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Archive for the ‘अनिल राजिमवाले’ Category

अभी हाल ही में (जून 2009 में) रूस के येकातेरिनबर्ग नामक शहर में ‘ब्रिक’ देशों का शिखर सम्मेलन हुआ। ‘ब्रिक’ का अर्थ है: ब्राजील, रूस, इण्डिया (भारत) और चीन। इन देशों के अंगे्रजी नामों के पहले अक्षरों को मिलाकर ब्रिक बनता है। इसके अलावा शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद ही शंघाई सहयोग समिति (एस0सी0सी0) की बैठक भी हुई। यह देशों का मिलाजुला संगठन हैं जिसमें रूस, चीन और भारत शामिल हैं।
उपर्युक्त सम्मेलन आज के विश्व और वैश्विक अर्थतंत्र में विकासमान देशों की बढ़ती भूमिका दर्शाते हैं। द्वितीय विश्व यु़द्ध के बाद साम्राज्यवादी संकट के फलस्वरूप अधिकतर पिछड़े देश आजाद होते चले गये। लेकिन इन नये आजाद देशों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी आर्थिक पिछड़ेपन की, जो उन्हें राजनैतिक तौर पर भी स्थिर नहीं होने दे रही थी।
पिछड़े और विकासमान देशों की एक सम्पूर्ण श्रेणी ही उभर आई जिन्हें सबसे बड़ा खतरा साम्राज्यवाद से था। इन पिछड़े देशों के सामने कृषि, उद्योगों, भारी मशीनों, यातायात, बाजार, अर्थतंत्र इत्यादि के विकास की समस्याएं मँुंह बाए खड़ी थीं। संसाधन, स्रोत, धन एवं पूँजी तथा तकनीक कहाँ से आयेगी? ऐसे में समाजवादी देश सहायता को आगे आये। गुट निरपेक्ष आंदोलन का जन्म हुआ।
विकास की रणनीति:-
अपने अर्थतंत्रों का विकास करने के लिए पिछड़े देशों ने नई रणनीति अपनाई। इसलिए उन्हें विकासमान देश भी कहते हैं। कुल मिलाकर यह रणनीति समाजवादी देशों के साथ मिलकर अपने पैरों पर खड़े होने की अर्थात आत्मनिर्भरता की रणनीति थी। इसलिए यह साम्राज्यवाद विरोधी नीति थी और है। साम्राज्यवाद, खासकर अमरीकी साम्राज्यवाद, कभी भी नहीं चाहता है कि कोई भी विकासमान देश आर्थिक तौर पर मजबूत हो और आत्म निर्भर बने। इन विकासमान देशों में भारत भी शामिल है। उसकी आर्थिक और विदेश नीति हमेशा ही साम्राज्यवाद विरोध की रही है।
युद्धोत्तर काल में पिछले लगभग पाँच से छह दशकों में विकासमान देशों में भारी परिवर्तन आया है। यह गुणात्मक परिवर्तन है, बिल्कुल जमीन आसमान का। एक समय था जब इन पिछडे़ देशों को कर्जों और सहायता की भारी जरुरत हुआ करती थी। दुनिया में उनकी छवि सहायता माँगने वालों की थी। लोगों को विश्वास तक नहीं था कि वे कभी इस स्थिति से निकल भी पाएंगे।
बदलती भूमिका-
लेकिन आज समय बदला हुआ है। आज भी विकासमान देशों के सामने कई समस्याएँ हैं, लेकिन आज वे न सिर्फ सहायता पाते है बल्कि कई देशों को सहायता देने भी लगे है। आज विकासमान देश बड़े पैमाने पर निर्यात कर रहे हैं जबकि कुछ ही समय पहले तक वे बड़े पैमाने पर आयात करते थे। आज वे न सिर्फ कच्चे मालों का बल्कि मशीनों तथा अन्य तैयार मालों का बड़े पैमाने पर निर्यात करने लगे हैं। भारत के कम्प्यूटर प्रोग्राम, कारें, मशीनें, कपड़े तथा अन्य सामान यूरोप और अमरीका के बाजारों में छाए हुए हैं, इसी प्रकार चीन के भी विकासमान देशों की पूँजी दूसरे देशों में लग रही है। विकासमान देश डब्लू0टी0ओ0 का महत्वपूर्ण गुट बनाते हुए अमरीका के विरूद्ध एकता कायम कर रहे हैं। इस कार्य में ब्राजील, भारत, चीन समेत कुल बीस देशों का गुट विश्व अर्थतंत्र में प्रभावी भूमिका अदा कर रहा है।
आज विकासमान देशों की विकास दर विकसित देशों से कही आगे निकल गई है। जहाँ विकसित देशों की दरें 2 प्रतिशत से 4 प्रतिशत के बीच हैं वहीं भारत चीन तथा कुछ अन्य विकासमान देश 6 प्रतिशत से 9 प्रतिशत की दर से विकास कर रहे हैं।
आज अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर विकासमान देश विश्व अथंतत्र में उचित कीमतों, बाजार तथा निर्यात में हिस्सेदारी उनके सामानों पर पाबंदियाँ हटाने और शुल्क कम करने इत्यादि और सामात्यतः भेद भाव समाप्त करने की माँग कर रहे है। आज विकासमान देश विश्व अर्थतंत्र में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनते जा रहे हैं।
विकासमान देशों का परस्पर सहयोग-
जी-20 और 8$5 के बाद ‘ब्रिक’ और शंघाई स0स0 महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। ब्रिक ने माँग की? कि एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व आर्थिक व्यवस्था कायम की जाये। सम्मेलन में खाद्य सुरक्षा से लेकर अधिक विविध मुद्रा प्रणाली की माँग की गयी। विकासमान देशों तथा विश्व के इतिहास में यह एक नई घटना है। अब तक विश्व अर्थतंत्र अमरीकी, ब्रिटिश तथा अन्य उच्च औद्योगीकृत देशों की मुद्राओं से चल रहा था। लेकिन इन विकासमान देशों ने अपनी-अपनी मुद्राओं को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राएं बनाने की दिशा में कुछ कदम उठाना शुरू कर दिया है।
भारत समेत अन्य देशों ने ‘संरक्षणवाद’ का विरोध किया है अर्थात् साम्राज्यवाद के पक्ष में संरक्षण का। भारत एवं अन्य देशों के नेताओं ने विश्व आर्थिक मंदी के दौर में उचित कदम् उठाने की माँग की हैं। उन्होंने निर्णय लिया है कि संकट की इस घड़ी में वे एक दूसरे की मदद करेंगे। उन्होंने तय किया है कि वास्तविक अर्थतंत्र में परस्पर सहयोग बढ़ाया जाये। इस दिशा में सम्बद्ध देशों ने संयुक्त संगठन भी बना लिया है।
ब्राजील के नेता लूई इनासियों लूला का कहना है कि आज बदलते विश्व में उचित भूमिका अदा करना ‘ब्रिक’ राष्ट्रों के सामने बड़ी चुनौती है, उन्होंने ‘दोहा राउंड’ की समुचित समाप्ति की माँग की।
आज ‘ब्रिक’ देश विश्व अर्थतंत्र के विकास का 65 प्रतिशत पैदा करते हैं। दुनिया की लगभग आधी जनता इन देशों में रहती है ये देश विश्व का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन करते हैं।
उनके विकास की गति दुनिया में सबसे अधिक हैं, फलस्वरूप वे एशिया तथा विश्व के नये विकास इंजन हैं। अब ये देश कृषि प्रधान नहीं रह गये। वे अब अधिकाधिक औद्योगिक इलेक्ट्रानिक तथा अन्य आधुनिकतम क्षेत्रों में विकास कर रहें हैं।
विकासमान देशों में अब इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया है कि वे ‘ब्रेटन वुड्स’ के जवाब में अपनी अलग मुद्रा व्यवस्था की बात कर रहे हैं। वास्तव में यह एक समानांतर व्यवस्था नहीं बल्कि बहु दिशावाद का विकास करके ‘ब्रिक’ तथा ऐसे अन्य देशों की मुद्राओं का विकसित देशों की अन्तराष्ट्रीय मुद्राओं के समकक्ष लाने तथा विश्व बाजार और मुद्रा व्यवस्था में अन्य के साथ कार्यशील मुद्रा विकसित करने का प्रयत्न हैं।
आज विकासशील देश बहुत बड़े परिवर्तन की कगार पर खड़े हैं।

-अनिल राजिमवाले
09868525812
लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाशित

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छद्म पूँजी बनाम उत्पादक पूँजी

सन 2005-08 के दौरान अमेरिका में वित्तीय संस्थाओ की क्रियाशीलता बेहद बढ़ गई । संपत्ति बाजार में पैसा लगाया जाने लगा । संपत्ति की कीमतों में पागलपन की हद तक वृधि हुई । लोग और कंपनिया अंधाधुंध कर्जे लेने और देने लगे। कंपनियों ने अपनी मूल पूँजी के 25-30 गुना अधिक पूँजी कर्ज पर लेकर निवेश करना आरम्भ किया। अमेरिका के वित्तीय केन्द्र तथा सबसे बड़े स्टॉक बाजार ”वाल स्ट्रीट ” तथा अमेरिका की विशालतम चार सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओ ने अकूत पैमाने पर शेयर बाजार,प्रतिभूति बाजार ,गिरवी बाजार इत्यादि में भारी पैमाने पर पूँजी लगा दी ।

उधर उत्पादक उद्यम और उत्पादक पूँजी अपेक्षित कर दी गई।
ऐसे में वित्तीय अर्थव्यवस्था के ”बैलून” को कभी न कभी फूटना ही था।
इस बार ”अति उत्पादन ” का संकट उतना स्पष्ट नही दिखाई सेता है क्योंकि वितरण एवं सेवा दोनों का चक्र बड़ी तेजी से काम कर रहा है।

संकट और मंदी का चक्र अब उत्पादन के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। ‘बेल आउट’ और राज्य द्वारा हस्तक्षेप

1929-33 की महामंदी के दौरान और उसके बाद जान मेनार्ड केन्स और शुम्पीटर जैसे पश्चिम के पूंजीवादी अर्थशास्त्रियो ने संकट से उभरने के लिए राज्य के हस्तक्षेप का सिधान्त प्रस्तुत किया था। खासतौर से केन्स इस सिधान्त के लिए जाने जाते है । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद , खासतौर पर पिछले दो दशको में पश्चिम में तथाकथित उदारवादी सिधान्तो की बाढ़ आई हुई है जिसके तहत राज्य से अर्थतंत्र से बहार जाने के लिय कहा गया। उससे पहले और अब आर्थिक मंदी के दौर राज्य से फिर अर्थतंत्र के हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया है। साम्राज्यवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र भी चक्रीय दौर से गुजरता है।

सर्वविदित है की अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशो में सरकारें खरबों डॉलर का विशेष कोष लेकर बड़े इजारेदार उद्यमों और वित्त पूँजी को बचने मैदान में उतर रही है। इस राहत कार्य को ‘बेल-आउट’ कहा जा रहा है। चीन की सरकार भी 600 अरब डॉलर का कोष बना चुकी है।

छद्म पूँजी पर अंकुश की आवश्यकता

दूसरे शब्दों में पूंजीवादी और साम्राज्यवाद का संकटाप्रन्न आर्थिक चक्र आज इस मंजिल में पहुँच गया है जहाँ राज्य और सरकारों द्वारा वित्तीय पूँजी पर अंकुश लगाना बहुत जरूरी हो गया है। वित्त पूँजी अर्थात छद्म पूँजी तथा उस पर आधारित ‘कैसीनो’ पूँजीवाद का प्रभुत्व कम करने और उन पर अंकुश लगाने के लिए राज्य द्वारा उत्पादन को सहायता देना आवश्यक है साथ ही अर्थतंत्र के उत्पादक हिस्सों कल कारखानों ,उद्यमों ,खेती,इत्यादि का विकास और उत्पादन जरूरी है। तभी जाकर मुक्त मुद्रा को वस्तुओं द्वारा संतुलित किया जा सकता है।

जाहिर इस दिशा में सम्पूर्ण आर्थिक नीतियाँ बदलने की आवश्यकता है।
भारत जैसे देशो ने दर्शा दिया है कि सार्वजानिक क्षेत्र का निर्माण देश के अर्थतंत्र के लिए कितना महत्वपूर्ण है। आज सार्वजनिक क्षेत्र और आधुनिक मशीन तथा ओद्योगिक एवं कृषि उत्पादन का निर्माण और विकास विश्व आर्थिक संकट से बचने के सबसे अच्छी उपाय है।

छद्म पूँजी के बनिस्बत वास्तविक पूँजी का विकास आवश्यक है ।

-अनिल राजिमवाले
मो नो -09868525812

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित ।

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युद्धोत्तरकाल में आर्थिक चक्र की विशेषताएं

इस प्रकार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और स्वयं दो विरोधी अंतर्विरोधी ध्रुवो में ध्रुवीकृत हो जाती है । उत्पादन से ही जनित वित्त पूँजी अब उत्पादन से जितनी दूर हो जाने की कोशिश करती है । पश्चिमी देशो के बड़े पूँजीवाद और नव-साम्राज्यवाद में एक नई विशेषता पैदा हो जाती है। वह वित्तीय और शेयर बाजार से ही अधिकाधिक मुनाफा कमाने का प्रयत्न करता है । फलस्वरूप ओद्योगिक एवं उत्पादक क्षेत्र की अधिकाधिक उपेक्षा होती जाती है।

यहाँ आज की विश्व अर्थव्यवस्था की कुछ खासियतो पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है । तभी हम वर्तमान आर्थिक मंदी की भी ठीक से व्याख्या कर पायेंगे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की जो सबसे महत्वपूर्ण घटना है वह है वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति ( संक्षेप में अंग्रेजी अक्षरो से बना एस.टी.आर ) इस क्रांति और इसके तहत हुई संचार क्रांति ने विश्व बजार को एक दूसरे से जोड़कर स्थान और काल का अन्तर समाप्त कर दिया। इलेक्ट्रोनिक्स और कम्प्यूटर पर आधारित इस क्रांति ने नई उत्पादक शक्तियों को जन्म दिया। नई इलेक्ट्रोनिक मशीनों और उपकरणों की उत्पादकता पहले से कई गुना अधिक थी। उद्योगों ,बैंकिग ,वित्तीय संस्थाओ ,कार्यालयों इत्यादि के कार्य-कलापों की गति में असाधारण तेजी आ गई । दूसरे शब्दों में धन ,मुद्रा और पूँजी का उत्पादन कई गुना बढ़ गया तथा अत्यन्त द्रुत गति से होने लगा।

वित्तीय हितों ने इन घटनाओ का प्रयोग अपने हितों में किया । हालाँकि अन्य प्रकार की गतिविधियाँ बढ़ी लेकिन वित्तीय पूँजी और एकाधिकार कारोबार में असाधारण तेजी आई । साथ ही यह भी नही भूला जाना चाहिए की छोटे और मंझोले कारोबार में भारी तेजी आई । इजारेदारी और वित्त के विकास पर एकतरफा जोर नही दिया जाना चाहिए।

एक अन्य घटना थी बाजार और मुद्रा वस्तु विनिमय प्रथा मुद्रा-मुद्रा विनिमय में असाधारण तेजी । पहले नोटो,मुद्राओ ,सोना,इत्यादि से लेन-देन हुआ करता था। आज भी होता है। लेकिन आज की तकनीकी क्रांति के युग में मुद्रा के नए इलेक्ट्रोनिक्स स्वरूप विकसित हो रहे है। इलेक्ट्रोनिक्स मुद्रा,स्मार्ट कार्ड ,ए .टी .ऍम कार्ड ,कम्पयूटरों एवं मोबाइल के जरिये लेन-देन ,इ-मेल तथा इन्टरनेट का बड़े पैमाने पर प्रयोग इन नए मौद्रिक उपकरणों ने धातु और कागज की मुद्रा की भूमिका लगभग समाप्त कर दी है। अब अधिकाधिक लेन इलेक्ट्रोनिक संकेतो से होता है।

इससे जहाँ छोटे उद्धम को फायदा हुआ है वहीं वित्त पूँजी ने अपना प्रभुत्व जमाने के लिए इसका भरपूर फायदा उठाया है। इलेक्ट्रोनिक्स संकेत प्रणाली से स्टॉक बाजारों और वित्त पूँजी का स्वरूप बदल गया है। एक तरह से इलेक्ट्रोनिक्स पूँजीवाद का जन्म हुआ है जिसमें व्यक्तिगत और छोटे उध्योद्ग से लेकर विशालकाय बहुद्देशीय कंपनिया और वित्तीय संस्थाएं कार्यशील है।

इसका फायदा वित्त पूँजी ने मुद्रा से मुद्रा और पूँजी से पूँजी कमाने के लिए किया है। इसमें आरम्भ में तो उसे असाधारण सफलता उसकी असफलता और धराशाई होने का कारण बना।

पिछले 25 -30 वर्षो में इतना बड़ा विश्व्यापी बाजार निर्मित हुआ है जितना की इतिहास में कभी नही हुआ था। पिछले बीस वर्षो में वास्तु -उत्पादन ,लेन-देन तथा मुद्रा की मात्र एवं आवाजाही में,यानी बाजार की गतिविधि में चार से पाँच गुना वृद्धि हुई है।

फलस्वरूप बाजार से मुनाफा कमाने ‘धन बनाने’ की रुझान में अभूतपूर्व वृधि हुई है ।

-अनिल राजिमवाले
मो.नं.-09868525812

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित होगा

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वर्तमान विश्व संकट: कारण और स्वरूप
पिछले लगभग एक सदी में ओद्योगिक अर्थव्यवस्था में भारी परिवर्तन हो गए हैवित्त पूँजी उत्पादक पूँजी से अलग होकर स्वतन्त्र स्वरूप धारण कर चुकी हैविश्व दो महायुद्धो से गुजर चुका हैऔर उसका बहुत बड़ा आर्थिक कारण वित्त पूँजी है19 वी सदी के अंत तथा 20 वी के आरंभ में पश्चिम में विशाल इजारेदारियो एवं एकाधिकारियो का विकास हुआकार्टेल ,ट्रस्ट ,कारपोरेशन इत्यादि ने अर्थतंत्र को अपने हित में इस्तेमाल करना शुरू कियाअर्थात आर्थिक साम्राज्यवाद का जन्म हुआऐसी ही कंपनिया आगे चलकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ( ऍम .एन .सी ) में रूपांतरित हो हो गई

इजारेदारी और साम्राज्यवाद का एक महत्वपूर्ण आधार है ‘वित्त पूँजी’ इस शब्द का प्रयोग अक्सर ही लोग बिना सोचे समझे कहते है। लेकिन यह एक वैज्ञानिक सिद्धांत है। पश्चिम में हॉब्सन ,हिल्फर्डिंग ,लेनिन ,रोजा , लाक्सेम्बर्ग ,कार्ल कॉउस्की ने वित्त पूँजी और साम्राज्यवाद की अवधारणाएं विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।
जब ओद्योगिक पूँजी बैंकिंग की पूँजी के साथ मिल जाती है तो वह एक शक्तिशाली ताकत अर्थात वित्त पूँजी बन जाती है। वह समूचे अर्थतंत्र पर छा जाती है।

अर्थतंत्र की गति

ओद्योगिक विकास सीधी रेखा में गमन नही करता है। उसमें उतार-चढाव आते है। लेकिन ये उतार चढाव बेतरतीब नही होते उनकी एक निश्चित बारंबारता होती है जिसकी कालिक भविष्यवाणी की जा सकती है। अर्थतंत्र में उभार उच्चतर बिन्दु पर होता है । यह आर्थिक चक्र या चक्रीय विकास मार्क्स की खोजो में एक था।
एकाधिकार कारोबार और वित्त पूँजी इस चक्र को विकृत करते है । अब उसकी बारम्बारता में स्वाभाविकता नही रह जाती है। 1929 -33 की महामंदी ने सारे विश्व ,खास तौर पर यूरोप और अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया था । उत्पादन में भारी गिरावट ,मुद्रा का अवमूल्यन ,स्टॉक बाजारों का धराशाई होना ,और बेकारी इसकी विशेषताएं थी ।
यह वित्त पूँजी का दबदबा था जिसके ओद्योगिक और कृषि उत्पादों की कीमतें धराशाई हो गई ,खासकर छोटे एवं व्यक्तिगत उत्पादक बरबाद हो गए और ओद्योगिक व्यवस्था बिखर गई , इस प्रकार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा ,वित्त पूँजी, अपने ही एक आत्म हिस्से ,ओद्योगिक अंश को नष्ट करने लगती है ।

-अनिल राजिमवाले

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19 वी सदी में यूरोप के देशो में ज्वाइंट स्टाक कंपनियाँ और फ़िर शेयर बाजार पैदा हुए। उद्योगों और प्रौधोगिकी तथा यातायात के विकास के साथ औधोगिक समाज एवं कल कारखाने फैलने लगे । 1870 में इस्पात बनाने के लिए ‘बेसीमर कन्वर्टर’ नमक नै किस्म की धमन भट्ठियों का आविष्कार किया गया। यहाँ से इस्पात युग शुरू होता है जिसने औद्योगिक और पूंजीवादी समाज को बदल डाला ।
इन घटनाओ के फलस्वरूप पूँजी और मुनाफे का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा। पूँजी एवं धन पूरे बाजार तथा अर्थतंत्र में चलायमान हो गई और उसने स्वतन्त्र रूप धारण कर लिया । शेयरों ,स्टाको ,बांङो,प्रतिभूतियों और बैंको की अलग प्रणाली अस्तित्व में आ गई। अब उद्यमी और कारोबारी कारखानों में ही नही बल्कि ,स्टॉक एवं शेयर बाजारों तथा वित्तीय संस्थाओ में अपने पैसे लगाने लगे । शेयर बाजार एक नई किस्म का बाजार था जहाँ पूँजी के टुकड़े (शेयर,स्टॉक) खरीदने ,बेचे जाने इसे ,ही मार्क्स vashtuvein ।
hi marks ने छद्म पूँजी कहा है। छद्म क्यों ? क्योंकि कारोबारी या उद्यमी लोग (पून्जिपति० कारखानों में पैसे नही लगते है जहाँ वाश्तुवें बनती है। वे स्टॉक बाजार ,वित्तीय संस्थाओ और बांको में धन लगाकर मुनाफा कमाने लगते है । धीरे-धीरे वे यह समझने लगते है कि उन्हें इन्ही बाजारों से मुनाफा मिलता है। या बांको से मुनाफा मिलता है । लेकिन आखिर बांको और वित्तीय संस्थाओ में ‘मुनाफा ‘यानी अतिरिक्त धन (पूँजी) कहाँ से आती है? वह कल कल्खानो से आती है।
स्टॉक और बांड या शेयर आखिरकार वस्तु ,उत्पादन का ही प्रतिनिधितिव करते है । लेकिन औद्योगिक पूँजीवाद क विकास से उत्पादन से इतनी दूर चले जाते है कि उनका उससे सम्बन्ध टूट जाता है और लोग यह समझ बैठते है कि उनका मुनाफा स्टॉक बाजार में पैदा होता है।

अनिल राजिमवाले

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आज सारे भारत और विश्व में आर्थिक मंदी तथा संकट की चर्चा जोरो पर है । लेख लिखे जा रहे है ,भाषण/व्याख्यान और गोष्ठियाँ आयोजित की जा रही है । विश्व आर्थिक मंदी पिछले वर्ष (२००८) के मध्य में आरम्भ हुई और आज कई वर्षो तक जारी रहने की भविष्यवाणी की जा रही है । यह हमारे दैनन्दिनी के आर्थिक जीवन तथा जीवन-यापन से जुड़ी घटना है , इसलिए इसकी उपेक्षा नही की जा सकती है। यह किताबों और सिद्धानतो तक सीमित नही है। हमारे देश का अर्थतंत्र भी इसकी चपेट में आ रहा है।
आख़िर विश्व आर्थिक और संकट है क्या और इससे मुक्ति पाने या इसे कम करने के क्या उपाय है?

छद्म पूँजी बनाम वास्तविक पूँजी

कुछ समय पहले चीन के राष्ट्रपति ने कहा की वर्तमान विश्व आर्थिक संकट ‘छद्म’ पूँजी के उत्पादक पूँजी पर हावी होने के कारन पैदा हुआ। उन्होंने इस संकट से निजात पाने के लिए समूचे विश्व के देशो के परस्पर सहयोग का प्रस्ताव रखा है।
कुछ इसी तरह के विचार कुछ अन्य नेताओं ने पेश किए है। इनमें भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह भी है। उनके अनुसार आज ‘कैसीनो ‘पूँजीवाद उत्पादक का औद्योगिक पूँजीवाद पर हावी हो गया है । कैसीनो का अर्थ होता वह जगह जहाँ सट्टेबाजी होती है । उनके विचार में औद्योगिक पूँजी को एक और दरकिनार करने की कुछ राष्ट्रों द्वारा कोशिश की जा रही है।

छद्म पूँजी और मार्क्स

छद्म पूँजी की अवधारणा सबसे पहले मार्क्स ने प्रस्तुत की थी जो उनकी रचना पूँजी के तीसरे खंड में मिलती है। जब हम पूँजी की बात करते है तो वह उत्पादन से जुड़ी होती है ,मुख्यत : औद्योगिक उत्पादन से। इसलिए मुनाफा भी उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान पैदा होता है ,उससे बाहर नही ,बाजार में नही ,वितरण में नही । यह सबसे बगैर हम वर्तमान संकट समझ नही सकते है यह सर्वप्रथम कार्ल मार्क्स थे जिन्होंने पूँजी और मुनाफे के स्रोत्र की खोज की थी । उसका स्रोत्र उन्होंने उत्पादन की प्रक्रिया ,विशेषत: श्रमशक्ति में खोज निकला था ।

-अनिल राजिमवाले

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भाजपा और आर्गनाइज़र की इस गोलगोल जलेबी का ,जिसे वह बड़ा ही सम्मानजनक दार्शनिकवैचारिक रूप देने का प्रयत्न कर रहे है,मतलब अगर साफ़सीधी वैचारिकराजनैतिक भाषा में निकला जाए तो इस प्रकार है

भारत की सभ्यता और संस्कृति केवल हिन्दुओं ने बनाई (वह भी केवल उपरी वर्णों /जातियों ने क्योंकि निचली और अछूत जातियों को तो भाजपा पसंद नही करता!) ,भारत में कोई मिलीजुली संस्कृति सभ्यता नही,आजादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव के रास्ते पर चलकर भारी गलती की और जनता की संवेदनाओ को ठेस पहुंचाई और इसी देश में आतंकवाद और सम्प्रदायवाद पैदा हुआ! होना यह चाहिए था की देश के शासको को भाजपा-मार्का सम्प्रदायवाद अपनाना चाहिए था ।
इस प्रकार भाजपाआर एस एस बड़ी चालाकी से एक जटिल और पाखंडपूर्ण विचार प्रणाली के रूप में अपनीसांप्रदायिक ,विभाजनकारी विचारधारा विकसित करने की कोशिश कर रही हैउसे बड़ी चालाकी से इस प्रकार पेशकिया जा रहा है की असलियत का पता भी चले और असली मूल दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया का सांप्रदायिक फॉसिस्ट रूप लोगो के मस्तिष्क में घर कर जाए! इसी के लिएभारत‘ ‘इंडिया‘ ‘भारतमाताइत्यादि का प्रयोगकिया जा रहा है,मोहरों के रूप में – यह दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया की विचारधारा बड़ी धूर्तता से दूसरे मतों,विश्वशो,धर्मो,आन्दोलनों पर चोट कर रही है। इनका उद्देश्य देश और राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को छिन्न भिन्न करना,उन शक्तियों में फूट डालना है। भाजपा भक्ति और सूफी आंदोलनों एवं दर्शनों का उल्लेख नही करती है। क्योंकि वे भारत की मिलीजुली सभ्यता -संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती थी।
हिटलर ने भी ‘शुद्ध ज़र्मन आर्यों ‘ को सारी दुनिया में फ्रैलने का नारा दिया था ! श्रीलंका ,इंडोनेशिया ,जापान में हिंदू पूजा स्थलों का उल्लेख किया गया है लेकिन इस्लामी,बौध ,इसाई तथा अन्य स्थानों का नही । यह है उनका कुटुंब ! वे गुजरात और कंधमाल को सारे विश्व में फैलाना चाहते है।
वसुधा‘(धरती) की बात तो छोड़ दीजिये,भाजपा हमारे ही देश के कुटुंब को छोटा करना चाहती हैआजादी के बाद हमारे देश का मजबूत धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक और सामाजिक ढांचा इतना गहरा तथा मजबूत है की उनके रास्ते में रोड़ा साबित हो रहा हैउसे हटाने के बाद ही सांप्रदायिक एजेंडा पूरी तरह लागू हो सकता है

अनिल राजिमवाले
मो– 09868525812

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