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Archive for दिसम्बर 31st, 2013

सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा था और सरकार की आँखें बन्द क्यों थीं? सरकार के पास दंगा होने की आशंका की खुफिया जानकारी भी थी। समाचार पत्रों में दंगे की सम्भावना की खबरें छप रही थीं। धारा 144 लगा दी गई थी। फिर भी महापंचायत होने दी गई। भड़काऊ भाषण, ज़हरीले नारों और हथियारों से लैस भीड़ का दृश्य वहाँ मौजूद उच्च पुलिस अधिकारियों के सामने था। पंचायत समाप्त होने से घंटों पहले इसमें भाग लेने आए लोगों द्वारा हत्या की वारदातें अंजाम दी जा चुकी थी। पंचायत समाप्त होने के बाद प्रशासन के पास हालात को सँभालने के लिए पर्याप्त समय था। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन ने जिस तरह स्थिति से निपटने में आपराधिक लापरवाही का प्रदशर्न किया उससे साफ तौर पर लगता है कि उस समय कानून व्यवस्था बनाए रखने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि यह कहा जाए कि तीनों की मंशा एक ही थी तो गलत नहीं होगा। फिरकापरस्त दंगा करवाना चाहते थे प्रशासन उसे रोकना नहीं चाहता था और सरकार की शान्ति बनाए रखने में कोई रुचि नहीं थी। इसका कारण सरकार व प्रशासन की अक्षमता और संवेदनहीनता थी, दंगाइयों के साथ मिली भगत या दंगा उपरान्त राजनैतिक लाभ हासिल करने की जुगत। मगर सच्चाई यही है कि दंगाइयों ने हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए लाशों को जलाया, बहाया और मिट्टी के नीचे दबा दिया। प्रशासन ने फाँसी पर लटकी हुई लाशों को आत्महत्या साबित करने का प्रयास किया। एफ.आई.आर. दर्ज करने में बाधाएँ उत्पन्न कीं। सत्ताधारी दल ने इसे कभी जातीय संघर्ष बताने की कोशिश की तो कभी सरकार के मंत्रियों ने अपनी रिपोर्ट में राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों को जबरन रोक कर अपना धंधा चलाने का आरोप लगाया। इन सभी प्रयासों का मात्र एक कारण था कि दंगे की व्यापकता और जघन्यता दुनिया पर ज़ाहिर न हो। सरकार और प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की बहाली और दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के मुकाबले में तथ्यों पर परदा डालने के मायने ज़्यादा थे। यही कारण है कि सरकारी तौर पर सिर्फ 62 मौतें बताई गईं जबकि मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से कुछ और हत्याओं से परदा उठा और आँकड़ा 100 पार कर गया। हालाँकि उन सभी की प्राथमिकी अभी तक दर्ज नहीं हो पाई है। इसके अलावा एक बड़ी संख्या लापता व्यक्तियों की है जिनके बारे में आशंका है कि उनकी हत्या हो चुकी है। यही स्थिति घर छोड़ कर जाने वाले दंगा पीड़ितों की संख्या की भी है। सरकार द्वारा इसे भी कम करके बताने का हर सम्भव प्रयास किया गया और फिर दंगा पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनहीनता को छुपाने के लिए राहत कैम्प चलाने वालों को ही सरकार के मंत्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुज़फ्फरनगर, शामली व अन्य जगहों पर छोटे बड़े तीन दर्जन से भी ज़्यादा राहत कैम्प काम कर रहे थे। मुज़फ्फरनगर में सज़ाक, तौली, बासी कलां, बु़ाना, सखीपुर, जौला, जोगी खेड़ा लोई, चरथावल, मीरापुर और शामली में मलकपुर, कान्धला, कैराना, खुरगान, मंसूरा, जलालाबाद, सुंता, रसूलपुर के अलावा ग्रामीण अंचलों में छोटे बड़े राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों ने पनाह ले रखी थी। शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को अपने रिश्तेदारों और सगे
संबधिंयों के यहाँ भी पनाह मिल गई थी। इनमें कई कैम्प ऐसे थे जहाँ एक साथ दस हजार तक दंगा पीड़ितों ने शरण ली थी। प्रदेश सरकार ने कैम्पों में दंगा पीड़ितों की मदद उनके खाने पीने रहने की व्यवस्था करने का कोई आँकड़ा अब तक नहीं दिया है। कुछ कैम्पों के आयाजकों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार की तरफ से उनको एक पैसे की भी कोई सहायता नहीं मिली। समाजवादी सरकार के मुस्लिम नेता और अखिलेश सरकार के विधायक मंत्री पहले की तरह कुछ ऐसे बिन्दुओं की खोज में लगे रहे जिससे पार्टी और सरकार का बचाव किया जा सके। सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान जो उस क्षेत्र के प्रभारी भी हैं, ने दो परस्पर विरोधी भूमिकाएँ अदा करके सबको हैरत में डाल दिया। पहले तो उन्होंने मीडिया के सामने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विरोध स्वरूप आगरा में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं गए। मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल यादव और कुछ वरिष्ठ सपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। परन्तु विधान सभा के मानसून सत्र में सदन के अन्दर आज़म खान ने ही सरकार का पूरी ताकत के साथ बचाव करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। हालाँकि गृह मंत्रालय का पदभार मुख्यमंत्री के पास होने के कारण यह ज़िम्मेदारी उनकी थी। तीन चार दिनों के भीतर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ जिससे आज़म खान का ह्रदय परिवर्तन हो गया यह तो वही बता पाएँगे। परन्तु जनता इसे उनकी राजनैतिक अदाकारी के रूप में ही देखती है। जब राहुल गांधी ने यह कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के लोग मुज़फ्फरनगर के 1015 मुस्लिम नौजवान जिनके भाई बहन दंगे में मारे गए हैं, से बात कर रहे हैं तो आज़म खान ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अखिलेश सरकार के मुज़फ्फरनगर सद्भावना मिशन पर गए मंत्री समूह ने अपनी रिपोर्ट में दुर्भावना वश जब ह कहा कि मदरसे के लोग दंगा पीड़ितों को जबरन कैम्पों में रोक कर अपनी दुकान चला रहे हैं तो इस पर आज़म खान ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। हालाँकि वह यह अच्छी तरह जानते थे कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की वापसी पर उनकी सुरक्षा का कोई बन्दोबस्त नहीं किया था। उन्हें यह भी मालूम था कि जो लोग अपने गाँव गए थे उनको मुकदमें वापस लेने के लिए
धमकियाँ दी जा रही थीं। बुाना के हुसैनपुर में खेत में काम कर रहे तीन मुसलमानों की 30, सितम्बर को की जाने वाली हत्या ने साबित भी कर दिया है कि असुरक्षा की आशंका बेबुनियाद नहीं थी और मंत्री समूह की रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा गया वह बदनीयती पर आधारित था। यदि राहुल
गांधी और मंत्री समूह की रिपोर्ट को जोड़ कर देखा जाए तो यह आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है कि आई.एस.आई. और दंगा पीड़ित मुस्लिम युवकों की मुलाकात उन्हीं मदरसों में होती थी। राहुल के बयान और शिवपाल की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की इस रिपोर्ट को खुफिया एवं जाँच एजेंसियों में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों को आतंकवाद के नाम पर मदरसों को घेरने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने का अवसर प्रदान करने के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार इसे मुसलमानों को पीड़ित और प्रताड़ित कर उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करके सुरक्षा देने के नाम पर राजनैतिक ठगी जारी रखने की कोशिश भी कहा जा सकता है। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुसलमानों के हित की बात करने वाली पार्टियों ने सुरक्षा के नाम पर उन्हें गोलबन्द करके सबसे अधिक छला है। भाजपा और शिवसेना जैसे दलों ने उन्हें इसका अवसर भी खूब दिया है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों के हित की कोई बात आती है साम्प्रदायिक दल और संगठन तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। उसके बाद इन तथाकथित सेकुलर और साम्प्रदायिक दलों के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो जाती है। थोड़े समय बाद ही सेकुलर दल हथियार डाल देते हैं और मुसलमानों को यह संदेश देने में लग जाते हैं कि वह तो कुछ करना चाहते हैं परन्तु स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। केवल राजनैतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि न्यायिक स्तर पर भी मुसलमानों के मामले में यह बार बार देखने को मिला है। आन्ध्र प्रदेश में रिज़र्वेशन का मामला रहा हो या यू.पी. में आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई का मुद्दा जानबूझ कर ऐसी कमियाँ छोड़ी गईं कि अदालत में जाकर केस गिर जाए और उसके बाद फिर वही राग कि हम तो करना चाहते हैं लेकिन ़ ़ ़। अखिलेश सरकार ने तो एक तीसरा रास्ता भी निकाल लिया है। मुसलमानों के खिलाफ उसी समुदाय के लोगों को इस्तेमाल करने का। खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के मामले में पंचनामा की बात हो या फिर मुज़फ्फरनगर का दौरा करने वाली टीम में तीन मुसलमानों को शामिल किया जाना इसी नई रणनीति का हिस्सा लगता है। खालिद मुजाहिद के पंचनामे में शामिल मुसलमान यह नहीं कह पाए कि उसमें खालिद के परिवार का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दंगों की जाँच का हिस्सा रहने वाले मुस्लिम मंत्री इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि दल के अगुवा से यह कह सकें कि जिन लुटे पिटे लोगों की जाँच उन्हें करनी थी उन पीड़ितों से कैम्पों में जाकर उनका दुख दर्द भी सुन लिया जाए। ऐसे लोगों से दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर कीचड़ उछालने वाली मंत्री समूह की रिपोर्ट पर उंगली रखने की उम्मीद करना सिर्फ धोखा है। इस तरह के मुस्लिम नेता अपने समाज में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार में अपने समाज का नहीं। मुस्लिम समाज को यह सब समझना होगा और अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाना होगा।
क्रमश:
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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