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Archive for सितम्बर 29th, 2012

राजेश मल्ल

जब नाम तेरा लीजिए तब चश्म भर आवे।
इस जिंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे।

  बीती सदियों में अमरीका ने दसियों लाख मूल निवासियों (रेड इण्डियन्स) का संहार किया है, आधे मैक्सिको पर अपना कब्जा जमाया है (जो दरअसल मूल निवासियों के क्षेत्र हैं) पूरे इलाके में हिंसक हस्तक्षेप किया है और हवाई और फिलीपीन्स को फतह किया है (हजारो-हजार फिलीपीन्स वासियों की हत्या करके) और खास तौर पर पिछली आधी सदी में अपने ऐसे ही कारनामों को ताकत के बल पर पूरी दुनिया में अंजाम देता रहा है। इन करतूतों के शिकार बेशुमार हैं।
-नोम चोम्स्की

  अरब। तेल। बाजार। ठेका। अरबों डालर। बहुराष्ट्रीय निगम। कारपोरेट। सिनेटर। ड्रोन, मिशाइलें, सेना, फौज। मानवाधिकार-लोकतंत्र। आदिम बर्बरता। कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सूडान, जार्डन, सीरिया। मरते लोग, लड़ते लोग, कटते लोग, विस्थापित होते लोग। सद्दाम, गद्दाफी, यासिर, अपराधियों की लम्बी सूची।
तेल देखिए और तेल की धार देखिए।
युद्ध आदिम बर्वर युद्ध……………………..
लाखों करोड़ों लोग………………………..
लाखों करोड़ों डालर……………………….
लाखों बैरेल तेल……….पेट्रोल…………।        विगत दो दशकों में पूरी दुनिया के पैमाने पर और खासकर अरब में एक भयानक युद्ध अमरीका तथा उसके सहयोगियों ने छेड़ रखा है। अब तक मरने और विस्थापित होने वालों की संख्या करोड़ांे में पहुँच गई है। मात्र लीबिया में मरने वालों और विस्थापित होने वालो की संख्या साढ़े छः लाख से ऊपर है। यह हमारे समय का सबसे खौफनाक-खूँरेज मंजर है जिसे दुनिया के लाखों अमन पसंद लोग ‘चश्म तर से देख रहे हैं और मीर की तरह कहाँ से मानवता के इस संहार को देखने का ‘जिगर लावें’ सोच रहे हैं। दुःखद और तकलीफ देह बात यह है कि ढेर सारे लोग  तो इसे शुतुरमुर्ग की तरह आँखों के सामने से ओझल किये हैं या संचार माध्यमों के शोर को अपनी रगों मंे उतार कर उस धोखे के शिकार हैं जो युद्ध के दिनों में सामान्यतः होता ही है। कुछ लोग इसे भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बद्ध कर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों तक सीमित कर देते हैं। इस दृष्टि-बोध ने हमें उस भयावह युद्ध से बिलग कर दिया है और भ्रामक सोच के कारण अनवरत चलते इस हत्याकाण्ड के चमश्दीद होने से मुक्त कर दिया है।
मेरी समझ है और विनम्र अवधारणा कि तेल और उसकी कीमतों पर कोई भी चर्चा ‘अरब युद्ध’ जो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की तरह की भयावह घटना है और और आज जारी है तथा तेल पर कब्जे और उपनिवेश बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सन्दर्भ के बिना सम्भव नहीं है। ‘तेल’ की कीमतों में लगी आग ‘युद्ध और मन्दी की आग’ है ये दोनों एक दूसरे के जनक अन्योन्याश्रित और पूँजीवाद की अन्धी गली का अन्तिम छोर हैं। हो सकता है कि आप को यह बात अतिरंजित लगे और आप मेरे सूत्रीकरण से असहमत हों। लेकिन आप यदि गौर फरमाएँ तथा घटनाक्रमों को एक तरतीब दें तथा अपने ज्ञान और विश्लेषण की परिधि को पूँजीवादी सूचना तंत्र से बाहर जाकर देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। मैं क्रमशः अपने निष्कर्षों के लिए तथ्य नहीं जुटाऊँगा बल्कि तथ्यों की ऐसी प्रत्यक्ष कड़ी है, श्रंृखला है और बहुत हद तक चीजें हस्तामलक हैं कि आपकी असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं है फिर भी मैं उस भयावह सच से परदा उठाना चाहता हूँ जो आपकी जेहन का हिस्सा नहीं है या नहीं बन पाया है। हालाँकि इसे साम्राज्यवादी ठीक-ठाक कह रहे हैं और उसे आप मात्र ‘शब्द’ मानकर उस ओर गौर नहीं कर रहे हैं जैसे मैं इसे ‘युद्ध और मन्दी’ का परिणाम मान रहा हूँ तो पूरा पूँजीवादी तंत्र बिना किसी हिचक के साफ शब्दों में इसे इसी रूप में कह भी रहा है। अमरीका पूरे नियोजित तरीके से विगत दो दशकों से इसे ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ कह भी रहा है और इसे नाटो के साथ मिलकर लड़ भी रहा है। मेरा संशोधन मात्र इसमें यह है कि यह ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ नहीं बल्कि ‘तेल के लिए युद्ध’ है। हाँ यदि आप किसी युद्ध से ही इन्कार करते हंै तो फिर आप से मुखातिब होना मेरे लिए संभव नहीं है।
तो ‘तेल के सन्दर्भ में पहली बात आपको माननी होगी कि एक पीड़ादायी-विनाशक और इन्सानियत के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा जा रहा है जिसके एक पक्ष अमरीका और उसके सहयोगी हैं और दूसरी तरफ सम्पूर्ण अरब जनता है। उसकी स्वतंत्रता है, उसकी सम्प्रभुता है। उसके अपने खनिज पदार्थों पर उसका अपना हक है। यह युद्ध अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में प्रत्यक्ष रूप से लड़ा गया है और कमोवेश भयावह तबाही के साथ जीता जा चुका है। वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों की हत्या की जा चुकी है। अब आगे निशाने पर सीरिया से लेकर ईरान तक वे सारे अरब देश हैं जो अभी गुलाम नहीं बने हैं या उनकी खनिज सम्पदा जो ‘तेल ही है पर साम्राज्यवाद का कब्जा नहीं हो गया है। इस युद्ध के आँकड़े समयावधि, धनराशि, शामिल सैनिको कीं संख्या, प्रभावित जन समुदाय, क्षेत्रफल, मारे और विस्थापित लोगों
की संख्या सभी द्वितीय महायुद्ध से ज्यादा है। मात्र इराक या लीबिया के युद्ध का आकार फैलाव और जन हानि तथा बबर्रता हिटलर द्वारा रचाए गए यहूदी हत्याकाण्ड से बड़ा है। युद्ध का तर्क, अरब देशों पर हमले का कारण और वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों के प्रति साम्राज्यवादी व्यवहार ‘सब कुछ घृणित, आपराधिक और मानवता को शर्मशार करने वाला है। उदाहरण के लिए अभी लीबिया और कर्नल गद्दाफी की घटना को देखा जा सकता है। ‘चूँकि लीबिया में संभावित गृहयुद्ध की स्थितियाँ हैं और ऐसे में लाखों लोग मारे जा सकते हैं इसलिए वहाँ के लोगों में शान्ति बहाल करने के लिए अमरीका तथा नाटो ने लाखों लोगों को मार डाला। गद्दाफी पर तो सद्दाम हुसैन की तरह मुकदमे की बेशर्मी भी नहीं की गई बल्कि पहले ही करोड़ों डालर का इनाम-इकराम घोषित कर दिया गया कि सेना की जद में आने के बाद कर्नल गद्दाफी को मारने की होड़ मच गई। यह बेशर्मी और अमरीकी बर्बता का ताजातरीन उदाहरण है। खैर ‘युद्ध’ के साथ-साथ जब-जब मन्दी खासकर विŸाीय पूँजी के संकट के बादल घिरते हैं। शेयर मार्केट, बैकिंग तथा अन्य विŸाीय संस्थाएँ डूबने लगती हैं, तेल कम्पनियों और उनके मालिकों का दबाव बढ़ता जाता है और तभी अरब का कोई न कोई हिस्सा फिर से युद्ध की लपटों में समाने लगता है।
यह किस्सा अब नानी के भूत की कहानी नहीं बल्कि एक संवेदनशील तार्किक निगाह की तलबगार है जिसे पूरी दुनिया ठीक से समझ रही है। तेल कम्पनियों पर पड़ने वाला मन्दी का प्रभाव और उसी के गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध की विभीषिका आज हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। मैं इस छोटे से आलेख में आँकड़े और उसके परिणामी निष्कर्षों को न रखकर मात्र उन सच्चाइयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिससे हम तथाकथित तेल संकट को समझ सकें।
‘युद्ध और मन्दी’ या ‘मन्दी और युद्ध’ के बीच तेल कीमतों की बढ़ोत्तरी और भारतीय मध्य वर्ग की चिल्ल-पों के बीच यह भी गौर करने का विषय है कि भारतीय तेल कम्पनियों और भारत सरकार के रिश्ते और मन्दी की मार से उबरने में तेल की कीमतों में वृद्धि की विवशता और तानाशाहीपूर्ण सोच ने हमें भी अरब जनता की तरह विवश कर रखा है।
मेरा अनुरोध है कि मन्दी-युद्ध तथा तेल कीमतों में वृद्धि को एक साथ रखकर देखें तो साम्राज्यवाद-पूँजीवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि पहले, मन्दी और युद्ध को समझा जाए फिर उसकी परिणति तेल कम्पनियों के लाभांश के लिए जनता को और-और दुहने में लगे पूँजीवादी साम्राज्यवादी खेल को समझा जाए और अब यह सारा कुछ साफ है, स्पष्ट है।
तेल कीमतों की वृद्धि, भयावह नरसंहार और मन्दी की बार-बार आती बाढ़ उसी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी क्रिया कलापों की परिणाति है जिसके खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना न देश की जनता का कल्याण है और न ही विश्व मानवता का। हर बार डूबती अर्थ व्यवस्थाओं को बचाने के नाम पर अरबों डालर मदद तथा तेल कम्पनियों के ‘तथाकथित घाटे’ जो कि अधिक मुनाफे की हवस ही है, को पूरा करने के लिए साम्राज्यवादी और उनकी पिट्ठू सरकारें तेल कम्पनियों के सामने नतमस्तक हैं। ब्रिटेन की छः डाईन कम्पनियाँ हों या भारत की तेल कम्पनियाँ इनकी शक्ति इतनी है कि ये सरकारों को अपनी मर्जी अर्थात अधिक से अधिक मुनाफे के लिए विवश कर सकती हैं। ‘युद्ध और मंदी’ के इस खेल को अंजाम देने का कार्य यदि ब्रिटेन, जर्मनी तथा अमरीकी कम्पनियों ने किया है तो भारत के संदर्भ में यहाँ की तेल कम्पनियाँ जो अब पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त हैं, उनका दबाव है। युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी सट्टेबाजी तथा तेल कम्पनियों के मुनाफे की हवस ने मिलकर एक सर्वग्रासी तंत्र का निर्माण किया है। मजेदार बात यह है कि तेल का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव सन् 2008 के बराबर है लेकिन 2012 तक कीमतों की वृद्धि लगभग दोगुने के आसपास पहुँच चुकी है। तब यह सवाल गंभीर है कि आखिर मुनाफे की भारी मात्रा किसकी जेब में जा रही है।
सही बात यह है कि नव उदारवादी तंत्र कारपोरेट और मुनाफा खोर कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए ही बन गया है जिससे बार-बार विश्व मानवता को खौफनाक दौरों से गुजरना पड़ रहा है। दुनिया के तथा देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को इन कम्पनियों के हवाले कर सरकारें नए-नए हत्याकाण्ड रचाने में शामिल हैं।
इस स्तर में ‘तेल’ की कीमतों के सवाल के पीछे पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थतंत्र है जो पिछली सदी के मुकाबले ज्यादा घृणित और आक्रामक हैं। जन विरोधी हैं। मुनाफे की अंधी हवस ने विश्व मानवता को संकट के दहाने पर खड़ा कर दिया है।
-राजेश मल्ल

मो0 09919218089

लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जनता को बहुत आशाएँ थीं। देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक मुसलमान खास तौर से बहुत उत्साहित था। समाजवादी पार्टी द्वारा चुनाव पूर्व किए गए वादों को साकार होते हुए देखने के लिए वह व्याकुल था। चुनाव पश्चात पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से जब यह स्वीकार किया कि पार्टी को बहुमत दिलाने में प्रदेश के मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है तो उसे इस बात का विश्वास हो चला कि अब उसकी कि़स्मत बदलने वाली है। प्रदेश में अब वह अमन चैन से जी सकेगा। आतंकवाद के नाम पर फँसाए गए निर्दोष युवकों की रिहाई का कोई रास्ता अवश्य निकल आएगा। अपनी सुरक्षा को लेकर उसकी असहजता और अनिश्चितता का दौर समाप्त हो जाएगा। शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में उसे पहले से अधिक अवसर मिल पाएँगे। परन्तु बेकसूरों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त होने की बात तो दूर आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों का सिलसिला भी नहीं थमा। मुसलमानों की सुरक्षा संबन्धी चिन्ताएँ और बढ़ गईं। दो महीने से भी कम समय में तीन बड़े दंगे और उसमें पुलिस प्रशसन के साथ-साथ नेताओं एंव मंत्रियों की संदिग्ध भूमिका तथा प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता ने समूचे मुस्लिम समुदाय को सक्ते मंे ला दिया। उत्तर प्रदेश का वातावरण समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के उद्दंडता भरे ताजपोशी के पथ से होता हुआ सीधे साम्प्रदायिक्ता की गोद में चला गया। मस्जिदों पर हमले, मरम्मत के काम में रुकावट, कब्रिस्तानों की आराज़ी पर नाजायज़ कब्ज़ा, मदरसों में तोड़फोड़, दो व्यक्तियों के बीच के विवाद को साम्प्रदायिक रंग देना, और इसी प्रकार के छोटे मोटे मामलों को लेकर दो दर्जन से अधिक स्थानों पर तनाव की स्थिति है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद हैं। वह बड़ी आसानी से माहौल को बिगाड़ रही हैं और सरकार का उनपर कोई अंकुश नहीं है।
मथुरा के कोसी कलां, जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान और बरेली के दंगों के त्वरित कारणों एवं उनसे निपटने के तौर तरीकों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह दंगे पूर्वनियोजित और पूरी तरह से संगठित थे। शायद प्रशासन को भी पता था कि उन्हें कैसी भूमिका निभानी है। जून महीने के पहले ही दिन कोसी कलां में जुमा की नमाज़ अदा करने वालों के लिए मस्जिद के बाहर शर्बत रखा हुआ था। किसी शरारती तत्व ने पेशाब करने के बाद शर्बत के टब में हाथ धुल लिया। थोड़ी कहा-सुनी के बाद मामला रफ़ा दफ़ा हो गया। वह अपने रास्ते गया और मुसलमान नमाज़ पढ़ने चले गए। नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद पर पथराव शुरू हो गया। आधे घंटे के अन्दर भीड़ जमा होना और इतने व्यापक स्तर पर हिंसा का शुरू हो जाना इस बात का प्रमाण है कि तैयारी पहले से थी। मात्र इतना ही नही बल्कि कुछ ही घंटों के अंदर आस पास के गाँवों से भी लोगों की बड़ी भीड़ वहाँ पहुँच गई। क्या इससे यह संदेह नहीं होता कि सब कुछ पहले से तय था बस दंगाइयों को ज़रूरत थी खेल शुरू होने का समाचार पाने की? इसी प्रकार जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम एस्थान में 20 जून को एक दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना होती है। इसमे चार मुस्लिम युवकों को नामज़द किया जाता है। आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो जाती है। घटना के तीन दिन बाद गाँव में कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था। पकड़े गए युवक अपने को निर्दोष बताते रहे। बाद में समाचार पत्रों में यह खबर भी आई कि बलात्कार की घटना के दिन से दो साधू और गाँव के ही तीन युवक फरार हैं। फिर भी कथित आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद किसी हिंसात्मक प्रतिक्रिया का औचित्य नहीं रह जाता है। परन्तु 23 जून को एस्थान एवं आस पास के लगभग एक दर्जन गाँवों से आए हुए सैकड़ों दंगाइयों ने मुसलमानों के घरों को घेर कर आग के हवाले कर दिया। तीन दर्जन से अधिक मकान जल कर खाक हो गए। दंगाई माल मवेशी भी लूट कर ले गए। समाचारों के अनुसार दंगाइयों ने आग लगाने के लिए छः ड्रम मिट्टी के तेल का प्रयोग किया। जब पीडि़त जान बचाने के लिए एक मकान की छत पर इकट्ठा हो गए तो उस छत को गैस सिलेंडर से धमाका कर उड़ाने का प्रयास भी किया गया। क्या यह सब पूर्व योजना के बिना सम्भव था? 23 जुलाई की शाम को बरेली के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से ठीक नमाज़ के समय काँवरियों का जुलूस जाता है। जुलूस जैसे ही शाहाबाद के उस स्थान पर पहुँचता है जहाँ करीब में ही दो मस्जिदें़ हैं तो ज़ोर ज़ोर से गाना बजाना और नृत्य शुरू हो जाता है। नमाज़ का समय होने की बात कहने के बावजूद जत्था वहीं गाने बजाने की जि़द पर अड़ जाता है। अभी बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि आस-पास की कुछ दुकानों पर पथराव शुरू हो जाता है। जुलूस का मुस्लिम मुहल्लों से होकर गुज़रना और एक खास स्थान पर रुक कर नमाज़ के समय गाने बजाने पर अड़ जाना किसी पूर्व योजना के बगैर सम्भव था?
दंगों के दौरान पुलिस प्रशासन की भूमिका बिल्कुल निष्क्रिय और मूक दर्शकों जैसी थी। कोसी कलां में दंगे की शुरुआत दिन में एक से दो बजे के बीच हुई और रात दस बजे तक दंगाई खुलेआम मुसलमानों के मकान और दुकान चुनचुन कर लूटते और जलाते रहे। पुलिस वहाँ मौजूद थी परन्तु दंगाइयों को खदेेड़ने का प्रयास करने के बजाय वह अपना बचाव करने का नाटक करती रही। आस-पास के गाँवों से दंगाई तो लूट मार करने कोसी कलां पहुँच गए लेकिन मथुरा प्रशासन अतिरिक्त पुलिस बल की व्यवस्था नहीं कर सका। एस्थान में दंगा दिन में ग्यारह बजे के आस-पास शुरू हुआ। एस्थान और करीब के लगभग एक दर्जन गाँवों से दंगाइयों ने सभी रास्ते बंद कर दिए। उसके बाद मुसलमानों के घरों को आग लगा दी। पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों समेत पुलिस बल तथा फायर ब्रिगेड के लोग घटना स्थल तक पहुँच ही नहीं पाए। नतीजे के तौर पर न तो दंगाइयों पर काबू पाने का प्रयास ही किया जा सका और न ही आग बुझाने की रस्म ही अदा हो पाई। हद तो यह है कि एक स्थान पर आठ दस महिलाओं ने पुलिस की एक कुमक को घंटों रोके रखा। यह सब कुछ दिन में ग्यारह बजे से शाम लगभग साढ़े चार बजे तक चलता रहा और पुलिस एवं प्रशासन के लोग दंगाइयों के चले जाने की प्रतीक्षा करते रहे। बरेली के शाहाबाद क्षेत्र में पथराव की घटना के बाद मामला शान्त हो गया था। परन्तु दो घंटे बाद दंगाइयों ने बाहर के कइ
क्षेत्रों मे लूटमार और आगज़नी शुरू कर दी। दो घंटे का समय मिलने के बावजूद प्रशासन स्थिति का सही आंकलन करने और उससे निपटने की व्यवस्था करने में पूरी तरह विफल रहा। इन तीनों घटनाओं में पुलिस एवं प्रशासन की निष्क्रियता और दंगाइयों के बुलंद हौसलों के साथ बेखौफ लूटमार करने से इस संदेह को बल मिलता है कि दंगाइयों की पीठ पर कुछ शक्तिशाली एंव प्रभावशाली लोगों का हाथ था।
कोसी कलां के दंगों के पीछे कथित रूप से बसपा एमएलसी लेखराज सिंह और उनके भाई लक्ष्मी नारायण सिंह की सक्रिय भूमिका थी और इन्हें समाजवादी पार्टी की जिला इकाई के कुछ प्रभावशाली नेताओं का समर्थन प्राप्त था। कोसी कलां दंगे में दर्जनों मकान और दुकान जला दिए गए, निर्दोषों की बेदर्दी के साथ हत्या कर दी गई, फिर भी कई दिनों तक सरकार द्वारा इसका संज्ञान न लिया जाना कई तरह की शंकाएँ पैदा करता है। घटना की नामज़द रिपार्ट होने के बावजूद कई दिनों तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। दस दिन बाद प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री अहमद हसन का यह बयान अवश्य आया कि बलवा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। परन्तु कुल मिलाकर प्रदेश सरकार का रवैया संवेदनहीन ही रहा। एस्थान में दलित बालिका के बलात्कार और हत्या की घटना के बाद तीन दिन तक शान्ति बनी रही। परन्तु 22 जून को समाजवादी पार्टी के स्थानीय एमपी शैलेन्द्र कुमार के एस्थान दौरे के अगले ही दिन दंगाइयों का उत्पात गहरा संदेह उत्पन्न करता है। शैलेंद्र कुमार को राजा भैया का करीबी बताया जाता है। बार-बार यह आरोप लगा है कि दंगे में राजा भैया के करीबी लोगों की सक्रिय भूमिका थी। दंगा पीडि़तों ने अबू आसिम आज़मी के एस्थान दौरे के समय राजा भैया के खिलाफ नारेबाज़ी भी की थी और स्वयं राजा भैया को अपने दौरे के वक्त उनकी खरी खोटी सुननी पड़ी थी। एक तरफ दंगा पीडि़तों को सुरक्षा के नाम पर कुंडा के पी0टी0 कालेज में ले जा कर बंद कर दिया गया ताकि उनकी आवाज़ मीडिया या बाहर के लोगों तक न पहुँच सके। दूसरी तरफ धारा 144 लागू होने के बावजूद भड़काऊ भाषण देने और अपनी मुस्लिम दुश्मनी के लिए विख्यात विश्व हिन्दू परिषद के प्रवीण तोगडि़या को पूरे दल बल के साथ एस्थान जाने की अनुमति दे दी गई। उसके उकसाने पर फिरकापरस्तों ने मुसलमानों के उसी दिन दस और घर जला दिए। हालाँकि एक दिन पहले ही स्थानीय लोगों ने इस प्रकार की आशंका जताई थी और कुछ समाचार पत्रों ने इस आशय का समाचार भी प्रकाशित किया था। सरकार में बैठे प्रभावशाली लोगों के आशीर्वाद के बिना स्थानीय प्रशासन इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता था। बरेली दंगों के एक सप्ताह बाद वहाँ दौरे पर गए समाजवादी सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव ने सर्किट हाउस में प्रेस से बात करते हुए स्पष्ट शब्दों मेें कहा था कि बरेली में दंगा भारतीय जनता पार्टी ने करवाए हैं। परन्तु दंगाइयों और दंगा भड़काने के लिए जि़म्मेदार व्यक्तियों या संगठनों के खिलाफ प्रदेश सरकार का रवैया इतना लचर क्यों रहा।
सम्भवतः यही कारण है कि कोसी कलां और एस्थान में मुसलमान आज भी दहशत मंे जीने पर मजबूर हैं। बरेली में कफ्र्यू समाप्त होने के बाद दंगा फिर से भड़क उठा। कफ्र्यू के कारण स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भी बरेली वासी आज़ादी के एहसास से वंचित रहे। यदि कोसी कलां में दंगाइयों के साथ सख्ती से निपटा गया होता तो एस्थान और बरेली में इन तत्वों की ऐसा करने की हिम्मत न होती।
इन दंगों में कुछ ऐसी चीज़ें भी सामने आई हैं जिनपर काबू नहीं किया गया तो आने वाले समय में इसके परिणाम खतरनाक होंगे। एस्थान में गैस सिलेंडर से धमाका करने की घटना प्रदेश में प्रशिक्षित दंगाइयों की उपस्थिति का संकेत है। कोसी कलां के दंगे में दो लोगों को जि़ंदा जला देने की घटना देश में होने वाले संगठित और कुछ फासीवादी संगठनों द्वारा संचालित दंगों की ओर इशारा करती है। दंगों के शान्त हो जाने के बाद कोसी कलां के पीडि़तों को दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई की माँग और कानूनी लड़ाई से दूर रहने अन्यथा बुरे अंजाम की धमकी या फिर एस्थान में मुसलमान किसान पर अपने खेत में काम करते समय होने वाला हमला कुछ ऐसी घटनाएँ हैं जो गुजरात दंगों से मिलती जुलती हैं। उसके बाद प्रवीण तोगडि़या का एस्थान के लोगों को यह कहकर उकसाना इस तरह के संदेह को एक तरह से प्रमाणित करता है ‘मुसलमान इस क्षेत्र को खाली कर दें क्योंकि पुलिस उनको सुरक्षा नहीं दे सकती। पुलिस हमारी कार्रवाइयों को नहीं रोक सकती। हिन्दू इस क्षेत्र में हिन्दुत्व नगर की आधारशिला रखें और आस-पास के मुसलमानों को भागने पर मजबूर कर दें’। प्रवीण तोगडि़या का यह जहरीला भाषण और बरेली में शिवपाल यादव की प्रेस वार्ता ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे को जानते भी हैं और समझते भी।
2014 के लोकसभा चुनावों में यदि समाजवादी पार्टी को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखनी है तो उसे इस तरह की चुनौतियों का मज़बूती से सामना करना होगा। यदि प्रदेश सरकार साम्प्रदायिक और फासीवादी शक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से हिचकिचा रही है कि इससे हिन्दू नाराज़ हो जाएगा तो यह उसकी बड़ी भूल है। दंगाई और देश का आम हिन्दू दोनों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता। न तो सरकार दंगाइयों को छूट देकर हिन्दुओं को अपने पक्ष में कर सकती है और न दंगा पीडि़तों की आर्थिक सहायता करके मुसलमानों की सहानुभूति ही प्राप्त कर सकती है। दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई और तोगडि़या जैसों पर अंकुश लगाने के बजाए भाजपा और संघ परिवार को बुरा भला कहकर मुसलमानों का दिल नहीं जीता जा सकता। कांग्रेस की यह चाल मुसलमान पहले ही पहचान चुका है। जिस प्रकार राम मंदिर के शिलान्यास का लाभ कांग्रेस के बजाए भाजपा को मिला था उसी तरह साम्प्रदायिक शक्तियों को छूट का लाभ भी समाजवादी पार्टी को कभी नहीं मिलेगा। हालाँकि दंगों की राजनीति अब प्रभावहीन होती जा रही हैं फिर भी यदि इस तरह के षड्यन्त्रों के सफल होने की कोई सम्भावना बनती है तो वह कांग्रेस के पक्ष में होगी न कि सपा के। कांग्रेस शासित असम के वर्तमान दंगों में अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। मुम्बई में असम और म्यांमार में मुसलमानों के नरसंहार के विरुद्व होने वाला प्रदर्शन हिंसक हो गया। आयोजक हैरान हैं कि लगभग शान्तिपूर्ण तरीके से समापन तक पहुँच गया कार्यक्रम अचानक हिंसा का शिकार कैसे हो गया। कार्यक्रम के अन्त में पचास साठ लोग कौन थे जो नारेबाज़ी करते हुए वहाँ पहुँचे थे। आयोजक सरकार से इसकी जाँच की माँग कर रहे हैं। परन्तु कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार ने घायल प्रदर्शनकारियों को ही आरोपी बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खून और षड्यन्त्र के इस खेल में वह अब भी अन्य किसी भी सेकुलर दल से आगे है और सेकुलर होने की हैसियत से उसके जो भी लाभ हो सकते हैं उन पर उसका सबसे ज्यादा हक है।
-मसीहुद्दीन संजरी

मोबाइल: 09455571488

लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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