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Archive for the ‘गीत चंदेल’ Category


प्रात : दुल्हन सी किरणें
है नीरज को छू लेती ।
अलि समझे इससे पहले
परिरम्य-मुक्त कर देती ॥

चम्पक पुष्पों की रेखा,
मन को आडोलित करती।
नित नूतन ही उसकी,
सन्दर्भ विवर्तित करती॥

अलकें कपोल पर आकर,
चंच; हो जाती ऐसे।
विधु -रूप-सुधा भरने को
दौडे धन शावक जैसे॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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है राग भरा उपवन में,
मधुपों की तान निराली।
सर्वश्व समर्पण देखूं
फूलो का चुम्बन डाली॥

स्निग्ध हंसी पर जगती की,
पड़ती कुदृष्टि है ऐसी।
आवृत पूनम शशि करती,
राहू की आँखें जैसी॥

उपमानों की सुषमा सी,
सौन्दर्य मूर्त काया सी।
प्रतिमा है अब मन में
सुंदर सी,सुन्दरता सी॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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वह मूर्तिमान छवि ऐसी,
ज्यों कवि की प्रथम व्यथा हो।
था प्रथम काव्य की कविता
प्रभु की अनकही व्यथा हो॥

निज स्वर की सुरा पिलाकर
हो मूक ,पुकारा दृग ने।
चंचल मन बेसुध आहात
ज्यों बीन सुनी हो मृग ने॥

मुस्का कर स्वप्न जगाना,
फिर स्वप्न सुंदरी बनना।
हाथो से दीप जलना
अव्यक्त रूप गुनना॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

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लघु स्मृति की प्राचीरों ने,
कारा निर्मित कर डाला ।
बिठला छवि रम्य अलौकिक
प्रहरी मुझको कर डाला ॥

पाटल-सुगंधी उपवन में,
ज्यों चपला चमके घन में।
वह चपल चंचला मूरत
विस्थापित है अब मन में॥

परिधान बीच सुषमा सी,
संध्या अम्बर के टुकड़े ।
छुटपुट तारों की रेखा
हो लाल-नील में जकडे॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

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ले प्रेम लेखनी कर में
मन मानस के पृष्ठों में।
अनुबंध लिखा था तुमने
उच्छवासो की भाषा में॥

अनुबंध ह्रदय से छवि का
है लहर तटों की भाषा।
जब दृश्य देख लेती है
तब भटकती प्रत्याशा॥

उन्मीलित नयनो में अब
छवि घूम रही है ऐसे।
भू मंडल के संग घूमे,
रवि,दिवस,प्रात तम जैसे॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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मधु स्मृति के कानन वन में,
वेदना विकल रोती है।
स्नेह भरे दीपक लौ से
दुःख की कालिख घिरती है॥

परिचय की अभिलाषा में ,
लहरें तट से टकराती।
सुंदर होगा आलिंगन ,
आतुरता में बढ़ जाती॥

तुम थे तो केवल तुम थे,
या पथ था सूना-सूना।
या गंध सुमन का संगम ,
कलियों का तरपन सूना ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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उषा की पहली किरणे ,
नित करती स्पर्श हमारा ।
कानों में कुछ कह जाती,
ले ले कर नाम तुम्हारा ॥

वरसा मेह सुधारस का
प्रेरणा सबल हो आई।
अप्सरा उतर आई हो ,
तपसी जीवन में कोई॥

आंदोलित भावों पर छवि
निर्मम प्रहार कर बैठी।
आसक्त चकित चितवन से
जीवन का रस ले बैठी।।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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चितिमय निखिल चराचर की,

विभूति ,मैंने अपना ली।

अंतस के तल में मैंने

विरहा की ज्योति जला ली॥

जो अग्नि प्रज्ज़वलित कर दी,

वह शांत अश्रु करते है॥

अब आंसू के जीवन में –

हम तिरते ही रहते है।

जीवन से लगन नही है,

इति से भी मिलन नही है ॥

अब कौन लोक है मेरा ?

चिंतन का विषय नही है॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

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रजनी के झिलमिल तारे

शशि छवि से आहत होकर।

दुःख भरी कहानी कहते,

नयनो में पानी लाकर॥

वे पंथ भूलते आए,

विस्मृत गंतव्य हमारा ।

उलझी साँसे सुलझाते

बीतेगा जीवन सारा ॥

रागिनी ह्रदय से निकली ,

adro se मृदु गीतांजलि ।

सुस्मृति -धागों में गुंथित ,

भावो की लघु पुष्पांजलि ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही ”

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मिलकर भी मिल सका जो ,
मन खोज रहा है उसको।
सव विश्व खलित धाराएं
अपना कह दूँ मैं किसको

याचक नयनो का पानी
अवगुण्ठन में मुसकाता
कल्याणरूप , चिरसुंदर
तुम सत्ययही कह जाता॥

पृथ्वी का आँचल भीगा
तरुनीलहर ममता में।
निर्दयता की गाथायें
अम्बरपट की समता में॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेलराही

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