Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘गीत चंदेल’ Category


जो है अप्राप्य इस जग में ,
वह अभिलाषा है मन की।
मन-मख,विरहाग्नि जलाकर
आहुति दे रहा स्वयं की॥

अपने से स्वयं पराजित ,
होकर भी मैं जीता हूँ ।
अभिशाप समझ कर के भी
मैं स्मृति – मदिरा पीता हूँ ॥

दुर्दिन की घाटी भी अब
विश्वाश भरी लहराए।
उस संधि -पत्र की नौका
कुछ डूबी सी उतराए॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

Read Full Post »

निराधार सपने टूटे,
क्रंदन शेष रहा मन का ।
भ्रमता जीव ,नियति रूठी,
परिचय पाषाण ह्रदय का॥

लज्जित हो मेरी लघुता ,
कोई नरेश बन जाए।
अधखुली पलक पंकज में,
जगती का भेद छिपाए॥

आशा की ज्योति सजाये ,
है दीप शिखा जलने को।
लौ में आकर्षण संचित
है शलभ मौन जलने को॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेलराही

Read Full Post »


मधु के ग्राहक बहुत मिले ,
क्रय कर ली अभिलाषाएं।
अब मोल चुका कर रोती
कुचली अतृप्त आशाएं ॥

अव्यक्त कथा कुछ ऐसी,
आँचल में सोई रहती।
हसने की अभिलाषा में,
आंसू में भीगी रहती ॥

मेरे दृगमबू सुमनों पर,
तुहिन कणों से बिखरे है
स्नेहिल सपनो के रंग में,
पोषित होकर संवरे है ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

Read Full Post »

रसधार नही जीवन में ,
है निर्बल वाणी कहती।
अनुरक्ति यहाँ छलना है
मन आहात करती रहती॥

मृदुला में कटुता भर दी,
कटुता में भर दी ज्वाला।
वेदना विहंस बाहों की
दे डाल गले में माला॥

है बीच भंवर में चक्रित,
नैया कातर मांझी है।
काल अन्त निर्मम वियोग
वेदना विकल आंधी है॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

Read Full Post »


आंसू की इस नगरी में,

दुःख हर क्षण पहरा देता।

साम्राज्य एक है मेरा ,

साँसों से कहला देता॥

मधुमय बसंत पतझड़ है,

मैं जीवन काट रहा हूँ ।

अब अश्रु जलधि में दुःख के,

मैं मोती छांट रहा हूँ॥

आंसू की जलधारा में,

युग तपन मृदुल है शेष ।

माधुरी समाहित होकर,

उज्जवल सत् और विशेष ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह ‘राही’

Read Full Post »

पथ कतिपय ललित कलाएं
सम्मोहन से भर देती।
निरश्य शून्य में भटके
छवि व्यथित जीव कर देती॥

अति विकल प्रतीक्षा गति ने
छाया को क्रम दे डाला ।
साँसों के क्रम में भर दी,
सम्पूर्ण जगत की ज्वाला॥

मन के द्वारे तक आकार
हर लहर लौट जाती है।
प्रति सुख की छाया को भी
वह राख बना जाती है॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

Read Full Post »


चेतनते व्याधि बनी तू
नीख विवेक के तल में।
लेकर अतीत का संबल,
अवसाद घेर ले पल में॥

मेरे मानस की पीडा,
है मधुर स्वरों में गाती।
आंसू में कंचन बनकर
पीड़ा से होड़ लगाती॥

मन की असीम व्याकुलता
कब त्राण पा सकी जग में ।
विश्वाश सुमन कुचले है,
हंस-हंस कर चलते मग में ॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ”राही”

Read Full Post »

सुधियों की अमराई में ,
है शांत तृषित अभिलाषा।
कतिपय अतृप्त इच्छाएं
व्याकुल पाने को भाषा॥

मेरा यह सागर मंथन,
अमृत का शोध नही है।
सर्वश्व समर्पण है ये
आहों का बोध नही है॥

सुस्मृति आसव से चालक
पड़ता ,जीवन का प्याला।
कालिमा समेट ले मन में,
ज्यों तय आसवृ उजाला

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

Read Full Post »


तुम गंध में न बसते हो
तुम रूप में न मिलते हो।
साधना समर्पित मेरी ,
पाषाण न तुम हिलते हो॥

मेरे सपनो की छाया
अब मुझे जलाती रहती ।
कुछ गरल छलक जाता है,
आशा है गाती रहती॥

मानस की स्नेहलता को
सींचा हमने सिसकन से ।
पर वह टूटी मुरझाकर
आडम्बर की चितवन से॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही’

Read Full Post »


क्षिति से नभ का आलिंगन
है लता पुष्प की दूरी।
प्रतिकूल पवन के झोंके
इच्छा अनुकूल अधूरी ॥

चिंतन की पहली रेखा
मूरत पर जाकर टिकती ।
फिर रंग भरने में आशा
पगली सी फिरती रहती॥

चिर परिचित से लगते हैं
छवि चित्रित मानस पट पर।
अस्तित्व मिटाकर जैसे-
हिम होता तुंग शिखर पर॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ‘राही ‘

Read Full Post »

« Newer Posts - Older Posts »