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Archive for अगस्त 2nd, 2012


हिन्दुवत्व वादी शक्तियां अगर बम विस्फोट करें तो वह राम राज्य का स्वागत करती नजर आती हैं जिसके ऊपर सरकार इंटेलिजेंस ब्यूरो, ए.टी.एस और एस.टी.ऍफ़ हलकी घटना बता कर अपना बचाव करती हुई नजर आती हैं अगर कोई विस्फोटक की घटना घटती है तो सबसे पहले इंडियन मुजाहिद्दीन कोई न कोई खान या मुसलमान का नाम आ जाता है।
पुणे बम विस्फोट सीरियल बम विस्फोट में रंगे हाथ जख्मी पकडे गए व्यक्ति का नाम शिवानन्द पाटिल है। आर.एस.एस का कार्यकर्ता है इसलिए विस्फोट होने के बाद खुफिया एजेंसियों की छठी इन्द्री ने बता दिया था कि इसमें इंडियन मुजाहिद्दीन का हाथ है लेकिन अब वह शरमाये-शरमाये से नजर आ रहे हैं। हमारा इलेक्ट्रोनिक मीडिया चुप्पी साढ़े हुए हैं। हेमंत करकरे की हत्या से लेकर अधिकांश विस्फोट हिन्दुवत्व वादी संगठनो ने ही किये हैं किन्तु सांप्रदायिक सोच के कारण अल्पसंख्यकों को ही फंसाया जा रहा है। असीमानंद के 164 सी.आर.पी.सी के बयान के बाद स्तिथि साफ़ होनी चाहिए थी किन्तु हिन्दुवत्व वादी संगठनो की एक भारी संख्या नौकरशाही से लेकर खुफिया एजेंसियों में है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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नरेन्द्र मोदी से शायद ही कोई यह अपेक्षा करेगा कि वे किसी से क्षमा मांगेगे। क्षमा मांगने का नैतिक साहस और शक्ति उनमें होती है जो उदार होते हैं, जिनका दिल बड़ा होता है. और दुनिया जानती है कि नरेन्द्र मोदी का दिल बड़ा नहीं है।

दुनिया के इतिहास में अनेक महान और प्रतिष्ठित लोगों ने क्षमा मांगी है या उनको माफ किया है जिन्होंने उन पर तरह-तरह की ज्यादतियां की थीं। दक्षिण अफ्रीका में गोरों का शासन समाप्त हुआ और नेल्सन मंडेला, आजाद दक्षिण अफ्रीका के प्रथम राष्ट्रपति बने। एक भव्य समारोह में उन्होंने शपथ ली। समारोह में विभिन्न देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजे-महाराजे आदि शामिल हुये। समारोह के अंत में नेल्सन मंडेला ने घोषणा की कि “मैं आपका परिचय दो विशिष्ट अतिथियों से कराना चाहता हूँ“। सभी विशिष्ट अतिथियों ने सोचा कि ऐसे कौन से विशिष्ट अतिथि हैं जो हमसे भी ज्यादा विशिष्ट हैं और जिनका परिचय मंडेला कराना चाहते हैं। मंडेला की घोषणा के बाद दो गोरे व्यक्ति मंच आये। दोनों को मंडेला ने अपने दोनों ओर खड़ा किया। उन्होंने कहा कि “मैं जब जेल मे था उस समय इन दोनों ने मुझ पर तरह-तरह के जुल्म किए। परन्तु आज मैं इन्हें क्षमा कर रहा हूँ और इनके माध्यम से मैं दक्षिण अफ्रीका के उन सभी गोरों को माफ कर रहा हूँ जिन्होनें यहां के मूल निवासियों पर वर्षों तक अत्याचार किये थे”। इस तरह का क्षमादान नेल्सन मंडेला जैसा महान हृदय व्यक्ति ही कर सकता है। क्षुद्र हृदय नरेन्द्र मोदी के पास इतना बड़ा दिल नहीं है।

कुछ वर्षों पहले, ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ भारत आईं थीं। अपनी भारत यात्रा के दौरान वे अमृतसर भी गयीं थीं। अमृतसर प्रवास के दौरान उन्होनें जलियांवाला बाग गोलीकांड के लिये क्षमा मांगी। एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में एकत्रित हजारों लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं थीं जिससे सैकड़ो लोग मारे गये थे। जनरल डायर की करतूत की निंदा भारत में तो की ही गई थी ब्रिटेन में भी की गई थी। इसलिए महारानी एलिजाबेथ ने अपने भारत प्रवास के दौरान जलियांवाला बाग में हुई हत्याओं के लिये माफी मांगी। सन् 1984 में सिक्खों के कत्लेआम के लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अनेक कांग्रेस नेताओं ने माफी मांगी।

हेम बरूआ एक प्रखर समाजवादी नेता थे। लोकसभा में चीनी आक्रमण की निन्दा करते हुये उन्होने नेहरू को गधा और देशद्रोही कह दिया। थोड़े समय बाद नेहरू जी की मृत्यु हो गई। हेम बरूआ भी उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुये। हेम बरूआ ने तीन बार नेहरू जी के पैर छुए। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुये उन्होने “धर्मयुग“ साप्ताहिक में एक लेख लिखा था। उन्होने लेख में कहा कि “मैंने एक बार नेहरू जी के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते पैर छुए, दूसरी बार मैंने एक महान प्रधानमंत्री का नमन किया और तीसरी बार मैंने नेहरू जी से क्षमा मांगी-उन्हें गधा कहने के लिए“। हेम बरूआ एक महान नेता थे। इसलिये उनका दिल भी महान था।

पर मोदी तो किसी से भी माफी मांगने को तैयार नहीं हैं। जब भी कोई दंगा होता है या आगजनी में लोग मारे जाते हैं, बाढ़ और भूकम्प में अपना सब कुछ खो देते हैं तो प्रधानमंत्री और मंत्रीगण पीड़ितों की खबर लेने जाते हैं। वे प्रायः इस बात के लिये खेद व्यक्त करते हैं कि उन्हें पीड़ित व्यक्तियों की जितनी सहायता करनी चाहिए थी वे. नही कर पाये। वे मृत व्यक्तियों के परिवारवालों से मिलते हैं। वे दुःखी लोगों का दुःख बांटने का प्रयास करते हैं। जबकि उस प्राकृतिक विभीषिका के लिए वे स्वयं किसी भी तरह से दोषी नहीं होते।

इसके विपरीत, नरेन्द्र मोदी एक भी दंगा पीड़ित के पास नही गये। उनका हाल चाल पूछने का प्रयास तक नहीं किया। क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे पूर्व सांसद एहसान जाफरी, जिनकी बड़ी क्रूरता से हत्या की गई थी, की पत्नी से मिलकर शोक व्यक्त करते, और क्षमा मांगते कि पुलिस सही समय पर उनकी रक्षा के लिए नहीं आ सकी? क्या नरेन्द्र मोदी का यह फर्ज नहीं था कि वे उन पुलिसकर्मियों को दंडित करते जो जाफरी को आश्वासन तो देते रहे परंतु उनकी सहायता के लिये नहीं पहुंचे? क्या उन्हें उन हजारों लोगों से मिलकर माफी नहीं मांगनी थी जो राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे थे। शिविर में रह रहे पीड़ितो से मिलना तो दूर की बात है, उलटे नरेन्द्र मोदी ने इन पीड़ितों के बारे में अत्यधिक घटिया टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ये शिविर बच्चे पैदा करने के कारखाने बन गए हैं। क्या इस तरह की घटिया बात करने वाले व्यक्ति से क्षमा मांगने की अपेक्षा की जानी चाहिए?

कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि गोधरा में जो कुछ हुआ था वह मोदी द्वारा रचे गये षड़यंत्र का हिस्सा था। क्या मोदी को इस बात का पता नही था कि गोधरा स्टेशन पर लगभग प्रतिदिन अयोध्या से वापिस आने वाले कारसेवकों और स्थानीय मुसलमानों के बीच टकराव की घटनाएं हो रहीं थीं? इन घटनाओ के मद्देनजर क्या गोधरा में व विशेषकर रेलवे स्टेशन पर पुलिस की तैनाती बढ़ाई नहीं जानी थी? जिस दिन, जैसा कि आरोपित है, मुसलमान एस-6 कोच में आग लगा रहे थे तब पुलिस ने उन्हें रोका नहीं? क्या पुलिस को ऐसे तत्वो पर गोली नहीं चलानी थी? परन्तु ऐसा नहीं हुआ और अनेक
कारसेवक मारे गये। उसके बाद मोदी ने लाशों पर राजनीति की। सभी लाशों को अहमदाबाद ले जाया गया और क्षत-विक्षत शरीरों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। हिन्दू धर्म की परम्परा के अनुसार मृत व्यक्ति की अंतिम क्रिया जल्दी से जल्दी की जानी चाहिये। ऐसा न करना, मृत व्यक्ति का अपमान माना जाता है। क्या लाशों पर राजनीति करना उचित था? कम से कम नरेन्द्र मोदी को उन परिवारों के पास जाकर क्षमा मांगनी थी जिन्होंने अपने प्रियजनों को गोधरा के अग्निकांड में खोया था।

गुजरात दंगे के दौरान अनेक लोगों के घर जला दिये गये थे। जिनके घर जले वे अपने घरो को छोड़कर चले गये। उनमें से कई आज तक वापस नहीं आये हैं। क्या उन्हें वापस लाने का प्रयास मोदी को नही करना था? कश्मीर में अनेक पंडित परिवार घर-बार छोड़कर चले गये हैं। उन्हें वापस लाने का प्रयास कश्मीर की जनता और सरकार कर रही है। अभी हाल में अनेक पंडित एक धार्मिक समारोह में शामिल हुये। इस समारोह मे आने वाले पंडितों का भव्य स्वागत स्थानीय मुसलमानों ने किया। ऐसा कुछ गुजरात की सरकार और वहां के हिन्दू क्यों नही कर रहे हैं? क्यों वे उन मुसलमानों से फिर से अपने शहर और गांव में बसने की अपील नहीं कर सकते जो दंगों के बाद भाग गए थे? क्या इस तरह के हजारों लोगों से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है जो आतंकित होकर अपने गांवो और घरों को छोड़कर चले गये? क्या मोदी को यह स्वीकार करने मे हिचक है कि उनकी पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और दंगाईयों से मिलीभगत के चलते इन लोगों को अपने घरों को छोड़ना पड़ा।

मोदी जी, आपने एक नहीं सैकड़ों गलतियां की हैं जिनके लिये आपको क्षमा मांगना चाहिये। लेकिन आप तो बेशर्मी से कहते हैं कि मैं माफी क्यों मांगूं।
– एल. एस. हरदेनिया

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

कुछ साथी मानते हैं कि माल का उत्पादन बनाए रखकर पार्टी ने गलत काम किया है जबकि पार्टी ने देश में सत्ता हासिल कर ली और उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण कर लिया। उनकी सोच है कि पार्टी को चाहिए था कि माल का उत्पादन उसी समय और तत्काल बंद कर देते। इस सिलसिले में वे ऐंगेल्स को उद्घृत करते हैं जिन्होंने कहा है समाज द्वारा उत्पादन के साधनों पर कब्जा करना माल के उत्पादन को समाप्त कर देना है, उसी तरह उत्पादक के ऊपर उत्पादन के प्रभुत्व का भी’’। (ऐंटी ड्यूहरिंग) ऐसे साथी पूरी तरह गलतफहमी में हैं।
हम लोग ऐंगेल्स के फारमूले की जांच करें। ऐंगेल्स के फारमूले को साफ तौर पर इस रूप में नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि उससे यह स्पष्ट नहीं है कि समाज द्वारा उत्पादन के सभी साधनों पर कब्जा की वे बात करते हैं या केवल उसके एक भाग का जिसका रूपांतरण सामाजिक सम्पत्ति के रूप में हो चुका है। इसलिए ऐंगेल्स के फारमूले को दूसरे तरीके से समझा जा सकता है।
ऐटीड्यूहरिंग’ में ही ऐंगेल्स एक जगह लिखते हैं कि उत्पादन के सभी साधनों पर कब्जा करना अर्थात उत्पादन के सभी साधनों पर नियंत्रण। इस तरह इस फारमूला के अंदर ऐंगेल्स के दिमाग में उत्पादन के साधनों पर एक भाग नहीं, बल्कि संपूर्ण साधनों का राष्ट्रीयकरण है। इसका मतलब है न केवल उद्योग में बल्कि कृषि में भी उत्पादन के सभी साधनों का सामाजिक सम्पत्ति के रूप में राष्ट्रीयकरण।
जहाँ उत्पादन का संकेन्द्रण इतना ऊँचा हो गया हो, उद्योग और कृषि के क्षेत्रों में वहाँ उत्पादन के सभी साधनों का सामाजिक सम्पत्ति के रूप में रूपांतरण संभव है। ऐंगेल्स ऐसे देशों के बारे में सोचते हैं कि उत्पादन के सभी साधनों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही माल उत्पादन का अंत होना चाहिए और वह सचमुच सही है। जब ॔ऐंटीड्यूहरिंग’ का प्रकाशन हुआ था उस समय गत शताब्दी के अंत में, केवल एक देश वैसा था ब्रिटेन। वहाँ पूँजीवाद का विकास उस सीमा तक हो गया था, उद्योग और कृषि दोनों क्षेत्रों में कि सर्वधारा द्वारा सत्ता हाथ में लेने के बाद यह संभव था कि देश के संपूर्ण उत्पादन साधनों का राष्ट्रीयकरण करके उसे सामाजिक सम्पत्ति बना दिया जाय और माल उत्पादन का अंत कर दिया जाय।
मैं यहाँ इस प्रश्न को छोड़ देता हूँ कि ब्रिटेन के लिए विदेश व्यापार का कितना महत्व है। इसकी राष्ट्रीय व्यवस्था में विदेश व्यापार की बड़ी भूमिका है। मैं समझता हूँ इस प्रश्न की जांच करने के बाद ही अंतिम तौर पर निश्चय किया जा सकेगा कि ब्रिटेन में सर्वधारा के सत्ता में आने पर और उत्पादन के सभी साधनों के राष्ट्रीयकरण हो जाने पर वहाँ के माल के उत्पादन का क्या भविष्य होगा।
तो भी, पिछली शताब्दी के अंत ही नहीं, बल्कि आज तक भी कोई देश पूँजीवादी विकास के उस बिन्दु पर नहीं पहुँचा है और कृषि में उत्पादन का संकेन्द्रण वहाँ नहीं पहुँचा है, जैसा ब्रिटेन में देखा जा रहा है। देहातों में पूँजीवादी विकास के होते हुए भी, जैसे अन्य देशों में अनेक छोटे और मझोले देहाती माल उत्पादक होते हैं जिनके भविष्य के बारे में निश्चय किया जायगा, अगर सर्वहारा सत्ता में आएगा।
लेकिन यहाँ एक सवाल है हमारे जैसे देश में सर्वहारा और उसकी पार्टी क्या करेगी जहाँ सर्वहारा के सत्ता में आने की परिस्थिति अनुकूल है और पूँजीवाद के उखाड़ फेंकने की भी तथा जहाँ उद्योग में उत्पादन का संकेन्द्रण उस बिन्दू पर पहुँच गया है कि उसे सामाजिक सम्पत्ति में बदला जा सकता है, लेकिन जहाँ पूँजीवादी विकास के बावजूद कृषि क्षेत्र अनेकानेक छोटे एवं मझोले उत्पादक मालिकों में उस सीमा तक बँटा है कि उन्हें समाप्त करने के बारे में सोचना भी असंभव है।
ऐंगेल्स का फारमूला इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता। लेकिन हमारे सामने जो प्रश्न है उसका उत्तर यहाँ नहीं है, क्योंकि यह प्रश्न एक दूसरे प्रश्न से खड़ा हुआ है कि माल के उत्पादन का क्या भविष्य होगा जहाँ उत्पादन के तमाम साधनों का समाजीकरण हो गया है?
और इसलिए वहाँ क्या करना है, आज तमाम नहीं बल्कि उत्पादन साधनों के केवल एक भाग का ही समाजीकरण हुआ है, तब भी सर्वहारा द्वारा सत्ता में आने की स्थिति अनुकूल है तो क्या सर्वहारा को सत्ता ग्रहण करना चाहिए और सत्ता ग्रहण करने के तुरन्त बाद माल उत्पादन समाप्त कर देना चाहिए?
ऐसे में कतिपय अपरिपक्व अधकचड़े माक्र्सवादियों के उत्तर को हम स्वीकार नहीं कर सकते जिनका विश्वास है कि वैसी स्थिति में जो कुछ करना है वह यह कि सत्ता ग्रहण करने से बचना चाहिए और तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक पूँजीवाद को लाखों छोटे एवं मझोले उत्पादकों को लूटने और उन्हें खेत मजदूरों में बदलने में सफलता नहीं मिल जाती और कृषि उत्पादन के साधनों का पूर्ण संकेन्द्रण नहीं हो जाता और इसके बाद ही सर्वहारा द्वारा सत्ता ग्रहण के बारे में सोचा जा सकता है एवं तभी उत्पादन के तमाम साधनों का समाजीकरण संभव होगा। जाहिर है, कोई माक्र्सवादी यह समाधान स्वीकार नहीं कर सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

आर्थिक बहस में भाग लेने वालों को मंतब्य

नवम्बर 1951 की बहस से सम्बंधित आर्थिक प्रश्नों पर

राजनैतिक अर्थशास्त्र की पाठ्य पुस्तक के प्रारूप के मूल्यांकन के लिए चलाई जा रही आर्थिक बहस से सम्बन्धित सभी सामग्रियाँ मुझे मिली हैं। जो सामग्रियाँ मुझे मिली हैं उनमें राजनैतिक अर्थशास्त्र के प्रारूप में सम्बर्द्धन के लिए प्रस्ताव,’’ गलतियों और लुटियों के विलोपन के लिए प्रस्ताव’’ और विवादास्पद मुद्दों पर ज्ञापन’’ शामिल हैं। इन सभी सामग्रियों और पाठ्यपुस्तक के प्रारूप पर मैं निम्नांकित मंतब्य प्रकट करना जरूरी समझता हूँ :

1. समाजवाद में आर्थिक नियमों का चरित्र

कुछ साथी विज्ञान के नियमों के वस्तुगत चरित्र को और स्वाभकर समाजवाद के अंदर राजनैतिक अर्थतंत्र के नियमों को इंकार करते हैं। वे इस तथ्य का इंकार करते हैं कि राजनैतिक अर्थतंत्र का नियम उस विनियमित प्रक्रिया का प्रतिबिंब है जो मनुष्य की इच्छा से परे संचालित है। वे विश्वास करते हैं कि इतिहास ने सोवियत सत्ता के ऊपर जो विशेष जिम्मेदारी सौंपी है, उसे देखते हुए सोवियत राज्य और उसके नेता राजनैतिक अर्थ तंत्र के विद्यमान नियमों को विलोपित कर सकते हैं, नये नियम ग़ और बना सकते हैं।
ऐसे सभी गंभीर गलतफहमी के शिकार है। ऐसे साथी सरकार के बनाए कानूनों को वैज्ञानिक नियमों के समतुल्य मान लेने की भूल करते हैं। ये सभी प्रत्यक्षतः विज्ञान के नियमों जो प्रकृति का या समाज की वस्तुगत प्रक्रियाओं को प्रतिबंधित करते हैं, ऐसी प्रक्रियाएँ जो मानव इच्छा से परे स्वतंत्र रूप से क्रियाशील हैं, को सरकारी कानूनों, जो मानव इच्छा के अधीन बनाए जाते हैं और जिनका केवल न्यायिक महत्व है, के साथ मिलाकर भ्रांतिपूर्ण स्थिति पैदा करते हैं। लेकिन उन्हें निश्च्य ही भ्रमित नहीं होना चाहिए।
माक्र्सवाद विज्ञान के नियमों को मानता है। वैज्ञानिक नियम चाहे वे प्राकृतिक विज्ञान के हों या राजनैतिक अर्थतंत्र के, सभी ऐसी वस्तुगत प्रक्रियाओं के प्रतिरूप हैं और मनुष्य की इच्छा से परे क्रियाशील है। मनुष्य इन नियमों को जान सकता है, उन्हें पता लगा सकता है, उनका अध्यन कर सकता है, उन पर भरोसा कर सकता है और समाज के हित में उनका उपयोग कर सकता है। लेकिन उन्हें बदल नहीं सकता, उन्हें समाप्त नहीं कर सकता और न नया वैज्ञानिक नियम बना सकता है।
तो क्या इसका यह मतलब है कि प्राकृतिक नियमों की कारगुजारियों के परिणाम अर्थात प्राकृतिक शक्तियों द्वारा की गई कार्रवाइयों के परिणाम सामान्य रूप से बदले नहीं जा सकते? क्या प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों की कार्रवाइयाँ बुनियाद की तरह सर्वथा अटल होती हैं जो मानव प्रभाव के समक्ष कभी झुकती नहीं? नहीं, ऐसा नहीं है। आकाशीय, भूगर्भीय या ऐसे अनेक क्षेत्रों को छोड़ दें, जिनके विकास नियमों को जान लेने के बाद भी मनुष्य उन्हें प्रभावित कर सकने में सर्वथा असमर्थ है, फिर भी अनेक मामलों में मनुष्य असमर्थता से काफी दूर है और वह प्राकृतिक प्रकियाओं को प्रभावित करता है। ऐसे सभी मामलों में मनुष्य प्राकृतिक नियमों को जानकर, उनका अंदाज कर, उन पर भरोसा कर, उनके बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग द्वारा प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों की दिशा बदलकर समाज के सर्जनात्मक कार्यों में इस्तेमाल कर सकता है।
ऐसे अनेक दृष्टांतों में एक को लें। पुराने जमाने में विशाल नदियों के अनियंत्रित प्रवाह के चलते बा़ और परिणाम स्वरूप लोगों के घरों और फसलों की बर्बादी, जिनके बारे में पहले समझा जाता था कि यह दुर्जय विपदा है। मनुष्य असहाय था। लेकिन समय बीतने के साथ और जान वृद्धि के कारण जब मनुष्य ने बांध निर्माण तथा पन बिजली संयंत्र खड़ा करना सीखा तो बा़ की विभीषिका से समाज का बचाव संभव हो गया। ऐसा बचाव असंभव माना जाता था। और भी, इंसान ने प्रकृति की विनाशनी शक्ति को मोड़ना सीखा, उनका श्रंृगार कियाऐसा कहें। जल प्रवाह को समाज के हित में मोड़ा गया। खेतों की सिंचाई की गई और प्रवाह का उपयोग बिजली उत्पादन में किया गया।
क्या इसका यह अर्थ है कि इंसान ने इस तरह प्रकृति के नियमों, विज्ञान के नियमों को समाप्त कर दिया और प्रकृति के नए कानून या विज्ञान के नए नियमों का निर्माण किया? नहीं, ऐसा नहीं है। बात यह है कि वैज्ञानिक नियमों में बिना किसी बदलाव, बिना किसी उल्लंघन या उसे समाप्त किए बगैर अथवा किसी नए नियम के बनाए बगैर एक प्रक्रिया द्वारा पानी के विनाशकारी प्रवाह को बदला गया और उसे समाज के हित में इस्तेमाल किया गया। इसके विपरीत, इस प्रक्रिया को प्र्रकृति और विज्ञान के नियमों के अनुकूल अंजाम दिया गया क्योंकि प्राकृतिक नियमों का एक तनिक भी उल्लंघन पूरे मामले को उलट देता और संपूर्ण प्रक्रिया को बेकार बना देता।
यही बात आर्थिक विकास के नियमों, राजनैतिक अर्थतंत्र के नियमों, चाहे पूँजीवाद की अवधि में या समाजवाद की अवधि में, के बारे में निश्चय ही कही जाएगी। यहाँ भी प्रकृति विज्ञान की तरह आर्थिक विकास के नियम आर्थिक विकास प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करते हुए वस्तुगत नियम हैं जो मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र परिचालित हैं। मनुष्य इन नियमों को जान सकता है, पता कर सकता है और उन पर भरोसा कर सकता है तथा समाज के हित में इस्तेमाल कर सकता है। यह भी कि कुछ विनाशकारी नियमों की दिशा में परिवर्तन कर सकता है, उसकी कार्रवाइयों के दायरे को सीमित कर सकता है और दूसरे नियमों को पूरा अवसर दे सकता है, जो सतह पर आने के लिए दबाव दे रहा है। लेकिन वह उन नियमों को विनष्ट नहीं कर सकता और न नया आर्थिक नियम बना सकता है।
प्रकृति विज्ञान के विपरीत राजनैतिक अर्थतंत्र की एक विशेषता यह होती है कि इसके नियम शाश्वत नहीं होते। इसके अधिकांश नियम इतिहास की खास अवधि में काम करते हैं और कालक्रम में इसकी जगह दूसरे नियम लेते हैं। यद्यपि ऐसे नियमों का विभाग नहीं होता, बल्कि नई परिस्थितियों में ऐसे नियमों की उपयोगिता नहीं रह जाती। नये नियमों को स्थान देने हेतु पुराने नियम दृश्य से ओझल हो जाते हैं, उन नये नियमों को स्थान देने हेतु जिन्हें मनुष्य की इच्छाओं ने नहीं बनाया है बल्कि वे नई आर्थिक स्थितियों से उभरे हैं।
॔ऐंटीड्यूहरिंग’ से ऐंगेल्स के सूत्र को उद्घृत किया जाता है जिसमें कहा गया है कि पूँजीवाद की समाप्ति और उत्पादनसाधनों के समाजीकरण के बाद मनुष्य उत्पादन साधनों पर नियंत्रण पाएगा कि सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों के बंधनों से मुक्त हो जाएगा और वह सामाजिक जीवन का स्वामी बन जायगा। ऐंगेल्स इस स्वतंत्रता को आवश्यकता का परिबोध ;ंचचतमबपंजपवद वि दमबमेपजलद्ध कहते हैं। इस आवश्यकता के परिबोध का क्या मतलब होता है? इसका मतलब होता है कि वस्तुगत नियमों ;दमबमेपजलद्ध को जान लेने के बाद मनुष्य इसका उपयोग पूरी चेतना के साथ समाज के हित में करेगा। यही कारण है कि उसी पुस्तक में ऐंगेल्स कहते हैं उसके अपने सामाजिक गतिविधियों के नियमों, जो अभी बाह्य प्राकृतिक नियमों से घिरा है और उसी का प्रभुत्व है, का उपयोग मनुष्य द्वारा पूरी चेतना के साथ किया जाएगा और इस तरह उस पर मनुष्य का प्रभुत्व होगा।’’
इस तरह हम देखते हैं कि ऐंगेल्स का सूत्र ऐसे लोगों के पक्ष में नहीं बोलता है जो यह सोचते हैं कि समाजवाद में आर्थिक नियम समाप्त किए जा सकते हैं और नए बनाए जा सकते हैं। इसके विपरीत यह नियमों की समाप्ति की मांग नहीं करता, बल्कि आर्थिक नियमों का समझने और उनके बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग की बात करता है।
यह कहा गया है कि आर्थिक नियम का चरित्र आधार मूल होता है, कि उसकी गति अपरिवर्तनीय होती है और उसके सामने समाज असहाय होता है। यह सही नहीं है। यह नियम को पूजावस्तु बनाना है और अपने को नियम का दास। ऊपर बताया गया है कि समाज नियम के सामने असहाय नहीं है, कि आर्थिक नियमों को जान लेने के बाद और उस पर भरोसा करते हुए समाज उसके कार्रवाई क्षेत्र को सीमित कर सकता है, समाज के हित में उसका उपयोग कर सकता है और उसका श्रंृगार कर सकता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्राकृतिक शक्तियों और उनके नियमों के मामलों में ठीक उसी तरह जैसे बड़ी नदियों के उत्ताल प्रवाह के बारे में ऊपर उदाहरण दिए गए हैं।
समाजवाद के निर्माण में सोवियत सरकार की विशिष्ट भूमिका का उल्लेख किया गया है और जैसा बतया गया है कि यह विद्यमान आर्थिक नियम के समाप्त करने में और नया आर्थिक विकास नियम बनाने में समर्थ है। यह भी सच नहीं है।
सोवियत सरकार की विशिष्ट भूमिका दो परिस्थितियों में है। सोवियत सरकार को जो कुछ करना है प्रथम तो ऐसा नहीं है कि एक प्रकार के शोषण को मिटाकर दूसरे प्रकार का शोषण जारी रखा जाय, जैसा कि पहले की क्रान्तियों में हुआ। हम तो शोषण का सर्वनाश चाहते हैं। द्वितीय, देश के अंदर किसी समाजवादी अर्थतंत्र की बनी बनायी पृष्ठ भूमि के पूर्ण अभाव की स्थिति में हमें नया निर्माण करना है, कहना चाहिए बिल्कुल शून्य से।
नि:संदेह यह कठिन, दुरूह और अभूतपूर्व कर्तव्य है। तो भी सोवियत सरकार ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया। लेकिन इसे इस तरह पूरा नहीं किया किया विद्यमान आर्थिक नियमों को तोड़ दिया और नया बना दिया। बल्कि इसके उस आर्थिक नियम पर भरोसा किया, जिसके मुताबिक उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूपेण उत्पादन शक्तियों से मेल खाता है। उत्पादन शक्तियों का चरित्र हमारे देश में, खासकर उद्योग में सामूहिक था, किन्तू दूसरी तरफ उसके स्वामित्व का स्वरूप निजी और पूँजीवादी था। इस आर्थिक नियम पर भरोसा करके कि उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से उत्पादन शक्तियों के चरित्र के अनुरूप होना चाहिए, सोवियत सरकार ने इसका समाजीकरण कर दिया, इसे सम्पूर्ण जनता की सम्पत्ति बना दिया और इस तरह शोषण प्रणाली का अंत कर दिया और समाजवादी अर्थतंत्र का निर्माण किया। अगर यह नियम नहीं होता और सोवियत सरकार ने उस पर भरोसा नहीं किया होता तो यह कार्यलक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता था।
यह आर्थिक नियम कि उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से उत्पादन शक्तियों केचरित्र के अनुकूल होता है, पूँजीवादी देशों में लंबे समय से रास्ता आगे निकालने हेतु दबाव डाल रहा है। किन्तु रास्ता फोड़कर आगे निकल पाने में विफल रहा है, क्योंकि समाज की पुरानी शक्तियों द्वारा जबरदस्त प्रतिरोध खड़ा किया जा रहा है। यहाँ हमारे सामने एक दूसरा विशिष्ट प्रभार का आर्थिक नियम खड़ा है। प्रकृति विज्ञान के नियमों के विपरीत जहाँ नए नियमों का चलन आमतौर से स्वाभाविक प्रक्रिया है, आर्थिक क्षेत्र में नये नियमों का आविष्कार और चलन चूँकि पुरानी सामाजिक शक्तियों को हितों के प्रभावित करती हैं, इसलिए इसे सशक्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है, अतएवं एक शक्ति, एक दूसरी सामाजिक शक्ति, जो उस प्रतिरोध पर काबू पा सके, की आवश्यकता होती है। हमारे देश में वह शक्ति किसानों का प्रतिनिधित्व करनी थी। इस तरह की शक्ति अन्य पूँजीवादी देशों में नहीं है। यह उस रहस्य को बताता है कि सोवियत सरकार कैसे पुरानी शक्तियों को शिकस्त देने में कामयाब हुई और क्यों हमारे देश में वह आर्थिक नियम कि उत्पादन शक्तियों के चरित्र के अनुरूप उत्पादन सम्बन्ध अनिवार्य रूप से होना चाहिए, के परिचालक का पूर्ण सुयोग मिला।
यह कहा गया है कि हमारे देश में राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास की आवश्यकता ने सोवियत सरकार के लिए पहले से मौजूद आर्थिक नियमों को बदलकर नये नियमों को लागू करना संभव कर दिया। यह बिल्कुल ही असत्य है। हमारा वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाओं का राष्ट्रीय अर्थतंत्र के सम्यक एवं संतुलित विकास के वस्तुगत नियमों के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय अर्थतंत्र का संतुलित विकास नियम पूँजीवाद की अराजक प्रतियोगिता नियम के विरुद्ध खड़ा होता है। यह उत्पादन साधनों के सामाजीकरण के बाद आता है जब उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता के नियमों का महत्व समाप्त हो जाता है। राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास नियम के आधार पर ही समाजवादी अर्थ व्यवस्था सम्पन्न की जा सकती है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय अर्थतंत्र के संतुलित विकास नियम इसकी संभावना उत्पन्न करते हैं कि हमारे योजना निकाय सामाजिक उत्पादन की सही योजना बना सके। लेकिन संभावना को यथार्थ के साथ नहीं मिलना चाहिए। ये दो भिन्न चीजें हैं। संभावना को यथार्थ में बदलने के लिए जरूरी है कि इस आर्थिक नियम का अध्ययन किया जाय, इस पर महारत हासिल की जाय, पूरे समय के साथ इसे लागू करना सीखा जाय और ऐसी योजनाएँ बनाई जाएँ जो इस नियम के तकाजों को प्रतिबंधित करें। यह नहीं कहा जा सकता है कि हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी तरह इस आर्थिक नियम के तकाजों को प्रतिबिंबित करती हैं।
यह कहा गया है कि हमारे देश के समाजवाद के अंतर्गत क्रियाशील आर्थिक नियमों में कतिपय जिनमें मूल्य का नियम भी शामिल है, का रूपांतरण यहाँ तक कि पूरी तरह रूपांतरण नियोजित अर्थ व्यवस्था के आधार पर हो गया है। यह भी उसी तरह असत्य है नियमों का रूपांतरण नहीं होता। अगर उसका रूपांतरण हो सकता था तो उसे समाप्त भी किया जा सकता था और दूसरे नियमों से बदला जा सकता था। यह भी कि नियमों का रूपांतरण किया जा सकता है उस गलत फारमूले का अवशेष है कि नियमों को समाप्त किया जा सकता है अथवा बनाया जा सकता है। यद्यपि आर्थिक नियमों को रूपांतरित करने का सिद्घांत हमारे देश में काफी दिनों से प्रचलित है जिसे अब परिशुद्धता की दृष्टि से छोड़ दिया जाना चाहिए। इस या उस आर्थिक नियमों के कार्यों के दायरे को नियंत्रित किया जा सकता है, इसके विनाशकारी कार्य, निश्चय ही अगर वह विनाशकारी होने वाला है तो उससे बचा जा सकता है, किन्तु उसे न तो समाप्त किया जा सकता है और न उसे बदला जा सकता है।
उसी तरह जब हम प्राकृतिक और आर्थिक शक्तियों पर काबू पाने, उसे वश में रखने आदि की बात करते हैं तो इसका कतई अर्थ नहीं होता कि मनुष्य वैज्ञानिक नियमों का निर्माण कर सकता है या उसे समाप्त कर सकता है। इसके विपरीत, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि मनुष्य इन नियमों को खोज ले सकता है, उन्हें जान सकता है, उन पर महारत हासिल कर सकता है, पूरी समझ के साथ उन्हें लागू करना सीख करता है, समाज के हित में उनका इस्तेमाल कर सकता है और इस तरह उन्हें अपने वश में रख सकता हैं, उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है।
इसलिए समाजवाद के अंतर्गत राजनैतिक अर्थतंत्र के नियम वस्तुपरक होते हैं जो इस तथ्य को प्रतिबिंबित करते हैं कि आर्थिक जीवन की प्रक्रियाएँ विनियमों से प्रभासित ;संहवतमेदमकद्ध हैं और हमारी इच्छाओं से स्वतंत्र होकर संचालित हैं। जो लोग इस अवधारणा का इंकार करते हैं वे सही माने में विज्ञान का इंकार करते हैं, वे पूर्वानुमान की सभी संभावनाओं से इंकार करते हैं, और परिणाम आर्थिक गतिविधियों को दिशानिर्देश करने की संभावनाओं को भी इंकार करते हैं।
यह कहा जा सकता है कि यह सच है, सबको मालूम है, इसमें कुछ भी नया नहीं है और इसलिए आम तौर पर ज्ञात सत्यों को दोहराने में समय खर्च करना उचित नहीं है। यह सही है कि इसमें कुछ भी नया नहीं है, लेकिन यह सोचना गलत होगा कि ऐसी सच्चाइयाँ, जो आमतौर पर हमें मालूम है, को दोहराते रहना समय बर्बाद करना है, तथ्य यह है कि हमारे नेतृत्व में प्रत्येक वर्ष नए नौजवान आते हैं जो उत्कटता से हमारा सहायता करना चाहते हैं, वे अपनी योग्यता प्रमाणित करना चाहते हैं, किन्तु उन्हें माक्र्सवादी शिक्षा नहीं है, वे ऐसी सच्चाइयों को नहीं जानते हैं, जिन्हें हम अच्छी तरह जानते हैं और इसलिए वे अंधकार में भटकने को विवश हैं। ऐसे नौजवान सोवियत सरकार की विराट सफलताओं से भौंचक हैं, वे सोवियत प्रणाली की आशातीत सफलताओं से इस प्रकार चकाचौंध हैं कि वे मान बैठे हैं कि सोवियत सरकार कुछ भी कर सकती है कि कुछ भी इससे परे नहीं है कि वैज्ञानिक नियमों को भी समाप्त कर सकती है और नया नियम बना सकती है। इन कामरेडों के लिए हमें क्या करना चाहिए? माक्र्सवादलेनिनवाद में हम उन्हें कैसे दीक्षित करें? मैं मानता हूँ कि सामान्य ज्ञान की सच्चाइयों को सुशांत तरीके से दोहराना और उनकी प्रासंगिक व्याख्या नये कामरेडों की शिक्षा के सबसे अच्छे तरीकों में एक है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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यूपी के सपा राज में महीने दर महीने साम्प्रदायिक दंगों की रोज नई घटनाएं सामने आ रही हैं। अभी मथुरा के कोसी कला और प्रतापगढ़ के अस्थान के दंगों की आग बुझी भी नहीं थी कि बरेली फिर दंगों की आग में झुलस गया।
दंगे की मुख्य वजह यह थी कि नमाजियों का कहना था कि नमाज के वक्त कावरिए तेज आवाज में लाउडर न बजाएं, पर वे माने नहीं। एक बार फिर पूर्व नियोजित फिरकापरस्त ताकतों ने पूरे शहर को दंगे में झोक दिया।
गौर किया जाए तो इस इलाके में कावरियों को लेकर पिछले कई सालों से तनाव होते आ रहे हैं। दरअसल इसके पीछे हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ है। जिस तरह से शाहबाद इलाके में नमाज के वक्त तेज साउंड सिस्टम को बजाने व बंद करने को लेकर यह तनाव शुरु हुआ, ऐसा प्रयोग हिन्दुत्वादी शक्तियां आजादी के बाद ही नहीं उससे पहले भी करती रही हैं। तीस-चालीस के दशक में तो एक पूरा अभियान ही चलाया गया था कि जुमे की नमाज के वक्त मस्जिदों के सामने जाकर भजन-कीर्तन और नगाड़े बजाने का। उस दौर में इलाहाबाद के कर्नलगंज इलाके में हुए दंगे के गर्भ में भी यही साजिश थी। जिसमें मुख्य अभियुक्त के रुप में हिंदुत्ववादी मदन मोहन मालवीय थे।

बरेली में दूसरे दिन यानी 23 जुलाई को भी दंगा अपनी गति में रहा पर दिन के उजाले में जो मंजर देखने को आया उसने साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी की सरकार दंगे पर काबू नहीं पाना चाहती। जहां एक ओर दंगे में मारे गए इमरान के जनाजे को रोका गया तो वहीं कावरियों के जत्थे को तेज आवाज के साउंड सिस्टम बजाते हुए कर्फ्यू क्षेत्र से पुलिस के प्रोत्साहन में निकाला गया।
मंजर पर बरेली कालेज के शिक्षक और पीयूसीएल नेता जावेद साहब की बातें चुभ जाती हैं कि यह ‘मुस्लिम कर्फ्यू’ है। बंद घरों में लोग अपने आंगन में आसमान में धुंआ उठता देखते हैं, और जलती दुकानों-घरों की आंच को महसूस करते हैं और अंदाजा लगाते हैं कि किसका आसियाना जला। एक लंबे समय अन्तराल के बाद पुलिस के सायरन की आवाजों के बीच फायर ब्रिगेड की घंटी की आवाज की टन-टनाहट उन्हें पागल कर देती है। यह सब उस सपा सरकार में हो रहा है, जिसके मुखिया मुलायम सिंह कहते हैं कि उन्हें मुसलमानों ने सौ फीसदी वोट देकर सत्ता में लाया है।
23 जुलाई को ही प्रतापगढ़ के अस्थान गांव में भी प्रवीण तोगडि़या जाते हैं और खुलेआम मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलते हैं। पिछले महीने अस्थान में हुए दंगे में दर्जनों मुस्लिमों के घरों को दंगाइयों ने खाक कर दिया था। इस दंगे में प्रदेश के कारागार मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया के लोगों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।
सपा के राज में एक बार फिर से हिन्दुत्ववादी ताकतें प्रायोजित तरीके से दंगें भड़कानें का काम कर रही हैं। फैजाबाद जो पिछले तीन दशक से सांप्रदायिक राजनीति की राजधानी बन गया है वहां भी 23 जुलाई की शाम दंगा भड़काने की कोशिश हुई। अयोध्या शहर से सटे हुए शहादतगंज के पास के गांव मिर्जापुर में नवाज के ऐन वक्त पुलिस मस्जिद में ताला जड़ देती है। भारी तनाव के बाद ईशा की नवाज तो अदा हो गई पर शहर एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा के अंदेशे से सहम गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस मस्जिद की उम्र सौ साल से ज्यादा है। 22 जुलाई को अयोध्या में गोरखपुर के सांसद और हिंदू युवा वाहिनी के संचालक योगी आदित्यनाथ शहर में आए थे। शहर में हुए इस तनाव के पीछे भी हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ सामने आ रहा है।
पा राज में हो रहे दंगों में प्रशासन की उदासीनता यह बताती है कि एक बार फिर से आम-आवाम के बीच सांप्रदायिकता का जहर घोल करके मूलभूत मुद्दों से भटकाने की राजनीति शुरु हो गई है।

-राजीव यादव

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वरिष्ठ राजनेता श्री नारायण दत्त तिवारी के डी.एन.ए टेस्ट के बाद यह साबित हो गया है कि वह रोहित तिवारी के पिता हैं। समान्य जिंदगी में इन चीजों का कोई विशेष अर्थ नहीं है जैविक संरचना के निर्माण में यह चीजें आम हैं किन्तु तिवारी जी के समर्थन में लिखे जा रहे आलेख में उनको सही साबित करने के लिये तरह-तरह के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। कुतर्क गढ़ने वाले लोग तिवारी जी को सूर्य की उपमा देने से भी नहीं चुके जब वह यह उपमा दे रहे होंगे तब उबके मन में यह नहीं होगा कि यशस्वी कर्ण की जीवन भर क्या मनोदशा रही है। तिवारी जी को सूर्य की उपमा देना सूर्य का अपमान है। हाँ रोहित तिवारी को कर्ण कहा भी जाए तो शायद ज्यादा ठीक होगा। पर उपदेश कुशल बहुतेरे ….की बात सही साबित होती है। तिवारी जी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल तथा भारत सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री रहे है। उनके कर कमलों से हजारों लाखों साहित्यकारों, नीति निर्देशकों ने समय समय पर सम्मान ग्रहण किया है और बहुत सारे उपदेश, नीति कथन तिवारी जी से सुने होंगे किसी भी व्यक्ति का जीवन अय्याशी पूर्ण है वह उसके व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा नहीं होता है और बड़े राजनेताओं को अपने चरित्र से यह साबित करना होता है की वह आम जनों से अलग हैं। आन्ध्र प्रदेश के गवर्नर हाउस का मामला क्या शर्मनाक नहीं है ? उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में तिवारी जी के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के किस्से आज भी प्रचलित हैं। उससे शर्म नहीं आती है श्रीमती उज्ज्वला शर्मा धन्य हैं, उनका पुत्र धन्य हैं जिसने आधुनिक सूरज को दीपक दिखा कर उसकी रोशनी धीमा कर दिया है। शर्मनाक यह भी है कि कुछ लोग श्री तिवारी जी के शर्मनाक कार्यों को जायज ठहराने का कार्य कर रहे हैं। शर्मनाक उन लोगों के लिये भी है जिन्होंने हैं तिवारी जी से सम्मान, उपहार ग्रहण किया होगा। आज सूर्य भी अपनी उपमा ऐसे व्यक्तियों के बराबर सुनकर शरमाया होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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