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Archive for जनवरी, 2014

सितम्बर 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत) के दंगे को संघियों ने भड़काया और मजदूर वर्ग के एक समुदाय को घर से बेघर कर दिया। दिन की उजाले की तरह साफ है कि दंगे राजनीतिक फायदे के लिये कराये गये थे, जिसमें सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए अपने-अपने तरीकों से दंगें में अपनी-अपनी भूमिका को निभाया। मुख्य भूमिका भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम का था जिसने एक घटना को साम्प्रदायिक रंग देने और लोगों के अन्दर जहर घोलने के लिये, पकिस्तान के सियालकोट में दो युवकों की हत्या का बर्बर विडियो फेसबुक पर अपलोड किया। इस विडियो को जब फेसबुक से हटा दिया गया तो यह मोबाईल पर भेजा गया और लोगों के अन्दर झूठा प्रचार कर एक समुदाय के खिलाफ भड़काने का काम किया गया ।
लोगों की समस्या रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व रोजगार के मुद्दों से भटकाने के लिए ‘बहु-बेटी बचाओ’ महापंचायत का आयोजन किया गया। इसमें एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगला गया तो दूसरी तरफ यह अफवाह फैला दी गई कि लोग हमले करने के लिए आ रहे हैं। इसी तरह टीकरी गांव, जिला बागपत में एक हिन्दू लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर लटका दिया गया। सवाल उठता है कि कोई मुस्लिम लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर क्यों लटकायेगा?
दंगे के मुख्य आरोपी संगीत सिंह, जिन्होंने फेसबुक पर फर्जी विडियो अपलोड किया था, को मोदी के मंच से आगरा में पुरस्कृत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल खुलेआम बयान देकर कहते हैं कि ‘‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बंधुओं ने इस बार ‘लव जेहादियों’ को ऐसा करारा जबाब दिया है जैसा कि गुजरात में रामभक्तों को जलाने वालों को दिया गया’’।
7 सितम्बर के नांगला-मंदौड़ पंचायत में ‘बहू बेटी बचाओ’ महापंचायत को धारा 144 के बावजूद होने दिया गया, जबकि उससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी देवराज नागर ने दौरा भी किया था। डीजीपी देवराज नागर भाजपा सांसद व दंगा भड़काने के आरोपी हुकूम सिंह के रिश्तेदार भी हैं। दंगे के दौरान जब एक समुदाय के लोग पुलिस को फोन कर रहे थे तो पुलिस फोन रिसिभ नहीं कर रही थी या कर रही थी तो बस यही पुछ रही थी कि कोई मरा तो नहीं। मुस्लिम समुदाय के घरों की तलाशी ली गई, और बीच में पड़ने वाले हिन्दू घरों को छोड़ दिया गया। शिनाना गांव के मीर हसन व दीन मुहम्मद के घरों के जेवर पुलिस तलाशी के दौरान चुरा लिये गये और उनको झूठे केसों में फंसा कर जेल भेज दिया गया। क्या इसे हिन्दू फासिज्म नहीं बोला जायेगा? 1987 में मेरठ में पीएसी जवानों द्वारा किये गये जनसंहार में अभी तक पीडि़त परिवार को न्याय नहीं मिल पाया है। बर्खास्त पीएसी जवानों को कर्तव्यनिष्ठ व अनुशासित मानते हुए वापस नौकरी पर ले लिया गया।
मुजफ्फरनगर दंगे के पीडि़त परिवार अभी भी शिविरों में रह रहे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार उन शिविरों को हटाने के लिए लगातार दबाव बना रही है। पीडि़त परिवार अपने गांव जाने को तैयार नहीं हैं। कुछ पीडि़तों को मुआवजा दिया गया और उनसे शपथ पत्र लिया गया कि वे अपने गांव नहीं जायेंगे-अगर वापस गये तो उनको मुआवजा वापस करना पड़ेगा।
डेमोक्रेटिक स्टूडेन्ट्स यूनियन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस में 22 जनवरी, 2014 को मुजफ्फरनगर दंगे में हिन्दुत्वा फासिज्म (संघ परिवार) की भूमिका पर एक सेमिनार रखी थी। इसमें संघ परिवार से जुडे़ ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के गुंडों ने बाधा डाला। सेमिनार रूम के बाहर पुलिस की मौजदूगी में वे नारे लगाते रहे व सेमिनार रूम में बैठ कर वक्ताओं की बातों पर टोका-टोकी करते रहे। ‘संघी, गाय’ आदि का नाम नहीं लेने की बात कह रहे थे। आयोजकों के पूछने पर कि ‘‘संघी को संघी और गाय को गाय नहीं कहा जाये तो क्या कहा जाये’’ तो उनका जबाब था कि जानवर कहो। इस पर सभी लोग हंस पड़े। सच कहा जाये तो ये जानवर ही हैं जिनको यह ज्ञान नहीं है कि इंसानियत क्या होती है। संघीय गुंडों ने ‘न्यू सोशलिस्ट इनिसिएटिभ (छैप्)’ के साथी बनोजीत के कपड़े फाड़ दिये। इन संघी गुंडों का जबाब कौन , छैप् व अध्यापकों ने मिलकर दिया जिससे वे अपने मनसुबे में कमयाब नहीं हो पाये। दिल्ली पुलिस का भी वही रवैय्या था जो कि यूपी पुलिस का था। वह मूक दर्शक बनी देख रही थी। दिल्ली पुलिस डिर्पाटमेंट के एचओडी से ही सवाल पूछ रही थी कि सेमिनार के आयोजन का परमीशन क्यों दिया गया? दबाव में आकर डिर्पटमेंट ने जल्द से जल्द सेमिनार खत्म करने के लिए आयोजकों पर दबाव डालना शुरू कर दिया। दिल्ली के अन्दर किसी भी डेमोक्रेटिक सम्मेलन, सभा, धरना में आकर यह संघी परिवार बाधा उत्पन्न कर रहा है और दिल्ली पुलिस उनका पूरा साथ दे रही है।
संघी और सभी संसदीय राजनीतिक पार्टिया साम्राज्यवाद के नई आर्थिक नीतियों को जोर-शोर से लागू करवाने के लिए वही नीति अपना रहे हैं जो 1991-1992 में नरसिम्हा राव-मनोमहन औ संघी ने अपनाया था। आर्थिक नीति लागू करवाने के लिए अडवाणी ने रथ यात्रा निकालकर हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ा कर मुद्दे को भटकाया था। वही नीति अभी संघी अपना रहे हैं जब भूमंडलीकरण के नीतियों को जोर-शोर से लागू करने में शासक वर्ग लगा हुआ है तो देश में अचानक दंगों में तेजी आ गयी है। सभी शांतिप्रिय, जनवादपसंद संगठनों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को यह सोचने की जरूरत है कि भगवाधारियों व पुलिस गठजोड़ को कैसे चुनौती दी जाये। भगवाधारियों की झूठी देशभक्ति को चुनौती देते हुए आत्मनिर्भर, जनवादी भारत का निर्माण कैसे किया जाये।

-सुनील कुमार

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गोरखपुर में नरेन्द्र मोदी ने बड़े शान से कहा कि गुजरात बनाने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए तो वहीँ वाराणसी में मुलायम सिंह यादव ने कहा कि यूपी को गुजरात नहीं बनने देंगे। नरेन्द्र मोदी का सीना बड़ा विशाल है कि भारत के एक बड़े नरसंहार का दायित्व उन्ही पर था जिसे उन्होंने खूबसूरती से निर्वाह किया था लेकिन गुजरात न बनने देने के योधा मुलायम सिंह यादव की पार्टी की सरकार ने 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए नरसंहार के पश्चात गुजरात का मुकाबला कर लिया है . यदि दोनों में से कोई प्रधानमंत्री बनता है तो यह देश नहीं कत्लगाह बन जायेगा . गुजरात में शराब बंद है किन्तु सबसे ज्यादा सुलभ पदार्थ शराब हर जगह उपलब्ध है और बड़े-बड़े शराब माफिया गुजरात में हैं. वहीँ, उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार की उपज पोंटी चड्ढा शराब व्यवस्था आज भी लागू है. पोंटी चड्ढा शराब व्यवस्था में उत्तर प्रदेश में जो भी मुख्यमंत्री होगा उसको सीधे-सीधे लाभ होता है. उत्तर प्रदेश में 127 दंगे इस कार्यकाल के दौरान हो चुके हैं. गुजरात में नरेन्द्र मोदी के अन्यायों खिलाफ कोई बोलने को तैयार नही है. उसी तरह उत्तर प्रदेश में सपा की गुंडागर्दी के आगे कानून और न्याय नाम की कोई चीज नही रह गयी है . नरेन्द्र मोदी की छवि निर्माण का काम अम्बानी के स्वामित्व वाले टीवी चैनल कर रहे हैं तो उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल को भी अम्बानी ग्रुप का समर्थन प्राप्त है . इसीलिए दोनों जगहों का चरित्र अल्पसंख्यक विरोधी है उत्तर प्रदेश में बहुसंख्यक आबादी को यह एहसास कराया गया है कि प्रदेश में मुसलमान समर्थित सरकार है इसलिए बहुसंख्यकों को कोई लाभ नहीं होना है लेकिन वस्तुस्तिथि इसके विपरीत है अल्पसंख्यकों का जितना नुकसान इस सरकार में हो रहा है उतना कभी नहीं हुआ वहीँ गुजरात में इसके उलट बहुसंख्यकों की भावनाओ को गलत तथ्यों के आधार पर अपने पक्ष में कर उनका दमन किया जा रहा है . गुजरात और उत्तर प्रदेश दोनों में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों की कोई सुनने वाला नहीं है . किसान खेत मजदूर निम्न शहरी वर्ग की हालत बाद से बदतर होती जा रही है वहीँ दोनों राजनीतिक नेता उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक उन्माद पैदा कर वोट बैंक का निर्माण करने की दिशा में अग्रसर है.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सामन्तवाद , साम्प्रदायिकता और अराजक तत्वों के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजहब और धर्म के नाम पर लड़ने – झगड़ने वालो को आडे हाथो लेने वाले , गरीबी और नाइंसाफी को देश से उखाड़ फेकने की तमन्ना रखने वाले मानवीय संवेदनाओं और असहाय लोगो की आवाज को जन – जन तक पुह्चाने वाले प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी
पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की फूलपुर तहसील से पांच — छ: किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा गाँव मिजवा | मिजवा गाँव के एक प्रतिष्ठित जमीदार परिवार में उन्नीस जनवरी 1919 को सैयद फतह हुसैन रिज्वी और कनिज फातमा के चौथे बेटे के रूप में अतहर हुसैन रिज्वी का जन्म हुआ | अतहर हुसैन रिज्वी ने आगे चलकर अदब की दुनिया में कैफ़ी आजमी नाम से बेमिशाल सोहरत हासिल की
कैफ़ी की चार बहनों की असामयिक मौत ने कैफ़ी के दिलो — दिमाग पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला |

कैफ़ी के वालिद को आने वाले समय का अहसास हो चुका था | उन्होंने अपनी जमीदारी की देख रेख करने के बजाय गाँव से बाहर निकल कर नौकरी करने का मन बना लिया | उन दिनों किसी जमीदार परिवार के किसी आदमी का नौकरी — पेशे में जाना सम्मान के खिलाफ माना जाता था | कैफ़ी के वालिद का निर्णय घर के लोगो को नागवार गुजरा | वो लखनऊ चले आये और जल्द ही उन्हें अवध के बलहरी प्रांत में तहसीलदारी की नौकरी मिल गयी | कुछ ही दिनों बाद अपने बीबी बच्चो के साथ लखनऊ में एक किराए के मकान में रहने लगे | कैफ़ी के वालिद साहब नौकरी करते हुए अपने गाँव मिजवा से सम्पर्क बनाये हुए थे और गाँव में एक मकान भी बनाया | जो उन दिनों हवेली कही जाती थी |कैफ़ी की चार बहनों की असमायिक मौत ने न केवल कैफ़ी को विचलित किया बल्कि उनके वालिद साहब का मन भी बहुत भारी हुआ | उन्हें इस बात कि आशका हुई कि लडको को आधुनिक तालीम देने के कारण हमारे घर पर यह मुसीबत आ पड़ी है | कैफ़ी के माता — पिता ने निर्णय लिया कि कैफ़ी को दीनी तालीम ( धार्मिक शिक्षा ) दिलाई जाय | कैफ़ी का दाखिला लखनऊ के एक शिया मदरसा सुल्तानुल मदारिस में करा दिया गया | आयशा सिद्दीक ने एक जगह लिखा है कि ” कैफ़ी साहब को उनके बुजुर्गो ने एक दीनी शिक्षा गृह में इस लिए दाखिल किया था कि वह पर फातिहा पढ़ना सीख जायेंगे | कैफ़ी साहब इस शिक्षा गृह में मजहब पर फातिहा पढ़कर निकल गये ” |

” तुम इतना क्यु मुस्कुरा रहे हो , क्या गम है जिसको छुपा रहे हो , गीतों के पक्तियों को आजादी के बाद की पीढ़ी में कौन सा शख्स ऐसा होगा जिसने कभी न गुनगुनाया हो कोई ऐसा भी शख्स है जो यह गीत न गुनगुनाया हो जिससे उसके रोगटे खड़े न हुए हो ” कर चले हम फ़िदा जाने ए वतन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो ” कैफ़ी ने इन गीतों से पूरी दुनिया के आवाम को आवाज दी और कहा ” देश में समाजवाद आया कि नही आया इस पचड़े में क्यों पड़ते हो और तुम अखबारनवीसो को वैसे भी समाजवाद से क्या लेना देना है | एक झोक में इतना बोलने के बाद बोले देखो , ”पेट के भूख और राख के ढेर में पड़ी चिनगारी को कमजोर न समझो ” | जंगल में किसी ने पेड़ काटने से अगर रोका नही तो किसी ने देखा नही | यह समझने के भूल कभी मत करना | गाँव – देहात का हर शख्स , खेती — किसानी से जुडा चेहरा मेहनतकश मजूर हो या खटिया — मचिया पर बैठा कोई अपाहिज , वह तुम्हारी हर चल को देख और समझ रहा है | वह भ्रष्ट अफसर शाही को खूब समझता है पर यह दौर समझने का नही बल्कि समझाने का है | अपने साथियो से मैं हर वक्त यही कहता हूँ — लड़ने से दरो मत , दुश्मन को खूब पहचानो और मौका मिले तो छोडो मत , अपनी माटी के गंध और पहचान को बनाये रखो , अपने हर संघर्ष में आधी दुनिया को मत भूलो , वही तुम्हारे संघर्ष की दुनिया को पूरा मरती है
मागने के आदत बंद करो , छिनने के कूबत पैदा करो | देखो , तुम्हारी कोई समस्या फिर समस्या रह जाएगी क्या ? बोले मेरे घर में तो खैर कट्टरपथि जैसा कोई माहौल कभी नही रहा मगर भइया मैं तो गाँव के मदरसे कभी नही गया | हमे तो होली का हुडदंग और रामायण की चौपाई ही अच्छी लगती थी | कैफ़ी के ये विचार उनको बखूबी बया करती है
” खून के रिश्ते ” यह वाक्य उनके चिंतन विचार शैली और सोच के दिशा का न केवल प्रतीक है बल्कि उनके विशाल व्यक्तित्व के झलक भी दिखलाती है इसी द्र्श्म की झलक हमे उनके इन गीतों से मिलती है
माटी के घर थे , बादल को बरसना था , बरस गये |
गरीबी जलेगी , मुल्क से यह सुनते — सुनते उम्र के सत्तर बरस गये |
समवेदना के धरातल पर दिल को झकझोर देने वाले शायर कैफ़ी की आवाज आज नही तो आने वाले कल शोषित — पीड़ित की आवाज बनकर इस व्यवस्था को झकझोर कर रखेगी ही बस वक्त का इन्तजार है |

सुल्तानुल मदारिस में पढ़ते हुए कैफ़ी साहब 1933 में प्रकाशित और ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जब्त कहानी संग्रह ” अंगारे ” पढ़ लिया था , जिसका सम्पादन सज्जाद जहीर ने किया था | उन्ही दिनों मदरसे की अव्यवस्था को लेकर कैफ़ी साहब ने छात्रो की यूनियन बना कर अपनी मांगो के के साथ हडताल शुरू कर दी | डेढ़ वर्ष तक सुल्तानुल मदरीस बन्द कर दिया गया | परन्तु गेट पर हडताल व धरना चलता रहा | धरना स्थल पर कैफ़ी रोज एक नज्म सुनाते | धरना स्थल से गुजरते हुए अली अब्बास हुसैनी ने कैफ़ी की प्रतिभा को पहचान कर कैफ़ी और उनके साथियो को अपने घर आने की दावत दे डाली | वही पर कैफ़ी की मुलाक़ात एहतिशाम साहब से हुई जो उन दिनों सरफराज के सम्पादक थे | एहतिशाम साहब ने कैफ़ी की मुलाक़ात अली सरदार जाफरी से कराई | सुल्तानुल मदारीस से कैफ़ी साहब और उनके कुछ साथियो को निकाल दिया गया | 1932 से 1942 तक लखनऊ में रहने के बाद कैफ़ी साहब कानपुर चले गये और वह मजदूर सभा में काम करने लगे | मजदूर सभा में काम करते हुए कैफ़ी ने कम्युनिस्ट साहित्य का गम्भीरता से अध्ययन किया | 1943 में जब बम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी का आफिस खुला तो कैफ़ी बम्बई चले गये और वही कम्यून में रहते हुए काम करने लगे सुल्तानुल मदारीस से निकाले जाने के बाद कैफ़ी ने पढ़ना बन्द नही किया | प्राइवेट परीक्षा में बैठते हुए उन्होंने दबीर माहिर ( फार्सी ० दबीर कामिल ( फार्सी ) आलिम ( अरबी ) आला काबिल ( उर्दू ) मुंशी ( फार्सी ) कामिल ( फार्सी ) की डिग्री हासिल कर ली | कैफ़ी के घर का माहौल बहुत अच्छा था | शायरी का हुनर खानदानी था | उनके तीनो बड़े भाई शाइर थे | आठ वर्ष की उम्र से ही कैफ़ी ने लिखना शुरू कर दिया | ग्यारह वर्ष की उम्र में पहली बार कैफ़ी ने बहराइच के एक मुशायरे में गजल पढ़ी | उस मुशायरे की अध्यक्षता मानी जयासी साहब कर रहे थे | कैफ़ी की जगल मानी साहब को बहुत पसंद आई और उन्होंने काफी को बहुत दाद दी |मंच पर बैठे बुजुर्ग शायरों को कैफ़ी की प्रंशसा अच्छी नही लगी और फिर उनकी गजल पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया गया कि क्या यह उन्ही की गजल है ? कैफ़ी साहब को इम्तिहान से गुजरना पडा | मिसरा दिया गया —- ” इतना हंसो कि आँख से आँसू निकल पड़े ‘ फिर क्या कैफ़ी साहब ने इस मिसरे पर जो गजल कही वह सारे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मशहूर हुई | लोगो का शक दूर हुआ ” काश जिन्दगी में तुम मेरे हमसफर होते तो जिन्दगी इस तरह गुजर जाती जैसे फूलो पर से नीमसहर का झोका ”

जिन्दगी जेहद में है , सब्र के काबू में नही ,
नब्जे हस्ती का लहू , कापते आँसू में नही ,
उड़ने खुलने में है निकहत , खमे गेसू में नही ,
जन्नत एक और है जो मर्द के पहलु में नही |

उसकी आजाद रविश पर भी मचलना है तुझे , उठ मेरी जान , मेरे साथ ही चलना है तुझे | ( कैफ़ी )

कामरेड अतुल अनजान कहते है कि कैफ़ी साहब साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे | लोकतंत्र के जबर्दस्त हामी थे | गरीब मजदूरो , किसानो के सबसे बड़े पैरोकार थे | मार्क्सवादी दर्शन तथा वैज्ञानिक समाजवाद में उनकी जबर्दस्त आस्था थी | आवाज बड़े बुलंद थी | गम्भीर बातो को भी बड़ी आसानी से जनता के सामने रखने की अद्भुँत क्षमता थी | शब्दों का प्रयोग बहुत सोच समझकर नपे – तुले अंदाज में रखते थे | इसीलिए वे आवामी शायर थे | इसीलिए उनकी पहचान और मकबूलियत देश परदेश में थी | इतना विशाल व्यक्तित्व और अत्यंत सादे और सरल | यही थे कामरेड कैफ़ी | मेरे जीवन में साहित्यिक अभिरुचि बनाये रखने के प्रेरणा स्रोत थे कामरेड कैफ़ी | —
कैफ़ी एक ऐसे संवेदनशील शयर थे जिन्हें मुंबई की रगिनियत बाँध न सकी | जिले के कई नामवर मुंबई से लेकर इडियन द्वीप बार्वाडोस और सूरीनाम ,अमेरिका ,जापान तक गये लेकिन वही के होकर वहा रह गये | कई लोगो ने मुंबई को व्यवसायिक ठिकाना बनाया और जिले के मिटटी के प्रति प्रेम उपजा तो चंद नोटों की गद्दिया चंदे के नाम व हिकारत की नजर से यहाँ के लोगो को सौप दी ; लेकिन कैफ़ी इसके अपवाद साबित हुए | उन्होंने एक शेर में जिक्र भी किया है
” वो मेरा गाँव है वह मेरे गाँव के चूल्हे कि जिनमे शोले तो शोले धुँआ नही उठता ”
कैफ़ी ने जिन्दगी के आखरी वकत को बड़ी सिद्दत के साथ अपने गाँव मिजवा की तरक्की के नाम दिए | लकवाग्रस्त शरीर जो की व्हील चेयर पर सिमट गया था , के वावजूद उन्होंने यहाँ के विकास के ऐसे सपने सजोये थे , जो एक कृशकाय शरीर को देखते हुए कल्पित ख़्वाब की तरह नजर आता था | लेकिन कैफ़ी ने अपने अपाहिज शरीर को आडे आने नही दिया | उन्होंने मिजवा में बालिका डिग्री कालेज खोलने का सपना देखा था वो तो साकार नही हो पाया लेकिन आज मिजवा में बालिकाओं का माध्यमिक विद्यालय उनके सपने को साकार करने का रह का सेतु बना | इस विद्यालय में बालिकाओ को कधी , बुनाई से लेकर आधुनिक दुनिया से लड़ने के लिए कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है |
कैफ़ी का मानना था कि ” अपनी मिटटी से कटा व्यक्ति किसी का भी नही हो सकता | जमीदार के घर में पैदा होने और लखनऊ के शायराना फिजा में पलने — बढने के वावजूद कैफ़ी को मुज्वा की बुनियादी जरूरते अक्सर खिचती रहती थी |
पतेह मंजिल नाम लोगो की जुबान पर बसे कैसी का यह आशियाना आज भी कैफ़ी की यादो का चिराग बना हुआ है और आने वाले सदियों तक बना रहेगा |

अजीब आदमी था वो ——–

मुहब्बतों का गीत था बगावतो का राग था
कभी वो सिर्फ फूल था कभी वो सिर्फ आग था
अजीब आदमी था वो
वो मुफलिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते है
वो जाबिरो से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज है
कभी पिघल भी सकते है
वो बन्दिशो से कहता था
मैं तुमको तोड़ सकता हूँ
सहूलतो से कहता था
मैं तुमको छोड़ सकता हूँ
हवाओं से वो कहता था
मैं तुमको मोड़ सकता हूँ
वो ख़्वाब से ये कहता था
के तुझको सच करूंगा मैं
वो आरजू से कहता था
मैं तेरा हम सफर हूँ
तेरे साथ ही चलूँगा मैं |
तू चाहे जितनी दूर भी बना अपनी मंजिले
कभी नही थकुंगा मैं
वो जिन्दगी से कहता था
कि तुझको मैं सजाऊँगा
तू मुझसे चाँद मांग ले
मैं चाँद ले आउंगा
वो आदमी से कहता था
कि आदमी से प्यार कर
उजड़ रही ये जमी
कुछ इसका अब सिंगार कर111814
अजीब आदमी था वो ————–

कैफ़ी अपनी जिन्दगी से रुखसत होते — होते ये नज्म कही थी पूरे दुनिया के मेहनतकस आवाम से ——–

” कोई तो सूद चुकाए , कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का , जो आज तक उधार सा है |
– सुनील दत्ता . स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

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देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।
इस भगाई और भगावा में सबसे रोचक तथ्य यह है कि देवयानी खोबरगड़े के पति व बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं। अब आप स्वयं समझ लीजिये की देवयानी साहिबा भारत को किस तरह से राजनयिक व कूटनीतिक तरीके से मजबूत कर रही थी और सबसे अच्छी बात यह भी है कि आदर्श होउसिंग घोटाले में देवयानी खोबरगड़े मौजूद हैं।
अब रही अमेरिका कि बात तो जब अटल बिहारी बाजपेयी के चेहरे के ऊपर बिल क्लिंटन ने वाइन छोड़ दी थी तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कोई विरोध नहीं किया। भारत में इसकी जानकारी काफी समय बाद आयी। रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज को नंगा करके तलाशी ली गयी उस समय कोई विरोध नहीं हुआ और भारत के नागरिकों को बहुत बाद में जानकारी हुई। अपने आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
अमेरिकियों के साथ आप मान्य का व्यवहार करते हैं जो उनके दूतावासों में होता है। उसको आप नजरअंदाज करते हैं उनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का समर्थन एक हिस्से द्वारा किया जाता है। जब उनका अधिकारी आता है तो वह भारत सरकार के अधिकारीयों के बाद अपने एजेंटों से भी मिलता है। हद तो यहाँ तक हो जाती है कि वह राज्यों के मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत वार्ता भी करता है और आप चुप रहते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि उनको किसी भी विशेषाधिकार विधि के विरुद्ध देने कि जरूरत नहीं है। इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित। अगर वह एक राजनयिक के साथ दुर्व्यवहार करते हैं तो ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए यही विकल्प है। विदेशों में तैनात भारतीय अधिकारीयों कि ईमानदारी व सतयनिष्ठा कि भी पहचान करनी चाहिए। अक्सर देखने में यह आया है कि हमारे अधिकारीयों कि निष्ठा देशनिष्ठ न होकर कुछ फायदों के लिए विदेशनिष्ठ हो जाती है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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यह चिन्ह छीनते ही हैसियत मालूम हो जाती है
किस्सा यह है कि आज एक अधिवक्ता थाना रामनगर जनपद बाराबंकी में अपने क्लाइंट, जो लॉकअप में निरुद्ध था, मिलने गए। वहाँ पर दीवान से अनुमति मांगी उसने कहा कि पांच मिनट बात कर लो। जिस पर अधिवक्ता महोदय उस व्यक्ति से बात करने लगे तभी थाने में तैनात दरोगा शुद्धि भूषण दूबे आये और अधिवक्ता से बदतमीजीपूर्ण तरीके से बात करने लगे तभी एक दूसरा दरोगा आ गया और उसने कहा कि वकील का तस्करा लिख दो। गनीमत यह थी कि अधिवक्ता महोदय फौजदारी के थे और नियम कानून कायदों की बात होने लगी जिससे एक बड़ी घटना होते-होते बची। शुद्धि भूषण दूबे दरोगा जी थाना आपके बाप का नहीं है और फर्जी तस्करा लिखने वाले दरोगा जी न आप के ही बाप का है। आप तो जनता के नौकर हैं और मालिक से बात करने का शऊर आपको आना चाहिए। लोकतंत्र में कानून से बड़ा कोई नही होता है। आप भी कानून से बड़े नहीं हैं और न हम। और अगर आप अपने को कानून से ऊपर समझते हैं तो नौकरी आपको नही करनी चाहिए बल्कि मवालियों की तरह अपनी गुंडागर्दी की बातें जो आप करते हैं उसी का हिस्सा हो जाइये। आप की जानकारी के लिए लिख रहा हूँ कि मानवाधिकार आयोग तथा माननीय सर्वोच्च न्यायलय के दिशा-निर्देशों के अनुसार पुलिस बल को कार्य करना चाहिए नहीं तो अपराधी और आप में क्या अंतर रहेगा ? एक अपराधी को घोड़िया लाद कर मिठाई खिलाते हुए ले जाते हुए आप लोगों को शर्म नही महसूस होती है और समाज के भले लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने का जरा सा भी अवसर मिलता है तो आप चूकते नही हैं। आप अपने परिवार में किस तरीके से रहते होंगे। इसीलिए कोई भी पीड़ित व्यक्ति थाने जाना पसंद नही करता है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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दंगे राजनैतिक लाभ के लिए करवाए जाते हैं यह तो पहले भी कहा जाता रहा है। इस बार सभी राजनैतिक दलों ने इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर लिया। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार िशंदे ने तो यहाँ तक कह दिया कि चुनाव से पहले इस तरह के और दंगे भी करवाए जा सकते हैं। 1, नवम्बर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मुज़फ्फरनगर में कुछ शरारती राजनैतिक तत्व हैं जो माहौल को खराब करने के लिए एक वारदात को दबाना और दूसरी को उछालना चाहते हैं। भाजपा पर राजनैतिक लाभ के लिए दंगा करवाने का आरोप लगभग सभी दलों ने खुले रूप से लगाया है। ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है कि दंगे का माहौल तैयार करने की शुरुआत संघ परिवार और भाजपा से जुड़े हुए नेताओं ने ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए की थी। उन्हें अपने लक्ष्य में सफल होते देख अन्य दलों के नेता समाज को बाँटने के उनके इस अभियान का विरोध करने के बजाय भड़की हुई भावनाओं पर राजनैतिक रोटी सेकने के लिए उसमें शामिल हो गए। अगर देश एंव समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अन्य दलों के नेताओं ने निभाया होता तो भी इस साम्प्रदायिक हवा को रोका या इसकी तीव्रता को कम अवश्य किया जा सकता था। कुल मिला कर यदि देखा जाए तो मूल्यविहीन और सिद्वान्तविहीन राजनीति भी इसकी ज़िम्मेदार है। बेहतर भविष्य और सेकुलर लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें राजनीति में मूल्यों और सिद्वान्तों की वकालत करने वालों को महत्व देना ही होगा।
मोबाइल : 09455571488
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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