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Archive for मई, 2021

यज्ञदत्त शर्मा का जन्म 1 मार्च 1918 को जिला सोनीपत के
जखोली नामक गांव में हुआ था ;इस वक्त पंजाब, वर्तमान में हरियाणा। वे एक पढ़े-लिखे मध्यमवर्गीय परिवार के
थेः माता और पिता दोनों ही अध्यापक थे। माता का नाम पार्वती था और पिता का मंसाराम।
1930 में वे दिल्ली आ गए। वे अपने बड़े भाई जनार्दन शर्मा के साथ रहने लगे। उनके भाई राजनीति में सक्रिय थे। वे अपने गांव के पहले वकील थे और कांग्रेस के ब्लॉक सचिव थे। वे आगे चलकर दिल्ली की  कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन के नेता बने।
यज्ञत्त पहले दरियांगज के रामजस स्कूल में भर्ती हुए। उसके बाद उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला
लिया। 1940 में उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए. फर्स्ट क्लास में पास किया। गांव के प्रथम
एमए थे। इस कारण उन्हें रामजस कॉलेज में अर्थशास्त्र में लैक्चरर का काम मिल गया। सेंट स्टीफेंस में ही
एआईएसएफ तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भावी नेता मुकीम फारूकी भी पढ़ रहे थे। दोनों के बीच आगे चलकर लम्बे समय के लिए दोस्ती हो गई।
1936 में दिल्ली में ‘स्वदेशी लीग’ की स्थापना की गई जिसमें वाई.डी. शर्मा, शंकरा, कंवरलाल शर्मा, आदि  शामिल थे।
1936 में अगस्त में लखनऊ में एआईएसएफ ;ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना की गई। इसका
प्रभाव दिल्ली समेत समूचे देश पर पड़ा। वाई.डी. शर्मा ने नवम्बर 1936 में एआईएसएफ के लाहौर सम्मेलन में भाग लिया। नवम्बर 1936 में ही उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में स्टूडेंट्स यूनियन बनाई जिसके वे
अध्यक्ष चुने गए। साथ ही दिल्ली प्रांतीय प्रोविंशियल स्तर पर दिल्ली प्रोविंशियल स्टूडेंट्स फेडरेशन ;डीपीएसएफ या यूनियन की स्थापना की गई। दिल्ली स्टूडेंट्स यूनियन का नाम बदलकर डीपीएसएफ कर दिया गया। इसमें मीर मुश्ताक, ईश चंद्र, के पी शंकरा, कंवरलाल शर्मा, हुकम सिंह राणा, ईत्यादि विद्यार्थी थे। यज्ञदत्त शर्मा इसके
उपाध्यक्ष चुने गए। अली सरदार जाफरी भी उन दिनों दिल्ली में ही थे और एंग्लो-अरेबिक कॉलेज में थे। नवम्बर
1937 में वाई.डी. दिल्ली प्रादेशिक एसएफ के महासचिव चुने गए।
1937-41 के दौरान यज्ञदत्त दिल्ली प्रोदशिक स्टूडेंट्स फेडरेशन के महासचिव चुने गए। एसएफ का ऑफिस
उन दिनों भागीरथ पैलेस में हुआ करता। 1-3 जनवरी 1938 को मद्रास में एआईएसएफ का तीसरा सम्मेलन हुआ।
उसमें वाई.डी. शर्मा ने दिल्ली एसएफ के महासचिव के रूप में भाग लिया। उसमें वाईडी संयुक्त सचिव चुने गए।
इसके अलावा उन्होंने मध्य प्रदेश में स्टूडेंट्स फेडरेशन बनाने में सक्रिय सहयोग किया।
12 से 14 नवम्बर 1938 को दिल्ली प्रादेशिक एस.एफ का दूसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। 1 से 2 जनवरी 1940 को एआईएसएफ का पांचवां सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया। इसमें यज्ञदत्त शर्मा ने सक्रिय भूमिका अदा की। वे भाकपा के महासचिव पी.सी. जोशी तथा अन्य नेताओं से मिले। वे कम्युनिस्ट फ्रैक्शन में भी सक्रिय थे।
कम्युनिस्ट राजनीति में यज्ञदत्त शर्मा का विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति से सम्बंध था, जैसा कि हम देख आए हैं। वे एआईएसएफ में अत्यंत सक्रिय थे जैसा कि ऊपर की घटनाओं से पता चलता है। उनकी स्वभाविक संज्ञान राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर थी। दिल्ली कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक बहाल सिंह मार्च 1939 में उन्हें दर्शक के रूप में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में ले गए।
वहां कम्युनिस्टों ने ‘नेशनल फ्रंट’ के नाम से अपना अलग ग्रुप बना रखा था। वहां वाई डी शर्मा की मुलाकात पी.सी. जोशी, जेड.ए. अहमद, के.एमअशरफ जैसे कम्युनिस्टों से हुई।
2-3 जुलाई 1939 को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन हुआ। इसके आयोजनकर्ताओं में वाई.डी. शर्मा, बाबा रामचंद्र तथा अन्य के साथ शामिल थे। मीनू मसानी ने इसकी अध्यक्षता की।
1939 में ही दिल्ली में भाकपा की संगठन समिति का गठन किया गया। उस समय पार्टी गैर-कानूनी थी। बहाल
सिंह इसके सचिव बनाए गए। वे साथ ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सचिव और एआईसीसी के सदस्य भी थे।
अक्टूबर 1939 में नागपुर में अ.भा. साम्राज्यवाद-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें वाईडी.
शर्मा ने भी फारूकी, बहाल सिंह, आदि के साथ हिस्सा लिया। इस सम्मेलन के फैसलों को अमल में लाने के लिए
बहाल सिंह ने विद्यार्थी नेताओं को कांग्रेस दफ्तर में बुलाया। इसमें वाई.डी. शर्मा भी शामिल हुए।
1-2 जनवरी 1940 को दिल्ली में एआईएसएफ का पांचवां सम्मेलन हुआ।  26 जनवरी 1940 को दिल्ली में युद्ध विरोधी दिवस बड़े पैमाने पर मनाया गया। इसकी तैयारी में यज्ञदत्त बहुत सक्रिय थे। 25 जनवरी 1940 को ही डीआईआर के तहत उनपर वारंट जारी कर दिया गया। 4 फरवरी को उनके भाई जनार्दन शर्मा के घर पर छापा मार कर यज्ञदत्त शर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया। इस समय वे दिल्ली पार्टी के सचिव थे। विधिवत पार्टी बनने के बाद वे प्रथम कम्युनिस्ट थे जो पकड़े गए। तलाशी में गैरकानूनी साहित्य पकड़ा गया जिसमें केन्द्रीय पार्टी का गुप्त मासिक ‘कम्युनिस्ट’ भी था।
यज्ञदत्त को जमानत पर छुड़ाया गया। तब उन्होंने एमए की परीक्षा दी, वे प्रथम श्रेणी में पास हुए। सरकार को
अपनी ही कमियों के कारण मुकदमा वापस लेना पड़ा। कुछ ही दिनों पहले इंद्रजीत गुप्त सेंट स्टीफेंस कॉलेज से
पास होकर निकल चुके थे। दिल्ली में पार्टी के गैर-कानूनी अखबार और साहित्य के वितरण का जिम्मा वाई.डी. का था। यह साहित्य इंद्रजीत गुप्त और अरूण बोस लाया करते। साप्ताहिक ‘‘नेशनल फ्रंट’’ 50-80 तक बंटता था।
एमए पास करने के पास वाईडी रामजस कॉलेज में पढ़ाते हुए ीी पार्टी और एआईएसएफ में सक्रिय रहे।
जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में एआईएसएफ ने दिल्ली में विद्यार्थियों की हड़ताल संगठित की।
इसमें यज्ञदत्त बड़े ही सक्रिय रहे। वाईडी शर्मा ने एआईएसएफ के नागपुर सम्मेलन ;दिसम्बर 1940 में सक्रिय हिस्सा लिया। वे ‘कम्युनिस्ट फ्रैक्शन’ में सक्रिय थे। वे कहते हैं कि शाह ग्रुप को रोकने के लिए कम्युनिस्ट
ग्रुप ने एम. फारूकी को खड़ा किया। फारूकी दिल्ली वि.वि. के ‘ग्वायर मामले’ में सुप्रसिद्ध हो चुके थे। मौरिस
ग्वायर वाइस-चांसलर थे। उनका पुतला जलाने के बाद फारूकी की डिग्री छीन ली गई थी। 24 से 26 मई 1941 को दिल्ली प्रदेश एसएफ का तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन प्रो. रणधीर सिंह ने किया
और अध्यक्षता के.एम. अध्यक्ष थे। जुलाई 1939 में दिल्ली में तीन दिनों का ‘समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ आयोजित किया गया। 1941 में देहरादून में भी स्कूल हुआ। इनमें वाईडी ने भाग लिया।
31 दिसंबर 1941 को पटना में एआईएसएफ का 7वां सम्मेलन हुआ। इसमें वाईडी शर्मा भी गए। अप्रैल 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स के दिल्ली आगमन पर वाईडी फारूकी और के एम अहमद ने उनसे मुलाकात की। इस समय वाईडी ने दिल्ली पार्टी में राजनैतिक शिक्षा का काम संभाल रखा था। उन्होंने ‘अध्ययन मंडलियों’ में कई क्लास लिए।
24 जुलाई 1942 को पार्टी पर पाबंदी हटाए जाने के बाद उसने खुले तौर पर काम करना आरंभ किया। वाईडी.
फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन में भी सक्रिय हो गए।
सितंबर 1942 में बम्बई में पार्टी का एक विशेष ‘प्लेनम’ ;अधिवेशन हुआ। इसमें वाईडी ने दिल्ली पार्टी की संगठन
समिति के सचिव की हैसियत से भाग लिया। दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने दिसंबर 1943 में वाईडी को कॉलेज में नौकरी से निकलवा दिया। इससे पहले दिल्ली ने एआईएसएफ के साथ मिलकर 1942 का जुलूस चांदनी चौक में
निकाला। वाईडी पार्टी सचिव थे। इस जुलूस पर लाठी चार्ज, आंसू गैस और गोलियों का प्रयोग हुआ।
मई 1943 में वाईडी और बहाल सिंह भाकपा की प्रथम कांग्रेस ;1943 में भाग लेने बम्बई गए। इसके बाद दिल्ली पार्टी का प्रथम सम्मेलन 23 से 25 जनवरी 1944 को गांधी ग्राउंड में सम्पन्न हुआ। वाईडी शर्मा सचिव और फारूकी सह सचिव चुने गए। लेकिन सरकार ने दिसंबर 1943 में उन पर पाबंदी लगा दी थीऋ इसलिए वे किसी भी
गतिविधि में भाग नहीं ले पाते थे। 12 दिसंबर 1943 को गांधी ग्राउंड में हजारों लोगों की एक विशाल सभा हुई जिसे बहाल सिंह, मोहम्मद यामीन और वाई डी शर्मा ने सम्बोधित किया। इसमें बंगाल के महा-अकाल, जापानियों के आक्रमण और अन्य प्रश्नों पर अंग्रेज सरकार की आलोचना की गई।
जुलाई 1944 में वाईडी को प्रांतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। 1945 में उन्होंने पार्टी की ओर से दिल्ली म्युनिसिपल कमिटि के चुनाव लड़े। 1946 के जनसंघर्षों में वाईडी ने सक्रिय ीूमिका अदा की। वे
डाक-तार कर्मचारियों के संघर्ष में गिरफ्तार कर लिए गए। दिसंबर 1946 में उन्होंने गाजियाबाद में रेलवे मजदूरों की हड़ताल को संगठित किया। दरियागंज में दिल्ली पार्टी कम्यून में ही भाकपा की केन्द्रीय समिति की बैठक
इन 1947 में हुई। यह वाई डी का मकान था। इसके अलावा बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक थेन जो पत्रकार थे, नियमित वाई डी से मिला करते। इस बीच भयानक दंगे हुए। इसमें वाई डी शर्मा तथा अन्य साथियों ने दंगा पीड़ितों के राहत के लिए सक्रिय कार्य किया।
आजादी के बाद
15 अगस्त 1947 को देश को मिली आजादी का पार्टी ने स्वागत किया। बाद में 1948 में बीटी रणदिवे लाइन के पार्टी पर हावी होने के बाद वाई डी शर्मा, फारूकी, सरला शर्मा तथा शकील अहमद को नेतृत्व से हटा दिया गया।
वाई डी शर्मा को 4 मार्च 1949 को गिरफ्तार कर दिया गया। अगस्त 1949 में जब पहली पत्नी के निधन पर उन्हें पैरोल पर छोड़ा गया तो पार्टी के आदेश पर भूमिगत हो गए। वे 20 मार्च 1951 तक भूमिगत रहे, फिर आत्मसमर्पण करने पर जमानत पर छोड़ दिए गए। 1951 में उन्होंने बम्बई में अ.भा. सम्मेलन में भाग लिया। अक्टूबर 1952 में एशिया-पैसिकल शांति सम्मेलन में भाग लेने बीजिंग गए। 1951 में वाई डी शर्मा ने गुप्त अ.भा. पार्टी समायोजन ;कलकत्ता में भाग लिया। इसमें पार्टी नीति में परिवर्तन हुआ। अजय घोष के सुझाव पर वे भाकपा की केन्द्रीय समिति में चुने गए। 1957 में उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में चुना गया। वे छठी पार्टी कांग्रेस ;1961, विजयवाड़ा तक लगातार राष्ट्रीय परिषद में चुने जाते रहें
1953 में उनका विवाद दिल्ली पार्टी की जानी-मानी नेता सरला शर्मा से हुआ।
ट्रेड यूनियन आंदोलन में
1952 के बाद वाई डी शर्मा ने अपना अधिकतर समय ट्रेड यूनियन तथा मजदूर आंदोलन में लगाया। पहले भी वे टीयू का काम कर चुके थे। उन्होंने तेल और प्रोट्रोलियम उद्योगों के मजदूरों, खासकर पब्लिक सेक्टर में बड़ा काम
किया। वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ माने जाने लगे। खासकर एस ए डांगे के साथ मिलकर उन्होंने भारत तथा सोवियत संघ, समानिया, पोलैंड, आदि देशों में तेल की खदानों, उसकी सफाई तथा उत्पादन का गहरा अध्ययन किया। उन्होंने अन्य साथियों के साथ मिलकर भारत सरकार को इनसे संबंधित कई सुज्ञान दिए। वे पेट्रोलियम वर्कर्स यूनियन के निर्माताओं में थे। तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करवाने में उनकी अहम भूमिका रही।
इसके अलावा उन्होंने इंजीनियरिंग, चाय, टायर, बीमा, होटल,आदि क्षेत्रों के मजदूरों एवं कर्मचारियों के बीच भी काम किया। 1954 में वे एटक की राष्ट्रीय परिषद में चुने गए। 1973 से 1987 के बीच ने एटक के सचिव और बाद
में उपाध्यक्ष रहें वे 15 वर्षों तक दिल्ली टीयूसी के सचिव और अध्यक्ष रहे। उन्होंने दूकान कर्मचारियों के लिए कानून बनवाने और उन्हें संगठित करने का महत्वपूर्ण काम किया।
भारत की स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर वाई डी शर्मा का स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु 11 जनवरी 2004 को हो गई

 -अनिल राजिमवाले

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 चन्द्र सिंह का जन्म एक साधारण किसान परिवार में 25 सिंबर 1891 को आजकल के उत्तराखंड में हुआ
था। उनका जन्म गढ़वाल में श्री जाधली सिंह भंडारी के परिवार में ग्राम सैणी मेरा मासा, पट्टी चौथान तहसील
थालीसैण, जिला गढ़वाल में हुआ था। गढ़वाल में पढ़ाई की कोई व्यवस्था न होने के कारण चंद्र सिंह को सामान्य
शिक्षा ही मिल पाई। अपनी मां के बारे में चंद्र सिंह ने लिखा है कि वह अनपढ़ होने के बावजूद गुणों से भरपूर थी।
चंद्र सिंह के अंदर जो कुछ भी गुण थे, ने उनकी माता की ही देन थे।
जहां बालक चंद्र सिंह का जन्म हुआ वहां प्रकृति भरपूर और सुंदर थी, बुरांज और पांगर ;चेस्टनटद्ध तथा अन्य
पेड़, फल-फूल और पास की हरी चादर चारों ओर मनोरम दृश्य बिखरेती थीं।
चंद्र सिंह की पढ़ाई ज्यादा आगे नहीं हो पाई। उनकी पहली शादी बचपन में ही हो गई। च्रद्र सिंह ने बचपन में
ही सामंती दुरूह प्रथाओं को देखा तथा राजाओं और उनके गुर्गों के अत्याचारों के दर्शन किए। उसने स्वयं  ‘वारदास्त’ प्रथा के तहत अंग्रेजों का अत्याचार कई बार सहा। इस प्रथा के तहत जब कोई राजकर्मचारी, यहां तक कि चपरासी भी गांव में आता तो उसकी हर तरह से आवभगत करना गांववालों का कर्तव्य हो जाता, रहने-खाने का
इंतजाम, अलग कमरा बनाना, बर्तन साफ करना, अच्छे से अच्छे पकवान और खाना बनाना एवं खिलाना आदि.।
यदि इन सबमें थोड़ी भी चूक हुई तो फिर मत पूछिए क्या-क्या भूगतना पड़े।
सचं चंद्र सिंह को रास्तों पर काफी दूर तक जाना पड़ा था।
प्रथम विश्वयुद्ध और फौज में
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया। इसमें बड़ी संख्या में गढ़वालियों को भर्ती किया जा रहा था। अंग्रेज उन्हें तथा अन्य भारतीयों को बड़ी संख्या में फौज में भर्ती करके मोर्चो पर भेज रहे थे। फौजियों का बड़ा सम्मान था और ‘वारदास्त’ प्रथा के अनुसार उनका बड़ा सम्मान किया जाता। चंद्र सिंह को भी फौजी वर्दी में अन्य गढ़वालियों
के समान घूमने का मन हुआ। उनके गांव के भी दो-तीन फौज में थे जो टेढ़ी टोपी लगाकर घूमा करते। उन्होंने
चंद्र सिंह से कहा कि तुम भी फौज में भर्ती हो जाओ, यहां कहां फंसे हुए हो। अच्छा खाना-कपड़ा मिलेगा और मुफ्त
में देश-विदेश की सैर करोगो! 1 सितंबर 1914 को भर्ती करने वाला हवलदार चंद्र सिंह के गांव आया।


चंद्र सिंह का घर पहला ही था। पिता के हुक्म पर चंद्र सिंह ने चूल्हा-चौका,  बर्तन का इंतजाम कर दिया ताकि
हवलदार अपनी रसोई खुद बनाए क्योंकि उसने कहा था कि वह खुद ही बनाएगा। बात-बात में हवलदार चंद्र
सिंह को फौज में भर्ती करने के लिए राजी हो गया। चंद्र सिंह चुपचाप बिना माता-पिता को बताए 3 सितंबर की
तड़के सुबह पहले कनियार गांव और दूसरे दिन ढाईजोली पहुंच गया। 11 सितंबर को चंद्रसिंह हवलदार तथा अन्य
रंगरूटों के साथ कालोडांडा लैन्सडाउनद्ध पहुंच गए। उसे 2/39 गढ़वाली राइफल्स की छठी कम्पनी के 12वें सेक्शन में रखा गया। पिता को बाद में मालूम हुआ और वे भागते-दौड़ते बेटे को देखने आए। 1914 में सिपाही को कुल 14 रूपए मासिक मिला करते। इस बीच छुट्टी मिलने पर चंद्र सिंह गांव भी हो आया और मां से भी मुलाकात हो गई। माता-पिता दोनों ने आर्शीवाद दिया और देश के लिए लड़ने की कामना की।
फ्रांस की लड़ाई में
6 जुलाई 1915 को दो अंग्रेज अफसरों और 75 जवानों के साथ चंद्र सिंह बम्बई के लिए ट्रेन से रवाना हो गए। रास्ते में ही सैनिकों को हैजा हो गया। 15 दिनों के ‘क्वारंटीन’ के बाद वे फिर चल पड़े। बम्बई के विक्टोरिया बंदरगाह में एक रात विश्राम करने के बाद उन्होंने दूसरे दिन दोपहर में ‘कोकनाडा’ जहाज पकड़ा। उसमें कुल 700 जवान थे जो फ्रांस जा रहे थे जिनमें वे 300 लैंसडाउन से थे।
1 अगस्त 1915 को ‘कोकनाडा’ ने भारत भूमि छोड़ी। अदन और पोर्ट सईद रूकते हुए भूमध्यसागर पार करके
जवाज 14 अगस्त को मारसेई, फ्रांस पहुंचा।
चंद्र सिंह को लगातार नए अनुभव होते जा रहे थे। सैनिकों को गंदी मालगाड़ियों में भर-भर कर लड़ाई के मोर्चो पर रवाना किया जा रहा था। कुछ ही बाद चंद्र सिंह और उनके साथियों ने जर्मनों के खिलाफ खंदकों में रहते हुए भयानक युद्ध में भाग लिया। कई गढ़वाली मारे गए।इस भयानक युद्ध का वर्णन राहुल ने अपनी पुस्तकों
में किया है। इन दो महीनों आठ दिनों में अनुभवों से चंद्र सिंह काफी परिपक्व हो गए।
देश-वापसी
अक्टूबर 1915 में चंद्र सिंह समेत बड़ी संख्या में जवान जहाज में वापस लौटे। उनमें वे दो को अंग्रेजों ने ‘विक्टोरिया क्रास’ पदक भी दिए। बीच में कुछ समय पोर्ट सईद में रहना पड़ा और खाइयां खोदनी पड़ी। वे सभी
फरवरी 1916 में बम्बई और फिर लैन्सडाउन लौटे।
मेसोपोटामिया का युद्ध1917
इस बीच चंद्र सिंह लांस-नायक और 12वीं प्लाटून के चौथे सेक्शन के कमांडर बन गए। मार्च 1917 में गढ़वाली पलअन को बसरा, ईराक लड़ने के लिए भेज दिया गया। इस बार चंद्र सिंह तथा अन्य जवानों को भयानक गर्मी में लड़ने का अनुभव हुआ। सितंबर 1917 में उन्होंने रमादी के युद्ध में भाग लिया। इस बार तुर्को के साथ लड़ाइ्र हुई जो जर्मनों के साथ थे। इन और पिछली चंद्र लडाइयों में चंद्र सिंह बाल-बाल बच गए। थोड़ी देर के लिए वे बंदी भी बना लिए गए। फिर बगदाद की लड़ाई हुई। 1917 में चंद्र सिंह तथा कई अन्य वापस भारत आ गए। उनकी पहली
पत्नी का देहान्त हो गया  फिर उनकी दूसरी शादी भी हो गई।
राष्ट्रीय आंदोलन की लहर
चंद्र सिंह को सहारनपुर स्टेशन पर तीन दिनों की ड्यूटी गार्ड की लगाई गई। उनकी निगरानी में दो राजनैतिक
कैदी थे जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ संघर्स में हिस्सा लिया था। उनमें चंद्र सिंह को बहुत सी जानकारियां मिलीं और इस प्रकार राजनीति से प्रथम परिचय हुआ। चंद्र सिंह ने अंग्रेजों द्वारा देश में कुछ अच्छा काम करने की बातम कही तो उनमें से बूढ़े बाबा ने कहा कि मेरा बेटा भी फौज में हैः ‘हो सकता था वह तुम्हारे बूढ़े बाप को इसी तरह कैद में रखता। क्या यह तुम्हें अच्छा लगता?’’ बात चंद्र सिंह को जंचने लगी।
इन तीन दिनों में चंद्र सिंह के दिमाग में उथल-पुथल मच गई। उन्हें एक नई रोशनी दिखाई दी जिसमें दुनियाकुछ और ही नजर आने लगी।
1916 में पं. गोविन्द बल्लभ पंत, पं. हरगोविन्द पंत, पं. बद्रीदत्त पांडे इने कुमाऊ परिषद का गठन किया। इस
संगठन ने बेगार प्रथा के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन छोड़ दियां 1914 में नैनीताल की एक सभा में गांधीजी को बुलाने के लिए 25 लोगों का डेप्यूटेशन नागपुर भेजा गया। गांधीजी आ तो नहीं पाए लेकिन अपना आर्शीवाद भेजा। अल्मोड़ा में बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया। पुलिस बंदोबस्त के बावजूद पुलिस को गोलियां चलाने
की हिम्मत नहीं हुई। ‘महात्मा गांधी’ की जय’ के नारे गूंजने लगे।
विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद फौजें तोड़े जाने लगीं और सैनिक घर लौटने लगे। फ्रांस के युद्ध में 13 हजार
गढ़वाली बलि चढ़े थे। उनके परिवार आर्थिक तथा अन्य संकटों से गुजर रहे थे। पहाड़ों में और समूचे देश में आर्थिक संकट गहरा रहा था। भूख, हैजा, प्लेग, मलेरिया, दरिद्रता फैल रही थी।
र्क हवलदारों को सिपाही बना दिया गया। उनमें चंद्र सिंह भी थे। उन्होंने तथा अन्य ने विरोध कया। चंद्र सिंह
गांधीजी से मिलने देहरादून जाने लगे लेकिन वे जा चुके थे। फिर वे जगाधरी गए। वहां बड़ा जलसा था। गांधी से
भेंट नहीं हुई लेकिन जिनसे भेट हुई, जैसा कि बाद में पता चलता, मोतीलाल नेहरू थे। चंद्र सिंह ‘गांधी जी की फौज’ में शामिल होना चाहते थे। मोतीलाल ने कहा, पहले अपनी पलटन से नाम कटाओ, फिर कांग्रेस में भर्ती कर लिया जाएगा। अन्यथा फौज में रहते हुए भर्ती होने पर फौज कड़ी सजा देगी।
सितंबर 1920 में 10/18 रायल गढ़वाली राइफल्स गठित की गई जिसमें चंद्र सिह को ड्रिल-नायक बनाया
गया। दिसंबर 1921 से 1923 तक वे वजीरिस्तान ;पश्चिमोत्तर प्रांत की लड़ाई में शामिल हुए। वे लांस-हवलदार बनाए गए। फिर कम्पनी क्वार्टर-मास्टर बनाए गए। वापस लैंसडाउन लौटने पर वे आर्यसमाज के प्रभाव में आ गए। साथ ही उन्होंने दैनिक अखबार नियमित पढ़ना शुरू किया और फौज में अंग्रेजी पढाई आगे बढ़ाई। इस बीच अखबारों से उन्हें कानपुर बोलशेविक षडयंत्र केस के बारे में काफी जानकारी मिलने लगी। इनमें एस ए डांगे तथा अन्य साथियों के बारे में तथा रूसी क्रांति एवं मजदूर-किसान राज के बारे में जानकारी मिली। वे अपने साथियों के
साथ मिलकर फौज में गुप्त मीटिंगें करने लगे और कांग्रेस में शामिल होने की तैयारी करने लगे।
1929 में उन्हें खैबर-दश जाना पड़ा। उन्हें हवलदार-मेजर बनाया गया।
वापस लौटकर कामेश्वर में गांधीजी की सभा में लिया। गांधीजी सामने ही बैठे थे। गांधीजी ने उन्हें टोपी दी। उसे
पहनकर चंद्र सिंह ने प्रतिज्ञा की कि मैं इसकी कीमत चुकाऊंगा। खूब तालियां मिलीं। गांधीजी ने कुमाऊं में ‘स्वराज भवन’ की नींव डाली। कुमाऊ से कुली-प्रथा उठ गई थी। 12 मार्च 1930 को डांडी मार्च के साथ गांधीजी ने नमक सत्याग्रह आरम्भ कर दिया।
ऐतिहासिक पेशावर कांड-1930
2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को पेशावर के हरिसंह लाइन्स में तैनात किया गया था। अन्य सैनिक
भी भारी संख्या में तैनात थे। बात यह थी पेशावर में नमक सत्याग्रह के सिलसिल में कांग्रेस की ओर से व्यापक
आंदोलन छेड़ दिया गया था और भारी सभा होने वाली थी। चंद्र सिंह की बटालियन पेशावर से 22 मील की दूरी पर डाक गांव, चरत छावनी में रखी गई थी। अप्रैल ;1930 में उसे पेशावर स्थानांतरित कर दिया गया।
12 अप्रैल की आमसभा में विदेशी सामान और शराब का बहिष्कार तथा दूकानों को शाही बाग में कांग्रेस की
मीटिंग हुई। चंद्र सिंह की दिलचस्पी और गतिविधियों की रिपोर्ट फौजी कमान को लगातार मिल रही थी।
22 अप्रैल की शाम तक स्पष्ट हो गया कि कम्पनी को 23 तारीख की आमसभा पर गोलियां चलाने का हुक्म
मिल सकता है। शाम की गिनती हो जाने के बाद चंद्र सिंह तथा अन्य ने अपने खास आदमियों की एक गुप्त
बैठक की। इसमें प्रत्येक कम्पनी का एक-एक आदमी आया। बैठक में तय किया गया कि सैनिक कांग्रेसियों पर
गोली चलाने का हुक्म मानने से इन्कार कर देंगे। वे हर तरह के नतीजे भुगतने को तैयार थे। बैठक में उपस्थित थेः शेर सिंह, नारायण सिंह, केदार सिंह, दौलत सिंह, रामकृष्ण सिंह और चंद्र सिह भंडारी। आगे अन्य जिम्मेदारियां बांटी गई।
23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती खुदाई
खिदमतगारों तथा कांग्रेस की आमसभा हो रही थी। 23 अप्रैल ;1930द्ध को सबेरे सात ‘ए’ कम्पनी को ‘फाल-इन’ तैयारद्ध होने का हुक्म मिला। कप्तान ने कम्पनी के 72 सैनिकों को शहर चलने का हुक्म सुनाया और बाकी 36
को लाइन में ही रहने का। इन बागियों में चंद्र सिंह भी थे अब उनके सामने दुविधा यह थी कि शहर कैसे जाएं। उन्होंने कप्तान बी. पॉवेल से कहा कि सैनिक पानी ले जाना भूल गए हैं। समझाने से पॉवेल ने इजाजत दे दी और चंद्र सिंह खच्चरों पर पानी लादकर शहर चल पड़े।
वे काबुली दरवाजा पहुंचे जहां 72 जवान तैनात थे। च्रद्र सिंह ने कम्पनी कमांडर को रिपोर्ट कीः ‘‘पानी के खच्चर
कम्पनी के पीछे खड़े हैं। जब जरूरत हो तो पानी मंगवा लें।’’ फिर चंद्र सिंह कम्पनी के हेडक्वार्टर में साहब के साथ
बैठ गए। शहर में एक गोरा मोटरसाइकल पर गश्त लगाने वाला जलकर मर गया है, नौजवानों ने पेट्रोल छिड़ककर उसे आग लगा दी थी। रिकेट ने सिपाहियों से उसे बचाने को कहा लेकिन कोई आगे नहीं आया।
उधर किस्सारवानी बाजार में लोग इकट्ठा हो रहे थे, तिरंगे फहराए जा थे, मकानों पर भीड़ जमा हो रही थी। राष्ट्रीय झंडे के चारों ओर वीर पठान खड़े थे। एक सिख नेता ने भाषण शुरू किया, नारे गूंजने लगेः ‘महात्मा गांधी की जय’, वगैरह। वे सैनिकों के बिल्कुल नजदीक थे। संगीनों की तीखी नोकें अब झंडों और पठानों की ओर झुकती जा रही थी। स्वयंसेवक सैनिकों को समझा रहे थे। कैप्टन रिकेट हट गया। उसने गोली चलाने की धमकी दी। रिकेट को गोली चलाने की इजाजत लेकर एक गोरा अर्दली आ गया।
कैप्टन रिकेट की धमकियों के बावजूद जनता टस से मस नहीं हुई। उसने गढ़वाली सैनिकों को फायर करने का हुम्म दे दिया। चंद्र सिंह ठीक रिकेट के बाई ओर खड़े थे। चंद्र सिंह ने जवाबी आदेश में चिल्लाकर कहा ‘‘गढ़वाली सीज फायर!’’ ;गढ़वालियों, गोली मत चलाओ!द्ध इसके बाद एक के बाद एक ‘सीज फायर’ के आदेश घूम गए। गढ़वालियों ने अपनी-अपनी राइफलें जमीन पर खडी कर दीं। एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बंदूक एक पठान को देकर कहाः लो भई, अब आप हमें गोली मार दो!’
कैप्टन रिकेट ने चंद्र सिंह से कहा-क्यों यह सब क्या है? चंद्र सिंह ने उत्तर दियाः ‘‘हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते।’’ फिर तो रिकेट ने गोरे सैनिकों को बुला लिया। इसके बाद तो एक और ‘जलियावाला कांड’ हो गया।
30 गोरों की एक प्लाटून ने अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। एक ट्रेंच मोटर ने चलते हुए दो मशीनगनों से फायरिंग कीं उसके नीचे छह लोग कुचल दिए गए।फिर लोगों ने उसे आग लगा दी और चार अंग्रेजो जल मरे। मैदान और गलियों मे तड़फडाती लाशें भर गईं। अंग्रेजों ने  कितनी ही लाशों ट्रकों में ीरकर काबुल नदी में फेंक दी। लोग गलियों, मकानों, छतों से बोतल, कुल्हाड़ी, बक्सा जो हाथ आया वही लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़े। कैप्टन टिकेट बुरी तरह कुल्हाडी से घायल हो गया लेकिन बच गया।
स्वयं गढ़वाली सैनिक भी घायल हुए, चंद्र सिंह भी बच निकले। लेकिन जल्द ही फौजी और सामान्य लोगों ने चंद्र
सिंह को घेर लिया और खूब शाबाशियां देने लगे। पेशावर में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई।
24 अप्रेल को िर गढ़वालियों को शहर कूच करने का आदेश दिया गया।
इस बार यदि कोई हुक्म न माने तो उसे वहीं तत्काल गोली मार देने का आदेश जारी किया गया। चंद्र सिंह और
उनके साथियों को निहित्या करके एक स्थान पर घेर कर रख दिया गया था। लेकिन इस बार फिर चंद्र सिंह के
नेतृत्व में गढ़वाली सैनिकों ने तय किया कि वे शहर जाएंगे ही नहीं, भले ही मार दिए जाएं। चंद्र सिंह ने याद दिलाया कि 1919 में जालियांवाला बाग कांड में नं. 6 गोरखा बटालियन ने और 1921 के मोदला विद्रोह में 1/18
रायल गढ़वाली रायफल्स ने जुल्म किए थे। इसलिए यहां कांग्रेसियों पर जुल्म करने के बजाय जान दे देंगे। फिर चंद्र सिंह ने गायत्री मंत्र पढ़कर देशभक्ति का संकल्प किया।
ज्यादातर ट्रकें खाली रहीं। जो थोड़े से चढ़े भी वे धिक्कार और नारों के दबाव से उतर आए। इस बीच 67
जवानों ने संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर कर फौज से इस्तीफा दे दिया। पहला नाम चंद्र सिंह भंडारी का था। ‘इंकलाब
जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे। शाम तक गढ़वालियों की निहत्थी बटालियन गिरफ्तार की जा चुकी थी। इन सभी को ऐबराबाद ;पेशावरद्ध में नजरबंद कर दिया गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।
हवलदार चंद्र सिंह भंडारी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उनका तथा 38 अन्य का कोर्ट मार्शल हुआ,
16 को लम्बी सजाएं सुनाई गईं। कई कैदियों को काबुल से ले जाया गया और तार से घरकर रखा गया।
चंद्र सिंह को एक अत्यंत ही तंग कालकोठरी में रखा गया।
आखिरकार चंद्र सिंह को आजीवन कारावास के लिए 12 जून 1930 को एबटाबाद जेल भेज दिया गया। यह एक सेल ;कोठरीद्ध में रखा गया जिसमें तीन पीट चौड़ा, साढ़े छह फीट लम्बा और डेढ़ फीट ऊंचा चबूतरा का जो लगभग सारी जगह घेरता था। इसी में आटा पीसने की चक्का और टट्टी-पेशाब की जगह थी। वहां हर तरह के कीडे-मकोडे इकट्ठा थे।
दूसरे दिन उनके पैरों में बेड़ियां पहनाई गईं। ;13 जून 1930 को ये बेड़ी-डंडा पूरे छह साल लगातार रहीं और 21 जुलाई 1936 को ही बरेली सेन्ट्रल जेल में खोली गई। इस बीच चंद्र सिंह ने कई बार भूख-हड़ताल की। वे 11 साल, 3 महीने और 16 दिन लगातार जेलों में रहे।
कम्युनिस्टों से संपर्क
इसके बाद उन्होंने विभिन्न जेलों की यात्रा कीः नैनी, लखनऊ, अल्मोड़ा, देहरादून, इ.। इस बीच युक्त प्रांत में
कांग्रेस सरकार आ गई थी जिससे स्थिति में काफी सुधार आया। चंद्र सिंह का काफी सम्मान था। उनकी मुलाकात
कम्युनिस्टों समेत विभिन्न नेताओं से हुई, जैसे यशपाल, रमेश चंद्र गुप्ता, ज्वाला प्रसाद गुप्त, जवाहरलाल नेहरू,
जयबहादुर सिंह, सुभाष बोस, आचार्य नरेन्द्र देव, पं. सुंदरलाल, इत्यादि।
इस बीच मार्क्सवाद और कम्युनिज्म में रूचि बढ़ती गई और वे लगभग कम्युनिस्ट हो गए। उनका नाम भी ‘बड़े
भाई’ पड़ गया।
जेल से मुक्ति ;1941
चंद्र सिंह ‘गढ़वाली’ ;भंडारी उर्फ बड़े भाई को 20 साल ;आजन्म कारावास की सजा मिली थी। इसमें छह साल का रेमिशन मिला। इसके अलावा अन्य रेमिशन भी मिले। 26 सितंबर 1941 को उन्हें 11 वर्षों के कुछ अधिक निरंतर कारावास के बाद रिहा कर दिया गया। लेकिन उन पर गढ़वाल न जाने का प्रतिबंध लगा दिया गया।
20 अक्टूबर को नेहरू जी के कहने पर वे आनन्द भवन, कांग्रेस कार्यालय, इलाहाबाद चले गए। वहीं उनका परिवार-पत्नी और बच्ची-रह रहे थे। उनकी कई सभाएं आयोजित की गईं। फिर वे गांधीजी के आमंत्रण
पर वर्धा आश्रम चले गए। उन्हें गांधीजी को नजदीक से देखने का मौका मिला। 942 की जुलाई में वे इलाहाबाद
लौट आए, फिर परिवार सहित बनारस।
बीएचयू के विद्यार्थियों ने 1942 के आंदोलन में बड़ा आगे बढ़कर भाग लिया था। विद्यार्थियों की एक सभा में
उन्हें जबर्दस्ती बिठा लिया गया। डाके एन गैरोला अध्यक्ष थे। वे बड़े भाई को पकड़कर मंच पर ले गए और उनका
परिचय पेशावर कांड के वीर नेता के रूप में दिया। विद्यार्थी इतने जोश में आ गए कि उन्होंने चंद्र सिंह को ‘कमांडर इन चीफ’ और डा. गैरोला को ‘डिक्टेटर’ नियुक्त किया। चंद्र सिंह भूल गए कि उनकी बच्ची बीमार है
और पत्नी की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है।
बस, चंद्र सिंह विद्यार्थियों को 1942 के आंदोलन में तार काटने, पटरियां उखाड़ने, इ. की ट्रेनिंग देने में लग गए। आए दिन जुलूस, प्रदर्शन और हड़तालें होने लगीं। चंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 6 अक्टूबर
1942 को उन्हें 7 ;सातद्ध साल की सजा सुनाई गई। उन्हें मिर्जापुर जेल भेज दिया गया जहां 6 सौ के करीब
राजबंदी थें चारों ओर चंद्र सिंह तथा पेशावर कांड की चर्चा होने लगी। वे कम्युनिस्ट पार्टी के बाकायदा मेम्बर नहीं बने थे लेकिन पार्टी को अपनी ही पार्टी मानते थे। इलाहाबाद में वे जेड.ए. अहमद और हाजरा बेगम से मिले भी थे।
मिर्जापुर जेल में दो नौजवान कम्युनिस्ट जिनसे उनका दृष्टिकोण ही बदल गया। नैनी जेल में कई राष्ट्रीय
नेताओं से मिले। शिव वर्मा से भी मिले। कम्युनिस्ट पार्टी में 1945 की बरसात में उन्हें रिहा कर दिया गया। जेल से छूटते ही साथी यशपाल के पास लखनऊ उनके घर चले गए। प्रदश्े के कांग्रेसियों से चंद्र सिंह का मोहभंग होने लगा। भाकपा के महासचिव पी सी जोशी से पहले से ही जान पहचान थी। उनसे सम्पर्क किया।
जोशी ने सौ रूपए भेजे और कहा कि बाल-बच्चों का इंतजाम करके आ जाओ।
बम्बई पार्टी हेडक्वार्टर में चंद्र सिंह ने पी सी जोशी से मुलाकात की और वहां रहने लगे। जोशी ने उन्हें 42
पुस्तकों का ढेर दिखाकर कहा कि ये सब तुम्हें पढ़नी पड़ेंगी। ‘पढ़ो और परीक्षा दो’’ का समय आ गया। जोशी बीच-बीच में सवाल पूछते और लेक्चर देते। यह क्रम छह महीनों तक चलता रहा। फिर उन्हें मजदूर सभाओं में भेजा
जाने लगा। कम्यून में लगभग 72 साथी थे। पार्टी शिक्षा का काम खत्म हुआ।
1945 में नेत्रकोना ;बंगाल में
अखिल भारतीय किसान सभा सम्मेलन में जोशी चंद्र सिंह को अपने साथ ले गए। वहां से वे आंध्र गएं जगह-जगह
‘‘चंद्र सिंह बाबा की जय’’ हो रही थी। विजयवाडा में सुदरैय्या से मुलाकात हुई। फिर बम्बई वापस आने पर वारली
आदिवासियों में काम किया। अब ‘बड़े भाइ्र्र’ चंद्र सिंह गढ़वाली को पार्टी सदस्यता के योग्य समझा गया। छह पर छोटी सी बैठक में जोशी ने पार्टी कार्ड दिया। रणदिवे तथा अन्य साथी भी थे।
चंद्र सिंह को वापस लखनऊ भेजा गया।
गढ़वाल प्रवेश
1946 में चंद्र सिंह को लखनऊ से प्रादेशिक पार्टी ने काम करने रानीखेत भेजा। 1946 में सारे देश में सीमित
चुनाव हुए जिसमें अंतरिम सरकार बनी। उसी ने संविधान तैयार करने का काम आरंभ किया। कम्युनिस्ट पार्टी ने
भी अपने उम्मीदवार खड़े किए। पार्टी ने चंद्र सिंह को खड़ा करने का फैसला किया। इसके लिए नगेन्द्र सकलानी,
ब्रजेन्द्र तथा अन्य साथियों ने उन पर प्रतिबंध हटवाने की कोशिशें आरम्भ कर दी। चंद्र सिंह को कोर्ट-माश्रल के
फैसले की कापी पाने के लिए युक्त प्रांत, लखनऊ, देहरादून वगैरह में बेइन्तहा भागदौड करनी पड़ी।
22 दिसंबर 1946 को चंद्र सिंह कोटद्वार पहुंच गए, 17 वर्षों बाद अपनी मातृभूमि लौटे थे। चारों ओर उनका भारी स्वागत हुआ। चंद्र सिंह नामजदगी पत्र तभी दाखिल कर सकते थे जब गवर्नर अनुमति दे। गवर्नर का अनुमति पत्र
समय से आधा घंटा बाद आया। यह सब जानबूझकर किया गया था। पार्टी ने प्रगतिशील उम्मीदवार का समर्थन
तय किया। कांग्रेस से डा. के एन गेरोला को खड़ा किया गया था। चंद्र सिंह, सकलानी तथा अन्य साथियों ने डागैरोला का प्रचार किया।
पार्टी संगठन और टिहरी राज के
खिलाफ आंदोलन

पौड़ी पार्टी का केन्द्र बना। ब्रजेन्द्र, चंद्र सिंह, सकलानी, इ. साथियों ने खूब काम किया। अकाल की स्थिति में
पार्टी ने संघर्ष किया। बड़ी संख्या में सहकारी समितियां गठित की गईं। नगेन्द्र सकलानी ने टिहरी रियासत के
खिलाफ संघर्ष छोड़ दिया। वे 11 जनवरी 1948 को शहीद हो गए।
मोलू सिंह भी शहीद हो गए। चंद्र सिंह ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। जनाजा कई दिनों तक पहाड़ी
रास्तों पर हजारों की भीड़ में चलता रहा। दोनों की अर्थियां जुलाई गईं।
चंद्र सिंह ने घोषणा कीः ‘‘अब टिहरी स्वतंत्र है।’’
बीच में कुछ व्यक्तिगत कारणों से चंद्र सिंह गढ़वाली ने पार्टी सदस्यता छोड़ दी। 1952 में पीसी जोशी कोटद्वार आए। उनकी कोशिशों तथा अन्य परिस्थितियों के कारण चंद्र सिंह फिर पार्टी मेम्बर बन गए।
अगस्त 1979 में वे कोटद्वार में बहुत बीमार पड़ गएं लम्बी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु 1 अक्टूबर 1979
को दिल्ली में हो गई। 1994 में उनकी याद में डाक टिकट जारी किया गया। गांधीजी ने कहा थाः ‘‘मेरे पास चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश कभी का आजाद हो गया होता।’’

-अनिल  राजिमवाले

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साथी पुरुषोत्तम मौर्य  का निधन हो गया ,श्री मौर्य एआईएसएफ, वाराणसी इकाई के अध्यक्ष थे। बीएचयू में दक्षिण डेलिगेसी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। बाद में, उन्हें बीएचयू कर्मचारी संघ के महासचिव के रूप में चुना गया। इस तरह, स्वर्गीय पुरुषोत्तम मौर्य बीएचयू में छात्रों और फिर कर्मचारियों के मशाल बने रहे।  काशी विद्यापीठ व  यू पी कॉलेज में भी कार्य किया था.उनका निधन 6.05.2021को हो गया था

श्री वाईएस लोहित, राष्ट्रीय महासचिव,इंडियन एसोसिएशन लायर्स ने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से और साथ ही समिति की ओर से उनके दुखद निधन पर शोक व्यक्त करता हूं।

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शनिवार, 8 मई 2021

जगन्नाथ सरकार का जन्म 25 सितम्बर 1919 को उड़ीसा के पुरी में हुआ था। वहां उनके पिता डा अखिलनाथ सरकार असिस्टेंट सर्जन के पद पर थे। उनकी माता का नाम बीनापाणि था। कहा जाता है कि वहां के मंदिर का रथ का कार्य उनकी मां पवित्र कार्य के रूप में करती थी  जब जगन्नाथ सरकार पेट में थे।
इसीलिए उनका नाम ‘जगन्नाथ’ पड़ गया। सुप्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार उनके चाचा थे।
पटना का पी एम सी एच टेम्पल मेडिकल स्कूल के रूप में स्थापित किया गया था  उसे 1925 में ‘प्रिंस ऑफ
वेल्स मेडिकल कॉलेज’ का रूप दिया गया।  डा. ए एन सरकार को बिहार और उड़ीसा का असिस्टेंट सर्जन बनाया
गया था और वे 1924 में पटना आ गए। वे जदुनाथ सरकार के घर आ गए।
1931 में जगन्नाथ की पढ़ाई पटना के राममोहन राय  ;स्कूल में हुई। 1935 में जगन्नाथ ‘डिस्टिन्क्शन’ के साथ मैट्रिक पास हुए। वे लगातार फर्स्ट रहे। फिर आईएससी के लिए पटना साइन्स कॉलेज में उन्हें भर्ती कर दिया गया। जगन्नाथ ;रोल नं. 13  के नाम से प्रसिद्ध हो गए। वे पटना कालेज में पढ़ा करते।
उनके साथ सुनील मुखर्जी, अली अशरफ तथा अन्य साथी भी थे। उन दिनों पटना और बिहार में ए आई एस एफ
का उभार हो रहा था। उपर्युक्त दोनों नेताओं तथा चन्द्रशेखर सिंह एवं अन्य विद्यार्थी नेताओं के रूप में उभर रहे
थे।
जगन्नाथ सरकार ए आई  एस एफ में सक्रियता से जुड़ गए। जल्द ही वे पार्टी के सम्पर्क में आ गए। कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल पहले तो भकपा की ओर से पी सी जोशी तथा सी एस पी ;कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी की ओर से जयप्रकाश नारायण में परस्पर समझौता किया था कि बिहार में भाकपा का गठन नहीं किया जाएगा। लेकिन जल्द ही मतभेद उभर आए और 1939 में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी की कमिटी का गठन कर लिया गया। अभी जगन्नाथ  दा औपचारिक रूप से पार्टी से जुड़े नहीं थे। फिर भी ने लगातार विभिन्न नेताओं के सम्पर्क में बने हुए थे। उन्होंने जगन्नाथ दा को पार्टी में शामिल होने का अनुरोध किया लेकिन जगन्नाथ दा ने कहा कि  एम ए की परीक्षा के बाद शामिल होंगे।
जल्द ही जगन्नाथ सरकार बिना परीक्षा में बैठे पार्टी में शामिल हो गए हालांकि अभी होलटाइमर नहीं बने थे।
यह 1940 की बात है। पटना के कदमकुआं के एक अंधेरे-से कमरे में तीन सभी इकट्ठा हुआ। जगन्नाथ
सरकार, सुरेन्द्र शर्मा जो विद्यार्थी में और अजीत मित्र जो ‘राष्ट्रीय क्रांतिकारी’ थे और मिदनापुर से थे।
अंतिम दोनों पहले ही सदस्य बन चुके थे। तीनों को मिलाकर पटना शहर में पहली बार भाकपा का ‘सेल’ स्थापित
किया गया। मीटिंग में  अली अशरफ उपस्थित थे। इस समिति का गठन मुंगेर में किया गया था।
उस वक्त पार्टी गैर-कानूनी थी। जगन्नाथ सरकार को ‘अंडरग्राउंड टेक’ की जिम्मेदारी दी गई। वे ‘गुप्त पता’ का जिम्मा निभा रहे थे। बम्बई हेडक्वार्टर तथा अन्य जगहों से सारा पत्र-पत्राचार तथा अन्य जगहों से सारा पत्र-पत्राचार, सूचना का अदान-प्रदान उन्हें के जरिए होने लगा। कूरियर का काम करने वालों में बेगूसराय के देवकी नंदन सिंह, हिलसा के फुलवंत प्रसाद और मुंगेर के हरि सिन्हा थे।
26 जनवरी 1940 को पटना, छपरा, दरभंगा, भागलपुर, मुंगेर तथा अन्य जगहों में विद्यार्थियों की व्यापक
हड़ताल हो गई। डालमियानगर के मजदूरों ने भी हड़ताल कर दी। अनुभव की कमी के कारण कई साथी पकड़ लिए गए, जैसे सुनील मुखर्जी, राहुल सांकृत्यायन, विश्वनाथ माथुर, बी बी मुखर्जी, रतन राय, आदि।
नई प्रादेशिक संगठन समितियांगठित 
1940 में बम्बई से पी सी जोशी ने एक ‘कूरियर’ भेजा जिसने जगन्नाथ दा को सूचित किया कि वे सदस्यों की लिस्ट भेजें। एक अन्य कूरियर के जरिए जोशी ने जगन्नाथ सरकार को आदेश दिया कि वे तुरन्त अंडरग्राउंड होकर कलकत्ता पहुंच जाएं-जहां उनकी पार्टी संगठनकर्ता के रूप में ट्रेनिंग होनी थी। जगन्नाथ सरकार एमए की परीक्षा छोड़कर चुपचाप घर से निकलकर कलकत्ता पहुंच गए।
वे वहां भवानी सेन उन्हें हर दिन सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास पर लेक्चर देने लगे। उसके बाद उन्हें
प्रश्न दिए जाते थे जिनका लिखित जवाब देना होता था। बाद में उनके साथ नृपेन चक्रवर्ती और पांचू गोपाल
भादुरी भी आ गए। भवानी सेन द्वारा पढ़ाई पूरी होने के बाद सोमनाथ लाहिरी के लेक्चर गुरू हुए। उन्होंने संगठन और अंडरग्राउंड कार्य पर विस्तृत लेक्चर दिए। इस बीच पार्टी ने ‘जनयुद्ध’  “पीपुल्स वार “सोमनाथ लाहिरी ने कहा कि अब इस विषय पर क्लासें लेना संभव नहीं है, समय नहीं है, इसलिए उन्होंने एक मोटा सा दस्तावेज थमा दिया।
लाहिरी ने पॉलिट ब्यूरो सदस्य की हैसियत से बिहार की एक नई प्रदेशिक समिति गठित कर दी जिसके सदस्य
थे 5 मंजर रिजवी, श्यामल किशोर झा, योगिन्द्र शर्मा और जगन्नाा सरकार।
सभी की सहमति से 1941में जगन्नाथ सरकार को सचिव बनाया गया । इस बीच वे गिरिडीह से आए और वहां गुप्त रूप से मीटिंग कीं। वे इस पद पर 1942 तक रहे।
केन्द्रीय समिति  के  प्रतिनिधि के रूप में सरदेसाई अक्सर ही बिहार जाया करते। एस जी सरदेसाई
से जगन्नाथ दा की मुलाकात पार्टी में भर्ती होने से पहले से ही थी। जगन्नाथ दा ने उन्हें पहली बार कलकत्ता के
एआईसीसी की मीटिंग में देखा जहां जगन्नाथ  सामान्य दर्शक के रूप में गए थे। सरदेसाई के चाचा इतिहासकार
जी एस सरदेसाई जगन्नाथ के चाचा सर जदुनाथ सरकार थे गहरे दोस्त थे। 1946 में उन्होंने सी सी की रिपोर्टिंग की जिसका बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सी सी के ‘मार भगाओ’ प्रस्ताव से साथियों
को अवगत कराया। उसका जगन्नाथ दा पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसे वे बाद में भी याद करते रहे। इसके बाद
जगन्नाथ दा मजदूरों में काम करने गिरिडीह चले गए। वहां उन्होंने मुख्यतःखदान मजदूरों में  काम शुरू किया।
वहां उन्होंने कोयला खदान मजदूर यूनियन में काम किया। वहां चतुरानन मिश्र, शरत पटनायक, कृपा सिंधु
खुंतिया बगैर काम कर रहे थे।
कोयला खदान मजदूरों को भयावह गरीबी से ऊपर उठाना और संगठित अपने-आप में एक अतयंत ही दुरूह
कार्य था। जगन्नाथ सरकार ने चपलेन्दु भट्टाचार्य तथा अन्य सक्रिय नेताओं के साथ काम किया। वहां कई हड़तालों में भाग लेने का मौका मिला।
गिरीडीह में जगन्नाथ दा झरिया कोयला खदान क्षेत्र में काम करने गए।
‘बीटीआर लाइन’ का दौर
15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली जिसका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पुरजोर स्वागत किया। पी सी जोशी के नेतृत्व में पार्टी ने सारे देश में रैलियां, मीटिंगें और जुलूसों के जरिए आजादी की स्वागत किया।
लेकिन 1947 के अंत और 1948 के आरम्भ में पार्टी पर ‘बीटीआर लाइन’ हावी हो गई जिसने पार्टी को बर्बाद कर दिया। पार्टी ने ‘यह आजादी झूठी है’ का नारा अपनाते हुए भारत में ‘सशस्त्र समाजवादी क्रांति’ का आह्वान कर दिया। तीन वर्षों के भीतर भाकपा की सदसयता 90 हजार से घटकर 9 हजार पर आ गई।
1949 में जगन्नाथ सरकार तथा बिहार के कुछ अनय साथियों को कलकत्ता तथा बिहार के कुछ अन्य साथियों को कलकत्ता आने का आदेश दिया गया। उस वक्त पार्टी हेडक्वार्टर बम्बई से कलकत्ता ले जाया गया था।
जगन्नाथ सरकार, इद्रदीप सिन्हा और योगींद्र शर्मा छिपकर कलकत्ता पहुंचे। वहां जाने के लिए उन्होंने
अजीबो गरीब तरीके अपनाए जैसे अपने नाम पर टिक नहीं लेना, बीच में ही इधर-उधर कहीं उतर जाना,आदि । वे
आरंभ में कलकत्ता के बाग बाजार में जगन्नाथ दा के चाचा के घर में ठहरे। फिर कुछ अन्य जगहों से घूमते-घामते, ठहरते आखिरकार उन्हें एक टूटी-फूटी मस्जिद ले जाया गया। वहां स्वयं बीटी रणदिवे  उनसे मिले। उन्होंने नई पार्टी लाइन विस्तार से समझाते हुए 9 मार्च 1949 को होने वाली रेलवे हड़ताल का महत्व बताया। बी टी आर ने कहाः
‘‘रेलवे हड़ताल का आरमभ देश में क्रांति का आरंभ होगा।’ फिर उन्होंने उन्हें वापस जाने के लिए कहा।
लेकिन रेलवे हड़ताल बुरी तरह विफल रही और ‘समाजवादी क्रांति’ दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आई।
जगन्नाथ दा अपने साथियों के साथ रेलवे लाइनें देखते रहे और पाया कि सारी ट्रेनें दौड़ रही हैं! ‘बीटीआर’ बड़े नाराज हुए और जगन्नाथ सरकार तथा अन्य साथियों से रेलवे हड़ताल की विफलता का कारण पूछा और यह भी पूछा कि उसके लिए कौन-कौन से साथी जिम्मेदार हैं। ऐसा उन्होंने सारे देश किया। जगन्नाा दा तथा अन्य साथियों ने केन्द्र को अपनी रिपोर्ट भेज दी।
इस बीच जगन्नाथ सरकार मुजफ्फरपुर गए और कृष्ण कुमार खन्ना नामक विद्यार्थी नेता के ‘डेन’ में
जाने को हुए। लेकिन वहां चन्द्रशेखर सिंह गिरफ्तार हो चुके थे। जब जगन्नाथ दा वहां पहुंचे तो चारों ओर
पुलिस का पहरा पाया। जगन्नाथ दा भुट्टे के खेत में छिपकर बैठ गए लेकिन पकड़े गए। उन्हें कलकत्ता जेल भेज
दिया गया। वे रांची जेल में भी रखे गए थे।
जेल में राजनैतिक क्लासें लेने में वे आगे रहा करते। उस वक्त बिहार पार्टी के सचिव विनोद मुखर्जी थे। उनके
आदेश पर जेल से निकल भागने का फैसला किया गया। जगन्नाथ दा सहमत नहीं थे फिर भी उन्हें मानना पड़ा।
तैयारियां हो गई, सीढी, सिपाहियों का बेहोश करने की दवा का इंतजाम, खिड़की काटने की आदि .। लेकिन
इसे मुल्तवी करना पडा। इस बीच कॉमिन्फार्म’ ;मास्को से प्रकाशित पत्रिका ‘फॉर ए लास्टिंग पीस, फॉर पीपुल्स डेमोक्रेसी’ का सुप्रसिद्ध सम्पादकीय आया। वह ‘बीटीआर’ की समझ से मेल नहीं खाता था। इसके अलावा पार्टी के अंदर भारी नुकसान उठाने के बाद विरोध के स्वर तेज हो गए। नेतृत्व परिवर्तन की मांग की जाने लगी। बीटीआर की जगह पहले तो सी राजेश्वर राव और फिर अजय घोष ;1951 में  महासचिव बनाए गए।
इस बीच जगन्नाथ दा जेल से रिहा कर दिए गए। पार्टी लाइन अब बदल चुकी थी। जगन्नाथ सरकार ने बिहार
की पार्टी को पुनः खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बिहार में पार्टी ने चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया।
1952 जगन्नाथ सरकार 1952-56 के दौरान फिर बिहार पार्टी सचिव बनाए गए। उनके कार्यकाल में बिहार में पार्टी द्वारा बहुत सारी गतिविधियां की गईं। 1955 में पटना के बी एन कॉलेज के सामने पुलिस फायरिंग में दीनानाथ पांडे मारे गए। इसके विरोध में सारे बिहार में प्रतिरोध-आंदोलन फूट पड़ा। भाकपा की पहल पर सर्व-दलीय समिति का गठन किया गया जिसके नेतृत्व में सारे बिहार में व्यापक आंदोलन छिड़ गया।
1950 के दशक में पटना तथा बिहार में एआईएसएफ ने कई राजनैतिक क्लासें लगाईं जिनमें जगन्नाथ सरकार ने प्रभावशाली लेक्चर दिए। जगन्नाथ सरकार फिर 1967 से 1978 तक बिहार पार्टी सचिव रहे।
1967 के आम चुनावों के बाद बिहार में ‘संविद’ सरकार बनी जिसके मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद थे। यह एक मजत्वपूर्ण और जटिल दौर था जिसमें जगन्नाथ सरकार ने सूझ-बूझ का परिचय दिया। सरकार में भाकपा की ओर से तीन मंत्री शामिल किए गए थेः इंद्रदीप सिन्हा, चन्द्रशेखर सिंह और तेजनारायण झा। लगभग हर दिन नई घटनाएं होती थीं और शक्ति संतुलन बदलता रहता। इस दौर और अगले दौर में जगन्नाथ दा के नेतृत्व का सारे बिहार पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका  सम्मान बढ़ा ।
जगन्नाथ दा का रूप  शांत, काफी लचीला और संतुलित हुआ करता। वे जनसभाओं में इतने प्रभावशाली वक्ता नहीं थे लेकिन पार्टी मीटिंगों में उन्हें बड़े ही ध्यान से सुना जाता। उनकी देखरेख में बिहार की पार्टी एक प्रभावशाली और शक्तिशाली ताकत बन गई।
1974-75 का बिहार में ‘जे पी आंदोलन’ तथा उसकी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ बिहार और समूचे भारत में बड़ी चुनौती थी। जयप्रकाश नारायण सी एस पी के जमाने में कम्युनिस्टों के नजदीकी मित्र थे हालांकि जल्द ही उन्होंने कम्युनिस्ट-विरोध अपना लिया। वे जगन्नाथ दा को बहुत अच्छी तरह जानते थे। 1974 आते-आते जे पी ने आरएसएस से हाथ मिला लिया और ‘पार्टी-विहीन जनतंत्र’ का नारा दे दिया। उनकी संयोजन समिति के संयोजक आरएसएस के नानाजी देशमुख थे।
इस तुफानी दौर से जगन्नाथ सरकार ने बड़ी खूबी से पार्टी को आगे बढ़ाया और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी शक्तियों को बिहार में रोक दिया और पीछे धकेल दिया।
जगन्नाथ दा की देखरेख में और उनकी पहल पर बिहार पार्टी ने ‘दैनिक जनशक्ति’ का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने डी ए राजिमवाले जीवनी  लेखक के पिता से कहाः ‘‘हम जनशक्ति अखबार चलाने के लिए एक ईमानदार, समर्पित और कड़ी मेहनत करने वाला कामरेड चाहिए। इसलिए आप अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दीजिए और होलटाइमर के रूप में अखबार का चार्ज ले लीजिए ।’’ उन्होंने नौकरी से तुरन्त इस्तीफा दे दिया।
जगन्नाथ सरकार के समय में बड़ी संख्या में शिक्षक और बुधिजीवी पार्टी में आए। पार्टी  में डा. ए के सेन उनके गहरे सहयोगी थे। डा. सेन पार्टी  और बिहार में पार्टी के जाने-माने डाक्टर और बुधिजीवी थे। पार्टी ने उन्हें 1969 के
मध्यावधि चुनावों में पटना पश्चिम से असेम्बली के लिए खड़ा किया। उनके समर्थन में जनता उमड़ पड़ी। वे भारी बहुमत से जीत गए। वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन जगन्नाथ दा की लगातार कोशिशों के फलस्वरूप उन्हें मानना ही पड़ा। पटना में ‘नागरिक मंच’ की गतिविधियों को भी उनका बड़ा समर्थन रहता। 1968 में पटना में भाकपा का महाधिवेशन आयोजित किया गया। यह बड़ा आयोजन था। उसकी तैयारी में जगन्नाथ सरकार ने अथक परिश्रम किया।
केन्द्रीय सचिव मंडल ;सेक्रटेरिएट में
बाद में जगन्नाथ सरकार भाकपा के केन्द्रीय सचिव मंडल में शामिल किए गए। वे बिहार छोड़कर आना नहीं चाहते थे लेकिन उन पर काफी दबाव डाला गया। वे केन्द्र में इस पद पर कभी भी सहज नहीं रह पाए। एक वक्त उनका नाम महासचिव पद के लिए भी लिया जा रहा था।
सोवियत संघ का पतन और जगन्नाथ दा
इस बीच सोवियत संघ तथा पूर्वी योरप के देशों में समाजवादी सत्ताओं का पतन हो गया। इन घटनाओं ने जगन्नाथ दा को पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया। वे उन कुछ नेताओं में थे जो खुले  दिमाग से सोवियत संघ और समाजवाद पर विचार और बहस करने को तैयार थे। उन्होंने समाजवाद और पार्टी संबंधी कई स्थापित प्रस्थापनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाया। उन्होंने स्तालिनवाद की आलोचना की। वे पार्टी में इन प्रश्नों पर खुली बहस चाहते थे।
जगन्नाथ सरकार ने कई सारे लेख और पुस्तकें लिखीं। उनकी पत्नी नीलिमादी निरंतर उनके काम में उनके साथ रहीं। उनकी मृत्यु 8 अप्रैल 2011 को पटना में हो गई। वे उससे कुछ वर्ष पहले आंशिक मस्तिष्क-घात के कारण बीच-बीच में बीमार रहा करते।
-अनिल राजिम वाले

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