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Archive for सितम्बर 11th, 2012

अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों को देख कर यह लगता है कि उसके पीठासीन अधिकारी न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग नहीं कर रहे हैं अपितु पुलिस विभाग के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में जितना दोषी पुलिस है उससे कहीं ज्यादा गैर जिम्मेदारी पूर्ण आदेश पुलिस  कस्टडी रिमांड का है। मुख्य बात यहाँ है की किस आधार पर न्यायलय श्रीमान ने उनको पुलिस कस्टडी रिमांड पर दिया था। कानून क तहत ही यह परिभाषित है की पुलिस कस्टडी रिमांड का उपयोग कभी-कभी विशेष परिस्तिथियों  में ही  है किन्तु न्यायलय में जैसे ही पुलिस प्रार्थनापत्र देती है वैसे ही पुलिस कस्टडी रिमांड स्वीकृत हो जाता है आखिर में इस मामले में पुलिस को इनकार करना पड़ा है की उसे पुलिस  कस्टडी रिमांड नहीं चाहिए। न्याय का यह सिद्धांत है की गुनाहगार से उसके ही खिलाफ उससे सबूत नहीं मांगे जा सकते हैं। भारतीय पुलिस का चरित्र चेखेव के नाटक ” गिरगिट ” की तरह है वह बार-बार रंग बदलती है और न्यायलय उसके हर रंग को स्वीकार करने के आदि हो गए हैं। प्रथम रिमांड क प्रस्तुत होते ही न्यायलय श्रीमान को देखना चाहिए था की उक्त धाराएं अभियुक्त के ऊपर आयत होती हैं या नहीं और प्रथम दृष्टया मामले को देखने के बाद न तो पुलिस  कस्टडी रिमांड देना चाहिए और न ही न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाने का आदेश पारित करना चाहिए। भारतीय कानून को जब कोई न्यायलय तख्ते लन्दन से जोड़कर देखता है तो उसके निर्णय सही नहीं हो सकते हैं और जब कानून को भारतीय संविधान और विधि के मूल सिद्धांतों से जोड़कर देखा जाता है तो निर्णय अवश्य सही होंगे। अब पीठासीन अफसर किस चश्मे से देख रहा है उसी से उसके निर्णय होते हैं।
 वहीँ, महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने मुंबई में कहा कि पुलिस को कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को हिरासत में लेने का कोई आधार नहीं था. पाटिल ने सोमवार 10 सितंबर को मुंबई में कहा कि इस मामले में पुलिस अपनी जांच का काम पूरा कर चुकी थी. उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले को देख रहे हैं और जो कुछ भी उचित होगा उसे अदालत के सामने कहेंगे। तब यह सवाल उठ खड़ा होता है कि पुलिस कस्टडी रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का आदेश पारित करना कहाँ तक औचित्यपूर्ण था।
सुमन

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