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Archive for मई, 2020

सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री
भारत सरकार
नई दिल्ली

श्रीमान जी
वर्ष 2013 के अनुसार पूरे देश मे 13 लाख सम्मानित अधिवक्ता थे तथा हर वर्ष औसतन 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे कि मौजूदा समय मे यह अकड़ा करीब 17 लाख 10 हज़ार के आस पास का हैं। इन पर 1 करोड़ परिवार आश्रित है, इनके स्टाफ/मुंशी की संख्या 5 लाख के लगभग है और आश्रित 20 लाख होंगे।
लॉकडाउन के चलते 24 मार्च से अदालतें बंद हैं और आगे जून माह में अधिकतर अदालते बंद ही रहती है।इस वजह से 1.20 करोड़ की आबादी इस लॉकडाउन की त्रासदी भुगत रही है।अधिवक्ता वर्ग में लगभग 5 प्रतिशत लोग ही ऐसे है जो आय कर देने के सक्षम है और देते है।10 प्रतिशत ऐसे अधिवक्ता होंगे मात्र जो 2-3 महीने बिना कचहरी गए अपने परिवार का ख़र्च उठा सकते है।
शेष सम्पूर्ण वकील/क्लर्क खास तौर पर युवा अधिवक्ताओ को सामान्य जीवन यापन करने में कष्ट उठाना पड़ रहा हैं।केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अभी तक इस वर्ग को कोई भी राहत/आर्थिक पैकेज/सहायता की बात नही की गई है जो कि नितांत ज़रूरी है। पिछले 2 महीने और आगामी एक महीने के लिए एक खास राहत राशि दिया जाना उचित हैं।
1-पन्द्रह हजार रुपए प्रति अधिवक्ता प्रति माह के हिसाब 45हजार रुपए अधिवक्ताओं के खाते में जमा किया जाए।
2-प्रत्येक अधिवक्ता को पांच लाख रुपए बगैर ब्याज के दिया जाए और उसकी अदायगी दस वर्षों में हो।

3-अधिवक्ताओं के प्रत्येक कार्यस्थल तहसील /जनपद न्यायालय में माननीय उच्चतम व उच्च न्यायालय की भांति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तत्काल व्यवस्था की जाए जब तक व्यवस्था न हो जाए तब तक एंबुलेंस तैनात की जाए।
4- बार कौंसिल आफ इंडिया द्वारा आयोजित आल इंडिया बार परीक्षा की फीस आधी की जाए।

अतः आप सभी से अनुरोध है कि तत्काल प्रभाव से हर अधिवक्ता साथी के खातों में 45000/- तथा स्टाफ/क्लर्क के खातों में भी 15000/- की राशि दी जाए।
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि स्वतंत्र न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आप व्यक्तिगत रुचि लेकर लाकडाउन पैकेज की घोषणा कर लागू करेंगे।
सादर
अधिवक्ता एकता ज़िन्दाबाद
भवदीय
इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स

प्रतिलिपि
माननीय मुख्यमंत्रीगण

अध्य्क्ष बार कौंसिल ऑफ इंडिया
अध्य्क्ष समस्त राज्य बार कौंसिल

यह ज्ञापन सभी अधिवक्ता बन्धुओं से अनुरोध है कि उचित माध्यम से भेजने का कष्ट करें सादर
वाई.एस.लोहित
प्रदेश अध्यक्ष
सुरेश त्रिपाठी
प्रदेश महासचिव

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को मेल से भेजने का कष्ट करें
connect@mygov.nic.in
narendramodi1234@gmail.com।
cmup@nic.in

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कुछ जिलों में निरुद्ध जमातियों को रिलीज कराया गया ।

गोंडा के कम्युनिस्ट नेता और वरिष्ठ वकील व इंडियन एसोसिएशन आफ लायर्स के प्रदेश महासचिव

कामरेड सुरेश चंद्र त्रिपाठी ने फोन से सूचना दी की गोंडा में जो 49 जमाती शासन द्वारा निरुद्ध किए गए थे उन सबको रिलीज कर दिया गया है।

इन 49 लोगों में बुलंदशहर ,दिल्ली, महाराष्ट्र और गोंडा के लोग शामिल थे।

इनको रिलीज करवाने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उनके वकीलों का बड़ा योगदान रहा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने मानवीय – नैतिक सरोकारों तथा संवैधानिक सरोकारों का पूर्णत: निर्वाह किया।

उसी तरह एक अन्य सूचना के अनुसार  वरिष्ठ अधिवक्ता व इंडियन एसोसिएशन आफ लायर्स के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रणधीर सिंह सुमन बाराबंकी जिले के जमातियों को रिलीज करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।

बाराबंकी में सहारनपुर के लोग निरुद्ध थे ।वहां भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं और वकीलों नें इनको रिलीज करवाने में अपनी बड़ी मदद दी।

प्रतापगढ़ में पहले ही रिलीज हो चुके है।

इन समस्त जगहों के पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को बधाई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भी उक्त आशय से संबंधित पत्र राज्य सरकार को प्रेषित किया गया था।

-अरविन्द राजस्वरुप

मोबाइल 9044905796

 

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सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री
भारत सरकार/माननीय मुख्यमंत्रीगण/अध्य्क्ष बार कौंसिल ऑफ इंडिया/अध्य्क्ष समस्त राज्य बार कौंसिल

श्रीमान,
वर्ष 2013 के अनुसार पूरे देश मे 13 लाख सम्मानित अधिवक्ता थे तथा हर वर्ष औसतन 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे कि मौजूदा समय मे यह अकड़ा करीब 17 लाख 10 हज़ार के आस पास का हैं। इन पर 1 करोड़ परिवार आश्रित है, इनके स्टाफ/मुंशी की संख्या 5 लाख के लगभग है और आश्रित 20 लाख होंगे।
लॉकडाउन के चलते 24 मार्च से अदालतें बंद हैं और आगे जून माह में अधिकतर अदालते बंद ही रहती है।इस वजह से 1.20 करोड़ की आबादी इस लॉकडाउन की त्रासदी भुगत रही है।अधिवक्ता वर्ग में लगभग 5 प्रतिशत लोग ही ऐसे है जो आय कर देने के सक्षम है और देते है।10 प्रतिशत ऐसे अधिवक्ता होंगे मात्र जो 2-3 महीने बिना कचहरी गए अपने परिवार का ख़र्च उठा सकते है।
शेष सम्पूर्ण वकील/क्लर्क खास तौर पर युवा अधिवक्ताओ को सामान्य जीवन यापन करने में कष्ट उठाना पड़ रहा हैं।केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अभी तक इस वर्ग को कोई भी राहत/आर्थिक पैकेज/सहायता की बात नही की गई है जो कि नितांत ज़रूरी है। पिछले 2 महीने और आगामी एक महीने के लिए एक खास राहत राशि दिया जाना उचित हैं।

अतः आप सभी से अनुरोध है कि तत्काल प्रभाव से हर अधिवक्ता साथी के खातों में 45000/- तथा स्टाफ/क्लर्क के खातों में भी 15000/- की राशि दी जाए।बार कौंसिल ऑफ इंडिया और समस्त राज्यों की बार कौंसिल से भी निवेदन है कि सरकार से इसकी मांग करे।

धन्यवाद।।
अधिवक्ता एकता ज़िन्दाबाद

रणधीर सिंह सुमन
“एडवोकेट”
सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी
इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्सIMG_20200224_071921

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आज औरैया में एक्सीडेंट में 24 मजदूर मरें 84 घायल।

इन मौतों का जिम्मेदार कौन।

लाकडाउन की उद्घोषणा करके नकाब के पीछे चले गए। हजारों लोग मर चुके हैं। images (3)

 

भाकपा ने कल निम्न बयान जारी किया था। यदि सरकार ने संज्ञान लिया होता तो औरैया का यह दुखद हादसा न हुआ होता। मगरूर सरकार-

हादसों और दुर्घटनाओं से घर लौटने वाले मजदूरों की मौतों से भाकपा व्यथित

सड़क पर आये एक एक मजदूर को घर तक सुरक्षित पहुंचाये सरकार: भाकपा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ गिरीश शर्मा ने मुजफ्फर नगर और मध्य प्रदेश के गुना में कल सड़क हादसों में 14 मजदूरों की दर्दनाक मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। भाकपा ने आज फिर उत्तर प्रदेश के ही विभिन्न स्थानों पर सड़क हादसों में मजदूरों की मौतों की खबरों को अंतस्तल तक हिला देने वाली बताया है। भाकपा ने इन हादसों के लिये सीधे राज्य और केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी ने केन्द्र और राज्य सरकार के मुखियाओं से इन मौतों की नैतिक ज़िम्मेदारी लेने की मांग की है। 

यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा कि अनियोजित लाक डाउन में मिल रही यातनाओं से पीड़ित और उन्हें समय पर घरों तक पहुंचाने में केन्द्र और राज्य सरकारों की असफलताओं से प्रवासी मजदूरों का धैर्य टूट चुका है और वे अपनी जान हथेली पर रख कर घरों को निकल रहे हैं। अब सड़कों पर न निकलने की सत्ताधारियों की अपील और रेल- बसों से पहुंचाने के उनके बयानों का उनके लिये कोई महत्व नहीं रह गया है।
‘अब मरता क्या न करता’ की स्थिति में निकले देश के इन कर्णधारों और पूंजी के निर्माताओं को उनके रास्तों में रोका जारहा है, उनकी बची खुची पूंजी उनसे छीनी जारही है, उन्हें लाठी- डंडों से खदेड़ा जा रहा है, अपने खर्चे से जुटाये यातायात के साधन उनसे छीने जारहे हैं, उन्हें शारीरिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया जारहा है॰
उनमें से अनेक भूख, प्यास, बीमारी और थकान से जानें गंवा चुके हैं। हर रोज तमाम लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं। हर दर्दनाक मंजर पर उत्तर प्रदेश सरकार का एक जैसा बयान- “ मुख्यमंत्री ने घटना का संज्ञान लिया है, घटना पर दुख व्यक्त किया है, घटना की जांच के आदेश दे दिये गये हैं, म्रतको व घायलों को मुआबजे का ऐलान कर दिया गया है” आदि अब पीड़ितों को ही नहीं हम सबको मुंह चिड़ाने लगा है। गत तीन सालों में हुयी हजारों घटनाओं की कथित जांच का परिणाम भी आज तक अज्ञात है।
भाकपा साफ़तौर पर कहना चाहती है कि सड़कों पर निकल पड़े इन मजबूर मजदूरों को अब सत्ताधारियों के उपदेशों और सहानुभूति की जरूरत नहीं है। उनकी पहली जरूरत है उन्हें जो जहां है वहाँ से पिक अप ( Pick Up ) कर घरों तक पहुंचाया जाये। इन तीन सालों में तीन तीन कांबड़ यात्राओं और अर्ध कुंभ को, कुंभ से भी बेहतर तरीके से आयोजित करने का श्रेय उत्तर प्रदेश सरकार लेती रही है। फिर इन कुछेक लाख मजदूरों की यह जानलेवा उपेक्षा किसी की भी समझ से परे है।
इन असहाय मजदूरों की मौतों पर मुआबजे की मांग तो की जाती रही है और की जानी ही चाहिये, लेकिन आज हम सरकारों से एक ही मांग कर रहे हैं कि- ‘जो भी मजदूर सड़क पर दिखे उसे उचित संसाधन से सुरक्षित घर पहुंचाया जाये। यह सरकार का कर्तव्य है और नैतिक दायित्व भी।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्र

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रुकी अर्थव्यवस्था को मज़दूरों की क़ीमत पर चलाने की कोशिशें
कोरोना की आड़ में मज़दूरों के हक़ों पर सरकार का हमला
वेबिनार में श्रम कानूनों में बदलाव का हुआ तीखा विरोध

– विनीत तिवारी
सरकार कोरोना वायरस से निपटने की आड़ में देश के मज़दूरों को मारने पर आमादा है। अचानक लॉकडाउन घोषित करने के बाद मज़दूरों को लग रहा था कि अब सरकार उनकी सुध लेगी। क़रीब दो महीनों से अपने घरों से दूर ये मज़दूर काम-धंधे से बेकार, खाने-पीने के लिए सरकार और दानदाताओं पर मोहताज हो गए है। अब लॉकडाउन खोलकर रुकी हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार जिनके जीवन को दाँव पर लगाने जा रही है, उन्हीं मज़दूरों से उनके हक़ छीनने के लिए सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव कर दिए हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय समीकरण भी छिपे हुए हैं। मज़दूरों को नयी परिस्थिति में नयी तरह से अपने आपको संगठित करना, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को अपने साथ जोड़ना होगा और संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

उक्त बातें शहर के विभिन्न श्रम संगठनों द्वारा 10 मई 2020 को आयोजित एक वेबिनार में कही गईं। वेबिनार का विषय था – “कोरोना की आड़ में श्रम कानूनों में बदलाव।” वेबिनार की शुरुआत में संयोजक विनीत तिवारी (इंदौर) ने कहा कि कोविड-19 से निपटने के लिए सरकार ने तब लॉकडाउन कर दिया था जब भारत में कोविड-19 के केवल करीब 500 केसेस थे। सरकार के उस अदूरदर्शी निर्णय ने करोड़ों मज़दूरों को बेतहाशा मुश्किल में डाल दिया था। जब केरल और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर अन्य सभी प्रदेशों की सरकारें इन गरीबों की भोजन, राशन, दवाओं, या अपने घर से संपर्क की व्यवस्थाओं में नाकाम रहीं तो ये मज़दूर भूख से मरने के डर से उन जगहों को छोड़ कर वे निकल पड़े अपने गाँवों की तरफ। सूखी हड्डियों वाले महिला-पुरुष अपने बच्चों को गोद में लेकर सैकड़ों, और हज़ारों किलोमीटर लम्बे सफर पर, चप्पलें टूट गईं, चिलचिलाती गर्मी में कुछ ने दम भी तोड़ दिया। उन्हें भी कहीं भी रोक लिया जाता है और उनसे बदतमीजी की जाती है, बजाय इसके कि उन्हें लज्जा और ग्लानि के साथ, माफ़ी मांगकर शासन और प्रशासन अपने घर छुड़वाने की व्यवस्था करे। यह दृश्य हमारे दिलों को दहला ही रहे थे कि पता चला मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा अन्य कुछ और भी राज्यों की सरकारों ने श्रम कानूनों में बदलाव का फैसला कर लिया है। ऐसे फैसले लेते हुए न तो विपक्षी दलों से पूछा गया और न ही श्रम संगठनों के साथ कोई मशविरा किया गया। इंदौर एटक के महासचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव (इंदौर) ने कहा कि हमें प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं पर सबसे पहले गौर करना चाहिए और सरकार ने जो बदलाव श्रम कानूनों में लाये हैं उनके खिलाफ इकट्ठे होकर लड़ाई लड़नी चाहिए। सीटू के मध्य प्रदेश के राज्य कमिटी सदस्य कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया (इंदौर) ने सरकार के इन क़दमों की कड़ी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार ने कारखाना अधिनियम, 1948, ठेका श्रमिक अधिनियम, दुकान एवं स्थापना अधिनियम आदि कानून बदल डालने का असर पूरे श्रमिक वर्ग पर बहुत प्रतिकूल पड़ेगा।

इंटक के प्रदेश महामंत्री श्याम सुन्दर यादव (इंदौर) ने कहा कि सरकार ने श्रम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया और कानूनों में बदलाव कर दिया। आज़ादी के बाद पहली बार मज़दूरों के साथ इस तरह का तानाशाहीपूर्ण रवैय्या अपनाया गया है. इसका पुरज़ोर विरोध किया जाएगा। एटक के प्रांतीय उप महासचिव एस. एस. मौर्या (भोपाल) ने कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार पहले भी अपने शासन के दौरान मज़दूर विरोधी रुख दिखा चुकी है और अब इस महामारी के दौरान पिछले दरवाज़े से श्रम क़ानून बदलने की उसकी चाल साबित करती है कि उसके केंद्र में पूंजीपति ही हैं। उन्होंने कहा कि चार इन्वेस्टर्स मीट करने के बाद 4 लाख हेक्टेयर ज़मीन सरकार ने पूँजीपतियों को दे दी है। ये कॉर्पोरेटी लूट है और इसके ख़िलाफ़ लड़ाई सभी मज़दूर संगठनों को साथ मिलकर लड़नी होगी। इंटक के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी. डी. गौतम (भोपाल) और इंटक के ही प्रांतीय महामंत्री कृपा शंकर वर्मा (जबलपुर) ने कहा कि इन कानूनी बदलावों से मज़दूर पूरी तरह निहत्था और कमज़ोर हो जाएगा। अगर नियोक्ता उसे तनख्वाह भी न दे तब भी मज़दूर को अधिकार नहीं होगा कि वो इसके खिलाफ कोर्ट में जा सके।

एटक के प्रांतीय उपाध्यक्ष अधिवक्ता कॉमरेड अरविन्द श्रीवास्तव (जबलपुर) ने कहा कि ये तथाकथित सुधार दरअसल गैरकानूनी हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के ऐतिहासिक सम्मेलनों में यह बात कानूनी तौर पर मान्य है कि मज़दूरों से 8 घंटे से ज़्यादा काम नहीं लिया जा सकता, फिर यह सरकार कैसे 12 घंटे के काम का नियम बना सकती है? इसके अलावा भी संविधान में वर्णिंत अनेक अनुच्छेदों का उल्लंघन होगा अगर ये श्रम कानून अमल में लाये गए तो। इंटक नेता रतिराम यादव (ग्वालियर) ने भी चर्चा में भाग लेते हुए इन बदलावों को मज़दूर वर्ग के हितों पर कुठाराघात बताया। ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरविन्द पोरवाल ने कहा कि 1990 में ग्लोबलाइजेशन से ही मज़दूरों के खिलाफ नीतियाँ बनने का दौर शुरू हो गया था और सरकारें पूँजीवादी नीतियाँ लागू कर रही थीं, लेकिन अभी के दौर में तो यह मज़दूर विरोध अपने चरम पर है। ऐसा लगता है जैसे केन्द्र और राज्य सरकार ने मज़दूरों को कोरोना से भी ज़्यादा बड़ा दुश्मन मान लिया हो। रतलाम से इंटक के श्री अरविन्द सोनी ने भी अपनी बात रखी।

अर्थशास्त्री जया मेहता (इंदौर) ने कहा कि श्रम कानूनों में बदलाव से जिन मज़दूरों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, वैसे मज़दूर कुल मज़दूरों का बहुत थोड़ा प्रतिशत हैं। जो असंगठित मज़दूर सैकड़ों – हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव वापस जा रहे हैं , जो रेल-सड़क हादसों और भूख का शिकार हो रहे हैं, उनकी तादाद कुल मज़दूरों की लगभग 93 प्रतिशत है। इन्हें रोज़गार की, या बेहतर जीवन की या काम के घंटों की या किसी और तरह की कानूनी सुरक्षा कभी भी मिली ही नहीं, लेकिन मज़दूरों के ये दोनों तबके आपस में जुड़े हुए हैं। कॉर्पोरेट जगत का तर्क यह है कि अगर नियम ढीले हो जाएँगे तो वे अधिक मज़दूरों को काम दे सकेंगे और तब सडकों -पटरियों पर चल रहे इन मज़दूरों को भी बेहतर रोज़गार हासिल होने की सम्भावना बनेगी। लेकिन यह एक साफ़ झूठ है। इतिहास गवाह है कि कानूनों में ढील देने से रोज़गार नहीं बढ़ा बल्कि मज़दूरों का शोषण ही बढ़ा है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात सरकार ने श्रम कानूनों में जो बदलाव किये हैं, वे केवल देश और प्रदेशों की राजनीति तथा अर्थव्यवस्था से भर जुड़े हुए मामले नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय बिसात का हिस्सा है। अमेरिका चाहता है कि कोरोना का बहाना लेकर चीन से निर्माण का आधार छीन लिया जाये ताकि चीन की अर्थव्यवस्था चरमरा जाये और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा में न रहे। इसके लिए जापान और योरप के अनेक देश भी तैयार हैं। भारत इस मौके का फायदा उठाकर विदेशी निवेश को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है। भारत ने 1000 अमेरिकी कंपनियों को ये आश्वासन दिया है कि अगर वे चीन से अपना निर्माण आधार भारत शिफ्ट करना चाहें तो उनका भारत स्वागत करेगा। भारत में संगठित क्षेत्र में प्रति मज़दूर प्रति माह औसत खर्च 143 अमेरिकी डॉलर है जबकि चीन में यह दर 234 अमेरिकी डॉलर है। मतलब भारत में श्रम सस्ता है और उसे और भी सस्ता और असुरक्षित बनाकर अंतरराष्ट्रीय पूँजी के सामने थाली में हमारी सरकार पेश कर रही है। ज़ाहिर है हमारी सरकार के सामने मज़दूर तबके की इतनी ही अहमियत है कि उसके ज़रिये रुकी हुई अर्थव्यवस्था चल सके चाहे ऐसा उनकी ज़िंदगियों की कीमत पर भी क्यों न हो। बीएसएनएल के वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता एस. के. दुबे ने भी अपने विचार साझा किये।

वेबिनार में इंदौर से वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता वसंत शिंत्रे, अजय लागू, प्रलेस और इप्टा से केशरी सिंह चिड़ार, प्रमोद बागड़ी, रामआसरे पांडे, भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य सचिव सारिका श्रीवास्तव, विवेक मेहता, सुनील चंद्रन, डॉ. रत्नेश खरे, शरीफ़ खान. सुरेश उपाध्याय, प्रणय, महिमा, नेहा, गीतेश, शिवपुरी से मनीषा, पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के श्रमिक नेता यशवंत पैठणकर, धर्मपाल अधिकारी, राजेश सूर्यवंशी, किसान नेता अरुण चौहान, छत्तीसगढ़ इप्टा और प्रलेस से नथमल शर्मा, राजेश श्रीवास्तव, उषा आठले, अजय आठले, जीवेश चौबे, तस्लीम, पुणे से विजय दलाल, भोपाल से सत्यम, परशुराम तिवारी, सीमा, काशीराम अहिरवार, कोतमा से सुषमा कैथल, कोलंबिया (अमेरिका) से तुहिन चक्रबॉर्ती, गुना से मनोहर मिरोटे, अशोकनगर से मयंक जैन, होशंगाबाद से प्रियम सेन दिल्ली से विनोद कोष्टी, मनीष श्रीवास्तव, पंखुरी ज़हीर, राजीव कुमार, आदि अनेक लोग शामिल हुए।1589512944775_1589512928427_1589512895874_WhatsApp Image 2020-05-10 at 19.17.441589512949198_1589512906769_1589512905595_WhatsApp Image 2020-05-10 at 19.17.45

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इंडियन एसोसिएशन आफ लायर्स की मांग

वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है और भारत में स्थिति भी बहुत गंभीर है, इसलिए आम सहमति है कि आबादी के सभी वर्गों को राज्य एजेंसियों के साथ पूरे सहयोग से रहना चाहिए और समय पर जारी किए गए कानूनी आदेशों, निर्देशों और दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए। समय पर। महामारी से निपटने के लिए विकसित किसी भी रणनीति की सफलता के लिए अनुशासन महत्वपूर्ण है। हालांकि, संकट की प्रकृति और पैमाने अनिवार्य रूप से व्यापक परामर्श और समाज के सभी वर्गों की सचेत और पूरे दिल से भागीदारी के लिए कहते हैं, अर्थात्, राजनीतिक कार्यकारी; नौकरशाही का बुनियादी ढांचा; उनके अधीन लोक सेवकों के रूप में सेवारत विशाल कार्यबल, उद्यम में सीमावर्ती भागीदार और घास की जड़ों में जनता। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए विभिन्न स्रोतों से उचित सलाह और परामर्श प्राप्त करने का बड़ा फायदा है। नागरिक समाज की इच्छुक और स्वैच्छिक भागीदारी अभूतपूर्व संकट से बाहर प्रभावी तरीके के लिए एक शर्त है। हालांकि, नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ-साथ संवैधानिक रूप से एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदान किए गए कानूनी मानदंड, किसी भी कीमत पर निलंबन के तहत रखा जा सकता है। राज्य केवल विद्रोही नियोजन, करुणापूर्ण निष्पादन और कमजोर और हाशिए वाले वर्गों तक पहुँचने के लिए पर्याप्त कल्याणकारी उपायों के माध्यम से नागरिकों का विश्वास जीत सकता है।
जबकि लोग राज्य और उसकी एजेंसियों को निर्विवाद समर्थन प्रदान कर रहे हैं, बाद वाले कार्य के लिए बहुत असमान रहे हैं। जल्दबाजी और अनियोजित लॉकडाउन ने सबसे गरीब देशवासियों के विभिन्न वर्गों में भूख, भुखमरी और दुर्दशा ला दी है।IMG_20200514_233529 प्रवासी कामगारों के साथ हुए अन्याय ने हम सभी को लज्जित करना चाहिए। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक गैर-नियोजित लॉकडाउन लागू होने के बाद भी प्रभावी सुधारात्मक उपाय करने के लिए बहुत कुछ नहीं किया गया है। गरीबों को पूरी तरह से असुरक्षित छोड़ दिया गया है। मज़दूर वर्ग की दयनीय स्थिति, विशेषकर प्रवासी मज़दूरों की अनुचित स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए, राज्य सरकारों में से कुछ ने ट्रेड यूनियनों की कड़ी मेहनत से जीते हुए अधिकारों पर कुल्हाड़ी मारना शुरू कर दिया है, जो कि परिस्थिति द्वारा पेश की गई भारी शक्तियों का अनुचित फ़ायदा उठाकर उन्हें पेश कर रहे हैं। बहुत कठोर, असमान, अन्यायपूर्ण और पूरी तरह से अनुचित कानून जो कि श्रमिक वर्ग के हित के खिलाफ है।
अधिकांश श्रम कानून केंद्रीय कानून हैं और ब्रिटिश शासन और ब्रिटिश नियोक्ताओं के खिलाफ श्रमिकों की भयंकर लड़ाई के बाद लागू किए गए थे। यहां तक ​​कि औद्योगिक विवाद अधिनियम को 11 मार्च, 1947 को यानी आजादी से महीनों पहले लागू किया गया था। भारत के संविधान का अनुच्छेद 37 यह प्रावधान करता है कि देश के शासन में निर्देशक सिद्धांत अभी भी मौलिक हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। अगला अनुच्छेद 38 (2) एक जनादेश देता है कि: –
राज्य, विशेष रूप से, आय में असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा, और न केवल व्यक्तियों के बीच, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले या अलग-अलग स्वरों में लगे लोगों के समूहों के बीच भी, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को खत्म करने का प्रयास करेगा।
जैसे कि श्रम कानूनों पर अंकुश लगाने का जानबूझकर किया गया कार्य संवैधानिक लक्ष्यों के विपरीत है और स्पष्ट रूप से श्रमिकों को गुलामी की स्थिति में डाल देगा, जिसके खिलाफ वे स्वतंत्रता आंदोलन में लड़े थे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोविद -19 ने असाधारण स्थिति से निपटने के लिए असाधारण उपायों का निर्माण किया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारें लोगों को संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकारों को रोकने के लिए कानूनों को निलंबित / निरस्त / दुरुपयोग कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा पारित हालिया अध्यादेश, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, प्रवासी श्रम अधिनियम सहित, श्रम कानूनों के एक मेजबान के आवेदन को छूट, अर्थव्यवस्था शुरू करने और राज्य में निवेश की सुविधा के बहाने उद्योगों को। सरकार ने एम.पी. श्रम कानूनों के साथ छेड़छाड़ भी की है ताकि श्रम को दासों में बदल दिया जाए। इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स ने इन अलोकतांत्रिक कार्यों के खिलाफ अपना मजबूत विरोध दर्ज किया, जो वास्तव में संघर्षों के कारण लंबे समय तक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स ने आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम के पास पॉलिमर फैक्ट्री में गैस त्रासदी पर गहरा दुख और दुख व्यक्त किया है, जिससे फैक्ट्री के आसपास के सैकड़ों निवासियों के साथ 12 निर्दोष नागरिकों की मृत्यु के साथ स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स की मांग है कि सुरक्षा कानूनों और मानदंडों की धज्जियां उड़ाने के लिए कारखाना प्रबंधन को अभियुक्त बनाया जाए। जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अभियुक्त नहीं बनाया गया है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई जनहित याचिका मामलों में त्वरित, निर्णायक और प्रभावी ढंग से कार्य करने में विफल होने के तरीके को नोट करना व्यथित है
भारतीय संघ के वकीलों ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस मजदूर विरोधी अध्यादेश को रद्द करने के लिए हस्तक्षेप करे। इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स ने भारत सरकार से अपील की कि वह अविलंब कार्रवाई करे
गरीबों को भूख, अभाव और पोषण से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर कल्याणकारी कदम शुरू करने के लिए कदम उठाएं। एक ओर लोगों को बचाने के लिए और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए विशाल सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता है। इस संबंध में अनिर्णय और देरी ने लोगों को भारी पीड़ा और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। लोगों और देश को अपूरणीय पीड़ा और क्षति से बचाने के लिए सही दिशा में उचित कदम एक आकस्मिक और योजनाबद्ध तरीके से उठाए जाने की आवश्यकता है।

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी की योगी के नाम खुला पत्र

माननीय मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ

महोदय,
निवेदन है कि प्रवासी मजदूरों को सिकंदराबाद से सीधे बाराबंकी एक ट्रेन के माध्यम से लाया गया जिसमें बाराबंकी के 510 यात्री थे बाकी अन्य जिलों के थे. गुजरात के गोधरा सूरत व वडोदरा से एक-एक ट्रेन 7 मई को ही आयीं जिसमे बाराबंकी का एक भी प्रवासी मजदूर नहीं था. मजबूर होकर जिला प्रशासन को फिरोजाबाद से लेकर आजमगढ़ और उससे आगे तक रोडवेज की बस लगवा कर भिजवाना प़डा फिर 8 मई को एक ट्रेन साबरमती से तथा 2 ट्रेन वडोदरा से बाराबंकी आयीं. यह ट्रेनें अचानक बाराबंकी आयीं. जिला प्रशासन ने रोडवेज की बसों से प्रवासी मजदूरों को उनके संबंधित जिलों को भिजवाया. बाराबंकी का उक्त ट्रेन में कोई भी प्रवासी मजदूर नहीं था.कोविद – 19 महामारी की स्तिथि में जनपद बाराबंकी ग्रीन जोन में है. महामारी अधिनियम व आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत रेलवे गंभीर अपराध कर रहीं है. वहीं प्रवासी मजदूरों को आप द्बारा निःशुल्क रोडवेज की सुविधा दिए जाने के कारण यह महत्वपूर्ण सराहनीय कार्य है जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं.
दूसरी तरफ तेलंगाना के सिकंदराबाद से आने वाले प्रवासी मजदूरों से कोई शुल्क नहीं लिया गया है लेकिन गोधरा, बड़ोदरा, साबरमती से आने वाली ट्रेनों से आने- वाले प्रवासी मजदूरों से किराया व अन्य चार्ज वसूले गए हैं. यह भी पता चल रहा है कि गुजरात में प्रदेश के प्रवासी मजदूरों से ठगों के गिरोह ने ट्रेन में भेजने के नाम पर वसूली की गई है जो गंभीर अपराध है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपसे मांग करती है कि यात्रियों से किराया वसूलने व कई गुना रुपया वसूलने वाले ठगों के गिरोहों के खिलाफ प्रदेश में मुकदमा दर्ज कर कठोर से कठोर कार्यवाई कराने का आदेश पारित करने का कष्ट करें . जिससे प्रदेश के प्रवासी मजदूरों को देश के किसी भी हिस्से में उनको ठगने व उनका उत्पीड़न करने की किसी की हिम्मत ना पड़े.

सादर
भवदीय
रणधीर सिंह सुमन
सदस्य राज्य पारिषद
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
उत्तर प्रदेश
मो. 9450195427
मेल से भेजा गया है

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योगी जी वाह
सरकार कोरोना काल में भी चल रही है। सब्जी उत्पादकों को लाभकारी मूल्य मिल सके जिसके लिए  पूर्ववर्ती सरकारों ने मंडी स्थापित की  थी।
लेकिन बाराबंकी में किसानों को लाभकारी मूल्य न मिल सके उसके मंडी समिति ने मंडी का समय तीन बजे से सुबह सात बजे कर दिया है।
जिससे अपने उत्पादों को न बेच पाएं। हद यहां तक हो गई है कि किसानों को आदेशित किया है कि वह अपना उत्पादन व्यापारी के पास छोड जाए और रुपये अगले दिन आकर लें।
फुटकर विक्रेताओं को भी जाने नहीं दिया जाता है। व्यापारियों और मंडी सचिव का गठजोड़ किसानों को तीन रुपये किलो लौकी बेचने पर मजबूर कर दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार जानकारी मिली है कि मंडी सचिव एक बाबूलाल  नाम के सेवा निवृत्त कर्मी को लेकर मंडी समिति में राउंड करते हैं और सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर अवैध चंदा न देने वालों पर लठ्ठ बजवा देते हैं।
व्यवस्था के नाम पर जंगलराज कायम हो गया है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपसे मांग करती है कि अविलंब मंडी सचिव को हटाकर जांच कराकर राष्ट्रीय संकट काल में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई कराएं।
इस तरह के तत्व सरकार को और अधिक बदनाम कर रहे हैं।
रणधीर सिंह सुमन

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कार्ल मार्क्स की 202 वीं जयंती ( 5 मई ) पर-

कोरोना काल में समूचे विश्व और भारत में मेहनतकशों पर बरपी मुसीबतों ने उन्हें सारी दुनियां के ध्यान के केन्द्र में ला दिया है। इसके साथ ही उनकी किस्मत के कायापलट के उद्देश्य से रचे गए सिध्दांत और उसके स्रजेता – कार्ल मार्क्स को भी विमर्श के सघन केन्द्र में ला दिया है। यद्यपि वे बौध्दिक और व्यावहारिक विमर्श से कभी बाहर नहीं हुये थे।

5 मई 1818 को जन्मे कार्ल हेनरिक मार्क्स का नाम इतिहास के सर्वाधिक अनुयायित महापुरुषों में विशिष्ट स्थान रखता है। उन्होने अपने मित्र और सहयोगी फ़्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिल कर साम्यवाद की विजय के लिये, सर्वहारा के वर्ग- संघर्ष के सिध्दांत की विजय के लिये सर्वहारा वर्ग- संघर्ष के सिध्दांत तथा कार्यनीति की रचना की थी। यह दोनों ही व्यक्ति इतिहास में विश्व के मेहनतकश वर्ग के विलक्षण शिक्षकों, उनके हितों के महान पक्षधरों, मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन के सिध्दांतकारों और संगठनकर्ताओं के रूप में सदैव अमर रहेंगे।

मार्क्स ने विश्व को सही ढंग से समझने तथा उसे बदलने के लिये मानव जाति और उसके सबसे ज्यादा क्रांतिकारी वर्ग, सर्वहारा वर्ग को एक महान अस्त्र का काम करने वाले अत्यंत विकसित एवं वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से लैस किया था, जिसका नामकरण बाद में उन्हीं के नाम पर- मार्क्सवाद किया गया। उसके बाद महान लेनिन ने उसे अपनी सामयिक परिस्थितियों के अनुकूल व्याख्यायित और विकसित कर सर्वहारा के स्वप्नों को अमलीभूत करने वाले राज्य – सोवियत संघ की स्थापना कर डाली। तदुपरान्त यह सिध्दांत मार्क्सवाद- लेनिनवाद कहलाया।

महर्षि मार्क्स ने ही समाजवाद को काल्पनिकता के स्थान पर वैज्ञानिक रूप प्रदान किया तथा पूंजीवाद के अवश्यंभावी पतन व साम्यवाद की विजय के लिये एक विशद एवं सर्वांगीण सैध्दांतिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

उन्होने ही अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन तथा मजदूर वर्ग की प्रारंभिक क्रांतिकारी पार्टियों का गठन किया था। इन पार्टियों ने वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा को स्वीकार किया।

उन्होने ही पूंजीवाद को नेस्तनाबूद करने और समाजवादी ढंग पर समाज के क्रांतिकारी रूपान्तरण के लिये पूंजीवादी उत्पीड़न के विरूध्द उठाने वाले मजदूरों के स्वतःस्फूर्त आंदोलनों को सचेत वर्ग- संघर्ष का रूप प्रदान किया।

मार्क्स प्रथम व्यक्ति थे जिनहोने सामाजिक विकास का नियंत्रण करने वाले नियमों की खोज के बल पर मानव कल्याण और प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति के सर्वांगीण विकास तथा सामाजिक उत्पीड़न को समाप्त करके सम्मानजनक जीवन- पध्दति के अनुरूप आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण करने के लिये मेहनतकशों को सही रास्ता और उपाय समझाया था।

मार्क्स के पहले के सामाजिक सिध्दांत नियमतः धनिक वर्ग का पक्ष- पोषण करते थे। उनसे गरीबों की बेहतरी की कोई आशा नहीं की जा सकती थी। वर्गीय समाज के संपूर्ण इतिहास में शासक और शोषक वर्ग शिक्षा, वैज्ञानिक उपलब्धियों, कलाओं और राजनीति पर एकाधिकार जमाये हुये थे जबकि मेहनतकश लोगों को अपने मालिकों के फायदे के लिये मेहनत करते हुये अपना पसीना बहाना पड़ता था। यद्यपि समय समय पर दलितों के प्रवक्ताओं ने अपने सामाजिक विचारों को परिभाषित किया था, पर वे विचार अवैज्ञानिक थे। उनमें अधिक से अधिक चमक मात्र थी, पर समग्र रूप से ऐतिहासिक विकास के नियमों की समझदारी का उनमें अभाव था। वे स्वाभाविक विरोध और स्वतःस्फूर्त आंदोलन की एक अभिव्यक्ति ही कहे जा सकते थे।

इसी दौर में आगे बढ़ रहे मुक्ति आंदोलनों को वैज्ञानिक विचारधारा की नितांत आवश्यकता थी, जिसकी भौतिक और सैद्धांतिक पूर्व शर्तें कालक्रम से परिपक्व हो चुकी थीं।

औद्योगिक क्रान्ति के दौरान उत्पादक शक्तियों के तीव्र गति से होने वाले विकास ने मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की समाप्ति और मजदूर वर्ग की मुक्ति  के ऐतिहासिक कार्य के प्रतिपादन के लिये वास्तविक आधार तैयार कर दिया था। पूंजीवाद के विकास के साथ ही एक ऐसी सक्षम सामाजिक शक्ति का उदय होगया था जो इस कार्य को पूरा कर सकती थी। उस शक्ति का नाम था- मजदूर वर्ग।

मजदूर वर्ग के हितों की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के रूप में मार्क्सवाद सर्वहारा के वर्ग संघर्ष के साथ निखरा और विकसित हुआ। पूंजीवाद के आंतरिक अंतर्विरोधों के प्रकाश में आने से यह निष्कर्ष सामने आया कि पूंजीवादी समाज का विध्वंस अवश्यंभावी है। साथ ही मजदूर वर्ग के आंदोलन के विकास से यह निष्कर्ष उजागर हुआ कि सर्वहारा ही आगे चल कर पूंजीवादी पध्दति की कब्र खोदेगा तथा नए समाजवादी समाज का निर्माण करेगा।

इस संबन्ध में लेनिन ने एक बहुत ही सुस्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होने लिखा, “ एकमात्र, मार्क्स के दार्शनिक भौतिकवाद ने ही सर्वहारा को ऐसी आध्यात्मिक गुलामी से निकालने का रास्ता सुझाया जिसमें संपूर्ण दलित वर्ग अभी तक पीसे जा रहे थे। एकमात्र, मार्क्स के आर्थिक सिध्दांत ने ही पूंजीवादी व्यवस्था के दौरान सर्वहारा वर्ग की सही नीति की व्याख्या की थी।“

सामाजिक संबंधों के विकास संबंधी विशद विश्लेषण से मार्क्स और एंगेल्स की यह समझदारी पक्की हुयी कि इन संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने, मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करने और समाजवादी समाज के निर्माण के लिये एक सक्षम शक्ति के रूप में सर्वहारा को महान ऐतिहासिक भूमिका निभानी होगी। सर्वहारा वर्ग की वर्तमान स्थिति से ही उसकी युग परिवर्तनकारी भूमिका निःस्रत होगी। पूंजीवादी शोषण के जुए से समस्त मेहनतकशों को मुक्त कराये बिना वह खुद भी मुक्त नहीं हो सकता। मार्क्स ने इस काम को सर्वहारा के वर्ग- संघर्ष का उच्च मानवीय उद्देश्य माना था, जिसका लक्ष्य मेहनतकश इंसान को पूंजीवादी समाज की अमानवीय स्थिति से मुक्ति दिलाना था।

मार्क्सवाद हमें यह भी सिखाता है कि विशुध्द वैज्ञानिक क्रान्तिकारी सिध्दांत और क्रांतिकारी व्यवहार की एकता कम्युनिज़्म की मुख्यधारा है।  क्रान्तिकारी व्यवहार के बिना, और मार्क्सवादी विचारधारा को जीवन में अपनाए वगैर, यह सिद्धान्त महज ऊपरी लफ्फाजी तथा सुधारवाद व अवसरवाद के लिये एक आवरण मात्र बन कर रह जाता है। विज्ञान और सामाजिक विकास के बारे में वैज्ञानिक द्रष्टिकोण के बिना क्रान्तिकारी कार्यवाही का पतन दुस्साहसवाद के रूप में हो जाता है जो अराजकता की ओर लेजाता है।

मजदूरवर्ग के हितों का वाहक कौन बनेगा इस पर भी मार्क्स का सुस्पष्ट द्रष्टिकोण है-

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर वर्ग के आंदोलनों के संपूर्ण इतिहास, विश्व की क्रांतिकारी प्रक्रिया तथा विभिन्न देशों में होने वाले क्रान्तिकारी संघर्षों के उतार- चढ़ाव ने अकाट्य रूप से यह साबित कर दिया है कि केवल मार्क्सवाद- लेनिनवाद के क्रान्तिकारी सिध्दांतों से निर्देशित पार्टी ही एक लड़ाकू अगुवा दस्ते का काम कर सकती है।

लेनिन ने रूस के मजदूर वर्ग के आंदोलन के शुरू में ही मार्क्स के सिध्दांतों का क्रान्तिकारी निचोड़ प्रस्तुत करते हुये लिखा था, “इस सिध्दांत का, जिसको समस्त देशों के समाजवादियों ने अपनाया है, अपरिहार्य आकर्षण इस तथ्य में निहित है कि इससे सही अर्थों में, सर्वोपरि रूप से वैज्ञानिकता और क्रान्तिकारिता का अपूर्व सामंजस्य है। इसमें उन गुणों का आकस्मिक सामंजस्य केवल इसलिए नहीं है कि उस सिध्दांत के प्रणेता के व्यक्तित्व में एक वैज्ञानिक और क्रान्तिकारी के गुणों का समावेश है, अपितु उनमें एक स्वाभाविक और अटूट समंजस्य है।“

आज कोविड- 19 के आक्रमण ने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था की निरीहता की कलई खोल के रख दी है। यह व्यवस्था अपने नागरिकों और समाज को बीमारी के प्रकोप से बचाने के बजाय विधवा प्रलाप कर रही है। पूंजीवाद ने बड़ी ध्रष्टता से संकट का भार सर्वहारा के कंधों पर लाद दिया है। दौलत पैदा करने वालों को कोरोना और भूख के हाथों मरने को छोड़ दिया है। आज अपने ही वतन में वे बेघर और बेगाने नजर आरहे हैं। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक आघात झेल रहे हैं। उनके अनुभवों ने सिध्द कर दिया है कि मौजूदा व्यवस्था में उनका वाजिब स्थान नहीं है। उन्हें इस व्यवस्था से मुक्ति हासिल करनी ही होगी। उनके मुक्तियुध्द में मार्क्सवाद ही पथ- प्रदर्शक की भूमिका निभा सकता है। यह भूमिका यह पहले भी निभाता आया है। अब यह संगठित- असंगठित मार्क्सवादियों का दायित्व है कि वे सर्वहाराओं की मुक्ति के काम को आगे बढ़ाएं। मार्ग कठिन भी है और मौजूदा दौर में खतरनाक भी। घबराइए नहीं, मार्क्स यहाँ भी आपका मार्गदर्शन करते नजर आते हैं। वे कहते हैं-

“यदि हमने अपने जीवन में वह रास्ता अख़्तियार किया है जिसमें हम मानव जाति के लिये अधिकाधिक कार्य कर सकते हैं तो कोई भी ताकत हमें झुका नहीं सकती”

 

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