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Archive for the ‘लोकसंघर्ष सुमन’ Category


संसद में 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण पूरे सत्र में विधायी कामगाज नहीं हुआ तो दूसरी ओर राष्ट्रमण्डल खेल के आयोजन में कांग्रेस व मुख्य विपक्षीदल भाजपा ने मिलकर सत्तर हजार करोड़ रूपये का घोटाला किया। बड़े आठ घोटालों ने लगभग 50 हजार करोड़ रूपयों को हड़प लिया जिसमें सत्यम्, हर्षद मेहता स्टाम्प, तेल काण्ड प्रमुख हैं।
घोटालों का दूसरा रूप यह भी है कि वित्त मंत्री प्रणव कुमार मुखर्जी ने फाइनेन्स एक्ट 2009 में एक भाग 35 ए0डी0 अलग से जोड़ दिया, जिससे हिन्दुस्तान में एक मात्र लाभार्थी मुकेश अम्बानी को लगभग 20 हजार करोड़ रूपये का शु( फायदा हुआ। यह विधि बनाने व विधि में संसोधन करने का घोटाला है। विधायन संस्थाओं में टैक्स सम्बंधी संशोधन करके विभिन्न उद्योगपतियों को हजारों-हजार करोड़ रूपये का लाभ देकर दूसरे हाथ से चंदा लेने का काम पूँजीवादी राजनैतिक दल कर रहे हैं।
गरीबों को जब कोई छूट, बाढ़ या सूखा के समय दी जाती है तो हो हल्ला हंगामा बड़े बड़े विज्ञापन निकालकर ढिंढोरा पीटा जाता है। वहीं 2008-09 में हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े पूँजीपतियों को 68 हजार 914 करोड़ रूपये की छूट दी गई। आम आदमी के कर्ज माफी से सात गुना ज्यादा रूपया देश में लगभग सौ धनाढ्य परिवारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिया गया है।
ट्रान्सपेरेसी इण्टरनेशनल के अनुसार सिर्फ ट्रक वालों से आर0टी0ओ0 व पुलिस विभाग 22 हजार 200 करोड़ रूपये घूस वसूलती है। बड़ौत कोतवाली में अन्दर जाने वाले व्यक्ति से 50 रुपये वसूले जाने के बाद पुलिस वालों की आपसी कहासुनी में यह मामला प्रकाश में आया कि थाने के अन्दर जाने के लिए इण्ट्री फीस होती है। पुलिस 25 लाख बी0पी0एल0 परिवारों से लगभग 214 करोड़ रूपये घूस वसूलती है। पुलिस विभाग में प्रत्येक कार्य के लिए घूस के मद हैं। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यकता पड़ने पर अपनी शक्ति के अनुसार घूस देनी है।
शहर के एक हत्याकाण्ड में पुलिस व राजस्व के अधिकारियों ने लगभग 40 लाख रूपये वसूले। मोहल्ले में लोगों के घरों में घुसकर तोड़फोड़ की गई और सामान को लूटा भी गया। एक छोटी सी लूट या चोरी होने पर पुलिस की लाटरी निकल आती है। शक के आधार पर 30 या 40 बच्चों को थाने में बन्द करके पिटाई करना और फिर उनके अभिभावकों से उनकी शक्ति के अनुसार वसूली की जाती है और पैसा न देने वाले बच्चों का चालान सम्बंधित अपराध में कर दिया जाता है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया इन मामलों में भरपूर सहयोग करती है। पुलिस के बताने पर मय फोटो फर्जी बरामदगी के साथ प्रकाशित किया जाता है। इलेक्ट्रानिक चैनल 24 घण्टे बार-बार समाचार प्रसारित कर खूँखार अपराधी घोषित कर देते हैं। आम्र्स लाइसेन्सेज में शपथ पत्र में तथ्य गलत होने पर उस व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने की बात मीडिया में आती है लेकिन जिस पुलिस अधीक्षक, उप अधीक्षक या पुलिस अधिकारी के रिपोर्ट के आधार पर शस्त्र लाइसेन्स जारी होता है उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती है। जबकि फर्जी शपथ पत्र उन्हीं की सलाह पर लोग लगाते हैं। यही हाल जनपद के कोटेदारों का है। तहसील और ब्लाक स्तर पर ही चावल और गेहूँ सीधे ब्लैक कर दिया जाता है और उत्पीड़न करने के लिए किसी न किसी कोटेदार से उसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। पूर्ति विभाग के किसी भी कर्मचारी व अधिकारी के खिलाफ प्रशासन कार्यवाही नहीं करता है क्योंकि प्रशासन का भी उसमें हिस्सा होता है।
जनपद की विकास योजनाओं में घोटाले ही घोटाले हैं लेकिन जब कार्यवाही की बात आती है तो निर्वाचित प्रधान के खिलाफ होती है लेकिन उसमें शामिल पंचायत सेक्रेट्री व मुख्य विकास अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही नहीं होती है।
विद्युत विभाग से लेकर शिक्षा विभाग तक इस घोटाला प्रतियोगिता में जमकर हिस्सा ले रहे हैं। विद्युत विभाग के मीटर सेक्शन के इंजीनियर श्री खान बगैर 500 रूपये लिए हस्ताक्षर करना अपनी शान में गुस्ताखी समझते हैं, तो सिंचाई विभाग भी पीछे नहीं है वह माइनरों की सफाई न कर उसकी धनराशि हड़पकर जाने में आगे है और फर्जी सिंचाई दिखलाकर राजस्व विभाग किसानों की खाल उतरवाने में माहिर है।
राजस्व विभाग जो पुराने जमीनदारों के लट्ठबाजों द्वारा वसूली के अपनाएँ गये तरीकों से चार कदम आगे बढ़कर वसूली करता है या यूँ कहे वर्तमान में सूदखोरों के गुण्डे मारपीट कर अनाप शनाप रकम वसूलते हैं। राजस्व विभाग के पास आर0सी0 पहुँच जाए और सम्बंधित विभाग इसे वापस भी ले लो तो भी 10 प्रतिशत वसूली चार्ज करने के लिए राजस्व विभाग सम्बंधित व्यक्ति के घर में मिलेगा। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण माती क्षेत्र के बिजली विभाग की आर0सी0 की 10 प्रतिशत वसूली चार्ज के लिए राजस्व विभाग द्वारा अभियान चलाया जा रहा है जबकि मा0 उच्च न्यायालय अपने आदेश में कई बार कह चुका है कि 2 से 3 प्रतिशत से अधिक रिकवरी चार्ज नहीं वसूले जायेंगे।
अलाव घोटाले से लेकर कम्बल घोटाले तक चर्चा में है। वहीं विधवा विकलांग, वृ(ावस्था पेंशनों में भी घोटाले ही घोटाले हैं। स्थिति तो यहाँ तक पहुँच गयी है कि किसी मुर्दे को अगर अच्छा कफन ओढ़ाकर लोग लिए जा रहे हैं तो उसमें भी वसूली कर ली जाती है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने सन् 2011 को भ्रष्टाचार विरोधी वर्ष मनाने का निर्णय लिया है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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इंसान को व देश को पंगु, बीमार और कंगाल बनाती मोटरवाहन क्रांति:
साईकिल ही इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन हो सकती है।

दोस्तों,
पिछले दिनों पेट्रोल की कीमत में 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हो गई। डीजल की कीमत भी बढ़ने वाली है। कुछ महीने पहले जब से सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने का फैसला किया, तब से छः बार उनके दाम बढ़ गए हैं। पहले से महंगाई की मार से जूझती जनता पर यह बड़ा अत्याचार है। सरकारों ने पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगा रख है। यदि उसे कम कर दिया जाए तो राहत मिल सकती है।
लेकिन इस संकट से राहत पाने के लिए हम भी कुछ कर सकते हैं, यदि कुछ नए और रचनात्मक तरीके से हम सोचना शुरु करें। यदि थोड़ा विचार करेंगें तो हम पाएंगे कि कई काम पहले हम पैदल या साईकिल से जाकर कर लेते थे, अब
मोटरसाईकिल या कार से करते हैं। क्या यह गैर-जरुरी नहीं है ? जरुरी लग सकता हैं क्योंकि उनकी आदत पड़ गई है। क्या यह आदत हमारे लिए, हमारे नगर के लिए, समाज के लिए और देश के लिए अच्छी है ? पिछले दिनों देश में मोटर-वाहनों की जो बाढ़ आई है, एक तरह की मोटरवाहन क्रांति आई है, जिसमें हम भी बिना सोचे-विचारे बह गए हैं, क्या वह स्वागत-योग्य है ? इसके कारण जो संकट पैदा हो रहे हैं, क्या हमने उन पर सोचा है ?
आइए, विचार करें –
आइए, हम कुछ बातों पर विचार करते हैं:-
1. मोटरवाहनों में प्रयोग होने वाला पेट्रोल/डीजल देश के बाहर से आयात करना पड़ता है, जिससे देश का धन बाहर जाता है। यदि हम पैदल या साईकिल से चलते हैं, तो कोई ईंधन खर्च नहीं होता।
2. मोटरवाहनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां विदेशी है या फिर विदेशी कंपनियों की भागीदारी है। तकनालाॅजी व पुर्जों का भी आयात होता है। विदेशी कंपनियों के मुनाफे व रायल्टी के रुप में भी देश का काफी पैसा बाहर जाता है। दूसरी तरफ, साईकिलें बनाने वाली करीब सारी कंपनियां भारतीय है।
3. मोटरवाहन गाड़ियां बड़े-बड़े कारखानों में बनती है, जो पूरे मशीनीकृत और स्वचालित होते हैं। इनमें बहुत कम रोजगार मिलता है। जबकि साईकिलें व उनके पुर्जें ज्यादातर लघु उद्योगों में बनते हैं, जिनसे ज्यादा रोजगार पैदा होता है।
4. औद्योगीकरण के नाम पर मोटरवाहन कंपनियों को सरकार कई कर-रियायतें, अनुदान, सस्ती जमीन दे रही है। सिंगूर जैसे संघर्ष भी इसके कारण पैदा हो रहे हैं।
5. मोटरवाहनों से हमारी सड़को पर भीड़ बढ़ती जा रही है और पैदल चलने की जगह भी नहीं बची है। टेªफिक जाम होने लगे हैं। बड़े शहरों में पार्किंग की समस्या भी भयानक हो गई है।
6. इन मोटरगाड़ियों के लिए शहरों में सड़कों को चैड़ा किया जा रहा है। उसके लिए अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब हाथठेले वालों, गुमठी वालों, छोटे दुकानदारों को हटाया जा रहा है और उनकी रोजी-रोटी छीनी जा रही है। कई जगह घरों को भी तोड़ा जा रहा है। इसी तरह राजमार्गों को चार लेन-छः लेन बनाने, बायपास और एक्सप्रेस मार्ग बनाने में भारी मात्रा में किसानों को उजाड़ा जा रहा है तथा खेती की जमीन छीनी जा रही है। यदि इसी तरह बड़े पैमाने पर खेतों को खतम किया जाता रहा तो, देश में अन्न संकट पैदा हो सकता है।
7. इन्हीं मोटरगाड़ियों के लिए एक्सप्रेसवे, हाईवे, बायपास, फ्लाईओवर, नए पुल, पार्किंग स्थल आदि बनाने में इस गरीब देश का अरबों-खरबों रुपया बरबाद हो रहा है। यदि इतनी गाड़ियां नहीं होती, तो पुरानी सड़कों और पुराने पुलों से भी काम चल सकता था। इनके कारण सड़कों की मरम्मत पर भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
8. यह मत सोचिए कि मोटरगाड़ियों की संख्या में यह विस्फोट आबादी में वृद्धि के कारण हो रहा है। भारत की आबादी तो केवल दो-ढाई फीसदी की दर से बढ़ रही है, किन्तु गाड़ियों (खास तौर पर कारों व मोटरसाईकिलों) की तादाद हर साल 20-25 प्रतिशत बढ़ रही है। बसों और ट्रकों की संख्या तो ठीक है (उसमें भी कुछ गैर जरुरी परिवहन हो सकता है) किन्तु एक कार सिर्फ एक या दो आदमी को ले जाती है और जगह काफी घेरती है। यह आबादी विस्फोट नहीं, ‘कार विस्फोट’ है, जो मुसीबत पैदा कर रहा है।
9. मोटरवाहनों के कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हमारे राजमार्ग मौत के राजमार्ग बनते जा रहे हैं।
10. मोटरगाड़ियों के धुएं से हवा जहरीली होती जा रही है। दुनिया के पर्यावरण को बिगाड़ने, जलवायु परिवर्तन और धरती के गरम होने में मोटरगाड़ियों का भी योगदान है। इसी तरह शोर भी बढ़ता जा रहा है। ऐसी ही हालत रही तो लोग जल्दी ऊंचा सुनने लगेंगें और बहरापन बढ़ेगा।
11. पैदल या साईकिल से चलने पर शरीर की कसरत होती है। गाड़ियों से चलने से मोटापा,हृदयरोग, रक्तचाप, मधुमेह, कब्ज, बवासीर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। अपना शरीर ठीक रखने के लिए हमंे अलग से जिम, योगासन, भ्रमण, दवाईयों का सहारा लेना पड़ रहा है। यदि पैदल या साईकिल से चलते तो शायद इनकी जरुरत ही नहीं पड़ती (या कम पड़ती)।
12. पृथ्वी पर जितने भी चैपाये हैं, उनमें सिर्फ इंसान ने ही पिछले पैरों पर खड़े होकर चलना सीखा है (चिम्पांजी और कंगारु जरुर दो अपवाद है)। इंसान ने लाखों सालों में यह महारत हासिल की है। यदि गाड़ियों का ऐसा प्रचलन बढ़ता गया, तो कहीं वह पैदल चलना भूल तो नहीं जाएगा ? इतिहास में बड़े-बड़े काम पैदल चलकर ही हुए है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसामसीह, शंकराचार्य और गुरुनानक ने पैदल घूम-घूम कर ही अपना संदेश फैलाया है। व्हेनसांग, फाह्यान और मार्को पोलो ने पैदल ही दुनिया की दूरियां नापी थी।
13. महंगी कारों और मोटरसाईकिलों ने इस देश में विलासिता और शान-शौकत की भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है तथा अमीर-गरीब की खाई को बढ़ाया है। दुनिया में कभी भी सबके पास कार नहीं हो सकती है, लेकिन साईकिल हो सकती है। इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन साईकिल ही हो सकता है।
14. दुनिया के अमीर देशों में भी साईकिलों का प्रचलन और लोकप्रियता बढ़ रही है। वहां के रास्तों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाई जाती है। डेनमार्क की सड़कों पर अब मोटर गाड़ियों से ज्यादा साईकिलें दिखाई देती हैं। फ्रांस में प्रतिवर्ष पूरे देश का चक्कर लगाने वाली एक अंतरराष्ट्रीय साईकिल दौड़ आयोजित होती है, जिसे देखने के लिए लाखों लोग जुटते हंै। इस का नाम ‘टूर डी फ्रांस’ है। पेरिस मंे नगर निगम ने किराये पर देने के लिए 20 हजार साईकिलों की एक जोरदार व्यवस्था की है, जिन्हें 1639 केन्द्रों से कहीं से भी उठा सकते हैं और कहीं भी जमा कर सकते हैं। इसका नाम है ‘वेलिब’ यानी साईकिल की आजादी। यूरोप, अमरीका, कनाडा, आस्टेªलिया आदि में कई नगरों में ऐसी योजनाएं शुरु हुई हैं और ऐसी साईकिल दौड़ें भी लोकप्रिय हो रही है। क्या हम उनसे सीखेंगे ?
हम क्या कर सकते हैं ?
1. कार-मोटर साईकिल की जगह पैदल व साईकिल पर चलना शुरु करें। लंबी दूरी के लिए सार्वजनिक वाहनों (बस, रेलगाड़ी, रिक्शा, टैक्सी आदि) का इस्तेमाल करें।
2. अपने नगर व इलाके में साईकिल का प्रचार करें। साईकिल-दौड़ें व साईकिल-रैलियां आयोजित करें। ‘साईकिल क्लब’ का गठन करें। जीवन भर साईकिल चलाने वाले बुर्जुगों को सम्मानित करें।
3. मोटरवाहन उद्योग को सरकार द्वारा दिए जा रही रियायतों, अनुदान व प्रोत्साहन का विरोध करें। सरकार की परिवहन नीति बदलने के लिए जनमत बनाएं।
4. शहरों के व्यस्त बाजारों और भीड़ वाले इलाकों को ‘वाहन-मुक्त जोन’ बनाने के लिए अभियान चलाएं। सड़कों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाने की मांग करें।
5. बच्चों द्वारा वाहन चलाने पर पूरी तरह रोक लगे और सही प्रशिक्षण व जांच के बगैर किसी को ड्राइविंग लाईसेन्स न दिया जाए, इस दिशा में कोशिश करें।

सुनील
मोबाईल 09425040452

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प्रदेश में प्रमुख क्षेत्र समिति का चुनाव चल रहा है सत्तारूढ़ दल के साथ राज्य सरकार की मशीनरी मतदाताओं का अपहरण करने में लगी हुई है। कहने को सत्तारूढ़ दल कहता है कि इन चुनावों में वह हिस्सा नहीं ले रहा है और जब परिणाम आ जायेंगे तब ये लोग बहुत गर्व से घोषणा करेंगे की प्रदेश में इतने ब्लाकों पर उनकी पार्टी के लोग निर्वाचित हुए हैं और सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जनता की आवाज है।
बाराबंकी जनपद के रामनगर ब्लाक में क्षेत्रिय विधायक श्री अमरेश शुक्ला सत्तारूढ़ दल के विधायक हैं। तहसील स्तर की सरकारी मशीनरी विधायक साले संजय तिवारी के पक्ष में हर तरह के हथकंडे अपना रही है जिससे ऊब कर सदस्य क्षेत्र पंचायत श्याम लाल यादव के पिता लाल बहादुर ने जिला मजिस्टरेट श्री विकास गोठलवाल को प्रार्थना पत्र देकर मांग की कि उनके लड़के का अपहरण कर लिया गया है। जिला मजिस्टरेट के आदेश पर थाना मसौली जिला बाराबंकी की पुलिस ने अपह्रत मतदाता को बरामद कर लिया जिस पर विधायक अमरेश शुक्ला थाने पहुँच कर श्याम लाल को डरा धमका कर पुन: अपहरण करने की जुगत में लग गए, लेकिन जनता के विरोध के बाद विधायक अपने साथ मतदाता को नहीं ले जा पाए।
क्षेत्र पंचायत प्रमुख के चुनाव में सत्तारूढ़ दल खुले आम गुंडई पर उतर आया है। उनके विधायक गण सरकारी मशीनरी के माध्यम से मतदाताओं का अपहरण करवा रहे हैं। यही हमारा लोकतंत्र है, यही संविधान, यही न्याय है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय में स्थित शिव पार्वती मंदिर को इन्ही लोगो ने तोड़ डाला। मंदिर और हिन्दू धर्म के ठेकेदार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके अनुवांशिक संगठन भाजपा ने शिव पार्वती मंदिर को तोड़ कर वहां पर मीडिया सेंटर बनाने जा रहे हैं। यदि यही हरकत किसी अन्य ने की होती तो अब तक यह संघी गला फाड़-फाड़ कर हल्ला गुल मचा रहे होते इनके चाटुकार पत्रकार बड़े-बड़े आलेख लिख रहे होते। समाचार चैनलों पर हिन्दुवों को उकसाने के लिए इनके नेता विलाप कर रहे होते। अगर कहीं अल्पसंख्यक समुदाय की हवा इधर आ गयी होती तो यह अफगानिस्तान से लेकर मिश्र होते हुए पकिस्तान बंगलादेश तक तलवार भांज रहे होते लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने 30000 मंदिर गुजरात में तुडवाये तो आर एस एस का हिन्दुवत्व नरेंद्र मोदी का यशोगान कर रहा था।
महात्मा गाँधी की हत्या के बाद मानववादी समाजवाद के प्रणेता पंडित श्री दीन दयाल उपाध्याय की हत्या भी इन्ही संघियों ने की थी। अजमेर शरीफ बमकांड के अभियुक्त सुनील जोशी की भी हत्या अब इन्ही संघियों ने कर दी है। सुनील जोशी के पकडे जाने से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आतंकवादी स्वरूप का पर्दाफाश हो जाता और असली चेहरा जनता के सामने आ जाता। अपने आतंकवादी स्वरूप को छिपाने के लिए संघ के लोग सुनील जोशी की हत्या करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई । कंधमाल गुजरात के नरसंहारों से लेकर सिख नरसंहार तक इन हिन्दुवत्व वादी शक्तियों का चेहरा नरपिशाच जैसा हो गया है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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लोकतांत्रिक देशों में लिंगभेद के आधार पर कोई फैसला नहीं होता है लेकिन वास्तव में अधिकांश फैसले पुरुषवादी मानसिकता के तहत होते हैं। भारत में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती, पार्वती जैसे विश्लेषण से विभूषित किया जाता है लेकिन सच यह भी है कि पूरी दुनिया में स्त्रियों की बुरी दशा है और एक बड़ी संख्या में स्त्रियों को देह व्यापार जैसे कार्यों में जबरदस्ती लगाया गया है। स्त्रियों की दुर्दशा का अभी महत्वपूर्ण मामला बिहार में देखने को आया है। 2005 में राष्ट्रीय जनता दल से विधायक चुनी गयी बीमा भारती को उनके पति अवधेश मंडल ने बुरी तरह मारा पीटा की उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है। घटना के समय विधायक के अंगरक्षक तमाशा देखते रहे। इस समय भी बीमा भारती सत्तारूढ़ दल जनता दल (यू) की विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार उनका हाल-चाल लेने के लिए अस्पताल भी गए।
अपने देश में महिलाओं के आरक्षण के तहत जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर सदस्य ग्राम पंचायत तक महिलाएं निर्वाचित होकर पदासीन होती हैं वहीँ संसद तथा विधान सभाओं में निर्वाचित होकर मंत्री बनती हैं। देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल हैं। इन में कितनी निर्वाचित महिलाओं की पिटाई आये दिन उनके पति करते होंगे और वह बेचारी समाज में अपनी पदीय विवशता के कारण अपनी बात को भी नहीं कह सकती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा दीक्षा इस तरह से निर्धारित कि जाए की उस में लिंग भेद समाप्त हो अन्यथा हम आप नारे लगते रहेंगे और महिलाओं कि दशा में कोई सुधार नहीं होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सत्तारूढ़ दल के लठैत

यूपी पुलिस के दामन में दाग ही दाग हैं। आम तौर पर उसकी छवि जनता के खिलाफ बर्बर गिरोह के रूप में उभरती है, जिसे वर्दी की आड़ में कुछ भी करने की आजादी है। भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की साथ गाँठ चलती रहती है। सत्ता के इशारे पर खाकी वर्दी कुछ भी करने को तैयार रहती है।
-जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1967 में की गयी टिप्पणी)

भारत में राजा महाराजाओं के पास शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुश्तैनी व परंपरागत लठैत होते थे जो राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कार्य करते थे। वह लठैत लोग कभी-कभी डकैती, बलात्कार, आगजनी जैसे अपराध भी करते रहते थे। ये लठैत लोग लौकी, तुरोई से लेकर बहुमूल्य चीजें नागरिकों से जबरदस्ती छीन लेते थे। नागरिक उनके खिलाफ कुछ कर नहीं पाते थे। कभी कभी लठैत और उनके सरदार राजा की भी संपत्तियों में भी सेंधमारी कर लेते थे लेकिन राजा द्वारा उसकी अनदेखी कर दी जाती थी। उसी तर्ज पर गाँव देहात में आज भी भारतीय पुलिस व्यवस्था काम कर रही है और राज्य उसके कुकृत्यों की अनदेखी कर रहा है। आज किसी की हत्या करानी हो तो एनकाउन्टर विशेषज्ञ से मिल लीजिये ट्रांस्पेरेंसी इन्टरनेशनल के सर्वे के अनुसार भारतीय पुलिस 214 करोड़ रुपये जनता से अवैध वसूली करती है। उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती घोटाला, फायर ब्रिगेड में पम्प घोटाला सहित अनेकों घोटाले पुलिस के उच्चाधिकारियों ने किये किन्तु कोई दंडात्मक कार्यवाई उनके खिलाफ अभी तक संभव नहीं हो पायी है।
पुलिस का वर्तमान समय में प्रमुख कार्य यह है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं को हर संभव तरीके से खुश रखो और मनचाहे तरीके से नागरिकों को लूटो, कोई कार्यवाई नहीं हो सकती है। न्याय, संविधान, विधि का शासन सब खोखले नारे हैं। जिला पंचायत के चुनाव में पुलिस विभाग के अधिकारियों ने जिस तरह जिला पंचायत सदस्यों को डरा, धमका कर, बाद में देख लेने की धमकी देकर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने में अहम् भूमिका अदा की है और अब ब्लाक प्रमुख पद पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने के लिए पुलिस अधिकारी स्टार प्रचारकों की भूमिका में नजर आ रहे हैं। बाराबंकी जनपद के रामनगर ब्लाक में अनुसूचित जाति की क्षेत्र पंचायत सदस्य श्रीमती रामदुलारी के लड़के योगेश का अपहरण सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी संजय तिवारी ने कर लिया था लेकिन पुलिस प्रशासन ने कोई कार्यवाई न करके संजय तिवारी के हौसलों को और बुलंद किया और स्थानीय पुलिस अधिकारी उनके चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि पुलिसिया लठैतों के काले कारनामो से नागरिको को बचाने के लिए एक अलग व्यवस्था कायम करने की है जिससे वर्दी पहने अपराधियों को दण्डित कराया जा सके।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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न हम संसद हैं और न ही हम लोकतंत्र का स्वांग भरते हैं

भारत में अधिकांश राजनीतिक दल के नेतागण मजदूर और किसान के लिए हैरान व परेशान रहते हैं, उनके सारे वक्तव्य मजदूर और किसानो की उन्नति के लिए होते हैं। इन राजनीतिक दलों दवारा उनके कल्याण के लिए नए-नए नियम बनाये जाते हैं। जिसका प्रभाव ये पड़ा है कि मजदूर और किसान भूख से व्याकुल होकर आत्महत्याएं कर लेता है वहीँ दूसरी ओर पूंजीपतियों के कल्याण के लिए कोई भी राजनीतिक दल खुल कर उनके समर्थन में कानून बनाने की बात नहीं करता है। पर 1947 में अगर कोई पूँजीपति का व्यवसाय 100 करोड़ रुपये का था तो उसके व्यवसाय में करोड़ गुना तक की वृद्धि हुई है।
संसद के अन्दर उद्योगिक घरानों से लाभ लेने वाले सांसद गण हमेशा उनके पक्ष में विधि के निर्माण कार्य करते हैं जिसके एवज में उद्योगिक घराने हजारो हजार करोड़ रुपये अपने उनके राजनीतिक दलों को देते हैं जो चुनाव के समय मतदातों को लुभाने में खर्च किये जाते हैं। सामान्य दिनों में बड़े नेताओं की सभाओं का सारा खर्च उद्योगिक घराने ही उठाते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को ओबलाइज करने के लिए भी पैसा उद्योगिक घराने ही उपलब्ध करते हैं। बड़े नेताओं के रहने खाने से लेकर सभी प्रकार का खर्च भी उद्योगिक घराने उठाते हैं। सांसद और विधान सभाओं में उनके द्वारा वित्त पोषित सदस्य उनके हितों के अनुरूप कार्य करते हैं। अब तो सदस्य विधान परिषद् से लेकर जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में भी राजनीतिक दल हजारो करोड़ रुपये मतदाताओं को खरीदने के लिए देते हैं।
कहने के लिए लोकतंत्र है। संसद जनता द्वारा चुनी गयी है, लेकिन यह सत्य नहीं है यहाँ तो उद्योगिक घरानों के लोग नए तरह मुखौटे लगाये हुए बैठे हैं, जो इस देश के मजदूर, किसान की श्रमशक्ति को कैसे छीना जाए उसके लिए विधि का निर्माण करते हैं। छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा, बिहार, महाराष्ट्र, मणिपुर तक की प्राकृतिक संपदाओं को कैसे उद्योगिक घराने को सौंप दिया जाए उसके लिए प्रयास करते हैं। वहां के मूल निवासियों का सब कुछ छीन कर इन उद्योगिक कंपनियों के साम्राज्य में वृद्धि करने के लिए भी तरह-तरह के कानून बनाये जाते हैं। संसद हो या लोकतंत्र सब उद्योगिक घरानों की कठपुतलियाँ हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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हरदीप पूरी मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारीयों के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
अभी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अभी हाल में अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।
हमारे देश का इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया ऐसी घटनाओ पर ख़ामोशी अख्तियार कर लेता है लेकिन अगर यही हरकत चीन या किसी एशियाई मुल्क में हुई होती तो पूरे देश में उस देश के खिलाफ प्रचार अभियान चल रहा होता। आखिर इस चुप्पी का राज क्या है ?

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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साहित्य जगत के नामचीन कवि, कथाकार विनोद दास मुम्बई से, प्रखर समीक्षक व कथाशिल्पी विनयदास की अयोध्या मुद्दा बनाम राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण पर एक बेबाक बातचीत-
युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, केदारनाथ अग्रवाल सम्मान जैसे अनेकशः पुरस्कारों से सम्मानित कवि विनोद दास ‘खिलाफ हवा से गुजरते हुए,’ ‘वर्णमाला से बाहर,’ ‘कविता का वैभव’ (समीक्षा) ‘भारतीय सिनेमा का अन्तःकरण,’ ‘बतरस’ (इन्टरव्यू) जैसी पुस्तकों के रचयिता हैं। उनकी काव्य चेतना पर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लघुशोध तथा उनकी फिल्म पुस्तक पर नागपुर यूनिवर्सिटी से लघु शोध प्रबन्ध भी हो चुके हैं।
विनयदास-साठ वर्षों के लम्बे अन्तराल से अयोध्या मन्दिर-मस्जिद मुद्दे पर उच्च न्यायालय के 30 सितम्बर 2010 के फैसले को किस हद तक कानूनी माना जा सकता है क्योंकि फैसले का मुख्य आधार आस्था है? इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
विनोददास-जहाँ तक मुझे लगता है यह एक राजनैतिक फैसला है। इस फैसले में न्याय की जो बुनियादी संरचना है उसका पालन नहीं हुआ है, क्योंकि यह फैसला आस्था के आधार पर दिया गया है न कि दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि यहाँ पर रामलला मंदिर के कोई पोख्ता प्रमाण भी नहीं मिले हैं।
विनयदास-अभी तक मुसलमानों का कहना था, हमें न्यायालय का फैसला मान्य होगा। किन्तु फैसला आने के बाद वे इसे मानने से अब मुकर रहे हैं। इस सन्दर्भ में आपकी क्या राय है?
विनोददास-मुसलमान कहाँ मुकरे हैं। इस फैसले के बाद उन्होंने अद्भुत धैर्य का परिचय दिया है। फिर इसे अभी एक कोर्ट ने कहा है। यह फैसला उन्हें न्याय के आधार पर नहीं लगता है। इसके लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खुला है। विश्वास है शायद उन्हें वहाँ न्याय मिल सके। उन्हें इस फैसले के विरोध में आगे जाना ही चाहिए।
विनयदास- न्यायिक प्रक्रिया और आस्था में आप कैसा और कितना सम्बन्ध देखते हैं?
विनोददास- जाहिर है आस्था मनुष्य की एक निजी सोच है, निजी व्यवस्था है, जबकि कानून एक सामाजिक व्यवस्था है। हर नागरिक की अलग-अलग आस्थाएँ हैं। मेरी समझ से आस्था का प्रश्न वैयक्तिक है जबकि कानून सामाजिक समानता, सामाजिक समरसता के सिद्धान्त पर बना है। अतः मैं न्याय के पक्ष में हूँ न कि आस्था के।
विनयदास- अयोध्या मन्दिर मस्जिद के फैसले पर कम्युनिस्ट ज्यादातर चुप रहे। क्या वे इस फैसले से असन्तुष्ट और इस मुद्दे को न हल होने देने के पक्ष में है।
विनोददास- कम्युनिस्ट चुप कहाँ हंै? फिर कम्युनिस्ट से आपका आशय क्या है? इसका विरोध कमोबेश सभी कम्युनिस्टों ने किया है। वे इस फैसले के स्थाई समाधान में विश्वास रखते हैं न कि इसके अस्थाई और तात्कालिक समाधान में। वे इसे नासूर नहीं बनने देना चाहते हैं। हो सकता है एक पक्ष जो अभी आपको शान्त दिखाई देता है आगे चलकर वह बम-सा विस्फोट कर जाए। जिससे पूरे समाज में अशान्ति फैल जाए।
विनयदास- सुन्नी वक्फ बोर्ड इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाना चाहता है। यदि वह उच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार नहीं कर सका, तो क्या वह उच्चतम न्यायालय के निर्णय को, जो इसी से मिलता-जुलता हुआ तो क्या वह उसे स्वीकार कर लेगा।
विनोददास- अगर वे ऐसा कर रहें हैं तो बुरा क्या कर रहे है? अगर वे ऐसा कह रहे है तो हमें उन पर विश्वास करना चाहिए।
विनयदास- मन्दिर स्थल की खुदाई में जो ध्वंसावशेष मिले हैं उसे पुरातत्व विदों ने जाँच के बाद मन्दिर के पक्ष के अवशेष बताए हैं फिर मस्जिद का सवाल ही कहाँ?
विनोददास- मेरी समझ में जो पुरातात्विक अवशेष मिले हैं वे मन्दिर के पक्ष में नहीं हैं। यदि वहाँ मन्दिर होता तो हड्डियाँ न मिलतीं और वहाँ पर कब्रें न मिलतीं। इससे लगता है वहाँ मन्दिर नहीं था।
विनयदास- विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल, आदि विभिन्न हिन्दू संगठन भी इस फैसले पर मुसलमानों के असन्तोषजनक प्रतिक्रिया स्वरूप अब असन्तोष व्यक्त कर रहे हैं। वे कह रहे हैं राम मन्दिर-अयोध्या प्रकरण को हम शाहबानो फैसले की तर्ज पर पार्लियामेन्ट में ले जाएँगे। जब पार्लियामेन्ट उनके लिए कानून बदल सकती है, संशोधित कर सकती है तो हमारे लिए क्यों नहीं?
विनोददास- पार्लियामेन्ट कानून बना सकती है। जिसके आधार पर फैसला लिया जा सकता है। मगर वह फैसला दे नहीं सकती फैसला अन्ततः न्यायालय को ही करना होगा। जो लोग ऐसा कह रहे हैं उन्हें कानून के प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। अशोक सिंघल आई0पी0एस0 रह चुके हैं जब वे ऐसी बात कह रहे हैं तो इसे हमारे देश का दुर्भाग्य ही समझें।
विनयदास- क्या आपको नहीं लगता कि न्यायालय का फैसला न्याय की प्रक्रिया से कम और सामाजिक समरसता के सिद्धान्त से अधिक प्रेरित है। इस कारण से देश में एक बड़ा तूफान आने से बच गया।
विनोददास- आपकी बात बिल्कुल ठीक है। इस दृष्टि से देखें तो यह फैसला एक हद तक संतोषजनक कहा जा सकता है। इसमें सभी को सन्तुष्ट करने की कोशिश की गई है। इसमें सामाजिक समरसता का ध्यान रखा गया है मगर कानूनी प्रक्रिया का नहीं।

-विनयदास
मोबाइल: 09235574885

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अयोध्या के विवादित पुरास्थल का उत्खनन आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया (ए0एस0आई0) द्वारा 2002-2003 में किया गया। यह उत्खनन लगभग पाँच महीनें में सम्पन्न हो गया।
उत्खनन के लगभग समाप्ति के दिनों में 10 जून से 15 जून 2003 तक तथा दूसरी बार ए0एस0आई0 की अन्तिम रिपोर्ट जमा हो जाने के बाद 27 सितम्बर से 29 सितम्बर 2003 तक धनेश्वर मण्डल, रिटायर्ड प्रोफेसर डिपार्टमेन्ट आफ ऐनशियंट हिस्ट्री, कल्चर एण्ड आर्कियोलाजी, यूनिवर्सिटी आफ इलाहाबाद ने अयोध्या जाकर मामले का बारीकी से अध्ययन एवं स्थलीय निरीक्षण किया तथा तथ्यों को एक पक्ष की तरफ़ से शपथ-पत्र के रूप में 5 दिसम्बर 2005 को न्यायालय के समक्ष दाखिल किया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ए0एस0आई0 की दो जिल्दों की मोटी-मोटी अंतिम उत्खनन रिपोर्ट केवल पन्द्रह दिनों में ही प्रकाशित हो गई।
प्रोफेसर मण्डल के बयान की एक पुस्तिका ‘एक पुरातत्ववेत्ता का हलफनामा-जनता के दरबार में’ के शीर्षक से, मई 2006 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा0) लि0 रानी झाँसी रोड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। इसी के आधार पर संक्षेप में कुछ तथ्य एवं अंश प्रस्तुत हैं-सबसे पहले यह बताते चलंे कि प्रो0 मंडल की टिप्पणियाँ तीन स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं प्रथम-उत्खनित स्थान का व्यक्तिगत सर्वेक्षण, द्वितीय-ए0एस0आई0 द्वारा प्रस्तुत दो जिल्दों की रिपोर्ट, तृतीय-उत्खनन से सम्बंधित डे-टू-डे रजिस्टर।
प्रो0 मंडल ने अपने बयान में ए0एस0आई0 की कार्य-विधि एवं रिपोर्ट पर अत्यन्त गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं, इस सम्बन्ध में यह अंश देखिए:-
‘‘उत्खनन में मान्यता प्राप्त पुरातत्विक विधियों का समुचित उपयोग नहीं हुआ है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि स्तरीकरण, पुरातात्विक, उत्खनन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधि है। इस विधि के अनुसार स्तर अथवा परत को आधार बनाकर उत्खनन किया जाता है न कि गहरान ;क्म्च्ज्भ्द्ध को। गहरान आधारित उत्खनन वस्तुतः पुरातत्विक उत्खनन नहीं अपितु पुरातत्व की दृष्टि से उसका विनाश है’’
वे यह भी लिखते हैं-
‘‘स्तरीकरण एवं कालक्रम से मैं सहमत नहीं हूँ।’’ उनके अनुसार इन दोनों में पहले का महत्व अधिक है, क्योंकि दूसरा, पहले पर निर्भर है। एक अध्याय का उल्लेख करके बताया कि उसमें ‘‘स्तरीकरण से सम्बंधित तथ्यों का नितांत अभाव है। पूरा का पूरा अध्याय कालक्रम के ब्योरे से भरा है, वह भी प्रमाणित तथ्यों पर आधारित नहीं।’’
यह उत्खनन क्षैतिज है, इसमें 5-5 मीटर की 90 ‘‘ट्रेंच’’ खोदी गईं। ट्रेंच जी-7 के बारे में प्रोफेसर साहब लिखते हैं कि यह ‘‘पुरास्थल की पूरी कहानी कहता है। यह एक खुली किताब है। इसका हर परत किताब के पन्नों की तरह है। जो पढ़ सके पढ़ ले।’’
ए0एस0आई0 की रिपोर्ट ने 18 परतों के जमाव को पुरातत्विक जमाव माना है परन्तु प्रो0 मंडल इसे दो कोटि में विभाजित करके दूसरे जमाव को प्राकृतिक जमाव मानते हैं, और इसे भी दो भागों बसावटी एवं गैर बसावटी में विभाजित करते हैं, फिर बताते हैं कि लम्बे अर्से तक जगह वीरान रही, फिर बाढ़ से कुछ परतंे बनीं तत्पश्चात आबादी हुई। जगह को ऊँचा करते रहने के भी प्रमाण मिले। श्री बी0बी0 लाल द्वारा खुदाई के हवाले से बताते हैं कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहा है जिसकी सुरक्षा में ‘फोर्टीफिकेशन वाल’ का भी अवशेष मिला था। प्रो0 मंडल का यह कहना है-‘‘संभावना है कि बाढ़ प्रकोप से सुरक्षा प्रदान करने हेतु ही इस स्थल को बार-बार ऊँचा करने की आवश्यकता पड़ी। इस घटनाक्रम में एक समय ऐसा भी आया कि बाढ़ के कारण यहाँ के लोगो को बाध्य होकर एक लम्बे समय के लिए यह स्थान ही त्याग देना पड़ा।’’
कालक्रम के सम्बन्ध में प्रो0 मंडल ने बताया कि ए0एस0आई0 ने अपनी रिपोर्ट में 18परतों के जमाव को नौ कालों में इस प्रकार विभाजित किया है-
NBPW, SUNGA, KUSHANA, GUPTA, POST GUPTA RAJPUT, EARLY MEDIEVAL SULTANATE, MEDIEVAL, MUGHAL rFkk LATE & POST MUGHAL कालक्रम की इस निरंतरता से प्रो0 मंडल सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार- ‘‘चार कालों के पश्चात यह पुरास्थल एक लम्बे समय के लिए वीरान हो गया। कालों की निरंतरता भंग हुई। इस सम्बन्ध में सांस्कृतिक अन्तराल का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध है।’’ चैथे अर्थात गुप्त काल में (4-6 शताब्दी ए0डी0) दो बार बाढ़ आई, दूसरी बाढ़ के बाद यह स्थान लम्बे समय तक त्याग दिया गया। इस बाढ़ जमाव के ऊपर-‘‘जिस संस्कृति के अवशेष मिलते हैं, वे इस्लामिक काल के हैं। ह्युमस जमाव के ऊपर के परतों से गलेज्ड वेयर, ग्लेज्ड टाइल्स, जानवरों की हड्डियाँ तथा चूना एवं सुर्खी से निर्मित फर्शों के अवशेष का मिलना इस तथ्य के अकाट्य प्रमाण हंै।’’
गुप्तकाल के बाद ही, जमाव के ऊपर तेरहवीं सदी (अर्थात सल्तनत काल) के साक्ष्य मिले हैं। अतः 9 के बजाय पूरे जमाव को 5 कालों में ही विभक्त किया जाना चाहिए अर्थात गुप्तकाल के बाद एक लम्बा अन्तराल, फिर इस्लामिक काल। यहाँ मुग़लकाल का आरम्भ, बाबरी मस्जिद निर्माण के साथ होता है।
पुरास्थल के पश्चिमी किनारे पर उत्तर दक्षिण दिशा मुखी 50 मीटर लम्बी, अकेली दीवार नं0 16 है। इसमें ताकों के भी अवशेष हैं, यहाँ-‘‘तीन ताकों के शीर्ष मेहराबदार होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती।’’ (पृष्ठ-25)
‘‘इस अकेली दीवार में, संभवतः मेहराबदार ताको़ं का सम्बद्ध होना स्पष्ट रूप से ईदगाह की ओर संकेत करते हैं। (पृष्ठ-26)
स्तम्भों तथा दीवार आदि पर अनेक पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर विस्तृत बहस के निष्कर्ष के रूप में प्रो0 मंडल का यह कथन महत्वपूर्ण है-
‘‘साक्ष्यों के आलोक में यहाँ मंदिर की परिकल्पना निश्चित रूप से निराधार प्रमाणित होती है।‘‘ (पृष्ठ-25)
यह भी बताया कि खुदाई के अनेक साक्ष्य छुपाए गए। डे-टू-डे रजिस्टर में प्रविष्टियाँ एक माह बाद क्यों की गई?
अभी तक जो चर्चा हुई वह प्रो0 मंडल के हलफनामे की प्रकाशित 46 पृष्ठ की पुस्तिका पर आधारित है। अब अलग से यह बात भी बताने योग्य है कि खुदाई के समय केन्द्र में एन0डी0ए0/भाजपा सरकार थी तथा ए0एस0आई0 जिस केन्द्रीय मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है, उसके मंत्री श्री जगमोहन थे।

विजय प्रताप सिंह (एडवोकेट)
मोबाइल- 09415461192

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