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Archive for the ‘मुक्ति संघर्ष’ Category

प्रेम का इतना पवित्र वर्णन मख्दूम ही कर सकते थे यहाँ पर खुदा का मुस्कुरा देना कवि की मासूमियत की पुष्टि करता है
यह कहा जा सकता है की माख्दूम का कवि जितना अवामी लडाइयो में मुब्तला था,निजामशाही साम्राज्य को उखाड़ फेकने की जिसने तहरीक चलाई थी ,वहीं उसने अपने क्रन्तिकारी साथियों के साथ भारत की स्वतंत्रता के लिए जान बाजी पर लगा थी। मख्दूम के सर पर उस वक्त पाँच हजार का इनाम था । मख्दूम भूमिगत थे। वे सशस्त्र घुमते थे।

एक होकर दुश्मनों पर वार कर सकते है हम

एक अन्य शेर में वे कहते है

पानी में लगी आग परेशान है मछली
कुछ शोला बदन उतरे है पानी में नहाने…”

इसी तरह तेलंगना की नारी को संबोधित ”तेलंगना ” शीर्षक की कविता ग्रामीण युवती के भोलेपन को उसकी लज्जा को ख़ुद में स्वर देती है-

फिरने वाली खेत की मेङों पर बलखाती हुई
नर्मो शिरी कहकहों के फूल बरसाती हुई
कंगनों से खेलती औरो से शर्माती हुई
अजनबी को देखकर खुश मत हो गए जा
हां तेलंगना गाए जा,बांकी तेलंगन गए जा

झोपडी की लडाई के योधा मख्दूम की बागी नज्म उन कविताओं में है ,जिस समय वे निजाम हुकूमत के
ख़िलाफ़ अपने सर पर कफ़न बाँध कर निजाम स्टेट के स्वतन्त्र भारत में विलय कराने के लिए लड़ रहे थे। स्वतंत्रता न्याय और साम्य के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले मख्दूम सौन्दर्य और प्रेम के प्रति भी आशक्त रहे है । तभी तो ख्वाजा अहमद अब्बास ने उनके बारे में कहा था-”मख्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूंदे भी । वे क्रांतिकारी छापामार की बंदूख थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी। ”
बच्चे की मौत पर ,माँ को पूरसा,हवेली आदि कवितायें शोषित मानव के पक्ष में परम्परा के अंधेरे में होने वाले अत्याचारों का विरोध करती है। ”जंगे आजादी” उत्कृष्ट राष्ट्रिय रचनाओ में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है।
मखदूम ने तीन कविताओं के अनुवाद किए है जो अपनी विशिष्ट शैली और कोमल विचारो को लिए हुए साहित्य में अपना स्थान रखते है। यह कलात्मक अनुवाद की भारतीय कविता में पहली पहल थी । तातरी शायर जम्बूल जाबर की कविता का भी उन्होंने अनुवाद किया है-
क्या में इस रज्म का खामोश तमाशाई बनूं
क्या मैं जन्नत को जहन्नुम के हवाले कर दू
क्या मुजाहिद बनूं?
वजा मैं तलवार उठाऊ वतन की खातिर
मेरे प्यारे, मेरे फिरदौस बदन की खातिर। ”

दूसरा अनुवाद अंग्रेजी कवियत्री इंदिरा देवी धनराज़गीर की दो कविताओं का है । ”हम दोनों” और ”फासले” शीर्षक से मख्दूम ने इन कविताओं का अनुवाद किया है।
फासले एक प्रभावी कविता है, जिससे गुजरते हुए पाठक ठहर- ठहर कर आगे बढ़ता है । एक धीमी सुलगती लय और विरही शब्दों की भाषा से यह कविता जिंदगी की सच्चइयो को उजागर करती है।
जिंदगी नौके सीना
जिंदगी मिस्ले सना ,जिस्म में जा में उतर जाती है
जिंदगी सूद जियां
जिंदगी एक दोधारी तलवार
काट देती है जुम्बिशे लब
नफो जहर,सूदों जिया
प्यार कर जाते है कट जाती है जां
”हम दोनों में पाठक रचना की मूल कवियत्री और अनुवादक कवि के बीच कोई फर्क नही पता है। कारण दोनों में प्रेम साम्य है। समझदारी है। और संबंधो को दोस्ती और खूबसूरत भविष्य देने की रचनात्मक ताकत भी थी-

रात है बातें है सरगोशी है
तू है मैं हूँ
अपने गुथे हुए गम के बंधन
सब के सन्नाटे में
जाग उठते है तड़प जाते है चिल्लाते है
गर्म गर्म आंसू
दुलक जाते है रुखसारों पर
जिंदगी यादो का मीनार बना लेती है। ”

जब जहां बाग़ पैलेस हैदराबाद में इंदिरा धनराज़गीर के यहाँ बाल डांस पार्टी थी,उसमें मख्दूम भी शामिल थे। दूर बैठे रक्श देख रहे थे -वहीं ‘विसाते रक्श’ नज्म हुई थी ।
मख्दूम ने गगारिन पर और लुमुभ्बा के कत्ल पर भी नज्में लिखी । हरेक जुल्म के ख़िलाफ़ लिखा । हरेक प्रगति का स्वागत करती हुई कविताएँ रची। गजले भी कहीं ,नई जमीन पर लिखी उन की गजले फिल्मो में भी ली गई-”फिर छिडी रात बात फूलो की” बाजार फ़िल्म और ”एक चमेली के मुंङवे तले, दो बदन प्यार की आग में जल गए”-चा चा चा फ़िल्म में मशहूर हुई।
मख्दूम मोहिउद्दीन आज भी प्रासंगिक है। उनकी जन्मशती का समापन हो रहा है ,एक और मुक्तिबोध की जन्मशती के प्रारम्भ होने के अवसर आ रहा है।

-शाशिनारायण स्वाधीन

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‘भारत माता की जय सुनिश्चित करें!” -आडवाणी

भारत का निर्माण करें ,विभाजन की शक्तियों को पराजित करें– आडवाणी

हिंदू हितों की पोषक बने राजनीती ,हिंदू अस्मिता की रक्षा करने वाली सत्ता बने !” – R.S.S

चुनाव अब अपने अन्तिम चरणों में प्रवेश कर रहे है । मतदान क्षेत्रो के एक और हिस्से में वोट डाले जायेंगे। मतदाता अपनी -अपनी पार्टिया चुनने में लगे हुए है ।
लेकिन इन सारी गतिविधियों के बीच एक पार्टी ऐसी भी है जो तय नही कर पा रही है कि आखिर वोटरों से क्या कहा जाए! अब तक मीडिया और अखबारों में साम्प्रदायिकता के जहरीले प्रचार और व्यक्तिगत चरित्र हनन ,वह भी अत्यन्त ही निम्न स्तर पर उतरकर, के अलावा भाजपा वोटरों से कुछ भी नही कह पाई है ।
ऊपर उल्लिखित नारों से पता चलता है कि भाजपा और उसका निर्देशक R.S.S अनिश्चितता और भयंकर दुविधा के दौर से गुजर रहे हैये दिलचस्प नारे और्गेनाइज़र और पांचजन्य के 12 और 19 अप्रैल के अंको में प्रकाशित किए गए है
आखिर ये नारे क्या दर्शाते है ?जब भाजपा ने अपना चुनाव शोषण पत्र जारी किया था और कई व्यक्तव्यप्रसारित किए थे तो उसे इस बात का कतई अंदाज नही था कि लोग इतनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करेंगे औरउसकी साम्प्रदायिकता का इतने बड़े पैमाने पर विरोध होगा ,खास कर समझदार ,संतुलित और पढ़े लिखे लोगो द्वारा । भाजपा और संघ परिवार को लगा कि सांप्रदायिक विभाजन के उनके अभियान के समर्थन में लोग उमडे चले आयेंगे । लेकिन सच्चाई यह है कि ख़ुद वरुण गाँधी को सुप्रीम कोर्ट के सामने यह आश्वाशन देना पड़ा कि वे ”गैर जिम्मेदाराना ” तरीके से सार्वजनिक व्यक्तव्य नही देंगे जिससे कि सांप्रदायिक भावनाएं भड़के । तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से सारे देश में साम्प्रदायिकता का जो कचरा फैलाया जा रहा था उस पर कुछ तो अंकुश लगाया जा सका है हालाँकि अन्य छद्म तारीको से ऐसा प्रचार जारी है ।
वरुण ने कहा कि उनके टेप फर्जी है और वे नही जानते कि उन्हें किसने बनाया (!) और वे भाषण देने के 12 दिनों बाद दिखाए जा रहे है। लेकिन यह सारा कुछ ग़लत बयानी है । इन विङीयो को तुंरत ही राष्ट्रिय टीवी नेटवर्को पर दिखाया गया ,और उनमें जो कुछ वरुण ने कहा है वह बिल्कुल ही असभ्य भाषा में ज़हरीली साम्प्रदायिकता उगली गई है।
वरुण ने अभी तक यह स्पष्ट नही किया है कि टेपों में प्रकट किए गए विचारों से वे सहमत है या नही और यही है मुख्य प्रश्न है । ओर्गेनाइज़र जैसे अखबारों ने बड़े ही हास्यास्पद तरीके से टेपों में वरुण कि लाइनों का अपना अर्थ पेश किया है यह दिखाते हुए कि उनके कहने का अर्थ ”यह नही वह था” ! टेपों के बाद दिए गए कई व्यक्तव्यों और भाषणों में वे अपने सांप्रदायिक विचारों कि पुष्टि करते है जिनसे साबित होता है कि उनके और उनकी पार्टी के यही विचार है ।

-अनिल राजिमवाले

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