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Archive for the ‘विनीत तिवारीइक्कीसवीं सदी का पहला लाल सितारा-नेपाल’ Category

तो अलगू चैधरी और जुम्मन शेख वाली प्रेमचन्द की कहानी-‘पंच-परमेश्वर’ बच्चों को पाठ्यक्रम में पढ़ाने का अधिकार हमने खो दिया। कम से कम नैतिक अधिकार तो खो दिया। लेकिन यह मामला सिर्फ प्रेमचन्द या उनकी एक कहानी भर का नहीं है। भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने उनका उपन्यास ही हटा दिया था, यह तो सिर्फ एक कहानी भर है। लेकिन यह मसला इसलिए बड़ा है कि यहाँ कहानी या उपन्यास हटाने के बजाय जीवन मूल्यों में से एक मूल्य बदल दिया गया है। हो सकता है कभी इस अदालत पर एक कहानी की हत्या का मुकदमा दायर हो।
अयोध्या का फैसला, न्याय की थोड़ी-बहुत उम्मीद रखने वाले पूरे समाज के साथ किया गया धोखा है। हालाँकि इसमें कोई नई बात नहीं है। हमारे देश की हजारों अदालतों में लाखों लोग रोज अन्याय के शिकार होते हैं। बहुत से तो अपने साथ हुए अन्याय का कारण ही नहीं जानते। अपनी गरीबी, साधनहीनता, दुत्कार, घिसटते हुए जीवन और इलाज के अभाव से लेकर किसी भी वजह या बेवजह होने वाली मौत तक को वे विधाता का खेल और अपना दुर्भाग्य मानकर रो-धोकर वापस जिन्दगी में खप जाते हैं- अपनी बारी का इंतजार करते हुए। वे विश्व बैंक या अमेरिका या अपने वित्त मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ कभी अदालत नहीं जाते। ये तो बड़े ओहदेदार हुए, दरअसल तो वे कभी अपने सरपंच, पटवारी, दारोगा या क्लर्क के खिलाफ भी नहीं जाते।
जो थोड़े से अदालत की सीढ़ी चढ़ पाते हैं, वे थोड़े भी लाखों या करोड़ों में होते हैं, उनमें भी अधिकतर को न्याय नहीं मिलता। पहले चप्पलें घिसती हैं, फिर जिन्दगी ही घिस जाती है। जिन थोड़े से लोगों को अदालत से फैसला मिलता भी है, उनमें भी न्याय सबको मिलता हो, ऐसा सोचने की कोई ठोस वजह हमारे आजाद देश की पवित्र कही जाने वाली न्याय प्रणाली ने हमें नहीं दी है।
न्याय व्यवस्था की दुरवस्था पर खुद बहुत से ईमानदार न्यायविद् लिख-कह चुके हैं और जिनका साबका जिंदगी में कभी भी कोर्ट-कचहरी से पड़ा है, उनमें से अधिकांश फिर वहाँ नहीं जाना चाहते। इस सबके बावजूद हमारे देश के सभी जातियों, सभी धर्मों और सभी वर्गों के लोग आश्चर्यजनक संयम के साथ आजादी के बाद से अब तक मोटे तौर पर न्यायालय का सम्मान करते आए हैं- दाग़ी वकीलों की लूट-खसोट और न्यायाधीशों के बारे में जब-तब उछलते रहे भ्रष्टाचारों के बावजूद।
तो फिर अयोध्या के फैसले में ऐसा क्या है जिससे कि हमारे सहनशील नागरिकों की न्यायालय के प्रति आस्था को धक्का लगे? क्यों नहीं यह भी न्याय के नाम पर न्याय को लगातार स्थगित करती रहती, या फिर अन्याय का ही पक्ष ले लेती भारतीय न्याय व्यवस्था का एक और सामान्य कारनामा मान लिया जाए?
अयोध्या का फैसला या वृहद् जन समुदाय के मन-मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए अन्य मामले इसलिए अलग हैं क्योंकि ये एक सार्वजनिक मान्यता का निर्माण करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर न्याय व्यवस्था की खामियों का शिकार होने के बावजूद लोग न्याय की उम्मीद इसलिए रखे रहते हैं क्योंकि बहुतों का होने के बावजूद न्याय के नाम पर अन्याय हासिल होने का उनका तजुर्बा उनका व्यक्तिगत तजुर्बा ही बना रहता है, वह सार्वजनिक नहीं हो पाता। जबकि अयोध्या जैसे मामले, जिनकी तरफ सारे देश की निगाहें लगी होती हैं, वे एक नज़ीर कायम करते हैं, वे जीवन के मूल्य तय करते हैं।
अयोध्या के फैसले में वह ताकत थी कि वह देश में मज़हब के नाम पर होने वाली राजनीति को करारा तमाचा मारता और एक नज़ीर कायम करता। भले बाद में मस्जिद बनती या मंदिर रहता या मामला सुप्रीम कोर्ट में लटका रहता, लेकिन बाद की पीढ़ियों तक के लिए एक जीवन मूल्य बनता कि न्याय ने सत्ता की खरीदी बाँदी होने से इन्कार कर दिया।
बहरहाल, जैसे कवि चन्द्रकान्त देवताले ने वैज्ञानिक अब्दुल कलाम को लिखी अपनी कविता में लिखा था कि उन्होंने भाजपा द्वारा परोसा गया राष्ट्रपति पद स्वीकार करके साम्प्रदायिक शक्तियों को लज्जित करने का दुर्लभ मौका गवाँ दिया, वैसे ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी यह दुर्लभ मौका गवाँ दिया, जो लाखों-करोड़ों में से किसी एक को जिन्दगी में सिर्फ एक बार बमुश्किल मिलता है।
देश के करोड़ों बगैर पढ़े-लिखे और पढ़े-लिखे लोग यही समझेंगे कि जरूर रामलला का जन्म वहीं हुआ होगा, जहाँ बाबर ने मंदिर ढहाकर मस्जिद बनाई तभी तो अदालत ने ऐसा फैसला दिया। उनमें वे भी होंगे जो बखूबी जानते हैं कि अदालतों के दिए फैसलों के आधार पर सच और झूठ की पहचान बहुत मुश्किल हो चुकी है। फिर भी वे इस फैसले को सच का फैसला मानेंगे क्योंकि एक तो इत्तफाकन वे धर्म से हिन्दू होंगे और दूसरे, वे लगातार दो दशकों से फैलाए जा रहे साम्प्रदायिक ज़हर के जाने-अनजाने शिकार बन चुके होंगे। तजुर्बों से सीखे लोग नई पीढ़ी को ये नसीहत देना बंद कर देंगे कि ‘‘सच्चाई की आखिरकार जीत होती है।’’
राजनैतिक हित में विज्ञान की चाकरी
एक जमाने में कवि, शायर, ऋषि-महर्षि और मनीषी राजा की पसंद-नापसंद का ख़याल न करते हुए वही कहते थे जो उन्हें सही लगता था। खरा सच कहने से जिनकी जान पर ही बन आई, वे तो थे ही, लेकिन इतिहास में ऐसे नाम भी कम नहीं जिन्होंने भले घुमा-फिराकर, इशारों में सच कहा हो लेकिन राजा की मर्जी की वजह से झूठ तो नहीं कहा। अब बाजार के दौर में अनेक इतिहासकारों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों ने अपने पाले बदल लिए। इस फेहरिस्त में अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भी जुड़ गया। खुदाई के दौरान प्राप्त हुईं जानवरों की हड्डियाँ, मुस्लिम शासकों के काल में इमारत निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सुर्खी और चूने के मसाले की मौजूदगी आदि अनेक तथ्य जो वहाँ कभी भी, किसी भी तरह के मंदिर की मौजूदगी के विरोधी सबूत थे, पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट में उपेक्षित कर दिए गए। पुरातत्व विभाग तो इस हद तक ही गया था कि एक निराधार ‘स्तंभ आधार वाली संरचना’ को उसने मंदिर होने की संभावना के रूप में पेश किया और ऐसे सारे सबूतों की ओर से आँखें मूँद लीं जो वहाँ मुगल कालीन निर्माण की ओर संकेत करते थे। लेकिन न्यायालय ने तो उससे कहीं आगे जाकर न केवल यह फैसला दे डाला कि वहाँ मंदिर था, बल्कि यह भी कि रामलला का जन्म भी वहीं हुआ था। राम के मिथकीय चरित्र को न्यायालय ने इतनी विश्वसनीयता व सहजता से स्वीकार कर लिया मानो उन्हें प्रसव कराने वाली दाई का शपथपत्र ही हासिल हो गया हो।
मैं इस लेख में उन ब्यौरों को नहीं दोहराऊँगा जो इसी अंक में अन्यत्र विस्तार से दिए जा रहे हैं। डी0 मंडल, सूरजभान और सीताराम राॅय जैसे ख्यातिप्राप्त पुरातत्ववेत्ता और रामशरण शर्मा, इरफान हबीब, के0एन0 पणिक्कर, के0एम0 श्रीमाली आदि अनेक इतिहासकारों ने अदालत में पेश की गई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की अयोध्या खुदाई की उस रिपोर्ट की इरादतन शरारतों और तथ्यों से खिलवाड़ करने का खुलासा किया है जिसकी बिना पर अदालत ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम की जन्मभूमि घोषित कर दिया। यहाँ मैं पुरातत्व विज्ञान की उन बारीकियों या फिर कानून की उन उलझी हुई धाराओं में भी नहीं जाऊँगा जिनका परदा बनाकर इस फैसले को सही ठहराने की कोशिश की गई है।
हाँ, पुरातत्व-विज्ञान और कानून की तरफ मेरे कुछ आम समझदारी के सवाल जरूर हैं जो मेरे ख़याल से इस मुद्दे के केन्द्र में रखे जाने चाहिए। सवाल यह है कि अगर कल कोई यह दावा करता है कि विवादित स्थल की जिस गहराई तक खुदाई हुई है, उससे और चंद फीट नीचे जैन मंदिर या बौद्ध स्तूप था तो क्या अदालत फिर से खुदाई करवाएगी? और चूँकि मौजूदा खुदाई में भी यह तथ्य तो सामने आया ही है कि अयोध्या के विवादित ढाँचे की कुछ विशेषताएँ सारनाथ के स्तूप से समानताएँ दर्शाती हैं और कुछ असमानताएँ, तो क्या कल हम फिर बौद्धों और हिन्दुओं में संघर्ष की जमीन तैयार होती नहीं देख रहे हैं? और फिर उस जमीन के नीचे से और कितने रक्तरंजित सामुदायिक संघर्षों के बीज निकलेंगे, इसकी कल्पना भी भयानक है।
आशय यह नहीं है कि हम इतिहास पर खाक डालें और अपने वर्तमान को मानवता और सौहार्द्रता से परिपूर्ण कर लें। इतिहास की ओर से आँखें मूँदकर कोई समाज न आगे बढ़ पाया है और न अपने आज का सामना कर पाया है। लेकिन इतिहास की तरफ किस नजरिये से, किस उद्देश्य से देखा जाए, इसकी समझदारी तो हमें बनानी होगी। हम पुराने वक्त को समझकर वहाँ से विवादों और नफरतों का वर्तमान में आयात करना चाहते हैं, या क्या हम वापस पुराने दौर में लौटकर अपनी पराजयों का फैसला पलटना चाहते हैं? या फिर हम अपने समाज के अतीत को विकास प्रक्रिया समझने का एक औजार बनाकर अतीत की वैमनस्यताओं और गलतियों से मुक्त कर इस धरती को जीने के लिए एक बेहतर जगह बनाना चाहते हैं?
जाहिर है कि अयोध्या के विवाद को उभारने के पीछे सदाशयताएँ या इतिहास के विवेचन की विशुद्ध वैज्ञानिक उत्सुक दृष्टि नहीं बल्कि संकीर्ण राजनीति का मुनाफाखोर नजरिया काम कर रहा है। अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने एक ऐसी जमीन तैयार करने में मदद की है जिस पर सिर्फ खून की सिंचाई होगी और नफरत की फसल उगेगी।
इसी तरह कानून का भी संक्षिप्त जायजा लें तो पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेन्दर सच्चर की कुछ बातों का इस सिलसिले में उल्लेख जरुरी और अहम है। सच्चर साहब के मुताबिक लाहौर की मस्जिद शहीदगंज के मामले में 1940 में हुआ यूँ था कि वहाँ सन् 1722 तक एक मस्जिद थी। बाद में वहाँ सिखों की हुकूमत कायम हो जाने के बाद उस जगह का इस्तेमाल 1762 आते-आते गुरुद्वारे के तौर पर होने लगा। सन् 1935 में उस इमारत पर एक मुकदमा कायम हुआ कि उस जगह पर चूँकि एक मस्जिद थी इसलिए उसे मुस्लिमों को लौटा दिया जाए। मामले पर फैसला देते हुए सन् 1940 में प्रीवी कौंसिल ने कहा कि लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ पूरी सहानुभूति होते हुए भी चूँकि वह इमारत 12 वर्षों से अधिक समय से सिखों के कब्जे में है अतः लिमिटेशन एक्ट के तहत इसका अधिकार मुस्लिमों को नहीं दिया जा सकता।
जिस दूसरे पहलू की ओर सच्चर साहब ने इशारा किया है वह यह कि जब तक अयोध्या-बाबरी मामला कोर्ट में था तब तक एक पक्ष उस जगह पर कब्जा नहीं कर सकता। इस लिहाज से हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा मस्जिद को ढहा दिए जाने से उनका कानूनी दावा कायदे से खत्म हो जाना चाहिए।
फैसले के पहले की उम्मीदें
यह फैसला आने के बाद कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। फैसले के पहले तक आम लोगों की चर्चाओं में तोड़ी गई बाबरी मस्जिद का क्या होना चाहिए, इस पर अलग-अलग राय रहती थी। उग्र हिन्दुत्व के पैरोकारों को छोड़ दें तो ज्यादातर सयाने किस्म के लोग, जो हिन्दू भी थे और मुसलमान भी, सोचते थे कि वहाँ कुछ राष्ट्रीय स्मारक या सार्वजनिक उद्यान या खैराती अस्पताल या सर्वधर्म समभाव का एक केन्द्र या ऐसा कुछ बना देना चाहिए ताकि देश के किसी भी तबके का उससे कोई धार्मिक भावना आधारित जुड़ाव न रहे और एक राष्ट्रीय भावना के तहत उसे देखा जाए। कुछ लोग तो उस स्थान पर गरीबों के लिए मुफ्त सुलभ शौचालय बनाने जैसे मशविरे के भी हक में थे। पहली नजर में धर्मनिरपेक्ष और भेदभावरहित लगते ये मशविरे दरअसल साम्प्रदायिक हिंसा से भयभीत समाज की वह प्रतिक्रिया थी जिसमें वह राष्ट्रवाद का सुरक्षित कवच ढँूढ़ रहा था। बेशक अगर ऐसा कोई फैसला किया जाता तो वह देश के करोड़ों मुसलमानों की भावनाओं के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता था, लेकिन शायद फिर भी वह साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों के खिलाफ एक प्रगतिशील फैसला होता। कम से कम वह इस देश के अल्पसंख्यकों को यह भरोसा तो दे सकता था कि न्याय व्यवस्था भले उनके साथ न्याय न कर पाई हो लेकिन उसने हत्यारे हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकों का पक्ष तो नहीं लिया।
तात्कालिक शान्ति से ज्यादा जो देश में न्याय और धर्मनिरपेक्षता के भविष्य के प्रति चिंतित लोग थे, उनका स्पष्ट मानना था कि चाहे कितनी ही सख्ती से पेश आना पड़े, साम्प्रदायिक ताकतों को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि इस देश में यह राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उनका मत था कि मस्जिद की जगह पहले मस्जिद बने, जिन्होंने उसे तोड़ा और तोड़ने के लिए उकसाया, उन्हें उसकी सजा मिले, उसके बाद दोनों समुदायों के भीतर आम लोगों का मेलजोल बढ़ाया जाए और अगर सामुदायिक सहमति से कोई और रास्ता निकलता है तो उसकी तरफ समझबूझ कर आगे बढ़ा जाए।
यह न्याय का रास्ता था। अगर यह फैसला होता तो यह हर किस्म की फिरकापरस्त ताकतों को एक साफ इशारा होता। इससे हिन्दू, मुसलमान और हर समुदाय के भीतर उदार और इंसाफपसंद ताकतों को इज्जत मिलती। बाबरी मस्जिद के फैसले से कई टूटी चीजों को इतनी मजबूती से जोड़ा जा सकता था कि जो दरार 1992 में मस्जिद गिराकर चैड़ी की गई थी और जिसमें 2002 में गुजरात में खून उड़ेला गया था, वह भरनी शुरु हो जाती।
लेकिन यह साहस और जोखिम का रास्ता था। ऐसा जोखिम नोआखली और बँटवारे के दौरान गांधीजी ने उठाया था और अपनी जान देकर भी धर्मनिरपेक्षता का एक मूल्य बनाया था। साहस नैतिकता से पैदा होता है। शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम तुष्टीकरण करके, अयोध्या के मंदिर के ताले खुलवाकर और फिर उसके जवाब में रथयात्राओं व सरकार की शह पर मस्जिद तुड़वाकर जिस तरह की राजनीति आगे बढ़ी, उससे इस नैतिकता की उम्मीद करना मुश्किल है।
वास्तविक राजनीति को और उसके बदलावों को करीब से देख-परख रहे इंसाफ तलब लोगों को इलाहाबाद न्यायालय के फैसले से ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं। उनका मानना था कि पुरातत्व विभाग द्वारा 2002-03 में करवाई गई खुदाई और उसे साजिशाना तरीके से उलटने-पलटने का जो रास्ता भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने चुना था, काँग्रेस की सरकार कल्पनाशील और मौलिक तरह से कुछ बदलाव भले करे लेकिन वह भी न्याय के रास्ते पर चलने का जोखिम उठानेवाली नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यह होता कि तारीखें आगे खिसकती रहतीं और फिर यह सिरदर्द नई सरकार के माथे पर मढ़ दिया जाता। जो जनपक्षीय ताकतें कुछ कर सकती थीं, वे साम्प्रदायिकता के साथ जुड़ी राजनीति के घृणित चेहरे को बेनकाब करने का काम करने में जुटी रहीं और जुटी हुई हैं लेकिन संगठित राजनैतिक प्रयासों के सामने ये कोशिशें, कम से कम अब तक तो बेहद नाकाफी साबित हुई हैं।
फैसले के बाद
फैसले के बाद कुछ ने तो चैन की साँस ली कि चलो फिर से दंगा नहीं हुआ। कुछ ने न्यायाधीशों की बुद्धिमत्ता को भी सराहा कि उन्होंने कितना अच्छा फैसला किया कि सबको कुछ-कुछ मिल गया। फैसले के बाद रही शांति को भी लोगों ने अलग-अलग नजरिए से देखा। कुछ ने इसे भारतीय जनता और समाज की गहरी सौहार्द्रता और समझदारी बताया कि सबकुछ शांति से निपट गया। कुछ ने यहाँ तक भी दावा किया कि भारत की आम जनता ने साम्प्रदायिकता को नकार दिया है। चैनलों और अखबारों ने फैसला आने के पहले से लेकर फैसला आने के बाद तक विशेष प्रस्तुतियाँ दीं। युवाओं से उनकी राय ली गई और जब उन्होंने कहा कि उनकी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं है तो उसका अर्थ यह भी निकाला गया कि देखिए, आज का युवा कितना समझदार है, जो इन फालतू मामलों में दिलचस्पी नहीं ले रहा है।
इस तरह की थकी हुई प्रतिक्रियाएँ दुखी करती हैं। लेकिन गनीमत है कि सब ऐसा नहीं सोचते। मुल्क की राजनीति, नौकरशाही, फौज और अब न्यायालय तक में फैलाए जा चुके साम्प्रदायिक ज़हर के सामने सभी ने हथियार नहीं डाल दिए हैं। कुछ हैं, और वे कुछ भी बहुत हैं, जो भरपूर साहस और जोखिम के साथ भाजपा और आर0एस0एस0 की ही नहीं बल्कि काँग्रेस और बाकी राजनैतिक-सामाजिक समूहों की साम्प्रदायिक साजिशों से मोर्चा ले रहे हैं।
मीडिया के लिए अयोध्या का फैसला एक सनसनीखे़ज फ़ैसला था जो इरादतन या गैर इरादतन काॅमनवेल्थ खेलों के आसपास हुआ। काॅमनवेल्थ खेलों में हुए भ्रष्टाचार की आँच देशभर में महसूस की जाने लगी थी और अगर उसी वक्त अयोध्या का मुद्दा ध्यान न भटका देता तो दिल्ली में बैठी सरकार को अपने कुछ सिपहसालारों और अफसरों से हाथ तो धोना ही पड़ता और इज्जत तब भी न बचती। ऐसे में अयोध्या का फैसला आना फौरी तौर पर इस शिकंजे से निजात पाने का अच्छा बहाना बना और अयोध्या मामले में न्यायपालिका ने जो कारगुजारियाँ की थीं, उन पर जनता का ध्यान जा सके और वह मुद्दा आगे बढ़ सके, उसके पहले ही सारे देश को राष्ट्रमंडल खेलों ने फिर राष्ट्रीयता के बुखार में जकड़ दिया। मीडिया सब भूल गया और स्वर्ण पदकों के यशोगान में लग गया। वह बुखार अरुंधति राॅय के कश्मीर पर दिए बयान से और बढ़ गया, जो आखिर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा जय हिन्द कह दिए जाने से आसमान पर चढ़ गया। बस दो महीनों के भीतर राष्ट्रीय महत्त्व के प्रमुख मसलों को कैसे एक-दूसरे को काटने के लिए इस्तेमाल किया गया, यह अवसरवादी राजनीति की काबिलियत का एक नमूना भर है।
इसी तरह लोगों की शांति या युवाओं की निस्संगता को समाज की सहिष्णुता और समझदारी समझना एक गलती होगी। आर्थिक रूप से निचले तबके के अधिकतर मुसलमानों के मन में इस फैसले से भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में उनकी राय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे देश के अपनी तरह के हिन्दुओं की ही तरह पहले से ही न्याय व्यवस्था के बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते हो सकते। पिछले कुछ वर्षों में उनके साथ भारतीय राज्य द्वारा, और आमतौर पर भी जो अपमानजनक सुलूक कभी सिमी तो कभी पाकिस्तान परस्ती के बहानों के साथ बढ़ता रहा है, उसका दंश कुछ और गहरा हो जाएगा। इसी अपमान के साथ भीतर ही भीतर वे सुलगते रहते हैं और फिर मुस्लिमों के भीतर मौजूद फिरकापरस्त ताकतें उस गुस्से को ही हथियार बनाती हैं। हिन्दुओं के भीतर मौजूद साम्प्रदायिक ताकतें बेरोजगार या गरीब नौजवान हिन्दुओं को एक छद्म राष्ट्रीय गौरव के अलौकिक और सत्ता सामीप्य के अवसरों के लाभों के लौकिक आधारों पर नचवाती हैं।
मध्यमवर्गीय हिन्दू किसी तरह का नुकसान न होने से प्रसन्न है और मध्यमवर्गीय मुस्लिम भी। लेकिन इस फैसले ने एक मध्यमवर्गीय नागरिक की पहचान को उसके भीतर सिकोड़ दिया है और एक सहमे मुस्लिम की पहचान को गहरा कर दिया है। इस फैसले ने उसे इस देश का नागरिक होने की बनिस्बत इस देश का सहमा हुआ मुसलमान बना दिया है। जिस देश में वह पीढ़ियों से बराबरी की हैसियत से रहा, वहाँ उसका मन यह स्वीकारने को तैयार होने लगा है कि भारत में उसकी स्थिति दोयम दर्जे की रहने वाली है। आर्थिक रूप से भले वह बेहतर स्थिति में हो लेकिन सामाजिक अलगाव उसे धीरे-धीरे अपनी तरह के सहमे और क्षुब्ध लोगों के पास ले जाएगा। अधिकांश मध्यमवर्गीय मुस्लिम नौजवान या तो औरों की तरह ही किसी तरह अपने से और ऊँचे वर्ग में शामिल होने के कैरियर युद्ध में शामिल हैं, या फिर वे एक सही मौका तलाश कर देश के बाहर अमेरिका या यूरोप या खाड़ी के देशों में ही कहीं चले जाना चाहते हैं ताकि हिन्दुस्तान में रहते हुए उन्हें अपनी दूसरे दर्जे की पहचान बार-बार याद न आए।
मुस्लिम समुदाय के भीतर एक और समस्याजनक स्थिति यह है कि कई दशकों से इसके पास कोई प्रगतिशील नेतृत्व गैरमौजूद है। मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी व्यापक सामुदायिक व अन्य समुदायों में स्वीकृति हो, जो सत्ता के स्वार्थों का मोहरा न हो और जो कठमुल्लावाद को चुनौती दे सके। ऐसे में मुस्लिम समुदाय एक तरफ हिन्दू सम्प्रदायवादियों से और दूसरी तरफ शहाबुद्दीन या शाही इमाम जैसे प्रतिक्रियावादी स्वार्थी राजनैतिक तत्वों के बीच फँसा हुआ है। एक तरफ बदहाली और फौजी ज्यादतियों के खिलाफ कश्मीर में किए जाने वाले उसके संघर्ष को मुस्लिम आतंकवाद का लेबल चस्पा करके पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मजबूर है कि वह हिंदुस्तान के प्रति हिंदुओं से भी ज्यादा वफादार दिखायी दे।
फैसले के असर और आगे की तैयारी
इस फैसले का असर तो सब पर पड़ रहा है चाहे कोई उसे तत्काल महसूस करे या बाद में। किसी भी तरह के व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन के अभाव में मुस्लिमों के पास यह गुंजाइश भी कम है कि वे किसी तरह अपने मजहबी खोल से बाहर आकर देश के दीगर परेशानहाल तबकों के साथ किसी संघर्ष का हिस्सा बनें। मुस्लिम समुदाय के अलावा यह फैसला हम जैसों को भी बहुत क्षुब्ध करने वाला है जो इस देश में अपने-अपने स्तर पर छोटे-छोटे समूहों, संस्थाओं या मुट्ठीभर लोगों के आंदोलनों से साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार को रोकने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। भले इससे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की हिफाजत में लगे लोगों के हौसले कमजोर नहीं होते हों लेकिन ऐसे हर फैसले से साम्प्रदायिकता की आँच में झुलस चुके और झुलस रहे लोगों का धर्मनिरपेक्षता और अमन की कोशिशों पर भरोसा कमजोर होता है।
जो फैसला आया है, वह जमीन तो बेशक तीन हिस्सों में बाँटता है लेकिन भरोसा सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों को देता है। वह 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर जबर्दस्ती रखी गई मूर्तियों को उनके सही स्थान पर प्रतिष्ठित करना ठीक मानता है और 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने में कोई हर्ज नहीं देखता। इस तरह यह फैसला भले जमीन का तीसरा हिस्सा मुस्लिम वक्फ बोर्ड को दे देता हो लेकिन हौसला वह साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादियों का बढ़ाता है। दरअसल यह फैसला एक तरह से इस देश के छलनी भविष्य की बुनियाद डालता है जहाँ अतीत वर्तमान को इंच-इंच खोदकर लहूलुहान कर सकता है। अयोध्या का फैसला अगर बदला नहीं गया तो केवल काशी-मथुरा या धार (मध्य प्रदेश) ही नहीं, हर शहर और हर मुहल्ले के मंदिर-मस्जिद खुदने शुरु हो सकते हैं। इस देश का इतिहास इतना पुराना है कि कोई ठिकाना नहीं कि किसके कितने गड़े मुर्दे कहाँ-कहाँ निकलेंगे।
यह तय है कि न्याय के नाम पर अन्याय करने वाले इतनी आसानी से इसलिए भी अन्याय कर पा रहे हैं क्योंकि उन्हें न अपने खिलाफ लगने वाले इल्जामों की परवाह है और न ही किसी जबर्दस्त विरोध की आशंका। वक्फ बोर्ड या सुप्रीम कोर्ट क्या करता है, इस बारे में न तो कुछ कहा जा सकता है और न ही उनसे उम्मीदें लगाकर खामोश बैठा जा सकता है। मसला कानूनी है और अदालती कार्रवाई चलनी ही चाहिए और वह भी इस तरह कि देश के लोगों तक भी ये तथ्य पहुँच सकें कि किस तरह न्यायाधीशों ने तथ्यों का मनचाहा निरूपण करके कानून का मखौल उड़ाया है।
लेकिन यह मसला सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने से नहीं सुलझने वाला। जो राजनैतिक दल इस फैसले को संविधान की कब्र मानते हैं उन्हें तमाम मतभेदों के लिए अलग गुंजाइश रखते हुए इस मसले पर साझा रणनीति बनानी जरूरी है। इस रणनीति में केवल संसद के भीतर की जाने वाली बहस ही नहीं बल्कि अपने-अपने जनाधारों के भीतर इस मसले पर लोगों के दिमाग साफ करने की अनिवार्य कार्ययोजना होनी चाहिए। ट्रेड यूनियन, विद्यार्थी व युवा मोर्चे, महिला संगठन व सांस्कृतिक संगठनों को एक समन्वित योजना बनानी होगी।
राजनैतिक दलों के साथ ही अन्य जनतांत्रिक संगठनों को भी इस मसले की गंभीरता समझते हुए अपने मुद्दों की सीमा रेखा पार कर आगे आना होगा। देश की अमेरिकापरस्त ग्लोबलाइजेशन की नीतियों की वजह से शहरों में और गाँवों में हर जगह मजलूमों की, गरीबों की तादाद बढ़ रही है। बाँध विस्थापित हों या दलित या छोटे किसान या महिलाएँ या आदिवासी, सभी व्यवस्था से पीड़ित लोग आज अनेक छोटे-बड़े आंदोलनों की शक्ल में भारतीय राज्य के सामने सवाल उठा रहे हैं। संघर्षों ने इन आंदोलनकारियों को जनवादी और प्रगतिशील बनाया है। इनके बीच भी इस मसले को ले जाने और उन्हें इस मामले में शिक्षित करने की जरूरत है।
रास्ते और भी तमाम हो सकते हैं लेकिन देश में धर्मनिपेक्षता का विकल्प कोई नहीं हो सकता। समाजवाद तो हम बना नहीं पाए, जैसे तैसे यह ही एक उपलब्धि हमारी बची रही है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र हैं। अब इसे भी नहीं बचा सके तो हम स्वार्थी सत्ता द्वारा जल्द ही बर्बर युग में फेंक दिए जाएँगे।

-विनीत तिवारी
(लेखक सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
मोबाइल-09893192740

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एक देश और दो सेनाएँ पेचीदा सवाल

माओवादियों की मूल ताकत से अप्रैल 2006 में काठमांडू पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य ज्ञानेन्द्र विरोधी राजनैतिक दलों ने लाखों लोगों की जन भावनाओं का नेतृत्व करते हुए नेपाल से दुनिया के सबसे पुराने राजतंत्र को इतिहास बना दिया। ज्ञानेन्द्र के पास शाही सेना थी जो काफी उम्दा हथियारों से लैस थी जो अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड और इजराइल से उसे हासिल हुई थी। एक लाख की तादाद वाली शाही सेना नेपाल के माओवादियों की जनमुक्ति सेना से कम से कम तीन गुना तो तादाद में थी ही, आधुनिक और उन्नत हथियारों की तो बात ही क्या! लेकिन शाही सेना अपने हथियार इस्तेमाल नहीं कर सकी। एक तो सड़कों पर निकले लाखों लोगों की भीड़ के सामने वे कितनी गोलियाँ चलाते, उसस भीड़ के हिंसक हो जाने का खतरा था। दूसरी प्रमुख वजह थी लाखों की तादाद वाले आम प्रदर्शनकारियों के साथ जनमुक्ति सेना के करीब बीस हजार जवानों की मौजूदगी। अपने से कई गुना बड़ी और कहीं ज्यादा आधुनिक शाही नेपाली सेना को पराजित करने वाली, माओवादी प्रशिक्षण से तपी और नैतिक साहस से दमकती इस जनमुक्ति सेना का नेपाल के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित है।
अब सोचिए कि जिस सेना ने क्रान्ति को अंजाम देने में इतनी अहम भूमिका अदा की हो, उसका नई सरकार बनने पर क्या सम्मान हुआ? सम्मान यह हुआ कि उसे पिछले तीन सालों से भी अधिक वक्त से बैरकों में रखा हुआ है।
दरअसल अप्रैल 2006 के लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद सात दलों के गठबंधन और माओवादियों के बीच हुए व्यापक शान्ति समझौते में इन बिंदुओं पर सहमति हुई थी कि –
1. शाही नेपाल सेना का नाम बदलकर नेपाल सेना कर दिया जाए।
2. माओवादियों की जनमुक्ति सेना और पूर्व शाही नेपाली सेना का एकीकरण किया जाए। इन दोनों सेनाओं द्वारा समझौते का पालन किया जाए, इसकी माॅनिटरिंग संयुक्त राष्ट्र संघ की एक टीम करे।
3. जब तक एकीकरण का काम पूरा नहीं हो जाता तब तक किसी भी सेना में कोई नई भर्ती नहीं की जाए, और तब तक ये दोनों सेनाएँ अलग-अलग बैरकों व छावनियों में रहेंगी।.
4. सरकार में कोई भी पद ग्रहण करने वाला व्यक्ति जनमुक्ति सेना का सदस्य नहीं रह सकता।
इसी आधार पर काॅमरेड प्रचंड ने जनमुक्ति सेना से त्यागपत्र दिया जिसके वे अध्यक्ष थे और प्रधानमंत्री बने। गठबंधन के भीतर आपसी समझ व विचार-विमर्श के बाद जनरल कटवाल को सेनाध्यक्ष बनाया गया। जनरल कटवाल ने जल्द ही प्रधानमंत्री काॅमरेड प्रचंड के निर्देशों की अवहेलना शुरू कर दी जो खिंचते-ख्ंिाचते मई 2009 में यहाँ तक आ पहुँचा कि कटवाल ने व्यापक शान्ति समझौते की शर्तों को दरकिनार करके 3000 सैनिकों की नेपाली सेना में भरती कर डाली। बहाना यह किया गया कि रोक तो नई भर्तियों पर है, रिक्त स्थान भरने पर नहीं। उस पर भी कटवाल तथा भारतीय राजदूत राकेश सूद ने जो गलतबयानियाँ कीं उनके समवेत असर से प्रचंड ने कटवाल को बर्खास्त कर दिया। प्रचण्ड के आदेश को अमान्य करते हुए नेपाल के राष्ट्रपति ने कटवाल को बहाल कर दिया। इसे अलोकतांत्रिक और सैनिक सर्वोच्चता कायम करने की कोशिश बताते हुए प्रचंड ने नागरिक सर्वोच्चता के खातिर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
इन सारे घटनाक्रमों में सत्ता से फौरी तौर पर माओवादी अलग हो गए लेकिन उन्होंने उन आशंकाओं को निर्मूल भी सिद्ध किया कि सत्ता पाने के बाद माओवादी भी सत्ता में बने रहने के मोह का शिकार हो जाएँगे और आमूल परिवर्तनों की योजनाएँ धरी रह जाएँगी। प्रचंड के इस्तीफे ने जनता के बीच उनकी प्रतिष्ठा को मजबूत किया है, लेकिन अब जिन लोगों के हाथों में सत्ता है वेे उसकी ताकत का इस्तेमाल संविधान को कमजोर करने में और माओवादियों को सत्ता से दूर रखने का हर संभव प्रयत्न करेंगे।

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2010 अंक में प्रकाशित

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छापामार जनयुद्ध से लोकतांत्रिक चुनावों तक सोची-समझी रणनीति


अब तक इस बारे में बहुत सी बातें सामने आ चुकी हैं कि अगर माओवादियों की ताकत नेपाल में इतनी थी कि वे इन चुनावों और गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बने बगैर भी नेपाल की सत्ता पर कब्जा कर सकते थे तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। संक्षेप में सबसे प्रमुख तर्क के तौर पर जो बातें सामने आई हंै वे ये हैं कि अगर वे सैन्य ताकत के जरिये तख्तापलट करते तो उन्हें भारत और अमेरिका की ओर से न केवल आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता बल्कि बहुत मुमकिन था कि अमेरिका अपने कुख्यात ‘‘लोकतंत्र की रक्षा के अभियान’’ की आड़ में माओवादियों पर हमला बोल देता, और इस बहाने दक्षिण एशिया में अपनी एक और फौजी चैकी कायम कर लेता जहाँ से चीन पर भी दबाव बढाया जा सकता था। भारत इसमें उसकी मदद क्यों करता, इन कारणों पर पहले ही रोशनी डाली जा चुकी है।
10 बरस से जनयुद्ध लड़ रहे माओवादियों का यह आकलन भी गलत नहीं कहा जा सकता कि इस तरह की छापामार लड़ाई के लिए 10 बरस एक लंबी अवधि होती है। नेपाल में माओवादियों ने 10 बरस में बेशक शोषित जनता के बीच प्रतिबद्ध कैडर और सैद्धान्तिक व व्यावहारिक तौर पर प्रशिक्षित फौज तैयार की, लेकिन फिर भी लड़ाई को बहुत लम्बा खींचने में एक स्थिति के बाद लोग थक जाते हैं। जिस सपने की खातिर वे जान पर खेलने के लिए क्रान्ति का हिस्सा बनने को तैयार होते हैं, वह सपना उन्हें कभी न हासिल होने जितनी दूरी पर टँगा दिखने लगता है। लोग, जो क्रान्ति को अंजाम देते हैं, वे सिर्फ माक्र्सवाद पढ़कर या प्रतिबद्धता के आशय समझकर ही साथ नहीं आते, बल्कि वे शोषण की घुटन से आजाद होना चाहते हैं। वे खुद को, या कम से कम आने वाली पीढ़ी को बदले हालातों वाले धरती-आसमान देना चाहते हैं। इसलिए जब 2005 में ज्ञानेन्द्र ने माओवादियों के पूर्ण सफाई की तैयारी और इरादा किया तो लोगों ने भी समझा लिया कि इसे और लंबा खींचने में आंदोलन को नुकसान हो सकता है। झोपड़ियों, कंदराओं, जंगलों, गाँवों, खेतों से वे आए और देखते ही देखते पूरे काठमाण्डू में सिर्फ वे ही थे। सामने हजारों की तत्कालीन शाही नेपाली सेना थी और ये गिनती के मोटे आँकड़ों में लाखों में थे। पूरा काठमाण्डू लाल था। ज्ञानेन्द्र की फौज और पुलिस पहले ही 10 बरसों के छापामार युद्ध में अनेक दफा पराजित होकर नैतिक तौर पर पस्त थी। पूरा देश अखबारों में छप चुकी खुफिया रिपोर्टोें से यह जानता था कि नेपाल के 75 जिलों में से अधिकांश में माओवादियों का जबर्दस्त असर है। सन् 2006 की अप्रैल माओवादी बंद के असर में ऐसी गुजरी कि न फौज कुछ कर सकी न अमेरिका, इजराइल, चीन और भारत से आए हथियार। सरकारी हिंसा में 11 लोग मारे भी गए लेकिन प्रदर्शन तब तक जारी रहे जब तक राजशाही की हार न हो गई। राजा की फौज के सामने जो लोग खड़े हुए उनमें आम ग्रामीण जनता के साथ न केवल खुद उसी के गृह मंत्रालय के कर्मचारी थे, बल्कि डाॅक्टर, वकील, पत्रकार और तमाम बुद्धिजीवियांे के साथ सैनिकों के परिवार के लोग, उनके पत्नी-बच्चे भी थे। आखिरकार ज्ञानेन्द्र को नेपाल के आखिरी राजा का खिताब हासिल कर राजशाही के खात्मे के लिए तैयार होना पड़ा।
ज्ञानेन्द्र के जुल्म से परेशान तो सभी थे। सन् 2001 में नारायणहिती शाही महल में अपने बड़े भाई राजा बीरेन्द्र और उनके पूरे खानदान की हत्या की कामयाब साजिश करके नेपाल की पूरी बागडोर अपने हाथ में ले लेने वाले ज्ञानेन्द्र ने सन् 2005 में सभी राजनैतिक दलों को दिए गए अधिकार छीनकर सत्ता संचालन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए थे। यही नहीं, गिरिजा प्रसाद कोइराला, माधव नेपाल, शेरबहादुर देउबा सहित बहुत से राजनेताओं को जेल भिजवा दिया। ज्ञानेन्द्र के जुल्म से परेशान तो सभी थे, लेकिन राजशाही को खत्म करके लोकतंत्र और फिर धीरे-धीरे समाजवाद की ओर बढ़ने का लक्ष्य सिर्फ माओवादियों का ही था। बाकी दल सिर्फ ज्ञानेन्द्र से मुक्ति या अधिक से अधिक राजशाही से मुक्ति चाहते थे और उसके लिए भी कुछ कर सकने की ताकत और नैतिक साहस उनके पास नहीं था। माओवादी नेपाली समाज की उस तस्वीर को बदलने का लक्ष्य लेकर लड़ रहे थे जिसमें नेपाल के 10 प्रतिशत लोग देश की 65 प्रतिशत जमीन के मालिक थे और वे 10 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले 70 फीसदी लोगों के पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण से देश की आधी आमदनी को कब्जाये हुए थे। जनयुद्ध के 10 वर्षों के दौरान भी माओवादियों ने जमींदार-पूँजीपतियों से जमीनें छीनकर उनका मेहनतकश जनता के बीच न्यायपूर्ण बँटवारा किया और सत्ता में आने के बाद भी समानता और न्याय पर आधारित समाज बनाने के कार्यक्रम बनाए। नेपाल में माओवादी नेतृत्व की सरकार के दौरान अर्थमंत्री रहे और एक माक्र्सवादी विद्वान की पहचान रखने वाले बाबूराम भट्टाराई ने विस्तार से सहकारिता आंदोलन को बढ़ाने, भूमि सुधार करने और देश को आत्मनिर्भर बनाने की आगामी योजनाएँ बना रखी थीं।
जाहिर है कि लोकतांत्रिक तरीके से समाजवाद कायम करने की नेपाल के माओवादियों की सुचिंतित व सर्वसमावेशी परियोजना में विरोधाभास उठने ही थे। जिन सात राजनैतिक दलों के साथ मिलकर उन्होंने राजशाही को खत्म कर लोकतंत्र की नींव रखी थी, उनका सरोकार उन सब न्याय और बराबरी की बातों से नहीं के बराबर ही था जो माओवादियों के लिए आंदोलन की कामयाबी की कसौटी थीं और हैं। इसीलिए, बहुत जल्द ही माओवादियों व शेष राजनैतिक दलों के आपसी अंतद्र्वंद्व उभर आए।
चाहे नेपाल के प्रधानमंत्री बने प्रचण्ड का इस परम्परा का उल्लंघन करना हो कि हर वह व्यक्ति जो नेपाल का प्रधानमंत्री बनता है, सबसे पहले भारत यात्रा करता है (प्रचण्ड भारत के बजाय चीन चले गए), या संविधान सभा में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व का सवाल हो, या पहाड़ी और तराई के लोगों के बीच या विभिन्न जातियों में भेदभाव का सवाल हो, या, यह सबसे प्रमुख है कि जिस जनमुक्ति सेना ने नेपाल को राजशाही से आजादी दिलाई, उसकी स्थिति क्या हो; इन सारे मुद्दों को विवाद के तौर पर उठाने का कोई मौका न नेपाल के विपक्षी दलों ने गँवाया औार न ही भारत के पूँजीवादी मीडिया ने। एक नये बनते देश और समाज के भीतर ये सारे अंतद्र्वंद्वउठने लाजिमी हैं। इन्हीं अंतद्र्वंद्वों को उभारकर और शेष अन्य राजनैतिक दलों के अवसरवादी चरित्र का जनता के सामने भण्डाफोड़ करने के लिए माओवादी भी इस नये किस्म के प्रयोग के लिए जंगलों से निकलकर खुले में आए थे। लेकिन इन्हीं अंतद्र्वंद्वों का इस्तेमाल वे सब भी करना चाहते हैं और कर रहे हैं जो माओवादियों की भूमिका राजशाही के बाद अब और नहीं चाहते। वे हर कोशिश करेंगे कि गैर जरूरी सवालों और मुद्दों में उलझकर यह क्रान्ति भटक जाए। माओवादियों के लिए यह एक कठिन परीक्षा है, क्योंकि यह उनका अपना नया तरीका है इसलिए इतिहास भी उनकी खास मदद नहीं कर सकता।
इनमें से सबसे प्रमुख एक, कटवाल प्रकरण को ही लें तो वह मानसिकता जाहिर हो जाती है जिसके चलते नेपाल की राजनीति के वे लोग माओवादियों को ‘अव्यावहारिक’, ‘नातजुर्बेकार’, ‘अड़ियल’ आदि सिद्ध करना चाहते हैं और जिनके इस अभियान को देश-विदेश का पूँजीवादी और अल्पज्ञ मीडिया सहज समर्थन देता है।

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2010 अंक में प्रकाशित

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चूँकि खुद भारत में ही 1980 का दशक आते-आते तेजी से राजनीति पर ऐसे तबके का कब्जा हो गया जो देश की पूँजी के हितों का प्रतिनिधित्व करता था न कि जनता के, इसलिए भी नेपाल के साथ अपने पारंपरिक संबंधों का और अपनी ताकतवर हैसियत का इस्तेमाल भारतीय शासकों ने कभी निजी स्वार्थों से हटकर या क्षेत्र में एक स्वस्थ, जनकेन्द्रित और जनतांत्रिक राजनीति की स्थापना के लिए करने के बजाय नेपाल की कमजोर स्थिति का शोषण करने में ही किया। सत्तर के दशक में सिक्किम को भारत का हिस्सा बनाने के लिए की गई कार्रवाई से भी भारत के प्रति एक शंका का भाव नेपाल के शासकों के मन में था। बावजूद इसके चीन की तरफ की प्रतिकूल भौगोलिक स्थितियों की वजह से चीन से नेपाल की नजदीकी उतनी नहीं बढ़ सकी। चीन से नेपाल को जोड़ने वाली मात्र एक सड़क है जबकि भारत के साथ नेपाल का जो हिस्सा जुड़ा हुआ है वह आवागमन, परिवहन और व्यापार के लिए अधिक उपयुक्त है। गौरतलब है कि 1950 के दशक में नेपाल के कुल विदेश व्यापार का 90 प्रतिशत व्यापार भारत के साथ होता था। इसी वजह से भले ही माओवादी नेतृत्व की सरकार रही या कोई और, भारत के साथ नेपाल का व्यापार दो-तिहाई के करीब बना रहा है जबकि चीन के साथ यह 10 फीसदी तक ही पहुँच सका है।

भारत के संदर्भ में नेपाल के माओवादियों की स्थिति चीन से भी ज्यादा जटिल लगती है। भारत की सत्ताधीश पूँजीवादी ताकतों का यह भय आधारहीन नहीं है कि नेपाल का माओवाद भारत के माओवाद को अगर सरकार में आ जाने पर कोई ठोस मदद न भी करे लेकिन उनके हौसलों को तो मजबूत करेगा ही। नेपाल की शक्ल में भारतीय माओवादी भी राज्य सत्ता पर कब्जा करने के छापामार अभियान में तेजी ला सकते हैं और पहले से माओवादियों को पाकिस्तान से बड़ा खतरा प्रचारित कर रही सरकार के लिए वाकई बड़ा खतरा बन सकते हैं। नेपाल के माओवाद से भारत की मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियाँ भी, खासकर माकपा काफी विचलित है। दरअसल भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों के आपसी संघर्षों का भी एक रक्तरंजित इतिहास रहा है और नंदीग्राम और लालगढ़ जैसे संघर्षों के जरिये वर्तमान में भी उसका खून सूखा नहीं है। जाहिर है कि संसदीय राजनीति के जरिए वाम राजनीति कर रहीं इन वामपंथी पार्टियों के लिए नेपाल के उस कामयाब उदाहरण को ‘बचकाना’ या ‘अतिवादी’ या ‘अव्यावहारिक’ वाम कहकर खारिज करना संभव नहीं होगा। इसलिए इन आरोपों को भी पूरी तरह खारिज करना मुश्किल है कि भारत की मुख्य धारा वाली प्रमुख वामपंथी पार्टियों ने भी माओवादियों को नेपाल में राज्य सत्ता पर पूरी तौर पर काबिज होने से रोकने की ही कोशिशें कीं और अपनी विश्वसनीयता व जनाधार खो चुकीं नेपाल की अन्य राजनैतिक पार्टियों के साथ गठबंधन बनाने का दबाव डाला।
दूसरी ओर भारत के माओवादियों में भी नेपाल के माओवादियों द्वारा संसदीय राजनीति में आने को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ रहीं। दोनों देशों की विशिष्ट परिस्थितियों को नजरंदाज करके भारत के माओवादियों के लिए भी यह नजीर दी जाने लगी कि जिस तरह नेपाल के माओवादियों ने सशस्त्र विद्रोह की अव्यावहारिकता को समझकर मुख्यधारा में आने का फैसला किया है वैसे ही भारत के माओवादियों व नक्सलवादियों को भी छापामार संघर्ष का रास्ता छोड़कर संसदीय राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होकर जनता के हित की लड़ाई लड़नी चाहिए।
नेपाल के पानी और बिजली पर नजर भारत और चीन, दोनों की ही नजर नेपाल में मौजूद जलविद्युत की अपार संभावनाओं का दोहन करने पर भी है। लगभग 3 करोड़ की आबादी और क्षेत्रफल के लिहाज से दुनिया के 93वें देश का दर्जा रखने वाले इस देश में दुनिया के दस सबसे ऊँचे पर्वत शिखरों में से आठ मौजूद हैं जिसकी वजह से तेज बहाव वाली अनेक नदियाँ यहाँ हैं। कोसी, गंडकी, करनाली जैसी नदियाँ ऊँचे हिमालयी ग्लेशियरों से निकलती हैं और नीचे आकर गंगा में मिल जाती हैं। ये योजनाएँ अब तक साकार होने के करीब होतीं अगर सब कुछ बेरोक-टोक चल रहा होता। लेकिन ये परियोजनाएँ 1995 से ही ठंडे बस्ते में हैं क्योंकि उस वक्त 1.1 अरब डाॅलर लागत और 402 मेगावाट अनुमानित क्षमता वाली अरुण-3 बाँध परियोजना से विश्व बैंक ने 1995 में ही अपना हाथ पीछे खींच लिया था क्योंकि परियोजना मानकों के मुताबिक दुरुस्त नहीं पाई गई थी और उसका लाभ स्थानीय समुदायों को नहीं मिलने वाला था। तब से नेपाल में कोई बड़ा बाँध नहीं बना है। हालाँकि भारत और नेपाल ने 2008 में अरुण-3 और अपर करनाली बाँध बनाने के लिए नये सिरे से एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों का कार्य भारतीय कंपनियों को ही मिला था। यह बात भी सामने आई थी कि वेस्ट सेती परियोजना का पूरा खर्च नेपाल वहन करेगा लेकिन अधिकांश बिजली का इस्तेमाल भारत करेगा। माओवादियों का कहना है कि दिवंगत गिरिजा प्रसाद कोइराला के इन फैसलों से वे पूरी तरह सहमत नहीं हैं और सरकार बनने के बाद इनकी समीक्षा की जाएगी। भारत की ओर से चल रहे अपर करनाली परियोजना के कार्य को माओवादियों ने रोकने की बात भी कही थी। उनकी ओर से जल संसाधन मामलों के प्रमुख श्री लीला मणि पोखरेल ने पत्रकारों से स्पष्ट कहा कि जब तक सरकार बनने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती और जब तक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की सही नीति नहीं बन जाती, तब तक कोई भी बाँध आगे नहीं बढ़ाने दिया जाएगा।

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2010 अंक में प्रकाशित

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बन्ने भाई एक शाम हल्के नशे में घर लौटे। पैर थोड़े लड़खड़ा रहे थे। आँखों में थोड़ी मस्ती थी और कुछ गुनगुना रहे थे। उनकी बेगम ने जब उन्हें देखा तो बोलीं, ‘‘कोई शर्म-लिहाज है कि नहीं आपको। आज सरे-शाम ही पी ली। बच्चे जाग रहे हैं, क्या सोचेंगे?’’ बन्ने भाई बोले, ‘‘बेगम, आज कुछ न कहो, आज मैं बेहद खुश हूँ।’’ बेगम कहाँ सुनने वाली थीं, बोलीं,‘‘क्यों, आज कौन आसमान से खुशियाँ टपक पड़ी हैं, जो मैं आज आपकी इस हरकत पर कुछ न कहूँ?’’
बन्ने मियाँ बेगम के नजदीक आकर बड़े रूमानी अंदाज में बोले,‘‘बेगम, आज अल्जीरिया आजाद हो गया।’’
आप पहचान गए होंगे कि ये बन्ने मियाँ थे, भारत में प्रगतिशील लेखक संघ की नींव रखने वाले और पाकिस्तान में बरसों तक जेल काटने वाले काॅमरेड सज्जाद ज़हीर और उनकी बेगम रज़िया सज्जाद ज़हीर। वर्ष था 1962।
यह किस्सा उनकी छोटी बेटी नूर ने हमें सुनाया था और नूर ज़हीर की किताब में भी यह मौजूद है। मैंने याददाश्त के आधार पर इसे लिखा है इसलिए थोड़े-बहुत फर्क की माफी चाहते हुए मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि 1962 से चालीस से भी ज्यादा बरसों के बाद ऐसी खुशी, जैसी सज्जाद ज़हीर को बहुत दूर के देश अल्जीरिया की आज़ादी से हुई थी, हममें से कितने दिलों में उमगी जब 2006 में हमारे बिल्कुल पड़ोस में मौजूद नेपाल राजशाही से आजाद हुआ।
बेशक इन चार बरसों में आजादी के अर्थ की आभा भी कम हुई है लेकिन इतना तो सभी मानते हैं कि राजशाही से लोकतंत्र में कदम रखना प्रगति की सतत् प्रक्रिया में कुछ महत्त्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाना तो है ही, भले वह लोकतंत्र अपने चरित्र में समाजवादी न हो। फिर भी अगर देश-दुनिया में हो रहे जनसंघर्षों को हम लोगों के जेहन में कहीं नहीं पाते या फिर ज्यादा से ज्यादा हाशिये पर पाते हैं तो जाहिर है कि पिछले 15-20 वर्षों में हमारा सामाजिक मूल्यबोध तेजी से बदला है। हम उन्नत तकनीक के जरिये विश्व के सुदूर कोनों तक संपर्क स्थापित कर लेते हैं, हमारे पास अनगिनत विषयों की सूचनाएँ सिर्फ एक बटन दबाने जितनी दूरी पर हैं लेकिन हममें से अधिकांश उस सपने से खाली हैं जो हमारे इस ग्रह पर अस्तित्व को कुछ सार्थकता देता है।
अधिकांश लोगों के पास यह विवेक नहीं है कि उन्हें कहाँ खड़ा होना है। राजनैतिक विचार भी उनके लिए एक पैकेज है कि जहाँ ज्यादा मिला, वहीं चल दिए।….तो ऐसे माहौल में पहले की तुलना में बहुत कम लोग हैं जो याद करें श्रीलंका को, फिलिस्तीन को, श्रीकाकुलम को, हाॅण्डुरास को, दंतेवाड़ा को, ……और नेपाल को।
दरअसल हिन्दुस्तान में ही नहीं, सारी दुनिया में ब्राजील, मैक्सिको, बोलीविया, वेनेजुएला आदि लैटिन अमेरिकी देशों के भीतर बीती सदी के आखिरी बरसों में हुए राजनैतिक परिवर्तनों को जितना महत्त्व हासिल हुआ, उससे बहुत कम तवज्जो नेपाल को मिल सकी। एक वजह तो उसकी बेशक यह है कि क्यूबा की लैटिन अमेरिका में मौजूदगी और उसके प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समाजवादी प्रतिबद्धता कायम रखने की कामयाबी ने नए जमाने के पूँजीवाद का गहरा दंश झेल रहे लैटिन अमेरिकी देशों की पीड़ित-शोषित जनता को हौसला दिया कि शोषणमुक्त समाज कायम करने की लड़ाई भी मुमकिन है और उस लड़ाई में कामयाबी भी नामुमकिन नहीं। इसलिए कभी उपनिवेश रहे और बाद में लोकतंत्र की राह चलने वाले देशों के लिए जो किरदार कभी सोवियत संघ ने अदा किया था, अपनी बहुत सीमित ताकत के बावजूद क्यूबा ने वैसी ही जिम्मेदारी लैटिन अमेरिका के भीतर मौजूद देशों के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों के लिए निभाई।
दो विशालकाय पड़ोसियों के बीच
अगर चीन को क्यूबा जैसा मानने की गलती न की जाए तो नेपाल के पास कोई क्यूबा नहीं है। बल्कि नेपाल की हालत चीन और भारत के दो पाटों के बीच फँसे होने जैसी है। नेपाल की भौगोलिक स्थिति ही वहाँ की विदेश नीति और राजनीति की भी दिशा तय किए रही है। चीन और भारत के बीच सैंडविच बने नेपाल के लिए दोनों में से किसी को भी नाराज करना मुसीबत मोल लेने जैसा है। ऐसी तमाम राजनैतिक घटनाओं से नेपाल का आधुनिक राजनैतिक इतिहास भरा पड़ा है जिसमें एक को नाराज करने का खामियाजा नेपाल को दूसरी तरफ से आए किसी न किसी नये दबाव के रूप में झेलना पड़ा है।
एक तरफ चीन है जो भले ही कहने-दिखने में लाल हो, उसका वामपंथ वामपंथियों के लिए भी उत्तरोत्तर असुविधा का कारण बनता जा रहा है। बेशक सैद्धांतिक तौर पर वह राजशाही के खात्मे को एक प्रगतिशील कदम मानेगा लेकिन सच तो यह है कि नेपाल के राजशाही के तहत बने रहने में उसे कभी कोई नुकसान या कुछ गलत नजर नहीं आया। परंपरागत तौर पर तो चीन और नेपाल के संबंधों में दो शताब्दियों से भी अधिक समय से उथल-पुथल रही है, लेकिन इनमें खासतौर से जो परिवर्तन हाल के संदर्भ में उल्लेखनीय हैं, वे 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद हुए हैं।
1842 से लगभग 1949 में चीनी इंकलाब होने तक नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर ब्रिटिश-भारतीय प्रभाव की स्पष्ट छाया रही, जो 1972 में राजा बीरेंद्र के नेपाल पर गद्दीनशीन होने तक कभी भारत, कभी अमेरिका तो कभी चीन की तरफ परिस्थिति अनुसार झुकते रहे। जाहिर है, चीन के साथ संबंधों में तिब्बत के प्रश्न की बड़ी भूमिका रही है। एक जमाने में तिब्बत पर चीन के अधिकार को अस्वीकार करने के बाद चीन ने भी नेपाल के साथ अपने रिश्ते समेट लिए थे और नेपाली व्यापारियों का तिब्बत के बैंकों मंे जमा धन भी जब्त कर लिया था। उसी दौर में अमेरिकी दबाव के चलते चीन के खिलाफ तिब्बती विद्राहियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत भी नेपाल को देनी पड़ी थी। इन संबंधों में कुछ वर्षों के अंतराल के बाद 1962 से 1965 के बीच तनाव कम हुआ तथा चीन ने नेपाली व्यापारियों का धन लौटा दिया और नेपाल ने तिब्बत पर चीन का अधिकार स्वीकार कर लिया।

1950 तक चीन के भीतरी हालात कमजोर थे और वहाँ की जनता खुद एक संक्रमण की अवस्था में थी। उधर दूसरी ओर भारत पर राज कर रहे अंग्रेजों की ताकत बहुत ज्यादा थी। ऐसे में नेपाल पर 1816 से ही ब्रिटिश दबाव बना रहा जो 1846 में शाही परिवार के एक नरसंहार से होते हुए भारत की आजादी के बाद भारत सरकार को हस्तांतरित हो गया। भारत सरकार का रवैया नेपाल के साथ वैसा ही रहा है जैसा अंग्रेजों का भारत या उपनिवेशों के साथ था। एक छोटे देश पर अपना प्रभाव जमा कर एक ओर तो तमाम गैर बराबर समझौतों के जरिये उसका शोषण करना और दूसरी तरफ दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए, दिखने में लोकतांत्रिक लेकिन असल में साम्राज्यवादी हथकंडे इस्तेमाल करना। दरअसल भौगोलिक दृष्टि से भारत के साथ नेपाल का सहज-सरल जुड़ाव है जबकि चीन की तरफ से पहुँच मार्ग दुर्गम है, लेकिन भारत के असमानतापूर्ण व्यवहार और संधियों की वजह से नेपाल की कोशिश पिछले 50 वर्षों से यह रहती है कि उसे सहयोग का कोई दूसरा स्रोत भी मिल जाए ताकि भारत पर निर्भरता कुछ कम हो।
सन् 1972 में जब अमेरिका और चीन के बीच एक-दूसरे के खिलाफ चलने वाली सैन्य गतिविधियों को संरक्षण न देने का समझौता हुआ, तब बीरेंद्र शाह ने चीन से नजदीकी बढ़ाने की हिम्मत की जिसे दिल्ली में बैठे भारतीय शासक हिमाकत के तौर पर देखते थे। एकतरफा हुए अनेक भारत-नेपाल समझौतों में से एक यह भी था कि नेपाल अपने सभी रक्षा उपकरण व गोला-बारूद भारत से ही खरीदेगा लेकिन सन् 1988 में भारत सरकार की नाराजगी की परवाह न करते हुए नेपाल ने हथियारों की एक बड़ी खेप चीन से खरीदी।
पड़ोसी देश और भौगोलिक-सामरिक दृष्टि से नेपाल महत्त्वपूर्ण देश होने की वजह से चीन की दिलचस्पी उससे दोस्ताना संबंध बनाये रखने की है यह अलग बात है कि चीन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नेपाल में राजशाही है या पूँजीवादी लोकतंत्र या क्रान्तिकारी सरकार। चीन के लिए यह अवश्य चिन्ताजनक स्थिति थी जब 11 सितंबर 2001 के ट्विन टाॅवर्स पर हुए हमले के बाद अमेरिका ने नेपाल के माओवादियों को आतंकवादियों की सूची में डालकर ज्ञानेंद्र के जरिये नेपाल में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप बढ़ाने की कोशिशें तेज की थीं। ज्ञानेंद्र के 2005-06 में अपदस्थ हो जाने के बाद उस प्रक्रिया पर तो लगाम लग गई, लेकिन चीन को अब दूसरी समस्या यह जरूर सता सकती है कि बिल्कुल उसके पड़ोस में अगर माओवादी सरकार में बने रहते हैं, और वे माक्र्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद के आमूल-चूल बदलाव वाले क्रान्तिकारी कार्यक्रम को अमल में लाते हैं तो उसी माक्र्सवाद का नाम लेकर बाजार के सामने परास्त होते और काफी हद तक पूँजीवाद की राह पर बढ़ चुके चीन के भीतर मौजूद असंतुष्ट क्रान्तिकारी ताकतों की हौसला अफज़ाई होगी।
चीन की तरफ तिब्बती सीमा से लगा होने के कारण चीन नेपाल को वहीं तक मदद करता रहा है जहाँ तक चीन के खिलाफ नेपाल को इस्तेमाल न किया जा सके। परंपरागत तौर पर नेपाल का अधिक नजदीक का संबंध भारत से रहा है, चाहे वह प्रेम का हो या घृणा का।

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2010 अंक में प्रकाशित

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