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Archive for सितम्बर, 2012

राजेश मल्ल

जब नाम तेरा लीजिए तब चश्म भर आवे।
इस जिंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे।

  बीती सदियों में अमरीका ने दसियों लाख मूल निवासियों (रेड इण्डियन्स) का संहार किया है, आधे मैक्सिको पर अपना कब्जा जमाया है (जो दरअसल मूल निवासियों के क्षेत्र हैं) पूरे इलाके में हिंसक हस्तक्षेप किया है और हवाई और फिलीपीन्स को फतह किया है (हजारो-हजार फिलीपीन्स वासियों की हत्या करके) और खास तौर पर पिछली आधी सदी में अपने ऐसे ही कारनामों को ताकत के बल पर पूरी दुनिया में अंजाम देता रहा है। इन करतूतों के शिकार बेशुमार हैं।
-नोम चोम्स्की

  अरब। तेल। बाजार। ठेका। अरबों डालर। बहुराष्ट्रीय निगम। कारपोरेट। सिनेटर। ड्रोन, मिशाइलें, सेना, फौज। मानवाधिकार-लोकतंत्र। आदिम बर्बरता। कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सूडान, जार्डन, सीरिया। मरते लोग, लड़ते लोग, कटते लोग, विस्थापित होते लोग। सद्दाम, गद्दाफी, यासिर, अपराधियों की लम्बी सूची।
तेल देखिए और तेल की धार देखिए।
युद्ध आदिम बर्वर युद्ध……………………..
लाखों करोड़ों लोग………………………..
लाखों करोड़ों डालर……………………….
लाखों बैरेल तेल……….पेट्रोल…………।        विगत दो दशकों में पूरी दुनिया के पैमाने पर और खासकर अरब में एक भयानक युद्ध अमरीका तथा उसके सहयोगियों ने छेड़ रखा है। अब तक मरने और विस्थापित होने वालों की संख्या करोड़ांे में पहुँच गई है। मात्र लीबिया में मरने वालों और विस्थापित होने वालो की संख्या साढ़े छः लाख से ऊपर है। यह हमारे समय का सबसे खौफनाक-खूँरेज मंजर है जिसे दुनिया के लाखों अमन पसंद लोग ‘चश्म तर से देख रहे हैं और मीर की तरह कहाँ से मानवता के इस संहार को देखने का ‘जिगर लावें’ सोच रहे हैं। दुःखद और तकलीफ देह बात यह है कि ढेर सारे लोग  तो इसे शुतुरमुर्ग की तरह आँखों के सामने से ओझल किये हैं या संचार माध्यमों के शोर को अपनी रगों मंे उतार कर उस धोखे के शिकार हैं जो युद्ध के दिनों में सामान्यतः होता ही है। कुछ लोग इसे भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बद्ध कर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों तक सीमित कर देते हैं। इस दृष्टि-बोध ने हमें उस भयावह युद्ध से बिलग कर दिया है और भ्रामक सोच के कारण अनवरत चलते इस हत्याकाण्ड के चमश्दीद होने से मुक्त कर दिया है।
मेरी समझ है और विनम्र अवधारणा कि तेल और उसकी कीमतों पर कोई भी चर्चा ‘अरब युद्ध’ जो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की तरह की भयावह घटना है और और आज जारी है तथा तेल पर कब्जे और उपनिवेश बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सन्दर्भ के बिना सम्भव नहीं है। ‘तेल’ की कीमतों में लगी आग ‘युद्ध और मन्दी की आग’ है ये दोनों एक दूसरे के जनक अन्योन्याश्रित और पूँजीवाद की अन्धी गली का अन्तिम छोर हैं। हो सकता है कि आप को यह बात अतिरंजित लगे और आप मेरे सूत्रीकरण से असहमत हों। लेकिन आप यदि गौर फरमाएँ तथा घटनाक्रमों को एक तरतीब दें तथा अपने ज्ञान और विश्लेषण की परिधि को पूँजीवादी सूचना तंत्र से बाहर जाकर देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। मैं क्रमशः अपने निष्कर्षों के लिए तथ्य नहीं जुटाऊँगा बल्कि तथ्यों की ऐसी प्रत्यक्ष कड़ी है, श्रंृखला है और बहुत हद तक चीजें हस्तामलक हैं कि आपकी असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं है फिर भी मैं उस भयावह सच से परदा उठाना चाहता हूँ जो आपकी जेहन का हिस्सा नहीं है या नहीं बन पाया है। हालाँकि इसे साम्राज्यवादी ठीक-ठाक कह रहे हैं और उसे आप मात्र ‘शब्द’ मानकर उस ओर गौर नहीं कर रहे हैं जैसे मैं इसे ‘युद्ध और मन्दी’ का परिणाम मान रहा हूँ तो पूरा पूँजीवादी तंत्र बिना किसी हिचक के साफ शब्दों में इसे इसी रूप में कह भी रहा है। अमरीका पूरे नियोजित तरीके से विगत दो दशकों से इसे ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ कह भी रहा है और इसे नाटो के साथ मिलकर लड़ भी रहा है। मेरा संशोधन मात्र इसमें यह है कि यह ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ नहीं बल्कि ‘तेल के लिए युद्ध’ है। हाँ यदि आप किसी युद्ध से ही इन्कार करते हंै तो फिर आप से मुखातिब होना मेरे लिए संभव नहीं है।
तो ‘तेल के सन्दर्भ में पहली बात आपको माननी होगी कि एक पीड़ादायी-विनाशक और इन्सानियत के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा जा रहा है जिसके एक पक्ष अमरीका और उसके सहयोगी हैं और दूसरी तरफ सम्पूर्ण अरब जनता है। उसकी स्वतंत्रता है, उसकी सम्प्रभुता है। उसके अपने खनिज पदार्थों पर उसका अपना हक है। यह युद्ध अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में प्रत्यक्ष रूप से लड़ा गया है और कमोवेश भयावह तबाही के साथ जीता जा चुका है। वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों की हत्या की जा चुकी है। अब आगे निशाने पर सीरिया से लेकर ईरान तक वे सारे अरब देश हैं जो अभी गुलाम नहीं बने हैं या उनकी खनिज सम्पदा जो ‘तेल ही है पर साम्राज्यवाद का कब्जा नहीं हो गया है। इस युद्ध के आँकड़े समयावधि, धनराशि, शामिल सैनिको कीं संख्या, प्रभावित जन समुदाय, क्षेत्रफल, मारे और विस्थापित लोगों
की संख्या सभी द्वितीय महायुद्ध से ज्यादा है। मात्र इराक या लीबिया के युद्ध का आकार फैलाव और जन हानि तथा बबर्रता हिटलर द्वारा रचाए गए यहूदी हत्याकाण्ड से बड़ा है। युद्ध का तर्क, अरब देशों पर हमले का कारण और वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों के प्रति साम्राज्यवादी व्यवहार ‘सब कुछ घृणित, आपराधिक और मानवता को शर्मशार करने वाला है। उदाहरण के लिए अभी लीबिया और कर्नल गद्दाफी की घटना को देखा जा सकता है। ‘चूँकि लीबिया में संभावित गृहयुद्ध की स्थितियाँ हैं और ऐसे में लाखों लोग मारे जा सकते हैं इसलिए वहाँ के लोगों में शान्ति बहाल करने के लिए अमरीका तथा नाटो ने लाखों लोगों को मार डाला। गद्दाफी पर तो सद्दाम हुसैन की तरह मुकदमे की बेशर्मी भी नहीं की गई बल्कि पहले ही करोड़ों डालर का इनाम-इकराम घोषित कर दिया गया कि सेना की जद में आने के बाद कर्नल गद्दाफी को मारने की होड़ मच गई। यह बेशर्मी और अमरीकी बर्बता का ताजातरीन उदाहरण है। खैर ‘युद्ध’ के साथ-साथ जब-जब मन्दी खासकर विŸाीय पूँजी के संकट के बादल घिरते हैं। शेयर मार्केट, बैकिंग तथा अन्य विŸाीय संस्थाएँ डूबने लगती हैं, तेल कम्पनियों और उनके मालिकों का दबाव बढ़ता जाता है और तभी अरब का कोई न कोई हिस्सा फिर से युद्ध की लपटों में समाने लगता है।
यह किस्सा अब नानी के भूत की कहानी नहीं बल्कि एक संवेदनशील तार्किक निगाह की तलबगार है जिसे पूरी दुनिया ठीक से समझ रही है। तेल कम्पनियों पर पड़ने वाला मन्दी का प्रभाव और उसी के गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध की विभीषिका आज हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। मैं इस छोटे से आलेख में आँकड़े और उसके परिणामी निष्कर्षों को न रखकर मात्र उन सच्चाइयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिससे हम तथाकथित तेल संकट को समझ सकें।
‘युद्ध और मन्दी’ या ‘मन्दी और युद्ध’ के बीच तेल कीमतों की बढ़ोत्तरी और भारतीय मध्य वर्ग की चिल्ल-पों के बीच यह भी गौर करने का विषय है कि भारतीय तेल कम्पनियों और भारत सरकार के रिश्ते और मन्दी की मार से उबरने में तेल की कीमतों में वृद्धि की विवशता और तानाशाहीपूर्ण सोच ने हमें भी अरब जनता की तरह विवश कर रखा है।
मेरा अनुरोध है कि मन्दी-युद्ध तथा तेल कीमतों में वृद्धि को एक साथ रखकर देखें तो साम्राज्यवाद-पूँजीवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि पहले, मन्दी और युद्ध को समझा जाए फिर उसकी परिणति तेल कम्पनियों के लाभांश के लिए जनता को और-और दुहने में लगे पूँजीवादी साम्राज्यवादी खेल को समझा जाए और अब यह सारा कुछ साफ है, स्पष्ट है।
तेल कीमतों की वृद्धि, भयावह नरसंहार और मन्दी की बार-बार आती बाढ़ उसी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी क्रिया कलापों की परिणाति है जिसके खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना न देश की जनता का कल्याण है और न ही विश्व मानवता का। हर बार डूबती अर्थ व्यवस्थाओं को बचाने के नाम पर अरबों डालर मदद तथा तेल कम्पनियों के ‘तथाकथित घाटे’ जो कि अधिक मुनाफे की हवस ही है, को पूरा करने के लिए साम्राज्यवादी और उनकी पिट्ठू सरकारें तेल कम्पनियों के सामने नतमस्तक हैं। ब्रिटेन की छः डाईन कम्पनियाँ हों या भारत की तेल कम्पनियाँ इनकी शक्ति इतनी है कि ये सरकारों को अपनी मर्जी अर्थात अधिक से अधिक मुनाफे के लिए विवश कर सकती हैं। ‘युद्ध और मंदी’ के इस खेल को अंजाम देने का कार्य यदि ब्रिटेन, जर्मनी तथा अमरीकी कम्पनियों ने किया है तो भारत के संदर्भ में यहाँ की तेल कम्पनियाँ जो अब पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त हैं, उनका दबाव है। युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी सट्टेबाजी तथा तेल कम्पनियों के मुनाफे की हवस ने मिलकर एक सर्वग्रासी तंत्र का निर्माण किया है। मजेदार बात यह है कि तेल का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव सन् 2008 के बराबर है लेकिन 2012 तक कीमतों की वृद्धि लगभग दोगुने के आसपास पहुँच चुकी है। तब यह सवाल गंभीर है कि आखिर मुनाफे की भारी मात्रा किसकी जेब में जा रही है।
सही बात यह है कि नव उदारवादी तंत्र कारपोरेट और मुनाफा खोर कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए ही बन गया है जिससे बार-बार विश्व मानवता को खौफनाक दौरों से गुजरना पड़ रहा है। दुनिया के तथा देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को इन कम्पनियों के हवाले कर सरकारें नए-नए हत्याकाण्ड रचाने में शामिल हैं।
इस स्तर में ‘तेल’ की कीमतों के सवाल के पीछे पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थतंत्र है जो पिछली सदी के मुकाबले ज्यादा घृणित और आक्रामक हैं। जन विरोधी हैं। मुनाफे की अंधी हवस ने विश्व मानवता को संकट के दहाने पर खड़ा कर दिया है।
-राजेश मल्ल

मो0 09919218089

लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जनता को बहुत आशाएँ थीं। देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक मुसलमान खास तौर से बहुत उत्साहित था। समाजवादी पार्टी द्वारा चुनाव पूर्व किए गए वादों को साकार होते हुए देखने के लिए वह व्याकुल था। चुनाव पश्चात पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से जब यह स्वीकार किया कि पार्टी को बहुमत दिलाने में प्रदेश के मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है तो उसे इस बात का विश्वास हो चला कि अब उसकी कि़स्मत बदलने वाली है। प्रदेश में अब वह अमन चैन से जी सकेगा। आतंकवाद के नाम पर फँसाए गए निर्दोष युवकों की रिहाई का कोई रास्ता अवश्य निकल आएगा। अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी असहजता और अनिश्चितता का दौर समाप्त हो जाएगा। शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में उसे पहले से अधिक अवसर मिल पाएँगे। परन्तु बेकसूरों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त होने की बात तो दूर आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों का सिलसिला भी नहीं थमा। मुसलमानों की सुरक्षा संबन्धी चिन्ताएँ और बढ़ गईं। दो महीने से भी कम समय में तीन बड़े दंगे और उसमें पुलिस प्रशसन के साथ-साथ नेताओं एंव मंत्रियों की संदिग्ध भूमिका तथा प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता ने समूचे मुस्लिम समुदाय को सक्ते मंे ला दिया। उत्तर प्रदेश का वातावरण समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के उद्दंडता भरे ताजपोशी के पथ से होता हुआ सीधे साम्प्रदायिक्ता की गोद में चला गया। मस्जिदों पर हमले, मरम्मत के काम में रुकावट, कब्रिस्तानों की आराज़ी पर नाजायज़ कब्ज़ा, मदरसों में तोड़फोड़, दो व्यक्तियों के बीच के विवाद को साम्प्रदायिक रंग देना, और इसी प्रकार के छोटे मोटे मामलों को लेकर दो दर्जन से अधिक स्थानों पर तनाव की स्थिति है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद हैं। वह बड़ी आसानी से माहौल को बिगाड़ रही हैं और सरकार का उनपर कोई अंकुश नहीं है।
मथुरा के कोसी कलां, जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान और बरेली के दंगों के त्वरित कारणों एवं उनसे निपटने के तौर तरीकों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह दंगे पूर्वनियोजित और पूरी तरह से संगठित थे। शायद प्रशासन को भी पता था कि उन्हें कैसी भूमिका निभानी है। जून महीने के पहले ही दिन कोसी कलां में जुमा की नमाज़ अदा करने वालों के लिए मस्जिद के बाहर शर्बत रखा हुआ था। किसी शरारती तत्व ने पेशाब करने के बाद शर्बत के टब में हाथ धुल लिया। थोड़ी कहा-सुनी के बाद मामला रफ़ा दफ़ा हो गया। वह अपने रास्ते गया और मुसलमान नमाज़ पढ़ने चले गए। नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद पर पथराव शुरू हो गया। आधे घंटे के अन्दर भीड़ जमा होना और इतने व्यापक स्तर पर हिंसा का शुरू हो जाना इस बात का प्रमाण है कि तैयारी पहले से थी। मात्र इतना ही नही बल्कि कुछ ही घंटों के अंदर आस पास के गाँवों से भी लोगों की बड़ी भीड़ वहाँ पहुँच गई। क्या इससे यह संदेह नहीं होता कि सब कुछ पहले से तय था बस दंगाइयों को ज़रूरत थी खेल शुरू होने का समाचार पाने की? इसी प्रकार जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान में 20 जून को एक दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना होती है। इसमे चार मुस्लिम युवकों को नामज़द किया जाता है। आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो जाती है। घटना के तीन दिन बाद गाँव में कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था। पकड़े गए युवक अपने को निर्दोष बताते रहे। बाद में समाचार पत्रों में यह खबर भी आई कि बलात्कार की घटना के दिन से दो साधू और गाँव के ही तीन युवक फरार हैं। फिर भी कथित आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद किसी हिंसात्मक प्रतिक्रिया का औचित्य नहीं रह जाता है। परन्तु 23 जून को एस्थान एवं आस पास के लगभग एक दर्जन गाँवों से आए हुए सैकड़ों दंगाइयों ने मुसलमानों के घरों को घेर कर आग के हवाले कर दिया। तीन दर्जन से अधिक मकान जल कर खाक हो गए। दंगाई माल मवेशी भी लूट कर ले गए। समाचारों के अनुसार दंगाइयों ने आग लगाने के लिए छः ड्रम मिट्टी के तेल का प्रयोग किया। जब पीडि़त जान बचाने के लिए एक मकान की छत पर इकट्ठा हो गए तो उस छत को गैस सिलेंडर से धमाका कर उड़ाने का प्रयास भी किया गया। क्या यह सब पूर्व योजना के बिना सम्भव था? 23 जुलाई की शाम को बरेली के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से ठीक नमाज़ के समय काँवरियों का जुलूस जाता है। जुलूस जैसे ही शाहाबाद के उस स्थान पर पहुँचता है जहाँ करीब में ही दो मस्जिदें़ हैं तो ज़ोर ज़ोर से गाना बजाना और नृत्य शुरू हो जाता है। नमाज़ का समय होने की बात कहने के बावजूद जत्था वहीं गाने बजाने की जि़द पर अड़ जाता है। अभी बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि आस-पास की कुछ दुकानों पर पथराव शुरू हो जाता है। जुलूस का मुस्लिम मुहल्लों से होकर गुज़रना और एक खास स्थान पर रुक कर नमाज़ के समय गाने बजाने पर अड़ जाना किसी पूर्व योजना के बगैर सम्भव था?
दंगों के दौरान पुलिस प्रशासन की भूमिका बिल्कुल निष्क्रिय और मूक दर्शकों जैसी थी। कोसी कलां में दंगे की शुरुआत दिन में एक से दो बजे के बीच हुई और रात दस बजे तक दंगाई खुलेआम मुसलमानों के मकान और दुकान चुनचुन कर लूटते और जलाते रहे। पुलिस वहाँ मौजूद थी परन्तु दंगाइयों को खदेेड़ने का प्रयास करने के बजाय वह अपना बचाव करने का नाटक करती रही। आस-पास के गाँवों से दंगाई तो लूट मार करने कोसी कलां पहुँच गए लेकिन मथुरा प्रशासन अतिरिक्त पुलिस बल की व्यवस्था नहीं कर सका। एस्थान में दंगा दिन में ग्यारह बजे के आस-पास शुरू हुआ। एस्थान और करीब के लगभग एक दर्जन गाँवों से दंगाइयों ने सभी रास्ते बंद कर दिए। उसके बाद मुसलमानों के घरों को आग लगा दी। पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों समेत पुलिस बल तथा फायर ब्रिगेड के लोग घटना स्थल तक पहुँच ही नहीं पाए। नतीजे के तौर पर न तो दंगाइयों पर काबू पाने का प्रयास ही किया जा सका और न ही आग बुझाने की रस्म ही अदा हो पाई। हद तो यह है कि एक स्थान पर आठ दस महिलाओं ने पुलिस की एक कुमक को घंटों रोके रखा। यह सब कुछ दिन में ग्यारह बजे से शाम लगभग साढ़े चार बजे तक चलता रहा और पुलिस एवं प्रशासन के लोग दंगाइयों के चले जाने की प्रतीक्षा करते रहे। बरेली के शाहाबाद क्षेत्र में पथराव की घटना के बाद मामला शान्त हो गया था। परन्तु दो घंटे बाद दंगाइयों ने बाहर के कइ
क्षेत्रों मे लूटमार और आगज़नी शुरू कर दी। दो घंटे का समय मिलने के बावजूद प्रशासन स्थिति का सही आंकलन करने और उससे निपटने की व्यवस्था करने में पूरी तरह विफल रहा। इन तीनों घटनाओं में पुलिस एवं प्रशासन की निष्क्रियता और दंगाइयों के बुलंद हौसलों के साथ बेखौफ लूटमार करने से इस संदेह को बल मिलता है कि दंगाइयों की पीठ पर कुछ शक्तिशाली एंव प्रभावशाली लोगों का हाथ था।
कोसी कलां के दंगों के पीछे कथित रूप से बसपा एमएलसी लेखराज सिंह और उनके भाई लक्ष्मी नारायण सिंह की सक्रिय भूमिका थी और इन्हें समाजवादी पार्टी की जिला इकाई के कुछ प्रभावशाली नेताओं का समर्थन प्राप्त था। कोसी कलां दंगे में दर्जनों मकान और दुकान जला दिए गए, निर्दोषों की बेदर्दी के साथ हत्या कर दी गई, फिर भी कई दिनों तक सरकार द्वारा इसका संज्ञान न लिया जाना कई तरह की शंकाएँ पैदा करता है। घटना की नामज़द रिपार्ट होने के बावजूद कई दिनों तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। दस दिन बाद प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री अहमद हसन का यह बयान अवश्य आया कि बलवा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। परन्तु कुल मिलाकर प्रदेश सरकार का रवैया संवेदनहीन ही रहा। एस्थान में दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना के बाद तीन दिन तक शान्ति बनी रही। परन्तु 22 जून को समाजवादी पार्टी के स्थानीय एमपी शैलेन्द्र कुमार के एस्थान दौरे के अगले ही दिन दंगाइयों का उत्पात गहरा संदेह उत्पन्न करता है। शैलेंद्र कुमार को राजा भैया का करीबी बताया जाता है। बार-बार यह आरोप लगा है कि दंगे में राजा भैया के करीबी लोगों की सक्रिय भूमिका थी। दंगा पीडि़तों ने अबू आसिम आज़मी के एस्थान दौरे के समय राजा भैया के खिलाफ नारेबाज़ी भी की थी और स्वयं राजा भैया को अपने दौरे के वक्त उनकी खरी खोटी सुननी पड़ी थी। एक तरफ दंगा पीडि़तों को सुरक्षा के नाम पर कुंडा के पी0टी0 कालेज में ले जा कर बंद कर दिया गया ताकि उनकी आवाज़ मीडिया या बाहर के लोगों तक न पहुँच सके। दूसरी तरफ धारा 144 लागू होने के बावजूद भड़काऊ भाषण देने और अपनी मुस्लिम दुश्मनी के लिए विख्यात विश्व हिन्दू परिषद के प्रवीण तोगडि़या को पूरे दल बल के साथ एस्थान जाने की अनुमति दे दी गई। उसके उकसाने पर फिरकापरस्तों ने मुसलमानों के उसी दिन दस और घर जला दिए। हालाँकि एक दिन पहले ही स्थानीय लोगों ने इस प्रकार की आशंका जताई थी और कुछ समाचार पत्रों ने इस आशय का समाचार भी प्रकाशित किया था। सरकार में बैठे प्रभावशाली लोगों के आशीर्वाद के बिना स्थानीय प्रशासन इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता था। बरेली दंगों के एक सप्ताह बाद वहाँ दौरे पर गए समाजवादी सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव ने सर्किट हाउस में प्रेस से बात करते हुए स्पष्ट शब्दों मेें कहा था कि बरेली में दंगा भारतीय जनता पार्टी ने करवाए हैं। परन्तु दंगाइयों और दंगा भड़काने के लिए जि़म्मेदार व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ प्रदेश सरकार का रवैया इतना लचर क्यों रहा।
सम्भवतः यही कारण है कि कोसी कलां और एस्थान में मुसलमान आज भी दहशत मंे जीने पर मजबूर हैं। बरेली में कफ्र्यू समाप्त होने के बाद दंगा फिर से भड़क उठा। कफ्र्यू के कारण स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भी बरेली वासी आज़ादी के एहसास से वंचित रहे। यदि कोसी कलां में दंगाइयों के साथ सख्ती से निपटा गया होता तो एस्थान और बरेली में इन तत्वों की ऐसा करने की हिम्मत न होती।
इन दंगों में कुछ ऐसी चीज़ें भी सामने आई हैं जिनपर काबू नहीं किया गया तो आने वाले समय में इसके परिणाम खतरनाक होंगे। एस्थान में गैस सिलेंडर से धमाका करने की घटना प्रदेश में प्रशिक्षित दंगाइयों की उपस्थिति का संकेत है। कोसी कलां के दंगे में दो लोगों को जि़ंदा जला देने की घटना देश में होने वाले संगठित और कुछ फासीवादी संगठनों द्वारा संचालित दंगों की ओर इशारा करती है। दंगों के शान्त हो जाने के बाद कोसी कलां के पीडि़तों को दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई की माँग और कानूनी लड़ाई से दूर रहने अन्यथा बुरे अंजाम की धमकी या फिर एस्थान में मुसलमान किसान पर अपने खेत में काम करते समय होने वाला हमला कुछ ऐसी घटनाएँ हैं जो गुजरात दंगों से मिलती जुलती हैं। उसके बाद प्रवीण तोगडि़या का एस्थान के लोगों को यह कहकर उकसाना इस तरह के संदेह को एक तरह से प्रमाणित करता है ‘मुसलमान इस क्षेत्र को खाली कर दें क्योंकि पुलिस उनको सुरक्षा नहीं दे सकती। पुलिस हमारी कार्रवाइयों को नहीं रोक सकती। हिन्दू इस क्षेत्र में हिन्दुत्व नगर की आधारशिला रखें और आस-पास के मुसलमानों को भागने पर मजबूर कर दें’। प्रवीण तोगडि़या का यह जहरीला भाषण और बरेली में शिवपाल यादव की प्रेस वार्ता ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे को जानते भी हैं और समझते भी।
2014 के लोकसभा चुनावों में यदि समाजवादी पार्टी को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखनी है तो उसे इस तरह की चुनौतियों का मज़बूती से सामना करना होगा। यदि प्रदेश सरकार साम्प्रदायिक और फासीवादी शक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से हिचकिचा रही है कि इससे हिन्दू नाराज़ हो जाएगा तो यह उसकी बड़ी भूल है। दंगाई और देश का आम हिन्दू दोनों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता। न तो सरकार दंगाइयों को छूट देकर हिन्दुओं को अपने पक्ष में कर सकती है और न दंगा पीडि़तों की आर्थिक सहायता करके मुसलमानों की सहानुभूति ही प्राप्त कर सकती है। दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई और तोगडि़या जैसों पर अंकुश लगाने के बजाए भाजपा और संघ परिवार को बुरा भला कहकर मुसलमानों का दिल नहीं जीता जा सकता। कांग्रेस की यह चाल मुसलमान पहले ही पहचान चुका है। जिस प्रकार राम मंदिर के शिलान्यास का लाभ कांग्रेस के बजाए भाजपा को मिला था उसी तरह साम्प्रदायिक शक्तियों को छूट का लाभ भी समाजवादी पार्टी को कभी नहीं मिलेगा। हालाँकि दंगों की राजनीति अब प्रभावहीन होती जा रही हैं फिर भी यदि इस तरह के षड्यन्त्रों के सफल होने की कोई सम्भावना बनती है तो वह कांग्रेस के पक्ष में होगी न कि सपा के। कांग्रेस शासित असम के वर्तमान दंगों में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। मुम्बई में असम और म्यांमार में मुसलमानों के नरसंहार के विरुद्व होने वाला प्रदर्शन हिंसक हो गया। आयोजक हैरान हैं कि लगभग शान्तिपूर्ण तरीके से समापन तक पहुँच गया कार्यक्रम अचानक हिंसा का शिकार कैसे हो गया। कार्यक्रम के अन्त में पचास साठ लोग कौन थे जो नारेबाज़ी करते हुए वहाँ पहुँचे थे। आयोजक सरकार से इसकी जाँच की माँग कर रहे हैं। परन्तु कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार ने घायल प्रदर्शनकारियों को ही आरोपी बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खून और षड्यन्त्र के इस खेल में वह अब भी अन्य किसी भी सेकुलर दल से आगे है और सेकुलर होने की हैसियत से उसके जो भी लाभ हो सकते हैं उन पर उसका सबसे ज्यादा हक है।
-मसीहुद्दीन संजरी

मोबाइल: 09455571488

लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। ” नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी” संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों को देख कर यह लगता है कि उसके पीठासीन अधिकारी न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग नहीं कर रहे हैं अपितु पुलिस विभाग के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में जितना दोषी पुलिस है उससे कहीं ज्यादा गैर जिम्मेदारी पूर्ण आदेश पुलिस  कस्टडी रिमांड का है। मुख्य बात यहाँ है की किस आधार पर न्यायलय श्रीमान ने उनको पुलिस कस्टडी रिमांड पर दिया था। कानून क तहत ही यह परिभाषित है की पुलिस कस्टडी रिमांड का उपयोग कभी-कभी विशेष परिस्तिथियों  में ही  है किन्तु न्यायलय में जैसे ही पुलिस प्रार्थनापत्र देती है वैसे ही पुलिस कस्टडी रिमांड स्वीकृत हो जाता है आखिर में इस मामले में पुलिस को इनकार करना पड़ा है की उसे पुलिस  कस्टडी रिमांड नहीं चाहिए। न्याय का यह सिद्धांत है की गुनाहगार से उसके ही खिलाफ उससे सबूत नहीं मांगे जा सकते हैं। भारतीय पुलिस का चरित्र चेखेव के नाटक ” गिरगिट ” की तरह है वह बार-बार रंग बदलती है और न्यायलय उसके हर रंग को स्वीकार करने के आदि हो गए हैं। प्रथम रिमांड क प्रस्तुत होते ही न्यायलय श्रीमान को देखना चाहिए था की उक्त धाराएं अभियुक्त के ऊपर आयत होती हैं या नहीं और प्रथम दृष्टया मामले को देखने के बाद न तो पुलिस  कस्टडी रिमांड देना चाहिए और न ही न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाने का आदेश पारित करना चाहिए। भारतीय कानून को जब कोई न्यायलय तख्ते लन्दन से जोड़कर देखता है तो उसके निर्णय सही नहीं हो सकते हैं और जब कानून को भारतीय संविधान और विधि के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखा जाता है तो निर्णय अवश्य सही होंगे। अब पीठासीन अफसर किस चश्मे से देख रहा है उसी से उसके निर्णय होते हैं।
 वहीँ, महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने मुंबई में कहा कि पुलिस को कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को हिरासत में लेने का कोई आधार नहीं था. पाटिल ने सोमवार 10 सितंबर को मुंबई में कहा कि इस मामले में पुलिस अपनी जांच का काम पूरा कर चुकी थी. उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले को देख रहे हैं और जो कुछ भी उचित होगा उसे अदालत के सामने कहेंगे। तब यह सवाल उठ खड़ा होता है कि पुलिस कस्टडी रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का आदेश पारित करना कहाँ तक औचित्यपूर्ण था।
सुमन

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तस्लीम परिकल्पना ब्लॉग सम्मान समारोह में एक वक्ता ने कहा था कि कुछ ब्लॉगर लम्पट होते हैं। उस वक्ता ने सही कहा था ब्लॉग जगत अमृत भी है विष भी है। कुंठाग्रस्थ लोग या लम्पट तत्व अपनी हरकतों से बाज नहीं आ सकते हैं। अन्तर्रष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन में लोकसंघर्ष पत्रिका तथा प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ का सहयोग था। कार्यक्रम आयोजक श्री रविन्द्र प्रभात व श्री जाकिर अली रजनीश ने आयोजन के सम्बन्ध में जो भी कार्य लोकसंघर्ष पत्रिका को बताये उनको पूरा करा दिया गया। सम्मलेन में उत्तर प्रदेश के साहित्य जगत के चर्चित रचनाकार डॉ सुभाष राय , शैलेन्द्र सागर, उद्भ्रांत, रंगकर्मी राकेश, आलोचक वीरेन्द्र  यादव,   मुद्राराक्षस, कथाकार शिवमूर्ती जैसी विभूतियाँ शामिल हुईं। ब्लॉग जगत के पाबला साहब, रवि रतलामी, डॉ अरविन्द मिश्र, शिवम् मिश्र, दिनेश गुप्त रविकर, अविनाश वाचस्पति, शिखा वार्ष्णेय, आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी मास्टर हरीश अरोड़ा , संतोष , पवन चन्दन, रूप चन्द्र शास्त्री ‘मयंक’, पूर्णिमा वर्मा, विजय माथुर, यशवंत माथुर, धीरेन्द्र भदौरिया, अलका सैनी, अलका सरवत मिश्र, कुंवर बेचैन, मनोज पाण्डेय सहित सैकड़ों चिट्ठाकार शामिल हुए। सभी चिट्ठकारों क नाम अगर लिखूंगा तो बात अधूरी रह जाएगी।
                  मुख्य बात यह है की कार्यक्रम में चिट्ठाकारों से जो स्नेह प्राप्त हुआ है वह अद्वित्यीय है। पाबला  साहब को देख कर और उनकी बात सुनकर मेरा पूरा परिवार बहुत खुश हुआ। हमारे जनपद से काफी लोग अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन  में गए थे जिन्होंने कार्यक्रम से लौटने के बाद चिट्ठाकारों की भूरि – भूरि प्रसंशा की थी लेकिन वह चिट्ठाकार नहीं थे अगर वह चिट्ठाकार होते तो कार्यक्रम क बाद कुछ लोगों की लम्पटई व चिरकुटई देख कर वह मन में क्या सोचते। ये हरकतें उसी तरह की हरकत है की एक शराबी ने बढ़िया खाना  खाया, बढ़िया शराब पी और जब नशा चढ़ा तो वह उलटी करने लगा और नशे में ही वह उलटी को पुन: खाने भी लगा और जब उसको लोगों ने रोकने की कोशिश की खाने से ज्यादा मजा उलटी खाने में है। इसलिए सभी साथियों से विनम्र प्रार्थना है की कार्यक्रम हो गया, सफल रहा तो ठीक असफल रहा तो ठीक लेकिन ऐसी हरकत न करें की ब्लॉगजगत के बाहर क लोगों को गलत धारणा बनानी पड़े। कार्यक्रम की सफलता काजल कुमार का यह कार्टून है जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।
हमारे लिए हर ब्लॉगर सम्मानीय है, साहित्यकार है, रचनाधर्मी है, सृजनकर्ता  है सभी सृजनकर्ताओं को मेरा सलाम।

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