश कर रहे होते।’’
लोहिया ने वायसराय को उनका बर्बर चेहरा दिखाते हुए लिखा, ‘‘आपके आदमियों ने भारतीय माताओं को नंगा कर, पेड़ों से बांध, उनके अंगों से छेड़छाड़ कर जान से मारा। आपके आदमियों ने उन्हें जबरदस्ती सड़कों पर लिटा-लिटा कर उनके साथ बलात्कार किए और जानें लीं। आप फासिस्ट प्रतिशोध की बात करते हैं जबकि आपके आदमियों ने पकड़ में न आ पाने वाले देशभक्तों की औरतों के साथ बलात्कार किए और उन्हें जान से मारा। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब आप और आपके आदमियों को इसका जवाब देना होगा।’’ कुर्बानियों की कीमत रहती है, इस आशा से भरे हुए लोहिया ने अलबत्ता व्यथित करने वाले उन क्षणों में वायसराय को आगे लिखा, ‘‘लेकिन मैं नाखुश नहीं हूं। दूसरों के लिए दुख भोगना और मनुष्य को गलत रास्ते से हटा कर सही रास्ते पर लाना तो भारत की नियति रही है। निहत्थे आम आदमी के इतिहास की शुरुआत 9 अगस्त की भारतीय क्रांति से होती है।’’
हालांकि कांग्रेस के कई बड़े नेता ‘फाासिस्ट’ शक्तियों के खिलाफ युद्ध में फंसे ‘लोकतंत्रवादी’ इंग्लैंड को परेशानी में डालने पर अंत तक दुविधाग्रस्त बने रहे। उनका जिक्र लोहिया ने अपने पत्र में किया है। लेकिन खुद लोहिया को अंग्रजों को बाहर खदेड़ने के फैसले पर कोई दुविधा नहीं थी। आधुनिकतावादियों जैसी दुविधा उनमें भी होती तो वे जनता के संघर्ष में पूरी निष्ठा और शक्ति से नहीं रम पाते। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम भविष्य के प्रति जिज्ञासु हैं। चाहे जीत आपकी हो या धुरी शक्ति की, उदासी और अंधकार चारों ओर बना रहेगा। आशा की मात्र एक ही टिमटिमाहट है। स्वतंत्र भारत इस लड़ाई को प्रजातांत्रिक समापन की ओर ले जा सकता है।’’ (देखें, ‘कलेक्टेड वक्र्स of डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 176-181)
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन का करीब तीन-चार साल का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ पेचीदा भी है। यह आंदोलन देश-व्यापी था जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूततपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। लोहिया ने ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 20 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की। (देखें, ‘कलेक्टेड वक्र्स आॅफ डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 129)
हालांकि जनता का विद्रोह पहले तीन-चार महीनों तक ही तेजी से हुआ। नेतृत्व व दूरगामी योजना के अभाव तथा अंग्रेज सरकार के दमन ने विद्रोह को दबा दिया। 8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ और 9 अगस्त की रात को कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नेताओं की गिरफ्तारी के चलते आंदोलन की सुनिश्चित कार्ययोजना नहीं बन पाई थी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व सक्रिय था लेकिन उसे भूमिगत रह कर काम करना पड़ रहा था। जेपी ने क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन और हौसला अफजायी करने तथा आंदोलन का चरित्र और तरीका स्पष्ट करने वाले दो लंबे पत्र अज्ञात स्थानों से लिखे। भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व का एक पक्ष यह भी है कि आंदोलन के दौरान जनता खुद अपनी नेता थी।
भारत छोड़ो आंदोलन की कई विशेषताएं हैं। कई चरणों और नेतृत्व से गुजरे भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में चले जनता के अहिंसक आंदोलन का मिलन भारत छोड़ो आंदोलन में होता है। दोनों की समानता और फर्क के बिंदुओं को लेकर 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के साथ भी भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्र जोड़े जा सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन हिंसक था या अहिंसक, इस सवाल को लेकर काफी बहस हुई। गांधी, जिन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और जिन्हें उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया, ने जनता से अहिंसक आंदोलन का आह्वान किया था।
जेपी ने गुप्त स्थानों ‘आजादी के सैनिकों के नाम’ दो पत्र क्रम्हा दिसंबर 1942 और सितंबर 1943 में लिखे। अपने दोनों पत्रों में, विशेषकर पहले में, उन्होंने हिंसा-अहिंसा के सवाल को विस्तार से उठाया। हिंसा-अहिंसा के मसले पर गांधी और कांग्रेस का मत अलग-अलग है, यह उन्होंने अपने पत्र में कहा। उन्होंने अंग्रेज सरकार को लताड़ लगाई कि उसे यह बताने का हक नहीं है कि भारत की जनता अपनी आजादी की लड़ाई का क्या तरीका अपनाती है। उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के मूल में हत्या नहीं करने और चोट नहीं पहुंचाने का संकल्प है।
उन्होंने लिखा, ‘‘अगर हिंदुस्तान में हत्याएं हुईं – और बेशक हुईं – तो उनमें से 99 फीसदी ब्रिटिश फासिस्ट गुडों द्वारा और केवल एक फीसदी क्रोधित और क्षुब्ध जनता के द्वारा। हर अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजी राज के लिए जिच पैदा करना, उसे पंगु बना कर उखाड़ फेंकना ही उस प्रोग्राम का मूल मंत्र है और ‘अहिंसा के दायरे में सब कुछ कर सकते हो’ यही है हमारा ध्रुवतारा। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि जिस प्रोग्राम पर 1942 के अगस्त से अब तक कांग्रेस संस्थाओं ने अमल किया है उसका बौद्धिक आधार अहिंसा है – उस अर्थ में अहिंसा, जैसा उसके अधिकारी पुरुषों ने इस अर्से में बताया है।’’ (‘नया संघर्ष’, अगस्त क्रांति विशेषांक, अगस्त-सितंबर 1991, पृ. 31)
भारत छोड़ो आंदोलन में अहिंसा-हिंसा के सवाल पर जनता से लेकर नेताओं तक जो विमर्श उस दौरान हुआ, उसका विष्लेषण होना चाहिए। हिंसा के पर्याय और उसकी पराकाष्ठा पर समाप्त होने वाले दूसरे विश्वयुद्ध के बीच एक अहिंसक आंदोलन का संभव होना निश्चित ही गंभीर विष्लेषण की मांग करता है। यह विष्लेषण इसलिए जरूरी है कि भारत का अधिकाँश बौद्धिक 1857 और 1942 की हिंसा का केवल भारतीय पक्ष देखता है और उसकी निंदा करने में कभी नहीं चूकता। केवल हिंसा के बल पर तीन-चैथाई दुनिया को गुलाम बनाने वाले उपनिवेशवादियों को सभ्य और प्रगतिशील मानता है।
भारत छोड़ो आंदोलन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ। लिहाजा, उसका एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी था। आंदोलन के अन्तरराष्ट्रीय पहलू का इतना दबदबा था कि विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के औचित्य और भारत की आजादी को विश्वयुद्ध में हुए अंग्रेजों के नुकसान का नतीजा बताने के तर्क भारत में आज तक चलते हैं। अंतरराष्ट्रीयतावादियों के लिए आजदी के लिए स्थानीय भारतीय जनता का संघर्ष ज्यादा मायने नहीं रखता। आज जो भारतीय जनता की खस्ता हालत है, उसमें आजादी के इस तरह के मूल्यांकनों का बड़ा हाथ है। हालांकि इसकी जड़ें और गहरी जाती हैं जिनके विश्लेषण का यहां स्थान नहीं है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आजाद हिंद फौज बना कर अंग्रेजों को बाहर करने के लिए किया गया संघर्षश्भी भारत छोड़ो आंदोलन के पेटे में आता है। अंग्रेजों और स्थानीय विभाजक शक्तियों द्वारा देश के विभाजन की बिसात बिछाई जाने का काम भी इसी दौरान पूरा हुआ। जेपी ने इन सब पहलुओं पर अपने पत्रों में रोशनी डाली है।
भारत छोड़ो आंदोलन देश की आजादी के लिए चले समग्र आंदोलन, जैसा भी भला-बुरा वह रहा हो, का निर्णायक निचोड़ था। विभिन्न स्रोतों से आजादी की जो इच्छा और उसे हासिल करने की जो ताकत भारत में बनी थी, उसका अंतिम प्रदर्शन भारत छोड़ो आंदोलन में हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन ने यह निर्णय किया कि आजादी की इच्छा में भले ही नेताओं का भी साझा रहा हो, उसे हासिल करने की ताकत निर्णायक रूप से जनता की थी। हालांकि अंग्रेजी षासन को नियामत मानने वाले और अपना स्वार्थ साधने वाले तत्व भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी पूरी तरह सक्रिय थे। वे कौन थे, इसकी जानकारी जेपी के पत्रों से मिलती है।
यह ध्यान देने की बात है कि गांधीजी ने आन्दनोलन को समावेशी बनाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए अपने भाषण में समाज के सभी तबकों को संबोधित किया था – जनता, पत्रकार, नरेश, सरकारी अमला, सैनिक, विद्यार्थी। उन्होंने अंग्रेजों, यूरोपीय देशों और मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व को भी अपने उस भाषण में संबोधित किया था। सभी तबकों और समूहों से देश की आजादी के लिए ‘करो या मरो’ के व्यापक आह्वान का आधार उनका पिछले 25 सालों के संघर्ष का अनुभव था।
किसी समाज एवं सभ्यता की बड़ी घटना का प्रभाव साहित्य रचना पर पड़ता है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारत की एक बड़ी घटना थी। अंग्रेजों का डर कह लीजिए या भक्ति, 1857 का संघर्ष लंबे समय तक साहित्यकारों की कल्पना से बाहर बना रहा। जबकि भारत छोड़ो आंदोलन ने रचनात्मक कल्पना (क्रियेटिव इमेजिनेशन) को तत्काल और बड़े पैमाने पर आकर्षित किया। विभाजन साहित्य (पार्टीशन लिटरेचर) के बाद भारतीय साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण घटना के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन का चित्रण रहा है। इसका कारण लगता है कि गांधी के राजनैतिक कर्म और विचारों ने पूंजीवाद के आकर्षण को भारतीय भद्रलोक के मानस से कुछ हद तक काटा था; और जनता के संघर्ष की बदौलत आजादी लगभग आ चुकी थी।
माक्र्सवादी लेखकों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन को विषय बना कर उपन्यास लिखे। हिंदी में यशपाल, जो अपने साहित्य को माक्र्सवादी विचारधारा के प्रचार का माध्यम मानते थे, ने आंदोलन के दौरान ही दो उपन्यास – ‘देशद्रोही’ और ‘गीता पार्टी कामरेड’ – लिखे। यह ध्यान देने की बात है कि भारत छोड़ो आंदोलन अपने ढंग के विशिष्ट राजनीतिक उपन्यासकार यशपाल का देर तक पीछा करता है। यशपाल सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम महाकाय उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (1979) में एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से चित्रण किया।
सोवियत रूस के दूसरे विश्वयुद्ध में शामिल होने पर भारत के माक्र्सवादी नेतृत्व ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध और अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया। वह कांग्रेस समाजवादियों और माक्र्सवादियों के बीच कटु टकराहट का कारण तो बना ही, उस निर्णय के चलते माक्र्सवादी कार्यकर्ता देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषा व कसौटी को लेकर भ्रमित हुए। यशपाल ने अपने तीनों उपन्यासों में माक्र्सवादी कथानायकों को देशभक्त सिद्ध किया है। सतीनाथ भादुड़ी का ‘जागरी’, बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का ‘मृत्युंजय’, समरेश बसु का ‘जुग जुग जियो’ (चार खंड) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यासों के अलावा भारतीय भाषाओं में, भारतीय अंग्रेजी उपन्यास सहित, कई उपन्यास भारत छोड़ो आंदोलन की घटना पर लिखे गए या उनमें उस घटना का जिक्र आया है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ का समय करीब आजादी के एक साल पहले और एक साल बाद का है। उनके इस कालजयी उपन्यास पर भारत छोड़ो आंदोलन की गहरी छाया व्याप्त है। यह परिघटना दर्शाती है कि भारत छोड़ो आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ हमारी जातीय स्मृति का हिस्सा है।
भारत छोड़ो आंदोलन का जो भी घटनाक्रम, प्रभाव और विवाद रहे हों, मूल बात थी भारत की जनता की लंबे समय से पल रही आजादी की इच्छा – ूपसस जव तिमामकवु – का विस्फोट। भारत छोड़ो आंदोलन के दबाव में भारत के आधुनिकतावादी मध्यवर्ग से लेकर सामंती नरेशों तक को यह लग गया था कि अंग्रेजों को अब भारत छोड़ना होगा। अतः अपने वर्ग-स्वार्थ को बचाने और मजबूत करने की फिक्र उन्हें लगी। प्रशासन का लौह-शिकंजा और उसे चलाने वाली भाषा तो अंग्रेजों की बनी ही रही, विकास का माॅडल भी वही रहा। भारत का ‘लोकतांत्रिक, समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष’ संविधान भी पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ की छाया से पूरी तरह नहीं बच पाया। अंग्रेजों के वैभव और रौब-दाब की विरासत, जिससे भारत की जनता के दिलों में भय बैठाया जाता था, भारत के शासक वर्ग ने अपनाए रखी। वह उसे उत्तरोत्तर मजबूत भी करता चला गया। गरीबी, मंहगाई, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, कुपोषण, विस्थापन और आत्महत्याओं का मलबा बने हिंदुस्तान में शासक वर्ग का वैभव अश्लील ही कहा जा सकता है। सेवाग्राम और साबरमती आश्रम के छोटे और कच्चे कक्षों में बैठ कर गांधी को दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई। अपना चिंतन/लेखन/आंदोलन करने में भी नहीं। गांधी का आदर्श यदि सही नहीं था तो शासक-वर्ग सादगी का कोई और आदर्श सामने रख सकता था। बशर्ते वैसी इच्छा होती।

वायसराय के आदमी

लोहिया ने आजाद भारत के शासक-वर्ग और शासनतंत्र की सतत और विस्तृत आलोचना की है। उन्होंने उसे अंग्रेजी राज का विस्तार बताया है। लोहिया को लगता रहा होगा कि उनकी आलोचना से शासक-वर्ग का चरित्र बदलेगा; तद्नुरूप शासनतंत्र में परिवर्तन आएगा और भारत की अवरुद्ध क्रांति आगे बढ़ेगी। हालांकि संसद और उसके बाहर जनता के पक्ष में उनका संघर्ष शासक-वर्ग की प्रतिष्ठा को नहीं हिला पाया। आज जब हम अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं तो सोचें – किसलिए? क्या हम जनता जनता का पक्ष मजबूत करना चाहते हैं? या स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा प्रतीकों, प्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर उनके सारतत्व को खत्म कर देना चाहते हैं?
नवउदारवाद के विराध की किसी भी प्रेरणा को नष्ट करने की प्रवृत्ति भारत में जोर-शोर से चल रही है। 1857 के डेढ़ सौवें साल पर कांग्रेस ने दिल्ली से मेरठ और मेरठ से दिल्ली की यात्रा का आयोजन किया था। धूमधाम से किए गए उस आयोजन में कई नवउदारवाद विरोधी बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने शिरकत की। देश की संवैधानिक संप्रभुता समेत उसके समस्त संसाधनों और श्रमशक्ति को नवसाम्राज्यवादी ताकतों का निवाला बना देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लालकिले पर मेरठ से लौटे क्रांति यात्रियों का लालकिले पर स्वागत किया था। यह कटूक्ति है, लेकिन इससे कम कुछ नहीं कहा जा सकता कि 1857 के शहीदों का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता था।
डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर दो वर्षों तक सरकार ने पैसा भी खूब बांटा। पैसा देखते ही बुद्धिजीवियों में भी जोश आ जाता है। जिन्होंने 1857 पर कभी एक पंक्ति न पढ़ी थी, लिखी थी, ऐसे बहुत-से विद्वान सभा-सेमिनारों में सक्रिय हो गए। माक्र्सवादियों ने इस बार कुछ ज्यादा जोर-शोर से 1857 का जश्न मनाया। लेकिन साथ ही उनके नेतृत्व ने यह भी कह दिया कि पूंजीवाद के अलावा विकास का कोई रास्ता नहीं है। यानी मान्यता वही पुरानी रही – अपनी आजादी के लिए लड़ने वाले पिछड़ी/सामंती शक्तियां थे और उन्हें गुलाम बनाने वाले अंग्रेज आगे बढ़ी हुई। ऐसे में पिछड़ी और सामंती शाक्तियों का हारना तय था। आज तक भारत का माकर्सवादी और आधुनिकतावादी दिमाग, उत्सव चाहे जितना मना ले, आजादी की इच्छा में अपने प्राणों पर खेल जाने वालों की हिमाकत को माफ नहीं करता है। उनके हिसाब से यह देश अंधकूप था और अंग्रेज न आते तो अंधकूप ही रह जाता। यह केवल नब्बे के दशक का फैसला नहीं है कि भारत की राजनीति के सारे रास्ते कारपोरेट पूंजीवाद की ओर जाते हैं।
लोहिया ने भारत छोड़ो आंदोलन की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर लिखा, ‘‘नौ अगस्त का दिन जनता की महान घटना है और हमेशा बनी रहेगी। पंद्रह अगस्त राज्य की महान घटना थी। लेकिन अभी तक हम 15 अगस्त को धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि उस दिन ब्रिटिश वायसराय माउंटबैटन ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ हाथ मिलाया था और क्षतिग्रस्त आजादी देश को दी थी। नौ अगस्त जनता की इस इच्छा की अभिव्यक्ति थी – हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे। हमारे लंबे इतिहास में पहली बार करोड़ों लोगों ने आजादी की अपनी इच्छा जाहिर की। कुछ जगहों पर इसे जोरदार ढंग से प्रकट किया गया।’’ पच्चीस साल की दूरी से देखने पर लोहिया को उस आंदोलन की कमजोरी – सतत दृढ़ता की कमी – पर अंगुली रखी। वे लिखते हैं, ‘‘लेकिन यह इच्छा थोड़े समय तक ही रही लेकिन मजबूत रही। उसमें दीर्घकालिक तीव्रता नहीं थी। जिस दिन हमारा देश दृढ़ इच्छा प्राप्त कर लेगा उस दिन हम विश्व का सामना कर सकेंगे। बहरहाल, यह 9 अगस्त 1942 की पच्चीसवीं वर्षगांठ है। इसे अच्छे तरीके से मनाया जाना चाहिए। इसकी पचासवीं वर्षगांठ इस प्रकार मनाई जाएगी कि 15 अगस्त भूल जाए, बल्कि 26 जनवरी भी पृष्ठभूमि में चला जाए या उसकी समानता में आए। 26 जनवरी और 9 अगस्त एक ही श्रेणी की घटनाएं हैं। एक ने आजादी की इच्छा की अभिव्यक्ति की और दूसरी ने आजादी के लिए लड़ने का संकल्प दिखाया।’’ (देखें, ‘राममनोहर लोहिया रचनावली’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 413)
अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ देखने के लिए लोहिया जिंदा नहीं रहे। लोग मरने के बाद उनकी बात सुनेंगे, उनकी यह धारणा अभी तक मुगालता ही साबित हुई है। अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ 1992 में पड़ी। कहां लोहिया की इच्छा और कहां 1992 का साल! यह वह साल है जब नई आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोल दिए गए और एक पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को ‘राममंदिर आंदोलन’ चला कर ध्वस्त कर दिया गया। तब से लेकर नवउदारवाद और संप्रदायवाद की गिरोहबंदी के बूते भारत का शासक-वर्ग उस जनता का जानी दुश्मन बन गया है जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में साम्राज्यवादी शासकों के दमन का सामना करते हुए आजादी का रास्ता प्रशस्त किया था। जो हालात हैं, उन्हें देख कर कह सकते हैं कि नब्बे के दशक के बाद उपनिवेशवादी दौर के मुकाबले ज्यादा भयानक तरीके से जनता के दमन को अंजाम दिया जा रहा है।
अगस्त क्रांति दिवस के मौके पर हम यह विचार कर सकते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत छोड़ो’ के नारे क्यों कारगर नहीं होते और क्यों कारपोरेट पूंजीवाद का कब्जा उत्तरोत्तर मजबूत होता जाता है? क्यों सारे देश को नगर और सारी आबादी को उपभोक्ता (कंज्यूमर) बनाने का दुःस्वप्न धड़ल्ले से बेचा जा रहा है? कारण स्पष्ट है, भारत का शासक वर्ग पूरी तरह से कारपोरेट पूंजीवाद का पक्षधर है। देश के नेता, उद्योगपति, बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, फिल्मी सितारे, पत्रकार, खिलाड़ी, जनांदोलनकारी, नौकरशाह, तरह-तरह के सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थन और मजबूती की मुहिम में जुटे हैं। इनमें जो शामिल नहीं हैं उनके बारे में माना जाता है उनकी प्रतिभा में जरूर कोई खोट या कमी है। नवउदारवाद और उसके पक्षधरों की स्थिति इतनी मजबूत है कि अब उनकी आलोचना भी उनके गुणों का बखान हो जाती है और उनका पक्ष और मजबूत करती है।
जैसा कि हमने पहले भी कई बार बताया है, नवउदारवादियों के साथ प्रच्छन्न नवउदारवादियों की एक बड़ी और मजबूत टीम तैयार हो चुकी है। वह षासक वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है और नवउदारवाद विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को नष्ट करने में तत्पर रहती है। दरअसल, सीधे नवउदारवादियों के मुकाबले प्रच्छन्न नवउदारवादी जनता और समाजवाद के बड़े दुश्मन बने हुए हैं। नवउदारवाद के मुकाबले में उभरे सच्चे जनांदोलनों और समाजवादी राजनीति के प्रयासों को प्रच्छन्न नवउदारवादियों ने बार-बार भ्रष्ट किया हैा। इन्होंने एक बड़ा हल्ला, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का, वल्र्ड सोशल फोरम (डब्ल्यूएसएफ) के तत्वावधान में बोला था और उससे बड़ा हमला, राष्ट्रीय स्तर पर, इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में बोला हुआ है। प्रछन्न नवउदारवादियों के लिए सब कुछ अच्छा हो सकता है; बुरी है तो केवल राजनीति। हालांकि उनकी अपनी राजनीतिक ऐशानाएं शायद ही कभी एक पल के लिए सोती हों।

डब्ल्यूएसएफ के समय कम से कम सांप्रदायिकता से बचाव था। गैर-राजनीतिक रूप में ही सही, ‘दूसरी दुनिया संभव है’ का नारा था। आईएसी के आंदोलन में संप्रदायवादी और धर्मनिरपेक्षतावादी आपस में मिल गए हैं और वे एक ‘जन लोकपाल’ के बदले नवउदारवादी व्यवस्था और नेतृत्व को अभयदान देते हैं। आईएसी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का शुरुआती नारा था – ‘मनमोहन सिंह वोट चाहिए तो जन लोकपाल कानून लाओ’। अब बाबा रामदेव कहते घूम रहे हैं, ‘राहुल गांधी काला धन वापस लाओ, प्रधानमंत्री बन जाओ’। सुना है नवउदारवाद के उत्पाद इन बाबा ने विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का आंदोलन फिर से छेड़ने के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना है!

मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह नवउदारवादियों और प्रच्छन्न नवउदारवादियों के साथ है, जिसमें नेता और मुद्दे कंपनियों के उत्पाद की तरह प्रचारित किए जाते हैं। नतीजा यह है कि भारतीय मानस संपूर्णता में शासक-अभिमुख यानी नवउदारवादी रुझान का बनता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों से प्रताडि़त जनता भी इस मुहिम की गिरफ्त में है। यह प्रक्रिया जब मुकममल हो जाएगी, कोई भी बदलाव संभव नहीं होगा। केवल फालतू लोगों का सफाया होगा। हम प्रच्छन्न नवउदारवादियों के इस तर्क के कायल नहीं हैं कि वे सरकार पर दबाव डाल कर गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं बनवाते हैं। उनकी यह मदद गरीबों को नहीं, कोरपोरेट घरानों को सुरक्षित करती है।
हम हाल का एक वाकया बताना चाहते हैं। 8 जुलाई को पूना में समाजवादी नेता और लेखक/पत्रकार पन्नालाल सुराणा के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। अवसर उनके अस्सीवें साल में प्रवेश करने का था। कार्यक्रम के आयोजन में राष्ट्र सेवा दल की प्रमुख भूमिका थी जिसके वे अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र के हर जिले से आए करीब पांच सौ लोगों ने साने गुरुजी स्मारक पहुंच कर पन्न्नालाल जी को बधाई दी। चंदा करके उगाहे गए ग्यारह लाख रुपयों का चेक भी भेंट किया गया। सत्ता की राजनीति से बाहर किए गए राजनीतिक संघर्ष के लिए उत्तर भारत में ऐसा कार्यक्रम होना असंभव है। हमने अपनी आंखों से देखा कि एक व्यक्ति नंगे पैर आया और स्वागत कक्ष में चंदा देकर रसीद ली।
कार्यक्रम हालांकि पन्नालाल जी के अभिनंदन का था, लेकिन चर्चा ज्यादातर राजनीतिक हो गई। स्वागत समिति के अध्यक्ष भाई वैद्य ने पन्नालाल जी के व्यक्तित्व और लेखकीय कृतित्व के साथ समाजवादी आंदोलन में उनके राजनीतिक संघर्ष पर भी प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने वक्तव्य में अवसरोपयुक्त टिप्पणी करने के साथ कार्यक्रम की अध्यक्ष अरुणा राय को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक बार फिर उन्हें सक्रिय राजनीति में आने की अपील करके उलझन में डालना चाहते हैं। वे शायद पहले भी कतिपय अवसरों पर उनसे वैसी अपील कर चुके होंगे। उन्होंने दूसरे मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को भी नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों की चर्चा करके उलझन में डाला। शिंदे साहब का भाषण लंबा था। वे नवउदारवादी नीतियों की जरूरत और उनसे होने वाले फायदों पर बोले। पन्नालाल जी को हालांकि आयोजकों और वहां आने वाले शुभेच्छुओं का धन्यवाद ही करना था, लेकिन समाजवादी प्रतिबद्धता और राजनीतिक संघर्ष के तहत उन्होंने अपने भाषण में शिंदे साहब की धारणाओं का जोरदार ढंग से खंडन किया।
हमें अच्छा लगा कि एक नागरिक अभिनंदन के कार्यक्रम में अच्छी-खासी राजनीतिक बहस सुनने को मिली। लेकिन आश्चर्य भी हुआ कि राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य अरुणा राय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सक्रिय राजनीति की बात करने वालों पर बिना झिझक तानाकशी की। उनका निशाना कारपोरेट पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद की राजनीति करने वालों पर था। गोया सक्रिय राजनीति करने का अधिकार उस पार्टी और सरकार के लिए सुरक्षित है, जिसकी वे सलाहकार हैं! उन्होंने कहा कि वे राजनीति को ज्यादा अच्छी तरह समझती हैं और जो कर रही हैं वही सच्ची राजनीति है। उनके मुताबिक, यह उसी राजनीतिक चेतना का असर है कि लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक चेतना फैलाने में नर्मदा बचाओ आंदोलन का हवाला भी दिया। मनरेगा को वे राजनीतिक चेतना की देशव्यापी पाठशाला मानती ही होंगी। काफी ऊंचे ओटले से बोलते हुए उन्होंने घोषणा की कि असली आजादी तो अब आई है, जब उन जैसे सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों ने लोगों का जागरूक करना शुरू किया है। अरुणा राय अपने वक्तव्य को लेकर इस कदर आत्मव्यामोहित थीं कि अपनी मान्यता और भूमिका पर रंच मात्र भी आलोचनात्मक निगाह डालने को तैयार नहीं दिखीं।
दरअसल, एनजीओ वालों का राजनीतिक संघर्ष से कोई वास्ता नहीं रहा होता। वे उसके बारे में वाकफियत भी नहीं रखना चाहते। वे गरीबों को साल में सौ दिन सौ रुपया का काम देने को बहुत बड़ी क्रांति मान कर अपनी पीठ ठोंकते हैं और इस सच्चाई से आखें फेरे रहते हैं कि देश में कारपोरेट क्रांति हो चुकी है। अगस्त क्रांति के दिन यह समझना जरूरी है इन लोगों का स्वार्थ शासक-वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है। वरना सीधी बात है, यदि आप किसी सरकार या पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं हैं तो उसके सलाहकार नहीं बन सकते। काम करने के लिए उस सरकार के प्रोजेक्ट नहीं ले सकते। सोनिया गांधी की सलाहकार समिति, जिसका सदस्य बनने के लिए मारामारी होती है, द्वारा जो भी काम संपादित होता है, सरकार के लिए होता है और कांग्रेस नीत यूपीए सरकार कारपोरेट पूंजीवाद की पैरोकार सरकार है।
मजेदारी यह है कि जनता को धोखा देने का यह खेल खुलेआम और बिना किसी ग्लानि के चलता है। अपने वायसराय को लिखे खत में लोहिया ने जिन्हें ‘आपके आदमी’ बताया है, सरकारों के सलाहकार बने प्रच्छन्न नवउदारवादी उसी श्रेणी में आते हैं। सोनिया के इन सलाहकारों से पूछा जा सकता है कि आप भारत की करोड़ों माताओं की दुर्दशा में शामिल हैं, उन माताओं के करोड़ों बच्चों के कुपोषण, बीमारी, असमय मृत्यु, अशिक्षा की जिम्मेदारी आप पर आयद होती है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के संसाधनों की लूट, लोगों के विस्थापन और लाखों किसानों की आत्महत्या किसी दैवीय प्रकोप की नहीं, आपकी देन हैं, क्योंकि आप सरकार के सलाहकार हैं और उस सरकार की राजनीति से अलग राजनीति के धुर विरोधी!

सीधे राजनीति ही रास्ता

नवउदारवादी गुलामी के खतरे को सबसे पहले देख पाने वाले राजनेता और चिंतक किशन पटनायक ने यह माना था कि नवउदारवाद के विरोध और विकल्प के लिए जनांदोलनों का राजनीतिकरण और एकीकरण होना चाहिए। वह निश्चित ही एक प्रासंगिक और स्फूर्तिदायक विचार था। किशन पटनायक की साख भी थी और समस्या की सम्यक समझ भी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी साथियों के साथ मिलकर पहल की। 1995 में एक नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) का गठन हुआ जिसके तहत वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक विकास का विचार लोगों के सामने रखा गया। हालांकि किशन पटनायक की आशा फलीभूत नहीं हो पाई। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में एनजीओ का तंत्र नवउदारवाद विरोधी किसी भी राजनीतिक पहल को निष्क्रिय करने के लिए स्वाभाविक तौर पर सक्रिय रहता है। उसी तंत्र में फंस कर किशन पटनायक की मौत हो गई।
नवउदारवाद के खिलाफ सजप के अलावा और भी कई राजनैतिक प्रयास हुए हैं। उदारीकरण के पहले 10 सालों में मुख्यधारा राजनीति की तरफ से भी उसके विरोध में कुछ न कुछ स्वर उठते रहे। देश पर देश के शासक-वर्ग द्वारा नवउदारवादी हमले के बाद उसका मुकाबला करने की प्रेरणा से चुनाव आयोग में बड़ी संख्या में राजनीतिक पार्टियों का पंजीकरण हुआ है। लेकिन कोई प्रयास कामयाब नहीं हो पा रहा है। बल्कि ऐसे प्रयासों को लोकतंत्र को कमजोर करना प्रचारित किया जाता है। इस गतिरोध के कई कारण हैं, लेकिन शासक-अभिमुख प्रछन्न नवउदारवादियों, जो कभी जनांदोलनकारियों के और कभी सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों की सूरत में होते हैं, की नकारात्मक भूमिका उनमें प्रमुख है।
अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह पर हम यह समझ लें, कि एनजीओ आधारित जनांदोलनकारी राजनैतिक प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैं, तो आगे का रास्ता बनेगा। कहने को ये गैर-सरकारी संस्थाएं हैं, लेकिन उनसे ज्यादा सरकारी सरकारों के अपने विभाग भी नहीं होते। इन्होंने जेनुइन प्रतिरोधी आंदोलनों – चाहे वे किसानों के हों, आदिवासियों के हों, मजदूरों के हों, छोटे व्यापारियों के हों, निचले दरजे के सरकारी कर्मचारियों के हों या छात्रों के – आगे नहीं बढ़ने दिया। वैश्विक कारपोरेट पूंजीवाद की हमसफर फोर्ड फ़ौंडेशन, राकफेलर फाउंडेषन जैसी दानदाता संस्थाओं और उसी तरह की बहुत-सी ईनामदाता संस्थाओं के धन ने समाजवादी राजनीति के रास्ते को अवरुद्ध किया हुआ है। जैसे बड़े नेता और पार्टियां अपने यहां स्वतंत्र राजनीतिक सोच के कार्यकर्ताओं को नहीं पनपने देते, वैसे ही प्रच्छन्न नवउदारवादी समाज में राजनीतिक पहल और प्रक्रिया को नहीं संभव होने देते। इनका मानना है कि हर कार्यकर्ता की कीमत होती है, उसे चुकाने वाला एनजीओ अथवा ईनामदाता संस्था होनी चाहिए। कहना न होगा कि कीमत और मुनाफे से जुड़ी यह सोच पूंजीवाद की पैदाइश है। इन्हें सुरक्षा का दोहरा कवच प्राप्त है – भारत के शासक वर्ग का और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का। इन्हें कारेपोरेट पूंजीवाद के ‘सिविल सुरक्षा बल’ कहा जा सकता है। एक और बात गौर की जा सकती है, अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग इनकी दुनिया के सदस्य नहीं बन सकते; उन्हें साम्राज्यवादी चाल के इन प्यादों का प्यादा बन कर रहना होता है। जनता की स्वतंत्र राजनीति भला ये कैसे बरदाश्त कर सकते हैं?
अगस्त क्रांति दिवस की सही प्रेरणा यही हो सकती है कि नवसाम्राज्यवादी गुलामी और उसे लादने वाले शासक-वर्ग के खिलाफ संघर्ष की राजनीति संगठित और विकसित हो। बाकी सारे सामाजिक-संस्कृतिक प्रयास उस राजनीति को पुष्ट और बहुआयामी बनाने में लगें। हालांकि पूंजीवाद की चैतरफा गिरफ्त और जीने की मजबूरियों ने देश की जनता को राजनीतिक रूप से लगभग अचेत कर दिया है। किसी नई राजनीतिक पहल को उसका समर्थन नहीं मिल पाता। मध्यवर्ग राजनीति-द्वेशी बन गया है और दिन-रात उसका प्रचार करता है। परोक्ष रूप से वह मौजूदा राजनीति को ही मजबूत करता है जो धनबल, बाहुबल, संप्रदायवाद, जातिवाद, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, वंशवाद, क्षेत्रवाद आदि के बल पर चलती है। ऐसे कठिन परिदृश्य में जो राजनीतिक संगठन जनता के पक्ष को मजबूत बनाने के लिए खुला और सतत राजनीतिक संघर्ष करेगा, एक दिन उसे सफलता मिलेगी।
हालांकि प्रच्छन्न नवउदारवादियों को दूर रखना बहुत मुश्किल है, लेकिन दूर रखे बगैर नवउदारवाद विरोध की राजनीति खड़ी नहीं हो सकती। 20-22 साल के अनुभव के बाद यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर भारत में समाजवादी राजनीतिक ताकत खड़ी हो पाएगी तो प्रछन्न नवउदारवादियों से बच कर ही हो पाएगी।

– प्रेम सिंह

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चन्द्रशेखर आजाद
( जन्म दिन 23 जुलाई 1906 )


क्रांतिकारी ही नही बल्कि क्रान्त्कारियो का नायक बनने के लिए ऊँची शिक्षा — दीक्षा कि जरूरत नही है , बल्कि उसके लिए क्रान्ति के प्रति अगाध विश्वास के साथ अदम्य साहस और अभूतपूर्व त्याग बलिदान कि जरूरत है शिक्षा व ज्ञान में पहुंच रखने वाले क्रान्तिकारियो साथियो से सिद्धांत व ज्ञान को सीखते रहने की जरूरत है | इसका सबसे बड़ा सबूत महान राष्ट्र भक्त क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद है | शिक्षा ज्ञान कि कमी के वावजूद वे
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी व आर्मी के नायक बने रहे | गरीबी में जन्मे और गरीबी में पले– बढे आजाद ने अपनी निजं कि गरीबी दूर करने की जगह राष्ट्र को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का व्रत लिया | किशोरावस्था से ही इस रास्ते पर आगे बढे | अदम्य साहस और त्याग के साथ आगे बढे | आजाद का जीवन उन सभी के लिए स्मरणीय है जो आज भी राष्ट्र कि उस क्रांतिकारी आजादी का सपना सजोये है , जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने देखा था |

23 जुलाई के दिन पैदा हुए चन्द्रशेखर आजाद , इसी दिन पैदा ही लोकमान्य तिलक से 50 वर्ष छोटे थे | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी संघर्ष के सेनानायको में चन्द्रशेखर आजाद का नाम अग्रणी है | वे उत्कट देशभक्त असीम त्याग , अपरिमित शौर्य , अदभुत साहस और अनुभवी सैन्य — नेतृत्त्व की साकार प्रतिमा थे |
पण्डित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका1 गाँव में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था।अलीराजपुर जिले मध्य प्रदेश के भावरा नामक ग्राम मे रहने का भी गौरव प्राप्त हुआ | भावरा ग्राम मध्य प्रदेश के आदिवासी मूल झाबुआ जिले में है | सीताराम तिवारी गाँव की सीमा पर एक झोपड़ी में रहते थे | आजीविका के लिए एक बाग़ में रखवाली करते थे| वे अत्यंत निर्धन थे | चन्द्रशेखर उनकी पांचवी संतान थे | तीन संताने अल्पायु रही | इस पांचवी संतान का पालन — पोषण उनकी माता ने अत्यंत कष्ट से निर्धनता में किया | निर्भीकता चन्द्रशेखर के स्वाभाव में जन्मजात थी |
एक दिन वे घर से अचानक बिना किसी को बताये बनारस जा पहुचे | संस्कृत सीखने की अपनी इच्छा अपने साथियो पर प्राय: व्यक्त किया करते थे | अत: बनारस पहुचकर एक मठ में संस्कृत का अध्ययन करने लगे घर की दयनीय आर्थिक स्थिति और संस्कृत पढने की अभिलाषा ही उन्हें बनारस खीच लायी थी |
देश में सर्वत्र असहयोग आन्दोलन का वातावरण था | विदेशी कपड़ो का बहिष्कार की भारत — भर में धूम थी | 1921 में च्न्र्शेख्र 14 वर्ष के किशोर थे | इस किशोर अवस्था में वे स्वेदेशी आन्दोलन में आ गये | भावरा की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला बना दिया था | इसी वर्ष के अन्त में ब्रिटेन के युवराज दयक आफ विद्स्र भारत यात्रा पर आये | कांग्रेस ने उनके आगमन का विरोध किया सर्वत्र हड़ताल रखी गयी |
सरकार ने अपना दमन चक्र प्राम्भ किया | गांधी को छ: महीने का कारावास मिला |चन्द्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया | इसी अपराध में इस किशोर पर मुकदमा चला | सुनवाई के दौरान चन्द्रशेखर ने जो उत्तर दिया वे इतिहास की धरोहर है
| न्यायाधीश ने पूछा तुम्हारा नाम ? आजाद ,पिता का नाम
नाम ? स्वतंत्र ,तुम्हारा निवास ? जेलखाना | चन्द्रशेखर के इन निर्भीक उत्तरों से न्यायाधीश क्रुद्ध हो उठे | उन्होंने इस बालक को 15 कोड़ो की सजा सुनाई गयी | उनके साथियो को जिले के कारागृह में भेजा गया | वह सिपाही नगे
बदन पर कोड़े बरसा रहे थे और वे ” वन्देमातरम ” के नारे लगा रहे थे | अन्त में मूर्क्षित होकर गिर पड़े | काशी के इतिहास में वह एक अविस्मरनीय घटना है | सारी काशी नगरी आततायी सरकार से टक्कर लेने वाले उस किशोर को देखने व उसका प्रेम से अभिवादन करने के लिए उमड़ पड़ी | अनेको भाषण हुए आजाद को मंच पर लाया गया | छोटे से आजाद को मेज पर खड़ा किया गया उनका सारा शरीर फूलो के हारो से ढक गया | उस दिन चन्द्रशेखर तिवारी से चन्द्रशेखर आजाद हो गये | चौरी — चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया और महात्मा गांधी के अहिसंक मार्ग से उनकी आस्था डिगने लगी | इसी समय प्रख्यात शचीन्द्रनाथ सान्याल
संयुक्त प्रांत में क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | श्री सान्याल ” हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक दल तैयार किया | प्रणवेश चटर्जी इस सभा के सदस्य थे | उनका ध्यान चन्द्रशेखर आजाद की ओर गया | चन्द्रशेखर आजाद विद्यापीठ की पढ़ाई छोडकर पुन: संस्कृत पढने लगे थे | संभवत: मठ में स्वतंत्रता संघर्ष के अनुकूल वातावरण रहा होगा |, चटर्जी ने मंथननाथ गुप्त को आजाद इस सभा सदस्य बनाने का काम सौपा गया| आजाद सदस्य बनना स्वीकार करलिए | शीघ्र ही वे अपनी योगता के कारण अन्तरंग समिति के सदस्य भी बना लिए गये |
चंदशेखर आजाद ने इस संस्था में नए कार्यकर्ताओं को जोड़ा | इस संस्था काउद्देश्य न केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना था , अपितु शोषण रहित प्रजातंत्रकी स्थापना करना भी था | संगठन का विस्तार हो रहा था पर धन की कमी का संकट बढ़ता जा रहा था | संगठन के सारे खर्च थोड़े — से चंदे के भरोसे कैसे चलते | इस लिए डकैती आवश्यक लगने लगी | 1925 में दल के नेताओं की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ जाने वाले पैसेंजर ट्रेन में रक्खे सरकारी खजाने को लुटने का प्रस्ताव रखा | 9 अगस्त 1925 को योजना को मूर्त रूप देने का निश्चय हुआ | गाडी को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के समीप रोककर लुटने की योजना बनी | योजनानुसार राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी ने द्दितीय श्रेणी व चन्द्रशेखर आजाद , केशव चक्रवर्ती , मुरैलाल , मुकुंदीलाल , बनवारी लाल , रामप्रसाद बिस्मिल व मंथन नाथ गुप्त ने तृतीय श्रेणी के टिकट लिए | राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी काकोरी स्टेशन से चदे | गाडी छूटते ही उन्होंने जंजीर खीचकर गाडी रोक दी | क्रान्तिकारियो ने 20 — 25 मिनट में गाडी में रखा खजाना लूट लिया | रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खा और चन्द्रशेखर आजाद समेत कुल 10 लोगो ने इसमें भागीदारी की |
सरकार ने सुरागो के जरिये क्रान्तिकारियो को पकड़ना शुरू किया | फिर कई लोगो के मुखबिर हो जाने से सरकार का काम आसान हो गया | 25 क्रान्तिकारियो पर मुकदमा चला | इसमें चन्द्रशेखर आजाद का नाम था | पर चन्द्रशेखर आजाद काकोरी केस के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे , जो अन्त तक पकडे नही जा सके फरवरी 1931 में अंतिम सहादत से पहले कभी पुलिस उनकी छाया तक नही छू पाई | उन्होंने कोर्ट ले जाते समय पुलिस की सशस्त्र व सज्जित गाडी पर आक्रमण करने जैसी साहसी योजनाये बनाई | परन्तु दुर्भाग्य से वे सफल नही हो सके |संगठन को काकोरी काण्ड की धर — पकड से जबर्दस्त झटका लगा | आजाद काफी समय अज्ञात वास में रहे | झांसी और ओरछा रियासत के जंगलो में भटकते रहे | अब वे हरीशंकर ब्रम्हचारी थे | झांसी में उन्होंने क्रान्ति दल की एक शाखा भी स्थापित की| भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , भगवानदास माहौर , सदाशिव राव मलकापुरकर विश्वनाथ राव , शिव वर्मा , जयदेव कपूर , प्रो. नंदकिशोर निगम , विजय कुमार सिन्हा , यशपाल , कुंदन लाल , काशीराम , राजेन्द्रपाल , सुरेन्द्र पाण्डेय , भगवती चरण बोहरा , दुर्गा भाभी , शुशीला दीदी , डाक्टर गया प्रसाद हंसराज वायरलेस सुखदवराज प्रकाशवती महावीर सिंह , बटुकेश्वरदत्त विमल प्रसाद जैन आदि अनेक इस नव गठित क्रांतिकारी दल के सदस्य थे |अब इस दल का नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशंन एंड आर्मी रखा गया | दल की 7 सदस्यी केन्द्रीय समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद थे | वही इस आर्मी ( सेना ) के सेनापति थे | उन्होंने अनेक स्थानों पर अपनी सेना के केंद्र स्थापित किए | साइमन कमिशन के विरोध में पूरे प्रदर्शन के अवसर पर लाला लाजपत राय की पुलिस की मार के कारण मृत्यु हो गयी | जिसके प्रतिशोध के लिए सांडर्स की हत्या की योजना रची गयी | इस योजना का नेतृत्त्व चन्द्रशेखर के हाथो में था | सांडर्स हेड कांस्टेबल चानन सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर पुलिस थाने से निकला | निकलते ही दो क्रान्त्रिकारियो ने गोली चलाकर उसे नीचे गिरा दिया | चानन सिंह ने भागते हुए सायकिल सवारों का पीछा किया | वे दयानंद आर्ट्स कालेज हास्टल के दरवाजे से अंदर घुसे | उन्होंने चानन सिंह से पीछा न करने की प्रार्थना की | उसके न मानने पर चन्द्रशेखर ने उसे गोली से उड़ा दिया | जिस समय भगत सिंह और राजगुरु पुलिस थाने पर हमला कर रहे थे | चन्द्रशेखर भी थोड़ी दूरी पर खड़े थे | पुलिस ने छात्रावास को चारो तरफ से घेर लिया | सम्पूर्ण लाहौर में गुप्तचर फैला दिया | रेलवे स्टेशन पर पुलिस का गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था इतने सख्त बन्दोबस्त के वावजूद दूसरे दिन लाहौर शहर में स्थान — स्थान पर दीवारों पर पर्चे चिपके हुए थे | जिन पर लाल स्याही से लिखा हुआ था की ”सांडर्स मारा गया ” ” लाला जी का बदला ले लिया गया ” क्रान्ति चिरायु हो | सांडर्स — वध के लिए अंग्रेजी शासन किसी को भी नही पकड सका | भगत सिंह और राजगुरु दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकलकर कलकत्ता पहुच गये | आजाद भी लाहौर से बाहर आ गये ||
9 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय विधान सभा में बम — विस्फोट की ऐतिहासिक घटना घटित हुई | यह साहसी कार्य सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया था | बम — विस्फोट के विषय में दल में पूर्ण विचार – विमर्श हुआ था | दल का प्रत्येक व्यक्ति जानता था की दोनों पकडे जायेंगे और उन्हें फांसी होगी |
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वंय गिरफ्तारी दी | क्योंकि वे न्यायालय को क्रान्ति के प्रचार माध्यम बनाना चाहते थे | इस संदर्भ में सरकार चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने का पूर्ण प्रयत्न किया परन्तु आजाद व यशपाल तथा अन्य 7 साथी फरार ही रहे |क्रान्तिकारियो द्वारा 23 दिसम्बर 1929 को गवर्नर इरविन की विशेष गाडी के नीचे बम विस्फोट किया गया | गांधी ने ” कल्ट आफ द बम ” नामक लेख लिखकर इसका विरोध किया | जिसके उत्तर में 26 जनवरी 1930 को ” फिलासफी आफ द बम ” पर्चा बाटा गया इसके लेखक यशपाल व भगवती चरण बोहरा थे | परन्तु सारी व्यवस्था चन्द्रशेखर आजाद की थी | जीवन के आखरी दिनों में उनका मन कुछ बेचैन — सा रहने लगा था | उनके मित्र गिरफ्तार हो गये थे और जो शेष थे , वे विशवास पात्र नही रहे | उनके ऐसे ही मित्रो में एक थे वीरभद्र तिवारी जिनके विश्वासघात से 27 फरवरी 1931 का दिन भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए काला दिन बनकर आया | उसी दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यशाही से सशत्र टक्कर लेते हुए अजेय सेनानी आजाद ने अपनी प्राण आहुति दी |27 फरवरी को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आजाद की मौजूदगी की सूचना क्रांतिकारी से पुलिस मुखबिर बने वीरभद्र ने पुलिस को दी पुलिस अधीक्षक नाट बाबर ने पुलिस दल के साथ पार्क के चारो ओर से घेरा डाल दिया दोनों तरफ से जबर्दस्त गोली चली आजाद का निशाना अचूक था | इन्ही की गोली से डी. एस . पी . विशेश्वर सिंह का जबड़ा भी टूट गया | आजाद पर चारो ओर से गोली की बौछार होने लगी | तब भी लगभग 20 मिनट तक वे साहस से लड़ते रहे |
इतने सिपाही और इतना असलहा होने के वावजूद वे उन्हें पकड नही सके | अनेक गोलिया उनके शरीर में घुस चूकि थी और वे जमीन पर गिर पड़े | तब उन्होंने स्वंय एक गोली अपने सीने में दाग ल़ी | ” आजाद हमेशा कहा करते थे ” मैं जीते — जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथ नही लगूंगा | और उन्होंने अपनी यह प्रतिज्ञा पूर्ण की | शहादत के बाद शोक सभा में पुरुषोत्तम दास , कमला नेहरु मंगलदेव सिंह , शिव बिनायक मिश्र , श्रीमती प्रतिभा शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि के भाषण हुए | अमर क्रान्ति कारी शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी श्रीमती प्रतिभा ने भाषण में कहा ” खुदीराम बोस की भस्म लोगो ने तावीज में रखकर अपने बच्चो को पहना दी थी | उसी भावना से मैं आजाद की भस्म लेने आई हूँ
जनता का आदर और उत्साह देखकर सरकार ने शहीद स्थल के उस वृक्ष को काट डाला स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघवदास ने उसी जगह पुन: पेड़ लगा दिया | डा. भगवानदास माहौर लिखते है — हमारे दल में कुछ लोग प्रेमगीत लिखा और गाया करते थे | उस पर चिडकर आजाद ने कहा , इस जीवन में कहा है प्रेम — वेम ? मेरी कविता सुनो ——
दुश्मन की गोलियों का
हम सामना करंगे |
आजाद ही रहे है ,
आजाद ही रहेंगे |
और सचमुच वे जीवन भर आजाद ही रहे आजाद रहकर उन्होंने देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया .

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण प्रतिफल और उसका आर्थिक सम्पूर्ण समय में फैला हुआ एकछत्र विश्व बाजार का विघटन समझा जाना चाहिए। इसने विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के आम संकट को और भी आगे गहरा कर दिया है।
द्वितीय विश्व युद्ध स्वयं ही संकट की उपज था। दोनों पूँजीवादी गठबंधनों में प्रत्येक ने, जिसने अपने सींग युद्ध में भिड़ाए के, सोचा था कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ देंगे और विश्व प्रभुत्व हासिल कर लेंगे। संकट के उबड़ने का उन्होंने यही रास्ता निकाला। संयुक्त राज्य अमेरिका ने आशा की थी कि वह इस दौर में अपने अत्यंत भयंकर प्रतिद्वंद्वी जर्मनी और जापान को कार्य परिक्यि के किल बाहर कर देगा, विदेश व्यापार और दुनिया के कच्चे माल के श्रोतों पर कब्जा कर लोग और इस तरह विश्व प्रभुत्व स्थापित कर लेगा।
किन्तु युद्ध ने इस आशा को उचित नहीं ठहराया। यह सही है कि तीनो बड़े पूँजीवादी देशों, सं0रा0अ0, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रतियोगी के रूप में जर्मनी और जापान को कार्य परिधि से निकाल बाहर कर दिया गया। किन्तु ठीक उसी समय चीन औ अन्य योरपीय गणतंत्रों ने पूँजीवाद व्यवस्था से नाता तोड़ लिया और सोवियत संघ के साथ मिलकर पूँजीवादी शिविर के मुकाबले एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर का निर्माण कर लिया। दो परस्पर विरोधी शिविरों के अस्तित्व का आर्थिक परिणाम यह हुआ कि संसार भर में छाया हुआ एक ध्रुव विश्व बाजार विघटित हो गया और इसलिए आज हमारे सामने दो समानांतर विश्व बाजार है जो एक दूसरे से टकराता भी है।
यह भी देखना चाहिए कि संयुक्त राज्य, ब्रिटेन और फ्रांस ने स्वयं ही, निश्चय ही स्वयं न चाहते हुए भी, नया समानांतर विश्व बाजार के बनाने और मजबूत करने में योगदान किया। उन्होंने सोवियत यूनियन, चीन, और योरपीय नवादी गणतंत्रों जो मार्शल प्लान में शामिल नहीं हुए, पर आर्थिक नाकेबंदी थोपी यह सोचते हुए कि इनका इस प्रकार गला घोंट देंगे। परिणाम यद्यपि यह हुआ कि इनका गला घोंटा नहीं गया, बकि नया विश्व बाजार मजबूत हुआ।
लेकिन बुनियादी बात निश्चय ही आर्थिक नाकेबंदी नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि युद्ध के सम से ही ये देश आर्थिक तौर पर आर्थिक सहयोग और परस्पर सहायता में जुड़ गये थे। इस प्रकार के सहयोग के अनुभव के साबित किया कि एक भी पूँजीवादी देश इतने प्रभावकारी दंग से सुयोग्य तकनीकी सहायता इन जनवादी गणतंत्रों को नहीं दे सकते थे। जैसा सोवियत संघ करते हैं। यहाँ विचार बिन्दु यह नहीं है कि यह सहायता यथासंभव सस्ता और अपेक्षाकृत उन्नत तकनीकी की है। मुख्य विचार बिन्दु यह है कि इस सहयता की तह में एक दूसरे को मदद करने और सबों की आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करने की सच्ची अभिलाषा है। इसी का सुफल है इन देशों में हो रही तेज औद्योगिक प्रगति। यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि औद्योगिक प्रगति की इस गति से जल्दी ही ये देश न केवल इस स्थिति में पहुँच जायेंगे कि इन्हें दूसरे देशों से आयात करने की जरूरत नहीं रह जायगी, बल्कि तब इन देशों को अपने अतिरिक्त माल की खपत के लिए बाहरी बाजार की दरकार होगी।
इसके साथ ही बड़े पूँजीवादी देशों (सं0रा0अ0, ब्रिटेन, फ्रांस) द्वारा दुनिया के श्रोतों का शोषण का दायरा ब़ेगा नहीं, बल्कि घटेगा। उनका व्यापार क्षत्र विस्तावितर नहीं होगा बल्कि सिकुड़ेगा। विश्व बाजार में बिक्री के उनके अवसर कम होंगे और उनके उद्योग उनकी क्षमता से नीचे काम करेंगे। सही में विश्व बाजार के विघटन के संदर्भ में विश्व पूँजीवाद के सामान्य संकट के गहराने का यही अर्थ है।
यह पूँजीपतियों द्वारा स्वयं ही महसूस किया जा रहा है। उनके लिए सोवियं संघ, चीन जैसे बाजारों के खाने का नुकसान सहन करना कष्ट दायक होगा। वे मार्शल प्लान, कोरिया युद्ध, उन्मत शस्थीकरण, औद्योगिक सैन्यीकरण आदि तरकों से उन नुकसानों की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह उसी प्रकार है जैसे डूबता आदमी तिनके का सहारा लेता है। इस परिस्थिति ने अर्थ शास्त्रियों के समक्ष दो प्रश्न उपस्थित कर दिये हैं :
क.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व स्तालिन द्वारा प्रतिपादित पूंजीवाद के सामान्य संकट के समय बाजार के सापेक्ष स्थाभित्व’’ का सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
ख.क्या यह दृ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि पूंजीवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद अपने समग्र रूप में पूँजीवादपहले की अपेक्षा तेजी से विकास कर रहा है’’ सन 1916 के बसंत में लेनिन द्वारा प्रतिपादित सिद्घांत आज भी मुक्ति युक्त है?
मैं सोचता हूं कि ऐसा नहीं हो सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न नई परिस्थिति के मद्देनजर इन दोनो सिद्घांत (thesis) के बारे में समझा जाना चाहिए कि अब इनकी प्रमाणिकता समाप्त हो गयी है।

लेखक – जोजेफ स्तालिन
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के महासचिव, पूर्व सांसद श्री नागेन्द्र नाथ ओझा का साक्षात्कार लोक संघर्ष पत्रिका के प्रबंध सम्पादक रणधीर सिंह सुमन द्वारा खेत मजदूरों की समस्याओं परः

प्रश्न- खेत मजदूरों की मुख्य समस्याएँ क्या है ?

नागेन्द्रनाथ ओझा- भूमिहीनता है और उसके चलते व्यापक गरीबी है। अशिक्षा, बेरोजगारी तथा ऋणग्रस्तता भी है।
इसीलिए कृषि क्षेत्र में मजदूरी करना उसकी विवशता है। कम मजदूरी के कारण उसकी पारिवारिक आय अत्यन्त अल्प होती है। जिससे वह अपना व परिवार का भरण पोषण नहीं कर सकता है। खेत मजदूरों की सामाजिक बनावट को देखें। इनका एक बड़ा हिस्सा दलित, आदिवासी, अति पिछड़ी जाति से है। सामाजिक रूप से अति पिछड़े दलित होने के कारण अपनी मजदूरी तय करने में असमर्थ है। खेती के समय बहुत सारे गाँवों में मजदूरी की दर प्रतिदिन 20 रूपये से 40 रूपये तक होती है। इस कारण उचित मजदूरी या न्यूनतम मजदूरी की बात ही नहीं हो पाती है। इसका मुख्य कारण आर्थिक व सामाजिक भी है।
खेत मजदूरों में संगठन का अभाव है। इसलिए जो भी कानून व योजनाएँ बनती हैं वे कागजों पर ही रह जाती हैं। खेत मजदूरों से सम्बंधित योजनाओं का क्रियान्वयन नौकरशाहों के हाथों में है। नौकरशाही भ्रष्ट है और नौकर शाही के अपने वर्गीय निहित स्वार्थ हैं। वर्गीय स्वार्थ के कारण खेत मजदूरों के कल्याण में उनकी रूचि नहीं होती है।
प्रश्न खेत मजदूरों की मजदूरी कम होने का मुख्य कारण क्या है?

नागेन्द्रनाथ ओझा- कृषि क्षेत्र के किसानों की आय कम है। कृषि घाटे का सौदा है। खेती सामूहिक आधार पर ही होती है। सरकार को चाहिए कि खेत मजदूरों को जीने लायक न्यूनतम मजदूरी किसानों से दिलाए। यह तभी संभव है जब भारतीय खेती को घाटे से उबारने का प्रयास ईमानदारी से किया जाए। छोटे और मध्यम किसानों को कृषि उपज का लाभकारी मूल्य दिया जाए।
प्रश्न खेत मजदूरों की ऋण ग्रस्तता के सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?

नागेन्द्रनाथ ओझा- उत्तर भारत में खेत मजदूर व छोटे किसान अपने ही गाँव के सूदखोरों के चंगुल में हैं। 90 प्रतिशत से अधिक खेत मजदूर जितना कमाते नहीं हैं उससे कहीं ज्यादा सूद बड़े किसानों व महाजनों के बही खातों में लिखा जाता है। खाने के लिए गेंहू भी वह बड़े किसानों व महाजनों से ड़ेी पर लेता है ड़ेी का मतलब होता ली गई वस्तु का छः महीने बाद ड़े गुना देना होता है। जोंक की तरह ये यह सूदखोर खेत मजदूरों का रक्त चूसते हैं।

प्रश्न मनरेगा के सम्बन्ध में आपको क्या कहना है?

नागेन्द्रनाथ ओझा- मनरेगा में खेत मजदूरों को 100 दिन का कार्य देने का कानून है। लेकिन पूरे देश में कोई भी ऐसा जिला नहीं है जिसने 100 दिन मजदूरों को कार्य दिया हो। 33 दिन ही कार्य देने का औसत है। न्यूनतम मजदूरी भी मनरेगा में लागू नहीं हो पा रही है। न्यूनतम खेत मजदूरी कुछ राज्यों में मनरेगा से भी कम मजदूरी है। सरकार ही न्यूनतम खेत मजदूरी अपने यहाँ लागू नहीं कर रही है।

प्रश्न खेत मजदूरों को संगठित करने के लिए अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन क्या कर रही है?

नागेन्द्रनाथ ओझा- खेत मजदूर यूनियन सम्पूर्ण भारत में खेत मजदूरों को संगठित करने का काम कर रही है। जगहजगह आन्दोलन चला रही है। खेत मजदूर यूनियन के नेतागण झोला डण्डा लेकर जिलों जिलों में जा रहे है॥ खेत मजदूरों का संगठित होने का आह्वाहन किया जा रहा है। मुझे पूरी उम्मीद है कि खेत मजदूरों को समस्याएँ उनके संघर्ष से ही हल होंगी। उक्त दिशा में सीमित साधनों के होने बावजूद सम्पूर्ण प्रयास जारी है।

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हिन्दुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है
लेकिन इन दोनों मुल्कों में अमरीका का डेरा है

ऐड की गंदम खाकर हमने कितने धोके खाए हैं
पूछ न हमने अमरीका के कितने नाज़ उठाए हैं

फिर भी अब तक वादी-ए-गुल को संगीनों ने घेरा है
हिन्दुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

खान बहादुर छोड़ना होगा अब तो साथ अँग्रेज़ों का
ता बह गरेबाँ आ पहुँचा है फिर से हाथ अंग्रेज़ों का

मैकमिलन तेरा न हुआ तो कैनेडी कब तेरा है
हिन्दुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

ये धरती है असल में प्यारे, मज़दूरों-दहक़ानों की
इस धरती पर चल न सकेगी मरज़ी चंद घरानों की

ज़ुल्म की रात रहेगी कब तक अब नज़दीक सवेरा है
हिन्दुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

-हबीब जालिब

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ज्योति बाबू ने अपने राजनीतिक कैरियर में त्याग, संघर्ष और कुर्बानी का जो जज्बा पैदा किया उसने हजारों युवाओं को शहरों से लेकर गांवों तक कम्युनिस्ट आंदोलन की कतारों में शामिल होने की प्रेरणा दी।इस तरह का प्रेरक संघर्षशील व्यक्तित्व विरल है। साम्प्रदायिक सदभाव और समानता की संवैधानिक समझ को उन्होंने राज्य प्रशासन के आम नजरिए में उतारकर नई मिसाल कायम की। वे साधारण मुख्यमंत्री नहीं थे,बल्कि क्षमता,विवेक और लोकतांत्रिक नजरिए के आदर्श प्रतीक थे वे लोकतंत्र के महान सपूत थे।लोकतंत्र में कोई कम्युनिस्ट जननायक हो सकता है यह चीज ईएमएस नम्बूदिरीपाद के बाद उन्होंने ही साबित की, इससे सारी दुनिया के मार्क्सवादियों को लोकतंत्र की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा मिली।

 

Jagadishwar Chaturvedi

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