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Archive for the ‘कविता’ Category

मेरा यह सागर मंथन

अमृत का शोध नही है

सर्वश्व समर्पण है ये

आहों का बोध नही है

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘ राही ‘

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तदवीर जैसे होती है तकदीर के बगैर।

वैसे ही मेरा ख्वाब है तावीर के बगैर

उसने जो सारे वज्म किया मुझको मुखातिब
मशहूर हो गया किसी तशहीर के बगैर ।

सुनकर सदाये साकिये मयखाना शेख जी
मेय्वर से उठ के चल दिए तक़रीर के बगैर

महफिल से आके उसने जो घूंघट उठा दिया
सब कैद हो गए किसी जंजीर के बगैर ।

दस्ते तलब भी उठने लगे अब बराये रस्म
वरना वो क्या दुआ जो हो तासीर के बगैर ।

दीवाने की नजर है जो खाली फ्रेम पर,
वहरना रहा है दिल तेरी तस्वीर के बगैर।

जरदार को तलब है बने कसेर आरजू
‘राही’ को है सुकूं किसी जागीर के बगैर ।

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेलराही

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जीवन से तुम ,या तुमसे जीवन ये मैं समझ न पाँऊ।
केवल तुमसे लगन लगी है फिर भी मिल न पाँऊ ।
दीप शिखा सी जलती जाऊ ॥

शबनम तेरे प्यार की हरदम बिखरी रहती है।
तन को छुकर पवन संदेशा तेरा कहती है।
व्याकुल मिलने को मन मेरा फिर भी मिल न पाँऊ –
दीप शिखा सी जलती जाँऊ ।

कभी लगे श्रृंगार अधूरा पर मैला सा ।
कभी लगे विश्वाश अधूरा मन मैला सा है ।
ऊहापोह में बीती कितनी घडिया गिन न पाँऊ-
दीप शिखा सी जलती जाँऊ।

हर मंजिल की कोई न कोई राह हुआ करती है ।
बहते बहते नदिया हरदम सिन्धु मिलन करती है।
पल पल घटती साँसों का व्यापार समझ न पाँऊ-
दीप शिखा सी जलती जाँऊ।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही ”

loksangharsha

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तीरगी से डरते है।
यू दीये भी जलते है ।

साँप दोस्त बनकर ही
आस्ती में पलते है।

शेर जिंदगी के सब
आंसुओ से ढलते है।

राजघाट के सपने
कौडियों में बिकते है।

वाह क्या है फनकारी
आस्था को चलते है।

टूटना ही किस्मत है
जो कभी न झुकते है।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेलराही

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तुम्हारे बिना जिंदगी यू कटी-

कि जैसे दिया ज्योति के बिन जले।

स्वप्न साकार दर्शन से होने लगे-

निमंत्रण मौन अधर देने लगे,

मन के दर्पण में मूरत बसी इस तरह,

कोरे सपनो में भी रंग भरने लगे,
छोड़ मझधार में ख़ुद किनारे लगे
बोझ सांसो तले रात दिन यूँ चले

जैसे मंजिल बिना कोई राही चले- ।

साँस की राह पर प्यार चलता रहा,

रूप की चांदिनी में वो बढ़ता रहा।

नैन की नैन से बात होती रही ,

प्रेम व्यापार में मन ये बिकता रहा।
आंसुओं
के तले पीर दुल्हन बनी
वो सुहगिनि मिली यू मिलन के बिन-

जैसे मोती के बिना सीप कोई मिले

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही ‘

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: लोकसंघर्ष,

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ऐसे बीती जिंदगी किसी के प्यार के बिना।
जैसे नदिया बहती जाए इन्तजार के बिना ॥

कोरे सपने रंग को तरसे
तरुबाई तरसे मधुबन को –
रूप चांदिनी को मन तरसे
सुधि तरसे आलिंगन को-

ऐसे योवन का बसंत है बहार के बिना।
जैसे कोई प्रेम सुहागिनी हो श्रींगार के बिना॥

खुली पलक आमरण रूप का
नित नूतन करता रहता है –
आकुल मन तस्वीर बनाकर
रंग नए भरता रहता है-

ऐसे खूब कुछ सूना है किसी की मनुहार के बिना।
जैसे सपनो का महल हो आधार के बिना॥

साकी प्याले पीने वाले
मदहोशी की भीड़ लगी है
जीवन की इस मधुशाला में
दर्द अकेला प्रीत ठगी है

ऐसे साँसों की सरगम है झंकार के बिना।
जैसे बरखा की घटाएं हो फुहार के बिना॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

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जब छोटा था तब माँ की शैया गीली करता था।
अब बड़ा हुआ तो माँ की आँखें गीली करता हूँ ॥
माँ पहले जब आंसू आते थे तब तुम याद आती थी।
आज तुम याद आती हो……. तो पलकों से आंसू छलकते है……. ॥

जिन बेटो के जन्म पर माँ -बाप ने हँसी खुशी मिठाई बांटी ।
वही बेटे जवान होकर आज माँ-बाप को बांटे …… ॥
लड़की घर छोडे और अब लड़का मुहँ मोडे ……….. ।
माँ-बाप की करुण आँखों में बिखरे हुए ख्वाबो की माला टूटे ॥

चार वर्ष का तेर लाडला ,रखे तेरे प्रेम की आस।
साथ साल के तेरे माँ-बाप क्यों न रखे प्रेम की प्यास ?
जिस मुन्ने को माँ-बाप बोलना सिखाएं ……… ।
वही मुन्ना माँ-बाप को बड़ा होकर चुप कराए ॥

पत्नी पसंद से मिल सकती है ………. माँ पुण्य से ही मिलती है ।
पसंद से मिलने वाली के लिए,पुण्य से मिलने वाली माँ को मत ठुकराना……. ॥
अपने पाँच बेटे जिसे लगे नही भारी ……… वह है माँ ।
बेटो की पाँच थालियों में क्यों अपने लिए ढूंढें दाना ॥

माँ-बाप की आँखों से आए आंसू गवाह है।
एक दिन तुझे भी ये सब सहना है॥
घर की देवी को छोड़ मूर्ख ।
पत्थर पर चुनरी ओढ़ने क्यों जन है…. ॥

जीवन की संध्या में आज तू उसके साथ रह ले ।
जाते हुए साए का तू आज आशीष ले ले ॥
उसके अंधेरे पथ में सूरज बनकर रौशनी कर।
चार दिन और जीने की चाह की चाह उसमें निर्माण कर ……. ॥

तू ने माँ का दूध पिया है ………….. ।
उसका फर्ज अदा कर ……………… ।
उसका कर्ज अदा कर ………………. ।

-अनूप गोयल

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हाल हमरो न पूछौ बड़ी पीर है।
का बताई के मनमा केतनी पीर है।
बिन खेवैया के नैया भंवर मा फंसी-
न यहै तीर है न वैह तीर है।

हमरे मन माँ वसे जैसे दीया की लौ
दूरी यतनी गए जइसे रतिया से पौ,
सुधि के सागर माँ मन हे यूं गहिरे पैठ
इक लहर जौ उठी नैन माँ नीर है –

का बताई की मन मा केतनी पीर है……

सूखि फागुन गवा हो लाली गई,
आखिया सावन के बदरा सी बरसा करे ,
राह देखा करी निंदिया वैरन भई –
रतिया बीते नही जस कठिन चीर है।

का बताई की मन मा केतनी पीर है……

कान सुनिवे का गुन अखिया दर्शन चहै,
साँसे है आखिरी मौन मिलिवे कहै,
तुम्हरे कारन विसरि सारी दुनिया गई-
ऐसे अब्नाओ जस की दया नीर है।

का बताई की मन मा केतनी पीर है……

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही ‘

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दुनिया में अगर दर्द का मौसम नही होता –
चेहरों पे तबस्सुम का ये आलम नही होता ।

क्या चीज मुहब्बत है ये हम कैसे समझते –
अश्को से अगर दामने दिल नम नही होता ।

इक वो है की माथे पे हमावत है शिकने-
इक मैं हूँ कि किसी हाल में वह हम नही होता।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही ‘

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थी संजीदा फौज में कुछ नामवर हस्ती मगर
उनके नामो से है बेहतर बदनुमा पत्थर के नाम

मांगना है जो भी मुझको मांग लूँगा आपसे
मैं गुजारिश लेके जाऊ क्यों किसी अफसर के पास ।

दिल के दस्तावेज पर जागीर- ए -गम को छोड़कर
हमने सबकुछ लिख दिया सिमे पैगम्बर के नाम।

पुश्त पर शब्बीर है सजदे में खैरुल अनाम –
शरफ ये भी लिख दिया अल्लाह ने सरवर के नाम।

मित्रो की कोशिशें नाकाम सारी हो गई –
सब उजाले हो गए फिर डूबते दिनकर के नाम।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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