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Archive for the ‘लोकसंघर्ष सुमन’ Category


हमें भी इन्साफ चाहिए

उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने माननीय उच्चतम न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर कर हाईकोर्ट के प्रति सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। प्रदेश की सबसे बड़ी अदालत के प्रति माननीय उच्चतम न्यायलय ने कई भ्रष्टाचार से सम्बंधित कई अहम् टिप्पणियां की थी। जिसमें यह कहा गया था कि न्यायधीशों के बेटे वहीँ वकालत कर करोडो रुपये की परिसंपत्तियां बना रहे हैं, वहां कुछ सड़ने की बू आ रही है। वहीँ इलाहाबाद बार एशोसिएशन ने टिप्पणियों के प्रति अपना अघोषित समर्थन भी व्यक्त किया है। सामान्यत: कहीं न कहीं पारदर्शिता न होने के कारण भ्रष्टाचार की बू आम जन भी महसूस करते हैं। वकालत के व्यवसाय में ज्ञान व तर्क दूर कर चेहरा देख कर फैसला करने के मामले अक्सर देखे जाते हैं।
ज्ञातव्य है कि बहराइच जनपद के एक मामले में उच्च न्यायलय इलाहाबाद ने क्षेत्राधिकार न होने के बाद भी अंतरिम आदेश पारित कर दिए थे जिसको उच्च न्यायलय इलाहाबाद की खंडपीठ लखनऊ ने आदेश को स्थगित कर दिया था। उसके विरुद्ध रजा नाम के व्यक्ति ने माननीय उच्चतम न्यायलय में एस.एल.पी दाखिल की थी। जिसपर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में गंभीर टिप्पणिया की थी।
जिस भी देश में आम जनता न्याय पाने में असमर्थ रहती है वहां पर अव्यवस्था का दौर प्रारंभ होता है। इस समय देश में आम जन अपने को न्याय पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है। इसलिए अव्यवस्था का दौर जारी है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति व महाभियोग दोनों जटिल प्रक्रियाएं हैं। पंच परमेश्वर की कुर्सी पर बैठ कर उनके सम्बन्ध में भ्रष्टाचार की शिकायत आना ही शर्मनाक है लेकिन आये दिन परस्पर विरोधी निर्णय न्याय की गरिमा को बढ़ा नहीं रहे हैं। समीक्षा याचिका प्रदेश की सबसे बड़ी न्यायालय ने किया है लेकिन जरूरत इस बात की थी कि समीक्षा याचिका दाखिल करने से पूर्व बहुत सारी चीजों को चुस्त दुरुस्त कर दिया जाता तो शायद टिप्पणियां स्वयं ही प्रभावहीन हो जातीं। अभी तक नारा था न्याय चला निर्धन से मिलने शायद अब यह नारा हो जाए न्याय चला अब न्याय मांगने।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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सुश्री नीरा यादव कारगार में

उत्तर प्रदेश में फायर ब्रिगेड में पम्प घोटाला, पुस्तक घोटाला, पुलिस भर्ती घोटाला, खाद्यान्न घोटाला सहित हजारों चर्चित घोटाले हैं जिसकी जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन या पुलिस विभाग की अन्य एजेंसियां करती हैं। कुछ दिनों तक अखबारों की सुर्ख़ियों में घोटाले चर्चित रहते हैं और उसके बाद घोटालों की फाइलें आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति के अभाव में अलमारियों में बंद हो जाती हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव अखंड प्रताप सिंह आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल जाना पड़ा वहीँ अब प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव सुश्री नीरा यादव को सी.बी.आई अदालत ने चार साल की सजा सुनाई है। जांच एजेंसी का स्वतन्त्र अस्तित्व न होने के कारण प्रदेश या केंद्र सरकार जांच पूरी होने के बाद भी आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति नहीं देते हैं जिससे जांच में लाखो रुपये खर्च होने के बाद भी परिणाम शून्य ही रहता है यदि शिकायत दर्ज करने वाली एजेंसी स्वतन्त्र हो तो वह जांच उपरांत आरोप पत्र न्यायलय में सीधे दाखिल करे तो भ्रष्ट अधिकारीयों को अपने आर्थिक अपराधों की सजा मिले। हद तो वहां हो जाती है कि सम्बंधित भ्रष्ट अफसर जिसकी जांच एजेंसी के यहाँ विचाराधीन होती है। उसी का वह अधिकारी हो जाता है। इस समय पूरे प्रदेश में खाद्यान्न से लेकर मनरेगा की योजनाओ में घोटाले ही घोटाले हैं और अधिकांश नौकरशाह विकास योजनाओ का धन लूटने में लगे हुए हैं। निर्माण करने वाले विभागों में तो खुले आम विकास का धन हड़प कर लिया जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि आर्थिक अपराधों में लिप्त राजनेता, नौकरशाह व दलाल वर्ग के खिलाफ सकारात्मक कार्यवाई के लिए एक स्वायत्तशासी जांच एजेंसी का गठन किया जाए अन्यथा ये जांच एजेंसियां घोटालों की कब्रगाह ही होंगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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अमेरिकन साम्राज्यवाद के मुखौटे को उखाड़ फेकने वाली वेबसाइट विकीलीक्स के संस्थापक जुलियन असान्जे को लन्दन में वहां के समयानुसार सुबह साढ़े नौ बजे गिरफ्तार कर लिया गया है। दूसरी तरफ स्विस बैंक ने असान्जे का अकाउंट बंद करने की घोषणा की है। दुनिया में विकीलीक्स अमेरिका के ढाई लाख से ज्यादा गुप्त संदेशों को अपनी वेबसाइट में प्रकाशित किया था। मानवता व लोकतंत्र का दम भरने वाली अमेरिकन फौजें ईराक में जो अमानवीय अत्याचार कर रही हैं, उसका भी खुलासा विकीलीक्स ने किया था वहीँ अमेरिकन साम्राज्यवाद दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों को किस घृणित तरीके से संबोधित करता है उसका भी खुलासा किया था। अमेरिका की अहम सैन्य व खुफिया जानकारियां विकीलीक्स के पास हैं जिसका खुलासा होने पर अमेरिका किस तरह से विभिन्न राष्ट्रों का शोषण करता है उसका भी खुलासा होना बाकी था।
अमेरिका विकीलीक्स के दस्तावेजों के प्रकाशित करने से अत्यधिक परेशान था। उसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इन्टरपोल से वारंट भी जारी कराया था। इस खबर से यह भी साबित हो रहा है कि दुनिया में अमेरिकन साम्राज्यवाद का जो भी विरोध करेगा उसको किसी न किसी तरह से नेस्तनाबूत कर दिया जायेगा। इस मामले में स्वेडेन से लेकर इंग्लैंड तक ने मिलकर असान्जे को खोज निकला और कानूनी मकडजाल में फांस कर ईराक के राष्ट्राध्यक्ष जैसी गत कर देना चाहती है।
इससे पहले असान्जे के परिवार व समर्थकों को अमेरिकन समर्थक आतंकवादी गुट जान से मारने की धमकियां दे रहे थे वहीँ असान्जे के वकीलों को भी धमकाया जा रहा था। साम्राज्यवादी शक्तियां न्याय देने का नाटक करती हैं और अंत में अपने विरोधी को समाप्त कर के ही दम लेती हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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उत्तर प्रदेश में राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि वह स्वतन्त्र व निष्पक्ष पंचायत चुनाव संपन्न कराये किन्तु वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ साबित हो रहा है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी दिशा निर्देश सत्तारूढ़ दल को मदद तथा विपक्षियों का उत्पीडन करने में मददगार हो रहे हें। प्रदेश में 16 जनपदों में जिला पंचायत अध्यक्ष पद हेतु एक ही प्रत्याशियों ने नामांकन किये हैं। जिसका सीधा अर्थ है कि इन जिलों में निर्वाचन आयोग के तहत काम कर रहे प्रशासन ने सत्तारूढ़ दल के एजेंट की भूमिका निभाई है। बाराबंकी जनपद में कानून और व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर प्रशासन ने सभी विपक्षी प्रत्याशियों के घरों में छपे डाले जिला पंचायत अध्यक्ष के बाद क्षेत्र प्रमुख के भी प्रत्याशियों के घरों में भी छापे डाले गए उनके लाईसेन्सी आर्म्स पुलिस जबर्दस्ती उठा ले गयी और कुछ जगहों पर छापेमारी दल ने नगदी भी लूटी है। प्रशासन का कहना है कि सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी के खिलाफ अगर चुनाव लड़ोगे तो नेस्तानबूत कर दिए जाओगे। मतदातों के ऊपर प्रशासन की मदद से नाजायज दबाव भी डाले जा रहे हैं। सरकारी मशीनरी राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार न चल कर सत्तारूढ़ दल के इशारे पर काम कर रही है। सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशियों ने अधिकांश जिला पंचायत सदस्यों को सरकारी मशीनरी के सहारे अपने कब्जे में ले लिया है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेन्द्र भौनवाल ने एक आदेश यह भी जारी किया है कि जिला मजिस्टेट अपने-अपने जिलों में जिला पंचायत सदस्यों की बैठक बुलाएं इससे यह होगा की विपक्षी जिला पंचायत सदस्य जिनको राज्य मशीनरी ढूंढ नहीं पायी है उनको सरकारी मशीनरी सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशियों के कब्जे में करा देगी।
राज्य निर्वाचन आयोग सरकारी मशीनरी की निष्पक्षता को बनाये रखने में असमर्थ साबित हुआ है इसके पूर्व के पंचायतों के चुनाव में सरकारी मशीनरी ने उस समय के सत्तारूढ़ दल के अनुरूप पंचायत चुनाव कराये हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि पंचायत चुनाव का ड्रामा छोड़ कर सत्तारूढ़ दल के सदस्यों को सीधे नामित कर दें जिससे सरकारी धन व जनता का धन की बचत होगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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फैसले पर अखबारों, चैनलों और नेट पर काफी बहस चल रही है। जैसा कि इन माध्यमों में होता है, बहस सतही और गंभीर दोनों स्तर की है। उसके विस्तार में हम नहीं जाएँगे। लोगों की नजर में न्यायपालिका की मान्यता और फैसले की संतुलित प्रकृति ने शुरू में स्वागत और खुशी का माहौल पैदा किया। सामान्यतः माना गया कि फैसला अच्छा है, न किसी की जीत है, न किसी की हार। लेकिन जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि फैसला न न्यायपालिका की मान्यता के अनुकूल है, न संतुलित। वे तथ्य, जो न्यायपालिका के फैसलों का आधार होते हैं, हैं नहीं, यह फैसला तो आस्था और विश्वास पर तथा संतुलन/समन्वय नहीं बहुसंख्यावाद पर आधरित है। यह भी जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि फैसला देने वाले तीन न्यायाधीशों में से एक धर्मवीर शर्मा ने फैसले की जगह आर0एस0एस0 का पेंफलेट जैसा लिखा है और बाकी के दो न्यायाधीशों सुधीर अग्रवाल और यू0एस0 खान ने बहुसंख्यक हिन्दू समाज की ‘आस्था के तर्क’ के सामने सिर झुकाया है।
मजेदारी देखिए, न्यायाधीश शर्मा कहते हैं कि तोड़ा गया ढाँचा मस्जिद नहीं थी क्योंकि उसका निर्माण इस्लाम के सिद्धांतों को दरकिनार करके किया गया था। जाहिर है, उन्हें रात के अँधेरेे में कपट-पूर्वक मस्जिद में मूर्तियाँ रखना, संतांे-साध्वियों का चोला पहने ‘रामभक्तों’ द्वारा अश्लीलतम भाषा में मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम घृणा फैलाना, उन्मादी भीड़ को आगे करके अपनी मौजूदगी में मस्जिद तोड़ना और उसकी सजा से बचने के लिए हर तरह का झूठ-फरेब करना हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के मुताबिक लगता है! संघ संप्रदाय जिसे आस्था मानता है उस पराजित मानसिकता के उन्माद का शिकार न्यायाधीश स्तर के लोग भी होते हैं तो इससे ज्यादा गंभीर संकट की स्थिति नहीं हो सकती।
फैसले को बारूदी सुरंग हटाने जैसा जोखिम भरा काम मानने वाले न्यायाधीश यू0एस0 खान तो भयभीत नजर आते हैं। जिस देश में जज भयभीत हों वहाँ सामान्य नागरिकों का हाल समझा जा सकता है। न्यायालय की तरफ से संदेश है कि अब सबको डर कर रहने की जरूरत है।
‘विधर्मियों’ को ही नहीं, हिन्दू धर्म के संघी संस्करण को नहीं मानने वाले सभी आस्तिक-नास्तिक भारतीयों को भी। कैसी विडंबना है, मठों और मंदिरों पर कट्टरता की चोट पड़ने के बावजूद मध्यकाल में धर्म का लोकतंत्र बना रहता है, लेकिन आधुनिक न्यायपालिका कट्टरता के पक्ष में फैसला देती है। यह सही है कि न्यायालय के बाहर सामाजिक-राजनैतिक समूह और संस्थाओं द्वारा लंबे समय तक किसी सुलह पर नहीं पहुँचने के बाद न्यायालय ने यह ‘पंचायत’ की है। लेकिन यह पंचायत, वह उदार धारा के मद्देनजर और हक में भी कर सकता था। उससे दबा दी गई उदार धारा को उभरने और बढ़ने का मौका मिलता जो भारतीय राष्ट्र और समाज के लिए अनिवार्य है। अफसोस कि न्यायालय भी कट्टरता वादी बहाव में बह गया।
स्पष्ट है कि फैसले ने लालकृष्ण आडवाणी और उनके नेतृत्व में संतों-साध्वियों द्वारा फैलाए गए सांप्रदायिक उन्माद और फिर मस्जिद के ध्वंस को सही ठहरा दिया है। आर0एस0एस0 खुशी से पागल है, जो कहता था कि न्यायपालिका के फैसले को कभी स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह जानता था कि फैसला अगर वाकई न्यायपालिका का होगा तो संपत्ति के स्वामित्व को लेकर होगा, जन्मस्थान को लेकर नहीं। संघ संप्रदाय की यह बड़ी सफलता है कि न्यायपालिका उसकी दबोच में आ गई है। वरना वह उसे ही अपने रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा मानता था। अब वह खुल कर और पूरे उत्साह से अन्य संस्थाओं को दबोचने का काम करेगा। न्यायालय ने हिन्दू-राष्ट्र के लिए संजीवनी और पहले से ही लड़खड़ाते भारतीय राष्ट्र के लिए विखंडन का आदेश लिख दिया है।
कोई राष्ट्र भौगोलिक रूप से एक रहते हुए भी अंदरखाने टूटा हुआ हो सकता है, आज का भारत उसकी एक ज्वलंत मिसाल है। जाति और लिंग जैसे परंपरागत कटघरों एवं गरीब और अमीर भारत के विभाजन के अलावा उसमें और भी कई टूटें सिर उठाए देखी जा सकती हैं। इन टूटों को अक्सर पुरातनता और गरीबी के मत्थे मढ़ दिया जाता है। लेकिन आधुनिकता और अमीरी का अमृत छकने वाले मध्यवर्ग में भी राष्ट्रीय एकता के प्रति सरोकार दिखावे भर का है। वह खुद निम्न, मध्य और उच्च के सोपानों में विभाजित प्रतिस्पर्धी गुटों का अखाड़ा बना हुआ है। कट्टरता की ऐसी करामात है कि भारत में बुद्धिजीवी और कलाकार तक गिरोहबंदी चलाते हैं। कहने का आशय यह है कि भारतीय राष्ट्र को विखंडित करने वाली कट्टरता का फैलाव केवल संघ संप्रदाय तक सीमित नहीं है।
1950 में लोहिया लिखते हैं, ‘‘आज हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता की लड़ाई ने हिंदू-मुस्लिम झगड़े का ऊपरी रूप ले लिया है लेकिन हर ऐसा हिंदू जो अपने धर्म और देश के इतिहास से परिचित है, उन झगड़ों की ओर भी उतना ही ध्यान देगा जो पाँच हजार साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं और अभी तक हल नहीं हुए हैं। कोई हिंदू-मुसलमान के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकता जब तक कि वह उसके साथ ही वर्ण और संपत्ति के विरुद्ध और स्त्रियों के हक मंे काम न करे। उदार और कट्टर हिन्दू धर्म की लड़ाई अपनी सबसे उलझी हुई स्थिति में पहुँच गई है और संभव है कि उसका अंत भी नजदीक ही हो। कट्टरपंथी हिन्दू अगर सफल हुए तो चाहे उनका उद्देश्य कुछ भी हो, भारतीय राज्य के टुकड़े कर देंगे, न सिर्फ हिन्दू, मुस्लिम की दृष्टि से बल्कि वर्णों और प्रांतों की दृष्टि से भी। केवल उदार हिन्दू ही राज्य को कायम कर सकते हैं।’’ वे आगाह करते हैं, ‘‘अतः पाँच हजार वर्षों से अधिक की लड़ाई अब इस स्थिति में आ गई है कि एक राजनैतिक समुदाय और राज्य के रूप में हिन्दुस्तान के लोगों की हस्ती इस बात पर निर्भर है कि हिन्दू धर्म में उदारता की कट्टरता पर जीत हो।’’
लोहिया ने इस निबंध में एक जगह यह भी कहा है कि देश में एकता लाने की भारत के लोगों और महात्मा गांधी की आखिरी कोशिश की आंशिक सफलता को पाँच हजार सालों की कट्टरपंथी धाराएँ मिल कर असफल बनाने के लिए जोर लगा रही हैं। उनके विचार में ‘‘अगर इस बार कट्टरता की हार हुई, तो वह फिर नहीं उठेगी।’’ लेकिन भारत के शासक वर्ग ने कट्टरता को मारने के बजाय भारत के लोगों और गांधी को मारने का काम चुना जो आज भी जारी हैे। उसने ऊपर से जो भी फँू-फाँ की हो, जैसे कि समाजवाद या रोशनी बुझ गई आदि, वह कट्टरता के साथ जुट कर खड़ा हुआ। शासक वर्ग का पिछलग्गू, जो अब उसका हिस्सा ही है, आधुनिक बुद्धिजीवी-वह पूँजीवादी हो या साम्यवादी या तटस्थ? सादगी और शांति के विचार की भ्रूण-हत्या करने के लिए आमादा रहता है। उसी तरह जिस तरह भारत का पढ़ा-लिखा खाता-पीता मध्यवर्ग बालिकाओं की भ्रूण-हत्या करता है। गांधी को मारने की इस परिघटना की विस्तृत पड़ताल हमने अपनी आने वाली पुस्तक ‘हम गांधी को क्यों मारते हैं?’ में करने की कोशिश की हैं।
कट्टरता की जीत के इस फैसले का विरोध जरूरी है और आशा करनी चाहिए कि उच्चतम न्यायालय इसे अस्वीकार करेगा। उसके लिए जनमत बनाया जाना चाहिए। लेकिन यह काम गंभीरतापूर्वक सोच-समझ कर करने का है। विरोध के जो ज्यादातर स्वर सुनाई पड़ रहे हैं वे कट्टरता को हराने के बजाय अपने विमर्श या विचारधारा को जिताने की नीयत से ज्यादा परिचालित लगते हैं। कट्टरता को यह माफ़िक पड़ता है। ऐसे में वह उदारता की ताकत को भी अपने भीतर खींच लेती है। ऐसे माहौल में उदारता के फलने-फूलने को आकाश नहीं बचता। क्या हम कट्टरता से पूरित भारतीय सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में किसी रामकृष्ण परमहंस या गांधी की उत्पत्ति की कल्पना कर सकते हैं? कट्टरता तो फिर भी उन्हें एप्रोप्रिएट करती है, लेकिन उसके मुकाबले के दावेदार कहेंगे कि परमहंस और गांधी को न केवल पैदा नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके पैदाइश से पैदा हुए प्रभावों को भी नष्ट करने का काम तेजी से होना चाहिए। भारत के सेकुलर और कट्टरपंथी दोनों खेमों का यह प्रण है। इस प्रण में दलितवादी और स्त्रीवादी शामिल हैं। मायावती का हाथी, जैसा कि उनकी सरकार ने न्यायालय को बताया, हिन्दू धर्म की कट्टरतावादी धारा का मजबूत वाहक और उसे पूँजीवादी कट्टरता से जोड़ने वाला है।
यह कोई रहस्य नहीं है। ये सब आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के नवीनतम चरण नव-उदारवाद अथवा नवसाम्राज्यवाद के प्रकट अथवा प्रच्छन्न भक्त हैं। ओबामा की जीत पर उसके साथ जब ये सब चिल्लाए थे- ‘यस वी कैन’ – तो उनकी मुराद यही थी कि हम भी अमेरिका बन सकते हैं। हम भी मानते हैं कि ‘वे ही’ अमेरिका बन सकते हैं। बल्कि नकली-सकली ढंग के अमेरिकन वे बने भी हुए हैं और अपनी कूद-फाँद उन्हें दिखाते भी रहते हैं। गांधी, आधुनिक औद्योगिक सभ्यता, जो साम्राज्यवादी होकर ही संभव होती है, के विकल्प हैं। इस गांधी को छोड़ कर ‘उदार हिन्दू गांधी’ की बात कुछ नवउदारवादी यदा-कदा करते हैं। लेकिन वे भी जानते हैं कि उसका कोई अर्थ नहीं होता है। धार्मिक और नव उदारवादी कट्टरताएँ एक-दूसरे के कीटाणुओं पर पलती हैं।
देश में फैसले के खिलाफ जनमत बनाते वक्त यह जरूरी है कि संवैधानिक मूल्यों, धर्म निरपेक्षता, समाजवाद और लोकतंत्र के आधार पर फैसले का विरोध करने वालों की खुद की निष्ठा उनमें अक्षुण्ण हो। विशेषकर पिछले दो दशकों से संविधान के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है, उस पर सरसरी निगाह डालने से ही पता चल जाता है कि देश का शासक वर्ग, जिसमें अकेले संघ संप्रदायी नहीं हैं, की संविधान के प्रति निष्ठा दिखावे के लिए रह गई है। यहाँ तक कि बुद्धिजीवियों का सरोकार अपनी स्वार्थपूर्ति का रह गया है। किसी विधेयक, अध्यादेश, संशोधन, कानून आदि द्वारा संविधान की मूल भावना को नष्ट किए जाने पर भी बुद्धिजीवी सरकारों के साथ हो जाते हैं। बड़े-बड़े महारथी शिक्षा के बाजारीकरण का बीड़ा उठाने वाले सैम पित्रोदा और कपिल सिब्बल के अनुगामी बन गए हैं। बात वहीं आ जाती है, संविधान को चुनौती देने वाली कट्टरतावादी ताकतें और संविधान के पालन के नाम पर पलने वाला शासक-वर्ग देश की मेहनतकश जनता का साझा प्रतिपक्ष बना हुआ है। ऐसे में वह सांप्रदायिक, जातीय, क्षेत्राीय, गोत्राीय आदि कट्टरताओं का शिकार होता है तो दोष पूरा उसका नहीं होता।
भारत का बुद्धिजीवी-वर्ग संक्रमण की अवधारणा को रणनीति की तरह इस्तेमाल करता है। वह कहता है कि यह चीजों के सही दिशा में बढ़ने का संक्रमण काल चल रहा है। इस रणनीति के तहत आधुनिक दुनिया के करोड़ों लोगों की मौत और पीड़ाओं का औचित्य प्रतिपादित किया जाता है लेकिन अपनी कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की जाती। संक्रमण की रणनीति को हटा कर देखा जाए तो कुछ बातें स्पष्ट हैं। पूँजीवाद और उसकी गाँठ में बँधा समाजवाद, वह एक पार्टी की तानाशाही वाला हो या एक से अधिक पार्टियों के लोकतंत्र वाला, कट्टरता को बढ़ाते और बलवान बनाते हैं। कट्टरता की अपनी परंपरा और पैठ तो है ही। इन हकीकतों को अनदेखा करके कट्टरता के विरोध के कर्तव्य तय नहीं किए जा सकते।
फैसले के बाद अशांति और हिंसा न फैलने की काफी तारीफ हुई है। कारण बताया गया कि भारत के लोग अब परिपक्व हो गए हैं। धर्म के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वालों की असलियत वे पहचान चुके हैं। उन्हें सांप्रदायिक भारत नहीं चाहिए। लोगों में पैदा हुए इस गुण को ज्यादातर ने नवउदारवाद की नियामत बताया है। यानी नवउदारवाद भारत के लोगों को सांप्रदायिकता से काट कर आर्थिक महाशक्ति से जोड़ता है। इसे उलट कर भी कह सकते हैं- भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने में जुटे लोगों के पास सांप्रदायिक ताकतों के लिए फुरसत नहीं है। शायद वे यह भी मानते होंगे कि नवउदारवाद के चलते लोगों को कुछ समय के लिए जो आर्थिक कष्ट झेलने पड़ रहे हैं, सांप्रदायिकता के राक्षस से मुक्ति पाने की वह बहुत छोटी कीमत है। बल्कि कल के लिए उनके दिमाग में यह कहने के लिए भी हो सकता है कि सांप्रदायिक कट्टरता को परास्त करने के लिए वे नवउदारवादी कट्टरता को झेलते जाएँ। वे तर्क देंगे, सांप्रदायिक कट्टरता पीछेे और नवउदारवादी कट्टरता आगे ले जाने वाली है।
जो कहते हैं कि फैसले के बाद कोई दंगा नहीं हुआ, क्या वे कह सकते हैं कि फैसला हिन्दुओं के हक में नहीं आता तब भी वैसा ही होता? जो इस फैसले के बाद मुसलमानों से, फैसले के तहत हिस्से में आई जमीन को, छोड़ने और देश में लाखों जगहों पर लाखों मुकदमे दायर करने की ताल ठोंक रहे हैं, फैसला सुन्नी वक्फ बोर्ड के हक में आने पर क्या करते? क्या वे गारंटी दे सकते हैं कि मुस्लिम कट्टरता घात लगा कर वार नहीं करेगी?
कुछ सुधीजनों ने फैसले के बाद शांति कायम रहने के पीछे लोकतंत्र की मजबूती का तर्क भी दिया है। उनके मुताबिक हम इसी तरह अपने लोकतंत्र को मजबूत करते जाएँ तो सांप्रदायिकता से जल्दी ही मुक्ति पा लेंगे। सचमुच यह सोच आशा बँधने वाली है। कमियों और खामियों के बावजूद लोकतंत्र आशा का सबसे बड़ा आधार है। इस बिगड़े लोकतंत्र में भी पिछड़ी और दलित राजनीति आपस में मिल जाए तो संप्रदायवादी और नवउदारवादी कट्टरताओं पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है। लेकिन थोड़ा ठहर कर सोचें, क्या नवउदारवाद की सेवा में जुटी लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में मजबूत कहा जाएगा? यह विस्तार से बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि देश में जो लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, वह कांग्रेस और भाजपा के वर्तमान और भविष्य की मजबूती का लोकतंत्र है। भारत के लोकतंत्र को लेकर मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की एक राय है- देश में दो-कांग्रेस ओर भाजपा-पार्टियाँ रहनी चाहिए, बाकी क्षेत्रीय पार्टियों को इन दोनों में मिल जाना चाहिए।
उनकी यह मान्यता निराधार नहीं है। देश की अन्य पार्टियाँ बारी-बारी से कांग्रेस या भाजपा के साथ जुड़ती रहती हैं। दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक यही स्थिति है। नीतीश कुमार भाजपा का साथ नहीं छोड़ते कि कहीं रामविलास पासवान न लपक लें। समाजवादी पार्टी मस्जिद ध्वंस के उपनायक कल्याण सिंह के साथ मिल चुकी है। इधर राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा है कि राजद ने कांग्रेस का साथ छोड़ कर गलती की। माकपा पोलित ब्यूरो ने कहा ही था कि कांग्रेस से संबंध-विच्छेद करना घाटे का सौदा रहा। नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, एम0 करुणानिधि, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू आदि नेता भाजपा-कांग्रेस से सुविधानुसार मिलते-बिछुड़ते रहते हैं।। माक्र्सवादी पार्टियों को भी कुछ सयाने लोग रास्ता दिखा रहे हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में वामपंथी धारा की प्रतिष्ठा हो चुकी है। लिहाजा, उन्हें कम से कम कांग्रेस के साथ मिलने से ऐतराज नहीं होना चाहिए। संदेश यह है कि सांप्रदायिकता से बचने के लिए लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को बदलने की जरूरत नहीं है।
जिस तरह से एक स्थानीय विवाद को कट्टरतावादी ताकतों ने पूरे देश के स्तर पर फैलाया, समाज में सांप्रदायिकता और वैमनस्य का ज़हर घोला, पहले मुलायम सिंह के शासन में कारसेवकों की और पीछे कल्याण सिंह के शासन में मस्जिद-ध्वंस के बाद हजारों निर्दोष नागरिकों की दंगों में मौत हुई, केंद्र में भाजपा नीति सरकार बनी और स्वाभाविक रूप से कट्टरता का कारोबार बढ़ा, कृष्णा आयोग की रपट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, संघ संप्रदाय के कतिपय हिंदुओं ने आतंकवादी कृत्यों को अंजाम दिया, गुजरात दंगा हुआ, उसके बाद निर्दोष नागरिकों पर आतंकवाद का कहर टूटा, जम्मू-कश्मीर जंग का मैदान बना, 49 बार कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद लिब्राहन आयोग की रपट आई और संसद से लेकर सड़क तक पिटी, और अब यह फैसला आया। किस दिमाग से कहा जा रहा है कि लोग सांप्रदायिकता से हट गए हैं या हट रहे हैं? यह नव उदारवाद और उसकी सेवा में समर्पित लोकतंत्र को बचाने वालों का ही दिमाग हो सकता है।
भारत के सेकुलर खेमे में सांप्रदायिक कट्टरता का विरोध एक तदर्थ कर्तव्य जैसा माना जाता है। यह मानते हुए कि आधुनिकता के साथ धर्म निरपेक्षता भी स्थापित हो जाएगी। इसलिए धर्म और दर्शन की उदार धारा को समझने और बचाने की कोई जरूरत नहीं है। उदारता के नाम पर सरकारी कार्यक्रमों में गंगा-जमुनी तहजीब की बात कर लेना काफी है। अंततः आधुनिकता ही सब संकटों से बचाएगी, इस विश्वास के चलते तात्कालिक और फुटकर किस्म के उपायों से काम निकाला जाता है। संकट गहराने पर किए जाने वाले कार्यक्रमों में सेकुलर दायरे के विभिन्न समूहों का थोड़ा-थोड़ा साझा कर लिया जाता है। कट्टरता का कहर जब बलि लेकर चला जाता है, सब अपनी-अपनी कंदराओं में लौट जाते हैं। राजग सरकार बनने और फिर गुजरात में मुसलमानों का राज्य-प्रायोजित नरसंहार होने पर माक्र्सवादी विद्वान कुछ दूसरे समूहों से भी बात करने लगे थे। उन दिनों एक-दो वामपंथी पत्रिकाओं ने लोहिया का ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ निबंध भी प्रकाशित किया। लेकिन जैसे ही कांग्रेस सत्ता में आ गई, वे अपनी दुनिया में लौट गए।
दरअसल, इस मामले में कट्टरता की जीत का फैसला तो 6 दिसंबर 1992 को ही हो गया था। न्यायालय का फैसला उसकी ही एक अभिव्यक्ति है। आशा की जानी चाहिए कि सेकुलर खेमा, पहले की तरह, फैसले के विरोध के नाम पर सांप्रदायिक ताकतों की रस्मी भत्र्सना करके ही नहीं रह जाएगा। वह खुद भी अपनी समझ और रणनीति पर गंभीरता से विचार करेगा।

-प्रेम सिंह
मोबाइल- 09873276726
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय
में एसोशिएट प्रोफेसर हैं)

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अंतर्गत धारा 197 सीआर पी सी तथा 19 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत लोकसेवकों के ऊपर किसी भी अपराध का आरोप पत्र दाखिल करने से पूर्व सम्बंधित सरकार की अभियोजन स्वीकृति आवश्यक थी इस बात को उच्च न्यायालय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने अपने ऐतिहासिक में आवश्यक नहीं बताया और अपने आदेश में कहा कि सरकारी अधिकारीयों या लोकसेवकों का भ्रष्टाचार में उनको ये धाराएं संरक्षण नहीं देती हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि दोषियों के खिलाफ मामला चलाने के लिए अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नही है।
विद्वान न्यायमूर्ति श्री देवी प्रसाद सिंह तथा न्यायमूर्ति एस सी चौरसिया ने भारत सरकार व राज्य सरकार के भ्रष्टाचार निवारण कानून में धारा 19 में (अभियोजन स्वीकृति के प्राविधान) फैसले के अनुसार संसोधन करने का भी आदेश दिया है। खंडपीठ ने यह भी कहा है जब तक संशोधन नहीं हो जाता है तब तक जांच एजेंसियां इस फैसले का सहारा लेकर सभी वादों में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है। उच्च न्यायालय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने अनाज घोटाले की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त आदेश पारित किये हैं। उत्तर प्रदेश में अनाज घोटाला , पुलिस भर्ती घोटाला सहित हजारो घोटालों में आई.ए.एस और आई.पी.एस सहित सरकारी लोकसेवकों के खिलाफ अपराधिक वादों में आरोप पत्र सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति न मिलने के कारण दाखिल नहीं हो पा रहे थे और 1947 से लेकर अब तक अभियोजन स्वीकृति न मिलने के कारण भ्रष्ट सफेदपोश अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हो पाती थी। अधिकारी करोड़ो रुपये का घोटाला करने के बाद बड़े आराम से सेवानिवृत्त हो जाते थे। अभियोजन स्वीकृति सम्बन्धी इस फैसले से नौकरशाहों को सबसे ज्यादा तकलीफ होगी क्योंकि प्रदेश में लगभग अधिकांश नौकरशाह विभिन्न घोटालों में अभियुक्त हैं। बहुत सारे नौकरशाहों का अपराधियों की तरह लम्बा चौड़ा अपराधिक इतिहास भी है। यदि किसी प्रशासनिक अफसर की तैनाती कहीं की जाए तो उसके अपराधिक इतिहास को भी प्रकाशित किया जाए तो काफी हद तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है। उच्च न्यायलय का यह फैसला ऐतिहासिक है और अगर इसमें विधायी हस्ताक्षेप न किया गया तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री को नियंत्रित करने में यह फैसला अहम् भूमिका अदा करेगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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हैकरों ने सीबीआई की वेबसाइट हैक कर उसपर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लिख डाले। वेबसाइट पर हैकरों ने अपना एक संदेश भी लिख छोड़ा।

इस संदेश में पाकिस्तान साइबर आर्मी की तरफ दिए गए इस संदेश में कहा गया है कि यह हैकिंग भारतीय साइबर आर्मी द्वारा उनकी 36 वेबसाइट को हैक करने के बाद की गई है। सीबीआई की वेबसाइट विश्व पुलिस संगठन इंटरपोल के कमांड सेंटर से जुड़ी हुई है।

एक पाक न्यूज चैनल ने दावा किया कि पाक साइबर आर्मी ने सीबीआई सहित भारत की कुल 270 वेबसाइट्स को हैक किया है। इस खबर के आने के तुरंत बाद सीबीआई की वेबसाइट ने काम करना बंद कर दिया।

हिन्दुस्तान

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उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत जो संगठन धरना प्रदर्शन के माध्यम से अपनी बात कहने राजधानी लखनऊ जाते हें उन पर सरकार के दिशा निर्देशों के अनुरूप लाठी और गोली से स्वागत किया जाता है। कल मनरेगा सेवकों पर राजधानी पुलिस ने जमकर लाठियां व गोलियां चलायी। काफी लोग जख्मी हुए और मीडिया ने अपने अपने समाचारों से प्रशासन को सुरक्षित किया। प्रदर्शनकारी शहीद स्मारक के पास गोमती नदी में कूद गए। पुलिस ने नदी में भी उनको पीटने से बाज नहीं आये।


लो क सं घ र्ष !

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गांधी और बराक ओबामा: संबंध् की पड़ताल

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गांधी के भारी प्रशंसक हैं। हाल की अपनी
भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने गांधी और विशेषकर उनके अहिंसा दर्शन की प्रशस्ति की।
साथ ही गांधी के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार किया। वे मुंबई और दिल्ली दोनों जगह
गांधी स्थलों पर गए। संसद में दिए गए अपने भाषण में उन्होंने यहां तक कहा कि गांध्ी
नहीं होते तो वे अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं हो सकते थे। ओबामा गांध्ी को अपना रोल
माॅडल बताते रहे हैं। वे गांध्ी से इस कदर अभिभूत हैं कि पिछले साल वर्जीनिया प्रांत के
के अरलिंगटन शहर में वेपफील्ड हाई स्कूल में एक छात्रा द्वारा पूछे जाने पर कि वे किस
जीवित अथवा दिवंगत हस्ती के साथ डिनर करना चाहेंगे तो ओबामा ने गांधी का नाम
लिया। अपने एक भाषण में यह कह कर कि ‘‘अमेरिका की जड़ें महात्मा गांधी के भारत
में हैं’’, वे अपने देश की नियति को भी गांध्ी के साथ जोड़ चुके हैं। गांधी को अपने और
अमेरिका के साथ जोड़ने के बाद वे विश्व के साथ जोड़ते हुए कहते हैं, ‘‘महात्मा गांधी ने
पूरी दुनिया में पिछली कई पीढ़ियों से लोगों को प्रेरित किया है।’’ ओबामा गांधी की
सार्वभौमिक सार्थकता देखते हैं और उन्हें मानवता का मसीहा मानते हैं।
कहना न होगा कि गांध्ी को पूरी दुनिया में नाम का यश खूब मिला है। इस मामले
में वे शायद आधुनिक युग के किसी भी चिंतक और नेता से ज्यादा खुशनसीब हैं। उन्हें
दुनिया में सामान्य से लेकर हर क्षेत्रा के विशिष्ट नागरिकों तक प्रायः सभी जानते हैं। बीसवीं
शताब्दी के शुरुआत से उन पर लिखा जाना शुरू हो गया था जो अभी तक जारी है।
हालांकि, जैसा कि अक्सर सभी प्रसिद्धि पाने वालों के साथ होता है, गांधी की प्रशस्ति के
महाकाव्य में एक अध्याय गांधी की निंदा का भी शुरू से रहा है। इस अध्याय में भारत से
लेकर पाकिस्तान और दक्षिण अप्रफीका से लेकर यूरोप-अमेरिका तक गांध्ी को पाखंडी
;प्रफाडद्ध बताने के ‘प्रमाण’ दिए जाते हैं। गांध्ी के क्रूर और कामी आचरण से लेकर उन्हें
नस्लवादी और यु( भड़काने वाला ‘सि(’ किया जाता है। गांधी को दलितों को गुलाम
बनाने की साजिश रचने वाला मान कर दलित अस्मिता के उन्नायकों में गांधी-निंदा का
सतत पाठ चलता है। भारत के हिंदूवादियों को गांधी से इस कदर घृणा है कि उनकी हत्या
को वे वध् ;जो राक्षस का किया जाता हैद्ध कहते हैं।
नीयत निंदा करने की हो तो तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा और उनका एकतरपफा इस्तेमाल
किया जाता है। महत्ता पाने वाली सभी हस्तियों के साथ ऐसा होता है। निंदक ईश्वर और
उनके पुत्रों-पैगंबरों को भी नहीं छोड़ते हैं। निंदकों को कितने ही सुस्पष्ट और सशक्त
ज्ञानात्मक तथा संवेदनात्मक तर्क दे दिए जाएं, वे हठपूर्वक अपने पक्ष पर डटे रहते हैं। उसी
तरह जैसे प्रशंसक कमियां और कमजोरियां बताए जाने के बावजूद प्रशंसा-पात्रा की प्रशंसा
से तनिक भी विरत नहीं होते हैं। किसी भी हस्ती की प्रशस्ति और निंदा के बीच गंभीर
आलोचना भी सामने आती है। आलोचना जरूरी है, आधुनिक काल के विचारकों और
विचारों के बारे में और भी जरूरी, ताकि व्यक्तित्व और विचारों में अकाल जड़ता न आ
जाए। गांध्ी की भी समय-समय पर कुछ अच्छी आलोचना सामने आती रही है, जिसमें
उनकी शक्ति और सीमा दोनों का आकलन होता है। यह हो सकता है कि एक आलोचक
केवल शक्ति की बात करता हो और दूसरा केवल सीमाओं की और तीसरा दोनों पक्षों को
सामने लाए। कहना न होगा कि आलोचनात्मक उद्यम में आलाचकों की शक्ति और सीमा
भी प्रकट होती है। गांध्ी के आलोचकों को प्रशंसक निंदक और निंदक प्रशंसक समझते हैं।
इसीलिए दोनों आलोचित गांध्ी में से अपने काम की सामग्री ही निकालते हैं। ऐसा न करके
वे तथ्यों की जानकारी और विश्लेषण की रोशनी में प्रशंसक और निंदक की कोटि से बाहर
आकर खुद गांधी के आलोचक बन सकते हैं। आधुनिकता का यही तकाजा है।
आधुनिकता के तकाजे को अनदेखा करके प्रशसंक और निंदक अपने-अपने ‘ध्र्म’
पर डटे रहते हैं तो देखना होगा कि प्रशंसक और निंदक में किसका महत्व ज्यादा है? हमें
लगता है कि प्रशंसक के मुकाबले निंदक का महत्व ज्यादा होता है। संतों ने निंदक को
नजदीक रखने को कहा है। किशन पटनायक ने अपने एक लेख का शीर्षक ‘गांध्ी की
निंदा अवश्य होनी चाहिए’ दिया तो हम चैंके थे। लेख 1994 में ‘सामयिक वार्ता’ में छपा
था और अब उनके लेखों की पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ ;राजकमल प्रकाशन,
2000द्ध में संकलित है। इस लेख में मायावती द्वारा की गई गांध्ी-निंदा से कुछ आलोचना
निकालने की कोशिश की गई है। उसी पुस्तक में उनका एक और लेख ‘गांध्ी का पाखंड’
संकलित है जो 1977 में लिखा गया था। इस लेख में गांध्ी-निंदकों द्वारा प्रचलित पाखंड
शब्द में से आलोचना के कुछ सूत्रा निकालने की कोशिश है। यहां हम लेखों पर चर्चा नहीं
कर रहे हैं। हमने हवाला इसलिए दिया है कि प्रशंसा से ज्यादा निंदा में आलोचना की
सामग्री हो सकती है।
पाकिस्तान से प्रकाशित ‘संडे मेल’ अखबार ने 5 नवंबर 2010 के संपादकीय में
‘प्रमाण’ सहित गांध्ी-निंदा की है। अखबार ने यह संपादकीय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक
ओबामा की भारत यात्रा के दौरान गांधी-प्रशंसा की प्रतिक्रिया में लिखा है। हम यहां उन
प्रमाणों का उल्लेख नहीं कर रहे हैं, न ही स्पष्टीकरण दे रहे हैं जो अखबार ने उ(ृत किए
हैं। अखबार ने चिंता जताई है कि ओबामा भी गांधी को महान बताने के भारत के प्रचार
का शिकार हो गए हैं। हालांकि अखबार को यह पता नहीं है कि ओबामा लंबे समय से
गांध्ी के प्रशंसक हैं और उसका आधर, जैसा कि हम आगे देखेंगे, भारत का प्रचार नहीं
है। अखबार यह भी नहीं जानता कि भारत गांधी-निंदा का सबसे बड़ा गढ़ है। बहरहाल,
अखबार गांध्ी के मुकाबले जिन्ना को लेकर आया है। अखबार की नीयत कुछ रही हो,
इससे कुछ लोगों को गांध्ी और जिन्ना दोनों को जानने-समझने की प्रेरणा मिल सकती है।
कम से कम उन ‘प्रमाणों’ की जांच की इच्छा हो सकती है जो अखबार ने दिए हैं। उस
कवायद में गांधी और जिन्ना का कोई अच्छा आलोचक बन सकता है। कुछ पाठक ओबामा
के गांधी-प्रेम की तह में भी जाने की कोशिश कर सकते हैं।
आइए बराक ओबामा की गांधी-प्रशंसा का अर्थ निकालने का प्रयास करें। कसौटी
वही रखते हैं – क्या ओबामा की भूरि-भूरि गांधी-प्रशंसा उन्हें गांध्ी का अच्छा आलोचक
बनाती है, बना सकती है? क्या ओबामा की गांधी-प्रशंसा पर पफूल बरसाने वाले भारत के
नेता, मीडिया वाले, बुद्धिजीवी, गांधीवादी गांधी के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि अपना सकते
हैं? उनमें वैसी इच्छा उत्पन्न हो सकती है? ओबामा की गांधी-प्रशंसा की पड़ताल में हम
गांधी के सिद्धांतो की कसौटी नहीं लगाने जा रहे हैं। हालांकि यह ध्यान दिलाना चाहते हैं
कि गांधी सामाजिक-राजनीतिक काम करते हुए यह ध्यान रखते थे कि लोगों पर ताम-झाम
भारी न पड़े। अपने काफिले सहित ओबामा और भारत में उनकी अगवानी करने वाले
शासक वर्ग का ताम-झाम मिल कर लोगों पर इस कदर भारी था कि उसमें कुछ बहुत बड़े
लोग ही दिख पा रहे थे।
ओबामा की गांध्ी-प्रशंसा का एक निश्चित ऐतिहासिक आधर है। ऐसा नहीं है कि
उन्होंने बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आने पर गांध्ी-प्रशंसा की रूढ़ि निभाई हो। पहले का
तो हम ज्यादा नहीं जानते लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के दौरान और बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति
उन्होंने गांधी के व्यक्तित्व और अहिंसक दर्शन की कई अवसरों पर प्रशंसा की है। कारण
है कि अमेरिका में अश्वेतों के नागरिक अध्किारों के लिए किए गए आंदोलन पर गांध्ी के

सत्याग्रह का प्रभाव रहा है। शुरू में उल्लिखित स्कूल के छात्रों से वार्तालाप करते हुए
ओबामा कहते हैं, ‘‘मुझे उनसे बड़ी प्रेरणा मिलती है। उन्होंने डॉ. मार्टिन लूथर किंग को
प्रेरित किया, अगर भारत में अहिंसक आंदोलन नहीं हुआ होता तो हो सकता है आप लोग
नागरिक अध्किारों के लिए चला वैसा ही अहिंसक आंदोलन संयुक्त राज्य में नहीं देख
पाते।’’
हालांकि ओबामा ने उल्लेख नहीं किया है लेकिन डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के
पहले बीस के दशक के एक अप्रफीकी-अमरीकी असा रेंडोल्पफ पिफलिप पर गांध्ी के
सत्याग्रह का प्रभाव था। वे नागरिक अध्किार आंदोलन और मजदूर आंदोलन के नेता थे
जिन्हें अप्रफीकी-अमरीकी गांध्ी भी कहा गया था। उनके बाद डाॅ. किंग पर गांध्ी का प्रभाव
रहा ही है। ओबामा अप्रफीकी-अमरीकी दास समुदाय से नहीं हैं, उनकी पत्नी मिशेल दास
समुदाय से आती हैं, लेकिन उनके राष्ट्रपति चुने जाने में नागरिक अध्किार आंदोलन की
विरासत का योगदान है। इस लिहाज से उनका यह कहना सही ठहरता है कि उनका
अमेरिका का राष्ट्रपति चुने जाने में गांध्ी की निर्णायक भूमिका है। एक दशक पहले
अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी भारतीय संसद को संबोध्ति करते हुए कहा था कि
गांध्ी के अहिंसा दर्शन ने अमेरिका में नस्ली भेदभाव की समस्या को शांतिपूर्वक सुलझाने
में मदद की।
कहने का आशय यह है कि पिता की तरपफ से अश्वेत समुदाय का होने के नाते
ओबामा पर भी गांध्ी का प्रभाव पड़ा है। वे अपने को गांध्ी का कर्जदार मानते प्रतीत होते
हैं। ऐसा लगता है गांध्ी के मामले में उनकी प्रभाव-प्रवणता श्र(ा की हद तक जा पहुंची
है। हो सकता है राष्ट्रपति बन जाने पर यह श्र(ाभाव उमड़ कर आया हो। लेकिन गांध्ी के
प्रति श्र(ाभाव के बावजूद वे गांध्ी के अनुयायी नहीं हैं। वे डाॅ. किंग के अनुयायी भी नहीं
हैं। गांध्ी या डाॅ. किंग का अनुयायी अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं हो सकता। डाॅ. किंग केवल
अश्वेतों के नागरिक अध्किारों के लिए लड़ने वाले अप्रफीकी-अमरीकन नहीं थे। वे
अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध्ी थे, यह हम ओबामा के चुनाव जीतने के वक्त ‘समय
संवाद’ में लिख चुके हैं।
ओबामा से गुरु गांध्ी का शिष्य होने की अपेक्षा करना गलत होगा। ओबामा पर
गांध्ी का प्रभाव परोक्ष रूप से है। गांध्ी के साथ रहने वाले नेहरू उनके शिष्य नहीं हो
पाए। किसी राजपुरुष का गांध्ी का शिष्य होना अभी बाकी है और मानवता के सामने
दरपेश बड़ी चुनौती है। ओबामा के गांध्ी-प्रेम की आलोचना करने वाले गांध्ी के स्वराज्य,
राज्य, सत्ता, सरकार, विकास आदि विचारों और प्रतिरोध् की अहिंसक कार्यप्रणाली की
कसौटी लागू करते हैं। यह निरर्थक कवायद है जो कुछ हद तक ओबामा पर अपने पहले
लेखों में हमने भी की है। यह उस आध्ुनिक पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता का दौर है जिसे
गांध्ी ने शैतानी कहा था और उसका विकल्प पेश किया था। जब उस विकल्प को ओबामा
के आलोचक मौका देने को तैयार नहीं हैं, भले उनमें माक्र्सवादी से लेकर गांध्ीवादी तक
हों, तो अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रतिष्ठान के शीर्ष पर बैठे ओबामा से कैसे अपेक्षा की जा
सकती है कि वे गांध्ीवादी कसौटी पर खरे उतरेंगे?
अपने चुनाव में ओबामा ने गांध्ी का उल्लेख किया। लेकिन उन्होंने वोट मांगते वक्त
गांध्ीवादी सि(ांतों अथवा मूल्यों का जिक्र नहीं किया। उन्होंने अमेरिकावासियों को मंदी से
निकाल कर उन्हें उनका पहले-सा जीवन-स्तर प्रदान करने का वादा किया। सादगी न चुनाव
प्रचार में थी, न विचार में। राज्य के केंद्रीकृत विशाल ढांचे को गांध्ी स्वराज्य यानी मनुष्य
की स्वतंत्राता के लिए दमनकारी मानते थे। ओबामा यह जानते होंगे, लेकिन उन्होंने
शक्तिशाली अमेरिकी राज्य की शक्ति को वैसा ही बनाए रखने का प्रण नागरिकों से किया।
आज भी वे वही कर रहे हैं। अपफगानिस्तान और इराक में जो पहले से चल रहा है वह
और ताकत से जारी है ही, हाल में नेटो कमांडरों ने पाकिस्तान की सीमा में घुस ड्रोन
हमले बढ़ाने का निर्णय किया है।
ओबामा ने ‘अमेरिका के शत्राुओं’ के खिलापफ अहिंसक संघर्ष चलाने की बात कभी
नहीं चलाई। वह उनके दिमाग में भी शायद ही कभी आती हो। भारत की संसद में दिए
भाषण में ओबामा ने गांध्ी के आखिरी आदमी का कोई जिक्र नहीं किया। उनका भाषण
मनमोहन सिंह के लोगों को संबोध्ति था जिनका प्रगाढ़ संबंध् वे अमेरिका के साथ बनाना
चाहते हैं। गांध्ी से प्रभावित कोई व्यक्ति डरा हुआ नहीं हो सकता। ओबामा के साथ उनकी
सुरक्षा के लिए आया लाव-लश्कर उनके गांध्ीवादी नहीं होने की हकीकत को बच्चों के
सामने भी जाहिर कर देता है।
कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति गांध्ी के अहिंसा दर्शन में विश्वास नहीं कर सकता। न
विचार के स्तर पर न अमल के स्तर पर। बल्कि हथियार और बाजार के दो पहियों पर
हांकी जाने वाली आज की दुनिया में किसी राष्ट्राध्यक्ष से गांधी के सिद्धांतो के पालन की
अपेक्षा नहीं की जा सकती। उसके लिए मानवता को अभी लगता है लंबा इंतजार करना
होगा। अफ़सोस यह है कि तब तक मानवता का, और बाकी जीवधरियों का भी, बड़ा
हिस्सा तबाह और समाप्त हो चुका होगा।
यहीं से एक बारीक धगा निकलता नजर आता है। विशेष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के
अलावा ओबामा का गांध्ी को बड़ा मान देने का एक अन्य कारण पूंजीवादी साम्राज्यवाद
की बलि चढ़ने वाले मानवता के समूहों के प्रति उनके बचे सदस्यों की रिणशोध् की भावना
लगती है जो उन्हें गांध्ी तक खींच ले जाती है। ओबामा, हो सकता है गांध्ी की मापर्फत,
यानी उनके प्रति प्रेम और श्र(ा रख कर, अपने उन असंख्य पुरखों का कर्ज उतारते हों
जिन्हें पूंजीवादी साम्राज्यवाद ने पशुवत प्रताड़ित किया और विरोध् करने पर मौत के घाट
उतार दिया। लोहिया ने लिखा है कि दुनिया के सताए गए लोग गांध्ी की हत्या पर रोए
और शोकाकुल हुए थे। गांधी ओबामा की भावनात्मक जरूरत हैं।
ओबामा की गांधी-प्रशंसा का ऐतिहासिक आधर और जेनुइन कारण होने के बावजूद
वे न अपने तईं, न अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान में गांध्ी का उपयोग कर सकते हैं। ओबामा की
गांधी-प्रशंसा प्रसवित नहीं हो सकती। यहां तक कोई समस्या नहीं है। दरअसल, गांध्ी
आधुनिक सभ्यता में एक ऐसी उपस्थिति हैं जो सत्ता के गलियारों के बाहर पीड़ित मानवता
को आज भी सांत्वना देती भटकती है। यह कहती हुई कि जीत अंत में सत्य की होती है,
होगी। समस्या यह है कि ओबामा की गांधी-प्रशंसा गांधी को उसी आधुनिक सभ्यता की
वैधता का हथियार बना देती है जिसके खिलापफ गांधी का संघर्ष था। ओबामा साम्राज्यवादी
प्रतिष्ठान के शीर्ष पुरुष हैं। उनकी प्रशंसा सामान्य गांधी-प्रशंसकों से कहीं ज्यादा
गांधी-विनाशक हो सकती है। ‘‘अमेरिका की जड़ें गांधी के भारत में हैं’’ कह कर राष्ट्रपति
यह संदेश देने में सपफल होते हैं कि अमेरिका और भारत एक-दूसरे के सगे हैं। यह भारत
के मौजूदा शासक वर्ग के लिए महानतम अभीप्सित संदेश है। लेकिन इसमें आधुनिक
सभ्यता के विद्रूप उत्तराध्किारी अमेरिका के साथ गांधी को जोड़ा गया है। यह तथ्य और
विचार दोनों स्तर पर गलत है। गांधी का आधुनिक सभ्यता में समायोजन आधुनिक सभ्यता
को मजबूत और गांधी को कमजोर करता जाता है।
अब थोड़ी चर्चा भारत के शासक वर्ग की करते हैं। अकेले पफारवर्ड ब्लाक के
सांसदों ने ओबामा के संसद में दिए गए भाषण का बहिष्कार किया। वे बधई के पात्र हैं।
हालांकि ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है कि उनके अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोध् की
विचारधरा में गांध्ी का कोई स्थान है। एक बसपा सांसद ने ओबामा को अंबेडकर की
‘व्हाट गांधी एंड कांग्रेस हेव डन फॉर अनटचेबल्स’ किताब दी। वे ओबामा द्वारा कतिपय
भारतीय हस्तियों के साथ अंबेडकर का नाम लेने से भी उत्साहित हुए होंगे। किताब देने के
पीछे उनकी मंशा रही होगी कि ओबामा पर चढ़ा गांधी-प्रेम का भूत उतर कर
अंबेडकर-प्रेम का भूत चढ़ जाए। हो सकता है ओबामा वह किताब कभी पढ़ लें। उससे
निश्चित ही उनका गांध्ी के प्रति भारतीय संदर्भ में एक आलोचनात्मक रवैया विकसित हो
सकता है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि किताब देने वाले सांसद पर ओबामा की
गांधी-प्रशंसा का कोई प्रभाव पड़ा होगा? यानी वे गांधी-निंदक से गांध्ी के आलोचक बनने
की दिशा में बढ़ने की सोचते होंगे? कम्युनिस्ट सांसदों ने ओबामा का भाषण सुना और
सराहा। उनमें से एक नेता ने गांधी-प्रशंसा के संदर्भ में भाषण की प्रशंसा की। देखना होगा
कि उनकी तरपफ से गांधी की नई आलोचना कब और किस रूप में सामने आती है? ज्यादा
संभावना यही है कि भाषण पर अपनी प्रतिक्रिया के बाद वे भूल गए होंगे।
हमें ये कुछ सकारात्मक संदर्भ लगे जिनका हमने जिक्र कर दिया। बाकी शासक वर्ग
के नुमाइंदों, जिन्हें ओबामा से इंटरेक्ट करने का मौका मिला, और सरकारी व मठी
गांध्ीवादियों के व्यवहार में हमें ओबामा की गांधी-प्रशंसा के संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय
कुछ नहीं लगता है। बहुतों के लिए, गांधी-निंदकों समेत, गांधी-प्रशंसा ओबामा द्वारा की
जाने के चलते स्वीकार्य थी। मनी भवन के अध्किारी कामदार की बातें सुन कर ऐसा लगा
कि वे न गांध्ी को सही जानते हैं, न ओबामा को।
हमको लिख्यो है कहा …
जगन्नाथदास रत्नाकर की रचना ‘उद्धव शतक’ में उ(व कृष्ण की पाती लेकर
गोकुल में आते हैं तो कृष्ण के विरह में तड़पती गोपियों उन्हें घेर लेती हैं। सभी एक साथ
जानना चाहती हैं कि उद्धव उनके लिए मथुरा से क्या संदेश लेकर आए हैं। गोपियों की
उत्कंठा की एक बानगी देखिए: ‘उझकि उझकि पद कंजन के पंजन पै, पेखि पेखि पाती
छाती छोहन छबै लगी। हमको लिख्यो है कहा हमको लिख्यो है कहा, हमको लिख्यो है
कहा कहन सबै लगी’।। एशिया के दौरे पर निकले ओबामा के पहले भारत आने के
समाचार से शासक वर्ग उद्धव की गोपियों से भी ज्यादा बेहाल हो उठा। आखिर, दूत नहीं,
साक्षात कृष्ण चले आए! चारों तरपफ ओबामा-ओबामा की पुकार मच गई। सभी पूछने लगे,
‘ओबामा की झोली में हमारे लिए क्या है, हमारे लिए क्या है?’
जनता की नजर से यह सच्चाई छिपा ली गई कि ओबामा झोली भरने आए हैं। यह
सच्चाई केवल इसलिए नहीं छिपाई गई कि ओबामा जो झोली भर कर जाएंगे उसमें से यहां
के शासक वर्ग को हिस्सा-पत्ती लेना है, बल्कि इसलिए भी कि जनता को यह न पता चल
जाए कि अपने देश के नागरिकों को मंदी और बेरोजगारी से उबारने के लिए वहां का
राष्ट्रपति किस कदर दुनिया में भागा घूम रहा है। अगर उसने नागरिकों की समस्याएं दूर
नहीं की तो सत्ता से उसका पत्ता सापफ हो जाएगा।
पुराने जमानों में किसी चक्रवर्ती राजा की ऐसी धक और धज नहीं होती होगी जैसी
अमेरिका के राष्ट्रपति की होती है। ओबामा की कुछ ज्यादा ही रही। अमेरिका में उनकी
यात्रा पर खर्च को लेकर विवाद उठ गया। यह आरोप लगा कि ओबामा की यात्रा पर 2008
मिलियन डालर का भारी-भरकम खर्च किया गया है। व्हाइट हाउस ने इस आंकड़े को
अशियोक्तिपूर्ण बताया। जो भी हो, दुनिया का ध्न-संसाध्न खींचना है और रौब-दाब कायम
रखना है तो कापिफला भारी-भरकम और शानो-शौकत वाला होना चाहिए। ओबामा की खूबी
यह रही कि इस सबके साथ गांधी-प्रशंसा का राग भी निभा ले गए।
भारत का शासक वर्ग ओबामा के प्रति संपूर्ण समर्पित हो गया। जो मंत्री-मुख्यमंत्री
नागरिक जीवन में शासन का आतंक पफैलाते हुए नागरिक जीवन को रौंदते चले जाते हैं,
उन्हें समर्पण से पूर्व ओबामा के अमलों को अपना पहचान-पत्रा दिखाना पड़ा। व्यापारियों,
नेताओं, जनरलों, नौकरशाहों, पत्राकारों, बु(िजीवियों, सेलीब्रेटियों – सबको ओबामा में सब
कुछ उच्च कोटि का लगा। कमी बस पाकिस्तान को खरी-खोटी नहीं सुनाने की महसूस की
गई। वह ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिए जाने की वकालत करके पूरी कर
दी। सारा शासक वर्ग जैसे नशे में झूमने लगा। हालांकि विकीलीक्स के खुलासे से पता
चला कि अमेरिका की विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन कहती हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा
परिषद में स्थायी सीट पाने का स्वनियुक्त दाावेदार है। यानी अमेरिका ने इस विषय में अभी
निर्णय नहीं किया है। लेकिन भारत का ‘आशावादी’ शासक वर्ग विकीलीक्स के खुलासे से
अर्थ निकाल लेगा कि अब तो बराक ओबामा अपनी बाम रखने के लिए सीट सुनिश्चित
करेंगे ही। बहरहाल, इस बार सांसदों ने ओबामा से हाथ मिलाने के लिए बिल क्लिंटन के
वक्त जैसी आपा-धपी नहीं मचाई। इसमें शायद रंग का कुछ भेद रहा हो!
पूरे सत्ता प्रतिष्ठान ने एकमुश्त एक संदेश दिया: जो करेगा अमेरिका करेगा। और
अमेरिका सब भला करेगा। अमेरिका हमेशा भला करता है। किसी को अमेरिका का किया
कहीं कुछ बुरा लगता है तो उसे जानना चाहिए कि वह बुरा भले के लिए ही होता है।
भारत का भला न जाने कब का हो जाता, अगर वह रूस के चक्कर में नहीं पड़ता। कोई
बात नहीं। अमेरिका बड़ा कृपानिधन है। देर से आने का बुरा नहीं मानता। परिस्थितियां पूरी
तरह पक चुकी हैं। भला भी पूरा होगा।
इस परिदृश्य का समाजशास्त्राीय विवेचन करें तो कह सकते हैं कि शासक वर्ग में
जो अगड़ा सवर्ण है वह पूरा गुलाम बन चुका है और शूद्र पूरा पिछलग्गू। दलित दोनों को
पीछे छोड़ने की दौड़ लगा रहा है। ऐसे माहौल में नवउदारवादी संपादक-पत्राकार, बु(िजीवी,
कलाकार, खिलाड़ी कोई पीछे नहीं रहना चाहते। अमेरिका का नाम आते ही नवउदारवादी
पत्राकार पूरे रंग में आ जाते हैं। यहां तो साक्षात अमेरिका आया हुआ था। ‘इंडियन एक्सप्रैस’
ने ओबामा के गांध्ी-प्रेम को सबसे ज्यादा विज्ञापित किया। ऐसा नहीं है कि अखबार की
टीम को गांधी से कोई प्रेम है। उसके एक लेखक भानुप्रताप मेहता दो साल पहले तीस
जनवरी के अंक में लिख चुके हैं कि गांधी चुक चुका था, लिहाजा उनकी हत्या नहीं होती
तो छिछालेदर होती। अखबार में ओबामा के गांधी-प्रेम का विज्ञापन समाजवाद की निंदा के
लिए किया गया। अखबार का संपादक, जो एक ब्रोकर भी है, मुखपृष्ठ पर निकल आता है
और बताता है, ‘अमेरिका के साथ बराबर का सौदा हुआ है।’ गुलाम दिमाग बराबर हो जाता
है!
जो सौदे और दावतें हुईं, कोई कह सकता है यह उसी गांध्ी का देश है, ओबामा ने
जिनके गुणगान की झड़ी लगाए रखी? हमें स्कूल के बच्चों के साथ ओबामा का वह
वार्तालाप याद आ रहा था जिसमें ओबामा ने गांधी के साथ खाना खाने की इच्छा व्यक्त
की थी। गांधी का चुनाव बताने के बाद उन्होंने बच्चों से हंस कर कहा, ‘‘भोजन सचमुच
में थोड़ा-सा होगा, वे ढेर सारा नहीं खाते थे।’’ कोई कह सकता है इस देश के संविधन
की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द लिखा हुआ है और सरकारों के लिए कुछ नीति-निर्देशक
तत्व हैं? सौदों, दावतों और मौजमस्ती को देख कर कोई कह सकता है इस देश की अस्सी
प्रतिशत गरीब जनता बीस रुपया रोज पर गुजारा करती है? लोकतंत्रा का गुणगान और उस
पर विमर्श करने वाले नहीं पूछते तो गरीब क्या पूछ पाएगा कि यह कौन-सी नीति है और
कैसा लोकतंत्रा? लेकिन वे तो ज्यादातर ‘विमर्श-विनोद’ में मगन हैं।
भूख है, बेरोजगारी है, बीमारी है, कुपोषण है, मृत्यु है, आत्महत्याएं हैं – लेकिन
गुलाम और पिछलग्गू दिमाग अमेरिका के पीछे कमर कस कर खड़ा हो चुका है। पूछ रहा
है, ‘हमारे लिए क्या, हमारे लिए क्या’? उसके लिए दुनिया माने अमेरिका है। भारत माने
भी अमेरिका है। भारत को अमेरिका बनना ही होगा। अमेरिका बनते ही सबके लिए सब
ठीक हो जाएगा। यकीन न हो तो जिनके लिए बन चुका है, उन्हें देख लो। आंखों के
सामने हैं। वृ(ि दर और नरेगा मिल कर सब और सबको पार लगा देंगे। कहने का आशय
यह है कि ओबामा के गांध्ी-प्रेम का एक वास्तविक आधर है, लेकिन भारत का शासक
वर्ग गांध्ी को लेकर निपट पाखंडी है। इस स्थिति और चरित्रा को बयान करने के लिए लिए
कम से कम हमारे पास कोई शब्द नहीं है।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

ध्यान दिया जा सकता है जो लोग ओबामा आगमन पर भारत को अमेरिका बना रहे
थे, अपने भ्रष्टाचारी चरित्रा और व्यवस्था को बिल्कुल भूले हुए थे। हालांकि ओबामा के
आने के पहले राष्ट्रमंडल खेलों में खुला भ्रष्टाचार हो चुका था। वह होता रहा और सरकार
देखती रही। जैसा कि हमने आपको बताया था, प्रधानमंत्री कार्यालय ने राष्ट्रमंडल खेलों के
भ्रष्टाचार के मामले को दबाने की कोशिश की थी। हाल के 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में तो
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को दबाने के आरोप में प्रधनमंत्राी को ही तलब कर
लिया है। हाल में ग्लोबल पफाइनांसियल इंटेग्रिटी संस्था की एक रपट आई है कि आजादी
के समय से 2008 तक देश 462 बिलियन डालर काला धन बाहर जा चुका है। रपट यह
भी बताती है कि उसमें से 68 प्रतिशत राशि 1991 यानी नई आर्थिक नीतियां लागू होने के
बाद बाहर गई है।
लेकिन आपने देखा होगा ‘ईमानदार’ प्रधनमंत्राी के चेहरे पर कोई भाव नहीं रहता।
शिकन का तो सवाल ही नहीं। वे निरपेक्ष भाव से वृद्धि-दर का मंत्रा बोलते रहते हैं।
भ्रष्टाचार पर उनका मुंह कभी नहीं खुलता। अलबत्ता राजा की पीठ वे जरूर थपथपाते हैं।
हर्षद मेहता से लेकर अब तक उन्हें भ्रष्टाचारियों से कोई परेशानी नहीं होती। बल्कि उनके
साथ वे सबसे ज्यादा सुविध अनुभव करते हैं। हमने आपको कहा था कि मनमोहन सिंह
अभी तक के सबसे क्रूर प्रधानमंत्री हैं। वे अभी तक के सबसे भ्रष्ट वित्तमंत्री जमा
प्रधानमंत्री भी सिद्ध होंगे, अगर कोई अभी तक का सारा ब्यौरा जुटा कर सामने रखे। कल
आवास रिण घोटाला सामने आया है। देश के संसाध्नों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने
और हथियारों की खरीद में जो वारे-न्यारे होते है, उसकी बानगी बीच-बीच में मिलती
रहती है। यह भी सामने आ चुका हे कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायध्ीश बड़ी
संख्या में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।
जो तर्क पहले गरीबी के लिए दिया जाता था, अब भ्रष्टाचार के लिए दिया जाता है।
प्रधानमंत्री कहते हैं भ्रष्टाचार और क्रोनी पूंजीवाद पूरी दुनिया को परेशान किए है। गरीबी
स्थायी और स्वीकृत हो गई है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में शासक वर्ग का रवैया भ्रष्टाचार को
स्थायी और स्वीकृत बनाने का है। सुब्रमण्यम स्वामी प्रधानमंत्री को कौरवों के पाप छिपाने
वाला भीष्म पितामह कहते हैं। यह शासक वर्ग की आपसी शब्दावली है। वरना वे कहते
कि प्रधानमंत्री देश में भ्रष्टाचार के नए अध्याय के लेखक हैं।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े
हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कहती है प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार
हैं। मुख्यधरा पार्टियों का कहा मीडिया में छपता है। जबकि प्रधनमंत्राी भ्रष्टाचार के जनक
और भ्रष्टाचारियों के नेता हैं। रतन टाटा का गुस्सा समझ में आता है जो कहते हैं कि
प्रधानमंत्री को कोई दोष नहीं देना चाहिए और हर सौदे में घोटाला नहीं देखना चाहिए,
वरना राष्ट्र का निर्माण कैसे होगा? लेकिन कम से कम वामपंथी पार्टियों की जिम्मेदारी
बनती है कि वे देश की मेहनतकश जनता को सच्चाई बताएं।
जब प्रधनमंत्राी कहते हैं कि यह कड़ी चुनौती का समय है तो इसी अर्थ में कि
गरीबी के साथ भ्रष्टाचार को भी साथ लेकर चलना कड़ी चुनौती का काम है। उन्हें इस
चुनौती को पूरा करने का पूरा विश्वास है। संदेश सापफ है। आगे-आगे देश में भ्रष्टाचार और
गहरा पैठेगा। इसलिए करने के लिए कमर कस लो। संकेत पर्याप्त स्पष्ट हो चुके हैं। शिक्षा
और स्वाथ्य सहित किसी क्षेत्रा में विदेशी पूंजी के खिलापफ मत बोलो, बहुराष्ट्रीय कंपनियों
के संसाध्न लुटाने के खिलापफ मत बोलो, पिफर चाहे जितना भ्रष्टाचार करो। बल्कि अब
छोटे भ्रष्टाचार गिनती में नहीं आएंगे।
मनमोहन सिंह के ‘आदर्श’ भारत का यह नक्शा है। सोनिया के सेकुलर सिपाही
उसमें रंग भरने का काम करते हैं। सोनिया के सेकुलर सिपाहियों को मनमोहन सिंह के
वारिस और अपने भावी नेता पर भरोसा जरूर होगा जो कहता है युवा राजनीति में आएं तो
भ्रष्टाचार खत्म होगा। लेकिन उन्हें अपने नेता से उदारीकरण के पहले सबसे बड़े भ्रष्टाचारी
हर्षद मेहता की उम्र पूछनी चाहिए। स्टैंप घोटाले का नायक तेलगी, सत्यम कंप्यूटर घोटाले
का नायक रामलिंगम, 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले का नायक राजा और करोड़ों रुपया झोंक कर
चुनाव जीतने वाले ‘युवा तुर्क’ भ्रष्टाचार की कला में भले ही वरिष्ठ हों, उम्र में युवा हैं।
आध्ुनिक सभ्यता का यह मलबा है जो भारत के शासक वर्ग ने पिछले 60 सालों
में जमा किया है। पिछले 20 सालों में देश के मलबाकरण में अत्यंत तेजी आई है। शासक
वर्ग ने गांधी को इस मलबे में मिलाने की शुरू से कोशिश है। इध्र के वर्षों में यह
कोशिश तेज हुई है। यह परिघटना गांध्ी की ताकत और कमजोरी दोनों को दर्शाती है।
लगता यही है अभी लंबे समय तक गांधी की एक दुर्निवार उपस्थिति बनी रहेगी। गांधी की
आलोचना बड़ती जाएगी तो आधुनिक सभ्यता के मलबे से मुक्ति की संभावना बनी रहेगी,
एक वैकल्पिक सभ्यता की भी।

प्रेम सिंह

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तो अलगू चैधरी और जुम्मन शेख वाली प्रेमचन्द की कहानी-‘पंच-परमेश्वर’ बच्चों को पाठ्यक्रम में पढ़ाने का अधिकार हमने खो दिया। कम से कम नैतिक अधिकार तो खो दिया। लेकिन यह मामला सिर्फ प्रेमचन्द या उनकी एक कहानी भर का नहीं है। भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने उनका उपन्यास ही हटा दिया था, यह तो सिर्फ एक कहानी भर है। लेकिन यह मसला इसलिए बड़ा है कि यहाँ कहानी या उपन्यास हटाने के बजाय जीवन मूल्यों में से एक मूल्य बदल दिया गया है। हो सकता है कभी इस अदालत पर एक कहानी की हत्या का मुकदमा दायर हो।
अयोध्या का फैसला, न्याय की थोड़ी-बहुत उम्मीद रखने वाले पूरे समाज के साथ किया गया धोखा है। हालाँकि इसमें कोई नई बात नहीं है। हमारे देश की हजारों अदालतों में लाखों लोग रोज अन्याय के शिकार होते हैं। बहुत से तो अपने साथ हुए अन्याय का कारण ही नहीं जानते। अपनी गरीबी, साधनहीनता, दुत्कार, घिसटते हुए जीवन और इलाज के अभाव से लेकर किसी भी वजह या बेवजह होने वाली मौत तक को वे विधाता का खेल और अपना दुर्भाग्य मानकर रो-धोकर वापस जिन्दगी में खप जाते हैं- अपनी बारी का इंतजार करते हुए। वे विश्व बैंक या अमेरिका या अपने वित्त मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ कभी अदालत नहीं जाते। ये तो बड़े ओहदेदार हुए, दरअसल तो वे कभी अपने सरपंच, पटवारी, दारोगा या क्लर्क के खिलाफ भी नहीं जाते।
जो थोड़े से अदालत की सीढ़ी चढ़ पाते हैं, वे थोड़े भी लाखों या करोड़ों में होते हैं, उनमें भी अधिकतर को न्याय नहीं मिलता। पहले चप्पलें घिसती हैं, फिर जिन्दगी ही घिस जाती है। जिन थोड़े से लोगों को अदालत से फैसला मिलता भी है, उनमें भी न्याय सबको मिलता हो, ऐसा सोचने की कोई ठोस वजह हमारे आजाद देश की पवित्र कही जाने वाली न्याय प्रणाली ने हमें नहीं दी है।
न्याय व्यवस्था की दुरवस्था पर खुद बहुत से ईमानदार न्यायविद् लिख-कह चुके हैं और जिनका साबका जिंदगी में कभी भी कोर्ट-कचहरी से पड़ा है, उनमें से अधिकांश फिर वहाँ नहीं जाना चाहते। इस सबके बावजूद हमारे देश के सभी जातियों, सभी धर्मों और सभी वर्गों के लोग आश्चर्यजनक संयम के साथ आजादी के बाद से अब तक मोटे तौर पर न्यायालय का सम्मान करते आए हैं- दाग़ी वकीलों की लूट-खसोट और न्यायाधीशों के बारे में जब-तब उछलते रहे भ्रष्टाचारों के बावजूद।
तो फिर अयोध्या के फैसले में ऐसा क्या है जिससे कि हमारे सहनशील नागरिकों की न्यायालय के प्रति आस्था को धक्का लगे? क्यों नहीं यह भी न्याय के नाम पर न्याय को लगातार स्थगित करती रहती, या फिर अन्याय का ही पक्ष ले लेती भारतीय न्याय व्यवस्था का एक और सामान्य कारनामा मान लिया जाए?
अयोध्या का फैसला या वृहद् जन समुदाय के मन-मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए अन्य मामले इसलिए अलग हैं क्योंकि ये एक सार्वजनिक मान्यता का निर्माण करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर न्याय व्यवस्था की खामियों का शिकार होने के बावजूद लोग न्याय की उम्मीद इसलिए रखे रहते हैं क्योंकि बहुतों का होने के बावजूद न्याय के नाम पर अन्याय हासिल होने का उनका तजुर्बा उनका व्यक्तिगत तजुर्बा ही बना रहता है, वह सार्वजनिक नहीं हो पाता। जबकि अयोध्या जैसे मामले, जिनकी तरफ सारे देश की निगाहें लगी होती हैं, वे एक नज़ीर कायम करते हैं, वे जीवन के मूल्य तय करते हैं।
अयोध्या के फैसले में वह ताकत थी कि वह देश में मज़हब के नाम पर होने वाली राजनीति को करारा तमाचा मारता और एक नज़ीर कायम करता। भले बाद में मस्जिद बनती या मंदिर रहता या मामला सुप्रीम कोर्ट में लटका रहता, लेकिन बाद की पीढ़ियों तक के लिए एक जीवन मूल्य बनता कि न्याय ने सत्ता की खरीदी बाँदी होने से इन्कार कर दिया।
बहरहाल, जैसे कवि चन्द्रकान्त देवताले ने वैज्ञानिक अब्दुल कलाम को लिखी अपनी कविता में लिखा था कि उन्होंने भाजपा द्वारा परोसा गया राष्ट्रपति पद स्वीकार करके साम्प्रदायिक शक्तियों को लज्जित करने का दुर्लभ मौका गवाँ दिया, वैसे ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी यह दुर्लभ मौका गवाँ दिया, जो लाखों-करोड़ों में से किसी एक को जिन्दगी में सिर्फ एक बार बमुश्किल मिलता है।
देश के करोड़ों बगैर पढ़े-लिखे और पढ़े-लिखे लोग यही समझेंगे कि जरूर रामलला का जन्म वहीं हुआ होगा, जहाँ बाबर ने मंदिर ढहाकर मस्जिद बनाई तभी तो अदालत ने ऐसा फैसला दिया। उनमें वे भी होंगे जो बखूबी जानते हैं कि अदालतों के दिए फैसलों के आधार पर सच और झूठ की पहचान बहुत मुश्किल हो चुकी है। फिर भी वे इस फैसले को सच का फैसला मानेंगे क्योंकि एक तो इत्तफाकन वे धर्म से हिन्दू होंगे और दूसरे, वे लगातार दो दशकों से फैलाए जा रहे साम्प्रदायिक ज़हर के जाने-अनजाने शिकार बन चुके होंगे। तजुर्बों से सीखे लोग नई पीढ़ी को ये नसीहत देना बंद कर देंगे कि ‘‘सच्चाई की आखिरकार जीत होती है।’’
राजनैतिक हित में विज्ञान की चाकरी
एक जमाने में कवि, शायर, ऋषि-महर्षि और मनीषी राजा की पसंद-नापसंद का ख़याल न करते हुए वही कहते थे जो उन्हें सही लगता था। खरा सच कहने से जिनकी जान पर ही बन आई, वे तो थे ही, लेकिन इतिहास में ऐसे नाम भी कम नहीं जिन्होंने भले घुमा-फिराकर, इशारों में सच कहा हो लेकिन राजा की मर्जी की वजह से झूठ तो नहीं कहा। अब बाजार के दौर में अनेक इतिहासकारों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों ने अपने पाले बदल लिए। इस फेहरिस्त में अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भी जुड़ गया। खुदाई के दौरान प्राप्त हुईं जानवरों की हड्डियाँ, मुस्लिम शासकों के काल में इमारत निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सुर्खी और चूने के मसाले की मौजूदगी आदि अनेक तथ्य जो वहाँ कभी भी, किसी भी तरह के मंदिर की मौजूदगी के विरोधी सबूत थे, पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट में उपेक्षित कर दिए गए। पुरातत्व विभाग तो इस हद तक ही गया था कि एक निराधार ‘स्तंभ आधार वाली संरचना’ को उसने मंदिर होने की संभावना के रूप में पेश किया और ऐसे सारे सबूतों की ओर से आँखें मूँद लीं जो वहाँ मुगल कालीन निर्माण की ओर संकेत करते थे। लेकिन न्यायालय ने तो उससे कहीं आगे जाकर न केवल यह फैसला दे डाला कि वहाँ मंदिर था, बल्कि यह भी कि रामलला का जन्म भी वहीं हुआ था। राम के मिथकीय चरित्र को न्यायालय ने इतनी विश्वसनीयता व सहजता से स्वीकार कर लिया मानो उन्हें प्रसव कराने वाली दाई का शपथपत्र ही हासिल हो गया हो।
मैं इस लेख में उन ब्यौरों को नहीं दोहराऊँगा जो इसी अंक में अन्यत्र विस्तार से दिए जा रहे हैं। डी0 मंडल, सूरजभान और सीताराम राॅय जैसे ख्यातिप्राप्त पुरातत्ववेत्ता और रामशरण शर्मा, इरफान हबीब, के0एन0 पणिक्कर, के0एम0 श्रीमाली आदि अनेक इतिहासकारों ने अदालत में पेश की गई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की अयोध्या खुदाई की उस रिपोर्ट की इरादतन शरारतों और तथ्यों से खिलवाड़ करने का खुलासा किया है जिसकी बिना पर अदालत ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम की जन्मभूमि घोषित कर दिया। यहाँ मैं पुरातत्व विज्ञान की उन बारीकियों या फिर कानून की उन उलझी हुई धाराओं में भी नहीं जाऊँगा जिनका परदा बनाकर इस फैसले को सही ठहराने की कोशिश की गई है।
हाँ, पुरातत्व-विज्ञान और कानून की तरफ मेरे कुछ आम समझदारी के सवाल जरूर हैं जो मेरे ख़याल से इस मुद्दे के केन्द्र में रखे जाने चाहिए। सवाल यह है कि अगर कल कोई यह दावा करता है कि विवादित स्थल की जिस गहराई तक खुदाई हुई है, उससे और चंद फीट नीचे जैन मंदिर या बौद्ध स्तूप था तो क्या अदालत फिर से खुदाई करवाएगी? और चूँकि मौजूदा खुदाई में भी यह तथ्य तो सामने आया ही है कि अयोध्या के विवादित ढाँचे की कुछ विशेषताएँ सारनाथ के स्तूप से समानताएँ दर्शाती हैं और कुछ असमानताएँ, तो क्या कल हम फिर बौद्धों और हिन्दुओं में संघर्ष की जमीन तैयार होती नहीं देख रहे हैं? और फिर उस जमीन के नीचे से और कितने रक्तरंजित सामुदायिक संघर्षों के बीज निकलेंगे, इसकी कल्पना भी भयानक है।
आशय यह नहीं है कि हम इतिहास पर खाक डालें और अपने वर्तमान को मानवता और सौहार्द्रता से परिपूर्ण कर लें। इतिहास की ओर से आँखें मूँदकर कोई समाज न आगे बढ़ पाया है और न अपने आज का सामना कर पाया है। लेकिन इतिहास की तरफ किस नजरिये से, किस उद्देश्य से देखा जाए, इसकी समझदारी तो हमें बनानी होगी। हम पुराने वक्त को समझकर वहाँ से विवादों और नफरतों का वर्तमान में आयात करना चाहते हैं, या क्या हम वापस पुराने दौर में लौटकर अपनी पराजयों का फैसला पलटना चाहते हैं? या फिर हम अपने समाज के अतीत को विकास प्रक्रिया समझने का एक औजार बनाकर अतीत की वैमनस्यताओं और गलतियों से मुक्त कर इस धरती को जीने के लिए एक बेहतर जगह बनाना चाहते हैं?
जाहिर है कि अयोध्या के विवाद को उभारने के पीछे सदाशयताएँ या इतिहास के विवेचन की विशुद्ध वैज्ञानिक उत्सुक दृष्टि नहीं बल्कि संकीर्ण राजनीति का मुनाफाखोर नजरिया काम कर रहा है। अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने एक ऐसी जमीन तैयार करने में मदद की है जिस पर सिर्फ खून की सिंचाई होगी और नफरत की फसल उगेगी।
इसी तरह कानून का भी संक्षिप्त जायजा लें तो पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेन्दर सच्चर की कुछ बातों का इस सिलसिले में उल्लेख जरुरी और अहम है। सच्चर साहब के मुताबिक लाहौर की मस्जिद शहीदगंज के मामले में 1940 में हुआ यूँ था कि वहाँ सन् 1722 तक एक मस्जिद थी। बाद में वहाँ सिखों की हुकूमत कायम हो जाने के बाद उस जगह का इस्तेमाल 1762 आते-आते गुरुद्वारे के तौर पर होने लगा। सन् 1935 में उस इमारत पर एक मुकदमा कायम हुआ कि उस जगह पर चूँकि एक मस्जिद थी इसलिए उसे मुस्लिमों को लौटा दिया जाए। मामले पर फैसला देते हुए सन् 1940 में प्रीवी कौंसिल ने कहा कि लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ पूरी सहानुभूति होते हुए भी चूँकि वह इमारत 12 वर्षों से अधिक समय से सिखों के कब्जे में है अतः लिमिटेशन एक्ट के तहत इसका अधिकार मुस्लिमों को नहीं दिया जा सकता।
जिस दूसरे पहलू की ओर सच्चर साहब ने इशारा किया है वह यह कि जब तक अयोध्या-बाबरी मामला कोर्ट में था तब तक एक पक्ष उस जगह पर कब्जा नहीं कर सकता। इस लिहाज से हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा मस्जिद को ढहा दिए जाने से उनका कानूनी दावा कायदे से खत्म हो जाना चाहिए।
फैसले के पहले की उम्मीदें
यह फैसला आने के बाद कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। फैसले के पहले तक आम लोगों की चर्चाओं में तोड़ी गई बाबरी मस्जिद का क्या होना चाहिए, इस पर अलग-अलग राय रहती थी। उग्र हिन्दुत्व के पैरोकारों को छोड़ दें तो ज्यादातर सयाने किस्म के लोग, जो हिन्दू भी थे और मुसलमान भी, सोचते थे कि वहाँ कुछ राष्ट्रीय स्मारक या सार्वजनिक उद्यान या खैराती अस्पताल या सर्वधर्म समभाव का एक केन्द्र या ऐसा कुछ बना देना चाहिए ताकि देश के किसी भी तबके का उससे कोई धार्मिक भावना आधारित जुड़ाव न रहे और एक राष्ट्रीय भावना के तहत उसे देखा जाए। कुछ लोग तो उस स्थान पर गरीबों के लिए मुफ्त सुलभ शौचालय बनाने जैसे मशविरे के भी हक में थे। पहली नजर में धर्मनिरपेक्ष और भेदभावरहित लगते ये मशविरे दरअसल साम्प्रदायिक हिंसा से भयभीत समाज की वह प्रतिक्रिया थी जिसमें वह राष्ट्रवाद का सुरक्षित कवच ढँूढ़ रहा था। बेशक अगर ऐसा कोई फैसला किया जाता तो वह देश के करोड़ों मुसलमानों की भावनाओं के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता था, लेकिन शायद फिर भी वह साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों के खिलाफ एक प्रगतिशील फैसला होता। कम से कम वह इस देश के अल्पसंख्यकों को यह भरोसा तो दे सकता था कि न्याय व्यवस्था भले उनके साथ न्याय न कर पाई हो लेकिन उसने हत्यारे हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकों का पक्ष तो नहीं लिया।
तात्कालिक शान्ति से ज्यादा जो देश में न्याय और धर्मनिरपेक्षता के भविष्य के प्रति चिंतित लोग थे, उनका स्पष्ट मानना था कि चाहे कितनी ही सख्ती से पेश आना पड़े, साम्प्रदायिक ताकतों को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि इस देश में यह राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उनका मत था कि मस्जिद की जगह पहले मस्जिद बने, जिन्होंने उसे तोड़ा और तोड़ने के लिए उकसाया, उन्हें उसकी सजा मिले, उसके बाद दोनों समुदायों के भीतर आम लोगों का मेलजोल बढ़ाया जाए और अगर सामुदायिक सहमति से कोई और रास्ता निकलता है तो उसकी तरफ समझबूझ कर आगे बढ़ा जाए।
यह न्याय का रास्ता था। अगर यह फैसला होता तो यह हर किस्म की फिरकापरस्त ताकतों को एक साफ इशारा होता। इससे हिन्दू, मुसलमान और हर समुदाय के भीतर उदार और इंसाफपसंद ताकतों को इज्जत मिलती। बाबरी मस्जिद के फैसले से कई टूटी चीजों को इतनी मजबूती से जोड़ा जा सकता था कि जो दरार 1992 में मस्जिद गिराकर चैड़ी की गई थी और जिसमें 2002 में गुजरात में खून उड़ेला गया था, वह भरनी शुरु हो जाती।
लेकिन यह साहस और जोखिम का रास्ता था। ऐसा जोखिम नोआखली और बँटवारे के दौरान गांधीजी ने उठाया था और अपनी जान देकर भी धर्मनिरपेक्षता का एक मूल्य बनाया था। साहस नैतिकता से पैदा होता है। शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम तुष्टीकरण करके, अयोध्या के मंदिर के ताले खुलवाकर और फिर उसके जवाब में रथयात्राओं व सरकार की शह पर मस्जिद तुड़वाकर जिस तरह की राजनीति आगे बढ़ी, उससे इस नैतिकता की उम्मीद करना मुश्किल है।
वास्तविक राजनीति को और उसके बदलावों को करीब से देख-परख रहे इंसाफ तलब लोगों को इलाहाबाद न्यायालय के फैसले से ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं। उनका मानना था कि पुरातत्व विभाग द्वारा 2002-03 में करवाई गई खुदाई और उसे साजिशाना तरीके से उलटने-पलटने का जो रास्ता भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने चुना था, काँग्रेस की सरकार कल्पनाशील और मौलिक तरह से कुछ बदलाव भले करे लेकिन वह भी न्याय के रास्ते पर चलने का जोखिम उठानेवाली नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यह होता कि तारीखें आगे खिसकती रहतीं और फिर यह सिरदर्द नई सरकार के माथे पर मढ़ दिया जाता। जो जनपक्षीय ताकतें कुछ कर सकती थीं, वे साम्प्रदायिकता के साथ जुड़ी राजनीति के घृणित चेहरे को बेनकाब करने का काम करने में जुटी रहीं और जुटी हुई हैं लेकिन संगठित राजनैतिक प्रयासों के सामने ये कोशिशें, कम से कम अब तक तो बेहद नाकाफी साबित हुई हैं।
फैसले के बाद
फैसले के बाद कुछ ने तो चैन की साँस ली कि चलो फिर से दंगा नहीं हुआ। कुछ ने न्यायाधीशों की बुद्धिमत्ता को भी सराहा कि उन्होंने कितना अच्छा फैसला किया कि सबको कुछ-कुछ मिल गया। फैसले के बाद रही शांति को भी लोगों ने अलग-अलग नजरिए से देखा। कुछ ने इसे भारतीय जनता और समाज की गहरी सौहार्द्रता और समझदारी बताया कि सबकुछ शांति से निपट गया। कुछ ने यहाँ तक भी दावा किया कि भारत की आम जनता ने साम्प्रदायिकता को नकार दिया है। चैनलों और अखबारों ने फैसला आने के पहले से लेकर फैसला आने के बाद तक विशेष प्रस्तुतियाँ दीं। युवाओं से उनकी राय ली गई और जब उन्होंने कहा कि उनकी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उसका अर्थ यह भी निकाला गया कि देखिए, आज का युवा कितना समझदार है, जो इन फालतू मामलों में दिलचस्पी नहीं ले रहा है।
इस तरह की थकी हुई प्रतिक्रियाएँ दुखी करती हैं। लेकिन गनीमत है कि सब ऐसा नहीं सोचते। मुल्क की राजनीति, नौकरशाही, फौज और अब न्यायालय तक में फैलाए जा चुके साम्प्रदायिक ज़हर के सामने सभी ने हथियार नहीं डाल दिए हैं। कुछ हैं, और वे कुछ भी बहुत हैं, जो भरपूर साहस और जोखिम के साथ भाजपा और आर0एस0एस0 की ही नहीं बल्कि काँग्रेस और बाकी राजनैतिक-सामाजिक समूहों की साम्प्रदायिक साजिशों से मोर्चा ले रहे हैं।
मीडिया के लिए अयोध्या का फैसला एक सनसनीखे़ज फ़ैसला था जो इरादतन या गैर इरादतन काॅमनवेल्थ खेलों के आसपास हुआ। काॅमनवेल्थ खेलों में हुए भ्रष्टाचार की आँच देशभर में महसूस की जाने लगी थी और अगर उसी वक्त अयोध्या का मुद्दा ध्यान न भटका देता तो दिल्ली में बैठी सरकार को अपने कुछ सिपहसालारों और अफसरों से हाथ तो धोना ही पड़ता और इज्जत तब भी न बचती। ऐसे में अयोध्या का फैसला आना फौरी तौर पर इस शिकंजे से निजात पाने का अच्छा बहाना बना और अयोध्या मामले में न्यायपालिका ने जो कारगुजारियाँ की थीं, उन पर जनता का ध्यान जा सके और वह मुद्दा आगे बढ़ सके, उसके पहले ही सारे देश को राष्ट्रमंडल खेलों ने फिर राष्ट्रीयता के बुखार में जकड़ दिया। मीडिया सब भूल गया और स्वर्ण पदकों के यशोगान में लग गया। वह बुखार अरुंधति राॅय के कश्मीर पर दिए बयान से और बढ़ गया, जो आखिर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा जय हिन्द कह दिए जाने से आसमान पर चढ़ गया। बस दो महीनों के भीतर राष्ट्रीय महत्त्व के प्रमुख मसलों को कैसे एक-दूसरे को काटने के लिए इस्तेमाल किया गया, यह अवसरवादी राजनीति की काबिलियत का एक नमूना भर है।
इसी तरह लोगों की शांति या युवाओं की निस्संगता को समाज की सहिष्णुता और समझदारी समझना एक गलती होगी। आर्थिक रूप से निचले तबके के अधिकतर मुसलमानों के मन में इस फैसले से भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में उनकी राय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे देश के अपनी तरह के हिन्दुओं की ही तरह पहले से ही न्याय व्यवस्था के बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते हो सकते। पिछले कुछ वर्षों में उनके साथ भारतीय राज्य द्वारा, और आमतौर पर भी जो अपमानजनक सुलूक कभी सिमी तो कभी पाकिस्तान परस्ती के बहानों के साथ बढ़ता रहा है, उसका दंश कुछ और गहरा हो जाएगा। इसी अपमान के साथ भीतर ही भीतर वे सुलगते रहते हैं और फिर मुस्लिमों के भीतर मौजूद फिरकापरस्त ताकतें उस गुस्से को ही हथियार बनाती हैं। हिन्दुओं के भीतर मौजूद साम्प्रदायिक ताकतें बेरोजगार या गरीब नौजवान हिन्दुओं को एक छद्म राष्ट्रीय गौरव के अलौकिक और सत्ता सामीप्य के अवसरों के लाभों के लौकिक आधारों पर नचवाती हैं।
मध्यमवर्गीय हिन्दू किसी तरह का नुकसान न होने से प्रसन्न है और मध्यमवर्गीय मुस्लिम भी। लेकिन इस फैसले ने एक मध्यमवर्गीय नागरिक की पहचान को उसके भीतर सिकोड़ दिया है और एक सहमे मुस्लिम की पहचान को गहरा कर दिया है। इस फैसले ने उसे इस देश का नागरिक होने की बनिस्बत इस देश का सहमा हुआ मुसलमान बना दिया है। जिस देश में वह पीढ़ियों से बराबरी की हैसियत से रहा, वहाँ उसका मन यह स्वीकारने को तैयार होने लगा है कि भारत में उसकी स्थिति दोयम दर्जे की रहने वाली है। आर्थिक रूप से भले वह बेहतर स्थिति में हो लेकिन सामाजिक अलगाव उसे धीरे-धीरे अपनी तरह के सहमे और क्षुब्ध लोगों के पास ले जाएगा। अधिकांश मध्यमवर्गीय मुस्लिम नौजवान या तो औरों की तरह ही किसी तरह अपने से और ऊँचे वर्ग में शामिल होने के कैरियर युद्ध में शामिल हैं, या फिर वे एक सही मौका तलाश कर देश के बाहर अमेरिका या यूरोप या खाड़ी के देशों में ही कहीं चले जाना चाहते हैं ताकि हिन्दुस्तान में रहते हुए उन्हें अपनी दूसरे दर्जे की पहचान बार-बार याद न आए।
मुस्लिम समुदाय के भीतर एक और समस्याजनक स्थिति यह है कि कई दशकों से इसके पास कोई प्रगतिशील नेतृत्व गैरमौजूद है। मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी व्यापक सामुदायिक व अन्य समुदायों में स्वीकृति हो, जो सत्ता के स्वार्थों का मोहरा न हो और जो कठमुल्लावाद को चुनौती दे सके। ऐसे में मुस्लिम समुदाय एक तरफ हिन्दू सम्प्रदायवादियों से और दूसरी तरफ शहाबुद्दीन या शाही इमाम जैसे प्रतिक्रियावादी स्वार्थी राजनैतिक तत्वों के बीच फँसा हुआ है। एक तरफ बदहाली और फौजी ज्यादतियों के खिलाफ कश्मीर में किए जाने वाले उसके संघर्ष को मुस्लिम आतंकवाद का लेबल चस्पा करके पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मजबूर है कि वह हिंदुस्तान के प्रति हिंदुओं से भी ज्यादा वफादार दिखायी दे।
फैसले के असर और आगे की तैयारी
इस फैसले का असर तो सब पर पड़ रहा है चाहे कोई उसे तत्काल महसूस करे या बाद में। किसी भी तरह के व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन के अभाव में मुस्लिमों के पास यह गुंजाइश भी कम है कि वे किसी तरह अपने मजहबी खोल से बाहर आकर देश के दीगर परेशानहाल तबकों के साथ किसी संघर्ष का हिस्सा बनें। मुस्लिम समुदाय के अलावा यह फैसला हम जैसों को भी बहुत क्षुब्ध करने वाला है जो इस देश में अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे समूहों, संस्थाओं या मुट्ठीभर लोगों के आंदोलनों से साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार को रोकने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। भले इससे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की हिफाजत में लगे लोगों के हौसले कमजोर नहीं होते हों लेकिन ऐसे हर फैसले से साम्प्रदायिकता की आँच में झुलस चुके और झुलस रहे लोगों का धर्मनिरपेक्षता और अमन की कोशिशों पर भरोसा कमजोर होता है।
जो फैसला आया है, वह जमीन तो बेशक तीन हिस्सों में बाँटता है लेकिन भरोसा सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों को देता है। वह 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर जबर्दस्ती रखी गई मूर्तियों को उनके सही स्थान पर प्रतिष्ठित करना ठीक मानता है और 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने में कोई हर्ज नहीं देखता। इस तरह यह फैसला भले जमीन का तीसरा हिस्सा मुस्लिम वक्फ बोर्ड को दे देता हो लेकिन हौसला वह साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादियों का बढ़ाता है। दरअसल यह फैसला एक तरह से इस देश के छलनी भविष्य की बुनियाद डालता है जहाँ अतीत वर्तमान को इंच-इंच खोदकर लहूलुहान कर सकता है। अयोध्या का फैसला अगर बदला नहीं गया तो केवल काशी-मथुरा या धार (मध्य प्रदेश) ही नहीं, हर शहर और हर मुहल्ले के मंदिर-मस्जिद खुदने शुरु हो सकते हैं। इस देश का इतिहास इतना पुराना है कि कोई ठिकाना नहीं कि किसके कितने गड़े मुर्दे कहाँ-कहाँ निकलेंगे।
यह तय है कि न्याय के नाम पर अन्याय करने वाले इतनी आसानी से इसलिए भी अन्याय कर पा रहे हैं क्योंकि उन्हें न अपने खिलाफ लगने वाले इल्जामों की परवाह है और न ही किसी जबर्दस्त विरोध की आशंका। वक्फ बोर्ड या सुप्रीम कोर्ट क्या करता है, इस बारे में न तो कुछ कहा जा सकता है और न ही उनसे उम्मीदें लगाकर खामोश बैठा जा सकता है। मसला कानूनी है और अदालती कार्रवाई चलनी ही चाहिए और वह भी इस तरह कि देश के लोगों तक भी ये तथ्य पहुँच सकें कि किस तरह न्यायाधीशों ने तथ्यों का मनचाहा निरूपण करके कानून का मखौल उड़ाया है।
लेकिन यह मसला सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने से नहीं सुलझने वाला। जो राजनैतिक दल इस फैसले को संविधान की कब्र मानते हैं उन्हें तमाम मतभेदों के लिए अलग गुंजाइश रखते हुए इस मसले पर साझा रणनीति बनानी जरूरी है। इस रणनीति में केवल संसद के भीतर की जाने वाली बहस ही नहीं बल्कि अपने-अपने जनाधारों के भीतर इस मसले पर लोगों के दिमाग साफ करने की अनिवार्य कार्ययोजना होनी चाहिए। ट्रेड यूनियन, विद्यार्थी व युवा मोर्चे, महिला संगठन व सांस्कृतिक संगठनों को एक समन्वित योजना बनानी होगी।
राजनैतिक दलों के साथ ही अन्य जनतांत्रिक संगठनों को भी इस मसले की गंभीरता समझते हुए अपने मुद्दों की सीमा रेखा पार कर आगे आना होगा। देश की अमेरिकापरस्त ग्लोबलाइजेशन की नीतियों की वजह से शहरों में और गाँवों में हर जगह मजलूमों की, गरीबों की तादाद बढ़ रही है। बाँध विस्थापित हों या दलित या छोटे किसान या महिलाएँ या आदिवासी, सभी व्यवस्था से पीड़ित लोग आज अनेक छोटे-बड़े आंदोलनों की शक्ल में भारतीय राज्य के सामने सवाल उठा रहे हैं। संघर्षों ने इन आंदोलनकारियों को जनवादी और प्रगतिशील बनाया है। इनके बीच भी इस मसले को ले जाने और उन्हें इस मामले में शिक्षित करने की जरूरत है।
रास्ते और भी तमाम हो सकते हैं लेकिन देश में धर्मनिपेक्षता का विकल्प कोई नहीं हो सकता। समाजवाद तो हम बना नहीं पाए, जैसे तैसे यह ही एक उपलब्धि हमारी बची रही है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र हैं। अब इसे भी नहीं बचा सके तो हम स्वार्थी सत्ता द्वारा जल्द ही बर्बर युग में फेंक दिए जाएँगे।

-विनीत तिवारी
(लेखक सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
मोबाइल-09893192740

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