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Archive for the ‘लोकसंघर्ष सुमन’ Category

निष्कर्ष
उ0प्र0 सरकार ने साम्प्रदायिक तत्वों की मिली भगत से योजनाबद्ध ढंग से दंगे में दंगाइयों को खुली छूट दे रखी थी। इस पूरे दंगे में तबाही, जानी नुकसान, लूट-पाट और इज़्ज़त के साथ जो खिलवाड़ किया गया उसका पुरा परिदृष्य गुजरात दंगों से लिया गया था। इस पर गुप्त सूत्रों का कहना है कि साम्प्रदायिक तत्वों ने पूरे भारत को गुजरात बनाने का अमल शुरू कर दिया है।
30 अगस्त को कवाल में हुई घटना को लेकर अल्पसख्ंयक समुदाय के लोगों ने जि़ला मुजफ्फरनगर में जुमा की नमाज़ के बाद प्रदर्षन किया। जिसमें कादिर राना ;M.L.A. ,B.S.P. राशिद सिद्दीकी ,S.P. मुरसलीन M.L.A. ,B.S.P. शाहिदुल आज़म ;Former Minister, Congress Party और मौलाना नज़ीर ने भड़काऊ भाषण दिए। बहुसंख्यक समुदाय की ओर से 31 अगस्त, 5 सितम्बर और 7 सितम्बर 2013 को आर0एस0एस0 और भाजपा के गठजोड़ में तीन महापंचायतें आयोजित की र्गइं। 5 सितम्बर की महापंचायत गाँव लिसाढ़ मंे हुई, जिसका नेतृत्व विनोद प्रमुख, बाबा हरिकिशन, बाबा सीताराम ;V.HP. और संघ के कार्यकर्ता विजेन्द्र (सचिन और गौरव का सम्बन्धी) ने किया। इस महापंचायत में 7 सितम्बर को होने वाली महापंचायत की घोषणा की गई और बहुसंख्यक समुदाय के लोगों से महापंचायत में हथियार लेकर आने के लिए कहा गया।
सभी लोग महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान के द्वारा भड़काए गए। महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान भाजपा के स्थानीय नेता हुकम सिंह के सहयोगी हैं। दंगा भड़काने में हुकम सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं के एक अन्य सहयोगी ब्रह्मपाल के घर में बहुत अधिक मात्रा में हथियार छुपाए गए। बिल्लू प्रधान और महाराज सिंह द्वारा दंगाइयों को हथियार बाँटे गए।
बाबा हरिकिशन ने गाँव लिसाढ़ के बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को मुसलमानों के खिलाफ़ साम्प्रदायिक ंिहंसा भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने महापंचायत आयोजित की और मुसलमानों को मारने के लिए बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को उकसाया।
सभी जानते हैं कि अगले साल 2014 मे देश में संसदीय चुनाव है। इन्हीं चुनावों की तैयारी के सिलसिले में पिछले दो साल में देश की 1150 से भी ज़्यादा जगहों पर दंगे कराए जा चुके हैं। जिसमें 100 से अधिक जगहों पर दंगे उ0प्र0 में हुए। हम पिछले कई चुनाव से देख रहे हैं कि हर चुनाव से पहले कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर जनता के बीच फूट के बीज बो दिए जाते हैं। इस माहौल में सबसे बड़ा नुकसान एतबार और विष्वास का हुआ है। एक ही छत के नीचे एक ही हुक्का गुड़गुड़ाने वाले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाएँगे तो समाज कैसे बचेगा। राजनैतिक लोग वोट बैंक के लिए ऐसा करवा रहे हैं। इस साम्प्रदायिक आग को बुझाने के लिए कोई भी राजनैतिक दल आगे नहीं आया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दगंा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के दौरान शरणार्थी शिविरों में दंगा पीडि़तों से मुलाकात करके कुसूरवारों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही और दंगे के समय बर्बाद हुए मकान और दुकानांे के पुनर्वास का विष्वास दिलाया। परन्तु लोगों में ग़म और ग़ुस्सा, भय और दहशत अभी भी बरकरार है। काँधला में लोगों ने मुख्यमंत्री को काले झण्डे भी दिखाए। दंगा पीडि़तांे से ऐसे ही वादे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी किए। अब नेताओं को वोट बैंक खिसकता नज़र आ रहा है तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। परन्तु अभी भी दंगा पीडि़तो को न तो केन्द्र सरकार और न ही उ0प्र0 सरकार की ओर से कोई सहायता मिली है। इससे इन्सानियत शर्मसार हो रही है। गाँव के क्षेत्रों में पहुँची राजनीति ने शहरों की आग को भी गाँवों में पहुँचा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से साबित होता है कि मुलायम सिंह ने एक बार फिर मुसलमानों के साथ विष्वासघात किया है।
मुज़फ्फरनगर और शामली में जो कुछ हुआ वह उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब के मुताबिक बिल्कुल नहीं है। इन परिस्थितियों में आम जनता को ही भूखे पेट सोना पड़ रहा है। ऐसे में बैठकर सफे़द पोश सुखि़र््ायाँ देख रहे हैं जबकि दंगे की चपेट में आए घरों में मातमी सन्नाटा छाया है। साम्प्रदायिकता के ज़हर में जितनी मुसीबत हिन्दू झेल रहे हैं उतना ही नुकसान मुसलमान उठा रहे हैं। अहम सवाल यह भी है कि आखि़र इन्सानियत की डोर कहाँ पर और किस तरह कमज़ोर पड़ी है कि 5 प्रतिषत दंगाई 95 प्रतिशत शांतिप्रिय लोगों पर हावी हैं। सँभलने, सोचने के लिए अभी मौक़ा और वक्त दोनों है। बाँटती राजनीति से मोर्चा लेकर शांति पसंद नागरिकों को एकजुटता का आईना दिखाना होगा।
दंगे में लाशो के ढेर लग गए। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने लाशो को खुले में सड़ने के लिए छोड़ दिया। चील कौए शवों पर मंडराते रहे और उन्हें नोचते रहे। लोग यह दृष्य देखकर आहत हुए। न जाने कितने लाचार लोग कड़वी सच्चाई से इस समय दो चार हैं। घरों में क़ैद हैं या घरों को छोड़कर जा चुके हैं। व्यापार ठप्प हैं। घरों में खाने पीने का सामान नहीं, बच्चे दूध को तरस रहे हैं। पढ़़ाई का नुकसान है। लेंकिन फ़ायदा किसे है? एकांत में सेाचोगे तो सिर्फ वही चेहरे दिखेंगे जो लोगों को इन्सान नहीं वोट समझते हैं।
उत्पात से प्रभावित गाँवों में बेसिक शिक्षा की रीढ़ टूट गई। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में दलित और मुस्लिम समाज के बच्चे ही पढ़ते हैं। हिंसा की घटनाओं के बाद लगभग 200 परिषदीय स्कूल ऐसे हैं जहाँ ताला लटका हुआ है। डर के मारे शिक्षक और बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं।
जिस घटना (लड़की के साथ छेड़छाड़ और उसके बाद शाहनवाज़, सचिन और गौरव की मौत) को मीडिया दंगों की असल वजह बना कर पेश कर रही है वह दरअसल है नहीं। शाहनवाज़ और दूसरे दो लड़कांे की मौत के बारे में जो एफ़.आई.आर. दर्ज कराई गई उसमें कहीं भी लड़की छेड़ने तक का जि़क्र नहीं है। एक मामूली घटना को साम्प्रदायिक दंगे का रूप दिया गया, दो वर्ष पहले के दगों के एक वीडियो को भाजपा के परम्परागत समर्थकों द्वारा सोशल नेटवर्किंग और मोबाइल फ़ोन के ज़रिए, सचिन और गौरव की हत्या का वीडियो बताकर लोगों को दिखाया गया। इस वीडियों को सबसे पहले संगीत सिंह सोम ने सोशल नेटवर्क के माध्यम से जारी किया। इस वीडियों ने बहुसंख्यक समुदाय के लोगों के दिलों में बदले की भावना को उकसाया।
मुज़फ़्फ़रनगर में अभी स्थिति नियन्त्रित भी नहीं हो पाई है और अधिकतर दंगा पीडि़त शरणार्थी कैम्पों से घर नहीं लौट पाए हैं, लेकिन छिट-पुट हिंसा अभी भी जारी है। 10 अक्टूबर देर रात को मुज़फ़्फ़रनगर में 2 लोगों की हत्या से स्थिति फिर तनावपूर्ण हो गई। मुज़फ़्फ़रनगर में मोटरसाइकिल सवार युवको ने सैलून के मालिक गाँव गढ़ी निवासी 28 वर्षीय आबिद की गोली मारकर हत्या कर दी, तो वहीं मेरठ के लावड गाँव के पास जमालपुर रोड पर बदमाशों ने एक कारपेन्टर मोहसिन और उसके भाई शौकीन पर चाकुओं से हमला किया। जिसमें मोहसिन की मौके पर ही मृत्यु हो गई। इसके बाद 4 नवम्बर 2013 को बुढ़ाना मार्ग पर हुसैनपुर गाँव में एक खेत मंे अल्पसंख्यक समुदाय के 3 युवकों को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने कत्ल कर दिया और गाँव फ़ुगाना के जोगियाखेड़ा के राहत शिविर मंे रह रही युवती के साथ बहुसंख्यक समुदाय के 2 युवकांे ने खेत मे खींचकर सामूहिक रुप से बलात्कार किया।
सुप्रीम कोर्ट में मुज़फ्फ़रनगर ’सांम्प्रदायिक हिंसा’ मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील राजीव धवन और रवि प्रकाश मेहरोत्रा ने बृहस्पतिवार 17 सितम्बर 2013 को अपनी रिपोर्ट पेश की। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, मेरठ, बाग़पत और सहारनपुर मंे कुल 128 मामले दर्ज हुए हैं। इसमें 11 हिन्दू घायल और 57 मुसलमान, जबकि 16 हिन्दुओं की और 46 मुसलमानों की मौत हुई। इसी तरह दर्ज मामलों में अभियुक्तों का विवरण भी हिन्दू व मुसलमान के आधार पर दिया गया। राज्य सरकार ने बताया कि इन 5 जि़लों मे कुल 876 लोग अभियुक्त हैं जिनमे से अभी तक 243 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 12 लोगों पर रासुका लगाई गई है, और 16,112 लोगों के खिलाफ ़प्रिवंटिव एक्शन लिया गया है। इसके अलावा 5,708 लोगों से अच्छे आचरण का बंधपत्र लिया गया है। सरकार ने बताया कि कुल 128 एफ.आई.आर. दर्ज की गई। गत् 13 अक्टूबर तक राहत शिविरों में भी 325 एफ.आई.आर. औरशिकायतें दर्ज कराई गईं। जबकि सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए तथ्य सर्वेक्षण के अनुसार साम्प्रदायिक हिंसा में घायल और मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। सरकारी तंत्र निष्क्रिय रहा। 27 तारीख़़ के दंगों से पूर्व ही उ0प्र0 के मुख्य सचिव ने राज्य सरकार को सर्तकता बरतने हेतु आदेश दे दिए थे।
यही नहीं केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी सरकार को आगाह किया था। लेकिन उ0प्र0 सरकार ने इन गुप्त सूचनाओं के बावजूद भी कोई सर्तकता नहीं बरती और पष्चिमी उ0प्र0 के मुज़फ़्फ़रनगर और उसके आस-पास के जि़लों को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया। साम्प्रदायिक दंगे और उनके बाद बने माहौल का राज्य का हर राजनैतिक दल अपने तरीके से फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। दंगा पीडि़त अपने मृतकांे की और लापता लोगों की तलाश में व्यस्त हैं। गिनती राजनैतिक दल भी कर रहे हैं पर हिंसा से प्रभावित लोगों की नहीं, ’वोटों’ की। कितने वोट किसके खाते में आए और विरोधी के खाते में कितने वोट गए इसका हिसाब-किताब चल रहा है। यदि इन साम्प्रदायिक ताक़तों को न रोका गया तो उ0प्र0 ही नहीं बल्कि पूरा भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस जाएगा। दंगों की न्यायिक जाँच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ़ सख्त से सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।
-डा0 मोहम्मद आरिफ (चेयरमेन)
सेन्टर फ़ाॅर हारमोनी एण्ड पीस एवं (संयोजक)
आल इंडिया सेक्यूलर फोरम (उ0प्र0)
मो0-9415270416
तथ्य सर्वेक्षण टीम के सदस्य-
1. शाहीन अन्सारी (सहारनपुर)
2. अब्दुल्लाह (सहारनपुर)
3. शाहनवाज़ बदर (देवबन्द, सहारनपुर)
4. सुरेश कुमार ’अकेला’ (वाराणसी)
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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bhookh hadtal
बाराबंकी। किसानो की 163 ग्राम पंचायतों की जमीन छीन कर उत्तर प्रदेश सरकार टाउनशिप बसाना चाहती है। बड़े-बड़े माल, स्विमिंग पूल, फाइव स्टार होटल बनाने का कार्यक्रम है। किसानो की आम की बाग़, लहलहाते केलों के झुण्ड, धान की फसलें, गेंहू के खेत, मेंथा की हरियाली की जगह किसानो की रोजी-रोटी छीन कर उनको भूखा मार देने की उक्त योजना के विरोध में ग्राम मुबारकपुर में आज से क्रमिक भूख हड़ताल प्रारंभ हो गई है।
यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद् सदस्य डॉ उमेश चन्द्र वर्मा ने बताया कि आज क्रमिक भूख हड़ताल पर कांशीराम के नेतृत्व में महेश प्रसाद, राम विलास, मायाराम व भिखारी लाल 24 घंटे के लिए बैठे हैं। यह क्रमिक भूख हड़ताल 20 अक्टूबर तक चलेगी।
डॉ उमेश वर्मा ने आगे बताया कि 17 अक्टूबर से किसान सभा के नेतृत्व में विशुनपुर, बरौली जाटा, मसौली, मलूकपुर, जीयनपुर, मोहम्मदपुर बंकी, कोलागांव, भगवंतनगर, अजगना, चंदनपुरवा, महुवामऊ, अलीपुर समेत अन्य कई गाँवों में क्रमिक भूख हड़ताल किसान प्रारभ करेंगे। किसानो की यह जंग भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अंतिम निर्णय होने तक जारी रहेगी। किसान एक भी इंच जमीन अधिग्रहण नहीं करने देगा।

नीरज वर्मा
मंत्री
अखिल भारतीय किसान सभा बाराबंकी

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मोहल्ले के दादा को जब दादागिरी मिली तो उसने अपनी धौंस ज़माने के लिये बहुत छोटे से व्यक्ति से लड़ गया और 25 साल तक लड़ता रहा। दादा के घर में जब लाशें जाने लगीं तब रोना पीटना मच गया और कुछ समय के लिये वह चुप हो गया। फिर उसने ताकत बटोरी और तमाम सारे लोगों के घर लोगों को मार – मार कर कब्ज़ा कर लिये और फिर वह अपने को शेरे बब्बर समझने लगा। उसकी समझ में आ गया कि मोहल्ले में उसके बगैर पत्ता नहीं हिलना चाहिये लेकिन फिर भी उस दादा के दूसरे प्रतिद्वंदी ने चुनौती दे दी। आजा तेरी दादागिरी भुला देंगे, तेरी टाँग तोड़ देंगे, मेरे बाप दादाओं ने तुमको हमेशा ठीक किया था और जब-जब ठीक किया तो तुम कई कई साल तक मोहल्ले में मुँह दिखने के काबिल नहीं रहे।

उसी तरीके से इस दुनिया में अमेरिका जब विएतनाम से लड़ा तो 25 साल तक लड़ने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी पूँछ दबा कर मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे थे किन्तु इराक युद्ध के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद ने कई देशों की सम्प्रभुता का हरण कर दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। दुनिया के इस दरोगा के पीछे संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपीय यूनियन तथा कई अन्य देश विभिन्न देशों की प्राकृतिक सम्पदा को लूटने के लिये लामबन्द हो गये।

रणधीर सिंह सुमन, लेखक जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता और हस्तक्षेप.कॉम के सह सम्पादक हैं

संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका यह हो गयी है कि जो देश अमेरिकी साम्राज्यवाद के दिशा निर्देशों को न माने उसके ऊपर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा कर उसकी ताकत को समाप्त करना और आर्थिक ताकत की कमी आते ही अमेरिकी साम्राज्यवादी मुल्क बाज की तरीके से उसको झपट लेते थे किन्तु उत्तरी कोरिया ने इस दुनिया के दादा को चुनौती देकर कहा है कि आ निपट ले तुझे छठी का दूध याद दिला दिया जायेगा। किम जोंग उन ने चुनौती देकर कहा कि है अमेरिकी साम्राज्यवादी तू मुझसे क्या लड़ेगा तेरे बाप दादाओं का पानी का जहाज जब हमने छीना था वह आज तक ले नहीं पाया।

बात सन 1968 की है। दुनिया में महाशक्ति होने का दंभ भरने वाले अमेरिका के लिये यह साल बहुत फजीहत भरा था। उत्तर कोरिया ने इसी साल अमेरिकी नौसेना के पोत को अपने कब्जे में ले लिया था। यही नहीं, जहाज में मौजूद सभी सैनिकों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। बाद में इन अमेरिकी सैनिकों को रिहा कर दिया गया, लेकिन अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस पब्लो को उत्तर कोरिया ने कभी अमेरिका के हवाले नहीं किया। आज भी उत्तर कोरिया में यहां जहाज खडा है।

1968 में अमेरिकी जहाज को अपने कब्जे में ले दुनिया भर में सनसनी मचा चुका उत्तर कोरिया एक बार फिर हरकत में आया। इस बार उत्तर कोरिया ने एक कदम आगे बढ़ते हुए एक अमेरिकी टोही विमान को मार गिराया। नतीजा यह हुआ कि इस घटना में कुल 31 अमेरिकी मारे गए।

ऐसा नहीं है कि उत्तर कोरिया सिर्फ अमेरिका से वैर पाल कर बैठा है, बल्कि उसके निशाने पर उसके सहयोगी भी हमेशा रहते हैं। इसका सबसे बड़ा सुबूत देखने को मिला था सन् 1998 में जब ऐसी ही तनातनी के दौर में उत्तर कोरिया ने दो मिसाइलें दाग दीं। ये जापान का आसमान चीरते हुए निकली और जापानी सरकार की नींद उड़ गई। उत्तर कोरिया की इस हरकत की अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूब आलोचना भी हुई, लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पडा।

वर्तमान में उत्तरी कोरिया ने सभी देशों से कहा है कि वह अपने दूतावास 10 अप्रैल तक खाली कर दें अन्यथा उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उत्तरी कोरिया की नहीं होगी। इस घटना के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद की स्थिति मोहल्ले के उसी दादा के तरीके से हो गयी है कि वह मोहल्ले के चौराहे पर अपनी शर्ट के बटन खोल कर खड़ा नहीं हो सकता है और मोहल्ले के दादा के चमचे मर्सिया पढ़ने लगे हैं। परमाणु युद्ध हो जायेगा, मानवता नष्ट हो जायेगी, लाखो लोग मारे जायेंगे, शांति के गीत गाये जाने चाहिये लेकिन जब दादा मोहल्ले में लोगों के घरों में घुसकर कत्लेआम कर रहा होता है या लूटपाट कर रहा होता है तब उसके चमचे उसके शौर्य गाथा और चरण वंदना में लग जाते हैं और कोई भी पिटने वालों को बचाने के लिये आगे नहीं आता है तब न्याय, समानता, लोकतन्त्र, विश्व बंधुत्व किताबी हो जाता है।

आज जरूरत है कि साम्राज्यवाद का नाश हो और इसके लिये दुनिया की इंसानी ताकतों को हर कुर्बानी देने के लिये तैयार रहना चाहिये। उत्तरी कोरिया के ललकारने से दुनिया का जन गण प्रसन्न है। विशेषकर मेहनत कश अवाम।
-रणधीर सिंह सुमन

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The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2012 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

4,329 films were submitted to the 2012 Cannes Film Festival. This blog had 15,000 views in 2012. If each view were a film, this blog would power 3 Film Festivals

Click here to see the complete report.

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राष्ट्रपति भवन में थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें अपनी टेबल की ओर आता देखा। मई घबरा गयी और कुछ नर्वस हो गयी। तब तक नेहरूजी मेरे पास आ पहुंचे। इतने नजदीक देखकर मुझे कुछ सूझ नही रहा था। मैं खड़ी हो गयी। वे काफी वरिष्ठ थे लेकिन उनकी उम्र से उनके व्यक्तित्व पर तब तक कोई असर नहीं पड़ा था। उनके साथ उनका कोई असिस्टेंट भी चल रहा था। मेरी ओर देखने के बाद प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखा। उसने जल्दी से अंग्रेजी में उन्हें कहा, “शी इज एन एमपी”ज वाइफ फ्रॉम एम.पी।” मुझे आज तक नहीं पता कि उस व्यक्ति को ये कैसे पता था। पर ये सुनकर नेहरूजी ने कुछ क्षण मुझे अपलक देखा और फिर आँखों में प्रश्न लाकर पूछा, “होमी दाजी?” मैंने “हाँ” में सर हिलाया लेकिन मैं क्या बताऊँ कि मेरी हालत क्या हो रही थी। नेहरूजी द्वारा पहचान लिये जाने से बहुत ख़ुशी तो हो ही रही थी लेकिन पता नहीं क्यों, शर्म भी बहुत आ रही थी।
मेरा सर हिलाना था कि नेहरूजी ने मुझे कन्धों से पकड़ लिया और बोले, “ही इज ए ब्रिलियंट बॉय।” उस वक्त दाजी सबसे काम उम्र के सांसद थे। फिर नेहरु जी बोले, “पता नहीं ये लड़का कहाँ-कहाँ से चीजें ढूंढ कर लाता है और हमसे पार्लियामेंट में इतने सवाल करता है कि हमें मुश्किल हो जाती है। तुम जरा उसकी लगाम खींचकर उसे घर में ही रखा करो ताकि हमें थोडा आराम रहे। हम रोज ये सोचकर सदन में जाते हैं कि पता नहीं आज दाजी क्या पूछेगा।” नेहरु जी के मजाकिया लहजे ने मेरी घबराहट कुछ कम कर दी। मैंने भी सम्मान से जवाब दिया, “सर, संसद बेलगाम न हो जाए, इसके लिये मैंने उनकी लगाम छोड़ दी है।” यह सुनते ही नेहरूजी ठहाका मारकर हँसे और मेरी पीठ थपथपाकर अपने साथ वाले व्यक्ति से बोले, “देखो, ये तो दाजी से भी दो कदम आगे है।” कहकर वे आगे बढ़ने लगे। मैंने उन्हें नमस्कार किया। वे तीन-चार कदम आगे चलकर रुके और वापस आकर बोले, ” अगर वह मेरी पार्टी में आ जाए तो मैं उसे चीफ मिनिस्टर बना सकता हूँ।” मैं एकदम हडबडा गयी। फिर मुंह से निकला, “सर , एक ईमानदार और समर्पित कम्युनिस्ट वहां कांग्रेस में कैसे काम कर सकता है? वह जहाँ है, वहीँ ठीक है। उसे वहीँ रहने दीजिये।” कह तो दिया लेकिन मन में बहुत घबराहट भी हुई। इतने महान, विद्वान और देशभक्त व्यक्ति को उसकी पार्टी के बारे में ऐसा कहना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था। पर अब क्या। अब तो बात निकल गयी। लेकिन नेहरूजी की बात ही कुछ और थी। उन्होंने हँसते हुए मेरी पीठ पर एक बुजुर्ग की तरह हाथ फेरा और चले गए।
यह बात पेरिन दाजी की किताब “यादों की रौशनी में” संपादक विनीत तिवारी से साभार लिया गया है।

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डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती के मौके पर अखबारों में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है – ”मुझे याद करेंगे लोग मेरे मरने के बाद“। मरने के बाद मनुष्य की अच्छाइयों को याद करने की प्राचीन भारतीय परम्परा है। इसलिये स्वाभाविक ही लोहिया ने ऐसी आशा की होगी। महाभारत युद्ध की विनाश लीला का सेनापति भीष्म ने भी मरने के ठीक पहले शरशैया पर लेटे अपनी ‘प्रतिज्ञा’ के दुष्परिणामों और यहां तक कि उस प्रतिज्ञा को न तोड़ पाने की अपनी विवशता पर अफसोस जाहिर किया था। लोहिया आज जिन्दा होते तो यह मानने के अनेक कारण हैं कि वे भीष्म की तरह विवेकहीन प्रतिज्ञा से बंधे रहने की गलती नहीं दोहराते और वे खुलकर अपने शिष्यों के कारनामों के विरूद्ध खड़े हो जाते। उन्होंने केरल में अपनी सोशलिस्ट पार्टी की सरकार द्वारा गोली चलाये जाने का विरोध किया और सरकार से इस्तीफा की मांग की थी।
लोहिया अपने को ‘कुजात गांधीवादी’ कहते थे और गांधी जी के शिष्यों को ‘मठवादी’ कह कर निंदा करते थे। पर लोहिया की विडंबना यह रही कि उन्होंने व्यावहारिक राजनीति में गांधी जी के साधन और साध्य की शुद्धता के सिद्धान्त से हमेशा परहेज किया। लोहिया ने आजादी के बाद फैल रही आर्थिक विषमता के प्रश्न को लेकर बहुत ही जोरदार तर्कपूर्ण तरीके से आम आदमी की वास्तविक आमदनी ‘तीन आने’ का कठोर सत्य उजागर किया, किन्तु आर्थिक विषमता को पाटने के जिस कार्यक्रम पर अमल किया, उसका समाजवाद से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं था। कहते हैं, नरक जाने का रास्ता नेक इरादे से खोदे गये थे। एक जमाने में कांग्रेस का विकल्प बनने का सशक्त दावेदार समाजवादी आन्दोलन का आज कहीं अता-पता नहीं है। नाम के समाजवादी भी आज कोई समाजवादी नहीं रह गये। लोहिया जन्मशती के मौके पर मूल्यांकन जरूरी है कि ऐसा क्यों हुआ?
राजनीति में विचार और आचार का मेल कठिन होता है। लेकिन राजनीति के मदारी कठिन से कठिन बेमेल कामों को सहज भाव से अंजाम देते हैं। लोहिया भारतीय संस्कृति और सभ्यता के पक्के समर्थक थे, किन्तु वे कट्टर रूढि़विरोधी प्रतिमाभंजक भी थे। वे राजनीति के चमकते सितारों का प्रतिमाभंजन कठोरता से करते थे। उनके तर्कों के तीक्ष्ण वाण राजनीति के बड़े से बड़े स्थापित सूरमाओं को विचलित करते थे। लोहिया ने एक तरफ जाति तोड़ो अभियान चलाया तो दूसरी तरफ ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ के नारे के साथ जातियों की संख्या के आधार पर आरक्षण और सत्ता में भागीदारी का राजनीतिक दावा प्रस्तुत किया। इस नारे का व्यावहारिक परिणाम, या यों कहें कि लाजिमी नतीजा यह हुआ कि गरीबी-अमीरी का संघर्ष पृष्ठभूमि में ओझल हो गया और जातीय एवं साम्प्रदायिक अस्मिता का टकराव भारतीय राजनीति का मुख्य एजेंडा बन गया।
यद्यपि जाति, धर्म और लिंग का भेदभाव संविधान विरूद्ध है, किन्तु लोहिया ने जाति आधारित पिछड़ावाद को क्रान्तिकारी घोषित किया। बाद के दिनों में जातिवाद और सम्प्रदायवाद लोकतांत्रिक चुनाव के अचूक हथकंडे बने। एक ने कहा: ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ तो दूसरे ने कहा: ‘गर्व से कहो हम चमार हैं’। ‘जाति तोड़ो’ का सामाजिक आन्दोलन ‘जाति समीकरण’ के राजनीतिक प्रपंच में तब्दील हो गया। समाजवादी आंदोलन के जिन नेताओं ने अपने नामों से जाति सूचक पदवी हटा ली थी, उनके शिष्यों ने मतदाताओं के मध्य अपनी जातीय पहचान बनाने के लिये फिर से जाति सूचक पदवी (टाइटल) धारण कर ली। मुलायम सिंह ‘मुलायम सिंह यादव’ हो गये। उसी प्रकार लालू प्रसाद ‘लालू प्रसाद यादव’ हो गये। अपने विचारों और आचारों के परस्पर विरोधी मिश्रण के ऐसे ही अद्भूत प्रतिनिधि थे लोहिया। यहां यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा कि ऐसी ही उनकी मंशा थी, प्रत्युत ऐसे नारों का यही हस्र होना था। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खायें?
राजनीति की तात्कालिक आवश्यकताएं अनेक अवसरवाद को जन्म देती हैं और फिर उस अवसरवाद का औचित्य ठहराने के लिए सिद्धांत और तर्क ढूंढ़ लिये जाते हैं। ऐसा ही एक नारा था ‘गैर-कांग्रेसवाद’। सत्ता में कांग्रेसी एकाधिकार तोड़ने के लिए लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद का मोर्चा खोला। उन्होंने सरकार को बराबर उलटने-पलटने की प्रक्रिया को ‘जिन्दा लोकतंत्र’ बताया और सत्ता पर कब्जा करने के लिए टूटो, जुड़ो और ताबे की रोटी को उलटने-पलटने की व्यूह-रचना विकसित की। पर उनके जीते जी उन्हीं की देखरेख में इस सिद्धान्त पर बिहार में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की हवा निकाल दी उनके ही परम शिष्य बी.पी.मंडल ने। ताबे की रोटी को उलटने-पलटने की लोहियावादी तकनीक अजमाते हुए बी. पी. मंडल बिहार के मुख्यमंत्री बन गये। बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार को तोड़ दिया लोहिया के ही शिष्यों ने, और वह भी कांग्रेस की सहायता से। ऐसा कर लोहिया के शिष्यों ने बिहार में फिर से कांग्रेस राज की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया।
सर्वविदित है कि यही बी. पी. मंडल बाद में पिछड़ावाद के पुरोधा बने। इनके नाम पर मंडलवाद का झंडा लहराया जो लोहियावाद से भी ज्यादा तेजी से लोकप्रिय हुआ। फिर भी मंडलवादियों के प्रेरणाश्रोत लोहिया ही बने रहे।
गैर-कांग्रेसवाद के लोहियावादी पुरोधाओं में मंडल अकेले नहीं रहे, जिन्होंने सत्ता के लिये कांग्रेसी बैशाखी को थामने में कभी संकोच नहीं किया और कांग्रेस को स्थायित्व प्रदान किया। ख्यात लोहियावादी मुलायम सिंह और चर्चित जेपी आन्दोलन के वीर बांकुड़ा लालू प्रसाद ने भी कांग्रेस की बैशाखी से कभी संकोच नहीं किया। परमाणु के मुद्दे पर जब वामपक्ष ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व की कांग्रेस नीत संप्रग-एक सरकार से समर्थन वापस लिया तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने कांग्रेस सरकार को संजीवनी बूटी प्रदान किया। यही नहीं 1.76 लाख करोड़ के 2-जी घोटाले की जांच कर रही लोक लेखा समिति में मतदान के समय सपा और बसपा कांग्रेस सरकार के संकटमोचक की भूमिका में सामने आये।
लोहिया समानता और सादगी के प्रतीक और भ्रष्टाचार के प्रखड़ विरोधी थे, किन्तु उनके आधुनिक शिष्य चारा घोटाला और आय से अधिक अप्रत्याशित धन-सम्पदा रखने के अभियुक्त हैं। अपने शिष्यों के कारनामों को देखकर लोहिया की आत्मा निश्चय ही विचलित होती होगी।
देश में आज भी अनेक व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह हैं, जो दूसरों को अशुद्ध और अपने को विशुद्ध लोहियावादी होने का दावा करते हैं। उन सबों को वैसा करने का बराबर का हक है। पर प्रश्न यह है कि यदि आज लोहिया जिन्दा होते तो क्या वे अपने आधुनिक शिष्यों की पंक्ति में खड़ा होना पसन्द करते?

गतिशील उत्पादक शक्तियां

लोहिया ने अनेक पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं। उनमें एक है ‘इकोनाओमिक्स आफ्टर माक्र्स’ (माक्र्स से आगे का अर्थशास्त्र)। माक्र्सवादी वर्ग दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए लोहिया कहते हैं: ‘गतिहीन वर्ग जाति है और गतिशील जाति वर्ग है।’ उनका यह जुमला भी उनके गंभीर अंतद्र्वन्द्व को प्रकट करता है। यह जुमला मुर्गी से अंडा कि अंडा से मुर्गी जैसी पहेली है। यद्यपि लोहिया अपने इस कथन में गति कि सत्यता स्वीकारते हैं, किन्तु साथ ही गति के स्वाभाविक फलाफल को नकारते हैं। इस जुमले के दोनों विशेषण ‘गतिहीन’ और ‘गतिशील’ आकर्षक किन्तु अर्थहीन और मिसफिट आभूषण मात्र हैं।
समाजशास्त्री हमें बताते हैं कि गति के अभाव में विकास प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है। विकास प्रक्रिया में गति अंतर्निहित होती है और उसी प्रकार उसका प्रतिफल परिवर्तन भी। वर्ग और वर्ग दृष्टिकोण औद्योगिक क्रान्ति के बाद पैदा हुआ कारक है। उसके पहले जातियां जन्म ले चुकी थीं। सामंती युग में जातियां अस्तित्व में आयीं। सामंती युग के पहले वर्गों का उदय ही नहीं हुआ था तो उसका जाति में संक्रमण कैसे संभव हुआ होगा? अगर यह मान भी लिया जाये कि लोहिया का यहां मतलब आदिम श्रम विभाजन से है, जिसका जातीय रूपांतरण सामंती समाज में हुआ तो यह मानना और भी ज्यादा तार्किक होगा कि सामंती युग की ‘गतिशील जातियां’ ही औद्योगिक युग का आधुनिक मजदूर है। जाहिर है, ऐसी अवधारण हमें अंधगली में धकेलती है।
मानव विकास की प्रक्रिया किसी भी अवस्था में गतिहीन नहीं होती है। समाज विकास निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, जो हमेशा इतिहास के एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु की तरफ बढ़कर परिवर्तन और फिर परिवर्तन को जन्म देती है। समाज विकास में कभी भी गतिहीन अवस्था नहीं आती। इसलिये ‘गतिहीन वर्ग’ और ‘गतिशील जाति’ की अवधारणा गुमराह करने वाली भ्रामक मुहावरेबाजी से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
माक्र्स ने मजदूर वर्ग को सामाजिक प्रगति का वाहक बताया और वर्ग विहीन, शोषण विहीन और शासन विहीन समाज का खाका तैयार किया, जबकि लोहिया मजदूर वर्ग को ‘गतिहीन’ वर्ग बता कर उसे जाति की जड़ता में डूबने का दोषी मानते हैं और जातियों को गतिशील बनाकर जातिविहीन समाज निर्माण का खाका बुनते हैं। 1980 के बाद के तीन दशकों में हमने देश की ‘गतिशील जातियों’ का जलवा देखा है। क्या इससे लोहिया का सपना पूरा होता दिखता है? लोहिया की जन्मशती के मौके पर इसका मूल्यांकन जरूरी है।
इन वर्षों के व्यावहारिक जीवन में हमने देशा है कि यथास्थितिवाद की शासक पार्टियां – कांग्रेस और भाजपा ने जातीय राजनीति का प्रबंधन (उनके शब्दों में सोशल इंजीनियरिंग) ज्यादा सक्षम तरीके से किया और इसी अवधि में बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान समेत केन्द्र में भी भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई। इस कवायद में लोहियावादी सोशलिस्ट भी जहां-तहां तांक-झांक करते और कभी इधर तो कभी उधर कंधा लगाते देखे गये। गरीबों की खुशहाली का संघर्ष संप्रदायवाद और जातिवाद की मधांधता में डूब गया। गतिशील जाति और संप्रदाय ने पूंजीवादी सत्ता को स्थायित्व प्रदान किया। पूंजीवाद सामंती पारंपरिक सामाजिक विभाजन को सहलाकर अपना आधार मजबूत करता है और बदले में कुछ रियायतें भी पेश करता है। देश में जब मंडल-कमंडल युद्ध चल रहा था तो उसी अवधि में वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीतियों का घोड़ा सरपट दौड़ रहा था।
यहां नस्लभेद का जातिभेद के साथ घालमेल करना गलत होगा। नस्ल का सम्बंध रक्त से होता है, जबकि जाति का सम्बंध आदिम श्रम विभाजन अर्थात कर्म से जो कालक्रम में जन्मजात हो गया। एक रक्त का जन समूह एक जगह पला-बढ़ा और इससे रक्त आधारित नस्लीय जनसमूह का निर्माण हुआ। कालक्रम में पलायन और प्रव्रजन से नस्लों का भी मिश्रण और समन्वय हुआ। खलीफा, सरदार, राजा, बादशाह, किंग, सम्राट आदि रक्त आधारित कबीलाई प्रभुत्व व्यवस्था की प्रारंभिक अभिव्यक्तियां हैं।
औद्यौगिक क्रान्ति के बाद जो नया पूंजीवादी बाजार बना, उसमें रक्त सम्बंधों पर आधारित पुराना नस्लीय विभाजन और जन्मजात जातियों के अस्तित्व अर्थहीन होते चले गये। पूंजीवादी अर्थतंत्र में जाति आधारित कार्यकलाप सिकुड़े और उनकी सामाजिक भूमिका शादी-विवाह और पर्व-त्यौहारों तक सीमित हो गयी।
पूंजीवाद माल उत्पादन और व्यापार का मकसद मुनाफा कमाना होता है। लाभ लिप्ता की पूर्ति के लिये इंसानी शोषण प्रणाली का दूसरा नाम पूंजीवादी निजाम है। लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि एक ही रक्त समूह का शोषक अपने ही रक्त समूह के लोगों का शोषण बेहिचक कर रहा है। इसलिये पूंजीवाद में स्वार्थ का सीधा टकराव शोषितों और शोषकों के बीच हो गया। एक तरफ सभी नस्लों व जातियों का विशाल शोषित जनसमूह का नया वर्ग मजदूरों और किसानों के रूप में प्रकट हुआ, वहीं दूसरी तरफ जमींदार और पूंजीपति के रूप में नया अत्यंत अल्पमत शोषक वर्ग चिन्हित हुआ।
क्रान्ति का अर्थ होता है व्यवस्था परिवर्तन इसलिये औद्योगिक क्रान्ति के बाद जो नई पूंजीवादी व्यवस्था उभरी उसने पुराने सामंती सम्बंधों को उलट-पुलट कर रख दिया। कार्ल माक्र्स बताते हैं आर्थिक परिवर्तन की गति तेज होती है, किन्तु आर्थिक प्रगति के मुकाबले सामाजिक रिश्तों में परिवर्तन की गति मंद होती है। फिर परिवर्तन के बाद भी नये समाज में पुराने सामाजिक सम्बंधों के अवशेष विद्यमान होते हैं।
उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों में निरन्तर हो रहे बदलाव का विशद विश्लेषण करते हुए माक्र्स इस नतीजे पर पहुंचे कि वैज्ञानिक तकनीकी अनुसंधान के चलते उत्पादन शक्तियों का विकास तेज गति से होता है, किन्तु इसके मुकाबले उत्पादन सम्बंधों में परिवर्तन की विकास गति धीमी होती है। इसके चलते उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों में स्वाभाविक विरोधाभाष होता है। इस तरह उत्पादन शक्तियों में परिवर्तन की गति तीव्रतम होती है, वहीं उत्पादन सम्बंधों में परिवर्तन की गति मंदतर और सामाजिक सम्बंधों में परिवर्तन की गति मंदतम होती है क्योंकि सामाजिक परिवर्तन का सम्बंध इंसान की आदतों, रीति-रिवाजों और स्वभाव के साथ जुड़ा होता है जो आसानी से पीछा नहीं छोड़ते। उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों का विरोधाभाष तथा उनका सामाजिक सम्बंधों में टकराव सामाजिक विकास के इतिहास के हर मंजिल पर भली प्रकार से देखा जा सकता है। ये टकराव अनेक सामाजिक विरोधाभाषों को जन्म देते हैं। नये आर्थिक टकरावों के परिणाम तीक्ष्ण, निर्णायक और अग्रगामी होते हैं, जबकि पुराने सामंती सामाजिक विरोधाभाषों के परिणाम शिथिल, गौण और प्रतिगामी होते हैं। इसलिये माक्र्स मानव इतिहास को वर्ग संघर्षों का इतिहास बताते हैं और वे मानवता की नियति पूंजीवाद में नहीं, बल्कि पूंजीवाद के विनाश में देखते हैं। माक्र्स पूंजीवाद से आगे बढ़कर समानता पर आधारित शोषणविहीन, शासन रहित समाज का नया नक्शा पेश करते हैं।
इसके विपरीत लोहिया मानव इतिहास को जातियों की लड़ाइयों की संज्ञा देते हैं। लोहिया यहीं नहीं रूकते, वे पूंजीवाद और साम्यवाद को पश्चिमी औद्योगिक सभ्यता की जुड़वां संतान बताकर निंदा तो करते हैं किन्तु पूंजीवाद के विकल्प के रूप में जो कुछ उन्होंने परोसा, वह उनका ख्याली पुलाव साबित हुआ। लोहिया आजीवन फ्रांस और जर्मनी के मध्ययुगीन कल्पनावादी समाजवादियों की पांत में ही भटकते रहे और अपने समाजवादी कार्यक्रम को गांधी जी की विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के साथ घालमेल करते रहे।
माक्र्स ने अपने पूर्ववर्ती और समकालीन कल्पनावादी समाजवादियों की अवधारणाओं के खोखलेपन की आलोचना की और उससे अलग हटकर वैज्ञानिक समाजवाद की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सभी तरह के विरोधाभाषों पर काबू पाने के लिए पूंजीवादी उत्पादन शक्तियों पर सामाजिक स्वामित्व कायम करने का सुझाव दिया। किन्तु इस प्रश्न से लोहिया हमेशा बचते रहे और आजीवन गोल-मटोल बातें करते रहे।
अलबत्ता यह विवाद का विषय बना रहा कि उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व का क्या रूप होगा। अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत यूनियन में उत्पादन के तमाम साधनों का राष्ट्रीयकरण किया गया। यह समझा गया कि राष्ट्रीयकरण अर्थात सरकारी स्वामित्व उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की दिशा में उठाया गया पहला कदम है। चूंकि राज्य सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथ में है, इसलिये सरकारी स्वामित्व को विकासक्रम में सामाजिक स्वामित्व में परिवर्तित किया जा सकेगा। समाजवादी विकास प्रक्रिया की उच्च अवस्था में धीरे-धीरे राज्य का अस्तित्व सूखता जायेगा और अंततः सरकारी स्वामित्व भी सामाजिक स्वामित्व में रूपांतरित हो जायेगा। समाजवाद के सोवियत प्रयोग में यह अपेक्षा पूरी नहीं हुई। समाजवाद एक व्यवस्था है, एक प्रणाली है, जिस पर चल कर साम्यवादी अवस्था हासिल की जाती है। समाजवाद के सोवियत माॅडल टूटने का यह अर्थ नहीं है कि समाजवाद असफल हो गया। पूंजीवाद संकट पैदा करता है, समाधान नहीं। समाधान समाजवाद में है, नये सिरे से दुनियां में समाजवादी प्रयोग का चिंतन चल रहा है।
लोहिया के आधुनिक शिष्य अपने कृत्यों को महिमामंडित करने के लिये लोहिया का नाम जपते हैं, किन्तु वास्तविकता में अपने कर्मो से वे लोहिया के उत्तराधिकारी नहीं रह गये हैं। वे लोहिया के विचारों और आदर्शों से काफी दूर विपरीत दिशा में भटक गये हैं, जहां से उनकी वापसी अब मुमकिन नहीं दिखती है। जिस प्रकार हाल के दिनों में श्रमिक वर्ग और उनके ट्रेड यूनियन इकट्ठे होकर संयुक्त कार्रवाई कर रहे हैं, उसी प्रकार कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट के बीच ईमानदान सह-चिंतन की आवश्यकता है।

– सत्य नारायण ठाकुर
क्रमश:

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उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के नाम पर एक बहुत बड़ी जमात में कुछ काली भेडें शामिल हो गयी हैं। जिनका विधि व्यवसाय से कोई लेना देना नहीं है लेकिन बार कौंसिल व बार एसोशिएसन के चुनाव में यह सभी मतदाता होने के कारण इन काली भेड़ों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हो पा रही थी किन्तु माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने 60-70 अधिवक्ताओं से सम्बंधित 11 मामलों की जांच सी.बी.आई को सौंप दी थी। जिसकी प्रगति आख्या सी.बी.आई को 27 मई को माननीय उच्च न्यायालय को देनी थी।
सी.बी.आई ने अदालत परिसर में तोड़फोड़, मारपीट व सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में परशुराम मिश्रा व मिर्जा तौसीफ बेग को गिरफ्तार कर लखनऊ की सी.बी.आई अदालत के समक्ष पेश किया और कस्टडी रिमांड की मांग की जिसको न्यायालय ने स्वीकार कर लिया और 24 घंटे की कस्टडी रिमांड सी.बी.आई को दे दी। लखनऊ, कानपुर में ऐसे पंजीकृत अधिवक्ता हैं जो बार कौंसिल में तो पंजीकृत हैं मगर उनका व्यवसाय विधि व्यवसाय नहीं है वरन वह लोग आये दिन मारपीट, दंगा-फसाद, मकान खाली करना, मकान कब्ज़ा करना, प्रोपर्टी डीलिंग जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। बहुत सारे पंजीकृत अधिवक्ता केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश की सरकारों में मंत्री हैं और उन्होंने नियमो के अनुसार बार कौंसिल को विधि व्यवसाय बंद करने की सूचना भी नहीं दी है। इस तरह से यह सब लोग विधि व्यवसाय से जुड़े हुए अधिवक्ताओं को अपने काले कारनामो से बदनाम भी करते हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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