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Archive for अगस्त, 2012

 

दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्श्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात

आज से 75 साल पहले सन 1936 में लखनऊ शहर प्रगतिषील लेखक संघ के प्रथम अधिवेषन का गवाह बना था, जिसकी गूंज आज तक सुनाई पड़ रही है। उसी प्रकार आज जो लखनऊ में ब्लॉग लेखकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है, इसकी गूंज भी आने वाले 75 सालों तक सुनाई पड़ेगी।

 

उपरोक्त विचार बली प्रेक्षागृह, कैसरबाग, लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत ने व्यक्त किये। सकारात्मक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देष्य से यह सम्मेलन तस्लीम एवं परिकल्पना समूह द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पूर्णिमा वर्मन (षारजाह) रवि रतलामी (भोपाल), षिखा वार्ष्णेय (लंदन), डॉ0 अरविंद मिश्र (वाराणसी), अविनाष वाचस्पति (दिल्ली), मनीष मिश्र (पुणे), इस्मत जैदी (गोवा), आदि ब्लॉगरों ने अपने उद्गार व्यक्त किये। कार्यक्रम को मुद्राराक्षस, शैलेन्द्र सागर, वीरेन्द्र यादव, राकेष, शकील सिद्दीकी, शहंषाह आलम, डॉ. सुभाष राय, डॉ. सुधाकर अदीब, विनय दास आदि वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी सम्बोधित किया।

मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि

मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि

वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इंटरनेट एक ऐसी तकनीक है, जो व्यक्ति को अभिव्यक्ति का जबरदस्त साधन उपलब्ध कराती है, लोगों में सकारात्मक भावना का विकास करती है, दुनिया के कोने-कोने में बैठे लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का अवसर उपलब्ध कराती है और सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों के विरूद्ध जागरूक करने का जरिया भी बनती है। इसकी पहुँच और प्रभाव इतना जबरदस्त है कि यह दूरियों को पाट देता है, संवाद को सरल बना देता है और संचार के उत्कृष्ट साधन के रूप में उभर कर सामने आता है। लेकिन इसके साथ ही साथ जब यह अभिव्यक्ति के विस्फोट के रूप में सामने आती है, तो उसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलते हैं। ये परिणाम हमें दंगों और पलायन के रूप में झेलने पड़ते हैं। यही कारण है कि जब तक यह सकारात्मक रूप में उपयोग में लाया जाता है, तो समाज के लिए अलादीन के चिराग की तरह काम करता है, लेकिन जब यही अवसर नकारात्मक स्वरूप अख्तियार कर लेता है, तो समाज में विद्वेष और घृणा की भावना पनपने लगती है और नतजीतन सरकारें बंदिषें का हंटर सामने लेकर सामने आ जाती हैं। लेकिन यदि रचनाकार अथवा लेखक सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इस इंटरनेट का उपयोग करे, तो कोई कारण नहीं कि उसके सामने किसी तरह का खतरा मंडराए। इससे समाज में प्रेम और सौहार्द्र का विकास भी होगा और देष तरक्की की सढ़ियाँ भी चढ़ सकेगा।

 

परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान
दशक के ब्लॉगर: (१) पूर्णिमा वर्मन (२) समीर लाल समीर (३) रवि रतलामी(४) रश्मि प्रभा (५) अविनाश वाचस्पति
दशक के ब्लॉग: (१) उड़न तश्तरी: ब्लॉगर समीर लाल समीर (२) ब्लोग्स इन मिडिया: ब्लॉगर बी एस पावला (३) नारी: ब्लॉगर रचना (४) साई ब्लॉगः ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र (५) साइंस ब्लोगर असोसिएशन: ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र डॉ जाकिर अली रजनीश
दशक के ब्लॉगर दंपति:
कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव
तस्लीम परिकल्पना सम्मान-2011

मुकेश कुमार सिन्हा, देवघर, झारखंड ( वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि) , संतोष त्रिवेदी, रायबरेली, उत्तर प्रदेश (वर्ष के उदीयमान ब्लॉगर), प्रेम जनमेजय, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार ),राजेश कुमारी, देहरादून, उत्तराखंड (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, यात्रा वृतांत ), नवीन प्रकाश,रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के युवा तकनीकी ब्लॉगर),अनीता मन्ना,कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),डॉ. मनीष मिश्र, कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),सीमा सहगल(रीवा,मध्यप्रदेश) रू रश्मि प्रभा ( वर्ष की श्रेष्ठ टिप्पणीकार, महिला ), शाहनवाज,दिल्ली (वर्ष के चर्चित ब्लॉगर, पुरुष ), डॉ जय प्रकाश तिवारी (वर्ष के यशस्वी ब्लॉगर),नीरज जाट, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, यात्रा वृतांत),गिरीश बिललोरे मुकुल,जबलपुर (मध्यप्रदेश) (वर्ष के श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर), दर्शन लाल बवेजा,यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक),शिखा वार्ष्णेय, लंदन ( वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, संस्मरण), इस्मत जैदी,पणजी (गोवा) (वर्ष का श्रेष्ठ गजलकार),राहुल सिंह, रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक),बाबूशा कोहली, लंदन (यूनाइटेड किंगडम) (वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री ), रंजना (रंजू) भाटिया,दिल्ली (वर्ष की चर्चित ब्लॉगर, महिला),सिद्धेश्वर सिंह, खटीमा (उत्तराखंड) (वर्ष के श्रेष्ठ अनुवादक), कैलाश चन्द्र शर्मा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ वाल कथा लेखक ),धीरेंद्र सिंह भदौरोया (वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार, पुरुष),शैलेश भारतवासी, दिल्ली (वर्ष के तकनीकी ब्लॉगर),अरविंद श्रीवास्तव, मधेपुरा (बिहार) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक),अजय कुमार झा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग खबरी),सुमित प्रताप सिंह, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ युवा व्यंग्यकार),रविन्द्र पुंज, यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के नवोदित ब्लॉगर), अर्चना चाव जी, इंदोर (एम पी) (वर्ष की श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर),पल्लवी सक्सेना,भोपाल (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, सकारात्मक पोस्ट) ,अपराजिता कल्याणी, पुणे (वर्ष की श्रेष्ठ युवा कवयित्री ) ,चंडी दत्त शुक्ल, जयपुर (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, कथा कहानी ),दिनेश कुमार माली,बलराजपुर (उड़ीसा) वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (संस्मरण ),डॉ रूप चंद शास्त्री मयंक (खटीमा) वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार, सुधा भार्गव,वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, डॉ हरीश अरोड़ा, दिल्ली ( वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक ) आदि

तस्लीम परिकल्पना विशेष ब्लॉग प्रतिभा सम्मान-2011

कुँवर कुसुमेश, लखनऊ, प्रीत अरोड़ा, चंडीगढ़, सुनीता शानू, दिल्ली, कनिष्क कश्यप, दिल्ली, निर्मल गुप्त, मेरठ, मुकेश कुमार तिवारी, इंदोर,अल्का सैनी,चंडीगढ़,प्रवीण त्रिवेदी, फ़तहपुर आदि

 

वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,डॉ अरविंद मिश्रा, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,डॉ अरविंद मिश्रा, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

इस अवसर पर देष के कोने-कोने से आए 200 से अधिक ब्लॉगर, लेखक, संस्कृतिकर्मी और विज्ञान संचारक भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में तीन चर्चा सत्रों (न्यू मीडिया की भाषाई चुनौतियाँ, न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार, हिन्दी ब्लॉगिंगः दषा, दिषा एवं दृष्टि) में रचनाकारों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगरों की सर्वसम्मति से सरकार से ब्लॉग अकादमी के गठन की मांग की, जिससे ब्लॉगरों को संरक्षण प्राप्त हो सके और वे समाज के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकें।

इस अवसर पर ‘वटवृक्ष‘ पत्रिका के ब्लॉगर दषक विषेषांक का लोकार्पण किया गया, जिसमें हिन्दी के सभी महत्वपूर्ण ब्लॉगरों के योगदान को रेखांकित किया गया है। इसके साथ ही साथ कार्यक्रम के सह संयोजक डॉ0 जाकिर अली रजनीष की पुस्तक ‘भारत के महान वैज्ञानिक‘ एवं अल्का सैनी के कहानी संग्रह ‘लाक्षागृह‘ तथा मनीष मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंगः स्वरूप व्याप्ति और संभावनाएं‘ का भी लोकार्पण इस अवसर पर किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ब्लॉग जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, बी एस पावला, रचना, डॉ अरविंद मिश्र, समीर लाल समीर, कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को ‘परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान‘ से विभूषित किया गया।

इसके साथ ही साथ अविनाश वाचस्पति को प्रब्लेस चिट्ठाकारिता शिखर सम्मान, रश्मि प्रभा को शमशेर जन्मशती काव्य सम्मान, डॉ सुभाष राय को अज्ञेय जन्मशती पत्रकारिता सम्मान, अरविंद श्रीवास्तव को

“लखनऊ में स्थापित होगा डॉ राम मनोहर लोहिया ब्लॉगर पीठ, इस आशय का प्रस्ताव संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने सभा पटल पर रखा जिसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। साथ इस अवसर पर रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगर कोश बनाने की बात कही ।”

केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती साहित्य सम्मान, शहंशाह आलम को गोपाल सिंह नेपाली जन्मशती काव्य सम्मान, शिखा वार्ष्णेय को जानकी बल्लभ शास्त्री स्मृति साहित्य सम्मान, गिरीश पंकज को श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य सम्मान, डॉ. जाकिर अली रजनीश को फैज अहमद फैज जन्मशती सम्मान तथा 51 अन्य ब्लॉगरों को ‘तस्लीम-परिकल्पना सम्मान‘ प्रदान किये गये।

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इतना ” सन्नाटा ” क्यों है , भाई
 
तू ज़िंदा है तो जिन्दगी की जीत पे यकीन कर ,
अगर कही है स्वर्ग तो उतर ला जमीन पर
ये गम के और चार दिन
सितम और चार दिन
ये दिन भी जायेंगे गुजर 
गुजर गये हजार दिन
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नजर …………………जिन्दगी के रंगमंच में एक अजीब सी सकशियत  थे ए . के .हंगल जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारतीय  रंगमंच को दिशा देने में लगा दिया | थियेटर की दुनिया के बेताज बादशाह को फिल्मो में अभिनय करना कुछ ख़ास पसंद नही था  |
ए . के हंगल ने फिल्मो में काम करके अभिनय को एक  नया आयाम दिया | रंगमंच से जुड़े होने के कारण हंगल के अभिनय में एक सहजता थी < जिसकी वजह से वह हर किरदार में ढल जाया करते थे | फिल्म शोले का वह संवाद ” इतना सन्नाटा क्यों है भाई ” फिल्म शोले में हंगल का किरदार बहुत बड़ा नही था , लेकिन नेत्रहीन बूढ़े के रूप में अपने पोते को खोने की आशंका से उनकी लरजती आवाज और बेचारगी के एहसास में बोला गया एक संवाद ”इतना सन्नाटा क्यों है भाई ” जैसे उन्हें एक नई पहचान दे गयी | अपनी आत्म कथा ”द लाइफ एंड टाइम आफ ए . के हंगल ” में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है की किस तरह वह न चाहते हुए भी फ़िल्मी दुनिया में आये और लगातार ” भले आदमी ” के किरदार से निजात पाने की कोशिश करते रहे , जिसमे उन्हें ज्यादा सफलता नही मिल पाई | हंगल ने लिखा है , ” मेरी फिल्मो में कैरियर बनाने की कोई इच्छा नही थी और मैं अपने थियेटर की दुनिया में खुश था | हालात कुछ ऐसे बने जिन्होंने मुझे फिल्मो में धकेल दिया हालाकि इसे लेकर मुझे कोई अफ़सोस नही है | मैं उस अन्जान सी दुनिया में पूरी तरह घुल मिल गया , जिसे लोग ” शो बिजनेस ‘ कहते है यहाँ कई साल गुजारने के वावजूद मुझे लगता है की मैं यह के लिए बेगाना हूँ | देश की स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाले अवतार किशन हंगल का जन्म 1 फरवरी 1917 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था | उनका बचपन पेशावर में गुजरा था | पेशावर में उन्होंने रंगमंच में कई बड़ी भूमिकाये निभाई | उनके पिता का नाम पंडित हरी किशन हंगल था | हंगल को अपना भविष्य दर्जी के काम में बनाने का फैसला किया था उन्हें परिवार के सदस्यों के विरोध का सामना करना पडा था | उनके पिता खासतौर पर इसके खिलाफ थे |
पेशावर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे अवतार विनीत किशन हंगल कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे | उन्होंने यूनियन गतिविधियों में खूब भाग लिया और गिरफ्तार भी हुए | पाकिस्तान की जेल में दो साल गुजारने के बाद 1949 में वह मुंबई आ गये |  उस समय उनकी उम्र 21 साल थी और जेब में जमा पूंजी के नाम पर 20 रूपये थे | हंगल इन्डियन पीपुल थियेटर एसोसिएसन से जुड़ गये और शुरू में बलराज साहनी और कैफ़ी आजमी जैसी शख्सियतो के साथ मंच साझा किया |हंगल ने 1966 में जब वे 50 वर्ष की उम्र में थे तब उन्होंने” तीसरी” कसम से अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की | इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुडकर नही देखा एक से बढकर एक किरदार निभाकर अपने अभिनय का लोहा मनवाया | श्री हंगल उस समय मुंबई में थे जब उन्हें दर्जी बनने का शौक जगा था | उस समय उन्होंने अभिनय की दुनिया की ओर रुख नही किया था | वह इंग्लैण्ड से प्रशिक्षित एक दर्जी से प्रशिक्ष्ण लेना चाहते थे लेकिन उनकी फ़ीस 500 रूपये थी | पांच सौ रूपये  उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी | उन्होंने फ़ीस की रकम जुटाने के लिए अपने पिता से मदद मांगी लेकिन स्वाभाविक था उन्होंने कोई जबाब नही दिया | इसके बाद जब श्री हंगल ने उन्हें कभी घर वापस न आने की धमकी दी तो पिता ने मजबूरन उन्हें फ़ीस के पैसे भेजे | श्री हंगल के मुताबिक़ इसके बाद उन्होंने टेलरिंग सीखी और सु जमाने में चार सौ रूपये कमाने लगे | हालाकि इस काम के लिए उन्हें घर से बगावत करनी पड़ी | फ़िल्मी दुनिया के इस बुजुर्ग अभिनेता  को 1993 में राजनितिक विवाद का कारण भी बनना पडा | दरअसल उन्होंने अपने जन्मस्थान की यात्रा करने के लिए पाकिस्तान का वीजा माँगा | उन्हें मुंबई स्थित पाकिस्तान वाणिज्य दूतावास से पाकिस्तानी दिवस समारोह में भाग लेने का निमंत्रण मिला और उन्होंने इसमें भाग लेकर शिव सेना के गुस्से को निमंत्रण दे डाला | शिवसेना प्रमुख ने उन्हें देशद्रोही तक कह डाला | इतने पुतले फुकने गये और इनकी फिल्मो के बहिष्कार की बात कही गयी 2006 में हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए पद्म विभुष्ण से सम्मानित किया गया | हालाकि अंतिम दिनों में हंगल ने मुफलिसी में दिन काट रहे थे |     आज के वर्तमान समाज में जो सच्चा कलाकार , कवि , चित्रकार होता है जो टा उम्र अपने उसूलो पे चलता है किसी से बिना समझौता किए उन सारे लोगो को अपनी जिन्दगी की आखरी शाम मुफलिसी में ही काटना होता है >………………………हंगल जैसे महान कलाकार की कमी सबसे ज्यादा इप्टा को खलेगी क्योंकि हंगल जैसे बडो की सरपरस्ती में इप्टा का तेवर आज के समय में निखर व तेजधार दार हथियार बन के आ रहा था | शत शत नमन ऐसे महान कलाकार को …..
..सुनील दत्ता
पत्रकार

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इप्टा के संस्थापक तथा सुप्रसिद्ध चरित्र अभिनेता श्री ए  के हंगल का देहांत आशा पारीख हॉस्पिटल मुंबई में हो गया. 1940 में बलराज सहनी के  साथ भारतीय जन नाट्य  संघ से जुड़े हुए थे। कैफ़ी आजमी क साथ भी रहे तथा आजीवन इस देश के मजदूरों किसानो क लिए लड़ते रहे. जनता की समस्यायों को नुक्कड़ नाटकों क माध्यम से उठाते रहे तथा एक पीढ़ी को तैयार किया जिसने इस देश के मजदूरों और किसानो के लिए होने वाले संघर्ष को समर्पित कर रखा है।
एके हंगल ने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम किया है. शोले फिल्म के मशहूर संवाद ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई’ को उन्होंने डायलॉग अदायगी के इतिहास में अमर कर दिया. हिंदी सिनेमा में उनकी यादगार चरित्र भूमिकाओं के लिए उन्हें पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था।
98 वर्षीय ए के हंगल अपने को अपने कार्य से विरत नहीं रखा वरन पिछले  वर्ष उन्होंने मधुबाला सीरियल में कार्य करना शुरू कर दिया था और आजीवन इप्टा से जुड़े रहे। भारतीय रंगमंच में उनका विशिष्ठ योगदान था। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे।
लोकसंघर्ष की तरफ से उनको विनम्र श्रद्धांजलि।

सुमन
लोकसंघर्ष

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असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल ?मुंबई हिंसा क्या इससे मूर्खतापूर्ण कुछ हो सकता था

पिछले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं कि इसकी परिणति मुंबई में हालिया (12 अगस्त 2012) हिंसा में हुई। ऐसा लगता है कि यह घटना, घटने का इंतजार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से बड़े पैमाने पर यह प्रचार किया जा रहा था कि पूरी दुनिया में मुसलमानों को मारा जा रहा है। बोडोमुस्लिम हिंसा और बर्मा में मारे जा रहे रोंहिग्या मुसलमानों के लिए लगभग हर मस्जिद में विशेष नमाज अदा की जा रही थीं और लाखों की संख्या में एसएमएस भेजे जा रहे थे। उर्दू अखबार ऐसे लेख प्रकाशित कर रहे थे जिनमें यह कहा गया था कि मुसलमानों को खत्म करने की विश्वव्यापी साजिश पर अमल हो रहा है। इनमें से अधिकांश लेख केवल भावनाओं को भड़काने वाले थे। उनमें घटनाओं के वस्तुपरक विश्लेषण के लिए कोई स्थान नहीं था।
मैंने मुंबई की उर्दू प्रेस में इस विेषय पर कोई गंभीर और विश्लेषणात्मक लेख नहीं देखा। मुस्लिम नेतृत्व, मुसलमानों के मन में यह धारणा उत्पन्न कर रहा था कि पूरी दुनिया मुसलमानों के पीछे पड़ी है। इससे उत्पन्न गुस्से को फूट पड़ने के लिए कोई बहाना भर चाहिए था। बर्मा में मुसलमानों के मारे जाने की तस्वीरों ने मुस्लिम युवकों को बहुत आहत किया। यहां यह कहना होगा कि इनमें से बहुत सी तस्वीरें नकली थीं परंतु उन्हें बड़े पैमाने पर इंटरनेट और सेलफोनों द्वारा पूरे देश में भेजा गया और इससे भावनाएं भड़कीं।
मुस्लिम नेतृत्व समुदाय की असली भलाई के लिए कभी कुछ नहीं करता। उसे केवल इस तरह के संवेदनशील मुद्दों की तलाश रहती है ताकि वह उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर सके। इस मामले में भी यही हुआ। आज़ाद मैदान में रैली के आयोजन की घोषणा मस्जिदों में की गई जिससे पूरे मसले पर धार्मिक रंग च़ गया। जो लोग मस्जिदों में नमाज प़ने जाते हैं, उनमें से बहुत से सहज विश्वासी होते हैं और ज्योंही किसी मुद्दे को धार्मिक कलेवर दिया जाता है, वे उस संबंध में अति संवेदनशील हो जाते हैं। रमजान के पवित्र महीने में मस्जिदों में नमाज प़ने वालों की संख्या में भारी वॢद्धि होती है।
मुसलमानों के धार्मिक नेता और कई सामाजिकराजनैतिक नेता भी, असम और बर्मा में क्या हो रहा है, उसके बारे में कुछ खास जानतेसमझते नहीं हैं। वे इन दोनों घटनाक्रमों को मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताते हैं। उन्हें इससे ज्यादा न कुछ मालूम है और न वे जानना चाहते हैं। आजाद मैदान में वक्ताओं ने अत्यंत भावनात्मक और भड़काऊ भाषण दिए। विशेषकर मीडिया पर यह आरोप लगाया गया कि उसने बर्मा में मुसलमानों की हत्याओं को पर्याप्त तरजीह नहीं दी। वक्ताओं ने अत्यंत उत्तेजनापूर्ण शब्दों का उपयोग, यह जानते हुए किया कि वहां मौजूद भारी भीड़ में हर तरह के लोग शामिल थे और उसमें असामाजिक तत्वों की भी कोई कमी नहीं थी। हिंसा भड़काने के लिए इतना काफी था।
यह सिर्फ भीड़ पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रश्न नहीं है। रैली के नेतृत्व का व्यवहार घोर गैरजिम्मेदारीपूर्ण था। उनका कहना था कि वे केवल 1500 के लगभग लोगों के इकट्ठा होने की उम्मीद कर रहे थे परंतु वहां 50,000 से ज्यादा लोग पहुंच गए। क्या केवल इसी तथ्य से उन्हें यह समझ में नहीं आना था कि इस मामले ने भावनात्मक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और भीड़ को अत्यंत समझदारी व परिपक्वता से संभाला जाना जरूरी है। कोई भी समझदार नेतृत्व इस तरह की बड़ी भीड़ के सामने भड़काऊ भाषण देने की इजाजत कभी नहीं देगा क्योंकि इससे भावनाओं के और अधिक भड़कने का खतरा रहता है।
आयोजकों के इस दावे में दम नहीं है कि उन्हें केवल 1500 लोगों के आने की उम्मीद थी। पिछले दोतीन शुक्रवारों से शहरभर की मस्जिदों में रैली के आयोजन की घोषणाएं की जा रहीं थीं और शहर के कई भागों में पोस्टर भी लगाए गए थे। साफ है कि आयोजक बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा करना चाहते थे और इसमें वे सफल भी रहे। बेहतर तो यह होता कि 1000,1500 ऐसे व्यक्ति, जो मुद्दे की गंभीरता और उसके सभी पहलुओ से वाकिफ हैं, आजाद मैदान पर दिन भर का धरना करते और शाम को मुख्यमंत्री या गृहमंत्री को अपनी मांगों के संबंध में ज्ञापन सौंपते। रैली आयोजित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
और अगर इतनी बड़ी रैली आयोजित की भी गई थी तो उसमें भावनात्मक भाषण क्यों दिए गए? क्या आयोजकों को मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा नहीं था? परंतु वह मुस्लिम नेतृत्व ही क्या जो लोगों की धिर्मक भावनाएं न भड़काए? जहां तक रैली के आयोजकों का संबंध है, उनमें से शायद मुट्ठीभर भी असम में हो रही हिंसा के पीछे के कारणों को समझते होंगे। वे केवल एक चीज जानते हैं और वह यह कि वहां मुसलमान मारे गए हैं और इस बात को वे तोते की तरह दुहराते रहते हैं।?
असम में बोडोमुस्लिम विवाद का इतिहास हमें समझना होगा। बोडो, मुसलमानों को इसलिए नहीं मार रहे हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं। वहां मूल विवाद जमीन का है। बोडो, आदिभाषियों, संथालों और अन्य समुदायों से भी संघर्षरत हैं। हालांकि यह सही नहीं है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी असम में घुस रहे हैं (यह केवल संघ परिवार का प्रचार है) परंतु दुर्भाग्यवश अपना बोडो राज्य कायम करने के लिए बोडो, इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल, बोडो क्षेत्रीय परिषद के अन्तर्गत चार जिलों से बंगाली मुसलमानों व अन्य गैरबोडो जातीय समूहों को खदेड़ने के लिए कर रहे हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में कांग्रेस सरकार की नीति है जिसने इस इलाके में शांति कायम करने की कीमत, बोडो क्षेत्रीय परिषद का गठन कर अदा की। बोडो अतिवादी समूहों से यह समझौता करने से पहले सरकार को अन्य जातीय समुदायों को विश्वास में लेना था और बोडो क्षेत्रीय परिषद में उन्हें पर्याप्त
प्रतिनिधित्व दिया जाना सुनिश्चित करना था। कोकराझार व अन्य जिलों में बोडोमुस्लिम दंगो के संबंध में पिछले लेख में हमनें प्रकाश डाला था।
जहां तक रोंहिग्या मुसलमानों का प्रश्न है, उन पर हो रही ज्यादतियों के लिए केवल और केवल बर्मा की सैनिक तानाशाह सरकार जिम्मेदार है। दंगों के बाद मैं रंगून गया था और वहां मेरी कई रोंहिंग्या मुसलमानों से लंबी चर्चा हुई थी। मुझे बताया गया था कि सन 1981 तक वहां कोई समस्या नहीं थी। रोहिंग्या मुसलमानों को मताधिकार प्राप्त था और उन्हें पूर्ण नागरिक माना जाता था। म्यंनमार की सैनिक तानाशाह सरकार ने अचानक और बिना कोई कारण बताए रोहिंग्या मुसलमानों से उनके नागरिकता संबंधी दस्तावेज छीन लिए और अब उन्हें पिश्चमी म्यंनमार के राखीने जिले से निकाल बाहर करने की कोशिश हो रही है।
मयंनमार की सरकार का यह कहना है कि ये मुसलमान विदेशी हैं और वह चाहती है कि बांग्लादेश उन्हें अपनी जमीन पर बसाए। यह पूरी तरह से अन्यायपूर्ण मांग है। रोंहिग्या मुसलमान उस इलाके में सदियों से रहे रहे हैं और उन्हें बाहरी बताए जाने का कोई आधार नहीं है। जहां तक मयंनमार की सैनिक सरकार का सवाल है, वह अन्य प्रान्तो में बर्मी मूल के लोगों पर भी अत्याचार कर रही है और प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों के बाद कई बौद्ध धर्मगुरूओं को भी मौत के घाट उतारा गया है। यह सही है कि कुछ बौद्ध धर्मगुरूओं ने अपने धर्मांवलम्बियों के प्रति एकता प्रदशिर्त करने के लिए राखीने जिले के मुसलमानों के खिलाफ पर्चे जारी किए हैं। उन्हें ऐसा कतई नहीं करना था। परंतु वे भी क्या करें। जैसा कि प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों से सिद्ध होता है, बौद्ध धर्मगुरूओं का भी राजनीतिकरण हो गया है। परंतु एक बात बिल्कुल साफ है। न तो असम और न ही रोहिंग्या मुसलमानों के मामले, मुसलमानों के खिलाफ किसी विश्वव्यापी षड़यंत्र का हिस्सा हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है।
मुंबई में मीडिया पर हमला किया गया और इसका एकमात्र कारण था भड़काऊ भाषण। यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण काम था। कोई भी समझदार नेतृत्व मीडिया को खुश रखने की कोशिश करता है न कि उसे नाराज करने की। दूसरे, मीडिया को इस तरह की हिंसा से दबाना असंभव है। इसके अलावा, पूरे मीडिया को एक रंग में रंगना भी गलत है। पिं्रट और इलेक्ट्रानिकदोनों मीडिया के विभिन्न संस्थानों की अलगअलग वैचारिक प्रतिबद्धताएं और व्यवसायिक मजबूरियां हैं। अगर मीडिया का एक हिस्सा मुसलमानों की समस्याओं को तरजीह नहीं देता या उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त है तो भी इस समस्या का इलाज पत्रकारों पर हमले कर और ओबी वैनों में आग लगाकर नहीं हो सकता। यह शुद्ध मूर्खता है।
उर्दू अखबार अक्सर लिखते हैं कि उलेमाकिराम (सम्मानीय उलेमा) को मुस्लिम उम्मा का पथप्रदशर्न और नेतृत्व करना चाहिए। उलेमा से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है जबकि उनमें से अधिकांश
आधुनिक दुनिया के बार में न के बराबर जानते हैं और धार्मिक भावनाएं भड़काना जिनकी मानसिकता का अंग होता है। कहने की जरूरत नहीं कि सभी उलेमा ऐसे नहीं हैं परंतु राजनैतिक मसलों में अधिकांश उलेमा या तो घोर अवसरवादी नीतियां अपनाते रहे हैं या आम मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुंबई की हिंसा रमजान के पवित्र महीने में हुई। उलेमा हमें यह बताते नहीं थकते कि रमजान के महीने में रोजे रखने का उद्धेश्य यह है कि हम अधिक धैर्यवान बनें और अपने गुस्से पर नियंत्रण पाना सीखें। ऐसा कहा जाता है कि इस पूरे माह को केवल इबादत करते हुए बिताना चाहिए अर्थात अल्लाह को याद करते हुए व गरीबों और कमजोरों के प्रति करूणाभाव रखकर उनकी मदद करते हुए। जब असम और बर्मा में कोई ताजी हिंसक घटनाएं नहीं हो रहीं थीं तब रमजान के पवित्र महीने में यह रैली आयोजित करने की जल्दी क्या थी। असम में हिंसा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया था और अब वहां चार हिंसा पीड़ित जिलों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों के लिए पैसे, वस्त्र, जूते व दवाईयां आदि इकट्ठा करने की जरूरत थी।
परोपकार के इस पवित्र महीने में ये नेता उन चार लाख लोगों के लिए मदद इकट्ठा कर सकते थे जो अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। मुसलमानों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में कई बोडो भी मारे गए हैं और कुछ शरणार्थी शिविरों में बोडो भी रह रहे हैं और उनकी हालत भी उतनी ही दयनीय है जितनी कि बांग्लाभाषी मुसलमानों की। एक सच्चे और दयावान मुसलमान की तरह इन नेताओं को बोडो शरणार्थियों के लिए भी मदद इकट्ठी करनी चाहिए थी। पवित्र कुरान हमसे यही अपेक्षा करती है। परंतु इसकी जगह उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ काल्पनिक विश्वव्यापी षड़यंत्र का प्रचार किया और बेजा हिंसा भड़काई।
अगर असम के घटनाक्रम को केवल मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताए जाने के स्थान पर बोडो की हत्या की भी निदां की जाती और उनकी भलाई के लिए भी प्रार्थना की जाती तो इस मुद्दे को भड़काऊ बनने से रोका जा सकता था। दूसरे, जो रैली आयोजित की गई थी, उसमें केवल मुसलमानों को बुलाया जाना गलत था। उसमें हिन्दुओं, ईसाईयों, बौद्घों और अन्य धमोर्ं के नेताओं को भी बुलाया जाना था जिससे रैली का चरित्र धर्मनिरपेक्ष बनता। यहां तो संकीर्णता की यह हद थी कि रैली का आयोजन रजा अकादमी द्वारा किया गया था जो कि बरेलवी मुसलमानों की प्रतिनिधि है। क्या इससे अधिक संकीर्णता कुछ हो सकती है? अगले दिन, उसी स्थान पर, देवबंदी मुसलमानों की विरोध रैली आयोजित थी, जो कि हिंसा के बाद रद्द कर दी गई।
अगर हम हिंसा के खिलाफ हैं तो इस मुद्दे पर हमें पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध होना चाहिए और हमें प्रत्येक समुदाय या वर्ग के खिलाफ हिंसा का विरोध करना चाहिए। इस मामले में संकीर्ण रूख अपनाने से काम नहीं चलेगा। अगर हम केवल किसी एक वर्ग के विरूद्ध हिंसा का विरोध करेंगे तो इससे जवाबी हिंसा भड़कने की आशंका बनी रहेगी। दूसरी ओर, यदि हम सभी वर्गों के साथ मिलकर, हर प्रकार की हिंसा का विरोध करेंगे तो इस विरोध का चरित्र न केवल प्रजातांत्रिक वरन अहिंसक बना रहेगा। एक वर्ग की संकीर्णता, दूसरे वर्ग की संकीर्णता को ब़ावा देती है। दूसरी ओर, उदार नजरिया अपनाने से हमें सभी का समर्थन और सहयोग प्राप्त होता है।
पुलिस का कहना है कि यह हिंसा सुनियोजित थी। इसका अर्थ यह है कि कई मुस्लिम युवक अब पुलिस की प्रताड़ना का शिकार बनेंगे। यह शर्मनाक है कि रैली में शामिल कई लोगों ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व्यवहार किया और उनके रिवाल्वर छीन लिए। इससे पुलिसकर्मियों के मन में प्रतिशोध का भाव जाग सकता है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि ऐसा न हो। यहां हमें पुलिस की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने धैर्य का परिचय दिया और पुलिस कमिश्नर अरूप पटनायक ने स्वयं रैली स्थल पर आकर मंच से रमजान के पवित्र महीने में धैर्य और शांति बनाए रखने की अपील की।
आईए, हम सब यह आशा करें कि सभी संबंधित पक्ष समझदारी और परिपक्वता से व्यवहार करेंगे और शांति भंग नहीं होने देंगे।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर

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फिलिस्तीन के साथ भूमंडलीय माध्यमों का रिश्ता बेहद जटिल एवं शत्रुतापूर्ण रहा है।कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिन पर ध्यान देने से शायद बात ज्यादा सफ़ाई से समझ में आ सकती है।ये तथ्य इजरायली माध्यम शोर्धकत्ताओं ने नबम्वर 2000 में प्रकाशित किए थे।
शोधकर्त्ताओं ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबर भेजने वाले संवाददाताओं का अध्ययन करने के बाद बताया कि इजरायल में 300 माध्यम संगठनों के प्रतिनिधि इस संघर्ष की खबर देने के लिए नियुक्त किए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में संवाददाता किसी मध्य-पूर्व में अन्य जगह नियुक्त नहीं हैं।
मिस्र में 120 विदेशी संवाददाता हैं।इनमें से दो-तिहाई पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका से आते हैं। इनमें ज्यादातर संवाददाता वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी से अंग्रेजी में खबर देते हैं।चूंकि खबर देने वाले संवादाता इजरायल में रहकर खबर देते हैं यही वजह है कि इनकी खबरें इजरायली दृष्टिकोण से भरी होती हैं।इनमें अधिकांश संवाददाता यहूदी हैं।ये वर्षों से इजरायल में रह रहे हैं।
औसतन प्रत्येक संवाददाता 10 वर्षों से इजरायल में रह रहा है।अनेक की इजरायली बीबियां हैं।अनेक स्थायी तौर पर ये काम कर रहे हैं।चूंकि इन संवाददाताओं की मानसिकता पश्चिमी है अत: इन्हें इजरायल से अपने को सहज में जोड़ने में परेशानी नहीं होती। 91प्रतिशत संवाददाताओं का मानना है कि उनकी इजरायल के बारे में ‘अच्छी'(गुड) समझ है।
इसके विपरीत 41 प्रतिशत का मानना है कि अरब देशों के बारे में उनकी ‘अच्छी’ (गुड) समझ है।35 प्रतिशत का मानना है कि उनकी ‘मीडियम’ समझ है।ये जूडिज्म के बारे में ज्यादा जानते हैं, 57 प्रतिशत ने कहा कि वे जूडीज्म के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।जबकि मात्र 10 फीसदी ने कहा कि वे इस्लाम के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।
ये संवाददाता अरबी की तुलना में हिब्रू अच्छी जानते हैं:54 फीसदी को हिब्रू की अच्छी जानकारी है जबकि 20 फीसदी को काम लायक ज्ञान है।इसके विपरीत मात्र 6 प्रतिशत को अरबी का अच्छा ज्ञान है।मात्र 42 फीसदी संवाददाताओं को अरबी थोड़ा सा ज्ञान है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी समाचार एजेन्सियों के लिए चंद इजरायली संवाददाता लिखते हैं। फिलिस्तीन के बारे में छठे-छमाहे खबर दी जाती है।फिलिस्तीन के बारे में उनके इलाकों में गए वगैर खबर देदी जाती है।सबसे बुरी बात यह कि इस इलाके में होने वाली घटना के बारे फिलिस्तीनियों की राय जानने की कोशिश तक नहीं की जाती।ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष की वस्तुगत प्रस्तुति संभव है।
भूमंडलीय माध्यम ज्यों ही आतंकवाद को इस्लामिक फंडामेंटलिज्म से जोड़कर बात करते हैं तो जाने-अनजाने इसके दुष्प्रभावों को दुनियाभर के मुसलमानों को झेलना पड़ता है। आतंकवाद चाहे वह किसी भी रुप में व्यक्त हो मूलत: राजनीतिक केटेगरी है। उसे धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है।
जब भी कहीं पर आतंकवादी हमला होता है तो तत्काल मुसलमानों से पूछा जाता है कि आपकी क्या राय है ?प्रश्न उठता है क्या माध्यम भी राय लेते समय धार्मिक अस्मिता का ख्याल करता है ? आमतौर पर भूमंडलीय माध्यम धार्मिक अस्मिता का ख्याल रखते हैं। इसके लिए वे स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों पर जोर देते हैं।स्टीरियोटाईय प्रस्तुतियों के माध्यम से उसकी वैचारिक प्रकृति को छिपाया जाता है।
इस तरह की प्रस्तुतियों में मुख्य जोर इस बात पर रहता है कि वह किसका एजेण्ट है ?जिसका एजेण्ट है उसने क्या दिया और क्या कहा ?ओसामा बिन लादेन के बारे में विभिन्न माध्यमों में जो जानकारियां पस्तुत की गयी हैं उनमें मूलत: इन्हीं बातों का विवरण है।इन पस्तुतियों से उसकी वैचारिक प्रकृति गायब है।
प्रसिध्द माध्यम विशेषज्ञ एम.सी.वासीउनी के अनुसार स्टीरियोटाईप इमेज अंतत: दर्शक और आतंकवादी के बीच सहिष्णुभाव पैदा करती है।इस तरह की प्रस्तुतियों का समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है।पहला,आतंक हिंसा की गतिविधियो को मिलने वाले महत्व से अन्य को वैसी ही कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करती है।
दूसरा,ज्यादा माध्यम कवरेज से यह संभव है कि राज्य के उत्पीड़न में इजाफा हो।यही स्थिति आतंकवादी पैदा करना चाहते हैं।इससे उन्हें अपने लक्ष्य के विस्तार में मदद मिलती है।इस तरह वे राज्य के उत्पीड़न को आमंत्रित करते हैं।जिसका आम जनता के ऊपर बुरा असर होता है।
तीसरा,आतंकवाद का नियमित या विस्तृत कवरेज आम जनता के अंदर भावशून्य स्थिति पैदा करता है।लेकिन कुछ माध्यम विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माध्यम कवरेज ‘सेफ्टी वाल्ब’ की भूमिका अदा करता है।
माध्यम कवरेज से पैदा होने वाली भावशून्यता से आम जनता में सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।वह आतंक और हिंसा को सच्चाई के रुप में देखने लगती है।नैतिक और राजनीतिक तौर पर उसके अन्दर प्रतिरोध का भाव खत्म होने लगता है।सामाजिक तौर पर भावशून्यता की स्थिति पैदा हो जाती है।यह वस्तुत: हिंसा की प्रकृति का विस्तार ही है।भावशून्यता की स्थिति पैदा करने में एक और तत्व मदद करता है वह है आतंकवादी को आतंकवादी की बजाय किसी और नाम से पुकारना।
मसलन् ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी न कहकर ‘जेहादी’ ,’फ्रीडम फाइटर’,’तालिबान’ या इसी तरह का कोई और नाम से जब पुकारा जाता है तो हम उसको जनता से जोड़ने और आतंकवादी गतिविधियों को वैधता प्रदान करने का काम करते हैं।इसी तरह यदि आतंकवादी को सामाजिक नियंत्रण से परे रुपायित किया जाये तब भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।
आतंकवादी गतिविधियों को अमूर्त या निर्वैयक्तिक रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।आतंकवादी कार्रवाई को सिर्फ ‘नुकसानदेह’ घटना के रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है। भावशून्य या संवेदनहीन हो जाने के कारण हिंसा का स्तर बढ़ जाता है,आतंकवादी प्रभाव में वृध्दि हो जाती है,पहले से ज्यादा लोग शिरकत करने लगते हैं।
आतंकवादी हिंसा का एक सिरा हिंसाचार से जुड़ा है तो दूसरा सिरा माध्यमों में प्रस्तुत हिंसा एवं आतंक के कार्यक्रमों से जुड़ा है।आतंकवाद पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरुरी है कि जनमाध्यमों में धर्म,हिंसा और आतंक के कार्यक्रमों पर अंकुश लगाना जरुरी है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के वैचारिक स्रोत पर भी पाबंदी लगाने के बारे में विचार किया जाना चाहिए।वे तमाम कार्यक्रम जो पुरानी मान्यताओं,आचार-व्यवहार,संस्कारों आदि को धारावाहिकों के जरिए प्रसारित करते हैं उनसे आतंकवाद और तत्ववाद को वैचारिक मदद मिलती है। जब तक इस क्षेत्र में प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते तब तक आतंकवाद या तत्ववाद को वैचारिक तौर पर परास्त करना असंभव है।संस्कृति-उद्योग के विकास की गति देखते हुए और बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों को देखते हुए यह कार्य असंभव लग रहा है। फिर भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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सूखे पर सरकारी बयानों और राहत के प्रयासों का सूखा और ज्यादा है | इसे देखकर तो यह लगता है की देश की केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे तो एक देश की है और सूखा किसी दूसरे देश में पडा है | किसी प्रांत की सरकार ने अब तक अपने प्रांत को सूखाग्रस्त घोषित नही किया है |
देश — प्रदेश सूखे की भयंकर चपेट में है | यह लेख लिखने तक खबरों के अनुसार प्रदेश व देश के अनेक भू– भागो में खासकर उत्तरी हिस्सों में औसत से बहुत कम वर्षा हुई है| इसे समाचार पत्रों में औसत वर्षा का 40 प्रतिशत बताया जा रहा है | हालाकि दर — हकीकत में यह उतनी भी नही है | किसानो ने धान की बोआई — रोपाई का काम घटाकर एक तिहाई कर दिया है | लेकिन इस भयंकर सूखे की चिंता चर्चा केवल गाँवों में है , किसानो में है | बाकी सब चिंता मुक्त है | शहरी आबादी में चिंता है तो गर्मी की , पानी बिजली की ,कमी की | सूखे की कोई चिंता नही | सत्ता पक्ष एवं विपक्ष में बैठती रही राजनितिक पार्टियों के उच्च स्तरीय नेताओं , शासन — प्रशासन में बैठे अधिकारियों तथा प्रचार माध्यमी स्तम्भों के यहा तो वर्षा सदाबहार चल रहा है | उनके लिए हर मौसम हर जगह ए. सी . है | इनके लिए कई दशको से खासकर पिछले दो दशको से मौसम लगातार खुशगवार बनता गया है | बेहतर से बेहतर होता गया है | कमोवेश यही स्थिति अधिकाधिक कमाई में लगे आम समाज के सुविधापरस्त मध्य वर्गियो की है | इसमें आम समाज में रहने वाले धनी व्यपारी , अधिकाधिक आमदनियो एवं सुविधाओं का उपभोग कर रहे है चिकित्सक अपेक्षा कृत छोटे स्तर के अधिकारी , उच्च स्तरीय वेतन व आमदनियो पाने वाले अध्यापक , अधिवक्ता व अन्य पेशो के ऐसे ही उच्च परन्तु आम सामाजिक हिस्से शामिल है | इनके यहा भी सालो साल सदाबहार चल रहा है | इस हिस्से का जीवन भी मौसमी मार्या उतार — चढ़ाव से फिलहाल मुक्त है | इसके अलावा इन सभी आम व खास सामाजिक हिस्सों के उपर बैठे
धन कुबेर राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का तो पूछना ही क्या ? उनका सूरज तो दिन रात चमक रहा है | उन्होंने अपने धन पूंजी की ताकत से देश —
दुनिया का पूरा माहौल ही अपने अनुकूल बनवा लिया है | इनके राजनितिक एवं गैर राजनितिक उच्च वर्गीय सेवक देश दुनिया की हर प्रतिकूल परिस्थितियों को धन कुबेरों के स्वार्थो हितो के अधिकाधिक अनुकूल बनाने में लगे है | इन सदाबहार हिस्सों को ही अपनी चर्चा प्रचार का प्रमुख हिस्सा मानने वाले प्रचार माध्यम जगत इन्ही को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करके स्वंय भी इस सदाबहार टोली का हिस्सा बने हुए है |इसीलिए सूखे की भयंकर स्थितियों के वावजूद सूखे पर कही कोई गंभीर चिंता चर्चा नही है | जो चर्चा है वह मौसम की है |

मानसून की बेरुखी की है | कई सालो की वर्षा व फसलो के आंकड़ो की है | लेकिन किसानो , ग्रामीणों उनके मवेशियों की खेती — किसानी और उस पर आधारित जनजीवन की जीविकोपार्जन के संकटों की कही कोई गम्भीर चर्चा नही है | सूखे पर प्रचार माध्यमी खबरों को देख सुनकर ऐसा लगता है मानो मौसम का हाल सुनाया
जा रहा हो | जिसका कोई ख़ास मायने — मतलब नही है उसका कोई ख़ास प्रभाव राष्ट्र व समाज के जनजीवन पर पड़ने वाला न हो | फिर इस सूखे के साथ ही सूखे पर सरकारी बयानों और राहत के प्रयासों का अभाव या सुखा और ज्यादा है | इसे देखकर तो यह लगता है की देश की केन्द्रीय सरकारे तो एक देश की है और सुखा किसी दूसरे देश में पडा है | किसी प्रांत की सरकार ने अब तक अपने प्रांत को सूखाग्रस्त घोषित नही किया है |

वस्तुत: स्थिति है भी ऐसी ही | सदाबहार हिस्सों ने इस देश की आम व्यवस्था से अपना अलगाव कर लिया है | और अपना सदाबहार देश और उसकी स्दाभारी व्यवस्था खड़ी कर ली है | इसीलिए 15 सालो में होती रही 2.5 लाख से अधिक किसानो की आत्महत्याए हमारे सदाबहार हिस्सों के लिए कोई मायने नही रखती | इस सदाबहार
हिस्से के राजनितिक , अर्थशास्त्री ,और अन्य प्रचार माध्यमी विद्वान् कृषि क्षेत्र को , उसमे लगी देश की आधी आबादी के जीवन व जीविकापार्जन को नही देखते न ही वे कृषि क्षेत्र को देश की समूची आबादी के भरण — पोषण की अपरिहार्य आवश्यकता से जोडकर ही देखते है | बल्कि वे उसे देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखते | बल्कि वे उसे देश की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी से यानी देश के सकल घरेलू उत्पाद से देखते – नापते है | वे अपने
भाषणों , प्रचारों लेखो में इस बात को बराबर कहते रहते है की देश की आर्थिक वृद्धि व विकास के साथ अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान घटते — घटते अब केवल 15 प्रतिशत रह गया है | उसकी जगह पर उद्योग वाणिज्य , व्यापार तथा सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जा रहा है | इसे आगे करके ही वे कृषि क्षेत्र को और ज्यादा उपेक्षित करने का काम करते व बढाते जा रहे है | वैसे सही बात तो यह है की कृषि क्षेत्र को योजनाबद्ध रूप में उपेक्षित करके ही अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र के योगदान को घटाया गया है | इसी के तहत कृषि क्षेत्र की सहायताओ — योजनाओं तथा प्रोग्रामो को काटने घटाने के साथ छूटो — अनुदानों को भी काटने घटाने का काम निरंतर किया जाता रहा है |

इन सहायताओ ,छूटो , प्रोत्साहनो को काटकर उसे बड़े व निजी उद्योगों व प्यापार के क्षेत्रो को देने का काम लगातार किया जाता रहा है | इसी के जरिये अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान घटाया जा रहा है | सूखे के
संदर्भ में इस घटाव का एक ज्वलंत उदाहरण यह है की — देश के 60 सालो की
आर्थिक वृद्धि व विकास और खासकर 20 सालो के तीव्र आर्थिक तकनीकी वृद्धि के वावजूद देश की 60 प्रतिशत उपजाऊ जमीन अपेक्षित सिंचाई के लिए मानसूनी वर्षा पर निर्भर है | बहुप्रचारित आधुनिक तकनीक के इस युग में तथा सडको , रेलवे लाइनों , स्टेशनों , हवाई अड्डो बन्दरगाहो
,तकनीकी वृद्धि के वावजूद देश की 60 प्रतिशत उपजाऊ जमीन अपेक्षित सिंचाई के लिए मानसूनी वर्षा पर निर्भर है | बहुप्रचारित आधुनिक तकनीक के इस युग
में तथा सडको , रेलवे लाइनों , स्टेशनों , हवाई अड्डो बन्दरगाहो आदि के रूप में अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढाचे के तीव्र विकास के इस दौर में कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढाचे के विकास का यानी सार्वजनिक सिंचाई के विकास का
नाम तक नही लिया गया है | खासकर 25 सालो में सिंचाई व्यवस्था को किसानो के निजी साधनों के उपर ही छोड़ने का काम किया जाता रहा है | इसी लक्ष्य से १९८५ के बाद से कृषि क्षेत्र के इस बुनियादी विकास को अर्थात सार्वजनिक सिंचाई के साधनों के विकास विस्तार को धीरे — धीरे करके काटने और छोड़ने का काम भी
लगातार किया जाता रहा है | ऐसी हालात में वर्षा कम होने या बहुत होने के फलस्वरूप खेती के सूखने 30 — 40 प्रतिशत तक धान की रोपाई हो पाने का दोष किसे दिया जाना चाहिए ?मानसून को ? या 20 सालो से सदाबहारी बनकर किसान और किसानी को उपेक्षित करने करवाने वाके देश के धनाढ्य , उच्च एवं सुविधा भोगी हिस्सों को और उनकी सेवा में जुटी हुई केन्द्रीय प्रांतीय सरकारों को ?
2 –3 साल बाद एक दो सीजन में वर्षा न होने से सूखे की भयावह स्थिति के लिए मानसून नही बल्कि सिंचाई की सार्वजनिक उपेक्षा , बदहाली व बदइन्तजामी को ही दोषी मान व बताया जाना चाहिए | इसके लिए केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारों से लेकर राष्ट्र व समाज को लेकर इस धनाढ्य व उच्च हिस्सों को ही केवल दोषी नही अपितु अपराधी भी मना जाना चाहिए | इनके इस अपराध का सबूत सूखे पर इनकी चुप्पी , सूखे पर चिंताओं चर्चाओं के अभाव के रूप में स्पष्टत: देखा जा सकता है |
इसीलिए सूखे पर किसान अपने खेत व खेती के लिए स्वंय से जो कुछ कर सकता है उसे तो करेगा ही लेकिन असली मुद्दा यह है की किसान व ग्रामीण समुदाय अपने निजी साधनों पर सिंचाई की निर्भरता की जगह सरकार से सार्वजनिक सिंचाई की माँग उठाने के लिए उसे संगठित होने का प्रयास करेगा या नही ? यह किसानो के लिए महज आवश्यक ही नही बल्कि अपरिहार्य है की वे इसके लिए आगे आये | बार बार के सूखे से निजात पाने के लिए किसानो को इस दिशा में बढना ही होगा साथ ही खाद्यानो की महगाई झेल रही ग्रामीण व शहरी मजदूरों से लेकर कस्बाई व शहरी जनता को भी इस समस्या के लिए किसानो को इस अन्य न्याय स्संग्त मांगो के साथ खड़ा होना चाहिए जनसाधारण को मानसून की कमी के प्रचारों में ही फंसे रहने से अपने दिलो दिमाग को मुक्त करना होगा सचेत होना होगा |
सुनील दत्ता ,
पत्रकार

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कुछ साथियों की धारणा है कि कालक्रम में उद्योग और कृषि के बीच के तथा मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के न केवल मूलभूत विभेद समाप्त हो जाएँगे बल्कि उनके बीच के सभी विभेद समाप्त हो जाएँगे। यह सही नहीं है। कृषि और उद्योग के मूलभूत विभेदों की समाप्ति से उनके बीच के सभी विभेदों का अंत नहीं होगा। उद्योग और कृषि के कामों की स्थितियों में भिन्नता के चलते कुछ ऐसे विभेद, जो मूलभूत नहीं हो सकते हैं, अवश्य ही आगे बने रहेंगे। उद्योग में भी श्रम की स्थितियाँ इसकी सभी प्रशाखाओं के समान नहीं है। उदाहरण के लिए कोयला मजदूरों की श्रम स्थिति मशीनीकृत जूता कारखाने में काम करने वालों की श्रम स्थिति से भिन्न हैं। इसी तरह कच्चा लोहा के खनिज मजदूरों की श्रम स्थिति अभियंत्रण उद्योग में कार्यरत मजदूरों की श्रमस्थिति से भिन्न होती है। अगर उद्योग के अंदर विभिन्न प्रशाखाओं की श्रम स्थितियों में भिन्नता है तो फिर उद्योग और कृषि के बीच निश्चय ही कुछ ज्यादा भिन्नताएँ होंगी।
निश्चय ही ऐसा शारीरिक और मानसिक श्रम के विभेदों के बारे में भी कहा जाएगा। इनके बीच के मूलभूत विभेद और इनके सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर का फर्क निश्चिय ही मिट जायगा। किन्तु कुछ विभेद जो मूलभूत नहीं होंगे (गौण प्रकृति के विभेद) बने रहेंगे। ऐसा इसलिए रहेगा क्योंकि प्रबंधन कर्मियों और मजदूरों की श्रम स्थितियाँ जब भी बिल्कुल एक समान नहीं रहेंगी।
कुछ कामरेड जो इसके विपरीत धारणा रखते हैं, वे शायद मेरे पूर्व के कतिपय बयानों को आधार बना रहे हों जिनमें, उद्योग और कृषि के बीच तथा मानसिक एवं शारीरिक श्रम के बीच के विभेदों के विलोपन की अवधारणा व्यक्त की गई है, इसके बारे में अब बिना किसी हिचक के स्पष्टता के साथ कहा जाना चाहिए कि उसका जो अर्थ है, वह यह कि मूलभूत विभेदों का विलोपन न कि सभी प्रकार के विभेदों का। मेरी अवधारणा को उन कामरेडों ने ठोस रूप में समझा कि यह सभी प्रकार के विभेदों की समाप्ति पर लागू है। कामरेडों ने इसे उस रूप में समझा यह साबित करता है किमेरी उन अवधारणाओं की अभिव्यक्ति सुस्पष्ट नहीं थी और इसलिए असंतोष जनक थी। अब उसे निश्चय ही छोड़ दिया जाना चाहिए और उसकी जगह यह अवधारणा बनानी चाहिए जो बताती है कि उद्योग और कृषि तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेदों का विलोपन होता है और गैर मूलभूत (अर्थात गौण) विभेदों की अवस्थिति कायम रहती है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्यनारायणठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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अब अगर ब्रिटेन के इस एकाधिकारी लूट – पाट एवं प्रभुत्व के संबंधो से अलग करके अंग्रेजो द्वारा ब्रिटिश राज की स्थापना एवं संचालन को ही देश की गुलामी मान लिया जाय तो इससे गुलामी के मूल सम्बन्ध छिपने ही नही जायेंगे , चर्चा तक में नही आयेंगे | फलत: ये सम्बन्ध छिप ही नही जायेंगे बल्कि विरोध से बच जायेंगे और ज्यो के त्यों बने रहेंगे | 1947 में यही हुआ है |
राज के संचालन से अंग्रेजो के हटने और उस राज पर हिन्दुस्तानियों के चढने को ही परतंत्रता का अन्त और स्वतंत्रता का शुभारम्भ घोषित कर दिया गया | मुख्यत: इसीलिए ब्रिटेन और ब्रिटेन की कम्पनियों के साथ बने संबंधो को संचालित करने वाले राज का ढाचा भी जस का तस रह गया | उसमे मुख्य परिवर्तन हुआ तो यही की उसके मुख्य संचालक अब अंग्रेज नही बल्कि भारतीय थे | उच्च अफसरशाही में अंग्रेज नही बल्कि भारतीय बैठे हुए थे | इस राज के मूल ढाचे को ज्यो का त्यों बने रहने का एक बड़ा सबूत यह भी है अभी भी सारे प्रमुख या बुनियादी कानून ब्रिटिश दासता के काल के ही बने हुए है और लागू भी है | कोई भी समझ सकता है की कानून का राज कहे जाने वाले आधुनिक भारतीय राज में अगर मूल या प्रमुख कानून ही दासता के काल के हो तो उसे स्वतंत्र और जनतांत्रिक राज कहना या बताना न्याय संगत नही कहा जा सकता |
इसलिए आँखे मूंदकर 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता को मनाने या मानने की जगह अब यह अहम सवाल खड़ा होना चाहिए की 1947 में ब्रिटेन के साथ लूट व दस्ता के आर्थिक संबंधो को बनाये रखकर फिर ब्रिटिश राज उसके शासन — प्रशासन के मूल ढाचे को , उसे संचालित करने वाले प्रमुख कानूनों को बनाये रखकर 1947 में घोषित स्वतंत्रता को क्या राष्ट्र की स्वतंत्रता माना जाए ? या स्वतंत्रता के रूप में छिपी परतंत्रता ? देश का धनाढ्य वर्ग , कम्पनिया और देश का उच्च हुकुमती तथा गैर हुकुमती हिस्सा इसे स्वतंत्रता मानता है , क्योकि उसे राज के संचालन नियंत्रण से लेकर देश के संसाधनों की लूट का प्रभुत्व अधिकार मिल गया है | ब्रिटिश राज के रहते ही इस देश की धनाढ्य कम्पनियों को तथा उच्च हिस्सों को ( खासकर 1920 के बाद से ) ये अधिकार बढ़ते रहे थे जो 1947 में ब्रिटिश सरकार के आसन पर चढने के साथ परिपूर्ण हो गये | आपसी समझौते से मिली इस स्वतंत्रता में सत्ताधारी , भारतीयों को ये अधिकार ब्रिटेन के साथ ब्रिटिश दासता के समय में बनते बढ़ते रहे आर्थिक , राजनितिक , सामाजिक , सांस्कृतिक संबंधो को बनाये रखने के लिए ही मिले थे | यही सम्बन्ध बाद के दौर में अमेरिका और अन्य साम्राज्यी देशो से भी बढ़ते रहे है | इसके फलस्वरूप इस देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा साम्राज्यी देशो के सहयोग व साठगाठ से और ज्यादा धनाढ्य एवं अधिकार सम्पन्न होता गया है | लेकिन इन्ही स्थितियों एवं संबंधो खासकर आर्थिक , कुटनीतिक संबंधो के चलते जनसाधारण हिस्से की बुनियादी समस्याए — महगाई , बेकारी से लेकर साधन — हीनता , अधिकारहीनता की समस्याए प्रत्यक्ष ब्रिटिश दासता काल से लेकर आज तक न केवल विभिन्न रूपों में बढती भी रही है | इन संबंधो में जीते — मरते हुए कोई भी गम्भीर व समझदार आदमी जनसाधारण के लिए इसके निरंतर बदतर होती दिशा या कहिये जन्घाती दिशा का पूर्वानुमान लगा सकता है | ऐसी स्थिति में जन साधारण 1947 की स्वतंत्रता को ज्यादा से ज्यादा ऐसी आशिक स्वतंत्रता कह सकता है , जिसके भीतर परतंत्रता के मूल सम्बन्ध मौजूद थे व है | बाद के दौर में और वे बढ़ते भी रहे है | इसीलिए ब्रिटिश काल से आज तक चली आ रही अपनी इस परतंत्रता तथा संकटों से युक्त अपनी स्थितियों को बदलने के लिए भी तथा 1947 की स्वतंत्रता को पूर्ण स्वतंत्रता में बदलने के लिए भी देश के इसी जनसाधारण को अपरिहार्यत:खड़ा होना पडेगा | इसके लिए अब साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |

सुनील दत्ता ….पत्रकार

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1947 में अंग्रेजो द्वारा बनाये गये राज शासन – प्रशासन के संचालन व नियंत्रण के अधिकार हिन्दुस्तानियों के हाथ में आ जाने को ही राष्ट्र की स्वतंत्रता का द्योतक माना जाता है | क्योंकि राष्ट्र की परतंत्रता या गुलामी को मुख्यत: ब्रिटिश राज और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभुत्व में ही निहित माना जाता था व है | इसे मानने को दो तीन प्रमुख कारण है | पहला तो किसी क्षेत्र या राष्ट्र का राज्य ही उसका सर्व प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नजर आता है | चाहे वह सामन्ती रहा ब्रिटिश राज हो या चाहे किसी देश का स्वतंत्र माना जाने वाला वर्तमान दौर जैसा जनतांत्रिक राज हो | इसका दुसरा कारण यह है ब्रिटिश राज ही ब्रिटेन द्वारा देश की श्रम संपदा की लूट- पाट को संचालित करने के साथ इसके विरोध के राष्ट्रव्यापी दमन का काम प्रत्यक्षत: करता रहा था | उसके लिए नीतियों और कानूनों को लागू करता रहा था | इसका तीसरा कारण खुद इस राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में लगी रही शक्तियों के एक हिस्से द्वारा लगातार किया जाता रहा यह प्रचार की राज्य का संचालन अंग्रेजो के हाथ से देशवासियों के हाथ में आते ही यह राष्ट्र स्वतंत्र हो जाएगा | जैसा की 1947 के बाद कहा और मान गया |

इन तीनो प्रमुख कारणों के चलते राज व शासन प्रशासन से हटते ही इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र मान लिया | सवाल है की क्या ऐसा मानना ठीक है ? अशत: जाहिरा तौर पर तो ठीक है , लेकिन दरअसल व मुकम्मल तौर पर इसे राष्ट्र की स्वतंत्रता मानना गलत है भ्रामक है | क्योंकि किसी भी परतंत्र व्यक्ति , वर्ग या राष्ट्र की परतंत्रता उसको परतंत्र बनाने वाली द्रश्य या अदृश्य शक्ति में नही है , बल्कि मुख्यत: उन उद्देश्यों व संबंधो में निहित होती है जो उसे परतंत्र बनाने के लिए बनाये गये होते है | इसलिए ब्रिटिश काल में इस देश की परतंत्रता को जानने समझने के लिए ब्रिटेन द्वारा इस देश के साथ बनाये गये संबंधो और उद्देश्यों को
जरुर देखा जाना चाहिए |

सभी जानते है की ब्रिटेन के साथ इस राष्ट्र के दासता के संबंधो की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी | यह उसके विश्वव्यापी बाजार और उस पर एकाधिकार के प्रयासों का ही एक हिस्सा था , ताकि कम्पनी अपने व्यापार , बाजार व लाभ — मुनाफे का निरंतर विस्तार कर सके | कम्पनी ने इस देश के साथ सम्बन्ध बढाने के साथ — साथ उस पर एकाधिकार स्थापित करने में आई हर बाधा को हटाने के लिए सैन्य कारवाइयो को चलाते रहने का भी काम निरन्तर किया | इसी के अंतर्गत उसने सबसे पहले 1757 में बंगाल में छोटे से इलाके में
कम्पनी राज स्थापित किया | फिर बाद में शासन प्रशासन में बदलाव , सुधारों को निरंतर आआगे बढाते हए कम्पनी ने अपने व्यापार के साथ राज्य का विस्तार जारी रखा | कम्पनी ने यह काम पूरे देश की व्यापारिक लूट – पाट के लिए तथा अपने फ्रांसीसी , डच ,जैसे विदेशी व्यापारिक विरोधियो को यहाँ से भगाने के लिए और राजाओं , नबावो द्वारा खड़े किए जाते रहे विरोधो — प्रतिरोधो को खत्म कर देने के लिए किया था | साफ़ बात है की ईस्ट इंडिया कम्पनी वाला ब्रिटिश राज या 1857 के बाद का ब्रिटिश साम्राज्यी राज ब्रिटेन के साथ बने
इन उन संबंधो के बुनियाद में नही था | उसकी बुनियाद तो ब्रिटिश कम्पनी और 1840 के बाद से खासकर 1857 के बाद सभी ब्रिटिश कम्पनियों के व्यापारिक और फिर औद्योगिक व महाजनी लूटपाट के लिए बनाये व बढाये गये आर्थिक संबंधो में निहित थी | कम्पनी यहा के उत्पादनों को कच्चे मालो को तथा श्रम शक्ति को
सस्ते में खरीदने और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशो के उत्पादन को ऊँचे मूल्यों पर बेच करके भारी लाभ लुटने के व्यापारिक सम्बन्ध शुरू से ही अर्थात अपने राज्य की स्थापना के पहले से ही बनाती रही | बाद में वह देश के समूचे बाजार पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आगे बढाने के साथ देश के कच्चे माल के स्रोतों पर भी लगातार कब्जा जमाती बढाती रही | अपने उद्योग व्यापार के लिए नए किस्म के कच्चे — पक्के मालो का उत्पादन करवाती रही | नील , अफीम कपास तम्बाकू आदि की खेतियो को बढावा देकर स्थानीय एवं परम्परागत खेतियो को तोड़ने का काम करती रही | दस्तकारियो को नष्ट करने का भी काम किया | इस सारे काम में कम्पनी राज या 1857के बाद ब्रिटेन की संसद सवारा संचालित ब्रिटिश राज , ब्रिटिश कम्पनियों की व्यापारिक लूट व प्रभुत्व के संबंधो को बनाने बढाने एवं चलाने में सहयोग करता रहा | यह राज खुद भी लगान तथा टैक्सों करो आदि के जरिये इस देश की जनता की लूट को उन पर ब्रिटेन के प्रभुत्व व दासता को बढाता रहा | इसके फलस्वरूप और देश के बाजार पर देश की श्रम संपदा पर ब्रिटिश कम्पनियों का और ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित होता रहा |बीसवी शताब्दी अर्थात १९०० की शुरुआत से इन लूट के संबंधो में व्यापारिक औद्योगिक शोषण लूट के साथ महाजनी लूट का सम्बन्ध भी जुड़ गया | अब ब्रिटेन से मालो मशीनों तकनीको के इस देश में निर्यात के साथ पूंजी का भी निर्यात होने लगा | ब्रिटेन के विशाल बैंको व उद्योगों की सम्मलित पूंजी ने इस देश के विभिन्न क्षेत्रो में माल मशीन तकनीक के बिक्री बाजार से भारी लाभ कमाने के साथ देश की श्रम संपदा से सूद दर सूद कमाने का महाजनी सम्बन्ध भी बना लिए | इन्ही संबंधो में ब्रिटिश कम्पनिया लाभ सूद के साथ ब्रिटेन की औध्यिगिक जरूरतों के साथ आम उपभोग के मालो सामानों को भी इस देश से ले जाती रही है | फलस्वरूप ब्रिटेन को धनाढ्य , विकसित था साधन सिविधा व शक्ति सम्पन्न बनाती रही तो इस देश को पराधीन , परनिर्भर , पिछड़ा . गरीब व कमजोर बनाती रही |
मुल्त: इन्ही संबंधो को बढाने व मजबूत करने के लिए ही ब्रिटेन से आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति का भी निर्यात किया जाता रहा | और उसके प्रभाव प्रभुत्व को भी इस देश पर फैलाया , बढाया जाता रहा | स्पष्ट बात है की ब्रिटिश राज को स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेजो ने इस देश को अपना गुलाम नही बनाया था , बल्कि मुख्यत: अपने व्यापारिक , औद्योगिक व महाजनी लूट पाट के लिए तथा इस देश के बाजार से लेकर श्रम संपदा पर एकाधिकार प्रभुत्व जमाने के लिए इस देश को पराधीन बनाया था | लूट के इन संबंधो को संचालित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही ब्रिटिश राज को , शासन प्रशासन व सैन्य व्यवस्था को स्थापित किया था | इसी के लिए ब्रिटिश राज व शासन — प्रशासन ने शताब्दियों तक इस देश में एक के बाद एक नीतियों , कानूनों को बनाया व लागू किया | इनका विरोध करने वाले देशवासियों एवं राष्ट्रवादियो को ब्रिटिश राज अपने पूरे दौर में हर तरह के जुल्म व अत्याचार का शिकार बनाता रहा।
क्रमश:

-सुनील दत्ता
पत्रकार

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शहर और देहात तथा मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के पारस्परिक विरोध का विलोपन और उनके बीच के विभेदों का अंत

यह शीर्षक ढेर सारी समस्याओं को समेटता है जो तात्विक रूप से एक दूसरे से भिन्न हैं। मैंने उन्हें एक साथ कर दिया है, इसलिए नहीं कि हम उनका घोरमठ्ठा करना चाहते हैं, बल्कि केवल इनकी व्याख्या की संक्षिप्तता के लिए ऐसा करना पड़ा है।
शहर और देहात के बीच तथा उद्योग और कृषि के बीच के पारस्परिक विरोध (Anti-Thesis) के विलोपन की जानी-मानी समस्या है, जिस पर माक्र्स और ऐंगेल्स ने विचार किया था। इस पारस्परिक विरोध का आर्थिक आधार शहर द्वारा देहात का शोषण है। पूँजीवाद के अंदर उद्योग, व्यापार और उधार ऋण (Creclit) के विकास के पूरे दौर में किसानों और देहात को अधिकांश आबादी की लूट और बर्बादी के कारण परस्पर विरोध (Anti-Thesis) पैदा हुआ है। इसलिए शहर और देहात के परस्पर विरोध को पूँजीवाद के अंदर स्वार्थ के प्रतिशोध के रूप में देखा समझा जा सकता है। यही वह चीज है जिसने देहात के अंदर शहर और शहरवासियों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण भावनाओं को उभारा।
निःसंदेह हमारे देश में पूँजीवाद और शोषण प्रणाली के अवसान के साथ और समाजवादी व्यवस्था के मजबूत होने के साथ ही देहात और शहर तथा कृषि और उद्योग के बीच स्वार्थ के प्रतिशोध के भाव का लुप्त होना लाजिमी था और यही हुआ भी। सामजवादी शहर द्वारा और मजदूर वर्ग के द्वारा किसानों को जमींदार और कुलकों को मिटाने में दी गई सहायता ने मजदूर और किसानों की एकता को मजबूत किया। किसानों को तथा सामूहिक फार्मों को प्रथम श्रेणी के ट्रैक्टर और अन्य मशीनों की आपूर्ति ने किसानों और मजदूरों की एकता को मित्रता में बदल दिया। यह सही हे कि मजदूर और सामूहिक फार्म के किसान दो भिन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे एक दूसरे से भिन्न अवस्थाओं से आते हैं। लेकिन यह फर्क इनकी दोस्ती को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करता। इसके विपरीत इनके स्वार्थ एक ही पंक्ति में खड़े होते हैं। वह स्वार्थ है समाजवादी समाज को मजबूत करना और साम्यवादी विजय हासिल करना। इसलिए यह आश्चर्यजनक नही ंहै कि देहातों में शहर के प्रति पुराना घृणाभाव की तो बात ही छोड़ दीजिए अब इनमें पुराने अविश्वास के चिन्ह भी शेष नहीं रह गए।
इन सबका अर्थ यह है कि शहर और देहात तथा उद्योग और कृषि के बीच परस्पर विरोध (Anti-Thesis) का आधार हमारी समाजवादी व्यवस्था में विलुप्त हो चुका है।
इसका निश्चय ही यह माने नहीं है कि नगर देहात के परस्पर विरोध भावों के विलोपन का यह परिणाम होगा कि ‘‘महानगर बर्बाद होंगे’’, (ऐंगेल्स, ऐंटीडयूहरिंग)। यही नही ंहोगा कि महानगर बर्बाद नहीं होंगे, बल्कि अधिकधिक सांस्कृतिक विकास के नये केन्द्रों के रूप में अनेकानेक महानगर प्रकट होंगे। ये नए महानगर न केवल बड़े उद्योगों के केन्द्र होंगे, बल्कि कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग तथा खाद्य सामग्रियों की विभिन्न प्रशाखाओं के जबर्दस्त विकास के केन्द्र भी होंगे। यह राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाएगा और नगर तथा देहात की जीवन दशा को उन्नत करेगा।
शारीरिक और मानसिक श्रम के पारस्परिक विरोधाभास को समाप्त करने की समस्या को मामले में भी ऐसी ही स्थिति है।यह भी पुरानी समस्या है जिसे माक्र्स ऐंगेल्स द्वारा विचार किया गया। दोनों के बीच के पारस्परिक विरोधाभास का आर्थिक आधार है मानसिक श्रम द्वारा शारीरिक श्रम का शोषण। इस खाई से सब अवगत हैं जिसने पूँजीवाद के अंदर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंध कर्मियों और शारीरिक श्रमिकों को विभाजित कर दिया। हम जानते हैं कि इसी खाई ने मैनेजरों, फोरमैनों, इंजीनियरों एवं तकनीकी कर्मियों के प्रति मजदूरों के अंदर शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण पैदा किया और मजदूर इन्हें अपना शत्रु मानने लगे। स्वभावतः पूँजीवाद के अवसान के बाद मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के परस्पर शत्रुता पूर्ण विरोधाभास का विलोपन अवश्यम्भावी था और हमारी समाजवादी व्यवस्था में सचमुच यह अदृश्य हो गया। आज शारीरिक श्रमिक और प्रबंध-कर्मीगण आपस में दुश्मन नहीं हैं। वे उत्पादन कार्य के एक ही सामूहिक परिवार के सदस्य के रूप में कामरेड हैं, दोस्त हैं जो उत्पादन बढ़ाने और प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अभिरुचि ले रहे हैं। उनमें पुरानी शत्रुता के चिह्न भी शेष नजर नहीं आते।
नगर (उद्योग) और गाँव (कृषि) के बीच तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के विभेदों ;क्पेजपदबजपवदद्ध को मिटाने की समस्या का चरित्र ही भिन्न है। इस समस्या पर माक्र्सवादी शास्त्रों में विचार नहीं किया गया। यह नई समस्या है जो हमारी समाजवादी रचना प्रक्रिया के आचरण से उभरी है।
क्या यह एक काल्पनिक समस्या है? क्या इसका हमारे लिए कोई व्यावहारिक या सैद्धांतिक महत्व है? नहीं, यह समस्या हमारे लिए काल्पनिक नहीं समझी जा सकती। इसके विपरीत, हमारे लिए यह गम्भीर महत्व की समस्या है।
उदाहरण के लिए कृषि और उद्योग के विभेद को लें। हमारे देश में यह विभेद केवल इस तथ्य में नहीं है कि कृषि के श्रम से भिन्न हैं उद्योग के श्रम, बल्कि मुख्य रूप से, प्रमुखतया इस तथ्य में कि जहाँ उद्योग में उत्पादन के साधनों और उत्पाद पर सार्वजनिक स्वामित्व है, वहीं कृषि में सार्वजनिक नहीं, किन्तु समूह का स्वामित्व वाला सामूहिक फार्म है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि यह तथ्य माल परिचालन की प्रथा बनाए रखने की ओर ले जाता है और जब उद्योग और कृषि का विभेद मिटेगा तभी माल उत्पादन के मौजूदा परिणाम मिट सकेंगे। इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कृषि और उद्योग के बीच के इस मूलभूत विभेद को मिटाना हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की बात है।
यही बात मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेद को मिटाने की समस्या के बारे में भी अवश्य कही जाएगी। यह सच है कि यह भी हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की समस्या है। समाजवाद स्पर्धा आंदोलन ने जब तक जन अभियान का शकल अख्तियार नहीं किया था, तब तक हमारे उद्योग की प्रगति बहुत ही रुक-रुककर चल रही थी इसे देखकर अनेक साथियों ने सलाह दी कि औद्योगिक विकास की गति को धीमा कर दिया जाय। प्रगति में इस लड़खड़ाहट का कारण यह था कि हमारे मजदूरों का सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर नीचा था और हमारे प्राविधिक कर्मियों ;ज्मबीदपबंस चमतेवददमसद्ध से वे काफी पीछे थे। लेकिन तब स्थिति बदल गई जब समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन ने जन आन्दोलन का रूप ले लिया। उसी क्षण से औद्योगिक विकास की गति तेज हो गई।
क्यों समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन का चरित्र जन आंदोलन का हो गया? क्योंकि मजदूरों के बीच से कामरेडों के सभी के सभी ग्रुप आगे बढ़कर न केवल तकनीकी ज्ञान की न्यूनतम जरूरतों पर महारत हासिल कर ली, बल्कि और आगे बढ़कर प्राविधिक कर्मियों के स्तर तक पहुँच गए। उन्होंने प्राविधिकों और अभियंताओं को ठीक करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने पहले से चल रहे तरीकों को पुराना घोषित कर तोड़ दिया और नई अद्यतन प्रणालियाँ अपनाईं। ऐसा ही बहुत कुछ किया। हमें क्या होना चाहिए था, अगर केवल अलग-अलग समूह नहीं, बल्कि मजदूरों का अधिकांश हिस्सा तकनीसियनों और इंजीनियरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर तक पहुँच गया होता? तब हमारा उद्योग उस ऊँचाई पर पहुँच गया होता जहाँ दूसरे देशों के उद्योगों का पहुँचना असंभव था। इसलिए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मजदूरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर को ऊँचा उठाकर मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत पारस्पिरिक विभेद को मिटाना हमारे लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक महत्व का है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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