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Archive for दिसम्बर, 2013

सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा था और सरकार की आँखें बन्द क्यों थीं? सरकार के पास दंगा होने की आशंका की खुफिया जानकारी भी थी। समाचार पत्रों में दंगे की सम्भावना की खबरें छप रही थीं। धारा 144 लगा दी गई थी। फिर भी महापंचायत होने दी गई। भड़काऊ भाषण, ज़हरीले नारों और हथियारों से लैस भीड़ का दृश्य वहाँ मौजूद उच्च पुलिस अधिकारियों के सामने था। पंचायत समाप्त होने से घंटों पहले इसमें भाग लेने आए लोगों द्वारा हत्या की वारदातें अंजाम दी जा चुकी थी। पंचायत समाप्त होने के बाद प्रशासन के पास हालात को सँभालने के लिए पर्याप्त समय था। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन ने जिस तरह स्थिति से निपटने में आपराधिक लापरवाही का प्रदशर्न किया उससे साफ तौर पर लगता है कि उस समय कानून व्यवस्था बनाए रखने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि यह कहा जाए कि तीनों की मंशा एक ही थी तो गलत नहीं होगा। फिरकापरस्त दंगा करवाना चाहते थे प्रशासन उसे रोकना नहीं चाहता था और सरकार की शान्ति बनाए रखने में कोई रुचि नहीं थी। इसका कारण सरकार व प्रशासन की अक्षमता और संवेदनहीनता थी, दंगाइयों के साथ मिली भगत या दंगा उपरान्त राजनैतिक लाभ हासिल करने की जुगत। मगर सच्चाई यही है कि दंगाइयों ने हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए लाशों को जलाया, बहाया और मिट्टी के नीचे दबा दिया। प्रशासन ने फाँसी पर लटकी हुई लाशों को आत्महत्या साबित करने का प्रयास किया। एफ.आई.आर. दर्ज करने में बाधाएँ उत्पन्न कीं। सत्ताधारी दल ने इसे कभी जातीय संघर्ष बताने की कोशिश की तो कभी सरकार के मंत्रियों ने अपनी रिपोर्ट में राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों को जबरन रोक कर अपना धंधा चलाने का आरोप लगाया। इन सभी प्रयासों का मात्र एक कारण था कि दंगे की व्यापकता और जघन्यता दुनिया पर ज़ाहिर न हो। सरकार और प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की बहाली और दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के मुकाबले में तथ्यों पर परदा डालने के मायने ज़्यादा थे। यही कारण है कि सरकारी तौर पर सिर्फ 62 मौतें बताई गईं जबकि मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से कुछ और हत्याओं से परदा उठा और आँकड़ा 100 पार कर गया। हालाँकि उन सभी की प्राथमिकी अभी तक दर्ज नहीं हो पाई है। इसके अलावा एक बड़ी संख्या लापता व्यक्तियों की है जिनके बारे में आशंका है कि उनकी हत्या हो चुकी है। यही स्थिति घर छोड़ कर जाने वाले दंगा पीड़ितों की संख्या की भी है। सरकार द्वारा इसे भी कम करके बताने का हर सम्भव प्रयास किया गया और फिर दंगा पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनहीनता को छुपाने के लिए राहत कैम्प चलाने वालों को ही सरकार के मंत्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुज़फ्फरनगर, शामली व अन्य जगहों पर छोटे बड़े तीन दर्जन से भी ज़्यादा राहत कैम्प काम कर रहे थे। मुज़फ्फरनगर में सज़ाक, तौली, बासी कलां, बु़ाना, सखीपुर, जौला, जोगी खेड़ा लोई, चरथावल, मीरापुर और शामली में मलकपुर, कान्धला, कैराना, खुरगान, मंसूरा, जलालाबाद, सुंता, रसूलपुर के अलावा ग्रामीण अंचलों में छोटे बड़े राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों ने पनाह ले रखी थी। शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को अपने रिश्तेदारों और सगे
संबधिंयों के यहाँ भी पनाह मिल गई थी। इनमें कई कैम्प ऐसे थे जहाँ एक साथ दस हजार तक दंगा पीड़ितों ने शरण ली थी। प्रदेश सरकार ने कैम्पों में दंगा पीड़ितों की मदद उनके खाने पीने रहने की व्यवस्था करने का कोई आँकड़ा अब तक नहीं दिया है। कुछ कैम्पों के आयाजकों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार की तरफ से उनको एक पैसे की भी कोई सहायता नहीं मिली। समाजवादी सरकार के मुस्लिम नेता और अखिलेश सरकार के विधायक मंत्री पहले की तरह कुछ ऐसे बिन्दुओं की खोज में लगे रहे जिससे पार्टी और सरकार का बचाव किया जा सके। सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान जो उस क्षेत्र के प्रभारी भी हैं, ने दो परस्पर विरोधी भूमिकाएँ अदा करके सबको हैरत में डाल दिया। पहले तो उन्होंने मीडिया के सामने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विरोध स्वरूप आगरा में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं गए। मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल यादव और कुछ वरिष्ठ सपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। परन्तु विधान सभा के मानसून सत्र में सदन के अन्दर आज़म खान ने ही सरकार का पूरी ताकत के साथ बचाव करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। हालाँकि गृह मंत्रालय का पदभार मुख्यमंत्री के पास होने के कारण यह ज़िम्मेदारी उनकी थी। तीन चार दिनों के भीतर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ जिससे आज़म खान का ह्रदय परिवर्तन हो गया यह तो वही बता पाएँगे। परन्तु जनता इसे उनकी राजनैतिक अदाकारी के रूप में ही देखती है। जब राहुल गांधी ने यह कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के लोग मुज़फ्फरनगर के 1015 मुस्लिम नौजवान जिनके भाई बहन दंगे में मारे गए हैं, से बात कर रहे हैं तो आज़म खान ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अखिलेश सरकार के मुज़फ्फरनगर सद्भावना मिशन पर गए मंत्री समूह ने अपनी रिपोर्ट में दुर्भावना वश जब ह कहा कि मदरसे के लोग दंगा पीड़ितों को जबरन कैम्पों में रोक कर अपनी दुकान चला रहे हैं तो इस पर आज़म खान ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। हालाँकि वह यह अच्छी तरह जानते थे कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की वापसी पर उनकी सुरक्षा का कोई बन्दोबस्त नहीं किया था। उन्हें यह भी मालूम था कि जो लोग अपने गाँव गए थे उनको मुकदमें वापस लेने के लिए
धमकियाँ दी जा रही थीं। बुाना के हुसैनपुर में खेत में काम कर रहे तीन मुसलमानों की 30, सितम्बर को की जाने वाली हत्या ने साबित भी कर दिया है कि असुरक्षा की आशंका बेबुनियाद नहीं थी और मंत्री समूह की रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा गया वह बदनीयती पर आधारित था। यदि राहुल
गांधी और मंत्री समूह की रिपोर्ट को जोड़ कर देखा जाए तो यह आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है कि आई.एस.आई. और दंगा पीड़ित मुस्लिम युवकों की मुलाकात उन्हीं मदरसों में होती थी। राहुल के बयान और शिवपाल की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की इस रिपोर्ट को खुफिया एवं जाँच एजेंसियों में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों को आतंकवाद के नाम पर मदरसों को घेरने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने का अवसर प्रदान करने के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार इसे मुसलमानों को पीड़ित और प्रताड़ित कर उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करके सुरक्षा देने के नाम पर राजनैतिक ठगी जारी रखने की कोशिश भी कहा जा सकता है। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुसलमानों के हित की बात करने वाली पार्टियों ने सुरक्षा के नाम पर उन्हें गोलबन्द करके सबसे अधिक छला है। भाजपा और शिवसेना जैसे दलों ने उन्हें इसका अवसर भी खूब दिया है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों के हित की कोई बात आती है साम्प्रदायिक दल और संगठन तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। उसके बाद इन तथाकथित सेकुलर और साम्प्रदायिक दलों के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो जाती है। थोड़े समय बाद ही सेकुलर दल हथियार डाल देते हैं और मुसलमानों को यह संदेश देने में लग जाते हैं कि वह तो कुछ करना चाहते हैं परन्तु स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। केवल राजनैतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि न्यायिक स्तर पर भी मुसलमानों के मामले में यह बार बार देखने को मिला है। आन्ध्र प्रदेश में रिज़र्वेशन का मामला रहा हो या यू.पी. में आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई का मुद्दा जानबूझ कर ऐसी कमियाँ छोड़ी गईं कि अदालत में जाकर केस गिर जाए और उसके बाद फिर वही राग कि हम तो करना चाहते हैं लेकिन ़ ़ ़। अखिलेश सरकार ने तो एक तीसरा रास्ता भी निकाल लिया है। मुसलमानों के खिलाफ उसी समुदाय के लोगों को इस्तेमाल करने का। खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के मामले में पंचनामा की बात हो या फिर मुज़फ्फरनगर का दौरा करने वाली टीम में तीन मुसलमानों को शामिल किया जाना इसी नई रणनीति का हिस्सा लगता है। खालिद मुजाहिद के पंचनामे में शामिल मुसलमान यह नहीं कह पाए कि उसमें खालिद के परिवार का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दंगों की जाँच का हिस्सा रहने वाले मुस्लिम मंत्री इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि दल के अगुवा से यह कह सकें कि जिन लुटे पिटे लोगों की जाँच उन्हें करनी थी उन पीड़ितों से कैम्पों में जाकर उनका दुख दर्द भी सुन लिया जाए। ऐसे लोगों से दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर कीचड़ उछालने वाली मंत्री समूह की रिपोर्ट पर उंगली रखने की उम्मीद करना सिर्फ धोखा है। इस तरह के मुस्लिम नेता अपने समाज में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार में अपने समाज का नहीं। मुस्लिम समाज को यह सब समझना होगा और अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाना होगा।
क्रमश:
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 36,000 times in 2013. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 13 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

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अमानवीय, पाष्विक, बर्बर या ऐसी कोई संज्ञा मुज़फ्फरनगर, श्यामली और आस-पास घटित होने वाली घटनाओं को अंजाम देने वालों के लिए पर्याप्त होगी? आचर्य और बेशर्मी की बात तो यह है कि इसे जायज़ ठहराने की उसी तरह की कोशिश की गईं जिस तरह गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताने का प्रयास किया गया था। उत्तर-प्रदेश में इस तरह के साम्प्रदायिक षड्यंत्र पिछले कई दंगों के मामले में पहले ही बेनकाब हो चुके हैं। इन दंगों में आमतौर से दंगाइयों ने समाज में विष घोलने और भावनाएँ भड़काने के लिए महिलाओं के साथ अभद्रता को हथियार रूप में प्रयोग किया है। फैज़ाबाद में तो हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के साथ ही मूर्तियों के खंडित करने की अफवाह भी फैलाई गई थी। बाद में यह तथ्य खुलकर सामने आगया कि मूर्तियाँ सही सलामत थीं। उनकी वीडियो भी जारी हो गई। किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ का कोई मामला कहीं दर्ज नहीं हुआ। यहाँ तक कि कोई यह बताने वाला भी नहीं था कि पीडि़त लड़की कौन और कहाँ की रहने वाली थी। इस बात के भी कई प्रमाण मिले कि दंगा पूर्व नियोजित था और लड़की के साथ छेड़छाड़ या मूर्तियों को खंडित करने की अफवाह जानबूझ कर गढ़ी गई थी। मुज़फ्फरनगर, शामली, मेरठ और बाग़पत में होने वाले दंगे के लिए भी बहाना यही बनाया गया कि जाट लड़की से मुसलमान लड़के ने छेड़छाड़ की थी। हालाँकि यह बात सही नहीं थी। मामला 27, अगस्त को मोटर साइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद उपजे विवाद से शुरू हुआ था। बात बढ़ गई और कंवाल ग्राम निवासी शाहनवाज़ की सचिन और गौरव नामक दो जाट युवकों ने चाकू मार कर हत्या कर दी। मुहल्ले के लोगों ने इन दोनों हमलावरों को भी मार डाला। दोनों पक्षों की तरफ से लिखवाई गई एफ.आई.आर. में भी मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर को ही विवाद का कारण बताया गया है। इस घटना से फिरकापरस्तों को पीढि़यों से चले आ रहे मुसलमान-जाट शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व को दंगों की आग में जलाने का मौका मिल गया। नफरत के सौदागरों ने मोटर साइकिल-साइकिल टक्कर की जगह लड़की के साथ छेड़छाड़ का प्रचार करना शुरू कर दिया। इस आग में घी डालने के लिए यू ट्यूब से पाकिस्तान की एक वीडियों डाउन लोड की गई जिसमें कुछ दाढ़ी टोपी वालों को एक व्यक्ति की पिटाई करते दिखाया गया था। इस वीडियो द्वारा प्रचारित किया जाने लगा कि मुसलमान जाट लड़के की पिटाई कर रहे हंै और विभिन्न माध्यमों से इसका बहुत व्यापक स्तर पर वितरण होने लगा। कथित रूप से यह काम भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम ने किया था। वातावरण इतना दूषित कर दिया गया कि इससे निपटने के लिए विभिन्न खापों ने पंचायतों का दौर शुरू कर दिया और 7, सितम्बर को कई खापों ने मिलकर ’बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत बुलाई जिसमें जमकर साम्प्रदायिक भाषण बाज़ी हुई। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगा भड़क गया। एक बार फिर यह प्रचारित किया गया कि पंचायत से वापसी पर मुसलमानों ने जाटों पर हमला कर दिया जिससे दंगा भड़का। यह बात सही है कि पंचायत से वापसी पर दोनों समुदाय के लोगों में कई स्थानों पर टकराव हुआ जिसमें दोनांे तरफ के लोग हताहत और घायल भी हुए थे। हमले की शुरुआत करने के मामले में परस्पर विरोधी आरोप भी हैं। परन्तु जहाँ तक दंगों की शुरूआत की बात है तथ्य कुछ और ही कहते हैं।
5, सितम्बर को एक खाप पंचायत के बाद नफीस नामक व्यक्ति को चाकू मार दिया गया। 7, सितम्बर को होने वाली महापंचायत में शामिल होने के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों के साथ मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदयिक नारे लगाते हुए लोग नगला मंदौड़ में इकट्ठा हुए। कहा जाता है कि यह संख्या एक लाख से भी अधिक थी। दोपहर में ही गढ़ी दौलत, कांधला निवासी नफीस अहमद ड्राइवर जो किराए पर महापंचायत में अपनी बोलेरो लेकर गया था उसकी हत्या कर दी गई। 4 बजे शाम में नंगला बुज़ुर्ग निवासी असगर पुत्र अल्लाह बन्दा को मार डाला गया। दिन में ही लपेड़ा निवासी फरीद पुत्र दोस्त मुहम्मद, सलमान पुत्र अमीर हसन, गढ़ी फीरोज़ाबाद निवासी नज़र मुहम्मद पुत्र मूसा, लताफत पुत्र मुस्तफा की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं के बाद फैलने वाली अफवाहों से एक बड़े दंगे की पृष्ठिभूमि तैयार हो गई। पंचायत से वापसी पर रास्ते में हथियारों के प्रदर्षन और नारेबाज़ी से कई स्थानों पर टकराव हुए और मुज़फ्फरनगर तथा शामली पूरी तरह दंगे की चपेट में आ गया। इसकी लपटें मेरठ और बाग़पत तक भी पहुँच गईं। करीब डेढ़ सौ गाँव मुसलमानों से खाली हो गए। उनके घरों को जला दिया गया। 7, अगस्त की रात से जो आगज़नी, हत्या, और बलात्कार की घटनाएँ हुईं उसे सही मायने में दंगा कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि इसका शिकार वह गरीब मुसलमान मज़दूर हुए जो पीढि़यों से जाट किसानों के यहाँ मज़दूरी करते आ रहे थे। उनके पास अपनी खेती नहीं थी। व्यवसाय के नाम पर लोहारी, बढ़ईगीरी या नाई के काम करते थे और इसके लिए भी उन्हीं जाटों पर आश्रित थे। सामाजिक स्तर पर उनकी जाट किसानों के सामने सर उठाने की भी हैसियत नहीं थी। इस एकतरफा दंगें में नौजवान, बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं की निर्मम हत्या की गई। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की एक साथ इतनी घटनाएँ उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई। इन घटनाओं को अंजाम देने का जो तरीका इक्कीसवीं सदी के मानव ने अपनाया उसका कोई उदाहरण दुनिया के किसी प्रजाति के जानवरों के इतिहास में नहीं मिलता। बुज़ुर्ग दम्पत्ति को आरा मशीन से काट कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। महिलाओं और कम उम्र लड़कियों के साथ उनके परिजनों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया। दूध पीते बच्चे को गोद में लिए हुए महिला को बच्चे समेत जि़न्दा आग में जला दिया गया। जले हुए शवों को अलग करने का प्रयास जब विफल रहा तो दोनों को एक साथ ही दफन कर दिया गया। कितने ही लोगों की हत्या कर सबूत मिटाने के लिए लाशों को नहर में बहा दिया गया, जला दिया गया या खेतों में मिट्टी के नीचे दबा दिया गया।
क्रमश:

मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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निष्कर्ष
उ0प्र0 सरकार ने साम्प्रदायिक तत्वों की मिली भगत से योजनाबद्ध ढंग से दंगे में दंगाइयों को खुली छूट दे रखी थी। इस पूरे दंगे में तबाही, जानी नुकसान, लूट-पाट और इज़्ज़त के साथ जो खिलवाड़ किया गया उसका पुरा परिदृष्य गुजरात दंगों से लिया गया था। इस पर गुप्त सूत्रों का कहना है कि साम्प्रदायिक तत्वों ने पूरे भारत को गुजरात बनाने का अमल शुरू कर दिया है।
30 अगस्त को कवाल में हुई घटना को लेकर अल्पसख्ंयक समुदाय के लोगों ने जि़ला मुजफ्फरनगर में जुमा की नमाज़ के बाद प्रदर्षन किया। जिसमें कादिर राना ;M.L.A. ,B.S.P. राशिद सिद्दीकी ,S.P. मुरसलीन M.L.A. ,B.S.P. शाहिदुल आज़म ;Former Minister, Congress Party और मौलाना नज़ीर ने भड़काऊ भाषण दिए। बहुसंख्यक समुदाय की ओर से 31 अगस्त, 5 सितम्बर और 7 सितम्बर 2013 को आर0एस0एस0 और भाजपा के गठजोड़ में तीन महापंचायतें आयोजित की र्गइं। 5 सितम्बर की महापंचायत गाँव लिसाढ़ मंे हुई, जिसका नेतृत्व विनोद प्रमुख, बाबा हरिकिशन, बाबा सीताराम ;V.HP. और संघ के कार्यकर्ता विजेन्द्र (सचिन और गौरव का सम्बन्धी) ने किया। इस महापंचायत में 7 सितम्बर को होने वाली महापंचायत की घोषणा की गई और बहुसंख्यक समुदाय के लोगों से महापंचायत में हथियार लेकर आने के लिए कहा गया।
सभी लोग महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान के द्वारा भड़काए गए। महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान भाजपा के स्थानीय नेता हुकम सिंह के सहयोगी हैं। दंगा भड़काने में हुकम सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं के एक अन्य सहयोगी ब्रह्मपाल के घर में बहुत अधिक मात्रा में हथियार छुपाए गए। बिल्लू प्रधान और महाराज सिंह द्वारा दंगाइयों को हथियार बाँटे गए।
बाबा हरिकिशन ने गाँव लिसाढ़ के बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को मुसलमानों के खिलाफ़ साम्प्रदायिक ंिहंसा भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने महापंचायत आयोजित की और मुसलमानों को मारने के लिए बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को उकसाया।
सभी जानते हैं कि अगले साल 2014 मे देश में संसदीय चुनाव है। इन्हीं चुनावों की तैयारी के सिलसिले में पिछले दो साल में देश की 1150 से भी ज़्यादा जगहों पर दंगे कराए जा चुके हैं। जिसमें 100 से अधिक जगहों पर दंगे उ0प्र0 में हुए। हम पिछले कई चुनाव से देख रहे हैं कि हर चुनाव से पहले कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर जनता के बीच फूट के बीज बो दिए जाते हैं। इस माहौल में सबसे बड़ा नुकसान एतबार और विष्वास का हुआ है। एक ही छत के नीचे एक ही हुक्का गुड़गुड़ाने वाले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाएँगे तो समाज कैसे बचेगा। राजनैतिक लोग वोट बैंक के लिए ऐसा करवा रहे हैं। इस साम्प्रदायिक आग को बुझाने के लिए कोई भी राजनैतिक दल आगे नहीं आया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दगंा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के दौरान शरणार्थी शिविरों में दंगा पीडि़तों से मुलाकात करके कुसूरवारों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही और दंगे के समय बर्बाद हुए मकान और दुकानांे के पुनर्वास का विष्वास दिलाया। परन्तु लोगों में ग़म और ग़ुस्सा, भय और दहशत अभी भी बरकरार है। काँधला में लोगों ने मुख्यमंत्री को काले झण्डे भी दिखाए। दंगा पीडि़तांे से ऐसे ही वादे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी किए। अब नेताओं को वोट बैंक खिसकता नज़र आ रहा है तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। परन्तु अभी भी दंगा पीडि़तो को न तो केन्द्र सरकार और न ही उ0प्र0 सरकार की ओर से कोई सहायता मिली है। इससे इन्सानियत शर्मसार हो रही है। गाँव के क्षेत्रों में पहुँची राजनीति ने शहरों की आग को भी गाँवों में पहुँचा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से साबित होता है कि मुलायम सिंह ने एक बार फिर मुसलमानों के साथ विष्वासघात किया है।
मुज़फ्फरनगर और शामली में जो कुछ हुआ वह उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब के मुताबिक बिल्कुल नहीं है। इन परिस्थितियों में आम जनता को ही भूखे पेट सोना पड़ रहा है। ऐसे में बैठकर सफे़द पोश सुखि़र््ायाँ देख रहे हैं जबकि दंगे की चपेट में आए घरों में मातमी सन्नाटा छाया है। साम्प्रदायिकता के ज़हर में जितनी मुसीबत हिन्दू झेल रहे हैं उतना ही नुकसान मुसलमान उठा रहे हैं। अहम सवाल यह भी है कि आखि़र इन्सानियत की डोर कहाँ पर और किस तरह कमज़ोर पड़ी है कि 5 प्रतिषत दंगाई 95 प्रतिशत शांतिप्रिय लोगों पर हावी हैं। सँभलने, सोचने के लिए अभी मौक़ा और वक्त दोनों है। बाँटती राजनीति से मोर्चा लेकर शांति पसंद नागरिकों को एकजुटता का आईना दिखाना होगा।
दंगे में लाशो के ढेर लग गए। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने लाशो को खुले में सड़ने के लिए छोड़ दिया। चील कौए शवों पर मंडराते रहे और उन्हें नोचते रहे। लोग यह दृष्य देखकर आहत हुए। न जाने कितने लाचार लोग कड़वी सच्चाई से इस समय दो चार हैं। घरों में क़ैद हैं या घरों को छोड़कर जा चुके हैं। व्यापार ठप्प हैं। घरों में खाने पीने का सामान नहीं, बच्चे दूध को तरस रहे हैं। पढ़़ाई का नुकसान है। लेंकिन फ़ायदा किसे है? एकांत में सेाचोगे तो सिर्फ वही चेहरे दिखेंगे जो लोगों को इन्सान नहीं वोट समझते हैं।
उत्पात से प्रभावित गाँवों में बेसिक शिक्षा की रीढ़ टूट गई। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में दलित और मुस्लिम समाज के बच्चे ही पढ़ते हैं। हिंसा की घटनाओं के बाद लगभग 200 परिषदीय स्कूल ऐसे हैं जहाँ ताला लटका हुआ है। डर के मारे शिक्षक और बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं।
जिस घटना (लड़की के साथ छेड़छाड़ और उसके बाद शाहनवाज़, सचिन और गौरव की मौत) को मीडिया दंगों की असल वजह बना कर पेश कर रही है वह दरअसल है नहीं। शाहनवाज़ और दूसरे दो लड़कांे की मौत के बारे में जो एफ़.आई.आर. दर्ज कराई गई उसमें कहीं भी लड़की छेड़ने तक का जि़क्र नहीं है। एक मामूली घटना को साम्प्रदायिक दंगे का रूप दिया गया, दो वर्ष पहले के दगों के एक वीडियो को भाजपा के परम्परागत समर्थकों द्वारा सोशल नेटवर्किंग और मोबाइल फ़ोन के ज़रिए, सचिन और गौरव की हत्या का वीडियो बताकर लोगों को दिखाया गया। इस वीडियों को सबसे पहले संगीत सिंह सोम ने सोशल नेटवर्क के माध्यम से जारी किया। इस वीडियों ने बहुसंख्यक समुदाय के लोगों के दिलों में बदले की भावना को उकसाया।
मुज़फ़्फ़रनगर में अभी स्थिति नियन्त्रित भी नहीं हो पाई है और अधिकतर दंगा पीडि़त शरणार्थी कैम्पों से घर नहीं लौट पाए हैं, लेकिन छिट-पुट हिंसा अभी भी जारी है। 10 अक्टूबर देर रात को मुज़फ़्फ़रनगर में 2 लोगों की हत्या से स्थिति फिर तनावपूर्ण हो गई। मुज़फ़्फ़रनगर में मोटरसाइकिल सवार युवको ने सैलून के मालिक गाँव गढ़ी निवासी 28 वर्षीय आबिद की गोली मारकर हत्या कर दी, तो वहीं मेरठ के लावड गाँव के पास जमालपुर रोड पर बदमाशों ने एक कारपेन्टर मोहसिन और उसके भाई शौकीन पर चाकुओं से हमला किया। जिसमें मोहसिन की मौके पर ही मृत्यु हो गई। इसके बाद 4 नवम्बर 2013 को बुढ़ाना मार्ग पर हुसैनपुर गाँव में एक खेत मंे अल्पसंख्यक समुदाय के 3 युवकों को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने कत्ल कर दिया और गाँव फ़ुगाना के जोगियाखेड़ा के राहत शिविर मंे रह रही युवती के साथ बहुसंख्यक समुदाय के 2 युवकांे ने खेत मे खींचकर सामूहिक रुप से बलात्कार किया।
सुप्रीम कोर्ट में मुज़फ्फ़रनगर ’सांम्प्रदायिक हिंसा’ मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील राजीव धवन और रवि प्रकाश मेहरोत्रा ने बृहस्पतिवार 17 सितम्बर 2013 को अपनी रिपोर्ट पेश की। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, मेरठ, बाग़पत और सहारनपुर मंे कुल 128 मामले दर्ज हुए हैं। इसमें 11 हिन्दू घायल और 57 मुसलमान, जबकि 16 हिन्दुओं की और 46 मुसलमानों की मौत हुई। इसी तरह दर्ज मामलों में अभियुक्तों का विवरण भी हिन्दू व मुसलमान के आधार पर दिया गया। राज्य सरकार ने बताया कि इन 5 जि़लों मे कुल 876 लोग अभियुक्त हैं जिनमे से अभी तक 243 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 12 लोगों पर रासुका लगाई गई है, और 16,112 लोगों के खिलाफ ़प्रिवंटिव एक्शन लिया गया है। इसके अलावा 5,708 लोगों से अच्छे आचरण का बंधपत्र लिया गया है। सरकार ने बताया कि कुल 128 एफ.आई.आर. दर्ज की गई। गत् 13 अक्टूबर तक राहत शिविरों में भी 325 एफ.आई.आर. औरशिकायतें दर्ज कराई गईं। जबकि सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए तथ्य सर्वेक्षण के अनुसार साम्प्रदायिक हिंसा में घायल और मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। सरकारी तंत्र निष्क्रिय रहा। 27 तारीख़़ के दंगों से पूर्व ही उ0प्र0 के मुख्य सचिव ने राज्य सरकार को सर्तकता बरतने हेतु आदेश दे दिए थे।
यही नहीं केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी सरकार को आगाह किया था। लेकिन उ0प्र0 सरकार ने इन गुप्त सूचनाओं के बावजूद भी कोई सर्तकता नहीं बरती और पष्चिमी उ0प्र0 के मुज़फ़्फ़रनगर और उसके आस-पास के जि़लों को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया। साम्प्रदायिक दंगे और उनके बाद बने माहौल का राज्य का हर राजनैतिक दल अपने तरीके से फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। दंगा पीडि़त अपने मृतकांे की और लापता लोगों की तलाश में व्यस्त हैं। गिनती राजनैतिक दल भी कर रहे हैं पर हिंसा से प्रभावित लोगों की नहीं, ’वोटों’ की। कितने वोट किसके खाते में आए और विरोधी के खाते में कितने वोट गए इसका हिसाब-किताब चल रहा है। यदि इन साम्प्रदायिक ताक़तों को न रोका गया तो उ0प्र0 ही नहीं बल्कि पूरा भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस जाएगा। दंगों की न्यायिक जाँच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ़ सख्त से सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।
-डा0 मोहम्मद आरिफ (चेयरमेन)
सेन्टर फ़ाॅर हारमोनी एण्ड पीस एवं (संयोजक)
आल इंडिया सेक्यूलर फोरम (उ0प्र0)
मो0-9415270416
तथ्य सर्वेक्षण टीम के सदस्य-
1. शाहीन अन्सारी (सहारनपुर)
2. अब्दुल्लाह (सहारनपुर)
3. शाहनवाज़ बदर (देवबन्द, सहारनपुर)
4. सुरेश कुमार ’अकेला’ (वाराणसी)
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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इन्सानियत जब शर्मसार हुई

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में सबसे घिनौनी और मानवता को झकझोर कर रख देने वाली खबर कि इन्सान के रूप में दरिन्दों ने मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ (जाट समुदाय के लोगों ने) उनके परिवार के सदस्यों के सामने बलात्कार और अभद्रता का व्यवहार किया और उन्हें बन्दी बनाकर रखा। इनमें लिसा़, लांक, बहावड़ी, हसनपुर, मोहम्मदपुर, कुटबा कुटबी, बाग़पत और शामली के बहुत से गाँव प्रमुख हैं।
गाँव लाँक निवासी सलमा पत्नी शहज़ाद ने बताया कि गाँव में हिंसा तो 7 सितम्बर की नंगलामंदौड़ की महापंचायत के बाद से ही शुरू हो गई थी। लगभग रात 8:00 बजे दंगाई हमारे घर में आ गए। मैने अपने पति को वहाँ से भाग जाने के लिए कहा। दंगाइयों ने सबसे पहले तेल डालकर मेरी 4 महीने की बच्ची को जला दिया, फिर मेरे साथ अभद्रता का व्यवहार करने लगे। दंगाइयों में हमारा पड़ोसी कुलदीप और उसके साथ जाट समुदाय के ही अन्य लोग थे। उन्होंने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया। मैं ऐसी ही हालत में वहाँ से भागी और पूरी रात ईख़ में छुपी रही। सुबह होने पर लोगों ने मुझे वहाँ से निकाला। अब मैं मलकपुरा कैम्प में रह रही हूँ। हमारे गाँव के प्रधान बिल्लू ने हमारी कोई मदद नहीं की। प्रमोद डीलर ने दंगाइयों को मुसलमानों के घर जलाने के लिए तेल दिया। कोई मेडिकल जाँच नहीं हुई। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने जाँच करने से इन्कार कर दिया था। बच्ची की एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है।
लाँक गाँव की ही निवासी वसीला खातून की 12 वर्षीय पुत्री शहनाज़ का सामूहिक बलात्कार कर उस पर तेज़ाब डालकर आग लगा दी। वसीला ने बताया कि दंगाई उनके पड़ोसी जाट और दलित समुदाय के ही थे। जिसमें नीरज कश्यप, संजीव और नीटू ने उसकी बच्ची के साथ बलात्कार किया। घर का सब सामान लूटकर आग लगा दी। उनकी बच्ची तड़प रही थी लेकिन वे वहाँ से अपनी जान बचाकर भागे और हसनपुर पहुँचे। रास्ते में जब बच्चों को भूख लगी तो खाने के लिए बच्चों को मिट्टी दी। इसके बाद उनको मलकपुर भेज दिया गया। जहाँ पर 10 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज की गई।
गाँव लिसा़ निवासी 70 वर्षीय असग़री ने हमे बताया कि जब गाँव में दंगा शुरू हो गया तो हम अपना घर छोड़कर भागने लगे तो दंगाई हमारे घर में आ गए उनके हाथों में हथियार थे। दंगाई जाट समुदाय के थे। जिनमें हमारे पड़ोसी मुकेश और आर्यन भी शामिल थे। दंगाइयों ने मेरे नाती उमरदीन को गड़ासे से गला काटकर मार दिया। फिर जब हम जान बचाकर भागे और हमारी बहू वकीला घर पर अकेली रह गई। मोहल्ले के बच्चों ने बाद में हमें बताया कि वकीला डर कर छत की ओर भागी लेकिन दंगाइयों ने उसे पकड़ कर खींच लिया और उसके साथ बलात्कार करने के बाद उसको तीन हिस्सों में काट दिया।
गाँव फुगाना निवासी ख़ुशीर्दा पत्नी नसीम अहमद, ने बताया कि 8 सितम्बर दोपहर 2:00 बजे 68 जाट समुदाय के लोग हाथों में हथियार लिए हमारे घर में आए। उनके साथ हमारे पड़ोसी गौरव, सुभाष, कपिल, उद्देश्य, अमरपाल और रॉकी भी शामिल थे। उन सब ने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया और मुझसे कहने लगे कि अगर तुमने भागने की कोशिश की तो हम तुम्हें जान से मार डालेंगे। मैं ऐसी ही हालत में वहाँ से भागी। रात 11:30 बजे फोन पर सम्पर्क के ज़रिए मैं अपने पति से जोगिया खेड़ा के जंगल में मिली। थाना फुगाना में हमारी एफ0आई0आर0 दर्ज नहीं की गई। सरकारी अस्पताल गए तो डॉक्टर ने मेडिकल जाँच करने से इन्कार कर दिया। एस0पी0 कल्पना ने कहा कि ’तुम झूठे केस लिए फिरते हो’। इसके बाद से हम जौला गाँव में रह रहे हैं। हमारी एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है। फुगाना निवासी फ़हमीदा पत्नी युसुफ़, घर पर अकेली थी। बच्चों को पहले ही बु़ाना भेज दिया था। पति भी घर पर नहीं थे। 8 सितम्बर दोपहर करीब 2:00 बजे जाट और सैनी समुदाय के 6 लोग सचिन, वेदपाल, नेक सिंह सैनी, राजपाल, नरेन्द्र और योगेश ने हमारे घर पर हमला बोल दिया। सभी लोग हमारे मोहल्ले के ही थे। सबके हाथों में हथियार थे। मैं डर कर भागने लगी तो उन्होंने मेरी चोटी खींच ली और फिर मेरे हाथपैर पकड़े और मेरे साथ ज़बरदस्ती करने लगे। उन्होंने सामूहिक रूप से मेरे साथ बलात्कार किया, और मैं बेहोश हो गई। जब मुझे होश आया तो मै अपनी जान बचाकर वहाँ से भागी और मैं लोई गाँव पहुँची। फिर सरकारी अस्पताल गई, डाक्टर ने मेडिकल जाँच करने से इन्कार कर दिया। इसके बाद जोगिया खेड़ा आई और फिर 15 दिन बाद यहाँ मेरी मेडिकल जाँच हुई। एफ0आई0आर0 दर्ज हो चुकी है।
गाँव फुगाना निवासी शबनम पत्नी शहज़ाद, ने बताया कि जब गाँव में दंगा शुरू हो गया तो प्रधान हरपाल ने मुसलमानों से विनती की कि वे गाँव छोड़कर न जाएँ। 8 सितम्बर की सुबह 45 लोगों ने घर पर हमला किया। उनके हाथों में हथियार थे। अपने पति को मैंने जान बचाकर भाग जाने के लिए कहा। बच्चे और मैं घर पर ही थे। दंगाइयों में राहुल, सुधीर और मोहित भी शामिल थे। सभी दंगाई जाट समुदाय के थे। उन्होंने मेरे बच्चों की नज़रों के सामने ही मेरा सामूहिक रूप से बलात्कार किया। सब सामान लूट लिया, घर जला दिया, कुछ नहीं छोड़ा। हमारे मोहल्ले में 16 घर मुसलमानों के थे, दंगे में सभी घर जला दिए गए। सेना ने हमें वहाँ से निकाला। मेडिकल जाँच नहीं हुई। डाक्टर ने कहा ’शादी शुदा की मेडिकल जाँच नहीं होती’। 15 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज हुई। सरकारी मेडिकल जाँच अभी तक नहीं हुई।
गाँव फुगाना की ही 22 वर्षीय फ़रज़ाना पत्नी शकील, ने बताया कि 8 सितम्बर हम अपने घर पर बैठे हुए थे तो शोर की आवाज़ सुनकर मेरे पति बाहर गए, इतने में जाट समुदाय के करीब 5 आदमी हाथों में हथियार लिए हुए हमारे घर में दाखिल हुए। मेरे साथ ज़बरदस्ती करने लगे। उन्होंने मेरे हाथपैर पकड़े और मुझे नीचे गिरा दिया, और सब ने बारीबारी से मेरे साथ बलात्कार किया। उनमें 3 मेरे पड़ौसी बदलू, नीरु और अमरदीप भी शामिल थे। मैं वहाँ से भागकर जोगिया खेड़ा पहुँची। अस्पताल गई तो डॉक्टर ने मेडिकल जाँच करने इन्कार कर दिया। 8 दिन बाद एफ0आई0आर0 दर्ज हुई।
गाँव फुगाना की एक और महिला 22 वर्षीय तस्मीम पत्नी मुस्तकीम ने हमें बताया कि 8 सितम्बर की सुबह 4 आदमी ज़बरदस्ती घर में आए, सबके हाथों में हथियार थे। घर में घुसने के बाद उन्होंने तोड़फोड़ की और फिर मेरे साथ हाथापाई करने लगे। सभी जाट थे। उन चारों ने मेरे साथ सामूहिक बलात्कार किया। मैं सभी को अच्छी तरह से जानती थी। उनके नाम हैं संजीव, रामदीन, रूपेश और पशमिन्दर। इसके बाद रामदीन ने कहा कि डीज़ल ले आओ इनके घर को आग लगा दो। मैं वहाँ से जान बचाकर भागी। मेरे घर के सभी लोग जोगिया खेड़ा में थे। कोई मेडिकल जाँच नहीं हुई, और एफ0आई0आर0 भी दर्ज नहीं है। जोगिया खेड़ा थाने में गई तो पुलिस ने कहा कि अपने थाने जाओ।
न जाने कितनी महिलाओं और लड़कियों को बलात्कार करने के बाद मार दिया गया और न जाने कितनी अभी तक लापता हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के कस्बों और गाँवों में जब साम्प्रदायिकता का तांडव चल रहा था और चारो ओर हाहाकार और कोहराम मच रहा था। वहीं कुछ ऐसे गाँव भी हैं जहाँ पर हिन्दूमुस्लिम-जाट ने अपने गाँवों में हिंसा न होने देने के लिए पंचायतें कीं। इन गाँवों में से घासीपुरा, हरसौली और निरमानी गाँव का हमने दौरा किया।
सबसे पहले हम निरमानी गाँव पहुँचे 6000 की आबादी वाले इस गाँव में 2000 से ज़्यादा मुसलमान हैं। जिनमें अधिकतर मुस्लिमजाट हैं। हमारी मुलाकात पूर्व सरपंच और पूर्व प्रधान एनुद्दीन से हुईं। उस समय उनकी बैठक पर दोनों समुदायों के 50 लोग बैठे थे। उन्होंने हमें बताया कि, ’’इस गाँव से न तो कोई पलायन हुआ और न ही हिंसा। हाल की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए उनका गला भर आया, उन्होंने बताया कि सच कहूँ तो 7 तारीख़ के झगड़े के बाद मुँह तक खाना नहीं गया। कई दिन रोते रहे, दुःख इस बात का है जाटमुस्लिम भाईचारा क्यों टूटा? हमें साज़िश करके लड़या गया है। शासनप्रशासन की भूमिका और भाजपा की चाल को नई पी़ी समझ नहीं रही है। महापंचायत को उनके हवाले कर दिया गया। उन्होंने कहा, कि हमें किसी से कोई शिकवा नही हमारे जाट भाइयों में क्यों बिगाड़ आया?’’
बु़ाना मार्ग पर ही थोड़ा सा आगे हरसौली गाँव में बलियान खाप के थांबेदार चौधरी तपे सिंह की चौपाल पर हिन्दूमुस्लिम एकत्र थे। क़रीब 15000 आबादी वाले इस गाँव में उनकी संख्या करीब आधीआधी है। यहाँ पर हिन्दू जाट भी हैं ओर मुस्लिम जाट भी हैं। तपे सिंह कहते हैं इस गाँव में हम लोग (जाटमुले जाट) एक दादा की औलाद हैं। दादी दो थीं एक के हम हैं और एक के वे। सन 1947 में भी हमने महापंचायत करके तय कर लिया था कि बाहरी लोगों से ख़ुद निपट लेंगे। इस बार भी पंचायत कर तय कर लिया था कि न फ़साद करेंगे न पलायन होने देंगे। नाम गिनाते हुए कहते हैं कि हमारे दूसरे गाँवों में कहीं झगड़े नहीं हुए। सिफ़र पुरबालियान में फ़साद हुआ। वह हमारा आधा गाँव है। अब कोशिश करेंगे कि जहाँ झगड़े हुए हैं वहाँ कमेटियाँ बना कर दिलों की दूरियाँ कम की जाएँ।
साम्प्रदायिक एकता की मिसाल गाँव ॔घासीपुरा’
मेरठ की ओर क़रीब 11 किमी. चलने के बाद घासीपुरा भी मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले का ही एक गाँव है। इस गाँव ने भी साम्प्रदायिकता की आग को अपनी सरहदों तक नहीं आने दिया। वहाँ पहुँचने पर हमने देखा कि यहाँ हिन्दू मुसलमानों को ाढ़स बँधा रहे थे। सबसे पहले हमारी बात गाँव के बुजुर्ग 62 वर्षीय नेत्रपाल से हुई, उन्होंने कहा, घासीपुरा गाँव में कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि यहाँ के बच्चे अब भी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं। नेत्रपाल की बात में दम था।
एक और युवा प्रवीण सिंह ने नेत्रपाल की बात की तस्दीक की, उसने भी बताया कि गाँव के लोगों के मिलनसार होने की वजह यह है कि सभी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं।
पास खड़े 49 वर्षीय अफ़ज़ाल ने बताया ’’मैं बचपन से इस गाँव में रह रहा हूँ। यहाँ के लोगों में मोहब्बत है। यही वजह है कि यहाँ से मात्र चारपाँच कि.मी. दूर पुरबालियान में फ़ायरिंग हुई, लेकिन हमें फिर भी कोई डर नहीं है। हमें अपने गाँव के लोगों की मोहब्बत पर पूरा भरोसा है।’’
हिंसा का शिकार हुआ मन्सूरपुर भी घासीपुरा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ मौजूद लोगों के चेहरे देखकर यह कहना मुश्किल है कौन हिन्दू है? कौन मुसलमान? घासीपुरा, निरमानी और हरसौली मुजफ़्फ़नगर के शायद अकेले ऐसे गाँव नहीं हैं जहाँ गाँव वाले नफ़रत से आपस में नहीं लड़ रहे हैं। हो सकता है ऐसे और भी गाँव हों। देखना यह है कि अफ़वाहों और नफ़रत के इस जंग में प्रशासन इनका साथ दे पाता है या नहीं। दंगा प्रभावित क्षेत्र
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के क़रीब 100 गाँव दंगे से बुरी तरह प्रभवित हुए। 54 गाँवों से एक समुदाय के लगभग 50,000 से अधिक लोग हिंसा के बाद पलायन कर गए। 40 से भी ज़्यादा जगहों पर शरणार्थियों को जगह मिली है। छोटी सरकार से बड़ी सरकार तक ज़िले में पहुँचीं, लेकिन अभी तक कोई भी ऐसा ब्लूप्रिन्ट सामने नहीं आया जिससे पलायन कर गए लोगों को वापस उनके गाँव लौटाया जा सके। प्रशासन के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हल़फ़नामे के अनुसार मुज़फफ़रनगर के 54 गाँव, शामली ज़िले के 31 और शामली के 23 गाँवों से लोगों ने हिंसा के बाद पलायन किया। लगभग 40 ऐसे गाँव हैं जहाँ से लोग दहशत के चलते घर छोड़कर चले गए। दोनों ज़िलों में 31 जगहों के लोग बड़े दिलवाले निकले और पलायन कर गए लोगों को शरण दी।
मुज़फफ़रनगर : बराल, बावली, सोंठा, बदरखा, किशनपुर, शेरपुर, धनौरा, लोहीरा, बामजोली, बिहारीपुर, माँगोजोली, आलम माजरा, डोंगर, हटाना, शीरी ख़ुर्द, खेड़ा, भोपा, लांक, मन्सूरपुर, खतौली,, शाहपुर बसी, धौलरा, ग़ी, गोड़ा, गोयला, बु़ाना, काकड़ा, सिसौली, कुरावली, खरड़, मोहम्मद पुर, खैनी ग़ी, रामराज सिखरेड़ा, करवा, टिकरी, तगाना, पैरोरी, उमरपुर, बुन्दुखेड़ा, लाख बावड़ी, हरौली गाँव, नागंल, भगवानपुर और मुज़फफरनगर शहर समेत 54 गाँवों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। जिसमें फुगाना, लिहसा़, जौली गंगनहर बहावड़ी और कुटबा कुटबी में सबसे ज़्यादा हिंसा हुई।
शामली : कुरमाली, थानाभवन और शामली शहर समेत शामली ज़िले के 23 गाँव हिंसा की चपेट में आ गए।
मेरठ : मवाना, बहसूमा, निलोहा, हस्तिनापुर में भी हिंसा हुई और मेरठ शहर में अभी भी स्थिति तनाव पूर्ण बनी हुई है।
बाग़पत : छपरौली, बड़ौत और बाग़पत शहर आदि में भी हिंसा हुई।
सहारनपुर : देवबन्द, गंगोह, रामपुर मनिहारान, नागल समेत सहारनपुर शहर में भी हिंसा हुई।
इस साम्प्रदायिक दंगे के परिणाम स्वरूप पिश्चमी उ0प्र0 के मुरादाबाद ज़िले समेत पूर्वी उ0प्र0 में भी तनाव व्याप्त है। हुआ यूँ कि मुरादाबाद हिन्दू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा समुदाय विशोष को लेकर पोस्टर पर प्रतिकूल टिप्पणी से शहर में साम्प्रदायिक तनाव हो गया। पूर्वी उ0प्र0 के कई क्षेत्ऱों से भी साम्प्रदायिक हिंसा की ख़बरें मिलीं। जिसमें बहराइच के दर्जीपुरवा क्षेत्र में रात 10:30 बजे लाउड स्पीकर को लेकर बवाल हो गया जिसमें 24 लोग घायल हो गए। कुशीनगर में शव दफ़न करने को लेकर एक वर्ग लामबन्द हुआ और बनारस के चार भाजपा विधायकों ने 12.9.2013 को उग्र भाषण देते हुए मुज़फ्फरनगर की तरफ़ कूच किया लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया उसके बाद वे अनशन पर बैठ गए।
दंगे में पुलिस की पक्षपात पूर्ण भूमिका के लिए डी.आई.जी. समेत कुछ अधिकारियों को स्थानान्ति्रत किया गया। गृह सचिव कमल सक्सेना के अनुसार, सहारनपुर रेंज में डी.आई.जी. डी.सी. मिश्रा की जगह अशोक मुथा जैन, मुज़फ़्फ़रनगर में एस.एस.पी. सुभाष चन्द्र दुबे की जगह प्रवीण कुमार और शामली के एस.पी. अब्दुल हमीद की जगह अनिल कुमार राय की तैनाती की गई। दंगा भड़काने के आरोप में लगभग 800 लोगों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया है।
ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर के डी.एम. कौशल राज शर्मा ने बताया कि शासन ने कंवाल के अलावा हिंसा में मरे तमाम लोगों को 1010 लाख रुपये, गम्भीर रुप से घायलों को 5050 हज़ार रुपये और घायलों को 2020 हज़ार रुपये देने के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया कि हिंसा में हुए नुकसान का आंकलन कराया जा रहा है। इस नुकसान की मुआवज़ा राशि पीड़ित परिवारों को दी जाएगी। इनमें शाहनवाज़, सचिन और गौरव भी शामिल हैं।
दंगे में हुए कुछ घायल और मृतक
सरकारी आँकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या 5060 है, जबकि कैम्पों में रह रहे प्रत्यक्षदिशर्यों के अनुसार इस साम्प्रदायिक हिंसा में घायलों और मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। जिन परिवारों से हमारा सम्पर्क हुआ, और हमने बातचीत की उन परिवारों के मृतकों की सूची अग्रलिखित हैः
सूची मृतक दिनांक07.09.2013 की घटना थाना ’भोपा’

1. सोहनबीर पुत्र कृपाल सिंह, निवासी भोकरहेड़ी, थाना, भोपा, मुजफ्फरनगर।
2. अजय पुत्र करण, निवासी सहमतपुर, थाना भोपा, मुजफ्फरनगर।
3. ब्रजपाल पुत्र हुकम सिंह, निवासी बसेडा़, थाना छपार, मुजफ्फरनगर।
4. नज़र मोहम्मद पुत्र मूसा, निवासी खेड़ी फिरोज़ाबाद, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर।
5. सलमान पुत्र उमर, निवासी तेवड़ा, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर
6. लताफत पुत्र मुस्तफ़ा, निवासी खेड़ी फ़िरोज़ाबाद, थाना ककरौली, मुजफ्फरनगर।
7. मोहम्मद नाज़िम पुत्र मुस्तफ़ा सैफ़ी, निवासी लाक, थाना फुगाना, शामली
सूची मृतक गाँव ’लाक’ दिनांक8.9.2013
1. अबलू लुहार, पट्टी भिटरवल सन्नी वाला
2. कासिम डोम, पट्टी मोघा
3. नसरु धोबी ज़िन्दा जला दिया गया।
4. 9 सितम्बर को एक महिला और उसके बेटे का मृतक शरीर प्रप्त हुआ। 8.9.2013 को ही फुगाना में भी 5 लोगों की हत्या की गई।
5. यामीन धोबी ज़िन्दा जला दिया गया।
6. ताहिर पुत्र गंजा वहीद
7. गंजा वहीद की पुत्रवधु
8. गंजा वहीद का एक और पुत्र
9. मेहरदीन तेली, पट्टी मोघा
मृतक सूची गाँव ’बजीटपुर’ दिनांक8.9.2013
1. यामीन का नाती
2. इकबाल, धोबी
घायल : 1. यामीन 2. कमरुद्दीन
सूची मृतक गाँव ’लिसा़’
दिनांक8.9.2013
1. नब्बू धोबी
2. मन्ज़ूरा
3. सिराजुद्दीन और उसकी पत्नी
4. करमू लुहार और उसकी पत्नी
5. भुट्टू परिवार के 7 सदस्य (जीवाँ धोबी, जीवाँ धोबी की पत्नी, बेटा, और जीवाँ धोबी के 2 नाती)
6. बाटी लुहार, आदि
7. एक ही दिन में 14 लोगों की हत्या की गई और अन्य कई घायल हुए।
8. 8.9.2013 को कुटबा गाँव में 4 लोगों की हत्या की गई।
मृतक सूची गाँव ’बहावड़ी, कुरमाली, खरड और हिंडोली 9.9.2013
1. इकरा पुत्री दिलशाद
2. हसीना पत्नी छज्जू
3. दिलशाद पुत्र छज्जू
4. अज़रा पुत्री आस मोहम्मद
5. ताजुद्दीन
6. शकील धोबी पुत्र जमील अहमद, 40 वर्ष
7. हाफ़िज़ साहेब कारी उमर दराज़
8. जुम्मा पुत्र दीनू को मस्जिद समेत जला दिया गया।
9. सग़ीर मनिहार
गाँव ’लिसा़’ में हुई हिंसा और हत्याओं में संलिप्त असामाजिक तत्वों की सूची
यह सूचना उन व्यक्तियों के द्वारा हमें दी गई जिन परिवारों से लोग घायल हुए और लोगों की मृत्यु हुई
1. सुक्खा पुत्र भूरा
2. अन्जु
3. कपिल पुत्र सतेन्द्र फौजी
4. सुरेन्द्र पुत्र खुब्बी
5. अनुज पुत्र चन्दर
6. बीनू पुत्र शानू
7. तोशी पुत्र महेन्द्र
8. सन्दीप पुत्र जीवन
9. मोनू पुत्र बिजेन्द्र फौजी
10. सुरेन्द्र उर्फ काला पुत्र माँगी
11. बबलू पुत्र श्याम
12. ऋषिपाल
13. सुरेन्द्र पुत्र चाही
14. बाबा हरिकिशन
15. राजेन्द्र मलिक पुत्र बाबा हरिकिशन
16. नीटू पुत्र रतन सिंह
17. बिजेन्द्र मलिक पुत्र बाबा हरिकिशन
18. सीतु पुत्र सत्य प्रकाश
19. सत्य प्रकाश पुत्र घासी
20. नीटु पुत्र नवाब कोडा
21. अमित पुत्र किशन, सुनार
22. विकास पुत्र सुखपाल
23. मिन्डा पुत्र सुखपाल
24. मनीष पुत्र स्वराज
25. चन्द्र पुत्र मिम्बर
26. बिट्टू पुत्र अत्तर सिंह
27. अंकुश पुत्र सतबीर और अन्य।
गाँव ’लाँक’ में हुई हिंसा और हत्याओं में संलिप्त असामाजिक तत्वों की सूची
यह सुचना उन व्यक्तियों के द्वारा हमें दी गई जिन परिवारों से लोग घायल हुए और लोगों की मृत्यु हुई
1. वीरपाल नाई का भतीजा
2. डॉ0 सुखदेव उर्फ डॉ0 काला का बेटा और माँगी लाल का नाती, पट्टी मोघा
3. चिराग पुत्र रामपाल गिरोलिया
4. पुत्र डॉ0 शिव कुमार और अन्य
5. धरमपाल झींवर
6. शौकिन्द्र प्रधान, सहयोगी, हुकम सिंह
7. धीरज पुत्र भोपाल
8. गाँधी पुत्र मास्टर सत्यपाल
9. भारत पुत्र भौंदा और नाती पूर्व प्रधान मेहर सिंह
10. भौंदा पुत्र मेहर सिंह
11. नवभारत
12. ओमपाल, पट्टी सालान
13.कपिल पुत्र ओमपाल सचिव, पट्टी सालान
14. पुत्र, डॉ0 नरेन्द्र पण्डित
15. विनोद उर्फ मांगी जोगी का जमाई
16. चमन पुत्र सोहन
17. निप्पल पुत्र मास्टर रणधीर
18. सुधीर उर्फ बिल्लू प्रधान
19. महाराज सिंह पुत्र भीम सिंह
20. राज सिंह पुत्र भीम सिंह
21. सचिन पुत्र साहब सिंह फ़ौजी, पट्टी
22. साहब सिंह, पट्टी मोघा
23. बब्लू पुत्र सोहनधर
24. दीपक पुत्र मास्टर जसवन्त
25. राहुल मलिक पुत्र राजबीर, पट्टी सालान
प्रशासन की भूमिका
पिछले वर्ष हुए साम्प्रदायिक दंगों कोसीकलाँ, प्रतापग़, बरेली, गाज़ियाबाद और फ़ैज़ाबाद आदि की कड़ुवाहट अभी ख़त्म भी नहीं हो पाई थी कि इन दंगों की कड़ी में हाल ही में मुज़फ़्फ़रनगर में जाट और मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक दंगा भड़क उठा। इस दंगे को आज़ाद हिन्दुस्तान में गुजरात के बाद सबसे बड़ा दंगा कहा जा रहा है। इस क्षेत्र में इमेरजेंसी के समय दंगा भड़का था लेकिन उसकी सूरत ऐसी नहीं थी जिसको देखकर मुर्दा दिल भी पसीज जाए। इस साम्प्रदायिक दंगे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मुसलमानों का न कोई मार्गदशर्क है और न ही कोई उनकी सुनने वाला है। राजनैतिक गलियों में मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझा जाता है और कुछ नहीं। इस दंगे को आर.एस.एस. की साज़िश बताया जा रहा है, और कुछ लोग इसे सरकार की नाकामी का नाम दे रहे हैं। दंगे में मरने वालों में सबसे अधिक संख्या में मुसलमान हैं विशोष रूप से बुर्जुगों और मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाया गया। जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी कम है वहाँ खास तौर से मुसलमानों पर हमले हुए। उ0प्र0 सरकार ने मौक़े पर लापरवाही बरती है। यह सब सरकार और प्रशासन की सुस्ती का नतीजा है। प्रशासन ने समय पर कार्यवाही न करके एक बार फिर निष्क्रियता का परिचय दिया है। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता के चलते साम्प्रदायिक तत्व अपने नापाक मंसूबों में कामयाब होते जा रहे हैं।
दंगे के दौरान प्रशासन का रवैया
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों को लेकर उ0प्र0 सरकार संदेह के घेरे में है। जब सरकार को इन हालात के बारे में मालूम था तो उन्होंने समय रहते कार्यवाही क्यों नहीं की। यह पहली बार हुआ कि एक के बाद एक मुस्लिम संगठन अखिलेश सरकार हटाने की माँग करने लगे। साम्प्रदायिकता के खेल के दूसरे सिरे पर भा.ज.पा. है जिसे उ0प्र0 जैसे बड़े राज्य में हमेशा किसी ऐसे अवसर की तलाश रहती है। पिछले अवसरों के मुक़ाबले में इस बार फ़र्क सिफ़र इतना है कि यह माहौल बनाकर मुलायम सिंह और इनकी पार्टी की सरकार ने भाजपा को यह अवसर सौग़ात में दे दिया। चौरासी कोसी परिक्रमा की नाकाम कोशिश के बहाने जो भा.ज.पा. नहीं कर पाई वो रास्ता समाजवादी पार्टी ने उसके लिए आसान कर दिया। यही नहीं मुज़फ्फरनगर के इस दंगे ने चौधरी चरण सिंह के समय से बनी मुस्लिम और जाटों की बरसों पुरानी एकता को भी तोड़ दिया। दंगे पहली बार शहर से निकलकर गाँव तक पहुँच गए। दंगों पर अफ़सोस करने वाले भाजपा नेताओं की दबी हुई ख़ुशी उनके चेहरों से देखते ही झलकती है।
भाजपा के सभी नेता अपनी सफ़ाई पेश करने में लगे हैं, और महापंचायत का ठीकरा एक दूसरे के सर पर फोड़ रहे हैं। यह महापंचायत ही मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे की जड़ बनी। भाजपा नेताओं ने पंचायत में जाटों को मुसलमानो के ख़िलाफ़ भड़काया। अब यह सभी नेता ख़ुद को बेगुनाह बता रहे हैं और इस महापंचायत को ’’बेटी बचाओ पंचायत’’ का नाम दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि ’बेटी बचाओ पंचायत’ में हथियारों की क्या ज़रुरत थी। जो लोग हाथों में लाठी, डंडे और नंगी तलवारें लेकर आए, प्रशासन ने उनको क्यों नहीं रोका और पंचायत में मुसलमानों के खिलाफ़ ज़हर क्यों उगला गया। इन सभी बातों से यह साबित होता है कि यह महापंचायत एक सोची समझी साज़िशके तहत बुलाई गई थी। दंगा भड़काने के इल्ज़ाम में भाजपा के कई बड़े नेता, हुकम सिंह, सुरेश राना, भारतेंदु संगीत सोम, साध्वी प्राची और इनके अलावा चौ0 टिकैत के दोनों बेटे नरेश टिकैत, राकेश टिकैत और हरिन्दर मलिक और ’बहुजन समाज पार्टी’ के नूर सलीम राना और कादिर राना पर भी मुक़द्मा दर्ज किया गया था। इनमें भाजपा के सुरेश राणा और संगीत सिंह सोम को गिरफ़्तार कर लिया गया। संगीत सिंह सोम और भाजपा विधायक सुरेश राणा पर 31 अगस्त और 7 सितम्बर की नंगला मंदौड़ की महापंचायत में भड़काऊ भाषण देने और हिंसा भड़काने के आरोप में रासुका लगाई गई।
1. पिछले 89 महीनों से ज़िले में साम्प्रदायिक प्रक्रिया के संकेत दिखाई दे रहे थे। लेकिन प्रशासन और राज्य खुफ़िया विभाग ख़तरे का आंकलन करने में विफ़ल रहा या नफ़रत फैलाने में संघ के साथ मिल गया।
2. जब एस0एच0ओ0 फुगाना, एस0एच0ओ0 भौंराकला और एस0एस0पी0 ने कोई जवाब नहीं दिया, तो सहारनपुर रेंज के आयुक्त सेना के साथ गाँव के लिए रवाना हुए। उन्होंने 2000 से अधिक लोगों की जान बचाई।
3. अधिकांश एफ0आई0आर0 नाम से पंजीकृत हो रही हैं, लेकिन आरोपी अभी भी मुक्त घूम रहे हैं।
4. गाँव लिसाड़ के अजीत प्रधान साम्प्रदायिक हिंसा के समय पुलिस के साथ था। वह लगभग 20 एफ0आई0आर0 में नामित किया गया है।
5. इन पुलिस थानों में तैनात अधिकांश पुलिस कर्मियों में जो जाट समुदाय से थे, वे दंगाइयों के साथ मिल गए थे।
6. पुलिस कर्मियों में से अधिकांश अपने व्यवहार में अत्यधिक पक्षपातपूर्ण थे।
7. कई दंगा पीड़ितों ने हमें बताया, पुलिस कर्मियों ने उनसे कहा कि, ’’वे उन्हें नहीं बचा सकते क्योंकि वे मुसलमान हैं।’’
8. स्थानीय पुलिस थानों में तैनात लोग मुसलमानों के खिलाफ़ पक्षपातपूर्ण हैं। जिसके परिणाम स्वरूप थानों में मामले दर्ज नहीं किए जा रहे।
9. घटना के दिन , सुबह से ही अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थाने में फोन कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने कोई भी प्रतिक्रिया करने से इन्कार कर दिया।
10. पर्याप्त पुलिस व्यवस्था भी परिस्थितियों को सँभाल नहीं सकी, जो कि पिछले 8 से 9 महीनों के लिए विकसित की गई थी।
नारे
1.’’तुमने दो को मारा है, हम सौ
कटवे मारेंगे।’’
2.’’सोनीसोनी लड़कियों के सिन्दूर
भर देंगे, बाकियों को काट देंगे।’’
3.’’ मोदी लाओ, देश बचाओ।’’
4.’’मोदी को लाना है, गोधरा बनाना
है।’’
5.’’देश, बहू और गाय को बचाना
है, तो नरेन्द्र मोदी को लाना है।’’
6’’मुसलमानों का एक स्थान
कब्रिस्तान या पाकिस्तान।’’

-डा0 मोहम्मद आरिफ

क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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तथ्य सर्वेक्षण
पृष्ठभूमि

पश्चिमी उ0प्र0 के जाट लैण्ड का दिल कहे जाने वाले मुज़फ़्फ़रनगर-शामली गंगा जमुना के दोआब में बसे उपजाऊ भूमि वाले इस क्षेत्र में 70 प्रतिशत किसान एक हेक्टेयर से कम जोत के हैं। मुज़फ़्फ़रनगर से किसी तरफ़ निकलिए हरियाली ही हरियाली दिखाई देगी। गन्ना यहाँ की लाइफ़ लाइन है। इस क्षेत्र में जहाँ पगड़ी और मूँछ को प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है वहीं अच्छी फ़सल और तंदुरुस्त पशु भी स्टेटस सिम्बल माने जाते हैं।
यह वही इलाका है जहाँ हिन्दू और मुस्लिम हर छोटे और बड़े फ़ैसले में साथ बैठ कर दुःख-दर्द साथ बाँटते थे। चैधरी चरण सिहं ने जाट-मुस्लिम के इस समीकरण को राजनैतिक प्रयोगशाला में मज़बूत बनाया। जाट और मुस्लिम एकता का यह एकमात्र उदाहरण है। वर्ष 2001 की आबादी के मुताबिक मुज़फ़्फ़रनगर-शामली में मुस्लिमों की आबादी 38.1 प्रतिषत, 60.1 प्रतिशत हिन्दू और बाक़ी सभी अन्य धर्म के लोगों की थीं। मुज़फ़्फ़रनगर में 540 और शामली में 218 ग्राम पंचायतें हैं। मुख्य रूप से जाट और मुसलमानों का दबदबा है और अब तक इसकी एकता की मिसाल दी जाती थी। यहाँ का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पिछले साठ सालों में मुसलमानों और जाटों के बीच ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिससे उनके बीच नफ़रत की दीवार खड़ी हो जाए। यहाँ तक कि अयोध्या विवाद के दौरान या पश्चिमी उ0प्र0 में हुए अन्य दंगों के दौरान भी। शायद इसी कारण चौधरी चरण सिंह ‘किसान मुसलमान’ का नारा देते थे। किसान यूनियन के झण्डे तले यहाँ के लोगों ने देशव्यापी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। भारतीय किसान यूनियन के जनक चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुआई में होने वाले हर आन्दोलन जिसमें ’नईमा आन्दोलन’ ’मेरठ आन्दोलन’ आदि में ’एकता’ का सन्देश देने के लिए ’हर-हर महादेव’ और ’नारा-ए-तकबीर अल्लाहु अकबर’ की सदा गूँजती रही। वे कभी यह नहीं देखते थे कि ज़ुल्म सहने वाला हिन्दू है या मुालमान। वे सिर्फ़ हक़ के लिए लड़ते थे। इन सभी आन्दोलनों की अध्यक्षता ग़ुलाम मोहम्मद जौला ने की थी। उनके चले जाने के बाद यह सिलसिला कमज़ोर पड़ गया। साम्प्रदायिक ताक़तों को जाटों और मुसलमानों का यह मेल-जोल खटक रहा था। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे इस मेल-जोल को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया।
नंगला मंदौड़ की महापंचायत के बाद भड़की हिंसा
वास्तव में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगे निश्चित रूप से हमारे कुछ राजनैतिक दलों की लाशों पर राजनीति करने की परम्परा और कुछ नेताओं की चुनावी लोलुपता के सिवाय कुछ नहीं। समाजवादी पार्टी और भा.ज.पा. के गठजोड़ में प्रायोजित इन दंगों ने न केवल राष्ट्रीय लोकदल और भारतीय किसान यूनियन के भविष्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया है बल्कि जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच सन्देह की ऐसी दीवार खड़ी कर दी है जिसका गिराया जाना दोनों समुदायों के लिए समय की नितान्त आवश्यकता है। दंगों के कारण जानमाल की हानि और गाँव के क्षेत्रों से होने वाला एक समुदाय विशोष का पलायन केवल एक क्षणिक आवेश में आकर भयाक्रान्त समुदाय का ही पलायन नहीं है बल्कि यह बड़े चौधरी के आदशोर्ं और एक किसान के तौर पर दोनों समुदायों की सामाजिक, राजनैतिक आवश्यकताओं और समस्याओं को लेकर बनी और आजतक चली आ रही भारतीय किसान यूनियन की बुनियाद से होने वाले पलायन के तौर पर भी इतिहास में दर्ज होगा।
घटना का ब्यौरा
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के (जानसठ) कवाल गाँव में 27 अगस्त 2013 को मोटर साइकिलों पर सवार दो समुदायों के युवकों के आपस में टकरा जाने की एक छोटी सी घटना से भड़की हिंसा में शाहनवाज़, गौरव और सचिन की हत्या के बाद से मुज़फ़्फ़रनगर, शामली समेत उसके आसपास के गाँवों में हुए साम्प्रदायिक दंगों से जहाँ आम आदमी ख़ौफ़ और दहशत के साए में जी रहा है वहीं इन दंगों से मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, बाग़पत, मेरठ और सहारनपुर समेत आसपास के शहरों का व्यापार भी बहुत प्रभावित हुआ है। इस साम्प्रदायिक दंगे में सरकारी आँकड़ों के अनुसार 50 से 60 और ग़ैर सरकारी आँकड़ों के अनुसार सैंकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और गम्भीर रूप से घायलों की संख्या तो अनगिनत है।
साम्प्रदायिकता की आग में सुलगता मुज़फ़्फ़रनगर
मुज़फ़्फ़रनगर कवाल घटना पर 7 सितम्बर 2013 को नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत में शामिल होने जा रही बस में सवार लोगों ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक आदमी को पीटपीट कर मार दिए जाने के बाद हालात क़ाबू से बाहर हो गए और दोनों समुदायों के लोग आमनेसामने आ गए और जमकर पथराव, लूटपाट, आगज़नी और फ़ायरिंग हुई जिसमें कई लोगों की मृत्यु हुई। मरने वालों में, एक टी.वी. चैनल का रिपोर्टर भी शामिल है। दंगे में मुज़फ़्फ़रनगर शहर के शेर नगर, मीनाक्षी चौक, अबुपुरा, अल्मासपुरा, खादरवाला, लद्घावाला, रूड़की चुंगी, जौली गंगनहर, व मीरापुर के मुंझेड़ा आदि में जमकर हिंसा हुई। हिंसा में मुस्लिम महिलाओं के साथ अभद्रता का व्यवहार कर उनको जान से मार दिया गया और मासूम बच्चों को भी नहीं बख़्शा गया। दंगे में बहुत सी मस्जिदों और मदरसों को भी निशाना बनाया गया। जौली गंगनहर पर साम्प्रदायिकता का नंगा नाच पुलिस और पी.ए.सी. की मौजूदगी में हुआ। स्थिति को नियन्ति्रत करने के
लिए ज़िले के तीन थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू लगा दिया गया था।
दंगे में तबाह हुए घर
उसके बाद गाँवों और कस्बों में असामाजिक तत्वों ने कोहराम मचा दिया था खेतों में घुसकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का नरसंहार किया जहाँ रोज़ाना लाश्ों बरामद हुईं। लेकिन प्रशासन ने इस ख़बर को बिल्कुल ही छुपा दिया। पुलिस और प्रशासन स्थिति पर नियन्त्रण नहीं कर सके। इसलिए वहाँ पर सेना को तैनात कर दिया गया था जहाँ पर बहुत अधिक संख्या में लाश्ों पड़ी हुई थीं। दंगों के नतीजे में मुज़फफ़रनगर के आसपास के ज़िलों शामली, बाग़पत, मेरठ और सहारनपुर में सार्वजनिक स्तर पर 50 से 60 लोगों की मृत्यु हुई और 60 से ज़्यादा लोग गम्भीर रूप से घायल हुए। हालाँकि मरने वालों की संख्या सैंकड़ों में है और घायलों की तो गिनती ही नहीं की जा सकती। ज़िले के शहरी और गाँव क्षेत्रों में सलामती दस्तों की लगभग 50 कम्पनियाँ तैनात की गई थीं और सेना, अर्द्धसैनिक बल और सिविल पुलिस का फ़्लैग मार्च जारी रहा और आसपास के ज़िलों में भी कड़ी निगरानी रखी गई क्योंकि मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के बाद इन क्षेत्रों में भी कशीदगी पैदा की गई थी। इससे निपटने के लिए मेरठ रेंज के चार ज़िलों में अधिकारियों की फ़ौज पड़ी रही और पैरा मिलिट्री के अलावा सेना भी स्थिति पर नियन्त्रण करने में नाकाम रही।
दंगे जलते हुए घर और वाहन
इस भयानक दंगें में हजा़रों लोग अपने आप को असुरक्षित समझते हुए अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हुए और उन्होंने आसपास के गाँवों में शरण ली। चिन्ताजनक बात यह है कि दंगें को नियन्ति्रत करने में पुलिस और प्रशासन ने ज़बरदस्त लापरवाही का सुबूत दिया। अगर शासन और प्रशासन पहले से ही कोशिश करता कि दंगा न हो तो फिर ये दंगा न फूटता। स्थिति तो 12 दिन पूर्व ही तनाव पूर्ण थी और दफा 144 भी लागू थी। फिर भी शरारती तत्वों को महापंचायत करने से नहीं रोका गया जिसमें बड़ॣ संख्या में भा.ज.पा. के स्थानीय नेताओं समेत बहुसंख्यक समुदाय के लगभग 50 हज़ार लोगों ने ब़चढ़ कर हिस्सा लिया और दंगे के लिए वातावरण तैयार किया। महापंचायत में मुसलमानों को मारने की क़समें खाई गईं। उनके खिलाफ़ नारे लगाए गए, ’’मुसलमानों का एक ही थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान ’’। महापंचायत में बहुसंख्यक समुदाय के लोग नंगी तलवारें और अन्य हथियार लेकर शामिल हुए और फ़िर दंगा भड़काना शुरू कर दिया। इसके बाद भी प्रशासन ने दंगे को नियन्ति्रत करने में इस क़दर सुस्ती बरती कि दंगाई हमेशा की तरह पुलिस की मौजूदगी में आगज़नी, लूटपाट और क़त्लओ-गा़रत करते रहे और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मरते रहे। पुलिस ने, जिसका काम ज़ालिम को ज़ुल्म से रोकना है, उसने जु़ल्म को ब़ावा देने के लिए दंगाइयों के लिए जैसे इंधन ही उपलब्ध करा दिया हो।
सितम्बर में नंगला मंदौेड़ की महापंचायत
इन गाँवों, कस्बों में हैं शरणार्थी:
जौला, शफ़ीपुर पट्टी, लोई, जोगी खेड़ा, मंडवाला, बसींकला, शिकारपुर, शाहपुर, हबीबपुर, रसूलपुर दभेड़ी, हुसैनपुर कलां, बु़ाना, जसोई, साँझक, खतौली, तावली, बघरा, सौंटा रसूलपुर, शामली, ग़ी पुख़्ता, कैराना, मलकपुर, नूरखेड़ा, ग़ी दौलत, काँधला, काँधला देहात गँगेरु, आल्दी, थानाभवन, जलालाबाद, लोनी, खतौली आदि।
काँधला समेत ग़ी दौलत और कैराना में 18 हज़ार, गँगेरु आल्दी में करीब 7 हज़ार, शामली में 14 हज़ार से ज़्यादा, थाना भवन में 116 परिवार, जलालाबाद में 200 और लोनी के मदरसे में 2833 लोग पनाह लिए हुए हैं। इनमें गाँव लिसा़, लाँक, बहावड़ी, हसनपुर, खरड़, फ़ुगाना, सिंभालका, कुटबा कुटबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, और बाग़पत के गाँव लूंब, तुगाना, हेवा, किरहल, बू़पुर, रमाला आदि गाँव के क़रीब ाई हज़ार लोग पनाह लिए हुए हैं। शरणार्थी शिविरों में यह लोग सरकारी राहत सामग्री का इन्तज़ार कर रहे हैं। यहाँ ग्रामीण आसपास के शहरों और कस्बों से राशन, कपड़े, कम्बल और ज़रूरत का लगभग सभी सामान जुटाकर इन सभी लोगों के लिए भोजनपानी और सुरक्षित रहने का इन्तज़ाम कर रहे हैं। रात में महिलाएँ सोती हैं तो पुरुष पहरा देते हैं। लोग अपने गाँव वापस आने से डरते हैं। लेकिन न तो उ0प्र0 सरकार और न ही केन्द्र सरकार से अब तक कोई मदद उन तक पहुँच पाई है।
पलायन करते हुए लोग व दंगे में घायल और भूख से बिलखते मासूम
प्रत्यक्षदिशर्यों के अनुसार :
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों ने हज़ारो लोगों को शरणार्थी बना दिया है। राहत कैम्पों में पड़े लोगों की दुनिया चंद घंटों मे बदल गई। लगभग 7080 हज़ार लोग साम्प्रदायिक हिंसा में बेघर हो गए और अब शरणार्थी शिविरों में अपना जीवन गुजार रहे हैं। हमारी पाँच सदस्यीय टीम ने शरणार्थी कैम्पों का दौरा कर कैम्पों में रह रहे पुरुषों और महिलाओं से बात की।
थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान ’’। महापंचायत में बहुसंख्यक समुदाय के लोग नंगी तलवारें और अन्य हथियार लेकर शामिल हुए और फ़िर दंगा भड़काना शुरू कर दिया। इसके बाद भी प्रशासन ने दंगे को नियन्ति्रत करने में इस क़दर सुस्ती बरती कि दंगाई हमेशा की तरह पुलिस की मौजूदगी में आगज़नी, लूटपाट और क़त्लओ-गा़रत करते रहे और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मरते रहे। पुलिस ने, जिसका काम ज़ालिम को ज़ुल्म से रोकना है, उसने जु़ल्म को ब़ावा देने के लिए दंगाइयों के लिए जैसे इंधन ही उपलब्ध करा दिया हो।
सितम्बर में नंगला मंदौड़ की महापंचायत
इन गाँवों, कस्बों में हैं शरणार्थी:
जौला, शफ़ीपुर पट्टी, लोई, जोगी खेड़ा, मंडवाला, बसींकला, शिकारपुर, शाहपुर, हबीबपुर, रसूलपुर दभेड़ी, हुसैनपुर कलां, बु़ाना, जसोई, साँझक, खतौली, तावली, बघरा, सौंटा रसूलपुर, शामली, ग़ी पुख़्ता, कैराना, मलकपुर, नूरखेड़ा, ग़ी दौलत, काँधला, काँधला देहात गँगेरु, आल्दी, थानाभवन, जलालाबाद, लोनी, खतौली आदि।
काँधला समेत ग़ी दौलत और कैराना में 18 हज़ार, गँगेरु आल्दी में करीब 7 हज़ार, शामली में 14 हज़ार से ज़्यादा, थाना भवन में 116 परिवार, जलालाबाद में 200 और लोनी के मदरसे में 2833 लोग पनाह लिए हुए हैं। इनमें गाँव लिसा़, लाँक, बहावड़ी, हसनपुर, खरड़, फ़ुगाना, सिंभालका, कुटबा कुटबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, और बाग़पत के गाँव लूंब, तुगाना, हेवा, किरहल, बू़पुर, रमाला आदि गाँव के क़रीब ाई हज़ार लोग पनाह लिए हुए हैं। शरणार्थी शिविरों में यह लोग सरकारी राहत सामग्री का इन्तज़ार कर रहे हैं। यहाँ ग्रामीण आसपास के शहरों और कस्बों से राशन, कपड़े, कम्बल और ज़रूरत का लगभग सभी सामान जुटाकर इन सभी लोगों के लिए भोजनपानी और सुरक्षित रहने का इन्तज़ाम कर रहे हैं। रात में महिलाएँ सोती हैं तो पुरुष पहरा देते हैं। लोग अपने गाँव वापस आने से डरते हैं। लेकिन न तो उ0प्र0 सरकार और न ही केन्द्र सरकार से अब तक कोई मदद उन तक पहुँच पाई है।
पलायन करते हुए लोग व दंगे में घायल और भूख से बिलखते मासूम
प्रत्यक्षदिशर्यों के अनुसार :
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों ने हज़ारो लोगों को शरणार्थी बना दिया है। राहत कैम्पों में पड़े लोगों की दुनिया चंद घंटों मे बदल गई। लगभग 7080 हज़ार लोग साम्प्रदायिक हिंसा में बेघर हो गए और अब शरणार्थी शिविरों में अपना जीवन गुजार रहे हैं।
हमारी पाँच सदस्यीय टीम ने शरणार्थी कैम्पों का दौरा कर कैम्पों में रह रहे पुरुषों और महिलाओं से बात की
होग़ी
दौलत मदरसा कैम्प
काँधला से 4 कि0मी0 आगे ग़ी दौलत गाँव कैम्प में 800 शरणार्थी रह रहे हैं। जहाँ पर मदरसे के प्रबन्धक, स्थानीय लोग और आसपास के क्षेत्रों के लोग उनके खानेपीने और सभी ज़रूरत के सामान का प्रबन्ध कर रहे हैं। कैम्प के प्रबन्धक ने हमें बताया कि कुछ दिन पहले सरकार की ओर से जो राशन आया था वह ऐसा था कि शायद उस राशन को जानवर भी न खाएँ। शरणार्थियों ने अपने घर में वापस लौटने की बात पर कहा कि वह वापस अपने घर कैसे जाएँ जब उनके घर जला दिए गए हैं।
प्रबन्धन कमेटी : मौलाना कामिल,
सबसे पहले हमारी बात गाँव लिसा़ निवासी इकराम से हुई उसके ताऊ और ताई दोनों की काटकर हत्या की गई और बाद में उनकी लाशों को और घर को उनकी नज़रों के सामने जला दिया गया। ख़ौफ की वजह से जंगल के रास्ते इकराम अपने परिवार की महिलाओं और बच्चो समेत ग़ी दौलत मदरसे में पहुँचे।
गाँव लिसा़ के ही दूसरे व्यक्ति मो0 शमशाद ने हमें बताया कि 5 सितम्बर की पंचायत लिसा़ में आयोजित की गई थी यहीं से इस पंचायत की भीड़ को देखते हुए 7 सितम्बर नंगला मंदौड़ पंचायत का ऐलान भी किया गया। 7 तारीख़ को शाम लने के बाद व्यक्तियों से लदी एक ट्राली नगला मंदौड़ से हसनपुर पहुँची, बहुसंख्यक समुदाय के अन्य व्यक्तियों को अपने साथ लेकर उन लोगों ने हथियारों और तमन्चों के साथ अराजकता का नंगा नाच करते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों को चुनचुन कर निशाना बनाना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने नजरू जुलाहा और उसकी पत्नी का गला काटकर उनके घर में आग लगा दी। इसके बाद बहुसंख्यक समुदाय का एक लड़का बबलू अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के पास गया और उसने लोगों को जानकारी दी कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की मीटिंग चल रही है और गाँव के प्रधान ने घोषणा की है कि एकएक मुसलमान को हम काट देंगे और जला देंगे। बबलू (जाट समुदाय का लड़का) ने अपनी कार से कुछ लोगों को सुरक्षित निकाला, थोड़ी ही देर में नसरुल जुलाहे के घर में दंगाई दाखिल हुए उसका तलवारोंगड़ासों से गला काटकर उसके घर में आग लगा दी। इसके बाद सुक्खन धोबी, अक्लू धोबी, नब्बू लुहार, ज़रीफ़न, सिराजुल और निकट ही यामीन की पत्नी को भी काटकर जला दिया गया और करमू और नब्बू की दो नवासियों को दंगाई उठा कर ले गए।
शमशाद ने बताया कि, 3050 की अल्पसंख्यक आबादी वाले लिसा़ गाँव में शमशाद और इकराम की जानकारी के मुताबिक उनकी नज़रों के सामने लगभग 12 पुरुषों और महिलाओं को काटा और जलाया गया। घरों से सभी सामान और पशु उनसे छीनकर उनके घरों को आग लगा दी। सिर्फ अपनी जान बचाकर लगभग 350 लोग काँधला की ओर भाग गए।इसके बाद ज़िला बाग़पत के वज़ीरपुर गाँव के नूर हसन ने हमें बताया क 8 सितम्बर 2013 को इशा की नमाज़ के समय दंगाइयों ने नमाज़ियों से भरी हुई एक मस्जिद पर अंधाधुंध फ़ायरिंग करके बड़ी संख्या में नमाज़ियों को घायल कर दिया, एक 7 साल के बच्चे समेत 4 लोगों की हत्या की गई और इसके अलावा मस्जिद में तोड़फोड़ और आगज़नी भी की गई। जब नमाज़ी अपनों की लाशों को उठा कर अपने घर ले गए तो पुलिस का भारी अम्ला उनके घरों पर गया और उनसे कहा कि इन चारों लोगों को अभी दफनाओ। लोगों ने उनका विरोध करते हुए कहा कि अभी इनके कफ़न और ग़ुस्ल का इन्तेज़ाम नहीं है और अभी किसी और को मारना है तो अभी मार दो। इस पर पुलिस ने उन लोगों को डराया, धमकाया और उनको जान से मारने तक की धमकी दी, और अर्द्धरात्री को उन चारों लाशों को एक ही कब्र में दफ़नाया गया।
ईदगाह कैम्प, कांधला

इस कैम्प में 80009000 दंगा पीड़ित शरणार्थी हैं। इसके अलावा मुस्तफ़ाबाद कैम्प में 500, इस्माईल कैम्प में 800 और बिजलीघर कैम्प में 2500 शरणार्थी इस समय रह रहे हैं। सभी कैम्प मुस्लिम समुदाय के द्वारा लगाए गए हैं। इन कैम्पों में न पानी की सप्लाई और न ही टायलेट का कोई प्रबन्ध सरकार की ओर से किया गया है। 810 दिन के बाद राशन सरकार की ओर से आता है, लेकिन जितनी ज़रूरत होती है उसका सिफ़र 10 प्रतिशत राशन आता है, जो कि पूरा नहीं हो पाता है। प्रबन्धन कमेटी : मौलाना अरशद, हाजी सलीम, इस्तिखार और मौलाना राशिद आदि।
ईदगाह कैम्प में हमारी बात गाँव लिसा़ निवासी यासीन से हुई। वे कहते हैं, ’’मेरी बीवी के पेट में बच्चा था, लात मारकर खत्म कर दिया गया। मुझे पता नहीं वह बच्ची थी या बच्चा। किसी के तबल मार दिया। एक नब्बे साल के वृद्ध को ज़िंदा जला दिया। उसे क्यों मारा? वह तो चार दिन रोटी न मिलती तो खुद ही मर जाता। ये क्या था कि हमारे बच्चों और बुजु़र्गो को हमारी ही नज़रों के सामने क़त्ल कर दिया गया। उनकी आवाज़ में दर्द था सब कुछ खो देने का। अपनी बात को जारी रखते हुए उन्होंने हमें बताया कि हमें सोतेसोते रात को अपने घरों को छोड़कर भागना पड़ा। बस ये ही आवाज़ आ रही थी कि ’’मार डालो’’ ’’लगा दो आग इनमें’’ ’’पकड़ो इन्हें भागने न पाएँ’’ आदि। हमारे घरों में आग लगा दी। भले ही मेरा घर बच गया हो, लेकिन वह मेरा कहाँ रह गया। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि अपने घर को अपना कह दूँ। ये कह दूँ कि ये मेरा घर है, मेरा गाँव है, क्यों छीन लिया मेरा अधिकार, मेरी नागरिकता? बस इतना बता दो?’’
सिम्भालका निवासी रुख़साना ने बताया 8 सितम्बर की सुबह जाट समुदाय के लोगों ने हमारे घर पर हमला बोला। उनके हाथों में हथियार थे। उन्होंने गड़ासे से गला काटकर मेरे ससुर हमीद की हत्या कर दी। घर का सब सामान लूट लिया गया और घर को आग लगा दी। हम किसी तरह अपनी जान बचाकर वहाँ से निकले।
लिसा़ निवासी भूरो ने बताया कि 8 सितम्बर की ही सुबह 8:30 बजे दंगाइयों ने हमारे घर पर हमला किया उनके हाथों में गड़ासे, तलवारें और डीज़ल था। उन्होंने सबसे पहले मेरी सास और ससुर हकीमु को गड़ासे से काट दिया और फिर उन पर तेल डालकर आग लगा दी। सब सामान और नकदी लूट कर घर को जला दिया।
इसी क्षेत्र के एक दलित कार्यकर्ता ने हमें बताया, ’’बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद 1992 में चरम साम्प्रदायिक तनाव के समय भी राज्य स्तर पर सेना नहीबुलानी पड़ी थी। साम्प्रदायिक तनाव के समय पहली बार यहाँ सेना को बुलाना पड़ा।’’ इसका अर्थ है कि राज्य सरकार को लगता है कि स्थानीय पुलिस और पी.ए.सी. की जगह किसी और की ज़रुरत है। राज्य सरकार को स्थाीनय पुलिस और पी.ए.सी. पर भरोसा नहीं है। ताज़ा हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आँकड़ों की तुलना करें तो दोनो में बहुत अंतर है। आधिकारिक तौर पर 5060 मरे हैं, सैंकड़ों लापता हैं। हमें पता है कि लापता कौन लोग हैं और कहाँ हैं।
राजकुमार के अनुसार, ’’ हालिया तनाव जाटों और मुसलमानों के बीच है, दूसरे समुदाय चुपचाप बैठे हैं और तमाशा देख रहे हैं। मुसलमानों को उनकी औक़ात दिखाने की सोच हावी है। पहले यह शहरी इलाके में होता था, अब गाँव के इलाकों में हिंसा फैलने से पता चलता है कि ये भावना हमारी सोच से ज़्यादा गहरी होती जा रही है।’’
वहीं पर हमारी बात नसरुद्दीन पुत्र कमालुद्दीन से हुई उन्होंने हमें बताया कि हमारे बच्चों को मार दिया गया। घरों से सारा माल और दौलत लूट लिया गया और हमारी बेटियों के साथ शर्मनाक खेल खेला गया। जिसको बयान करना मुश्किल है। अभी तक एफ़.आई.आर. दर्ज नहीं हुई।
इसके बाद गाँव बहावड़ी निवासी शमशाद, फ़ैज़ान, अयूब, सद्दाम, कादिर और शाहबाज़ ने हमें बताया कि रविवार की रात दंगाइयों ने उनके मकानों में आग लगा दी। किसी तरह जान बचाकर जंगल के रास्ते बाहर निकले ओर वहाँ से शामली अस्पताल पहुँचे। उनके परिवार से दिलशाद नाम का एक लड़का लापता है।
जामिया अरबिया ज़ैनतुलइस्लाम, कैम्प, लोनी
8 सितम्बर 2013 से ही इस कैम्प में ज़िला बाग़पत, शामली, मुज़फ्फरनगर और अन्य 15 गाँवों से लोग आने शुरू हो गए थे। इस कैम्प में 3,500 शरणार्थी थे, लेकिन अब 800 शरणार्थी रह रहे हैं। कैम्प चन्दे से ही चल रहा है। सरकार की ओर से किसी प्रकार की कोई मदद नहीं मिल रही। सभी प्रबन्ध स्थानीय या आसपास के क्षेत्रों के लोग ही कर रहे हैं। प्रबन्धन कमैटी : बाबू कुरैशी, हाजी मुनव्वर, ज़ाकिर अली और राशिद आदि।
मुज़फ़्फ़रनगर के लाँक गाँव निवासी 18 वर्षीय रेशमा और उसके भाई राशिद ने हमें बताया कि दंगे का अंदाज़ा तो हो गया था मगर इतनी बड़ी तबाही का अंदाज़ा नहीं था। हमारे गाँव में 8 सितम्बर को दंगा हो गया था जिसमें हमारे चचा, अम्मी, अब्बा, भाई और दादा को मार दिया गया। हमारे घर पर रेशमा की शादी थी जिसका सारा सामान लूट लिया गया। किसी तरह हम अपनी छोटी बहनों को बचाकर भागने में कामयाब हुए। हमारा पूरा गाँव खंडहर बन गया है। कोई डर से गाँव वापस जाने को तैयार नहीं।
हटरोली गाँव के निवासी सलीम ने बताया कि हमारे गाँव के लोगों को बल्लम मारमार कर खत्म करके उनके घरों को जला दिया गया। गाँव की मस्जिद भी शहीद कर दी गई। मैं अपनी 80 साल की माँ को लेकर गन्ने के खेत में चला गया। सुबह होने के बाद पास के ही गाँव साठू चला गया।
मुज़फ़्फ़रनगर के थाना बु़ाना के गाँव इटावा के कयामुद्दीन ने बताया कि हमारे गाँव में मुसलमानों का कुल 150 मकान हैं। हमारे यहाँ दंगे से एक रात पहले हमारे ऊपर ईंटें बरसाई गइंर्। गाँव के जाटों की दो गाड़ियाँ भर कर महाकवाल में आयोजित महापंचायत में शामिल होने के लिए गइंर्। फ़िर जब हम फ़ज्र की नमाज़ के लिए निकलने लगे तो उन्होंने हमारी तलाशी लेनी शुरू कर दी और हमें गाँव छोड़ कर जाने से भी मना कर दिया। इसके बाद हम अपनी औरतों को लेकर चुपके से बाहर निकल गए। उन्होंने हमारे कुछ जानवर मार दिए और कुछ छीन कर ले गए। फिलहाल गाँव की क्या सूरत है इस बारे में हमें कुछ भी मालूम नहीं।
मुज़फ़्फ़रनगर के गाँव कुटबा में सबसे ज़्यादा हिंसा हुई। इसी गाँव की रहने वाली 21 वर्षीय शाकिरा ने बताया है कि कुटबा के प्रधान ने पहले तो हमें यक़ीन दिलाया कि हम यहाँ पर दंगा हरगिज नहीं होने देंगे। मगर वह खुद आ कर दंगाइयों के साथ शामिल हो गया और अचानक हमला कर दिया। हम किसी तरह अपनी जान बचाकर कर भाग निकले। मेरे दो बच्चे, जेठ, जेठानी और उनके बच्चों की अब तक कोई ख़बर नहीं है। हमारे पूरे गाँव को जला दिया गया। हमारी सारी भैसें लोग अपने कब्ज़े में ले चुके और हमारे घर की गाड़ी भी लुट चुकी। मदरसा गुलज़ारए-मोहम्मदी कैम्प, शाहपुर
इस कैम्प में लगभग 4050 शरणार्थी रह रहे हैं। सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिल रही। सब इन्तिज़ाम स्थानीय लोग ही कर रहे हैं। डॉ0 भी कभीकभी आते हैं। सरकार की ओर से सुरक्षा का भी कोई
प्रबन्ध नहीं है। प्रबन्धन कमेटी :मौलाना मोहम्मद इकबाल, मोहम्मद रफ़त, और मोहम्मद तौहीद आदि।
गाँव काकड़ा निवासी नाथों ने बताया कि 7 सितम्बर की शाम माचू जाट के साथ 8 और लोग हथियार लिए हुए हमारे घर में आए, और हमारे घर में तोड़फोड़ करने लगे और कहने लगे इनकी लड़कियों उठा कर ले जाओ। हम प्रधान के पास मदद के लिए गए, लेकिन प्रधान ने हमारी सहायता करने से इन्कार कर दिया। दंगाइयों ने सब सामान लूटकर घर को आग लगा दी। हमारा पूरा गाँव मुसलमानों से खाली हो गया है।
काकड़ा निवासी एक और महिला गुलशाना पे्रगनेन्ट थी और जब उनके घर पर हमला हुआ तो वह अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से भागी। भागते हुए वह गिर गई और उसको बहुत चोट आई। इसके बाद उसने शाहपुर कैम्प में एक बेटी को जन्म दिया। लेकिन बच्ची पैदा होते ही मर गई।
गाँव धौलरा निवासी लाली की 16 वर्षीय बेटी 7 सितम्बर की महापंचायत के बाद भगदड़ में न जाने कहाँ गा़यब हो गई इसका अब तक कुछ पता नहीं चल सका। दंगाइयों ने घर का सब सामान लूटकर घर को आग लगा दी। लाली के चार बेटियाँ और एक बेटा है। एफ.आई.आर. दर्ज हो चुकी है। लाली अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठी है।
गाँव काकड़ा निवासी अफ़साना ने बताया कि 7 सितम्बर की शाम उनके घरों पर अचानक हमला हुआ। सामान लूटकर उनके घरों को जला दिया गया। सेना के लोगों ने हमें वहाँ से निकाला। अब हम यहाँ कैम्प में रह रहे हैं, लेकिन ऐसे हम कब तक रहेगें? बच्चे बीमार हैं, हम परेशान हैं। बच्चों की पॄाई छूट गई। न छत है, न घर है, कहाँ जाएँ ? सरकार को चाहिए हमें घर दे।
इस्लामाबाद कैम्प, (शाहपुर)
इस कैम्प में लगभग 1300 शरणार्थी रह रहे हैं। सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिल रही। सब इन्तिज़ाम स्थानीय लोग ही कर रहे हैं। डॉक्टर भी कभीकभी आते हैं। सरकार की ओर से सुरक्षा का भी कोई प्रबन्ध नहीं है। प्रबन्धन कमेटी : हाजी बाबू साहेब, डॉ0 नौशाद, हाजी इक़बाल और मौलाना अब्दुस्समद आदि।
गाँव कुटबा कुटबी निवासी वरीशा ने बताया कि 8 सितम्बर की सुबह गाँव के पूर्व प्रधान लोकेन्द्र और प्रमोद ब्राह्मण ने उनके घरों पर जा कर कहा कि यहाँ से चले जाओ वर्ना जाट समुदाय के लोग तुम्हे मार डालेंगे। उनके जाने के बाद गाँव के प्रधान नीरज और ऋषिपाल भीड़ के साथ आए और हमारे घरों पर हमला बोल दिया। सबके हाथों में हथियार थे। हम जान बचाकर गाँव से भाग निकले। बाद में कैम्प में शरण ली। यहाँ आने के बाद प्रमोद ने उन्हें फोन पर सूचना दी कि उनके घरों को जला दिया गया।
गाँव कुटबा कुटबी की ही 18 वर्षीय वसीमा जिसकी शादी दंगे से 15 दिन पूर्व ही हुई थी, ने हमें बताया कि 8 सितम्बर की सुबह लगभग 8:00 बजे गाँव के प्रधान देवेन्द्र, उसका भाई बबलू और चाचा बाबू ने अन्य जाट समुदाय के लोगों के साथ उनके घर पर हमला बोल दिया। उनके हाथों में नंगी तलवारें, गड़ासे, लाठियाँ और डीज़ल था। सबसे पहले दंगाइयों ने उसके ससुर शमशाद का तबल (घास काटने का हथियार) से गला काट दिया। फिर ससुर के भाई क़यूम, फ़ैयाज़, अब्दुल वहीद, ताऊ का लड़का तुराबुद्दीन, चाची ख़ातून, वसीमा के पति इरशाद समेत जेठ के दो बच्चों को भी काटकर मार दिया। हमारे घर को आग लगा दी। अपनी जान बचाने के लिए हम ऊपर की ओर भागे तो उन्होंने एक मोटा डंडा उसकी जेठानी के सिर पर दे मारा और गडासे से उस पर वार किया। उसे गम्भीर चोटें आई जिससे उसकी स्थिति गम्भीर बनी हुई है। इसके बाद हमने उन पर पथराव किया। हम पथराव करते रहे और वे फ़ायरिंग करते रहे। लगातार 3 घंटे तक हमने उनका मुकाबला किया। इसके बाद सेना ने हमें वहाँ से निकाला।
इसी गाँव की एक और अन्य महिला साबिरा ने बताया कि 8 सितम्बर की सुबह गाँव पर हमला हुआ। गाँव की मस्जिद तोड़ दी गई। गाँव में चुनचुन कर मुसलमानों के घरों को निशाना बनाया गया। गाँव कुटबा में मुसलमानों के लगभग 150 घर हैं और कुटबी में 30 घर हैं। लेकिन दंगे में मुसलमानों के सभी घरों को जला दिया गया और सामान लूट लिया गया। जो लोग दंगाइयों के हाथ आ गए उनको काट दिया गया और जो लोग हाथ नहीं आए उनके घरों को जला दिया गया। जब गाँव में पुलिस आने लगी तो
प्रधान ने उनको यह कह कर रोक दिया कि ’गाँव में शादी हो रही है’ और एस0 ओ0 को अपने घर ले गया। मुसलमानों पर हमला जारी रहा। एस0ओ0 ने प्रधान के घर पर बैठ कर दंगाइयों को कहा कि ’तुम्हें जो करना है करते रहो’। प्रधान देवेन्द्र ने दंगाइयों को हथियार दिए और बबलू डीलर ने मुसलमानों के घर जलाने के लिए दंगाइयों को तेल दिया।
लोई कैम्प
यहाँ पर लगभग 10,000 शरणार्थी कैम्प में शरण लिए हए है। यह कैम्प खुले आसमान के नीचे खेतों में लान पर लगा हुआ है। जिससे बरसात में पानी टेन्ट में अन्दर चला जाता है जिससे शरणार्थियों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। कैम्प में टेन्ट और चटाई आदि ज़रुरत के सभी सामान का प्रबन्ध स्थानीय लोगो ने ही किया है। कैम्प मे डॉक्टर की सुविधा न होने की वजह से एक गर्भवती महिला बच्चे को जन्म देते हुए मर गई। इसके अलावा तीन अन्य बच्चों की दवाई न मिलने के कारण मृत्यु हो गई। क्षेत्रीय अधिकारी की ओर से भी कैम्पों में सुरक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है। सरकार की ओर से कैम्प में ज़रूरत के मुताबिक राशन का 20 प्रतिशत से भी कम मात्रा में पहुँचता है जबकि दूध की सप्लाई 5 प्रतिशत से भी कम है। प्रबन्धन कमैटी : प्रधान अब्दुल जब्बार, अफ़ज़ाल और मेहरबान कुरैशी आदि।
लोई कैम्प में हमारी बात गाँव फुगाना निवासी ज़रीफ़ से हुई। उन्होंने ने हमें बताया कि 8 सितम्बर को जब गाँव पर हमला हो चुका था तो सुबह लगभग 9:00 बजे प्रधान हरपाल, थाम सिंह, प्रधान सुनील और विनोद उनके घरों पर गए और उनसे गाँव न छोड़ने के लिए कहा और कहा कि वे उनका हर हाल में साथ देगें। लेकिन जैसे ही वे लोग उनके घरों से गए तो जाट और दलित समुदाय के लोगों ने मुसलमानों को चारों ओर से घेर लिया। गली में वे लोग मुसलमानों के खिलाफ़ नारे लगाते आ रहे थे। यह शोर सुनकर उनके घर के सभी मर्द बाहर की ओर भागे तो रास्ते में ही दंगाइयों ने उसके पिता इस्लाम का पहले गडासे से गला काट दिया, और फिर तीन हिस्सों में उनको काट कर उनकी हत्या कर दी। घर पर बेटी की शादी होनी थी उसके दहेज़ के सामान समेत घर का सारा सामान लूट लिया और घर को जला दिया। अब यहाँ कैम्प के ज़िम्मेदार लोगों ने उसकी बेटी का निकाह 30 सितम्बर 2013 को करवाया।
गाँव फुगाना के ही एक और निवासी हारुन ने हमें बताया 8 सितम्बर की सुबह 10:00 बजे हाथों में हथियार लिए हुए जाट और दलित समुदाय के लोगों ने उनके घरों में ज़बरदस्ती घुसकर लूटपाट की और उनके घरों को आग लगा दी। वे अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे। अब वे लोई कैम्प में रह रहे हैं। उनके पास 6 बच्चे हैं। कैम्प में गन्दगी होने और दवाई न मिलने की वजह से 6 अक्टूबर को उनकी 12 वर्षीय बेटी की टाइफाइड होने से मृत्यु हो गई। इसके अलावा इसी कैम्प में 6 बच्चों की दवाई न मिलने के कारण मृत्यु हो गई। राज्य सरकार की ओर से कैम्पों में न कोई डॉ0 है और न ही कोई अन्य सुविधा।
मलकपुरा कैम्प, खुमरान रोड कैम्प
इस कैम्प में 138 गाँव के लगभग 12,500 शरणार्थी रह रहे है। कैम्प एक जंगल में है और कस्बे से बहुत दूर हैं। वहाँ पर सरकार की ओर से कोई राहत सामग्री नहीं पहुँच पा रही है। यह कैम्प 50 बीघा तक में फैला है और लान पर है। जिससे बरसात का पानी टेन्ट में चला जाता है, और इससे शरणार्थियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार की ओर से न किसी डॉक्टर की सुविधा है और न ही कोई अन्य सुविधा। स्थानीय लोग ही उनके लिए सब ज़रूरत का सामान मिलजुल कर जुटा रहे हैं। कैम्प जंगल में होने की वजह से वहाँ साँप और बिच्छू निकल आते हैं। कुछ दिन पहले एक बच्ची की बिच्छू के काटने से मृत्यु हो गई थी। प्रबन्धन कमेटी : अब्दुल क़यूम, हाजी दिलशाद, हाजी यासीन और चौधरी गुलशाद आदि।
गाँव फुगाना निवासी 12 वर्षीय गुलशाना ने बताया कि 8 सितम्बर की सुबह जाटों ने उनके घरों पर हमला किया, उनके हाथों में हथियार थे। दंगाइयों ने गड़ासे से उसके पैर पर हमला किया। जिससे उसे गम्भीर चोट आई और उसके पिता उसको उठाकर वहाँ से भाग गए। एक महीने से इस कैम्प में रह रहे हैं, अभी तक ज़ख़्म नहीं भरा। पैसे नहीं तो इलाज कहाँ से हो।
फुगाना निवासी अब्दुल ग़फ्फार ने बताया कुछ दंगाइयों ने 8 सितम्बर की सुबह उनके घर पर हमला किया, सब सामान लूटा और घर को जला दिया। जब वे अपनी जान बचाकर भाग रहे थे तो देखा कि दंगाइयों ने पड़ोस के ही एक आदमी इस्लाम को तीन हिस्सों में काट दिया। दंगाइयों ने गाँव की मस्जिद को भी तोड़ दिया। दंगाइयों में विनोद पुत्र माँगेराम और सुनील पुत्र बिरहम सिंह भी शामिल थे। सभी दंगाई जाट समुदाय के थे।
अब कैम्प में रह रहे शरणार्थियों के सामने चिंताओं का बड़ा बोझ है। घर वापस लौटने के जवाब में सब लोग यही कहते हैं कि वे लौटकर अपने गाँव नहीं जाएँगें। कहाँ ले जाएँ अपने बच्चों को? किसका सहारा? कोई सहारा नहीं। अब मज़दूरी भी नहीं कर सकते और अन्त में वे एक सवाल करते हैं कि हमे तो बस यह जवाब दे दो कि दुनिया हमसे पूछेगी कि तुम क्यों सताए गए तो हम क्या जवाब देगें?

-डा0 मोहम्मद आरिफ

क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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भारतीय इतिहास में आज़ादी के बाद हिन्दुवत्वादियों द्वारा बाबरी मस्जिद का ध्वंस सबसे बड़ी आतंकी घटना है। यह घटना 6 दिसंबर 1992 को जर्मन नाजीवादी विचारधारा से लैस हिन्दुवत्वादियों ने की थी और भारतीय लोकतंत्र उसको न बचा पाने पर शर्मिंदा हुआ था। फेसबुक पर मित्रों के निम्नलिखित विचार आयें हैं :-

Jagadishwar Chaturvedi
आज 6 दिसम्बर है।यह स्वतंत्र भारत का कलंकमय दिन है। आज के ही दिन 1992 में बाबरी मस्जिद गिरायी गयी। जब यह मस्जिद गिरायी गयी तो मसजिद गिराने वालों ने एक ऐतिहासिक मसजिद को नष्ट किया, हमारे देश के संविधान और कानून की अवमानना की।इसके अलावा उस दिन अकेले अयोध्या में 14 मुसलमान मारे गए।267घर जलाए गए या तोड़े गए।19मजार और मदरसों को क्षतिग्रस्त किया गया।4500मुसलमानों को अयोध्या छोड़कर भागना पड़ा।इसके अलावा देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। दुखद यह है कि जिन संगठनों ने यह सब काण्ड किया उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
Anand Pradhan
बाबरी मस्जिद का ध्वंस आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक और त्रासद घटनाओं में से एक है. इस दिन भगवा सांप्रदायिक ताकतों ने एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, बहुराष्ट्रीय और बहुभाषी भारत के विचार को मर्मान्तक चोट पहुंचाने की कोशिश की थी. इसलिए यह आज़ाद भारत के इतिहास का एक काला दिन है जिसे बेहतर समाज और देश चाहनेवालों को कभी भुलाना नहीं चाहिए.

Girijesh Tiwari

आइए, आज फिर एक बार अदम गोंडवी को याद करें
और साम्प्रदायिक सौहार्द की गंगा-जमनी तहज़ीब की हिफ़ाज़त के लिये
पहलकदमी करें.
“हिन्दू और मुस्लिम के एहसासात को मत छेडिये;
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेडिये.

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है;
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जले;
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए.

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ;
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए.

छेड़िए असली जंग, मिल-जुल कर गरीबी ख़िलाफ़;
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए !”
Saleem Akhter Siddiqui
छह दिसंबर को आज की पीढ़ी भूलती जा रही है। हो सकता है वक्त के साथ यह तारीख इतिहास में कहीं दफन हो जाए। ऐसे ही जैसे 1949 से लेकर 31 जनवरी 1986 तक का वक्फा दफन रहा था। लेकिन 1 फरवरी 1986 ने सब कुछ बदल दिया। जो एक साल पहले दो सीटें लेकर इतिहास बनने की ओर अग्रसर थे, वे अचानक हमलावर हो गए। 2 से 88 और फिर 180 तक जा पहुंचे। देश की राजनीति का घोर सांप्रदायिकरण कर दिया गया। उस फसल को देश आज तक काट रहा है। मामला भले ही सुप्रीम कोर्ट में हो, लेकिन पता नहीं कौन और कब इसे दोबारा भड़काकर देश को अस्सी के दशक जैसे डरावने दौर में ले जाए।
Ali Sohrab
मंदिर तो एक बहाना है, मक़सद नफरत फैलाना है ,यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।
मस्जिद भी रहे, मंदिर भी बने क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?
हिलमिल कर सब साथ रहें क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?

इक मंदिर बने अयोध्या में इसमें तो किसी को उज्र नहीं
पर वह मस्जिद की जगह बने यह अंधी जिद है, धर्म नहीं।

क्या राम जन्म नहीं ले सकते मस्जिद से थोड़ा हट करके?
किसकी कट जाएगी नाक अगर मंदिर मस्जिद हों सट करके?

इंसान के दिल से बढ़कर भी क्या कोई मंदिर हो सकता?
जो लाख दिलों को तोड़ बने क्या वह पूजा घर हो सकता?

मंदिर तो एक बहाना है मक़सद नफरत फैलाना है
यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।

इस लम्बे-चौड़े भारत में मुश्किल है बहुमत पायेंगे
यह सोच के ओछे मन वाले अब हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे।

इतिहास का बदला लेने को जो आज तुम्हें उकसाता है
वह वर्तमान के मरघट में भूतों के भूत जगाता है।

इतिहास-दृष्टि नहीं मिली जिसे इतिहास से सीख न पाता है
बेचारा बेबस होकर फिर इतिहास मरा दुहराता है।

जो राम के नाम पे भड़काए समझो वह राम का दुश्मन है।
जो खून-खराबा करवाए समझो वह देश का दुश्मन है।

वह दुश्मन शान्ति व्यवस्था का वह अमन का असली दुश्मन है।
दुश्मन है भाई चारे का इस चमन का असली दुश्मन है।

मंदिर भी बने, मस्जिद भी रहे ज़रा सोचो क्या कठिनाई है?
जन्मभूमि है पूरा देश यह इसे मत तोड़ो राम दुहाई है।

-डॉ. रण्जीत
Ranjan Yadav
आज कोई बाबरी विध्वंश का जश्न मना रहा है ,कोई गम में पागल हुए जा रहा है | लेकिन कुछ ऐसा है जो भारत के जातिवाद गद्दार समाज के खिलाफ मुहीम को अंजाम दे रहे है ,मेरा नाम उसी लिस्ट में शामिल करे |
असरफ हिन्दू और स्वरण मुस्लिम के लिए बाबरी और राम मंदिर मुद्दा दोनों में कोई अंतर नहीं है ,इनके लिए धर्म भी कोई मायने नहीं रखती है ,इनके लिए मायने रखती है तो सिर्फ और सिर्फ राज सत्ता !
देश के 60 फीसदी आबादी जब मंडल मुहीम में अपनी सविन्धानिक हक और आर्थिक हितो के लिए एकत्र हो रही थी ,तभी अडवानी मुरलीमनोहर जोशी जैसे जातिवादी असरफ स्वर्णों ने मंदिर -मस्जिद प्रकरण को आवाज दी |मंडल दब के रह गया ,आवाज दबी देश के आधी आबादी की ,अब खुद सोचे क्या इनके पाप इस जन्म में माफ़ किये जा सकते है ?
तुम्हारे शौर्य दिवस कलंक है देश पर !
संक्षेप में इनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक शब्द “देशद्रोही गद्दार जातिवादी |
जंग जारी रहे ,लिखते रहिये लोगो को बताते रहिये ,समझाते रहिये ,गद्दार जातिवादी लोगो के चहरे सामने आनी ही चहिये | जब पेट भरा रहेगा तभी राम भजन होगा

Rajendra Singh
हम 6 दिसम्बर को ही भारत के संविधान को तार-तार करने वाली घटना भी हुई थी। मैं मुस्लिम भाइयो से बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए माफ़ी मांगता हूँ। हमारे समुदाय के लोगो ने जो गलत किया इस बात के लिए।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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