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Archive for अगस्त 17th, 2012

फिलिस्तीन के साथ भूमंडलीय माध्यमों का रिश्ता बेहद जटिल एवं शत्रुतापूर्ण रहा है।कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिन पर ध्यान देने से शायद बात ज्यादा सफ़ाई से समझ में आ सकती है।ये तथ्य इजरायली माध्यम शोर्धकत्ताओं ने नबम्वर 2000 में प्रकाशित किए थे।
शोधकर्त्ताओं ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबर भेजने वाले संवाददाताओं का अध्ययन करने के बाद बताया कि इजरायल में 300 माध्यम संगठनों के प्रतिनिधि इस संघर्ष की खबर देने के लिए नियुक्त किए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में संवाददाता किसी मध्य-पूर्व में अन्य जगह नियुक्त नहीं हैं।
मिस्र में 120 विदेशी संवाददाता हैं।इनमें से दो-तिहाई पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका से आते हैं। इनमें ज्यादातर संवाददाता वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी से अंग्रेजी में खबर देते हैं।चूंकि खबर देने वाले संवादाता इजरायल में रहकर खबर देते हैं यही वजह है कि इनकी खबरें इजरायली दृष्टिकोण से भरी होती हैं।इनमें अधिकांश संवाददाता यहूदी हैं।ये वर्षों से इजरायल में रह रहे हैं।
औसतन प्रत्येक संवाददाता 10 वर्षों से इजरायल में रह रहा है।अनेक की इजरायली बीबियां हैं।अनेक स्थायी तौर पर ये काम कर रहे हैं।चूंकि इन संवाददाताओं की मानसिकता पश्चिमी है अत: इन्हें इजरायल से अपने को सहज में जोड़ने में परेशानी नहीं होती। 91प्रतिशत संवाददाताओं का मानना है कि उनकी इजरायल के बारे में ‘अच्छी'(गुड) समझ है।
इसके विपरीत 41 प्रतिशत का मानना है कि अरब देशों के बारे में उनकी ‘अच्छी’ (गुड) समझ है।35 प्रतिशत का मानना है कि उनकी ‘मीडियम’ समझ है।ये जूडिज्म के बारे में ज्यादा जानते हैं, 57 प्रतिशत ने कहा कि वे जूडीज्म के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।जबकि मात्र 10 फीसदी ने कहा कि वे इस्लाम के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।
ये संवाददाता अरबी की तुलना में हिब्रू अच्छी जानते हैं:54 फीसदी को हिब्रू की अच्छी जानकारी है जबकि 20 फीसदी को काम लायक ज्ञान है।इसके विपरीत मात्र 6 प्रतिशत को अरबी का अच्छा ज्ञान है।मात्र 42 फीसदी संवाददाताओं को अरबी थोड़ा सा ज्ञान है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी समाचार एजेन्सियों के लिए चंद इजरायली संवाददाता लिखते हैं। फिलिस्तीन के बारे में छठे-छमाहे खबर दी जाती है।फिलिस्तीन के बारे में उनके इलाकों में गए वगैर खबर देदी जाती है।सबसे बुरी बात यह कि इस इलाके में होने वाली घटना के बारे फिलिस्तीनियों की राय जानने की कोशिश तक नहीं की जाती।ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष की वस्तुगत प्रस्तुति संभव है।
भूमंडलीय माध्यम ज्यों ही आतंकवाद को इस्लामिक फंडामेंटलिज्म से जोड़कर बात करते हैं तो जाने-अनजाने इसके दुष्प्रभावों को दुनियाभर के मुसलमानों को झेलना पड़ता है। आतंकवाद चाहे वह किसी भी रुप में व्यक्त हो मूलत: राजनीतिक केटेगरी है। उसे धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है।
जब भी कहीं पर आतंकवादी हमला होता है तो तत्काल मुसलमानों से पूछा जाता है कि आपकी क्या राय है ?प्रश्न उठता है क्या माध्यम भी राय लेते समय धार्मिक अस्मिता का ख्याल करता है ? आमतौर पर भूमंडलीय माध्यम धार्मिक अस्मिता का ख्याल रखते हैं। इसके लिए वे स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों पर जोर देते हैं।स्टीरियोटाईय प्रस्तुतियों के माध्यम से उसकी वैचारिक प्रकृति को छिपाया जाता है।
इस तरह की प्रस्तुतियों में मुख्य जोर इस बात पर रहता है कि वह किसका एजेण्ट है ?जिसका एजेण्ट है उसने क्या दिया और क्या कहा ?ओसामा बिन लादेन के बारे में विभिन्न माध्यमों में जो जानकारियां पस्तुत की गयी हैं उनमें मूलत: इन्हीं बातों का विवरण है।इन पस्तुतियों से उसकी वैचारिक प्रकृति गायब है।
प्रसिध्द माध्यम विशेषज्ञ एम.सी.वासीउनी के अनुसार स्टीरियोटाईप इमेज अंतत: दर्शक और आतंकवादी के बीच सहिष्णुभाव पैदा करती है।इस तरह की प्रस्तुतियों का समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है।पहला,आतंक हिंसा की गतिविधियो को मिलने वाले महत्व से अन्य को वैसी ही कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करती है।
दूसरा,ज्यादा माध्यम कवरेज से यह संभव है कि राज्य के उत्पीड़न में इजाफा हो।यही स्थिति आतंकवादी पैदा करना चाहते हैं।इससे उन्हें अपने लक्ष्य के विस्तार में मदद मिलती है।इस तरह वे राज्य के उत्पीड़न को आमंत्रित करते हैं।जिसका आम जनता के ऊपर बुरा असर होता है।
तीसरा,आतंकवाद का नियमित या विस्तृत कवरेज आम जनता के अंदर भावशून्य स्थिति पैदा करता है।लेकिन कुछ माध्यम विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माध्यम कवरेज ‘सेफ्टी वाल्ब’ की भूमिका अदा करता है।
माध्यम कवरेज से पैदा होने वाली भावशून्यता से आम जनता में सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।वह आतंक और हिंसा को सच्चाई के रुप में देखने लगती है।नैतिक और राजनीतिक तौर पर उसके अन्दर प्रतिरोध का भाव खत्म होने लगता है।सामाजिक तौर पर भावशून्यता की स्थिति पैदा हो जाती है।यह वस्तुत: हिंसा की प्रकृति का विस्तार ही है।भावशून्यता की स्थिति पैदा करने में एक और तत्व मदद करता है वह है आतंकवादी को आतंकवादी की बजाय किसी और नाम से पुकारना।
मसलन् ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी न कहकर ‘जेहादी’ ,’फ्रीडम फाइटर’,’तालिबान’ या इसी तरह का कोई और नाम से जब पुकारा जाता है तो हम उसको जनता से जोड़ने और आतंकवादी गतिविधियों को वैधता प्रदान करने का काम करते हैं।इसी तरह यदि आतंकवादी को सामाजिक नियंत्रण से परे रुपायित किया जाये तब भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।
आतंकवादी गतिविधियों को अमूर्त या निर्वैयक्तिक रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।आतंकवादी कार्रवाई को सिर्फ ‘नुकसानदेह’ घटना के रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है। भावशून्य या संवेदनहीन हो जाने के कारण हिंसा का स्तर बढ़ जाता है,आतंकवादी प्रभाव में वृध्दि हो जाती है,पहले से ज्यादा लोग शिरकत करने लगते हैं।
आतंकवादी हिंसा का एक सिरा हिंसाचार से जुड़ा है तो दूसरा सिरा माध्यमों में प्रस्तुत हिंसा एवं आतंक के कार्यक्रमों से जुड़ा है।आतंकवाद पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरुरी है कि जनमाध्यमों में धर्म,हिंसा और आतंक के कार्यक्रमों पर अंकुश लगाना जरुरी है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के वैचारिक स्रोत पर भी पाबंदी लगाने के बारे में विचार किया जाना चाहिए।वे तमाम कार्यक्रम जो पुरानी मान्यताओं,आचार-व्यवहार,संस्कारों आदि को धारावाहिकों के जरिए प्रसारित करते हैं उनसे आतंकवाद और तत्ववाद को वैचारिक मदद मिलती है। जब तक इस क्षेत्र में प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते तब तक आतंकवाद या तत्ववाद को वैचारिक तौर पर परास्त करना असंभव है।संस्कृति-उद्योग के विकास की गति देखते हुए और बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों को देखते हुए यह कार्य असंभव लग रहा है। फिर भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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सूखे पर सरकारी बयानों और राहत के प्रयासों का सूखा और ज्यादा है | इसे देखकर तो यह लगता है की देश की केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे तो एक देश की है और सूखा किसी दूसरे देश में पडा है | किसी प्रांत की सरकार ने अब तक अपने प्रांत को सूखाग्रस्त घोषित नही किया है |
देश — प्रदेश सूखे की भयंकर चपेट में है | यह लेख लिखने तक खबरों के अनुसार प्रदेश व देश के अनेक भू– भागो में खासकर उत्तरी हिस्सों में औसत से बहुत कम वर्षा हुई है| इसे समाचार पत्रों में औसत वर्षा का 40 प्रतिशत बताया जा रहा है | हालाकि दर — हकीकत में यह उतनी भी नही है | किसानो ने धान की बोआई — रोपाई का काम घटाकर एक तिहाई कर दिया है | लेकिन इस भयंकर सूखे की चिंता चर्चा केवल गाँवों में है , किसानो में है | बाकी सब चिंता मुक्त है | शहरी आबादी में चिंता है तो गर्मी की , पानी बिजली की ,कमी की | सूखे की कोई चिंता नही | सत्ता पक्ष एवं विपक्ष में बैठती रही राजनितिक पार्टियों के उच्च स्तरीय नेताओं , शासन — प्रशासन में बैठे अधिकारियों तथा प्रचार माध्यमी स्तम्भों के यहा तो वर्षा सदाबहार चल रहा है | उनके लिए हर मौसम हर जगह ए. सी . है | इनके लिए कई दशको से खासकर पिछले दो दशको से मौसम लगातार खुशगवार बनता गया है | बेहतर से बेहतर होता गया है | कमोवेश यही स्थिति अधिकाधिक कमाई में लगे आम समाज के सुविधापरस्त मध्य वर्गियो की है | इसमें आम समाज में रहने वाले धनी व्यपारी , अधिकाधिक आमदनियो एवं सुविधाओं का उपभोग कर रहे है चिकित्सक अपेक्षा कृत छोटे स्तर के अधिकारी , उच्च स्तरीय वेतन व आमदनियो पाने वाले अध्यापक , अधिवक्ता व अन्य पेशो के ऐसे ही उच्च परन्तु आम सामाजिक हिस्से शामिल है | इनके यहा भी सालो साल सदाबहार चल रहा है | इस हिस्से का जीवन भी मौसमी मार्या उतार — चढ़ाव से फिलहाल मुक्त है | इसके अलावा इन सभी आम व खास सामाजिक हिस्सों के उपर बैठे
धन कुबेर राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का तो पूछना ही क्या ? उनका सूरज तो दिन रात चमक रहा है | उन्होंने अपने धन पूंजी की ताकत से देश —
दुनिया का पूरा माहौल ही अपने अनुकूल बनवा लिया है | इनके राजनितिक एवं गैर राजनितिक उच्च वर्गीय सेवक देश दुनिया की हर प्रतिकूल परिस्थितियों को धन कुबेरों के स्वार्थो हितो के अधिकाधिक अनुकूल बनाने में लगे है | इन सदाबहार हिस्सों को ही अपनी चर्चा प्रचार का प्रमुख हिस्सा मानने वाले प्रचार माध्यम जगत इन्ही को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करके स्वंय भी इस सदाबहार टोली का हिस्सा बने हुए है |इसीलिए सूखे की भयंकर स्थितियों के वावजूद सूखे पर कही कोई गंभीर चिंता चर्चा नही है | जो चर्चा है वह मौसम की है |

मानसून की बेरुखी की है | कई सालो की वर्षा व फसलो के आंकड़ो की है | लेकिन किसानो , ग्रामीणों उनके मवेशियों की खेती — किसानी और उस पर आधारित जनजीवन की जीविकोपार्जन के संकटों की कही कोई गम्भीर चर्चा नही है | सूखे पर प्रचार माध्यमी खबरों को देख सुनकर ऐसा लगता है मानो मौसम का हाल सुनाया
जा रहा हो | जिसका कोई ख़ास मायने — मतलब नही है उसका कोई ख़ास प्रभाव राष्ट्र व समाज के जनजीवन पर पड़ने वाला न हो | फिर इस सूखे के साथ ही सूखे पर सरकारी बयानों और राहत के प्रयासों का अभाव या सुखा और ज्यादा है | इसे देखकर तो यह लगता है की देश की केन्द्रीय सरकारे तो एक देश की है और सुखा किसी दूसरे देश में पडा है | किसी प्रांत की सरकार ने अब तक अपने प्रांत को सूखाग्रस्त घोषित नही किया है |

वस्तुत: स्थिति है भी ऐसी ही | सदाबहार हिस्सों ने इस देश की आम व्यवस्था से अपना अलगाव कर लिया है | और अपना सदाबहार देश और उसकी स्दाभारी व्यवस्था खड़ी कर ली है | इसीलिए 15 सालो में होती रही 2.5 लाख से अधिक किसानो की आत्महत्याए हमारे सदाबहार हिस्सों के लिए कोई मायने नही रखती | इस सदाबहार
हिस्से के राजनितिक , अर्थशास्त्री ,और अन्य प्रचार माध्यमी विद्वान् कृषि क्षेत्र को , उसमे लगी देश की आधी आबादी के जीवन व जीविकापार्जन को नही देखते न ही वे कृषि क्षेत्र को देश की समूची आबादी के भरण — पोषण की अपरिहार्य आवश्यकता से जोडकर ही देखते है | बल्कि वे उसे देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखते | बल्कि वे उसे देश की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी से यानी देश के सकल घरेलू उत्पाद से देखते – नापते है | वे अपने
भाषणों , प्रचारों लेखो में इस बात को बराबर कहते रहते है की देश की आर्थिक वृद्धि व विकास के साथ अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान घटते — घटते अब केवल 15 प्रतिशत रह गया है | उसकी जगह पर उद्योग वाणिज्य , व्यापार तथा सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जा रहा है | इसे आगे करके ही वे कृषि क्षेत्र को और ज्यादा उपेक्षित करने का काम करते व बढाते जा रहे है | वैसे सही बात तो यह है की कृषि क्षेत्र को योजनाबद्ध रूप में उपेक्षित करके ही अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र के योगदान को घटाया गया है | इसी के तहत कृषि क्षेत्र की सहायताओ — योजनाओं तथा प्रोग्रामो को काटने घटाने के साथ छूटो — अनुदानों को भी काटने घटाने का काम निरंतर किया जाता रहा है |

इन सहायताओ ,छूटो , प्रोत्साहनो को काटकर उसे बड़े व निजी उद्योगों व प्यापार के क्षेत्रो को देने का काम लगातार किया जाता रहा है | इसी के जरिये अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान घटाया जा रहा है | सूखे के
संदर्भ में इस घटाव का एक ज्वलंत उदाहरण यह है की — देश के 60 सालो की
आर्थिक वृद्धि व विकास और खासकर 20 सालो के तीव्र आर्थिक तकनीकी वृद्धि के वावजूद देश की 60 प्रतिशत उपजाऊ जमीन अपेक्षित सिंचाई के लिए मानसूनी वर्षा पर निर्भर है | बहुप्रचारित आधुनिक तकनीक के इस युग में तथा सडको , रेलवे लाइनों , स्टेशनों , हवाई अड्डो बन्दरगाहो
,तकनीकी वृद्धि के वावजूद देश की 60 प्रतिशत उपजाऊ जमीन अपेक्षित सिंचाई के लिए मानसूनी वर्षा पर निर्भर है | बहुप्रचारित आधुनिक तकनीक के इस युग
में तथा सडको , रेलवे लाइनों , स्टेशनों , हवाई अड्डो बन्दरगाहो आदि के रूप में अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढाचे के तीव्र विकास के इस दौर में कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढाचे के विकास का यानी सार्वजनिक सिंचाई के विकास का
नाम तक नही लिया गया है | खासकर 25 सालो में सिंचाई व्यवस्था को किसानो के निजी साधनों के उपर ही छोड़ने का काम किया जाता रहा है | इसी लक्ष्य से १९८५ के बाद से कृषि क्षेत्र के इस बुनियादी विकास को अर्थात सार्वजनिक सिंचाई के साधनों के विकास विस्तार को धीरे — धीरे करके काटने और छोड़ने का काम भी
लगातार किया जाता रहा है | ऐसी हालात में वर्षा कम होने या बहुत होने के फलस्वरूप खेती के सूखने 30 — 40 प्रतिशत तक धान की रोपाई हो पाने का दोष किसे दिया जाना चाहिए ?मानसून को ? या 20 सालो से सदाबहारी बनकर किसान और किसानी को उपेक्षित करने करवाने वाके देश के धनाढ्य , उच्च एवं सुविधा भोगी हिस्सों को और उनकी सेवा में जुटी हुई केन्द्रीय प्रांतीय सरकारों को ?
2 –3 साल बाद एक दो सीजन में वर्षा न होने से सूखे की भयावह स्थिति के लिए मानसून नही बल्कि सिंचाई की सार्वजनिक उपेक्षा , बदहाली व बदइन्तजामी को ही दोषी मान व बताया जाना चाहिए | इसके लिए केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारों से लेकर राष्ट्र व समाज को लेकर इस धनाढ्य व उच्च हिस्सों को ही केवल दोषी नही अपितु अपराधी भी मना जाना चाहिए | इनके इस अपराध का सबूत सूखे पर इनकी चुप्पी , सूखे पर चिंताओं चर्चाओं के अभाव के रूप में स्पष्टत: देखा जा सकता है |
इसीलिए सूखे पर किसान अपने खेत व खेती के लिए स्वंय से जो कुछ कर सकता है उसे तो करेगा ही लेकिन असली मुद्दा यह है की किसान व ग्रामीण समुदाय अपने निजी साधनों पर सिंचाई की निर्भरता की जगह सरकार से सार्वजनिक सिंचाई की माँग उठाने के लिए उसे संगठित होने का प्रयास करेगा या नही ? यह किसानो के लिए महज आवश्यक ही नही बल्कि अपरिहार्य है की वे इसके लिए आगे आये | बार बार के सूखे से निजात पाने के लिए किसानो को इस दिशा में बढना ही होगा साथ ही खाद्यानो की महगाई झेल रही ग्रामीण व शहरी मजदूरों से लेकर कस्बाई व शहरी जनता को भी इस समस्या के लिए किसानो को इस अन्य न्याय स्संग्त मांगो के साथ खड़ा होना चाहिए जनसाधारण को मानसून की कमी के प्रचारों में ही फंसे रहने से अपने दिलो दिमाग को मुक्त करना होगा सचेत होना होगा |
सुनील दत्ता ,
पत्रकार

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कुछ साथियों की धारणा है कि कालक्रम में उद्योग और कृषि के बीच के तथा मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के न केवल मूलभूत विभेद समाप्त हो जाएँगे बल्कि उनके बीच के सभी विभेद समाप्त हो जाएँगे। यह सही नहीं है। कृषि और उद्योग के मूलभूत विभेदों की समाप्ति से उनके बीच के सभी विभेदों का अंत नहीं होगा। उद्योग और कृषि के कामों की स्थितियों में भिन्नता के चलते कुछ ऐसे विभेद, जो मूलभूत नहीं हो सकते हैं, अवश्य ही आगे बने रहेंगे। उद्योग में भी श्रम की स्थितियाँ इसकी सभी प्रशाखाओं के समान नहीं है। उदाहरण के लिए कोयला मजदूरों की श्रम स्थिति मशीनीकृत जूता कारखाने में काम करने वालों की श्रम स्थिति से भिन्न हैं। इसी तरह कच्चा लोहा के खनिज मजदूरों की श्रम स्थिति अभियंत्रण उद्योग में कार्यरत मजदूरों की श्रमस्थिति से भिन्न होती है। अगर उद्योग के अंदर विभिन्न प्रशाखाओं की श्रम स्थितियों में भिन्नता है तो फिर उद्योग और कृषि के बीच निश्चय ही कुछ ज्यादा भिन्नताएँ होंगी।
निश्चय ही ऐसा शारीरिक और मानसिक श्रम के विभेदों के बारे में भी कहा जाएगा। इनके बीच के मूलभूत विभेद और इनके सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर का फर्क निश्चिय ही मिट जायगा। किन्तु कुछ विभेद जो मूलभूत नहीं होंगे (गौण प्रकृति के विभेद) बने रहेंगे। ऐसा इसलिए रहेगा क्योंकि प्रबंधन कर्मियों और मजदूरों की श्रम स्थितियाँ जब भी बिल्कुल एक समान नहीं रहेंगी।
कुछ कामरेड जो इसके विपरीत धारणा रखते हैं, वे शायद मेरे पूर्व के कतिपय बयानों को आधार बना रहे हों जिनमें, उद्योग और कृषि के बीच तथा मानसिक एवं शारीरिक श्रम के बीच के विभेदों के विलोपन की अवधारणा व्यक्त की गई है, इसके बारे में अब बिना किसी हिचक के स्पष्टता के साथ कहा जाना चाहिए कि उसका जो अर्थ है, वह यह कि मूलभूत विभेदों का विलोपन न कि सभी प्रकार के विभेदों का। मेरी अवधारणा को उन कामरेडों ने ठोस रूप में समझा कि यह सभी प्रकार के विभेदों की समाप्ति पर लागू है। कामरेडों ने इसे उस रूप में समझा यह साबित करता है किमेरी उन अवधारणाओं की अभिव्यक्ति सुस्पष्ट नहीं थी और इसलिए असंतोष जनक थी। अब उसे निश्चय ही छोड़ दिया जाना चाहिए और उसकी जगह यह अवधारणा बनानी चाहिए जो बताती है कि उद्योग और कृषि तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेदों का विलोपन होता है और गैर मूलभूत (अर्थात गौण) विभेदों की अवस्थिति कायम रहती है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्यनारायणठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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अब अगर ब्रिटेन के इस एकाधिकारी लूट – पाट एवं प्रभुत्व के संबंधो से अलग करके अंग्रेजो द्वारा ब्रिटिश राज की स्थापना एवं संचालन को ही देश की गुलामी मान लिया जाय तो इससे गुलामी के मूल सम्बन्ध छिपने ही नही जायेंगे , चर्चा तक में नही आयेंगे | फलत: ये सम्बन्ध छिप ही नही जायेंगे बल्कि विरोध से बच जायेंगे और ज्यो के त्यों बने रहेंगे | 1947 में यही हुआ है |
राज के संचालन से अंग्रेजो के हटने और उस राज पर हिन्दुस्तानियों के चढने को ही परतंत्रता का अन्त और स्वतंत्रता का शुभारम्भ घोषित कर दिया गया | मुख्यत: इसीलिए ब्रिटेन और ब्रिटेन की कम्पनियों के साथ बने संबंधो को संचालित करने वाले राज का ढाचा भी जस का तस रह गया | उसमे मुख्य परिवर्तन हुआ तो यही की उसके मुख्य संचालक अब अंग्रेज नही बल्कि भारतीय थे | उच्च अफसरशाही में अंग्रेज नही बल्कि भारतीय बैठे हुए थे | इस राज के मूल ढाचे को ज्यो का त्यों बने रहने का एक बड़ा सबूत यह भी है अभी भी सारे प्रमुख या बुनियादी कानून ब्रिटिश दासता के काल के ही बने हुए है और लागू भी है | कोई भी समझ सकता है की कानून का राज कहे जाने वाले आधुनिक भारतीय राज में अगर मूल या प्रमुख कानून ही दासता के काल के हो तो उसे स्वतंत्र और जनतांत्रिक राज कहना या बताना न्याय संगत नही कहा जा सकता |
इसलिए आँखे मूंदकर 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता को मनाने या मानने की जगह अब यह अहम सवाल खड़ा होना चाहिए की 1947 में ब्रिटेन के साथ लूट व दस्ता के आर्थिक संबंधो को बनाये रखकर फिर ब्रिटिश राज उसके शासन — प्रशासन के मूल ढाचे को , उसे संचालित करने वाले प्रमुख कानूनों को बनाये रखकर 1947 में घोषित स्वतंत्रता को क्या राष्ट्र की स्वतंत्रता माना जाए ? या स्वतंत्रता के रूप में छिपी परतंत्रता ? देश का धनाढ्य वर्ग , कम्पनिया और देश का उच्च हुकुमती तथा गैर हुकुमती हिस्सा इसे स्वतंत्रता मानता है , क्योकि उसे राज के संचालन नियंत्रण से लेकर देश के संसाधनों की लूट का प्रभुत्व अधिकार मिल गया है | ब्रिटिश राज के रहते ही इस देश की धनाढ्य कम्पनियों को तथा उच्च हिस्सों को ( खासकर 1920 के बाद से ) ये अधिकार बढ़ते रहे थे जो 1947 में ब्रिटिश सरकार के आसन पर चढने के साथ परिपूर्ण हो गये | आपसी समझौते से मिली इस स्वतंत्रता में सत्ताधारी , भारतीयों को ये अधिकार ब्रिटेन के साथ ब्रिटिश दासता के समय में बनते बढ़ते रहे आर्थिक , राजनितिक , सामाजिक , सांस्कृतिक संबंधो को बनाये रखने के लिए ही मिले थे | यही सम्बन्ध बाद के दौर में अमेरिका और अन्य साम्राज्यी देशो से भी बढ़ते रहे है | इसके फलस्वरूप इस देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा साम्राज्यी देशो के सहयोग व साठगाठ से और ज्यादा धनाढ्य एवं अधिकार सम्पन्न होता गया है | लेकिन इन्ही स्थितियों एवं संबंधो खासकर आर्थिक , कुटनीतिक संबंधो के चलते जनसाधारण हिस्से की बुनियादी समस्याए — महगाई , बेकारी से लेकर साधन — हीनता , अधिकारहीनता की समस्याए प्रत्यक्ष ब्रिटिश दासता काल से लेकर आज तक न केवल विभिन्न रूपों में बढती भी रही है | इन संबंधो में जीते — मरते हुए कोई भी गम्भीर व समझदार आदमी जनसाधारण के लिए इसके निरंतर बदतर होती दिशा या कहिये जन्घाती दिशा का पूर्वानुमान लगा सकता है | ऐसी स्थिति में जन साधारण 1947 की स्वतंत्रता को ज्यादा से ज्यादा ऐसी आशिक स्वतंत्रता कह सकता है , जिसके भीतर परतंत्रता के मूल सम्बन्ध मौजूद थे व है | बाद के दौर में और वे बढ़ते भी रहे है | इसीलिए ब्रिटिश काल से आज तक चली आ रही अपनी इस परतंत्रता तथा संकटों से युक्त अपनी स्थितियों को बदलने के लिए भी तथा 1947 की स्वतंत्रता को पूर्ण स्वतंत्रता में बदलने के लिए भी देश के इसी जनसाधारण को अपरिहार्यत:खड़ा होना पडेगा | इसके लिए अब साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |

सुनील दत्ता ….पत्रकार

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1947 में अंग्रेजो द्वारा बनाये गये राज शासन – प्रशासन के संचालन व नियंत्रण के अधिकार हिन्दुस्तानियों के हाथ में आ जाने को ही राष्ट्र की स्वतंत्रता का द्योतक माना जाता है | क्योंकि राष्ट्र की परतंत्रता या गुलामी को मुख्यत: ब्रिटिश राज और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभुत्व में ही निहित माना जाता था व है | इसे मानने को दो तीन प्रमुख कारण है | पहला तो किसी क्षेत्र या राष्ट्र का राज्य ही उसका सर्व प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नजर आता है | चाहे वह सामन्ती रहा ब्रिटिश राज हो या चाहे किसी देश का स्वतंत्र माना जाने वाला वर्तमान दौर जैसा जनतांत्रिक राज हो | इसका दुसरा कारण यह है ब्रिटिश राज ही ब्रिटेन द्वारा देश की श्रम संपदा की लूट- पाट को संचालित करने के साथ इसके विरोध के राष्ट्रव्यापी दमन का काम प्रत्यक्षत: करता रहा था | उसके लिए नीतियों और कानूनों को लागू करता रहा था | इसका तीसरा कारण खुद इस राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में लगी रही शक्तियों के एक हिस्से द्वारा लगातार किया जाता रहा यह प्रचार की राज्य का संचालन अंग्रेजो के हाथ से देशवासियों के हाथ में आते ही यह राष्ट्र स्वतंत्र हो जाएगा | जैसा की 1947 के बाद कहा और मान गया |

इन तीनो प्रमुख कारणों के चलते राज व शासन प्रशासन से हटते ही इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र मान लिया | सवाल है की क्या ऐसा मानना ठीक है ? अशत: जाहिरा तौर पर तो ठीक है , लेकिन दरअसल व मुकम्मल तौर पर इसे राष्ट्र की स्वतंत्रता मानना गलत है भ्रामक है | क्योंकि किसी भी परतंत्र व्यक्ति , वर्ग या राष्ट्र की परतंत्रता उसको परतंत्र बनाने वाली द्रश्य या अदृश्य शक्ति में नही है , बल्कि मुख्यत: उन उद्देश्यों व संबंधो में निहित होती है जो उसे परतंत्र बनाने के लिए बनाये गये होते है | इसलिए ब्रिटिश काल में इस देश की परतंत्रता को जानने समझने के लिए ब्रिटेन द्वारा इस देश के साथ बनाये गये संबंधो और उद्देश्यों को
जरुर देखा जाना चाहिए |

सभी जानते है की ब्रिटेन के साथ इस राष्ट्र के दासता के संबंधो की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी | यह उसके विश्वव्यापी बाजार और उस पर एकाधिकार के प्रयासों का ही एक हिस्सा था , ताकि कम्पनी अपने व्यापार , बाजार व लाभ — मुनाफे का निरंतर विस्तार कर सके | कम्पनी ने इस देश के साथ सम्बन्ध बढाने के साथ — साथ उस पर एकाधिकार स्थापित करने में आई हर बाधा को हटाने के लिए सैन्य कारवाइयो को चलाते रहने का भी काम निरन्तर किया | इसी के अंतर्गत उसने सबसे पहले 1757 में बंगाल में छोटे से इलाके में
कम्पनी राज स्थापित किया | फिर बाद में शासन प्रशासन में बदलाव , सुधारों को निरंतर आआगे बढाते हए कम्पनी ने अपने व्यापार के साथ राज्य का विस्तार जारी रखा | कम्पनी ने यह काम पूरे देश की व्यापारिक लूट – पाट के लिए तथा अपने फ्रांसीसी , डच ,जैसे विदेशी व्यापारिक विरोधियो को यहाँ से भगाने के लिए और राजाओं , नबावो द्वारा खड़े किए जाते रहे विरोधो — प्रतिरोधो को खत्म कर देने के लिए किया था | साफ़ बात है की ईस्ट इंडिया कम्पनी वाला ब्रिटिश राज या 1857 के बाद का ब्रिटिश साम्राज्यी राज ब्रिटेन के साथ बने
इन उन संबंधो के बुनियाद में नही था | उसकी बुनियाद तो ब्रिटिश कम्पनी और 1840 के बाद से खासकर 1857 के बाद सभी ब्रिटिश कम्पनियों के व्यापारिक और फिर औद्योगिक व महाजनी लूटपाट के लिए बनाये व बढाये गये आर्थिक संबंधो में निहित थी | कम्पनी यहा के उत्पादनों को कच्चे मालो को तथा श्रम शक्ति को
सस्ते में खरीदने और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशो के उत्पादन को ऊँचे मूल्यों पर बेच करके भारी लाभ लुटने के व्यापारिक सम्बन्ध शुरू से ही अर्थात अपने राज्य की स्थापना के पहले से ही बनाती रही | बाद में वह देश के समूचे बाजार पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आगे बढाने के साथ देश के कच्चे माल के स्रोतों पर भी लगातार कब्जा जमाती बढाती रही | अपने उद्योग व्यापार के लिए नए किस्म के कच्चे — पक्के मालो का उत्पादन करवाती रही | नील , अफीम कपास तम्बाकू आदि की खेतियो को बढावा देकर स्थानीय एवं परम्परागत खेतियो को तोड़ने का काम करती रही | दस्तकारियो को नष्ट करने का भी काम किया | इस सारे काम में कम्पनी राज या 1857के बाद ब्रिटेन की संसद सवारा संचालित ब्रिटिश राज , ब्रिटिश कम्पनियों की व्यापारिक लूट व प्रभुत्व के संबंधो को बनाने बढाने एवं चलाने में सहयोग करता रहा | यह राज खुद भी लगान तथा टैक्सों करो आदि के जरिये इस देश की जनता की लूट को उन पर ब्रिटेन के प्रभुत्व व दासता को बढाता रहा | इसके फलस्वरूप और देश के बाजार पर देश की श्रम संपदा पर ब्रिटिश कम्पनियों का और ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित होता रहा |बीसवी शताब्दी अर्थात १९०० की शुरुआत से इन लूट के संबंधो में व्यापारिक औद्योगिक शोषण लूट के साथ महाजनी लूट का सम्बन्ध भी जुड़ गया | अब ब्रिटेन से मालो मशीनों तकनीको के इस देश में निर्यात के साथ पूंजी का भी निर्यात होने लगा | ब्रिटेन के विशाल बैंको व उद्योगों की सम्मलित पूंजी ने इस देश के विभिन्न क्षेत्रो में माल मशीन तकनीक के बिक्री बाजार से भारी लाभ कमाने के साथ देश की श्रम संपदा से सूद दर सूद कमाने का महाजनी सम्बन्ध भी बना लिए | इन्ही संबंधो में ब्रिटिश कम्पनिया लाभ सूद के साथ ब्रिटेन की औध्यिगिक जरूरतों के साथ आम उपभोग के मालो सामानों को भी इस देश से ले जाती रही है | फलस्वरूप ब्रिटेन को धनाढ्य , विकसित था साधन सिविधा व शक्ति सम्पन्न बनाती रही तो इस देश को पराधीन , परनिर्भर , पिछड़ा . गरीब व कमजोर बनाती रही |
मुल्त: इन्ही संबंधो को बढाने व मजबूत करने के लिए ही ब्रिटेन से आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति का भी निर्यात किया जाता रहा | और उसके प्रभाव प्रभुत्व को भी इस देश पर फैलाया , बढाया जाता रहा | स्पष्ट बात है की ब्रिटिश राज को स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेजो ने इस देश को अपना गुलाम नही बनाया था , बल्कि मुख्यत: अपने व्यापारिक , औद्योगिक व महाजनी लूट पाट के लिए तथा इस देश के बाजार से लेकर श्रम संपदा पर एकाधिकार प्रभुत्व जमाने के लिए इस देश को पराधीन बनाया था | लूट के इन संबंधो को संचालित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही ब्रिटिश राज को , शासन प्रशासन व सैन्य व्यवस्था को स्थापित किया था | इसी के लिए ब्रिटिश राज व शासन — प्रशासन ने शताब्दियों तक इस देश में एक के बाद एक नीतियों , कानूनों को बनाया व लागू किया | इनका विरोध करने वाले देशवासियों एवं राष्ट्रवादियो को ब्रिटिश राज अपने पूरे दौर में हर तरह के जुल्म व अत्याचार का शिकार बनाता रहा।
क्रमश:

-सुनील दत्ता
पत्रकार

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शहर और देहात तथा मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के पारस्परिक विरोध का विलोपन और उनके बीच के विभेदों का अंत

यह शीर्षक ढेर सारी समस्याओं को समेटता है जो तात्विक रूप से एक दूसरे से भिन्न हैं। मैंने उन्हें एक साथ कर दिया है, इसलिए नहीं कि हम उनका घोरमठ्ठा करना चाहते हैं, बल्कि केवल इनकी व्याख्या की संक्षिप्तता के लिए ऐसा करना पड़ा है।
शहर और देहात के बीच तथा उद्योग और कृषि के बीच के पारस्परिक विरोध (Anti-Thesis) के विलोपन की जानी-मानी समस्या है, जिस पर माक्र्स और ऐंगेल्स ने विचार किया था। इस पारस्परिक विरोध का आर्थिक आधार शहर द्वारा देहात का शोषण है। पूँजीवाद के अंदर उद्योग, व्यापार और उधार ऋण (Creclit) के विकास के पूरे दौर में किसानों और देहात को अधिकांश आबादी की लूट और बर्बादी के कारण परस्पर विरोध (Anti-Thesis) पैदा हुआ है। इसलिए शहर और देहात के परस्पर विरोध को पूँजीवाद के अंदर स्वार्थ के प्रतिशोध के रूप में देखा समझा जा सकता है। यही वह चीज है जिसने देहात के अंदर शहर और शहरवासियों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण भावनाओं को उभारा।
निःसंदेह हमारे देश में पूँजीवाद और शोषण प्रणाली के अवसान के साथ और समाजवादी व्यवस्था के मजबूत होने के साथ ही देहात और शहर तथा कृषि और उद्योग के बीच स्वार्थ के प्रतिशोध के भाव का लुप्त होना लाजिमी था और यही हुआ भी। सामजवादी शहर द्वारा और मजदूर वर्ग के द्वारा किसानों को जमींदार और कुलकों को मिटाने में दी गई सहायता ने मजदूर और किसानों की एकता को मजबूत किया। किसानों को तथा सामूहिक फार्मों को प्रथम श्रेणी के ट्रैक्टर और अन्य मशीनों की आपूर्ति ने किसानों और मजदूरों की एकता को मित्रता में बदल दिया। यह सही हे कि मजदूर और सामूहिक फार्म के किसान दो भिन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे एक दूसरे से भिन्न अवस्थाओं से आते हैं। लेकिन यह फर्क इनकी दोस्ती को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करता। इसके विपरीत इनके स्वार्थ एक ही पंक्ति में खड़े होते हैं। वह स्वार्थ है समाजवादी समाज को मजबूत करना और साम्यवादी विजय हासिल करना। इसलिए यह आश्चर्यजनक नही ंहै कि देहातों में शहर के प्रति पुराना घृणाभाव की तो बात ही छोड़ दीजिए अब इनमें पुराने अविश्वास के चिन्ह भी शेष नहीं रह गए।
इन सबका अर्थ यह है कि शहर और देहात तथा उद्योग और कृषि के बीच परस्पर विरोध (Anti-Thesis) का आधार हमारी समाजवादी व्यवस्था में विलुप्त हो चुका है।
इसका निश्चय ही यह माने नहीं है कि नगर देहात के परस्पर विरोध भावों के विलोपन का यह परिणाम होगा कि ‘‘महानगर बर्बाद होंगे’’, (ऐंगेल्स, ऐंटीडयूहरिंग)। यही नही ंहोगा कि महानगर बर्बाद नहीं होंगे, बल्कि अधिकधिक सांस्कृतिक विकास के नये केन्द्रों के रूप में अनेकानेक महानगर प्रकट होंगे। ये नए महानगर न केवल बड़े उद्योगों के केन्द्र होंगे, बल्कि कृषि उत्पादों के प्रोसेसिंग तथा खाद्य सामग्रियों की विभिन्न प्रशाखाओं के जबर्दस्त विकास के केन्द्र भी होंगे। यह राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाएगा और नगर तथा देहात की जीवन दशा को उन्नत करेगा।
शारीरिक और मानसिक श्रम के पारस्परिक विरोधाभास को समाप्त करने की समस्या को मामले में भी ऐसी ही स्थिति है।यह भी पुरानी समस्या है जिसे माक्र्स ऐंगेल्स द्वारा विचार किया गया। दोनों के बीच के पारस्परिक विरोधाभास का आर्थिक आधार है मानसिक श्रम द्वारा शारीरिक श्रम का शोषण। इस खाई से सब अवगत हैं जिसने पूँजीवाद के अंदर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंध कर्मियों और शारीरिक श्रमिकों को विभाजित कर दिया। हम जानते हैं कि इसी खाई ने मैनेजरों, फोरमैनों, इंजीनियरों एवं तकनीकी कर्मियों के प्रति मजदूरों के अंदर शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण पैदा किया और मजदूर इन्हें अपना शत्रु मानने लगे। स्वभावतः पूँजीवाद के अवसान के बाद मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के परस्पर शत्रुता पूर्ण विरोधाभास का विलोपन अवश्यम्भावी था और हमारी समाजवादी व्यवस्था में सचमुच यह अदृश्य हो गया। आज शारीरिक श्रमिक और प्रबंध-कर्मीगण आपस में दुश्मन नहीं हैं। वे उत्पादन कार्य के एक ही सामूहिक परिवार के सदस्य के रूप में कामरेड हैं, दोस्त हैं जो उत्पादन बढ़ाने और प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अभिरुचि ले रहे हैं। उनमें पुरानी शत्रुता के चिह्न भी शेष नजर नहीं आते।
नगर (उद्योग) और गाँव (कृषि) के बीच तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के विभेदों ;क्पेजपदबजपवदद्ध को मिटाने की समस्या का चरित्र ही भिन्न है। इस समस्या पर माक्र्सवादी शास्त्रों में विचार नहीं किया गया। यह नई समस्या है जो हमारी समाजवादी रचना प्रक्रिया के आचरण से उभरी है।
क्या यह एक काल्पनिक समस्या है? क्या इसका हमारे लिए कोई व्यावहारिक या सैद्धांतिक महत्व है? नहीं, यह समस्या हमारे लिए काल्पनिक नहीं समझी जा सकती। इसके विपरीत, हमारे लिए यह गम्भीर महत्व की समस्या है।
उदाहरण के लिए कृषि और उद्योग के विभेद को लें। हमारे देश में यह विभेद केवल इस तथ्य में नहीं है कि कृषि के श्रम से भिन्न हैं उद्योग के श्रम, बल्कि मुख्य रूप से, प्रमुखतया इस तथ्य में कि जहाँ उद्योग में उत्पादन के साधनों और उत्पाद पर सार्वजनिक स्वामित्व है, वहीं कृषि में सार्वजनिक नहीं, किन्तु समूह का स्वामित्व वाला सामूहिक फार्म है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि यह तथ्य माल परिचालन की प्रथा बनाए रखने की ओर ले जाता है और जब उद्योग और कृषि का विभेद मिटेगा तभी माल उत्पादन के मौजूदा परिणाम मिट सकेंगे। इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कृषि और उद्योग के बीच के इस मूलभूत विभेद को मिटाना हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की बात है।
यही बात मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेद को मिटाने की समस्या के बारे में भी अवश्य कही जाएगी। यह सच है कि यह भी हमारे लिए सर्वाधिक महत्व की समस्या है। समाजवाद स्पर्धा आंदोलन ने जब तक जन अभियान का शकल अख्तियार नहीं किया था, तब तक हमारे उद्योग की प्रगति बहुत ही रुक-रुककर चल रही थी इसे देखकर अनेक साथियों ने सलाह दी कि औद्योगिक विकास की गति को धीमा कर दिया जाय। प्रगति में इस लड़खड़ाहट का कारण यह था कि हमारे मजदूरों का सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर नीचा था और हमारे प्राविधिक कर्मियों ;ज्मबीदपबंस चमतेवददमसद्ध से वे काफी पीछे थे। लेकिन तब स्थिति बदल गई जब समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन ने जन आन्दोलन का रूप ले लिया। उसी क्षण से औद्योगिक विकास की गति तेज हो गई।
क्यों समाजवादी स्पर्धा आन्दोलन का चरित्र जन आंदोलन का हो गया? क्योंकि मजदूरों के बीच से कामरेडों के सभी के सभी ग्रुप आगे बढ़कर न केवल तकनीकी ज्ञान की न्यूनतम जरूरतों पर महारत हासिल कर ली, बल्कि और आगे बढ़कर प्राविधिक कर्मियों के स्तर तक पहुँच गए। उन्होंने प्राविधिकों और अभियंताओं को ठीक करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने पहले से चल रहे तरीकों को पुराना घोषित कर तोड़ दिया और नई अद्यतन प्रणालियाँ अपनाईं। ऐसा ही बहुत कुछ किया। हमें क्या होना चाहिए था, अगर केवल अलग-अलग समूह नहीं, बल्कि मजदूरों का अधिकांश हिस्सा तकनीसियनों और इंजीनियरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर तक पहुँच गया होता? तब हमारा उद्योग उस ऊँचाई पर पहुँच गया होता जहाँ दूसरे देशों के उद्योगों का पहुँचना असंभव था। इसलिए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मजदूरों के सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर को ऊँचा उठाकर मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के मूलभूत पारस्पिरिक विभेद को मिटाना हमारे लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक महत्व का है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

लो क सं घ र्ष !

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राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित (सानुपातिक) विकास नियम भी इसी दिशा में काम करता है जिसने उत्पादन में प्रतियोगिता और अराजकता को समाप्त कर दिया है।
हमारी वार्षिक और पंचवर्षीय योजनाएँ भी इसी दिशा में काम करती हैं, जिनकी आर्थिक नीतियाँ आमतौर पर राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम की आवश्यकताओं पर आधारित हैं।
सब मिलाकर परिणाम यह है कि हमारे देश में मूल्य नियम परिचालन का प्रभाव क्षेत्र सीमित है और इसलिए हमारी व्यवस्था में मूल्य नियम उत्पादन का नियामक नहीं बन सकता।
सचमुच यही उस ज्वलंत तथ्य की व्याख्या है कि हमारे देश में इसके बावजूद कि समाजवादी उत्पादन का अनवरत तेज विकास अति उत्पादन का संकट पैदा नहीं करता, वहीं पूँजीवादी देशों में जहाँ इसी मूल्य नियम का प्रभाव-क्षेत्र व्यापक है, उत्पादन के धीमा विकास के बावजूद समय-समय पर अति उत्पादन का संकट पैदा करता है।
कहा गया है कि मूल्य नियम एक ऐसा चिर स्थायी कानून है जो ऐतिहासिक विकास की सही अवधि में लागू होता है। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट में भी यह बिल्कुल सच नहीं है। मूल्य नियम की तरह मूल्य भी एक ऐतिहासिक श्रेणी है जिसका सम्बंध माल उत्पादन के अस्तित्व के साथ जुड़ा है। माल उत्पादन के विलुप्त होने के साथ ही मूल्य और इसका स्वरूप तथा मूल्य नियम भी विलुप्त हो जाएगा।
समाजवादी समाज के दूसरे चरण में उत्पादित सामानों पर खर्च किए गए श्रम की गणना मोटा मोटी अनुमानित तरीके से इसके मूल्य और परिणाम के आधार पर नहीं किया जाएगा, जैसा माल उत्पादन प्रक्रिया के अंदर होता है, बल्कि उत्पादित सामानों पर सीधे और तुरन्त खर्च किए गए समय के परिमाण और उसके घंटो की संख्या के आधार पर किया जाएगा। चूँकि श्रम विभाजन, उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में इसका वितरण मूल्य नियम से विनियमित नहीं होगा क्योंकि जब तक इसका परिचालक बंद हो गया रहेगा, बल्कि यह सामानों के लिए समाज की बढ़ती माँगों से विनियमित होगा। तब समाज की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन प्रक्रिया संचालित होगी। यह ऐसा समाज होगा जब उत्पादन का नियमन समाज की आवश्यकताओं द्वारा होगा। इस तरह समाज की आवश्यकताओं का आकलन करना हमारे योजना निकायों के लिए सबसे बड़े महत्व का कार्य हो जाएगा।
यह अवधारणा भी पूर्णतः गलत है कि हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत साम्यवादी समाज के प्रथम चरण में उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं में श्रम विभाजन के अनुपात का निर्धारण मूल्य नियम द्वारा होता है।
अगर यह सच होता तो यह समझ पाना कठिन होता कि आखिर हमारे हल्के उद्योंगों, जो काफी लाभदायक हैं, को पूरी तरह क्यों नहीं विकसित किया जा रहा है, जबकि भारी उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो कम लाभ देने वाले हैं और कुछ तो बिल्कुल घाटे पर चल रहे हैं।
अगर यह सच होता तो इसे भी नहीं समझा जा सकता था कि हमारे अनेक भारी उद्योगों संयंत्रों, जो अभी भी लाभदायक नहीं है, और जहाँ मजदूरों के श्रम का समुचित रिटर्न भी नहीं आता है, को बंद क्यों नहीं कर दिया जाता और उसकी जगह हल्का उद्योग संयंत्रों जो निश्चिय यही लाभदायक होते और जहाँ मजदूरों के श्रम का रिटर्न काफी बड़ा आता, क्यों नहीं चालू कर दिया जाता है?
अगर यह सच होता तो इसे भी समझना मुश्किल होता कि ऐसे संयंत्रों से, जो कम लाभदायक हैं (यद्यपि हमारी अर्थ व्यवस्था के लिये आवश्यक हैं) मजदूरों का स्थानांतरण ऐसे संयंत्रों के क्यों नहीं कर दिया जाता जो मूल्य नियम के मुताबिक ज्यादा लाभदायक हैं और जिनके बारे में माना जाता है कि वह (अर्थात मूल्य नियम) उत्पादन की विभिन्न प्रशाखाओं के बीच श्रम विभाजन का अनुपात निर्धारित करता है।
यह स्पष्ट है कि अगर हम इन कामरेडों का नेतृत्व मान लें तो उपभोक्ता सामानों के उत्पादन के पक्ष में उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता देना हमें रोक देना चाहिए। लेकिन इसका क्या परिणाम होगा जब उत्पादन के साधनों के उत्पादन की प्राथमिकता समाप्त कर दी जाएगी? परिणाम होगा राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के निरंतर विकास की संभावनाओं को बर्बाद कर देना क्योंकि उत्पादन के साधनों के बगैर उत्पादन के राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का निरंतर विकास एवं विस्तार नहीं किया जा सकता।
ये कामरेड भूल जाते हैं कि मूल्य नियम केवल पूँजीवाद में उत्पादन का नियामक होता है जहाँ उत्पादन साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व, उत्पादन अराजकता और अति उत्पादन का संकट होता है। वे भूलते हैं कि हमारे देश में उत्पादन साधनों पर सामाजिक स्वामित्व और संतुलित राष्ट्रीय विकास नियम दरअसल मूल्य नियम के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हैं और हमारे वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधान तदनुसार बने हैं भी, मूल्य नियम के प्रभाव को कटाते हैं।
कुछ कामरेड इससे यह नतीजा निकालते हैं कि राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था का संतुलित विकास नियम और अर्थ नियोजन उत्पादन की लाभदायकता को ही अभिशून्य का देते हैं। यह बिल्कुल सच नहीं है। बल्कि बात उल्टी है। अगर लाभदायकता को प्रत्येक प्लांट और प्रत्येक उद्योग के साथ अलग-अलग नहीं देखें, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्रीय विकास को दृष्टि में रखते हुए आगामी दस वर्षों को देखें, जो इस मुद्दे पर सही दृष्टिकोरण होगा, तो तात्कालिक और क्षणिक लाभदायकता का प्रश्न नीचे चला जाएगा। राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के संतुलित विकास नियम और तदनुसार अर्थ नियोजन ;म्बवदवउपब च्संददपदहद्ध से अपेक्षाकृत ऊँचा विकास सुनिश्चित होता हैं और इस राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने वाले सामाजिक आर्थिक संकटों से बचते हैं।
संक्षेप में, निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था में उत्पादन की विभिन्न प्रभाखाओं के बीच श्रम विभाजन का ‘अनुपात-नियामक’ मूल्य का नियम कभी नहीं बन सकता।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के शासकीय कन्या महाविद्यालय में दिया गया प्रखर चिंतक — कवियत्री महादेवी वर्मा का यह व्याख्यान आप को साझा कर रहा हूँ |

मुझे पता नही था की आप के बीच आना है दिन भर घुमती रही अन्त में यही आई हूँ तो बहुत थकी हूँ | आप से बहुत बात करना चाहती थी लेकिन बंधुओ ने मौका नही दिया | अब आप से इतना कहना चाहती हूँ की भारत का भविष्य आपके हाथ में है , लडको के हाथ में नही है हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
लेकिन हमारी संस्कृति ने हमे बहुत शक्ति दी है | देखिये , ब्रह्मा के चार मुँह है , सो कोई नही जानता उनको क्यों बनाया क्योंकि चार मुँह से हो सकता है , चार तरह की बात करते रहे होंगे | बनाया तो सरस्वती को है | सरस्वती एक बात करती है | हमारे ज्ञान की अधिष्ठात्री है |हाथ में वीणा लिए हुए है , पुस्तक लिए हुए है , अक्ष माला लिए हुए है | समय , हर क्षण का प्रतीक है वो | और समयके लिए सृजन का प्रतीक है |
आप देखिये , ऐश्वर्य मिलता है घर मिलता है , लेकिन अगर घर में पत्नी न हो , बहन न हो ,माँ न हो तो कैसा घर है | वास्तव में वह लक्ष्मी है | शिव उस के मस्तक पर है | शवेताबरा
है , सब को मंगलमय रखती है और जब आसुरी शक्तिया ध्वस्त करने लगती है तो वह आसुरी शक्तियों पर आरूढ़ होती है , तब वह सिंहवाहिनी होती है , दुर्गा होती है | बड़ी शक्ति है उसमे | प्रारम्भ में संस्कृति ने हमे महत्व दिया , लेकिन समाज ने धीरे — धीरे हमारा महत्व छीन लिया , कब छीन लिया ? जब आप कमजोर बनी , सिर्फ लक्ष्मी रह गई , सम्पत्ति बन गई |
आप जो नए युग की नारी है , आप को बड़ा काम करना है | अपनी शक्ति को पहचानना है | सम्पत्ति होना अस्वीकार कर दो | सामान है क्या आप?सब आप को सामान मानते है और अगर पति न रहे , तो जैसे खिलौना फेंक देता है बच्चा , ऐसे स्त्री को फेंक देते है | कानून ने हमे बहुत अधिकार दिए है | लेकिन कानून पात्रता नही देगा | पात्रता आप से आएगी | हमारा युग बड़ा कठिन था | हमे लड़ाई लड़नी पड़ी | पुलिस की लाठियों के सामने , गोलियों के सामने खड़े रहे और फिर पढने के लिए चारो ओर भटकते रहे | आप को सब सुविधाए है | इस लिए आप देश को बनाइए जैसा आप बनाएगी , वैसा देश बनेगा | तो आप इस भारत की धरती की तरह , जैसे सीता को भूमिजा कहते है , वैसे भूमिजा है आप आप सीता बनिये | मान लिया की राम रक्षा करने गये थे | वन में चले गये थे की रक्षा करंगे , लेकिन रावण के यहा रक्षा कौन करता था सीता की ? वह तो राम लक्ष्मण नही थे | उन्हें पता नही था | ढूढ़ रहे थे | सीता ने अपने वर्चस्व से , अपनी शक्ति से अपनी रक्षा की | रावण उसको अपने प्रासाद में भवन में नही ले जा सका | अशोक वाटिका में रखा |
और उसकी शक्ति देखिये | अग्नि परीक्षा दी उसने | और उसका तेजस्वी रूप देखिये | जब राम ने कहा , लव — कुश बड़े हो और राम , लव — कुश से हार गये तो उन्होंने सीता से कहा की अब अयोध्या की महारानी होइए और अयोध्या चलिए | सीता ने इनकार कर दिया | राम ने कहा प्रजा के सामने सिर्फ परीक्षा दे दीजिये | अस्वीकार कर दिया उसने |
कोई माता अपने पुत्रो के सामने परीक्षा देती है ? अपने सतीत्व के लिए ? नही देती है | तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और राम ने जब बहुत कहा तो सीता ने धरती में प्रवेश कर लिया |
अब उस की शक्ति देखिये | वो चाहती तो राम के हाथ पाँव जोडती , अयोध्या की रानी हो जाती , लेकिन उसने नही होना चाहा | ऐसा पति जो किसी के कहने से , पति का कर्तव्य भूल जाए , उसके साथ क्यों जायेगी ? नही गई वह | सो मैं बार — बार कहती हूँ | सीता बनो , तुम्हारा उत्तर होना चाहिए , हम तो सीता है ही हम तो धरती की पुत्री है | स्वंय शक्ति रखती है | वह आप का घर बनाती है | आपको सुख देती है | आपको मंगलमय बनाती है | कितने रूपों में पुरुष को सहयोग देती है | वह पति को कितना आत्मत्याग सिखाती है | पुत्र को कितना तेजस्वी बनाती है | वह तो मानव जीवन की निर्मात्री है | जीवन की श्रुति है वह | बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसकी गोद में आएगा , छाए राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो, किसी माता की गोद में किसी माता के आंचल की छाया में बड़ा होगा | उसकी आँखों के सपने अपने आप को देखेगा | वह उसे अंगुली पकड कर चलना सिखाएगी | आप अपने को छोटा मत समझिये |
आपके भी कुछ कर्तव्य है | हमने देखा , आधुनिका बनने के लिए , लडकिया घंटे भर घुघराले बाल बनाएगी | आँखों में काजल लगाएगी , होठ रंगेगी , चेहरा रंगेगी | एक जगह हम गये तो रंगे चेहरे वाली लडकिया सामने बैठी थी | हमने कहा , पहले मुँह धोकर आओ , हम तो पहचान नही पाती आप को |
आदमी तो आदमी है न | वह आपको कठपुतली बना देता है | आप लड़के को कोई खिलौना दे दीजिये तोडकर देखेगा | लेकिन लड़की घर बसाएगी , गृहस्थी बसाएगी , घरौदा बनाएगी , उसमे गुड्डे — गुड्डी बैठाएगी | उनका व्याह रचाएगी , यानी यह सब कुछ जानती है | छोटी लड़की भी | और लड़के को देखिये तो उसकी टांग तोड़ देगा , सर फोड़ देगा | पुरुष का स्वभाव ही आक्रामक है | अगर स्त्री उसे सयम नही सिखाएगी तो फिर वह सयम से नही रहता || हमारे युग के एक बड़े व्यक्ति ने कहा की राष्ट्र स्वतंत्र नही होगा , यदि उसकी नारी जो शक्ति है वो स्वतंत्र नही होगी | जितनी कला है वह आप के पास है | जितनी विद्या है , वह आप के पास है | आप तितली या कठपुतली मत बनिये | साक्षात शक्ति स्वरूपा है आप | आप शक्ति को पहचानिए और देश को बनाइए | मेरी मंगलकामना आपके साथ है |
– सुनील दत्ता
आभार-लोक गंगा पत्रिका

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कभी-कभी यह पूछा जाता है कि हमारे देश में समाजवाद के अंदर क्या मूल्य के नियम का अस्तित्व है? और क्या वह काम करता है?’

हाँ वह अस्तित्व में है, और वह काम भी करता है। जहाँ कहीं माल और माल का उत्पादन होता है, वहाँ मूल्य का नियम काम करता है।
हमारे देश में मूल्य का नियम सबसे पहले माल के परिचलन, खरीद और बिक्री द्वारा माल का विनिमय, व्यक्तिगत उपभोग के लिए सामग्रियों का विनियम के क्षेत्र में काम करता है। यहाँ इस क्षेत्र में एक सीमा तक मूल्य का नियम सही माने में नियमन कार्य को संरक्षित करता है।
किन्तु मूल्य नियम केवल माल के परिचलन क्षेत्र तक ही सीमित नहीं होता है। इसका विस्तार उत्पादन क्षेत्र में भी है। यह सच है कि मूल्य नियम हमारे समाजवादी उत्पादन का नियामक नहीं है फिर भी यह हमारे उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्पादन निर्धारित करते समय हम इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकते। वास्तव में उपभोक्ता सामान, जिसकी जरूरत उत्पादन प्रक्रिया में खर्चित श्रम शक्ति की क्षतिपूर्ति के किए होती है, हमारे देश में मूल्य नियम के अन्तर्गत ही माल के रूप में उत्पादित और प्राप्त किए जाते हैं। इसी रूप में मूल्य नियम उत्पादन पर प्रभाव डालता है। इस मामले में लागत लेखा ;बवेज ंबबवनदजपदहद्धए लाभदायकता, उत्पादन लागत, दाम, इत्यादि जैसी चीजें हमारे प्रतिष्ठानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मूल्य नियम को ध्यान में रखे बगैर हमारे प्रतिष्ठान काम नहीं कर सकते और अवश्य ही करना भी नहीं चाहिए।
क्या यह अच्छी बात है? यह बड़ी बात भी नहीं है। वर्तमान समय में यह सचमुच बड़ी बात नहीं है। यह हमारे प्रतिष्ठानों के व्यावसायिक प्रबंधकों को, उत्पादन को युक्तिसंगत मितव्ययिता कुशलता के आधार पर अनुशासित करने के क्षेत्र में प्रशिक्षित करता है। यह इसलिए बड़ी बात नहीं है क्योंकि यह हमारे प्रबंधकों को सिखाता है कि उत्पादन परिणाम की कैसे गणना की जाय, और यह भी कि इसके विस्तार और महत्व को ठोस रूप में कैसे रेखांकित किया जाय, अनुमानित आंकड़े जैसे गोल मटोल हवाई और वाहियात बातों से कैसे बचा जाय। यह बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह हमारे प्रबंधक को सिखाता है कि हमारे उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्निहित आम स्रोतों को कैसे देखा जाय, उन्हेंकैसे पाया जाय और उनका बेहतर इस्तेमाल किया जाय तथा उन्हें पैसे तले रौंदकर बर्बाद होने से कैसे बचाया जाय। यह बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह हमारे प्रशासन को उत्पादन की सुसंगत उन्नति, उत्पादन लागत कम करने, लागत लेखा के अनुशासन के अनुपालन और प्रतिष्ठानों के अधिकाधिक उपयोगी एवं लाभदायक बनाने की विधि सिखाता है। यह एक अच्छा व्यावहारिक विद्यालय है जो हमारे प्रबंधक कर्मियों की क्षमता को बढ़ाता है और उन्हें हमारे समाजवादी उत्पादन की वर्तमान अवस्था के अच्छे परिपक्व नेता के रूप में विकसित करता है।
कठिनाई यह नहीं है कि हमारे देश का उत्पादन मूल्य नियम से प्रभावित है। कठिनाई यह है कि कुछेक अपवाद को छोड़कर हमारे प्रशासक और योजनाकार मूल्य नियम के परिचालन से बहुत कम अवगत हैं, वे उनका अध्ययन नहीं करते और अपनी गणना में इसका हिसाब रख पाने में असमर्थ हैं। दाम निर्धारण नीति के क्षेत्र में अस्पष्टता इस बात का प्रतीक है कि इस मामले में पूरी दिशाहीनता व्याप्त है। ऐसे अनेकों उदाहरणों में एक यह है कि कुछ समय पहले यह निश्चिय किया गया कि कपास और अनाज के दामों, कपास उगाने के हित में समंजन किया जाय, कपास उत्पादकों को बेचे जाने वाले अनाज की कीमत और ज्यादा सही किया जाय और राज्य को आपूर्ति किए जाने वाले कपास का दाम बढ़ा दिया जाय। हमारे प्रशासकीय प्रबंधन और योजनाकारों ने एक प्रस्ताव इसके लिए प्रस्तुत किया जा आश्चर्यजनक एवं अजीबोगरीब था। प्रस्ताव में सुझाव दिया गया कि एक टन अनाज का दाम व्यावहारिक रूप से एक टन कपास के बराबर निर्धारित किया जाय और फिर एक टन अनाज का दाम एक टन सेंकी हुई रोटी के बराबर किया जाय। केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों द्वारा जब यह पूछा गया कि एक टन रोटी का दाम निश्चित रूप से एक टन अनाज से ज्यादा होना चाहिए क्योंकि उसे आटा पीसने और सेंकने में अतिरिक्त खर्च पड़ता है तो उसका कोई तर्क संगत उत्तर प्रस्तावक योजनाकारों द्वारा नहीं दिया जा सका। तब पूरे मामले को केन्द्रीय कमेटी ने अपने हाथों में लिया। अनाज का दाम कम कर दिया गया और कपास का दाम बढ़ा दिया गया। तब क्या होता अगर इन साथियों के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता? जाहिर है, कपास उगाने वालों का दिवाला पिट जाता और हम बिना कपास के हो जाते।
तो क्या इसका मतलब यह है कि मूल्य नियम के परिचालन का क्षेत्र हमारे यहाँ भी उतना ही बड़ा है जितना पूँजीवाद में? और क्या यह हमारे देश के उत्पादन का भी नियामक है?
नहीं, ऐसा नहीं है। असल में मूल्य नियम परिचालन का क्षेत्र हमारी आर्थिक व्यवस्था में अत्यंत ही सीमित है और उसे निश्चित बंधन में रखा गया है। पहले ही कहा जा चुका है कि माल उत्पादन का परिचालन क्षेत्र निर्धारित बंधनों के अंदर रखा गया है। यही बात मूल्य नियम के बारे में भी कही जानी चाहिए। निःसंदेह यह तथ्य कि हमारे यहाँ उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व का अस्तित्व नहीं है और इसका समाजीकरण (शहर और देहात में) हो गया है, मूल्य नियम के प्रभाव और क्षेत्र विस्तार को रोकता है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा है। समाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थी। इस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया था। इस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं। आप के सुझाव व विचार सादर आमंत्रित हैं।
-सुमन

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