Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for अक्टूबर, 2020

Image may contain: text that says "एटक शताब्दी समारोह 31 अक्टूवर, 1920-2020 AITUC 1920 2020 A Saga of Struggle and Sacrifice एटक का अतीत, वर्तमान और भविष्य अमरजीत कौर मनसचिव, एक ऑल इंडिया ट्रेड युनियन काँग्रेस प्रकारन"
Image may contain: 1 person, text
31 अक्टूबर 2020 को भारत के पहले केंद्रीय मजदूर संगठन
ष्ऑल इंडिया ट्रेड युनियन काँग्रेसष् के गौरवशाली सौ साल पूरे हुए। एटक
की स्थापना 31 अक्टूबर 1920 को मुंबई मे हुई। इस स्थापना
सम्मेलन में देश के सभी राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर
शामिल हुए थे। यह वह समय था जब देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के
खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था। जलियांवाला बाग कांड अभी
ताजा था जिसमें एक अँग्रेज आर्मी जनरल ने, बैसाखी मना रहे निहत्थे
लोगों पर अंधाधुंद गोलियां बरसा कर दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतार
दिया था। महात्मा गांधी ने तुरंत इस के बाद ब्रिटिश सरकार से असहयोग
और नागरिक अवज्ञा आंदोलन का आवाहन किया था। उस में जनता के
सभी तबके – देहात के किसान, शहरों क३
में वर्गचेतना दर्शाती हैं। पहला महायु( शुरू होने तक यह सिलसिला जारी
रहा।
1905 मे ब्रिटिश हुकूमत ने बढ़ते आंदोलन मे फूट डालने के इरादे
से बंगाल का विभाजन किया। नतीजा उलटा ही हुआ। मज़दूर और भी
तेजी से लामबंद होने लगे और अपनी संघटित ताकत स्वतंत्रता आन्दोलन
में उतारने लगे। हडतालों की लहर फिर उभरने लगी। इसमे उल्लेखनीय
छः दिन की हडताल है जो लोकमान्य तिलक को छः साल की की सजा
सुनाने के विरोध में मुंबई के मजदूरों ने 24 हे 28 जुलाई, 1908 में
की। मजदूर अंग्रेज पुलिस व अंग्रेज आर्मी से भीड़ गए।
लेनिन ने इस हड़ताल के बारे में लिखा, ष्भारतीय सर्वहारा वर्ग पहले
से ही सचेत और राजनीतिक जन संघर्ष छेड़ने के लिए पर्याप्त रूप से
परिपक्व हो चुका है, और यह मामला भारत में एंग्लो-रशियन तरीकों से
खेला जाता हैष्।
1914 से मजदूर वर्ग कई नये३
जैसा कानूनद्ध के खिलाफ हडताल हुई, जो राष्ट्रीय आंदोलन पर बहुत बड़ा
असर था। 1920 के पहले छः महिनों मे 200 हडताल हुईं जिसमें 15
लाख मजदूरों ने हिस्सा लिया। 1920 में मांगों में काम के घंटे दस हों
और महंगाई भत्ता मिलें आदि मांगे प्रमुख थी।
जुलाई 1920 से दिसम्बर 1920 तक 97 हडताले हुइंर् जिसमें
सिर्फ 31 नाकामयाब हुईं। बाकी सभी हडतालों से मजदूरों ने कुछ न कुछ
हासिल किया।
1920 में और कुछ युनियनों का गठन हुआ – जैसे जमशेदपूर लेबर
एसोसिएशन, अहमदाबाद वर्कर्स युनियन, इंडियन कोलियरी एम्प्लॉईज
एसोसिएशन, बंगाल-नागपूर रेलवे, इंडियन लेबर युनियन, ऑल इंडिया
पोस्टल त्डै युनियन, इंपीरियल बैंक स्टाफ एसोसिएशन, बर्मा लेबर
एसोसिएशन, हावड़ा लेबर युनियन, ओडिया लेबर युनियन, बंगाल अॅन्ड
नॉर्थ वेस्टर्न रेलवेमेन्स एसोसिएशन, ठठब् – प् रेलवे ३
अली जिन्ना, मिसेस अॅनी बेसंट, वि. जी. पटेल, बी. पी. वाडिया, जोसेफ
बाप्तिस्ता, लालूभाई सामलदास, जमनादास, द्वारकादास, बी. डब्ल्यू.
वाडिया, आर. आर. करंदीकर, कर्नल जे. सी. वेजवुड, जो ब्रिटिश ट्रेड
युनियन कौन्सिल के प्रतिनिधि के तौर पर सम्मेलन में शरीक हुए। 43 ऐसी
युनियन थी जो परिषद मे हिस्सा नही ले पाई लेकिन उन्होने सम्मेलन के
प्रति अपनी सहमति घोषित की थी।
लाला लाजपत राय ने बंबई शहर में 10,000 कार्यकर्ताओं के जुलूस
का नेतृत्व किया। लाला लाजपत राय ने कहा था, वर्तमान के लिए हमारी
सबसे बड़ी जरूरत संगठन, आंदोलन और कार्यकर्ताओं को शिक्षित करना
है। हमें अपने कार्यकर्ताओं को संगठित करना होगा, उन्हें उनके वर्ग के प्रति
जागरूक करना होगा और उन्हें एक समान राष्ट्र के तरीकों और हित के
बारे में शिक्षित करना होगा ”।
उन्होंने यह भी कहा कि ष्श्रम आ३
बदौलत कई कानून हासिल किये गये – जैसे वर्कमेन्स कम्पनशेसन एक्ट
1923, ट्रेड युनियन एक्ट 1926 के कानून। तब तक भी एटक का
नेतृत्व मध्यमवर्ग या बु(ीजिवीयों के हाथों में ही था। वे परोपकार की भावना
से एटक में हिस्सा लिया करते थे। साथ ही, जो मार्क्सवाद और समाजवाद
में रूचि रखते थे वे भी युनियन बनाने मे दिलचस्पी ले रहे थे। एस. ए. डांगे
ने 1922 में “सोशलिस्ट” नाम से एक अंग्रेजी प्रकाशन प्रकाशित करना
शुरू किया।
1927 में पहली बार एटक ने अधिकृत रीत से अपनी संलग्न युनियन्स
को मई दिन मनाने का आवाहन किया। 1928 से 1931 के दरम्यान
मजदूर वर्ग राजनीत के क्षेत्र में बहुत सक्रिय रहा। समाजवादी विचारधारा
के लोग स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण बनते जा रहे थे। एटक के करीब
करीब सभी संम्मेलनों में आंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधी हिस्सा लेते थे या भाईचारे
के संदेश देते ३
के हिस्सा थे, उनकी खुद की काम की जगह पर मांगे तो थी तथा विदेशो
में जहां मजदूर नात्झी-फांसीवाद के शिकार हो रहे थे, उन्हे भी सहारा देना
था।
एटक ने विश्व फेडरेशन ऑफ ट्रेड युनियन्स ;ॅथ्ज्न्द्ध की स्थापना में
अहम भूमिका निभाई। फरवरी, 1945 में लंदन मे तैयारी के लिए एक
अंर्तराष्ट्रीय सभा का आयोजन किया गया, जिस में विश्व के कोने कोने
के 67 करोड़ मजदूरों के 204 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। एटक के
प्रतिनिधि एस. ए. डांगे, आर. के. खेडगीकर तथा सुधींद्र प्रामाणिक थे। इस
सभा ने मजदूरों का एक मांगपत्र तैयार किया। आखिरकार 3 अॅक्टूबर,
1945 को ॅथ्ज्न् की स्थापना हुई।
1947 में भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। मजदूर वर्ग ने साम्राज्यवादी
शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। एटक के नेतृत्व में मजदूरों के
अधिकारों के लिए आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के लगभ्३
चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। दुनियाभर के लोगों के लिए ये उपलब्धियां
पूर्ववत हैं, उनके विकास, अर्थव्यवस्थाओं और विकास के लिए राष्ट्रों की
संप्रभुता को खतरा है।
अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी का साम्राज्यवादी डिजाइन द्वारा प्राकृतिक संसाध्
ानों पर कब्जा करने, बाजार बनाने और उस पर कब्जा करने, अधिकतम
मुनाफा अर्जित करने और दुनियाभर में अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए
आर्थिक रणनीति विकसित की जा रही है। किसी भी विरोध को विभाजित
करने, उसे समाप्त करने और दबाने की प्रवृत्ति उस डिजाइन का हिस्सा है।
शासक वर्गों के समर्थन के साथ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फासीवाद
रूझान बढ़ रहे हैं। एक देश से दूसरे देश इस तरह की योजना और
कार्यवाहियों का लक्ष्य मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया साम्राज्यवादी शक्तियों
के नीतिगत फ्रेम वर्क में रहे हैं।
भारत सरकार अंतर्राष्टी३
लगाने के नाम पर डिमोनेटाइजेशन, जीएसटी ने देश का आर्थिक परिदृश्य
बिगाड़ दिया है और सरकार की अक्षमता को उजागर किया है।
शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजीकरण के माध्यम से स्कूल और
कॉलेजों की शिक्षा पर हमले तेज हो गये हैं। शिक्षा के निजीकरण की नीतियों
के विरोध और छात्रों और शिक्षकों के असंतोष की आवाज एवं विचारों को
रौंदा जा रहा है।
लेखक कलाकार, रंगमंच के व्यक्ति, पत्रकार, स्वतंत्र विचारक और
बुद्विजीवी सभी पर हमले हो रहे हैं। भारतीय संविधान में निहित मूल
सि(ांतों को कमजोर करते हुए विपक्ष को चुप कराने की राजनीति अक्रामक
तरीके से लागू की जा रही है। लोकतांत्रिक मुल्यों, आस्था, धर्म, भाषा, जीने
के तरीकों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विविधता पर आधारित
संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत गंभीर खतरे में है।
श्रम संघ जो सामूहिकतावा३
मानवीय समस्या से लोगों को निजात दिलाने से अधिक अपने शोषण
और लाभ हेतु इस आपदा के अवसर का दुरूपयोग करने में लगा है। इस
अवधि में गैर लोकतांत्रिक और अमानवीय शासन की मजबूती हेतु शासन
निरंकुश एवं तानाशाहीपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा है। ऐसा कई अन्य देशों
में भी देखने को मिला है परंतु भारत की सरकार दुनिया की सबसे खराब
उदाहरण के रूप में सामने आयी है। रोजी के लिए पलायन किये प्रवासी
मजदूरों, छात्रों, तीर्थयात्रियों और अन्य नागरिकों जो इलाज के लिए घरों
से दूर बाहर यात्रा पर थे या अस्पताल में थे उन्हें अचानक 4 घंटा के
सूचना पर पूर्ण बंदी कर उन्हें अपने घर वापसी तक का मौका दिये बिना
कू्रर यातना का शिकार बनाया गया। इस अचानक पूर्ण बंदी ;लॉकडाउनद्ध
के कारण लाखों लोगों की नौकरी, आजीविका यहां तक कि उनका रहने
का आश्रय तक छीन लिया गया एवं भूखे-प्यासे उनके नसीब पर छोड़
दिया गया। अपने घरों को लौटने को मजबूर साधन विहीन लोगों ने जीवन
जोखिम में डाल सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल
पड़ने पर उन्हें भयानक यातना का भी शिकार बनाया गया। बच्चे, बूढ़ों,
गर्भवती महिलाओं सहित परिवार के लाखों लोग निकल पड़े एवं उनकी
दयनीय हालत पर तरस के बदले उन्हें पीटा गया, अपमानित किया गया
और उन पर रसायनिक छिड़काव, चेहरे पर काली स्याही से ‘मैं लॉकडाउन
ब्रेकर हूं’ लिखे जाने का अमानवीय कार्य हुए। उनमें से सैंकड़ों लोग भूख,
अभाव, बीमारी में चिकित्सा की कमी, शरीर में पानी की कमी के शिकार
होने व आत्महत्या से मर गए। अनकही पीड़ा को और परिवार के कमाउ
सदस्य खोने की स्थिति एवं लॉकडाउन में शासन-प्रशासन की कमियों ने
जनआवाम को भारी नुकसान पहुंचाया।
मोदी सरकार ने 19 दिसंबर को बीमारी की प्रारंभिक खबर आने से
मार्च 2020 तक के चार माह में बीमारी की गंभीरता का संज्ञान लेकर,
स्वास्थ्य एवं उपचार की आपात स्थिति से निपटने की तैयारी के बदले
नागरिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने वाले डीएमए ;आपदा प्रबंधन अधि्
ानियमद्ध लगाने का रास्ता चुना। अचानक बंदी के क्रम में डीएमए का
उपयोग करना वास्तव में सरकार की एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा
था जिसके द्वारा जनता को नियंत्रित करने के लिए इसे कानून व्यवस्था का

महामारी मजदूर वर्ग के संघर्ष के मादा को कम नहीं कर सकता है।
चिकित्सकों की सलाह को मानते हुए संयुक्त मई दिवस आयोजन सहित
कई आंदोलन किये गये हैं। 22 मई का राष्ट्रव्यापी विरोध, 3 जुलाई का
प्रतिरोध-दिवस, 9 अगस्त ;भारत बचाओ दिवस के रूप मेंद्ध, 23 सितंबर
राष्टीय विरोध दिवस आदि संघर्षों के आयोजन किये गये। केंद्रीय श्रम संघों
के हर अभियानों में भागीदारी बढ़ती गई। प्रतिरोध बढ़ रहे हैं। इस अवधि में
कोयला, बीपीसीएल, स्कीम वर्कर्स की हड़ताल की कार्रवाई आयोजित की
गई। रक्षा क्षेत्र में अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान समझौता प्रक्रिया
के क्रम में स्थगित किया गया है। ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के बीच
कार्रवाई की एकता विकसित हो रही है जो स्वागत योग्य दिशा है।
2 अक्तूबर को वेबिनार पर आयोजित केंद्रीय श्रम संघों के राष्ट्रीय
कन्वेंशन में 26 नवम्बर 2020 को एक दिवसीय राष्ट्रीय आम हड़ताल
की घोषणा की व्यापक सफलता का कार्यक्रम सामने है। हमें एटक के
शताब्दी वर्ष के अवसर पर ट्रेड यूनियनों की एकता और मजदूर, किसान
तथा आम जनता के साथ संघर्षों एवं कार्रवाईयों में एकजुटता का जमीनी
स्तर पर विस्तार का लक्ष्य पूरा करने के लिए संकल्प के साथ आसन्न
अभूतपूर्व चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम सांगठनिक शक्ति के रूप
में मजदूर वर्ग की एकता का निर्माण का लक्ष्य पूरा करना है।
हमें न्याय और समानता पर आधारित शोषणविहीन समाज के निर्माण
के संर्धष को आगे बढ़ाते हुए एटक के स्थापना के समय घोषित लक्ष्य की
पूर्ति हेतु मजदूर आंदोलन के इतिहास एवं एटक के 100 वर्षों के अनुभवों
से शिक्षा लेते हुए इस लक्ष्य की प्राप्ति की ओर आगे बढ़ने का संकल्प लेना
है।
दुनिया के मेहनतकशों एक हों
न्याय और समानता पर आधारित शोषणविहीन समाज निर्माण हेतु
मज़दूर वर्ग, किसान, छात्र, युवा-बेरोजगार एवं बु(जीवियों की
एकता जिंदाबाद।

No photo description available.

Read Full Post »

 Image may contain: 1 person, smiling
कुंवर मुहम्मद अशरफ हमारे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के योद्धा, प्रकाण्ड
विद्वान, विख्यात मार्क्सवादी इतिहासकार तथा भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के सुप्रसिद्ध नेता थे। इनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा जनवादी
आंदोलन के इतिहास का वह अध्याय है, जिससे नयी पीढ़ियां हरेक दिन प्रेरणा
प्राप्त करती रहेंगी।
आरंभिक जीवन 1
के.एम. अशरफ का जन्म उत्तरप्रदेश स्थित अलीगढ़ जिले की हाथरस
तहसील के दरियापुर गांव में 24 नवंबर 1903 को हुआ था। एक व्यक्ति
के रूप में अशरफ मिश्रित भारतीय संस्कृति के प्रतीक थे। वे मुस्लिम
राजपूत परिवार में पैदा हुए। हिन्दू तथा मुसलमान राजपूतों के कई रीति-
रिवाज एक जैसे ही थे। भिन्न धार्मिक विश्वासों के बावजूद दोनों के नाम भी
आमतौर पर एक तरह के होते थे। उन्नीसवीं शताब्दी में ठाकुर कुंॅवर
सिंह अलवर रियासत से आकर दरियापुर में बस गये। कुॅंवर सिंह को
एक बेटा हुआ जिसका नाम पड़ा ठाकुर मुराद अली खॉं। ठाकुर मुराद अली ने
कुछ अंग्रेजी पढ़ी और रेलवे में मुलजिम हो गए। पलटन में भी काम किया और
प्रथम महायु( में हिन्दुस्तान के बाहर
अफ्रीका, इराक आदि देशों में लड़े।
ठाकुर मुराद अली की शादी मथुरा
जिले के गहनपुर गांव के पॅंवारे में ठाकुर
नन्हू सिंह की लड़की अंची से हुई।
कुॅंवर मुहम्मद अशरफ उन्हीं के बेटे
थे। अशरफ तीन-चार ही साल के हो
पाये थे कि उनकी मांॅ चल बसी। पिता
के प्रति इतना गहरा स्नेह था कि बालक
को मॉं का अभाव खला नहीं।
मेधावी छात्र और राजनीति
अशरफ की पढ़ाई दरियापुर के
अपर प्राइमरी स्कूल में हुई। पिता के
बाद अशरफ पर सबसे ज्यादा असर
पंडित रामलाल का पड़ा जो उनके
शिक्षक थे। अशरफ ने 7वीं कक्षा तक
हिन्दी पढ़ी। कुछ और बड़ा होने पर
पिता ने अशरफ का अलीगढ़ धर्मसभा
हाई स्कूल में नाम लिखाया। वहॉं अपने
बहनोई के संसर्ग में उन्हें आर्य समाज
का भाषण सुनने का अवसर मिला।
लेकिन आर्य समाज की धार्मिक बातों
का बालक अशरफ पर कोई अधिक
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-28
कुंॅवर मुहम्मद अशरफः प्रकांड मार्क्सवादी
इतिहासकार और भाकपा नेता
प्रभाव नहीं पड़ा। उन दिनों आर्य समाज
राष्ट्रीय आजादी और स्वदेशाभिमान का
जबरदस्त प्रचारक था। अशरफ को
उन उपदेशों से देशभक्ति के प्रथम पाठ
उन्हें अवश्य मिले।
मुराद अली की बदली होने पर
वह मुरादाबाद आ गये, तो वहां उन्होंने
मुस्लिम हाई स्कूल में अशरफ का नाम
लिखाया। अशरफ पहले संस्कृत और
हिन्दी लेकर पढ़ रहा था। यहां
संस्कृत-हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था
नहीं हो सकने के कारण उन्हें
फारसी-उर्दू लेनी पड़ी।
अशरफ ने 1918 में फारसी के
साथ मैट्रिक पास किया। अशरफ के
दिल में देश-सेवा के विचार पनपने
लगे। दरियापुर में शंकर लाल और
ठाकुर मुराद अली के घर का बहुत
अच्छा संबंध था। शंकर लाल की भावज
ने मातृविहीन अशरफ को पुत्र की तरह
पाला था! शंकर लाल एक राजनीतिक
हत्या में लपेट लिये गये थे। इससे
बालक अशरफ की भावना का उधर
प्रेरित होना स्वाभाविक था। मौलाना
अब्दुल्ला सिद्दिकी और एनी बेसेन्ट की
नजरबंदी की खबर ने अशरफ के
राजनीतिक भाव को जगाने का काम
किया।
अशरफ 1918 में एम.ए.ओ.
कॉलेज, अलीगढ़ में दाखिल हुए। उस
वक्त इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ही
परीक्षाएंॅ ली जाती थीं। अशरफ ने अरबी
तर्कशास्त्र और इतिहास विषय अध्ययन
के लिये चुने। अशरफ मुरादाबाद में ही
एक ओजस्वी वक्ता के रूप में उभरने
लगे। अलीगढ़ आने पर बहस और
व्याख्यान का शौक और बढ़ गया।
इतिहास और दर्शन उनके प्रिय विषय
थे।
अशरफ 1920 में बी.ए. में
दाखिल हुए। इसी समय असहयोग,
खिलाफत और महात्मा गांधी की आवाज
देश में गूंजने लगी। 1921 में अशरफ
ने मौलाना मुहम्मद अली तथा अन्य
के साथ अलीगढ़ में जामिया मिलिया
कायम की जो राष्ट्रीय शिक्षा का प्रतीक
बन गया। राष्ट्रीय आंदोलन में
छात्र-जीवन से ही अशरफ खुलकर
काम करने लगे। तिलक स्वराज-फंड
के लिए चंन्दा जमा करना, खादी प्रचार
और हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रचार
अशरफ का प्रधान काम था। 1923
में उन्होंने जामिया से बी.ए. पास किया।
1924 में फिर अलीगढ़
मुस्लिम-यूनिवर्सिटी में नाम लिखाया।
मुस्लिम तसुव्वफ मुस्लिम दर्शन और
इतिहास उनके विषय थे। उन्होंने
1926 में एल.एल.बी. प्रथम श्रेणी में
पास करने के साथ ही उन्होंने यूनिवर्सिटी
में रिकॉर्ड स्थापित किया।
सक्रिय राजनीति में प्रवेश
वे 1920-21 के
असहयोग-आंदोलन में काम कर चुके
थे। 1922 में शौकत उस्मानी से
परिचय हुआ। शौकत उस्मानी ने उनसे
सोशलिज्म की बातें की। गया कांग्रेस
के बाद 1923 में कलकत्ता जाने पर
अशरफ ने मुजफ्फर अहमद और
कुतुबउद्दीन से भेंट की। 1925 में
यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय ही उनके
विचार समाजवाद की ओर कुछ
आकर्षित हुए लेकिन अब भी समाजवाद
का, उनका ज्ञान धुंधला-सा था।
1926 में एम.ए. करने के बाद वह
अलवर गये। राजा की ओर से भी
उनका सम्मान हुआ और वह राजकीय
मेहमान बनकर ठहरे। अशरफ ने
सामन्ती व्यवस्था को बहुत निकट से
देखा।
मुजफ्फरनगर में तीन माह में एल.
एल.बी. होने के बाद अशरफ ने वकालत
भी की। अलवर रियासत के महाराजा
ने अशरफ को अपनी रियासत के काम
में खींचना चाहा। अशरफ ने विलायत
जाकर और पढ़कर आने की शर्त रखी।
अलवर की राजकीय स्कॉलरशिप
लेकर, वह विलायत के लिए रवाना
हुए।
विदेश यात्रा
अशरफ 1927 में लंदन पहुंॅचे।
बैरिस्टरी की पढ़ाई शुरू की। उनकी
इच्छा हिन्दुस्तान के सामाजिक जीवन
का अध्ययन करने थी। लन्दन
यूनिवर्सिटी में 1200-1550 तक
भारत का सामाजिक जीवन ‘‘पी.एच.
डी.’’ के लिए अपना विषय चुना।
शापुरजी सकलतवाला, सज्जाद जहीर,
महमुदुज्जफर, मुहम्मद अली आदि
कितने ही भारतीयों से उनकी घनिष्ठता
हुई। अशरफ अब कम्युनिस्ट विचारधारा
के साथ पूर्णतः प्रतिब( हो गये थे।
1929 में अलवर महाराज की
जुबिली थी। अशरफ अलवर की
स्कॉरलशिप से पढ़ते थे। महाराजा का
पत्र गया और वह अलवर पहॅुंच गये।
अशरफ उस समय महाराजा के प्राइवेट
सेक्रेटरी थे। जुबिली समारोह ने अशरफ
की ऑंखे खोल दी। एक सप्ताह के
भीतर पन्द्रह लाख रुपये साफ कर
लिये गये। लार्ड इरविन उस समारोह
में भाग लेने आए थे। महाराजा के
प्राइवेट सेक्रेटरी के रूप में तीन माह में
अशरफ ने भारत के रियासती सामंतवाद
और उपनिवेशवाद को निकट से देखा।
अशरफÛ अपने विद्रोही मन को दबा
नहीं सके। महाराजा की फरमांॅबरदारी
उनके लिए असह्य हो गयी। वह अलवर
छोड़कर घर चले आये। 1930 के
शुरू में घर से रुपया लेकर अशरफ
फिर लन्दन चले गये और 1932 में
पी.एच.डी. होकर भारत लौटे।
लंदन में अशरफ मार्क्सवादी और
राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रिय हो गए।
श्रीनिवास अय्यंगर, का. अली, और
शापुरजी सकलतवाला के साथ मिलकर
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की
लंदनकमिटि का गठन किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में
वामपक्ष के नेता
1932 में भारत लौटने पर
डॉक्टर कुॅंवर मुहम्मद अशरफ सक्रिय
राजनीति में भाग लेने लगे।
1933-34 में एक वर्ष के लिए
उन्होंने मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
का काम किया। कानपुर में मजदूर
कॉन्फ्रेंस हुई। डॉ. अशरफ उसमें शामिल
हुए। मथुरा में किसानों के आंदोलन
और बेगÛारी के विरोध में होने वाले
हरिजनों के आंदोलन में उन्होंने खूब
भाग लिया। डॉ. अशरफ ने राजनीतिक
क्षेत्र में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वामपक्ष के
नेता के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्थान
प्राप्त कर लिया।
वे कांग्रेस तथा कांग्रेस सोशलिस्ट
पार्टी में शामिल हो गए।
1934 में कॉंग्रेस सोशलिस्ट पार्टी
की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जयप्रकाश
नारायण, आचार्य नरेन्द्रदेव, ई.एम.एस.
नाबूदरीपाद, डॉ. जेड.ए. अहमद,
सज्जाद जहीर, डॉ. राममनोहर लोहिया,
अशोक मेहता आदि के साथ डॉं. कुॅंवर
मुहम्मद अशरफ भी चुने गये। 1936
में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के
अवसर पर वे अखिल भारतीय कांग्रेस
कमिटी के एक सचिव चुने गये।
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं.
जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मुस्लिम
जनसंपर्क का कार्यभार सौंपा।
जवाहरलाल नेहरू द्वारा सौंपे गये
काम के लिए डॉ. अशरफ सर्वथा योग्य
थे। उन्हें फारसी तथा अरबी भाषाओं
का पूर्ण ज्ञान था। मध्यकालीन और
दर्शन के अधिकारी विद्वान थे। दो
दशकों तक वे स्वाधीनता संग्राम के
मुस्लिम नेताओं के निकट संपर्क में रहे
थे।
वे इलाहाबाद में ए.आई.सी.सी.
कार्यालय में काम करने लगे। उन्होंने
कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों के बीच
अभियान चलाया।
ए.आई.एस.एफ. से संपर्क
डॉं. अशरफ अखिल भारतीय
कांग्रेस समिति में कम्युनिस्ट दल के
प्रवक्ता बन गये। वे अखिल भारतीय
छात्र संघ ;एआईएसएफद्ध में भी
दिलचस्पी लेने लगे। अखिल भारतीय
छात्र संघ के कलकत्ता अधिवेशन
;जनवरी 1939द्ध की अध्यक्षता और
1940 में नागपुर के ऐतिहासिक
अधिवेशन का उद्घाटन उन्होंने किया।
देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र संघ
द्वारा आयोजित सभाओं में वे प्रबल
आकर्षण के केंद्र बन गये। वे ए.आई.
एस.एफ. में कम्युनिस्ट फ्रैक्शन के
इन्चार्ज भी थे। उन्होंने निर्देशन में
महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1940
में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना
अबुलकलाम आजाद के विशेष आग्रह
पर डॉ. अशरफ ने उनके सचिव के
रूप में भी कार्य किया।
दूसरे विश्वयु( के दौरान उन्हें भी
अन्य कम्युनिस्टों तथा वामपंथियों के
साथ देवली के यातना-शिविर में
गिरफ्तार कर बंद कर दिया गया। यहां
अन्य कैदियों के साथ उन्होंने तीस दिनों
तक भूख हड़ताल की। इस भूख हड़ताल
से उनका स्वास्थ्य बुरी तरह गिर गया।


1943 में जेल से रिहा होने पर
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन
केंद्रीय मुख्यालय में रहकर काम करने
लगे। पार्टी-पत्रों में लिखना और देश
के विभिन्न हिस्सों में जनता के बीच
प्रचार अभियान तक व्यस्त रहना
कामरेड अशरफ के प्रधान काम हो
गया।
विश्वयु( के बाद वे आर.डी.
भारद्वाज की बीमारी के कारण
अनुपस्थिति के बाद कांग्रेस में
कम्युनिस्ट प्रवक्ता बन गए।
यु(ोत्तर काल में जन उभार का
और पार्टी की नीतियों के सशक्त प्रचार
के रूप में संघर्ष को शक्ति पहुंचाते रहे।
1946 में वे दिल्ली आये और
दरियागंज पार्टी कम्यून में मात्र 8 रु.
मासिक और भोजन भत्ता लेकर पूरा
वक्ती की तरह काम करने लगे। कम्यून
में रहने वाले सभी नौजवान थे। डॉ.
अशरफ ही सबसे ज्यादा उम्रवाले,
सर्वाधिक अनुभवी और परिपक्व थे। वे
कम्यून जीवन में हमेशा अत्यंत विनम्र,
अनुशासित और साथियों के प्रति स्नेही
बने रहें। वे बड़े जिन्दादिल स्वभाव के
थे। हास्य, विनोदप्रियता और
हाजिर-जवाबी कूट-कूट कर भरी थी।
भारत विभाजन के बाद
 1947 में भारत विभाजन के
समय कॉ. अशरफ दिल्ली में ही थे।
उस समय की सांप्रदायिक घटनाओं और
हिंसात्मक कार्यवाईयों ने उन्हें बहुत
अस्तव्यस्त कर दिया। बंॅटवारे के बाद
हिन्दू-मुस्लिम दंगे अत्यंत लोमहर्षक
और वेदनापूर्ण थे। कॉ. अशरफ बहुत
ही संवेदनशील व्यक्ति थे। पार्टी की
दिल्ली प्रदेश कमेटी ने व्यक्तिगत सुरक्षा
के ख्याल से अशरफ और दूसरे मुस्लिम
साथियों को दरियागंज कम्यून से
हटाकर जामा मस्जिद के पास प्रांतीय
दफ्तर में जाने का आग्रह किया। जब
कॉमरेडों के पहरे में डॉक्टर कुॅंवर
मुहम्मद अशरफ कम्यून छोड़ रहे थे,
तब उनकी ऑंखों से ऑंसू की धारा
फूट पड़ी। वर्षों तक इस क्षेत्र में रहने
के बाद केवल मुस्लिम होने के कारण
उन्हें यह जगह छोड़नी पड़ रही थी।
डॉ. अशरफ विशेष रूप से दुःखी थे।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने
लंबे समय तक संघर्ष किया था।
पार्टी की शक्तियों को फिर से
गोलबंद करने और विभाजन के बाद
दंगों की वजह से जनता से टूटे संबंधों
को जोड़ने में कॉ. अशरफ ने बड़ी अहम
भूमिका अदा की। जब पार्टी-केंद्र ने
दिल्ली से उर्दू दैनिक ‘‘आवामी दौर’’
निकालने का फैसला किया तब डॉ.
कुंॅवर मुहम्मद अशरफः प्रकांड मार्क्सवादी…
अशरफ उसके संपादक और कॉ.
टीकाराम सखुन सहायक संपादक बनाये
गये। एक पार्टी हमदर्द ने धन का
इंतजाम किया और कनॉट प्लेस में
दफ्तर खोला गया। फिर भी अपने
अल्पकाल में ही ‘‘आवामी दौर’’ ने
अच्छी भूमिका अदा की और पाठकों के
बीच में अपना स्थान बना लिया।
पाकिस्तान में
‘‘आवामी दौर’’ बंद हो जाने पर
पाकिस्तान में पार्टी संगठन के लिए
1948 में पार्टी के आदेश पर के.एम.
अशरफ को जाना पड़ा। विभाजन के
बाद पाकिस्तान में पार्टी की अत्यंत
क्षति हुई। पार्टी के अनुशासित सिपाही
होने के नाते उन्होंने इस कठिन काम
को अपने हाथ में लिया। पाकिस्तान में
पार्टी पर घोर दमन हुआ। पार्टी पर
पाबंदी लगा दी गयी थी। कॉ. अशरफ
भूमिगत रहकर काम करते थे। बाद में
गिरफ्तार कर लिये गये। उन पर आरोप
था कि भारतीय नागरिक होकर
गैरकानूनी रूप से पाकिस्तान आये है।
जेल में उनकी शारीरिक स्थिति
चिंताजनक हो गई। कुछ पुराने मित्रों
के हस्तक्षेप से वे इस शर्त पर रिहा हुए
कि उन्हें फौरन पाकिस्तान छोड़ना
पड़ेगा। भारत भी उन्हें स्वीकार करने
को तैयार नहीं था। भारतीय नागरिकता
समाप्त हो गई थी।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक
महान यो(ा का कोई देश नहीं था।
कुछ मित्रों की सहायता से वे इलाज के
लिए इंगलैंड पहुंचे। जब तबीयत कुछ
सुधरी तो उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण
से मध्यकालीन भारत के इतिहास पर
ब्रिटिश संग्रहालय में शोधकार्य प्रारंभ
कर दिया। जीवन-यापन के लिए पर्याप्त
धन न होने पर भी उन्होंने कठिन परिश्रम
किया। ब्रिटिश संग्रहालय में सुबह घुसने
वाले वे प्रथम तथा शाम को निकलने
वालों में अंतिम व्यक्ति होते थे।
भारत वापसी
डॉ. कॅुंवर मुहम्मद अशरफ के मन
में इस दौरान अपने प्यारे देश भारत
लौटने की बात हमेशा उठती रही। छठे
दशक के मध्य में एक देशविहीन
नागरिक के रूप में वे भारत वापस
आये। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल
नेहरू और शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल
कलाम आजÛाद से निकट संबंध रहने
के बावजूद भारत सरकार ने उन्हें
नागरिकता देने में दो वर्ष गुजार दिये।
पं. नेहरू ने इस दिशा में बड़ी कोशिशें
कीं। कॉ. अशरफ से उन्होंने आग्रह किया
कि कश्मीर की जनता का इतिहास
लिखने की योजना में वे श्रीनगर में
रहकर काम करें। दो वर्ष बाद दिल्ली
यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में
इतिहास विभाग के अध्यक्ष बनाये गये।
डॉ. अशरफ का व्यक्तित्व मिश्रित भारतीय
संस्कृति का प्रतीक था। उन्हें अपने
भारतीयपन और राजपूत वंश परंपरा
का गौरव था। इंगलैंड से भारत लौटने
पर जब उन्होंने भारतीय नागरिकता के
लिए पं. जवाहरलाल नेहरू और मौलाना
अबुलकलाम आजाद, दोनों से भेंट कर
अपने आग्रह के लिए तर्क पेश किया
और नेहरू ने मजाक में यह कहकर
अशरफ को नाराज कर दिया कि ‘‘अब
आप भारतीय नहीं हैं।’’ इस पर डॉ.
अशरफ ने गुस्से से जवाहरलाल नेहरू
से कहा थाः ‘‘मैं आपसे ज्यादा भारतीय
हूं। मैं राजपूत हूं’’।
उन्होंने भारतीय इतिहास कांग्रेसों
में कई पेपर प्रस्तुत किए।
1969 में विश्व विख्यात हम्बोल्ट
यूनिवर्सिटी में अतिथि-प्रोफेसर के रूप
में डॉ. अशरफ बर्लिन गये। बर्लिन में
दो वर्ष के प्रवास काल में अपने प्रिय
विषय पर उन्होंने गंभीर शोध और
अध्ययन किया। ‘‘मध्ययुग में भारत
की जनता की सामाजिक और
सांस्कृतिक स्थिति’’ के अध्ययन के
लिए इस बीच मास्को और ताशकंद
भी गये। उन्होंने प्रचुर सामग्री एकत्रित
की। इतिहास लिखने के अत्यंत
महत्वपूर्ण और बहुमूल्य कार्य को
असामयिक मृत्यु ने पूरा नहीं होने दिया।
56 वर्ष की उम्र तक देश की
आजÛादी और श्रमजीवी जनता के संघर्ष
में व्यस्त रहते हुए 1962 के 7 जून
को जर्मन जनवादी गणतंत्र की
राजधानी बर्लिन में हृदयगति रूक जाने
से उनकी जीवन-यात्रा का अंत हो
गया। उनकी मृत्यु का शोक व्यापक
राजनैतिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में मनाया
गया।


डॉ. के.एम. अशरफ को अपने देश
की संस्कृति और इतिहास की खोज का बहुत शौक था। वह भारत को
राजनीतिक आजÛादी के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक
तौर पर संपन्न और विकसित देखना चाहते थे। समाजवाद उनके जीवन का लक्ष्य था।
उनका जीवन पार्टी और देश के लिए समर्पित था। उनका बलिदान, पार्टी
तथा जनता के लिए उनका योगदान कॉ. अशरफ अपने देश का एक
प्रामाणिक इतिहास लिखना चाहते थे। राजा-रानियों का इतिहास नहीं, जनता
का इतिहास, समाज का इतिहास, जीवन के हर एक अंश का इतिहास। इतिहास
संबंधी बहुत-सी सामग्री एकत्रित कर, इतिहास लिखने की जवाबदेही नयी
पीढ़ी पर सौंप कर वह चले गये। वह स्वयं इतिहास के एक विषय बन गये।

Read Full Post »

  दादा गजेन्द्र सिंह जैसी प्रतिभाएँ इस संसार में सदियों में पैदा होते हैं। वह बहुयामी प्रतिभाओं वाले व्यक्ति थे।     दादा गजेन्द्र सिंह के 9वें स्मृति दिवस पर उनके पैतृक आवास हसनापुर में आयोजित स्मृति सभा को सम्बोधित करते हुए इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लाॅयर्स के उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक परमात्मा सिंह ने कहा कि गजेन्द्र सिंह जब मैं विधायक था तब वह भी विधायक थे उन्होंने अपना सारा जीवन जनहित, सभ्य एवं आदर्श समाज के निर्माण के संघर्ष को समर्पित कर दिया था। वह एक आदर्श जनप्रतिनिधि थे। 

                           सभा की अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार महंत बी0पी0 दास बाबा ने कहा कि देश को इस समय स्व0 गजेन्द्र दादा जैसी राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिभाओं की नितान्त आवश्यकता है। रिहाई मंच के संयोजक मुहम्मद शुऐब एडवोकेट ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक समरसता पर घोर संकट है यदि हम अब भी न जागे तो देश की दशा एवं दिशा क्या होगी, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि कोरोना की आड़ में केन्द्र एवं राज्य में स्थापित साम्राज्यी शक्तियों ने जनता का बड़ी निर्दयता के साथ शोषण किया है। अध्ययन करने की बात है कि समाजवादी शासित देशों में कोरोना का प्रभाव क्यो कम रहा। भाजपा नेता उमाशंकर वर्मा उर्फ ‘‘मुन्नू भैय्या’’ ने कहा कि कोरोना का संकट देश में अभी भी बरकरार है, ऐसे में कोई ढिलाई नहीं करना चाहिए, मोदी और योगी सरकार जनहित में कार्य कर रही है। साहित्यकार डा0 विनय दास ने दादा को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वह साहित्य एवं मानव धर्म प्रेमी थे और समाज में इनके समावेश के पक्षधर थे। हिन्दी साहित्य में विद्वान डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित ने दादा गजेन्द्र सिंह के सुपुत्र रणधीर सिंह सुमन की प्रशंसा करते हुए कहा कि कम लोग हैं जो अपने पुरखों का स्मरण एवं सम्मान करते हैं, उन्होंने गजेन्द्र जी के साथ बिताए अपने स्मरणों की चर्चा की। 

                 सभा में पधारे आगन्तुकों का स्वागत करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि देश को साम्राज्यवादी शक्तियों ने दबोच रखा है और किसान, मजदूर और दबे-कुचले समाज का अस्तित्व घोर संकट में है। 

                                        वरिष्ठ पत्रकार एवं उर्दू दैनिक इंकिलाब के जिला संवाददाता मो0 तारिक खां के द्वारा संचालित स्मृति सभा में जिला टैक्स बार के अध्यक्ष पवन कुमार वैश्य, नवीन सेठ, उपेन्द्र सिंह एडवोकेट, सिटी इण्टर कालेज के प्रधानाध्यापक विजय प्रताप सिंह, रामनगर डिग्री कालेज के प्रवक्ता डाॅ0 इकबाल बहादुर सिंह, कमल सिंह चंदेल, कामरेड डाॅ0 कौसन हुसैन, डाॅ0 एस0एम0 हैदर ने भी अपने-अपने विचार रखते हुए स्व0 दादा गजेन्द्र सिंह को अपने श्रद्धां सुमन अर्पित किये। 

                               इस अवसर पर कलीम किदवई, आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष मो0 वसीम राईन, रिजवान राईन, प्रवीण कुमार, शिव दर्शन वर्मा, राम नरेश वर्मा, संजय, कृष्ण मोहन, पुष्पेन्द्र सिंह, नीरज वर्मा, विजय प्रताप सिंह, निर्मल वर्मा आदि लोग उपस्थित रहे। इस अवसर पर दादा गजेन्द्र सिंह की स्मृति में एक वाटिका का शिलान्यास परमात्मा सिंह एवं महंत बी0पी0 दास के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।

Read Full Post »

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय का उद्घाटन आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने किया .इस अवसर पर मुखविर राज और आजादी के महानायक -1 तथा लोकसंघर्ष पत्रिका के विशेष अंक का विमोचन भी किया ने किया .
आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘ मोदी सरकार किसानों के सम्बंध में जिन कानूनों का निर्माण किया है उससे किसानों का कोई भला नहीं होने वाला है । ” मण्डी समाप्त हो जाने के बाद किसानों को न्यूनतम लागत मूल्य मिलने के बजाय 1,200 रूपये प्रति कुन्टल धान खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है और आवश्यक वस्तु अधिनियम से अनाज को बाहर कर बड़े पूंजीपतियों को सस्ते दामों पर खाद्यान्न खरीद कर स्टॉक करने का जो लाइसेन्स मिल गया है उससे शहरी उपभोक्ताओं को भी महंगे दाम पर खाद्यान्न खरीदना पड़ेगा । सरकार ने संविदा खेती की अनुमति देकर गांव में रहने वाले 80 प्रतिशत गरीब पिछड़े लोगों से बटाईदारी का हक छीन लिया है । कार्पोरेट सेक्टर के लोग गांव में छोटे और मंझौले किसान जो लोगों के खेत बटाई पर लेकर जीविकोपार्जन करते थे उनका जीविकोपार्जन का साधन छीन लिया है । श्री यादव ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि बाराबंकी जिला प्रशासन ने आज से कुछ वर्ष पूर्व बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर बाराबंकी के किसानों की जमीन छीनने का प्रयास किया था , जिसका विरोध आल इण्डिया किसानसभा के पदाधिकारी होने के नाते गांव – गांव जाकर विरोध कर उस प्रस्ताव को रद्द कराया था लेकिन योगी सरकार के आने के बाद जिला प्रशासन के अधिकारी किसानों की जमीन को छीनने के लिए बाराबंकी विकास प्राधिकरण का प्रस्ताव तैयार किया है जिसका किसानसभा भरपूर विरोध करेगी और किसानों की एक इंच जमीन भी प्राधिकरण को नहीं देने देंगे । वि सान सभा आने वाले दिनो में किसानों की जमीन बचाने के लिए आन्दोल । का रास्ता अख्तियार करेगी।भारतीय कम्युनिस्टपार्टी के इस कार्यक्रम के अवसर पर पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीरसिंह सुमन ,पार्टी के जिला सचिव ब्रजमोहन वर्मा ,सह सचिव डॉ कौसर हुसेन ,शिव दर्शन वर्मा ,किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ,उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार ,गिरीश चन्द्र ,वीरेंद्र कुमार ,अमर सिंह ,महेंद्र यादव ,आशीष शुक्ला,रमेश वर्मा ,मुनेश्वर ,रामदुलारे यादव ,श्याम सिंह एडवोकेट ,अंकुल वर्मा सहित सैकड़ों लोग थे .

Read Full Post »