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Archive for the ‘सुमन लोकसंघर्ष’ Category

हाथ में कूँड़ी बगल में सोटा, चारो दिसा जागीरी में.
आखिर ये तन खाक मिलेगा, कहां फिरत मगरूरी में ॥
बीएसई सेंसेक्स 854.86 (-3.07%) पॉइंट की गिरावट के साथ 26,987.46 पर बंद हुआ । निफ्टी में भी 251.05 (-3.00%) पॉइंट की गिरावट रही। निफ्टी 8,127.35 पर बंद हुआ। बाजार की इस बड़ी गिरावट ने छोटे, बड़े सभी निवेशकों में हड़कंप मचा दिया है।
इस बीच 5 सालों में पहली बार तेल का मूल्य 50 डॉलर से नीचे पहुंच गया है । करीब 6 महीनों से तेल की कीमत में गिरावट का सिलसिला जारी है इससे आर्थिक मंदी के संकट का डर सताने लगा है। तेल की कीमतों में गिरावट के कारण न सिर्फ एनर्जी स्टॉकों बल्कि समूचे स्टॉक मार्केट में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है।दुनिया भर के बाजारों में अफरातफरी मची है-सार्वजनिक क्षेत्र को बेच कर उद्योगपतियों के हाथों को मजबूत करने के लिए वर्तमान केंद्र सरकार पूरी तरीके से प्रयासरत है . बीमा, बैंक रेल, डाक , स्टील के कारखानों सहित जहाँ भी सरकार के पास अपना कुछ है उसको हर संभव तरीके से किसी न किसी उद्योगपति को देने की तैयारियों  पर युद्ध स्तर पर काम चल रहा है . कुछ वर्षों पूर्व यूरोप से लेकर अमेरिका तक आर्थिक मंदी का शिकार हुए थे उस समय भारत में सार्वजानिक क्षेत्र की वजह से आर्थिक मंदी का असर मामूली ही आया था लेकिन इस बार कॉर्पोरेट सेक्टर की प्रिय सरकार इन क्षेत्रों के अतिरिक्त किसानो की या जनता के पास जामीन नाम की जो चीज है उसको छीनने के लिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया जा चूका है और उद्योगपतियों के काले धन से देश के निवासियों के पास जो जमीनें मकान, दुकान है उसको छीनने के एक कानूनी तरीका भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के माध्यम से किया जाना शुरू हो गया है. जनता से यह कहा जायेगा कि आपकी जमीन और मकान के ऊपर अदानी साहब रेशमी रुमाल का कारखाना लगाने वाले हैं इसलिए यह रुपया लो . मकान व जमीन छोड़ दो अन्यथा पुलिस और पी एस सी की बन्दूखें कानून व्यवस्था के नाम पर तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का वध कर देंगी .
                नागपुर मुख्यालय एक धार्मिक राष्ट्र बनाने का नारा देकर सम्पूर्ण नागरिकों को यह सिखाना चाहता है कि  “आखिर ये तन खाक मिलेगा, कहां फिरत मगरूरी में ” यही  उसका हिन्दुवत्व है . उद्योगपतियों के गुलाम बनाने के लिए नागपुर मुख्यालय प्रयत्नशील रहा है और इसके लिए वह घ्रणा – द्वेष का व्यापार कर रहा है .

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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bhookh hadtal
बाराबंकी। किसानो की 163 ग्राम पंचायतों की जमीन छीन कर उत्तर प्रदेश सरकार टाउनशिप बसाना चाहती है। बड़े-बड़े माल, स्विमिंग पूल, फाइव स्टार होटल बनाने का कार्यक्रम है। किसानो की आम की बाग़, लहलहाते केलों के झुण्ड, धान की फसलें, गेंहू के खेत, मेंथा की हरियाली की जगह किसानो की रोजी-रोटी छीन कर उनको भूखा मार देने की उक्त योजना के विरोध में ग्राम मुबारकपुर में आज से क्रमिक भूख हड़ताल प्रारंभ हो गई है।
यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद् सदस्य डॉ उमेश चन्द्र वर्मा ने बताया कि आज क्रमिक भूख हड़ताल पर कांशीराम के नेतृत्व में महेश प्रसाद, राम विलास, मायाराम व भिखारी लाल 24 घंटे के लिए बैठे हैं। यह क्रमिक भूख हड़ताल 20 अक्टूबर तक चलेगी।
डॉ उमेश वर्मा ने आगे बताया कि 17 अक्टूबर से किसान सभा के नेतृत्व में विशुनपुर, बरौली जाटा, मसौली, मलूकपुर, जीयनपुर, मोहम्मदपुर बंकी, कोलागांव, भगवंतनगर, अजगना, चंदनपुरवा, महुवामऊ, अलीपुर समेत अन्य कई गाँवों में क्रमिक भूख हड़ताल किसान प्रारभ करेंगे। किसानो की यह जंग भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अंतिम निर्णय होने तक जारी रहेगी। किसान एक भी इंच जमीन अधिग्रहण नहीं करने देगा।

नीरज वर्मा
मंत्री
अखिल भारतीय किसान सभा बाराबंकी

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विलय फिर कर लेंगे
भारत में भारतीय जनता पार्टी ने एक नयी परंपरा की शुरुवात की थी कि प्रधानमन्त्री के पद पर वेटिंग होगी जिसके तहत सबसे पहले उम्मीदवार पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण अडवाणी रहे हैं लेकिन वेटिंग कन्फर्म नहीं हो पायी, तब पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वेटिंग प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाया है लेकिन वेटिंग कन्फर्म हो पानी मुश्किल है। वहीँ, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव वेटिंग प्रधानमंत्री के तीसरे उम्मीदवार हैं वह तीसरे मोर्चे के वेटिंग प्रधानमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ी जोर-शोर से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की पैरवी की जा रही है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मुलायम सिंह यादव ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश शाखा का विलय समाजवादी पार्टी में कई वर्ष पूर्व कर दिया था तत्कालीन पार्टी के सचिव मित्रसेन यादव समेत कई दिग्गज कम्युनिस्ट नेताओं ने रवीन्द्रालय में कम्युनिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय कर दिया था। जनता दल को तोड़ने का भी काम सपा प्रमुख ने बखूबी निपटाया था। आज कितनी चालाकी से सपा तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की बात चुनाव के बाद कर रही है इसका मतलब यह है कि अगर कम्युनिस्ट पार्टियाँ उत्तर प्रदेश में एक आध सीट अपने दम पर जीत कर आये और उसके बाद उनको प्रधानमंत्री बनाने के लिए सपोर्ट करें और चुनाव में आमने सामने अपने दमखम का प्रदर्शन करें। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी का कोई अस्तित्व अन्य प्रदेशों में नही है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस और भाजपा का ललकारते हुए ऐलान किया कि लोकसभा चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा सबसे बड़े समूह के रूप में उभरेगा। केंद्र में अगली सरकार तीसरे मोर्च की ही बनेगी। समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा, 2014 लोकसभा चुनाव में न तो कांग्रेस और न ही भाजपा की सरकार बनेगी। आम चुनाव के बाद तीसरा मोर्चे की सरकार बनेगी। हम लेफ्ट पार्टियों के संपर्क में हैं, चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा का गठन होगा।
सन 2011 में यह बयान काबिलेगौर है कि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अवसरवादी है, वह अल्पसंख्यकों का वोट बटोरने के लिए तरह-तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि सपा को इस प्रकार की बयानबाजी से अधिक फायदा नहीं मिलने वाला है। भाकपा ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की तुलना करते हुये दिये बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए यही बात कही। भाकपा प्रदेश सचिव गिरीश और वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा कि सपा प्रमुख उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ताकतों को वाक ओवर देना चाहते हैं।
अगर वाम ब्लाक को और भी अपनी दुर्गति करनी होगी और राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी पार्टी में अपनी अपनी पार्टियों का विलय करना होगा तो निश्चित रूप से तीसरे मोर्चे का वेटिंग प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव को बनायेगे। अब वेटिंग प्रधानमंत्री वेटिंग ही रहते हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी के बिक्री बाजार का अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे – थोक व्यापारियों के रोज़ी – रोजगार कि आवश्यकता है | उनके जीवन – अस्तित्व की शर्त है |
केन्द्रीय सचिवो कि समिति द्वारा फुटकर दुकानदारी के मल्टी ब्रांड कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट की सिफारिश कर दी गयी है | अभी यह छूट 51 % निवेश के लिए की गयी है | विदेशी निवेश वाले इन रिटेलो स्टोरों को विभिन्न प्रान्तों में खोलने का अधिकार राज्य सरकारों को देने का प्रस्ताव किया गया है | फिर इस प्रस्ताव में मल्टी ब्रांड रिटेल के ताकतवर – माल , शाप से छोटे स्तर के उद्यमों एवं किराना स्टोरों के सुरक्षा के उपाय तय करने व उसे लागू करने का भी अधिकार राज्य सरकार के हाथो में देने का प्रस्ताव किया गया है | सचिव समिति के प्रस्ताव में अभी विदेशी निवेश के रिटेल स्टोरों को 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में खुदरा व्यापार की छूट दी गयी है | इस आधार पर अभी देश के 35 शहरों को इसके लिए उपयुक्त बताया गया है | अभी सचिव समिति के इस निर्णय पर मंत्रीमंडल का निर्णय आना बाकी है | पर इस प्रस्ताव से फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में मल्टी ब्रांड रिटेल व्यापार में विदेशी निवेश को अब सुनिशिचत माना जा रहा है | सचिव समिति के इस प्रस्ताव का कही – कही स्थानीय फुटकर दुकानदारों द्वारा थोड़ा विरोध भी किया गया | पर वह एक – दो दिन में ही खत्म भी हो गया | जबकि देश की बड़ी औद्योगिक एवं वाणीजियक कम्पनियों के राष्ट्र स्तर के ‘ पिक्की ‘ व सी0 आई0 आई0 और रिटेल क्षेत्र में लगी बड़ी भारतीय कम्पनियों ने सचिव समिति के प्रस्ताव का स्वागत किया है | अभी दो – तीन साल पहले स्थानीय स्तर के फुटकर दुकानदारों के संगठनों द्वारा फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में विदेशी ही नही देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने का विरोध किया जा रहा था |फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बड़ी कम्पनियों के आ जाने से फुटकर दुकानदारों के बिक्री बाज़ार में भारी कटौती के साथ उनकी बर्बादी की चर्चाये भी हो रही हैं | पर धीरे – धीरे यह विरोध मद्धिम पड़ गया | अब यही बाते फुटकर व्यापार में विदेशी निवेश के बारे में भी कही जा रही है और वह गलत भी नही है | इसके वावजूद इस बार उस प्रचार माध्यमो में चर्चा ही बहुत कम है | फिर उसका विरोध तो और भी कम है ऐसा लगता है , जैसे फुटकर दुकानदारों ने जाने या अनजाने में यह मान लिया है की उनके विरोध से कुछ नही होगा | जो सत्ता सरकार चाहेगी , वही होगा | यही असली हार है | संघर्ष में मिली हार बड़ी हार नही होती | क्योंकि उस हार से पराजितो को अपनी कमिया देखने व दूर करने एवं पुन: संघर्ष के जरिये उसे विजय में बदल देने के लिए प्रयास करने की हर सम्भावना मौजूद रहती है | लेकिन बिना संघर्ष के ही हार मान लेने पर तो विजय कदापि सम्भव नही है |किसान भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष में है |ज्यादातर जगहों पर थक – हारकर मुआवजा ले चुके है | जमीन छोड़ चुके हैं |पर उन्होंने अभी संघर्ष नही छोड़ा हैं | इसलिए अब कही – कही उनको जीत भी मिल रही है |उनकी भूमि का अधिग्रहण रदद भी हो रहा है | कल को यह जीत बढ़ सकती है | राष्ट्रव्यापी जीत में बदल सकती है | फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी का अधिग्रहण किया जा रहा है | इनके बिक्री बाज़ार का अधिग्रहण भी अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे – थोक व्यापारियों के रोजी – रोजगार की आवश्यकता है | उनके जीवन – अस्तित्व की शर्त है | उन्हें किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारी में बड़ी कम्पनियों का विरोध करना ही पड़ेगा | इसी के साथ उन्हें पिछले 20 सालो से लागू होती रही उन वैश्वीकरणवादी , उदारीकरणवादी नीतियों का भी विरोध करना होगा , जिसके अंतर्गत बड़ी कम्पनियों के छूटो , अधिकारों को हर क्षेत्र में बढाया जा रहा है तथा विभिन्न क्षेत्रो में जनसाधारण हिस्सों के छूटो , अधिकारों को खुलेआम काटा – घटाया जा रहा है |इसमें उन्हें देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने के प्रति नर्म और विदेशी निवेश के प्रति ही विरोध में भी बहकने से भी बचना होगा | फुटकर व्यापार के संदर्भ में हम स्पष्ट देख सकते है कि इस क्षेत्र में विदेशी निवेश का अनुमोदन खुद इस देश के बड़े कम्पनियों के संगठन कर रहे है | इसका साफ़ मतलब है इस देश कि बड़ी कम्पनिया यहा के फुटकर दुकानदारों के साथ नही है | बल्कि उनके विरोध में विदेशियों के साथ खड़े है | आम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे डीलरो , स्टाकिस्टो को देशी व विदेशी बड़ी कम्पनियों के अधिग्रहण के विरोध में खड़ा होना होगा | इसी तरह से उन्हें फुटकर व्यापार के बारे में बड़ी कम्पनियों के हिमायतियो तथा सरकारों द्वारा चलाए जा रहे तर्को – कुतर्को का भी संगठित रूप में जबाब देने के लिए स्वंय को तैयार करना होगा |

उदाहरण —-(1) उन्हें यह तथ्य जरुर जानना चाहिए कि इस देश में लगभग 4 करोड़ लोगो को इस क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है | ( 2) इस तरह देश के कुल रोजगार का 11% हिस्सा फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | इस मामले में यह कृषि के बाद स्वरोजगार का दुसरा बड़ा क्षेत्र है संभवत: 4 करोड़ लोगो के परिवारों कि 20 या 22 करोड़ कि आबादी का जीवन – यापन फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | ( 3) खुदरा व्यापार में देश की बड़ी कम्पनियों और अब विदेशी निवेश के लिए यह तर्क भी दिया जाता है कि ‘ फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बिचौलियों की समाप्ति हो जायेगी | किसान व उत्पादन में लगी अन्य छोटी इकाइयों द्वारा अपना माल , सामान सीधे माल शापिंग माल को दिया जाएगा | जहा से वह सीधे उपभोक्ता के हाथ पहुच जाएगा |’ कोई भी आदमी समझ सकता है कि फुटकर व्यापार अपने आप में बिचौलियागिरी का धंधा है | चाहे वह छोटी दुकानदारी के रूप में हो या फिर माल शाप के रूप में हो | फिर इन सबके साथ डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे बिचौलियों का समूह भी खड़ा रहता है | अत: फुटकर दुकानदारी के जरिये बिचौलियागिरी को समाप्त करने का ब्यान भी एक धोखा है |(4)जहा तक किसानो को शापिंग माल में अपना माल बेहतर मूल्य पर बेचने और उपभोक्ता द्वारा सस्ता खरीदने की बात है तो दोनों ही बाते गलत है | फुटकर व्यापार में बड़ी कम्पनियों के आगमन से बहुतेरे फुटकर दुकादारो को अपना माल बेचने और उपभोक्ता द्वारा उन दुकानदारों से मोल भाव कर सौदा लेने की क्षमताओं में गिरावट आ जानी है | क्योंकि अब बाज़ार पर थोड़े से , पर विशालकाय माल शाप के मालिको का एकाधिकार बढ़ जाना है | और किसानो व अन्य उत्पादकों की तथा उपभोक्ताओं की यह मजबूरी बढती जायेगी कि वह बाज़ार पर अधिकार जमाए हुए बड़ी कपनियो के आगे समर्पण कर दे | उसी के निर्देशानुसार चले | ( 5) अभी तक कि बाज़ार व्यवस्था स्थानीय स्तर पर बाज़ार का संतुलन स्थानीय खरीद – बिक्री पर टिका हुआ है | क्योंकि हर आदमी स्थानीय स्तर पर खरीदने के लिए वहा के स्थानीय लोगो के साथ अपना शारीरिक व मानसिक श्रम या अपना माल , सामान बेचता रहा है | लेकिन फुटकर व्यापार में देशी व विदेशी धनाढ्य कम्पनियों के बढ़ते चढ़ते घुसपैठ से अपने स्थानीय लेन- देन के सम्बन्ध व संतुलन में दरकन टूटन का आना निश्चित है |क्योंकि फुटकर दुकानदार केवल स्थानीय स्तर का विक्रेता ही नही है , बल्कि वह स्थानीय स्तर पर उत्पादित मालो , सामानों का खरीदार होने के साथ – साथ शिक्षा , चिकित्सा , न्याय , कानून आदि कि सेवाओं का खरीदार भी होता है | बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर बाज़ार व्यापार के अधिकाधिक अधिग्रहण के साथ स्थानीय स्तर के खरीद – बिक्री के आपसी संबंधो का भी अधिग्रहण हो जाता है | जिसका परिणाम अन्य क्षेत्र के लोगो के पेशे , धंधे के टूटन के रूप में ही आना निश्चित है |
इसलिए फुटकर दुकानदारी से टूटकर तथा स्थानीय , व्यापारिक , सामाजिक संबंधो से टूटकर स्थानीय फुटकर दुकानदारों में भी संकट का तेज़ी से बढना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है |
इसीलिए किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारों को भी अपना स्थानीय समितिया बनाकर देश की बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर दुकानदारी का किए जा रहे अधिग्रहण के विरुद्ध ,फुटकर दुकानदारी में विदेशी निवेश के विरुद्ध केंद्र सरकार द्वारा बनाये जा रहे कानून के विरुद्ध तथा प्रांतीय व स्थानीय स्तर पर उन्हें दिए जा रहे छूट के विरुद्ध संघर्ष में उतर जाना चाहिए | इसी के साथ उन्हें किसानो , मजदूरों एवं अन्य कारोबारियों के साथ इस घुसपैठ को बढाने वाली वैश्वीकरणवादी नीतियों को खारिज किए जाने के लिए और अपने अस्तित्व कि रक्षा के लिए करो या मरो का नारा बुलंद करके आन्दोलन शुरू कर देना चाहिए |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

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येरुशलम।। आपने कभी सुना है कि किसी कुत्ते को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। लेकिन इस्राइल में ऐसा हुआ है। वहां की एक धार्मिक अदालत ने एक कुत्ते को मौत की सजा सुनाई है। कुत्ते को ये सजा इसलिए दी गई है क्योंकि अदालत को लगा कि एक धर्मनिरपेक्ष वकील ने कुत्ते की शक्ल में पुनर्जन्म ले लिया है।

इस वकील ने 20 साल पहले एक केस की पैरवी के दौरान जजों की तौहीन की थी। यह कुत्ता अदालत की परिसर में घुसने की कोशिश कर रहा था, तो वहां मौजूद एक जज को सालों पहले की एक घटना याद आ गई जब एक अन्य जज ने बदतमीज वकील को श्राप दिया था कि वह कुत्ते के रूप में पुनर्जन्म लेगा। जज को लगा कि कुत्ते में उसी श्राप दिए हुए वकील की रूह है और उसने उसे गिरफ्तार करवा कर सजा सुना दी।

कुत्ते को पत्थरों से मारने की सजा को लागू करने की जिम्मेदारी जज ने पड़ोस के बच्चों को सौंप दी। लेकिन सौभाग्य से सजा मिलने से पहले ही कुत्ता वहां से किसी तरह से भाग खड़ा हुआ। येरुशलम सिटी काउंसिल के मेंबर और सामाजिक कार्यकर्ता राशेल अज़ारिया ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल को चिट्ठी लिखकर जज के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। जानवरों के लिए काम करने वाले एक संगठन ने जज के खिलाफ पुलिस से शिकायत भी दर्ज कराई है।

नवभारत
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डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती के मौके पर अखबारों में प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है – ”मुझे याद करेंगे लोग मेरे मरने के बाद“। मरने के बाद मनुष्य की अच्छाइयों को याद करने की प्राचीन भारतीय परम्परा है। इसलिये स्वाभाविक ही लोहिया ने ऐसी आशा की होगी। महाभारत युद्ध की विनाश लीला का सेनापति भीष्म ने भी मरने के ठीक पहले शरशैया पर लेटे अपनी ‘प्रतिज्ञा’ के दुष्परिणामों और यहां तक कि उस प्रतिज्ञा को न तोड़ पाने की अपनी विवशता पर अफसोस जाहिर किया था। लोहिया आज जिन्दा होते तो यह मानने के अनेक कारण हैं कि वे भीष्म की तरह विवेकहीन प्रतिज्ञा से बंधे रहने की गलती नहीं दोहराते और वे खुलकर अपने शिष्यों के कारनामों के विरूद्ध खड़े हो जाते। उन्होंने केरल में अपनी सोशलिस्ट पार्टी की सरकार द्वारा गोली चलाये जाने का विरोध किया और सरकार से इस्तीफा की मांग की थी।
लोहिया अपने को ‘कुजात गांधीवादी’ कहते थे और गांधी जी के शिष्यों को ‘मठवादी’ कह कर निंदा करते थे। पर लोहिया की विडंबना यह रही कि उन्होंने व्यावहारिक राजनीति में गांधी जी के साधन और साध्य की शुद्धता के सिद्धान्त से हमेशा परहेज किया। लोहिया ने आजादी के बाद फैल रही आर्थिक विषमता के प्रश्न को लेकर बहुत ही जोरदार तर्कपूर्ण तरीके से आम आदमी की वास्तविक आमदनी ‘तीन आने’ का कठोर सत्य उजागर किया, किन्तु आर्थिक विषमता को पाटने के जिस कार्यक्रम पर अमल किया, उसका समाजवाद से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं था। कहते हैं, नरक जाने का रास्ता नेक इरादे से खोदे गये थे। एक जमाने में कांग्रेस का विकल्प बनने का सशक्त दावेदार समाजवादी आन्दोलन का आज कहीं अता-पता नहीं है। नाम के समाजवादी भी आज कोई समाजवादी नहीं रह गये। लोहिया जन्मशती के मौके पर मूल्यांकन जरूरी है कि ऐसा क्यों हुआ?
राजनीति में विचार और आचार का मेल कठिन होता है। लेकिन राजनीति के मदारी कठिन से कठिन बेमेल कामों को सहज भाव से अंजाम देते हैं। लोहिया भारतीय संस्कृति और सभ्यता के पक्के समर्थक थे, किन्तु वे कट्टर रूढि़विरोधी प्रतिमाभंजक भी थे। वे राजनीति के चमकते सितारों का प्रतिमाभंजन कठोरता से करते थे। उनके तर्कों के तीक्ष्ण वाण राजनीति के बड़े से बड़े स्थापित सूरमाओं को विचलित करते थे। लोहिया ने एक तरफ जाति तोड़ो अभियान चलाया तो दूसरी तरफ ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ के नारे के साथ जातियों की संख्या के आधार पर आरक्षण और सत्ता में भागीदारी का राजनीतिक दावा प्रस्तुत किया। इस नारे का व्यावहारिक परिणाम, या यों कहें कि लाजिमी नतीजा यह हुआ कि गरीबी-अमीरी का संघर्ष पृष्ठभूमि में ओझल हो गया और जातीय एवं साम्प्रदायिक अस्मिता का टकराव भारतीय राजनीति का मुख्य एजेंडा बन गया।
यद्यपि जाति, धर्म और लिंग का भेदभाव संविधान विरूद्ध है, किन्तु लोहिया ने जाति आधारित पिछड़ावाद को क्रान्तिकारी घोषित किया। बाद के दिनों में जातिवाद और सम्प्रदायवाद लोकतांत्रिक चुनाव के अचूक हथकंडे बने। एक ने कहा: ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ तो दूसरे ने कहा: ‘गर्व से कहो हम चमार हैं’। ‘जाति तोड़ो’ का सामाजिक आन्दोलन ‘जाति समीकरण’ के राजनीतिक प्रपंच में तब्दील हो गया। समाजवादी आंदोलन के जिन नेताओं ने अपने नामों से जाति सूचक पदवी हटा ली थी, उनके शिष्यों ने मतदाताओं के मध्य अपनी जातीय पहचान बनाने के लिये फिर से जाति सूचक पदवी (टाइटल) धारण कर ली। मुलायम सिंह ‘मुलायम सिंह यादव’ हो गये। उसी प्रकार लालू प्रसाद ‘लालू प्रसाद यादव’ हो गये। अपने विचारों और आचारों के परस्पर विरोधी मिश्रण के ऐसे ही अद्भूत प्रतिनिधि थे लोहिया। यहां यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा कि ऐसी ही उनकी मंशा थी, प्रत्युत ऐसे नारों का यही हस्र होना था। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खायें?
राजनीति की तात्कालिक आवश्यकताएं अनेक अवसरवाद को जन्म देती हैं और फिर उस अवसरवाद का औचित्य ठहराने के लिए सिद्धांत और तर्क ढूंढ़ लिये जाते हैं। ऐसा ही एक नारा था ‘गैर-कांग्रेसवाद’। सत्ता में कांग्रेसी एकाधिकार तोड़ने के लिए लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद का मोर्चा खोला। उन्होंने सरकार को बराबर उलटने-पलटने की प्रक्रिया को ‘जिन्दा लोकतंत्र’ बताया और सत्ता पर कब्जा करने के लिए टूटो, जुड़ो और ताबे की रोटी को उलटने-पलटने की व्यूह-रचना विकसित की। पर उनके जीते जी उन्हीं की देखरेख में इस सिद्धान्त पर बिहार में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की हवा निकाल दी उनके ही परम शिष्य बी.पी.मंडल ने। ताबे की रोटी को उलटने-पलटने की लोहियावादी तकनीक अजमाते हुए बी. पी. मंडल बिहार के मुख्यमंत्री बन गये। बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार को तोड़ दिया लोहिया के ही शिष्यों ने, और वह भी कांग्रेस की सहायता से। ऐसा कर लोहिया के शिष्यों ने बिहार में फिर से कांग्रेस राज की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया।
सर्वविदित है कि यही बी. पी. मंडल बाद में पिछड़ावाद के पुरोधा बने। इनके नाम पर मंडलवाद का झंडा लहराया जो लोहियावाद से भी ज्यादा तेजी से लोकप्रिय हुआ। फिर भी मंडलवादियों के प्रेरणाश्रोत लोहिया ही बने रहे।
गैर-कांग्रेसवाद के लोहियावादी पुरोधाओं में मंडल अकेले नहीं रहे, जिन्होंने सत्ता के लिये कांग्रेसी बैशाखी को थामने में कभी संकोच नहीं किया और कांग्रेस को स्थायित्व प्रदान किया। ख्यात लोहियावादी मुलायम सिंह और चर्चित जेपी आन्दोलन के वीर बांकुड़ा लालू प्रसाद ने भी कांग्रेस की बैशाखी से कभी संकोच नहीं किया। परमाणु के मुद्दे पर जब वामपक्ष ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व की कांग्रेस नीत संप्रग-एक सरकार से समर्थन वापस लिया तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने कांग्रेस सरकार को संजीवनी बूटी प्रदान किया। यही नहीं 1.76 लाख करोड़ के 2-जी घोटाले की जांच कर रही लोक लेखा समिति में मतदान के समय सपा और बसपा कांग्रेस सरकार के संकटमोचक की भूमिका में सामने आये।
लोहिया समानता और सादगी के प्रतीक और भ्रष्टाचार के प्रखड़ विरोधी थे, किन्तु उनके आधुनिक शिष्य चारा घोटाला और आय से अधिक अप्रत्याशित धन-सम्पदा रखने के अभियुक्त हैं। अपने शिष्यों के कारनामों को देखकर लोहिया की आत्मा निश्चय ही विचलित होती होगी।
देश में आज भी अनेक व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह हैं, जो दूसरों को अशुद्ध और अपने को विशुद्ध लोहियावादी होने का दावा करते हैं। उन सबों को वैसा करने का बराबर का हक है। पर प्रश्न यह है कि यदि आज लोहिया जिन्दा होते तो क्या वे अपने आधुनिक शिष्यों की पंक्ति में खड़ा होना पसन्द करते?

गतिशील उत्पादक शक्तियां

लोहिया ने अनेक पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं। उनमें एक है ‘इकोनाओमिक्स आफ्टर माक्र्स’ (माक्र्स से आगे का अर्थशास्त्र)। माक्र्सवादी वर्ग दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए लोहिया कहते हैं: ‘गतिहीन वर्ग जाति है और गतिशील जाति वर्ग है।’ उनका यह जुमला भी उनके गंभीर अंतद्र्वन्द्व को प्रकट करता है। यह जुमला मुर्गी से अंडा कि अंडा से मुर्गी जैसी पहेली है। यद्यपि लोहिया अपने इस कथन में गति कि सत्यता स्वीकारते हैं, किन्तु साथ ही गति के स्वाभाविक फलाफल को नकारते हैं। इस जुमले के दोनों विशेषण ‘गतिहीन’ और ‘गतिशील’ आकर्षक किन्तु अर्थहीन और मिसफिट आभूषण मात्र हैं।
समाजशास्त्री हमें बताते हैं कि गति के अभाव में विकास प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है। विकास प्रक्रिया में गति अंतर्निहित होती है और उसी प्रकार उसका प्रतिफल परिवर्तन भी। वर्ग और वर्ग दृष्टिकोण औद्योगिक क्रान्ति के बाद पैदा हुआ कारक है। उसके पहले जातियां जन्म ले चुकी थीं। सामंती युग में जातियां अस्तित्व में आयीं। सामंती युग के पहले वर्गों का उदय ही नहीं हुआ था तो उसका जाति में संक्रमण कैसे संभव हुआ होगा? अगर यह मान भी लिया जाये कि लोहिया का यहां मतलब आदिम श्रम विभाजन से है, जिसका जातीय रूपांतरण सामंती समाज में हुआ तो यह मानना और भी ज्यादा तार्किक होगा कि सामंती युग की ‘गतिशील जातियां’ ही औद्योगिक युग का आधुनिक मजदूर है। जाहिर है, ऐसी अवधारण हमें अंधगली में धकेलती है।
मानव विकास की प्रक्रिया किसी भी अवस्था में गतिहीन नहीं होती है। समाज विकास निरंतर गतिशील प्रक्रिया है, जो हमेशा इतिहास के एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु की तरफ बढ़कर परिवर्तन और फिर परिवर्तन को जन्म देती है। समाज विकास में कभी भी गतिहीन अवस्था नहीं आती। इसलिये ‘गतिहीन वर्ग’ और ‘गतिशील जाति’ की अवधारणा गुमराह करने वाली भ्रामक मुहावरेबाजी से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
माक्र्स ने मजदूर वर्ग को सामाजिक प्रगति का वाहक बताया और वर्ग विहीन, शोषण विहीन और शासन विहीन समाज का खाका तैयार किया, जबकि लोहिया मजदूर वर्ग को ‘गतिहीन’ वर्ग बता कर उसे जाति की जड़ता में डूबने का दोषी मानते हैं और जातियों को गतिशील बनाकर जातिविहीन समाज निर्माण का खाका बुनते हैं। 1980 के बाद के तीन दशकों में हमने देश की ‘गतिशील जातियों’ का जलवा देखा है। क्या इससे लोहिया का सपना पूरा होता दिखता है? लोहिया की जन्मशती के मौके पर इसका मूल्यांकन जरूरी है।
इन वर्षों के व्यावहारिक जीवन में हमने देशा है कि यथास्थितिवाद की शासक पार्टियां – कांग्रेस और भाजपा ने जातीय राजनीति का प्रबंधन (उनके शब्दों में सोशल इंजीनियरिंग) ज्यादा सक्षम तरीके से किया और इसी अवधि में बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान समेत केन्द्र में भी भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई। इस कवायद में लोहियावादी सोशलिस्ट भी जहां-तहां तांक-झांक करते और कभी इधर तो कभी उधर कंधा लगाते देखे गये। गरीबों की खुशहाली का संघर्ष संप्रदायवाद और जातिवाद की मधांधता में डूब गया। गतिशील जाति और संप्रदाय ने पूंजीवादी सत्ता को स्थायित्व प्रदान किया। पूंजीवाद सामंती पारंपरिक सामाजिक विभाजन को सहलाकर अपना आधार मजबूत करता है और बदले में कुछ रियायतें भी पेश करता है। देश में जब मंडल-कमंडल युद्ध चल रहा था तो उसी अवधि में वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीतियों का घोड़ा सरपट दौड़ रहा था।
यहां नस्लभेद का जातिभेद के साथ घालमेल करना गलत होगा। नस्ल का सम्बंध रक्त से होता है, जबकि जाति का सम्बंध आदिम श्रम विभाजन अर्थात कर्म से जो कालक्रम में जन्मजात हो गया। एक रक्त का जन समूह एक जगह पला-बढ़ा और इससे रक्त आधारित नस्लीय जनसमूह का निर्माण हुआ। कालक्रम में पलायन और प्रव्रजन से नस्लों का भी मिश्रण और समन्वय हुआ। खलीफा, सरदार, राजा, बादशाह, किंग, सम्राट आदि रक्त आधारित कबीलाई प्रभुत्व व्यवस्था की प्रारंभिक अभिव्यक्तियां हैं।
औद्यौगिक क्रान्ति के बाद जो नया पूंजीवादी बाजार बना, उसमें रक्त सम्बंधों पर आधारित पुराना नस्लीय विभाजन और जन्मजात जातियों के अस्तित्व अर्थहीन होते चले गये। पूंजीवादी अर्थतंत्र में जाति आधारित कार्यकलाप सिकुड़े और उनकी सामाजिक भूमिका शादी-विवाह और पर्व-त्यौहारों तक सीमित हो गयी।
पूंजीवाद माल उत्पादन और व्यापार का मकसद मुनाफा कमाना होता है। लाभ लिप्ता की पूर्ति के लिये इंसानी शोषण प्रणाली का दूसरा नाम पूंजीवादी निजाम है। लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि एक ही रक्त समूह का शोषक अपने ही रक्त समूह के लोगों का शोषण बेहिचक कर रहा है। इसलिये पूंजीवाद में स्वार्थ का सीधा टकराव शोषितों और शोषकों के बीच हो गया। एक तरफ सभी नस्लों व जातियों का विशाल शोषित जनसमूह का नया वर्ग मजदूरों और किसानों के रूप में प्रकट हुआ, वहीं दूसरी तरफ जमींदार और पूंजीपति के रूप में नया अत्यंत अल्पमत शोषक वर्ग चिन्हित हुआ।
क्रान्ति का अर्थ होता है व्यवस्था परिवर्तन इसलिये औद्योगिक क्रान्ति के बाद जो नई पूंजीवादी व्यवस्था उभरी उसने पुराने सामंती सम्बंधों को उलट-पुलट कर रख दिया। कार्ल माक्र्स बताते हैं आर्थिक परिवर्तन की गति तेज होती है, किन्तु आर्थिक प्रगति के मुकाबले सामाजिक रिश्तों में परिवर्तन की गति मंद होती है। फिर परिवर्तन के बाद भी नये समाज में पुराने सामाजिक सम्बंधों के अवशेष विद्यमान होते हैं।
उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों में निरन्तर हो रहे बदलाव का विशद विश्लेषण करते हुए माक्र्स इस नतीजे पर पहुंचे कि वैज्ञानिक तकनीकी अनुसंधान के चलते उत्पादन शक्तियों का विकास तेज गति से होता है, किन्तु इसके मुकाबले उत्पादन सम्बंधों में परिवर्तन की विकास गति धीमी होती है। इसके चलते उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों में स्वाभाविक विरोधाभाष होता है। इस तरह उत्पादन शक्तियों में परिवर्तन की गति तीव्रतम होती है, वहीं उत्पादन सम्बंधों में परिवर्तन की गति मंदतर और सामाजिक सम्बंधों में परिवर्तन की गति मंदतम होती है क्योंकि सामाजिक परिवर्तन का सम्बंध इंसान की आदतों, रीति-रिवाजों और स्वभाव के साथ जुड़ा होता है जो आसानी से पीछा नहीं छोड़ते। उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बंधों का विरोधाभाष तथा उनका सामाजिक सम्बंधों में टकराव सामाजिक विकास के इतिहास के हर मंजिल पर भली प्रकार से देखा जा सकता है। ये टकराव अनेक सामाजिक विरोधाभाषों को जन्म देते हैं। नये आर्थिक टकरावों के परिणाम तीक्ष्ण, निर्णायक और अग्रगामी होते हैं, जबकि पुराने सामंती सामाजिक विरोधाभाषों के परिणाम शिथिल, गौण और प्रतिगामी होते हैं। इसलिये माक्र्स मानव इतिहास को वर्ग संघर्षों का इतिहास बताते हैं और वे मानवता की नियति पूंजीवाद में नहीं, बल्कि पूंजीवाद के विनाश में देखते हैं। माक्र्स पूंजीवाद से आगे बढ़कर समानता पर आधारित शोषणविहीन, शासन रहित समाज का नया नक्शा पेश करते हैं।
इसके विपरीत लोहिया मानव इतिहास को जातियों की लड़ाइयों की संज्ञा देते हैं। लोहिया यहीं नहीं रूकते, वे पूंजीवाद और साम्यवाद को पश्चिमी औद्योगिक सभ्यता की जुड़वां संतान बताकर निंदा तो करते हैं किन्तु पूंजीवाद के विकल्प के रूप में जो कुछ उन्होंने परोसा, वह उनका ख्याली पुलाव साबित हुआ। लोहिया आजीवन फ्रांस और जर्मनी के मध्ययुगीन कल्पनावादी समाजवादियों की पांत में ही भटकते रहे और अपने समाजवादी कार्यक्रम को गांधी जी की विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के साथ घालमेल करते रहे।
माक्र्स ने अपने पूर्ववर्ती और समकालीन कल्पनावादी समाजवादियों की अवधारणाओं के खोखलेपन की आलोचना की और उससे अलग हटकर वैज्ञानिक समाजवाद की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सभी तरह के विरोधाभाषों पर काबू पाने के लिए पूंजीवादी उत्पादन शक्तियों पर सामाजिक स्वामित्व कायम करने का सुझाव दिया। किन्तु इस प्रश्न से लोहिया हमेशा बचते रहे और आजीवन गोल-मटोल बातें करते रहे।
अलबत्ता यह विवाद का विषय बना रहा कि उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व का क्या रूप होगा। अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत यूनियन में उत्पादन के तमाम साधनों का राष्ट्रीयकरण किया गया। यह समझा गया कि राष्ट्रीयकरण अर्थात सरकारी स्वामित्व उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की दिशा में उठाया गया पहला कदम है। चूंकि राज्य सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथ में है, इसलिये सरकारी स्वामित्व को विकासक्रम में सामाजिक स्वामित्व में परिवर्तित किया जा सकेगा। समाजवादी विकास प्रक्रिया की उच्च अवस्था में धीरे-धीरे राज्य का अस्तित्व सूखता जायेगा और अंततः सरकारी स्वामित्व भी सामाजिक स्वामित्व में रूपांतरित हो जायेगा। समाजवाद के सोवियत प्रयोग में यह अपेक्षा पूरी नहीं हुई। समाजवाद एक व्यवस्था है, एक प्रणाली है, जिस पर चल कर साम्यवादी अवस्था हासिल की जाती है। समाजवाद के सोवियत माॅडल टूटने का यह अर्थ नहीं है कि समाजवाद असफल हो गया। पूंजीवाद संकट पैदा करता है, समाधान नहीं। समाधान समाजवाद में है, नये सिरे से दुनियां में समाजवादी प्रयोग का चिंतन चल रहा है।
लोहिया के आधुनिक शिष्य अपने कृत्यों को महिमामंडित करने के लिये लोहिया का नाम जपते हैं, किन्तु वास्तविकता में अपने कर्मो से वे लोहिया के उत्तराधिकारी नहीं रह गये हैं। वे लोहिया के विचारों और आदर्शों से काफी दूर विपरीत दिशा में भटक गये हैं, जहां से उनकी वापसी अब मुमकिन नहीं दिखती है। जिस प्रकार हाल के दिनों में श्रमिक वर्ग और उनके ट्रेड यूनियन इकट्ठे होकर संयुक्त कार्रवाई कर रहे हैं, उसी प्रकार कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट के बीच ईमानदान सह-चिंतन की आवश्यकता है।

– सत्य नारायण ठाकुर
क्रमश:

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उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के नाम पर एक बहुत बड़ी जमात में कुछ काली भेडें शामिल हो गयी हैं। जिनका विधि व्यवसाय से कोई लेना देना नहीं है लेकिन बार कौंसिल व बार एसोशिएसन के चुनाव में यह सभी मतदाता होने के कारण इन काली भेड़ों के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हो पा रही थी किन्तु माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने 60-70 अधिवक्ताओं से सम्बंधित 11 मामलों की जांच सी.बी.आई को सौंप दी थी। जिसकी प्रगति आख्या सी.बी.आई को 27 मई को माननीय उच्च न्यायालय को देनी थी।
सी.बी.आई ने अदालत परिसर में तोड़फोड़, मारपीट व सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में परशुराम मिश्रा व मिर्जा तौसीफ बेग को गिरफ्तार कर लखनऊ की सी.बी.आई अदालत के समक्ष पेश किया और कस्टडी रिमांड की मांग की जिसको न्यायालय ने स्वीकार कर लिया और 24 घंटे की कस्टडी रिमांड सी.बी.आई को दे दी। लखनऊ, कानपुर में ऐसे पंजीकृत अधिवक्ता हैं जो बार कौंसिल में तो पंजीकृत हैं मगर उनका व्यवसाय विधि व्यवसाय नहीं है वरन वह लोग आये दिन मारपीट, दंगा-फसाद, मकान खाली करना, मकान कब्ज़ा करना, प्रोपर्टी डीलिंग जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। बहुत सारे पंजीकृत अधिवक्ता केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश की सरकारों में मंत्री हैं और उन्होंने नियमो के अनुसार बार कौंसिल को विधि व्यवसाय बंद करने की सूचना भी नहीं दी है। इस तरह से यह सब लोग विधि व्यवसाय से जुड़े हुए अधिवक्ताओं को अपने काले कारनामो से बदनाम भी करते हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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