Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘loksangharsha’ Category

 इला मित्रा का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को कलकत्ता में एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। उनका परिवार एक पढ़ा-लिखा धनी परिवार था। इला के पूर्वज वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही जिले के जेनाइदा सब-डिविजन स्थित बागुतिया ग्राम से थे। उसके पिता नागेंद्रनाथ सेन कलकत्ता में ए.जी.बी. कार्यालय में एकाउंटेंट थे। आरंभिक पढ़ाई के बाद उनकी आगे की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय के बेथ्यून स्कूल एंड कॉलेज में हुई। उसने 1944 में बांगला साहित्य में बी.ए. ;ऑनर्स पास किया। आखिरकार वह बंगला साहित्य और संस्कृति में एम.ए. 1958 में ही कर पाईं। इन 13 वर्षोंं में वह अत्यंत कष्टमय जीवन से गुजरी जिसका उल्लेख हम आगे करेंगे।Comrade Ila Mitra: Light of Inspiration
चैम्पियन खिलाड़ी
अपने स्कूल एवं कॉलेज के दिनों में इला बहुत ही मेधावी खिलाड़ी थी। उसे ढेर सारी ट्रॉफियां मिली थीं। वह 1935 से 38 तक बंगाल प्रेसीडेन्सी की चैम्पियन एथलीट थी। वह बहुत अच्छी बास्केटबॉल खिलाड़ी भी थी।
वह खेलों की दुनिया में स्टार के रूप में प्रसिद्ध हो गई। उसे जापान में आयोजित ऑलिम्पिक खेलों के लिए
भारत से खेलने के लिए चुन भी लिया गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से खेल नहीं हो पाए।
राजनीति में
अपनी पढ़ाई के दौरान इला ए. आई.एस.एफ. के संपर्क में आई। बाद में वह विश्वयुद्ध  के दौरान ‘महिला
आत्मरक्षा समिति’ में शामिल हो गई। वह जल्द ही कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आ गई और 1943 में 18 वर्ष
की आयु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गई।
इला का विवाह 1944 में रामेन्द्र नाथ मित्रा से हुआ। रामेन्द्र भी धनी जमींदारी परिवार के थे। लेकिन जल्द
वे भी किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और होलटाइमर बन गए। इला भी रामचंद्रपुर चली गई और उन्हें 1948 में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
इसी दौर में कलकत्ता में दंगे शुरू हो गए। पार्टी ने इला के दंगा-पीड़ितों के राहत-कार्य के लिए नोआखाली जाने
का आदेश दिया। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं के साथ व्यापक दौरा किया। उन्होंने
बड़े पैमाने पर राहत कार्य किया। वह पहला मौका था जब इला का इतने बड़े पैमाने पर आम जनता से संपर्क स्थापित हुआ ।
देश के विभाजन के बाद मित्रा परिवार की जमींदारी पूर्वी पाकिस्तान में रह गई। इसलिए इला समेत उनका
परिवार वहीं रह गया। एक स्थानीय किसान नेता अल्ताफ हुसैन की पहल पर कृष्णा-गोविंदपुर में एक स्कूल खोला गया जो इला के घर के नजदीक था। लोगों ने मांग की कि ‘‘बधुमाता’ अर्थात इला उनके बच्चों को बढ़ाए। इला तेयार हो गईं पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। स्कूल ने एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया।
उस वक्त पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी को भारी दमन का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए उन्हें अंडरग्राउंड
जाने के लिए कहा गया। उस वक्त इला गर्भवती थी। वे कलकत्ता चली गईं। वहां उन्होंने अपने पुत्र मोहन को जन्म दिया। मोहन की देखरेख इला की सास ने रामचंद्रपुर में किया।
पाकिस्तान में पार्टी कार्य तथा किसान संघर्ष इला अपने पति के साथ वापस पूर्व पाकिस्तान लौट गईं। वे नवाबगंज के नाचोल में रहने लगीं। नाचोल राजशाही से 35 कि.मी. दूर है जहां जाने का रास्ता अत्यंत दुर्गम है। स्थानीय नेतृत्व ने किसानों को संगठित किया जिनका संघर्ष आगे चलकर सुप्रसिद्ध ‘तेभागा’ आंदोलन का हिस्सा बना। पूर्वी पाकिस्तान की मुस्लिम लीग सरकार आंदोलन को अमानवीय तरीके से कुचलने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही थी।आजाद भारत के असली सितारे-14 - सबलोग
नाचोल क्षेत्र में जोतदारों को फसल उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा देना पड़ता था जबकि किसानों के पास मात्र
एक-तिहाई ही बचता था। उत्तरी बंगाल के अन्य जिलों में फसल का आधा-आधा बंटवारा किया जाता था।
धान की सफाई की मजदूरी 20 में से 3 ही हिस्सा ;‘अरास’द्ध थी जबकि वे 7 हिस्से की मांग कर रहे थे।
इला ने चांदीपुर को अपने काम का केंद्र बनाया। चांदीपुर में एक जाने-माने संथाल कम्युनिस्ट नेता
मातला माझी थे जिनका घर आंदोलन का केंद्र बना। इला मित्रा ने उस क्षेत्र में घूम-घमकर काफी काम किया और
खेतिहर मजदूरों तथा किसानों को संगठित किया। वे ‘‘रानी मां’ के नाम से जनता के बीच लोकप्रिय हो गईं
उनके कार्यों की प्रशंसा में गीत रचे जाने लगे।
यह संघर्ष सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण करने लगा। किसान आंदोलन के नेत्ृत्व ने बहुत सरल और प्रभावशाली
तरीका अपनाया। फसल कट जाने पर मालिकों को विशेष दिन बुलाया जाताऋ उस दिन सामान्य ग्रामीण और किसान भी उपस्थित होते। फसल तीन हिस्सों में बांट दी जातीः किसान को दो हिस्से मिलते। जोतदार को एक।
1950 आते-आते भूस्वामियों ने ‘तेभागा’ और ‘सात आरी’ मान ली
लेकिन प्रशासन और बड़े भूस्वामी अंदर-अंदर नाराज हो रहे थे तथा चुप नहीं बैठे थे। उन्होंने सशस्त्र बलों तथा पुलिस को गोलबंद करना आरंभ कर दिया। वे किसानों एवं ग्रामीणें को डराने-धमकाने और लूटने लगे। उनकी
फसलें लूटी जाने लगीं। बड़ी संख्या में किसानों तथा मजदूरों को गिरफ्तार कर उन्हें यातनाएं दी जाने लगीं।
7 जनवरी 1950 को नाचोल में दो हजार सेना पहुंच गई और उन्होंने दर्जनों गांवों को आग लगा दी। फौज के साथ पुलिस और अन्सार भी लगे हुए थे। वे गांवों और घरों में घुसकर लूटपाट करने लगे। सैंकड़ों संथाल मारे गए।
साथियों ने इला मित्रा से अनुरोध किया कि सीमा-पार भारत भाग जाएं।
इसके लिए उन्होंने धान से लदे बैलगाड़ियों में उन्हें छिपाकर ले जाने का इंतजाम का वादा भी किया। लेकिन
इला किसी तरह मानने को तेयार नहीं हुई जब तक कि उनके साथी रिहा नहीं कर दिए जाते। रामेन्द्र मित्रा का
ग्रुप भारत जाने में सफल हो गए लेकिन कई अन्य सफल नहीं हो पाए। इला संथाल वेशभूषा पहने हुए उनकी भाषा
बोलते हुए उनके बीच छिपी हुई थीं लेकिन खुफिया विभाग के एजेंटों ने उन्हें पहचान लिया। वे अपने सैंकड़ों साथियों के साथ गिरफ्तार कर ली गईं। फिर नाचोल पुलिस थाने में अमानवीय शारीरिक यातनाओं का दौर
शुरू हो गया। सैंकड़ों लोगों को बुरी तरह पीटा गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं। पुलिस चाहती थी कि लोग
इला को अपना नेता बताकर गलत काम करवाने की जिम्मेदारी उनपरडालें। लेकिन किसी ने भी अपना मुंह
तक नहीं खोला। इला पर पुलिसवालों की हत्याएं करवाने का आरोप भी लगायागया। सिर्फ यातनाओं के कारण 100 से भी अधिक लोग मारे गए।
पाकिस्तान में इला मित्रा पर आमनवीय अत्याचार उसके बाद इला मित्रा पर अमानवीय और अवर्णनीय अत्याचारों का दौर आरंभ हुआ। उस वक्त पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही का दौर आरंभ हो रहा था। चरमपंथी मुस्लिम सांप्रदायिक लोग हावी थे। इला कम्युनिस्ट थीं,महिला थीं और हिन्दू भी थीं। इन तीनों
का पूरा इस्तेमाल उनके खिलाफ किया गया। पाक सरकार ने उनसे बातें मनवाने के लिए राज्य एवं पुलिस तथा
फौजी मशीनरी का भरपूर प्रयोग किया लेकिन वह बुरी तरह असफल रही। इला की सहयोगी तथा सामाजिककार्यकर्ता मनोरमा मसीमा और भानु देवी तथा अन्य ने इस बात पर दृढ़ता से जोर दिया कि इला मित्रा अपने ऊपर किए गए अत्याचारां का बिना छिपाए पूरा-पूरा विवरण लोगों तक  पहुंचाएं। इला उनके विस्तार में जाने से हिचक रही थीं।
इला को न खाना दिया गया और न ही पानी, उन्हें लगातार राइफलों के‘बट’ से पीटा गया, पेट तथा अन्य
हिस्सों पर बूटों से मारा गया, दाहिने पैर में कील ठोकी गई, और बारम्बार बलात्कार तथा नारी पर जो भी
अत्याचार किए जा सकते थे, किए गए।
इला पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार 3-4 दिनों तक चलता रहा।वह पूरी तरह खून में नहा गई। यह
सबकुछ वर्णनातीत है। उन्हें फिर नवाबगंज जेल ले जाया गया जेल के गेट पर ही उनकी फिर
पिटाई की गई। बाद में जेल के सेल में कुछ पुलिस अफसरों ने उनकी सहायताकी और आगे अत्याचारों से बचाया।
उनमें से एक कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनके साथ पढ़ा करता था। बाद में इला ने उन सबों को धन्यवाद भी दिया।
वह रात में चुपके से भोजन और दवाएं दे आता। जेलों में इला को दी गई यातनाओंका वर्णन उनके वक्तव्य के रूप में ‘‘लियाकत-नूरूल आमीन सत्ता’ केखिलाफ हैंडबिल की शक्ल में सारेदेश में बांटा गया। लोग यह सब पढ़कर
दंग रह गए और गुस्से में आ गए।मुकदमे में इला पर आंदोलन कानेतृत्व कर किसानों को भड़काने, फसलें
लुटवाने और पुलिस अफसरों की हत्याएंकरवाने का आरोप लगाया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति चकनाचूर हो चुकी थी। वे लिखती हैः
‘‘कभी-कभी अपने बच्चे को जन्म देने के खुशी के क्षण सामने से गुजर जाते………..लेकिन जल्द ही लुप्त हो जाते………..मेरे पास कोई भी अच्छी यादें नहींबची थीं………. सबकुछ जैसे अंधकार में डूब गया था….जज की आवाज उभर आती……लेकिन सबकुछ शून्य में खो जाता।’’
इला को ढाका सेंट्रल जेल लाया गया। फिर उन्हें ढाका मेडिकल कॉलेज 1953 में उस वक्त लाया गया जब वे मरणासन्न थीं। सैंकड़ों लोग उनसे मिलने आते। मौलाना भशानी तथा अन्य नेताओं ने पूर्वी पाकिस्तान असेम्बली
में चिंता व्यक्त करते हुए उनके रिहाई की मांग की।
उन्हें जून 1954 के मध्य में पैरोल पर छोड़ा गया और इलाज के लिए कलकत्ता लाया गया। वे धीरे-धीरे सुधरने लगीं। अब पाकिस्तान की सरकार को मालूम हुआ कि उनकी हालत सुधर रही है तो उसने भारत सरकार पर उन्हें वापस भेजने का दबाव बनना शुरू किया ताकि उन पर मुकदमे आगे बढ़ाए जाए। सबों ने उन्हें वापस भेजने से इंकार कर दिया ताकि वे पाक तानाशाही से दूर रहें।
उनकी देखभाल डॉ. शिशिर मुखर्जी तथा अन्य डॉक्टर कर रहे थे। साहित्यकार दिपेन्द्र बंदोपाध्याय ने उनकी स्थिति का विस्तार से वर्णन किया है। सुचित्र मित्र, सुभाष मुखोपाध्याय तथा अन्य कई साथियों ने उनकी
मानसिक स्थिति बेहतर बनाने में उनकी बड़ी मदद की। सुभाष ने उनपर एक कविता लिखीः 

‘‘केनो बोन पारुल डाको रे’। प. बंगाल में पार्टी का काम इला मित्रा पूर्वी पाकिस्तान वापस नहीं लौटी और प. बंगाल में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का काम करती रहीं। उन्होंने 1957 में बंगल में निजी विद्यार्थी के रूप में अपना एम.ए. पूरा किया और फिर सिटी कॉलेज ;साउथ कलकत्ता में प्रोफेसर का काम करना आरंभ किया।
इला मित्रा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  की ओर से प. बंगाल असेम्बली के चुनाव लड़ी। वे
मणिकतला चुनाव क्षेत्र से 1962-71 और 1972-77 में चार बार चुनी गयी।
हालांकि वे पूर्वी पाकिस्तान ;बांगलादेशद्ध वापस नहीं लौटीं लेकिन उसे कभी भी भुलाया नहीं। बांगलादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान उनका घर और पार्टी ऑफिस मुक्ति योधाओं की  गतिविधियों का केंद्र रहा। उन्होने कहा कि वे उस देश की रिणी हैं और यह उनका कर्तव्य है।
उन्होंने 1972 और 1974 में बांगलदेश की यात्रा की। उनकी मुलाकात बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से हुई। बंगबंधु ने कहा कि इला और रामेन्द्र मित्रा उनकी पुत्री और पुत्र के समान हैं और जल्द ही वे उन्हें बांगलादेश के नागरिक के रूप में वापस लाएंगे। लेकिन इस बीच बंगबंधु की हत्या कर दी गई।
बांगलादेश में इला का पुश्तैनी घर  खस्ता हालत में खंडहर बना पड़ा है। दिनाजपुर, बांगलदेश, में इला की याद
में ‘तेभागा छत्र’ बनाया गया है जिसपर उनकी पेंटिंग उकेरी गई है।
1965 में इला मित्रा ने प. बंगाल में मुस्लिम-विरोधी दंगे रोकने में सक्रिय भूमिका अदा की। भारत सरकार से ‘‘ताम्र-पत्र’ इला मित्रा को देश की आजादी के संघर्ष में योगदान के लिए भारत सरकार से ‘ताम्र-पत्र’ प्रदान किया गया। उन्हें साहित्यिक अनुवाद के लिए ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ से भी नवाजा गया।
वे प. बंगाल राज्य किसान सभा की अध्यक्ष चुनी गईं और राज्य इस्कफ की कार्यकारिणी अध्यक्ष भी। उनकी मृत्यु कलकत्ता में 3 अक्तूबर 2002 को हो गई .

-अनिल राजिमवाले

Read Full Post »

बाराबंकीः भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए मुखबिर राज समाप्त कर किसान मजदूरों का राज स्थापित करना होगा अखिल भारतीय नौजवान सभा द्वारा आयोजित शहीद दिवस के अवसर पर श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि भगत सिंह शोषण विहीन मजदूर किसान राज चाहते थे, वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि अगर आज भगत सिंह होते तो वर्तमान किसान मजदूर विरोधी सरकार उन्हे पुनः जीवित फांसी पर लटका देती है’’ भगत सिंह को फांसी कराने में इन्ही तत्वों का हाथ था। पार्टी के जिला सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन चल रहा है, मजदूर आन्दोलन चल रहा है सरकार चुनाव लड़ने में व्यस्त है। चुनाव मंे मोदी की लहर नहीं है लेकिन कार्पोरेट सेक्टर की धन की लहर है।
किसाना सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि किसान आन्दोलन तय करेगा कि किसानों के हालात सुधरंगे या नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि किसानों मंे आन्दोलन को हम सब मदद कर भगत सिंह के सपनों को सरकार करें। 

श्रद्धांजलि सभा मेें  धीरेन्द्र कुमार यादव, रमेश कुमार सच्चिदानन्द, संदीप तिवारी, राम दुलारे यादव, लवकुश वर्मा, योेगेन्द सिंह, महेन्द्र यादव, राजकुमार दीपक वर्मा, आशीष शुक्ला, राजेन्द्र सिंह राणा, मो0 फदीर, धर्मेन्द्र, दिग्विजय सिंह, कुलदीप यादव, मुनेश्वर प्रसाद गोस्वामी, विनोद यादव, गिरीश चन्द्र तथा श्याम सिंह आदि प्रमुख लोग थे।
श्रद्धांजलि सभा का संचालन किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया सभा में प्रारम्भ मंे सभी लोगों ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू के चित्रों पर माल्यापर्ण कर श्रद्धांजलि दी।

Read Full Post »

 loksabha elections 2019 bjp is full confident with pm narendra modi but  also has worried with sp and bsp alliance - मिशन 2019: बीजेपी को पीएम मोदी  पर पूरा भरोसा, लेकिन इस                     मोदी बंगाल में कहते हैं अपराध है, अपराधी हैं, लेकिन जेल में नहीं है, माफिया हैं, घुसपैठिया हैं लेकिन खुलेआम घूम रहे हैं। सिंडिकेट है, स्कैम है, लेकिन कार्यवाही नहीं होती है, मोदी भूल जाते हैं कि भाजपा शासित , उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राज्यों में स्थित बद से बदतर है, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री के बजाए संघ के प्रचारक की भूमिका में ही बने रहते हैं, पार्टी में अपराध की स्थिति यह है कि दो सांसदों ने बड़े नेताओं के दबाव के कारण आत्महत्या कर ली है, तमाम सारे लोग सत्तारूढ दल के पोर्न स्टार को भी फेल कर रहे हैं, उनके ब्लू फिल्म के वीडियो वायरल हो रहे हैं, तमाम सारे नेता- उपनेता सेक्स उद्योग के व्यापारी होने के कारण पकड़े गये हैं यहां तक कि मध्य प्रदेश के एक मंत्री राघव साहब अप्रकृतिक यौन सम्बंध बनाते हुए जब वीडियो वायरल हुआ तब उनको मजबूरी में इस्तीफा दे देना पड़ा था।
    सावरकर, गोलवरकर, हेड गवारकर व महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे को प्रेरणा स्रोत मानकर संघ प्रचारक उनके नाम पर वोट नहीं मांगते हैं, शैतान -साधू की भूमिका में दाढ़ी रखकर आजादी के महानायक पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद जैसे महान व्यक्तियों का मुखौटा लगाकर वोट मांगते हैं।
    हिटलर या मुसोलिनी के रक्त पिपाशु के यह भक्तगण कभी भी जनता के बीच में इनका नाम नहीं लेते हैं, लेकिन हिटलर के प्रचारमंत्री गोविल्स का अनुशरण करते हुए हर वक्त एक झूठ को हजारों  बार सुमिरनी लेकर जाप करते हुए मिलते हैं। हाँ लेकिन यह भी है कि हिटलर की मन की बात की तरह यह भी मन की बात करते हैं, लेकिन दूसरों की मन की बात सुनना यह पसंद नहीं करते हैं।
    मोदी बंगाल में या राज्यों में आम चुनाव में गैस, पेट्रोलियम पदार्थों या महंगाई की चर्चा नहीं करते हैं न ही देश के कल कारखानों को बेचने की बात ही करते हैं, मोदी बंगाल के चुनाव में एक प्रधानमंत्री के रूप में संघ का प्रचार अभियान चला रहे हैं, और जनता के करोड़ों रूपये खर्च कर गोविल्स के झूठ को प्रचारित कर रहे हैं चाहे बंगाल हो या तमिलनाडु हर जगह केन्द्र सरकार के मंत्री और प्रधानमंत्री स्वयं सरकारी खर्चों व सुरक्षा व्यवस्था का उपयोग कर जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं। बंगाल में प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं, तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस व वामदलों के निष्कासित लोगों की खरीद फरोख्त कर प्रत्याशी बना रहे है, हद तो यहां तक हो गई है कि चार सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए बाध्य किया है, नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री की भूमिका में कभी होते ही नहीं है हमेशा वह संघ के प्रचारक के रूप में ही होते हैं, यह देश का दुर्भाग्य है कि गलत बयानी करने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री है। 

-रणधीर सिंह सुमन

Read Full Post »

मोदी सरकार से मुक्ति दिलाना ही असली देशभक्ति है. दिल्ली बॉर्डर पर सैकड़ों किसानों की मृत्यु हो चुकी है. ऐसी कसाई सरकार इस देश में कभी नहीं रही है. अंग्रेजों के जुल्मों को इस सरकार ने पीछे छोड़ दिया है.

  यह बात किसान सभा के प्रांतीय उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने मोहम्मदपुर गाँव में किसानों की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी, पुर्तगाली, फ़्रांसिसी व डच उपनिवेशकों ने ऐसे अत्याचार किसानों के ऊपर नहीं किये हैं जितना यह सरकार कर रही है. किसान आन्दोलन के कारण पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा के चुनावों में संघी गिरोह पूरी तरह से चुनाव हार जायेगा.   
 संयुक्त किसान मोर्चा के नेता यादवेन्द्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने किसानों से अपील की कि पंचायत चुनाव में कमल छाप समर्थक कोई भी व्यक्ति चुनाव नहीं जीतना चाहिए यही किसानों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव कामरेड बृजमोहन वर्मा ने कहा कि उनकी पार्टी गाँव-गाँव किसान आन्दोलन के समर्थन में किसानों को जागरूक करेगी. वहीँ, किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि किसानों से हर गाँव से दिल्ली बॉर्डर पर पांच-पांच किसान भेजकर किसान आन्दोलन का समर्थन करना चाहिए.
किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि वह किसान आन्दोलन के लिए जान भी दे सकते हैं और आखिरी सांस तक किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए आन्दोलनरत रहेंगे. वहीँ,सामाजिक कार्यकर्ता व क्षेत्र में जनप्रिय मौलाना मेराज अहमद कमर ने कहा कि चाँद पूरी दुनिया को रौशनी देता है लेकिन एक स्तिथि ऐसी आती है कि चाँद नहीं निकलता है सितारे जुगनू की तरह से चमकते हैं. आज देश में सितारे जुगनू की तरह चमक रहे हैं जो किसी का भला नही कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि वह दिल्ली में किसानों के समर्थन में एक माह विभिन्न आन्दोलन स्थलों पर रहकर आये हैं, किसानों का उत्साह बढ़ाने की जरूरत है.  

श्रद्धांजलि सभा का संचालन डॉ अलाउद्दीन ने किया, अध्यक्षता मौलाना मेराज अहमद कमर ने की. सभा में अधिवक्ता श्याम सिंह, मुनेश्वर बक्श, कमरुद्दीन अंसारी, जसीम अंसारी, कमलेश मौर्या, रेहान मलिक, अली काजिम खान, हमीदुल्लाह शेख, मौलाना गयासुद्दीन फलाही, डॉ रईस सिद्दीकी, राम खेलावन यादव पूर्व प्रधान, जगदीश मौर्या पूर्व प्रधान, अय्यूब अंसारी प्रधान, मोहम्मद सलीम, चन्द्रिका प्रसाद यादव पूर्व प्रमुख, लईक पूर्व प्रधान सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे.

Read Full Post »

गिरफ्तार हुईं कल्पना

 कल्पना दत्त (बाद में कल्पना जोशी )का जन्म 27 जुलाई 1913 को श्रीपुर, बोउल खाली उपजिला, चटगांव जिला, बंगाल प्रदेश ;अब बांग्लादेश में हुआ था। श्रीपुर मात्र 300 घरों का छोटा-सा गांव था। उनका परिवार पुरातनपंथी
परम्परावादी विचारों का बड़ा जमींदार परिवार था। कल्पना के पिता विनोद बिहारी दत्त थे और माता का नाम
शोभना देवी। परिवार शिक्षित था और इसके सदस्य बाद में स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गए।

शिक्षा और राजनैतिक सक्रियता

 कल्पना की आरंभिक शिक्षा घर पर हुई। उसके बाद उसे डॉ. खास्तगीर बालिका हाई स्कूल में दाखिल करा दिया गया। यह स्कूल परिवार के ही कुछ सदस्यों ने स्थापित किया था। कल्पना पढ़ाई में बड़ी तेज थी और हमेशा अव्वल आया करती। उसने सुप्रसिद्ध  बंगला पुस्तक ‘‘पथेर दाबी’ पढ़ ली, साथ ही कन्हाईलाल तथा कई क्रांतिकारियों की जीवनियां भी पढ़ीं। उसक दो चाचा गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। इसका
उस पर बड़ा असर पड़ा। कल्पना को विज्ञान का बड़ा शौक था। महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय को वह अपना आदर्श मानती थी। कल्पना संस्कृत और गणित में भी बहुत तेज थी।
समय के साथ उसके परिवार में राजनैतिक मतभेद पैदा हो गए। गांधी जी चटगांव आए और इस परिवार की
कपड़े की दुकान पर बंग लक्ष्मी मिल्स के स्वदेशी कपड़े रख गए। परिवार की कई स्त्रियां गांधी का ‘दर्शन’ करने
गईं, यहां तक अपने गहने तक उन्हें दान कर आईं।
कल्पना ने 1929 में चटगांव से मैट्रिक पास किया। उसी वर्ष वहां एक विद्यार्थी सम्मेलन आयोजित किया गया
जिसमें कल्पना ने अपने चाचा की सहायता से भाषण भी दिया। चटगांव के नौजवान क्रांतिकारी संगठनों में
संगठित होने लगे। उसके एक सदस्य पूर्णेन्दु दस्तीदार कल्पना के घर आने-जाने लगे। कल्पना धीरे-धीरे
प्रशिक्षित होने लगी।
कल्पना ने कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में भर्ती ले ली। उसके विषय थे भौतिक शास्त्र, गणित और वनस्पति
शास्त्र। साथ ही उसने व्यायाम, बोटिंग, इ. भी सीखी। उसने हिन्दी और फ्रेंच का भी अध्ययन किया। जल्द ही उसका संपर्क सूर्यसेन, अनंत सिंह, गणेश घोष तथा अन्य प्रसिद्ध  क्रांतिकारियों से हुआ।
उसने लाठी, छुरा, इत्यादि चलाने में ट्रेनिंग पाई।
कल्पना ने अप्रैल 1930 में जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए बेथ्यून कॉलेज मे हड़ताल संगठित की। कॉलेज की महिला प्रिंसिपल ने विद्यार्थियों से दुर्व्यवहार किया। बाद में प्रिंसिपल को माफी मांगनी पड़ी।
कल्पना दत्त ’छात्री संघ’ ;गर्ल स्टूडेंट ऐसोसिएशनमें शामिल हो गई। यह एक अति-क्रांतिकारी संगठन था
जिसमें बीना दास और प्रीतिलता व द्देदार जैसी क्रांतिकारी छात्राएं शामिल थीं।
चटगांव शस्त्रागार पर हमला
क्रांतिकारी युवाओं ने 18 अप्रैल 1931 को चटगांव के ब्रिटिश शस्त्रागार पर हमला कर दिया। इस खबर ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया। खबर तेजी से फैल गई। कल्पना जल्द से जल्द चटगांव चली जाना चाहती थी लेकिन उसे कॉलेज से ट्रांसफर नहीं मिल रहा था। काफी समय बर्बाद हो गया जिसका उसकी पढ़ाई पर असर पड़ा। वह प्राइवेट छात्र के रूप में परीक्षा में बैठी। उसका सेंटर चटगांव में ही पड़ा। कल्पना ने चटगांव कॉलेज में बी.एस.सी. में एडमिशन ले लिया।
वह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए अधीर हो रही थी। उसने पिस्तौल तथा अन्य हथियारों की ट्रेनिंग लेना अधिक सक्रियता से लेना शुरू कर दिया। अपने मैट्रिक के दिनों मे कल्पना एक कम्युनिस्ट साथी के संपर्क में आ चुकी थी जिसका नाम था सुरभा दत्त। इससे उसके विचार बनने लगे थे। कल्पना ने अनन्त सिंह को, जो क्रांतिकारी दल के नेताओं में से एक थे, दल में शामिल होने पर मजबूर कर दिया। उसे रेलवे लाइन उड़ाने के
ग्रुप में शामिल कर लिया गया। इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के सूर्य सेन ने कल्पना दत्त को कलकत्ते से एसिड, रसायन तथा अन्य सामग्री का इंतजाम करने के लिए कहा। कल्पना खुद यह सारा सामान ले आई। वह विस्फोटक तैयार करने की विशेषज्ञ बन गई। उसे ‘एक्शन स्क्वाड’ में शामिल कर लिया गया।
जेल को बम से उड़ने की पहली कोशिश असफल रही। जेल में दिनेश गुप्ता और रामकृष्ण बिस्वास को फांसी
दी जाने वाली थी। कल्पना को 17 दिसंबर 1932 को चटगांव के पहाड़ तली में स्थित योरपियन क्लब के पास से गिरफ्तार कर लिया गया। वह पुरुष वेश में घूम रही थी। इसके एक सप्ताह बाद ही प्रीतिलता वद्देदार
के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने क्लब पर हमला कर दिया। यह हमला जलालाबाद के उस नरंसहार के बदले
में था जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने कई युवाओं की हत्या कर दी थी। प्रीतिलता गंभीर रूप से घायल हो गई और पकड़े
जाने से बचने के लिए उसने सायनाड खाकर आत्महत्या कर ली। प्रीतिलता कल्पना दत्त की सहपाठिनी और
क्रांतिकारी दल में सहयोगिनी थी। पुलिस ने कल्पना को उक्त कांड में फंसाने की कोशिश की लेकिन सबूतों
के अभाव में उसे जमानत पर छोड़ दिया गया। उसे अपने घर में बंदी बनाकर चारों ओर पुलिस का पहरा
बिठा दिया गया। उसे घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।
फिर भी कल्पना मौका पाते ही घर से भाग निकली। उनके पिता को काम से निकाल दिया गया और घर पर
छापा मारकर सारा सामान जब्त कर लिया गया।
कल्पना और सूर्यदा

सूर्यसेन किसी तरह रात और दिन में छिपते तथा भागते रहे और पुलिस के जाल से बचते रहे। इसी दौरान वह पुलिस फायरिंग में घायल हो गई। वह और मणिन्द्र दत्त पूरे दो घंटे एक तालाब के पानी में छिपे रहें। फिर भी वह भागती गई। आखिरकार उसे चटगांव के पास समुद्री किनारे एक छोटे-से कस्बे से गिरफ्तार कर लिया गया।
कल्पना और कई अन्य साथियों को पकड़कर पुलिस ले गई। एक पुलिस अफसर ने उसे थप्पड़ मारा। इस पर
वहां उपस्थित फौजी कमांडर ने थप्पड़ मारने वाले को डांटते हुए कहाः ‘‘उसे उचित सम्मान दो।’’ कल्पना पुलिस
और फौजी अधिकारियों के बीच बड़ी लोकप्रिय हो गई।
सूर्यसेन और तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी की सजा सुनाई गई जबकि कल्पना दत्त को आजन्म कारावास की
सजा मिली। विशेष ट्रिब्यूनल जज ने कहा कि वह सिर्फ 18 वर्ष की थी। उसे अंडमान में काला पानी की सजा
के लिए भेजा जाने वाला था लेकिन महाकवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने हस्तक्षेप कर रुकवा दिया। उसे पहले तो हिजली
और राजशाही जेलों में भेजा गया, फिर सितंबर 1934 से अक्टूबर1935 तक मेदिनीपुर जेल में रखा गया। फिर
दिनाजपुर जेल और उसके बाद मेदिनीपुर जेल में वापस लाया गया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
कल्पना दत्त और अन्य कैदियों की रिहाई के लिए आंदोलन जोर पकड़ता गया तथा सरकार पर दबाव बढ़ता
गया। 1938-39 में कैदियों की रिहाई का आंदोलन तेज हो गया। इसके अलावा गांधीजी और टैगोर ने भी दबाव
बनाया। फलस्वरूप कल्पना दत्त तथा कई अन्य को 1 मई 1939 को रिहा कर दिया गया।
रिहाई के बाद कल्पना को रविन्द्रनाथ टैगोर की ओर से पत्र मिला। इसमें उन्होंने कल्पना को उसके भविष्य के कर्तव्यों का ध्यान दिलाते हुए उसे आशीर्वाद दिया।
कल्पना के अधिकतर साथी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो चुके थे। अभी कल्पना पशोपेश में थी। वह वेदान्त
और गीता के आध्यात्मिक प्रभाव में भी थी। साथ ही उसे कम्युनिस्टों के विचार जरा ज्यादा ही सिधान्तिक लगते थे। उसे महसूस हो रहा था कि ‘जनता के बीच’ काम होना चाहिए। कोई भी कॉलेज कल्पना दत्त को एडमिशन देने
को तैयार नहीं था। आखिरकार उसने 1940 में बी.ए. पास किया ओर एम. ए.;गणित में एडमिशन लिया।
1940-41 में उसे फिर ‘गृह-बंदी’ में रखा गया वापस कलकत्ता लौटकर उसने ‘अध्ययनमंडली’ का गठन किया। साथ ही हस्तलिखित पत्रिका ‘पथेय’ निकालना शुरू किया। उसने लगभग सौ सदस्यों वाली एक नारी समिति भी गठित की।
उसने ‘रात-दिन’ स्कूल स्थापित किए। उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चटगांव पर जापानियों द्वारा बमबारी के दौरान रक्षा-उपायों संबंधी काम किया। इस संदर्भ में उसने महिला आत्मरक्षा समिति’ के गठन में भाग लिया। इस बीच वह दो बार टाइफायड से गंभीर रूप से बीमार हुई।
कल्पना को अब जनता के बीच काम करने के कई अवसर मिले। उसने संथाल मजदूरों, आदिवासियों, सफाई
श्रमिकों, धोबियों, इ. तबकों के बीच, उनकी झुग्गियों में जाकर बहुत सक्रियतासे काम किया। इसके अलावा उसने
1943 के बंगाल में पड़े महा-अकाल में बड़ा काम किया। उसे किसान सभा में भी काम करने का मौका मिला।
कलकत्ता में उसने ट्रामवे तथा अन्य मजदूरों के बीच सक्रिय काम किया।
वह ट्रामवे वर्कर्स यूनियन के ऑफिस में होलटाइमर बन गईं।
इन कार्योंं के दौरान कल्पना दत्त कम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गईं। उन्हें 1942 में, जब वे
टाइफायड से बीमार थीं, सूचना दीगई कि उन्हें भा.क.पा. का सदस्य बना लिया गया है।
दिसंबर 1942 में कल्पना पार्टी स्कूल में भर्ती होने बंबई गईं। वहां उनकी मुलाकात पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी से हुई। उन्हें प्रादेशिक स्तर पर पार्टी संगठनकर्ता बनाया गया।
उनकी चार बहनें भी पार्टी की सदस्य बन गईं। अगस्त 1943 में पी.सीजोशी और कल्पना दत्त की शादी हो गई।
कल्पना जोशी ने कई जनसंघर्षोंं का नेतृत्व किया और कई अन्य में भाग लिया। इनमें से एक था जनवरी 1946 में चटगांव के पाटिया में हड़तालें और प्रदर्शन। यह ब्रिटिश सिपाहियों द्वारा किए गए अत्याचारों के विरोध में था। कल्पना और उसके साथियों ने इनका नेतृत्व किया।
1946 में कल्पना जोशी ने भाक. पा. उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान सभा के लिए चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

कल्पना जोशी 1948 में अंडरग्राउंड चली गईं। 1951 में जब पार्टी पर से पाबंदी हटाई गई तो उन्हें वित्तीय एवं राजनैतिक कारणों से नौकरी करनी पड़ गई। उन्हें प्रो. पी.सीमहालनोबिस के तहत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीच्यूट में काम मिल गया। उन्होंने मुख्यतः नेशनल सैम्पल सर्वे ;एन.एस.एस. में काम किया। वे इंस्टीच्यूट ऑफ स्टडीज इन रश्शियन लैंग्वेज की संस्थापक-डाइरेक्टर भी थीं। उन्होंने ‘चिटगांग आर्मरीरेडर्सःरेमिनिसेन्सेज’ ;चटगांव शस्त्रगार कांड के साथियों के संस्मरण नाम से आत्म-कथात्मक पुस्तक भी लिखी। इसे अंग्रेजी में पी.सी. जोशी और निखिल चक्रवर्ती ने अनूदित किया। जोशी ने इसकी भूमिका भी लिखी। कल्पना ने लिखाः ‘‘हमें अपने स्कूली दिनों में अपने भविष्य का कोई खाका स्पष्ट नहीं था। और तब झांसीं की रानी की कहानी ने हमें प्रेरित कर दिया।’’ कल्पना दत्त जोशी की मृत्यु 5 फरवरी 1995 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले

Read Full Post »

बाराबंकी। कुंवर उमेश सिंह विधि व्यवस्था के स्वर्णिम युग के स्वर्णिम व्यक्तित्व के स्वामी थे विधि के क्षेत्र को उन्होंने समृद्धि किया आज जरूरत इस बात की है कि विधि व्यवसाय को पुनः नई ऊचांईयों पर ले जाने की जरूरत है इसलिए अधिवक्ता कुंवर उमेश सिंह के चरित्र को अपनाना पड़ेगा।
यह विचार इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स के राष्ट्रीय महासचिव वाई0एस0 लोहित ने गांधी भवन में आयोजित स्मृति सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमारी न्याय व्यवस्था में जो कमियां आयी है वह व्यवस्थागत है जिनको दूर किया जाना आवश्यक है।


स्मृति सभा को जिला बार एसोसिएशन बाराबंकी एलडर्स कमेटी के अध्यक्ष अधिवक्ता जुबेर अंसारी ने कहा कि ‘‘कुंवर उमेश सिंह सटीक जिरह व बहस करते थे विधि विशेषज्ञ के साथ-साथ वह तीर अंदाजी के भी शौकीन थे।’’
सुप्रसिद्ध खिलाड़ी हाजी सलाउद्दीन ने कुंवर उमेश सिंह के खेल प्रेम को उजागर किया इन्कलाब के ब्योरो चीफ सुप्रसिद्ध पत्रकार मो0 तारिक खान ने कहा कि ‘‘अधिवक्ता कुंवर उमेश सिंह से हमारे पारिवारिक सम्बन्ध थे और वह गुणों के खान थे।’’
स्मृति सभा को उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मुस्तफा खान श्याम सुन्दर दीक्षित, विनय दास, डाॅ0 एस0एम0 हैदर, अनिल निगम, बलराम पाण्डेय, उपेन्द्र सिंह, पंकज अवस्थी, अरविन्द वर्मा, बृजमोहन वर्मा, नरेन्द्र वर्मा पूर्व महामंत्री, हुमायू नईम खान, पंडित राजनाथ शर्मा आदि ने सम्बोधित किया। बृजेश कुमार दीक्षित पूर्व अध्यक्ष, सुरेन्द्र प्रताप सिंह ‘बब्बन’, विजय प्रताप सिंह, पुष्पेन्द्र सिंह, निर्मल वर्मा, नीरज वर्मा, गिरीश चन्द्र, भूपेन्द्र पाल सिंह, राजेन्द्र बहादुर सिंह, श्याम सिंह, राजकुमार सिंह, नरेन्द्र वर्मा, अंकुल वर्मा, गौरी रस्तोगी, प्रवीण कुमार, शिवदर्शन वर्मा, मो0 कदीर, अंशुलता मिश्रा, अशोक कुमार वर्मा मो मोहतसिम व चन्द्र शेखर आदि प्रमुख लोग थे। सभी लोगों ने उनके चित्र पर मल्यार्पण भी किया।
स्मृति सभा की अध्यक्षता पवन कुमार वैश्य, संचालन विभव मिश्रा तथा आयोजन रणधीर सिंह सुमन ने किया था ।

Read Full Post »

गरीब-मजदूरों के साथ नहीं हैं माेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलत नीतियों के कारण इस समय देश की हालत खराब है। किसानों, ग्रामीणों सहित महिलाओं की हालत बहुत ही खराब है। ये बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के महासचिव डी राजा ने कही। वे भारतीय खेत मजदूर यूनियन के दो दिवसीय ऑल इंडिया जनरल काउंसिल के अधिवेशन में बोल रहे थे 

अधिवेशन में बोलते सीपीआइ के महासचिव डी राजा। जागरण

सीपीआइ के महासचिव डी राजा ने कहा कि देश के किसान-मजदूरों की हालत बहुत खराब है। वे भारतीय खेत मजदूर यूनियन के दो दिवसीय ऑल इंडिया जनरल काउंसिल के अधिवेशन में बोल रहे थे। उन्‍होंने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा।

गरीब-मजदूरों के साथ नहीं हैं माेदी

डी राजा ने कहा कि मोदी देश की जनता से कहते है कि वे सेवक हैं। लेकिन वे जनता के नहीं बल्कि काॅरपोरेट घराने के सेवक हैं। उन्हें किस प्रकार से लाभ मिले ये देखते हैं। वे मजदूरों व गरीबों के सेवक नही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि सबका साथ, सबका विकास। इसका मतलब क्या है। प्रधानमंत्री गरीब-मजदूर व किसानों के साथ नहीं है।  केवल पैसे वालों और बड़े-बड़े कारपोरेट घराने के मालिकों के साथ हैं। हमारे देश के अंदर रहने वाले मजदूर व किसान गरीबी के अंदर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

भाजपा को हराने के लिए हो जाएं एकजुट

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के महासचिव डी राजा ने कहा कि आने वाले समय में पांच राज्यों में चुनाव होना है। उसकी तारीख भी चुनाव आयोग ने घोषित कर दी है। अब जरूरत भाजपा को हराने के लिए एकजुट होने की है। उसके बाद देश में लोगों को नई सरकार चाहिए। इसके लिए भी अभी से ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। अधिवेशन में महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा, पेरिया सामी, गुलजार सिंह गोडिया, नागेंद्र नाथ ओझा सीताराम शर्मा, कृष्णदेव यादव आदि उपस्थित थे। बैठक में देश के 17 राज्यों के कुल 81 जनरल काउंसिल के सदस्य भाग ले रहे हैं।

Read Full Post »

विद्या कानूगा या मुंशी का जन्म एक गुजराती परिवार में 5 दिसंबर 1919 को बंबई में हुआ था। उनके पिता वकील थे और माता सामाजिक कार्यकर्ता। स्कूल परीक्षा में लड़कियों में उनका स्थान प्रथम आया था। इसके बाद उन्होंने बंबई के एलफिन्स्टन कॉलेज में आई.एस.सी.में दाखिला लिया। 1938 में उन्होंने मेडिसिन पढ़ने इंगलैंड जाने का फैसला किया। उनके इस फैसले का परिवार के अंदर और बाहर काफी विरोध हुआ। लेकिन उनकी नानी ने उनके समर्थन में दृढ़ स्थिति अपनाई और कहाः ‘‘उसे क्यों नहीं जाना चाहिए? उसके पिता के पास पैसा है और लड़की के पास बहादुरी है।’’ उन दिनों ऐसे कामों में काफी साहस की जरूरत हुआ करती थी इंगलैंड मेंः कम्युनिज्म की ओर विद्या को उसके चाचा ने राजनीति से परिचित कराया। उसके पिता ने उसे पुस्तकों से परिचित कराया। विद्या 1938 में इंगलैंड पहुंची। जब तक वह प्र्री-मेडिकल परीक्षाओं के लिए तैयार होती, द्वितीय विश्वयु( छिड़ चुका था। इसलिए भारत लौटने के बजाय उसने न्यूकासल, डरहम में किंग्स कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहीं उसका परिचय कम्युनिस्ट विचारधारा से हुआ। तीन वर्षोंं बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और वहीं पूरा वक्ती कार्यकर्ता बन गई। वह ‘फेडिंड’ ;फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स इन ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड की सचिव बन गई। वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य भी बन गई। वह भारतीय कमयुनिस्टों और राष्ट्रवादियों के संपर्क में आई। वह वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेने लगी।खासकर फासिज्म-विरोधी कार्यक्रमों में वह सक्रिय रहती। पोस्टरों के जरिए संघर्ष 1943 में विद्या कानूगा ‘पोस्टरों’ की दुनिया से वाकिफ हुई। उनके और उसके मित्रों ने शेफील्ड ;इंगलैंड में प्रथम पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की। इसमें बंगाल के महा-अकाल में पीड़ित जनता का दुख-दर्द प्रदशि्र्ात किया गया था। इससे प्राप्त पैसे अकाल-पीड़ित लोगों के लिए भारत भेजे गए। विद्या कहती हैः ‘‘तब से मैंने विभिन्न विषयों पर कई पोस्टर बनाए हैंः महिला और युवा प्रश्नों पर, मजदूरों की छंटनी पर, सांप्रदायिक शांति के बारे में। पोस्टर की दृश्य शक्ति को कम के नहीं आंका जा सकता।’’अधिकतर पोस्टर इतिहास के गर्त में लुप्त हो चुके हैं।1 मार्च 2014 को कलकत्ता में एक पोस्टर प्रदर्शनी लगी जिसमें विद्या मुंशी प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित की गईं। यह उचित ही था और वे एक ‘व्हील चेयर’ पर बैठकर आईं। उन्हें चारों ओर से युवा महिलाओं ने घेर लिया जो उनसे बातें करना चाहती थीं और उन्हें सुनना चाहती थीं। इस प्रकार की प्रदर्शनी शायद विश्व भर में पहली बार लगी। ‘स्वयं‘, ‘जुबान’, ‘सी-गल’फाउंडेशन जैसे संगठनों ने इसे आयोजित किया था। इसमें 157 असाधारण पोस्टर प्रदर्शित किए गए थे। उनकी व्यापक दृष्टि ने सभी को आकर्षित कर लिया। विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना, 1945 वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डेमोक्रेटिक यूथ ;डब्ल्यू.एफ.डी.वाई.या विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना लंदन में अक्टूबर-नवंबर 1945 में उद्घाटन सम्मेलन में की गई। विद्या ने उसमें ए.आईएस.एफऔर ‘फेडिन्ड’ के प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया। सम्मेलन में 67 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।भारत से विद्या कानूगा के अलावा केवायूं बूमला और ए.एच.सादर भी शामिल हुए। एम.राशीद पर्यवेक्षक थे। वे सभी‘फेडिन्ड’ की ओर से शामिल हुए।विद्या कानूगा विश्व युवा सम्मेलन के कमिशन नं.3 की सचिव भी चुनी गई। इस कमिशन के अध्यक्ष चेकोस्लोवाकिया के डॉ. हाएक थे। कमिशन का विषय थाः ‘‘स्थाई और टिकाऊ शांति कीस्थापना में युवाओं की भूमिका’’। डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. की परिषद की प्रथम बैठक पैरिस में 19 जुलाई से5 अगस्त 1946 को आयोजित की गई। विद्या कानूगो इसमें भी शामिल हुईं। उन्हें वहां गठित ‘औपचारिक ब्यूरो’का सचिव बनाया गया । यह तय पाया गया कि खाद्यों के बंटवारे में भारत को प्राथमिकता दी जाय।विद्या कानूगा ने विश्व महिला जनवादी फेडरेशन ;वीमेन्स इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन-डब्ल्यू.आई.डी.एफ. के संस्थापना सम्मेलन में पैरिस,1945 में भी भाग लिया। उनके साथ भारत से महिला आत्मरक्षा समिति की ओर से इला रीड ने भी भाग लिया।यह सम्मेलन 26 नवंबर से 1 दिसंबर 1945 को वेलोड्रोम ‘डी’ हाइवर;विन्टर स्टेडियम में संपन्न हुआ। यहविशाल उद्घाटन समारोह था।विद्या कानूगा 1948 में भारतलौट आईं। वे उस वक्त डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।उन्होंने फरवरी 1948 में कलकत्ता में आयोजित दक्षिण-पूर्वी एशियाई युवा सम्मेलन की तैयारी समिति में हिस्सालिया।महिला आंदोलन औरपत्रकारिता के क्षेत्रों मेंविद्या मुंशी ने एन.एफ.आई.डब्ल्यू.;भारतीय महिला फेडरेशन के स्थापना सम्मेलन, कलकत्ता, 1954 में सक्रिय हिस्सा लिया। वे इसके प्रेस संपर्क समिति में थीं। इस प्रकार वे भारतीय महिला फेडरेशन की संस्थापकों में थीं। वे काफी समय तक इसकी कार्यकारिणी की सदस्य भी चुनी गई, जैसे 1973 और 1999 में।इंगलैंड से लौटने के बाद उनका विवाह सुप्रसि( पत्रकार और भूगर्भशास्त्री सुनील मुंशी से हुआ।सुनील पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे और बंबई से प्रकाशित ए.आई.एस.एफ की पत्रिका ‘द स्टूडेंट’ के संपादक भी रहे। विद्या भी उसमें लिखती रहीं।विद्या की बंगला भाषा की जानकारी बहुत अच्छी नहीं थी। फिर भी उन्हें ‘चलार पथे’’ नामक बंगला पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने कड़ी मेहनत करके जल्द ही भाषा सीख ली।इस बीच वे सुप्रसि( अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ की कलकत्ता संवाददाता बन गईं। यह काम उन्होंने 1952 से 1962 तक किया। विद्या मुंशी को सामान्यतः भारत की प्रथम महिला पत्रकार के तौर पर जाना जाताहै।ब्लिट्ज में काम के दौरान उन्होंने कई असाधारण ‘स्टोरीज’ खोज निकालीं। एक थी दो कनाडियन पायलटों के बारे में जो हांगकांग से सोने की तस्करी करके सुंदर बन के जंगलों में गिराने वाले थे। फिर नावोंसे उसे कलकत्ता लाने की योजना थी। दूसरा ‘स्कूप’ था आसनसोल में चिनाकुरी खदानों में दुर्घटना के बारे में। इसमें सैंकड़ों खदान मजदूरों की जानें गईं। सुप्रसि( रंगकर्मी उत्पल दत्त ने इस विषय पर ‘अंगार’ नामक नटक का मंचन किया। उन दिनों पत्रकारिता काफी कठिन हुआ करती थी। एक बार 1953 में पुलिस ने पत्रकारों की जमकर पिटाई कर दी। विद्या मुंशी की भी खूब पिटाई हुई। वे ट्राम के किरायों में वृ( का आंदोलन रिपोर्ट कर रही थीं। पुलिस ने उनसे खूब पूछताछ की लेकिन विद्या ने ‘ब्लिट्ज’ को फंसने नहीं दिया। पुलिस के अत्याचारों की जांच के लिए जस्टिस पी.बी. मुखर्जी कमिशन बिठाया गया। महिला समस्याओं का अध्ययन विद्या मुंशी 1954-55 से ही महिला आंदोलन में सक्रिय भाग लेने लगीं। वे बंगला भाषा में इतनी तेज हो गईं कि महिला आंदोलन के संबंध में वे अक्सर बंगला में ही लिखतीं। उन्होंने प. बंगाल में महिलाओं की स्थिति; 1970-2000 नामक रिपोर्ट के लिए महिलाओं की हिस्सेदारी के संबंध में एक अध्याय लिखा। ‘राजनैतिकि हिस्सेदारी’’ संबंधी यह अध्याय तथ्यों से भरा हुआ है। उन्होंने विस्तृत संस्मरण लिखा है जिसका शीर्षक है ‘‘इन रिट्रोस्पेक्टःवार-टाइम मेमोरीज एंड थॉट्स ऑनवीमेन्स मूवमेंट’ ;यु(काल संबंधी कुछ संस्मरण और महिला आंदोलन के बारेमें कुछ विचारद्ध। वे पश्चिम बंग महिला समिति की अध्यक्ष, भारतीय महिला फेडरेशन की 1986 से 1989 तक राष्ट्रीय सचिव एवं कई वर्षोंं तक फेडरेशन की कार्यकारिणी सदस्य रहीं।महिला आंदोलन संबंधी उनके विचार बड़े ही व्यापक थे। शमिता सेन को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा : ‘‘अब गांधीवादी, मार्क्सवादी और नारीवादी महिला प्रश्नों पर एक दूसरे से सहयोग करते हुए काम कररहे हैं। हम साथ मिलकर काम कर सकते हैं और करना चाहिए।’’ 1994 में उन्होंने एक पुस्तिका लिखी। जिसका शीर्षक थाः ‘परिवार को जनवादी बनाओःइसके अधिकारां का फैलाव एवं इसकी रक्षा करो’। इसके अलावा उन्होंने भारतीय महिला फेडरेशन का एक संक्षिप्त इतिहास भी लिखा है।विद्या मुंशी का एक पत्रकार के रूप में चित्रण 10 एपिसोड वाले एक वेब-सीरिज में भी किया गया है। यह 1959 के सुप्रसि( नानावटी मर्डरकेस से संबंधित है। इसका शीर्षक है‘‘द वर्डिक्टः स्टेट वर्सेज नानावटी’;नानावटी केस के फैसले के बारे मेंद्ध। विद्या मुंशी ने विभिन्न विषयों पर बहसों, चर्चाओं और विवादों में भाग लिया जिनमें महिला आंदोलन, नारीवाद से लेकर अंतर्राष्ट्रीय विषय शामिल थे। वे प. बंगाल पार्टी के दैनिक अखबार‘कालान्तर’ के बोर्ड की सदस्य थी। वे राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की प्रमुख भी थीं, साथ ही वे महिलाकमिशन में भी थीं। उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर महिला संगठन और आंदोलन के जनवादी करण के लिए निरंतर संघर्ष किया। उन्होंने ‘इप्टा’ के लिए भी लिखा। अपने अंतिम वर्षोंं में वे लकवे से आंशिक रूप से ग्रसित रहीं। सन 2002 में उन्हें मस्तिष्क का पक्षाघात हुआ। फिर भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा। वे घंटों कुर्सी पर बैठे पढ़ा करतीं और दस्तावेजों का अध्ययन किया करतीं। इसके लिए मोटा चश्मा और ‘मैग्निफांइग ग्लास’ का प्रयोग करतीं। वे बांए हाथ से नोट्स लिया करतीं। उन्होंने महिला आंदोलन के विषय में काफी तथ्य और आंकड़े इकट्ठा किए। उन्होंने महिला तथा पार्टी आंदेलन से संबंधित इतिहास और दस्तावेजी तथ्य सुनील मुंशी को ‘डिक्टेट’ कराए। सुनील ने विस्तार सेडिक्टेशन लिया।विद्या मुंशी की मृत्यु 8 जुलाई2014 को लंबी बीमारी के बाद कलकत्ते में 94 वर्ष की आयु में होगई।

Read Full Post »

बाराबंकी। देश की जन विरोधी केन्द्र सरकार ने देश व देश की जनता को बरबाद करने पर उतारू है, चाहे किसान हो, मजदूर हो, छात्र हो, महिलाएं हो, बेरोजगार हों, गरीब हो, सबके अहित के लिए अभियान चला रखा है। किसानों की बरबादी के लिए कृषि कानून 2020 जबरन लागू कर रही है, जिसके विरोध में किसान दिल्ली की सीमाओं पर 80 दिनों से धरना दे रहे हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था चैपट है, बेरोजगारों को नौकरी नहीं है, पढ़ाई इतनी महंगी हो गयी है कि गरीब आदमी अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकता है, श्रमिक हित के कानून समाप्त किये जा रहे हैं। देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियां तेजी से अपने चहेते उद्योगपतियों को बेच रही है। देश की संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है, सरकार इनका अपने विरोधियों को डराने और दबाने के लिए दुरूपयोग कर रही है। इसी तरह डीजल, पेट्रोल और एल0पी0जी0 सिलेंडर की कीमत भी आसमान छू रही है, जब देश में कच्चा तेल 150 डालर प्रति बैरल था तब डीजल 54 रूपये लीटर, पेट्रोल 80 रूपये लीटर तथा एलपीजी सिलेंडर 424 रूपये में था और अब कच्चा तेल 50 डालर प्रति बैरल है तब डीजल 80 रूपये, पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर, एलपीजी सिलेंडर 780 रूपये तक पहुंच गया है, जिससे आमजन की रसोई पर विपरीत असर पड़ रहा है, डीजल के दामों की वृद्धि की वजह से देश में यातायात, कृषि क्षेत्र, ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र में लागत बढ़ेगी, यातायात और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमत बढ़ेगी, जिससे आम जनता का महंगाई से जीना दूभर हो जायेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा और मांग की कि- डीजल पेट्रोल पर सभी उपकर तत्काल हटाये जाये, पेट्रोलियम पदार्थ को वैट से हटाकर जी0एस0टी0 के दायरे में लाया जाये। तीनों काले कानून कृषि बिल रद्द किया जाये। एम0एस0पी0 की गारंटी का कानून बनाया जाये। किसान आन्दोलन में शामिल किसानों और आन्दोलन का समर्थन करने वालों को प्रताड़ित करना बंद किया जाये।
ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में रणधीर सिंह सुमन, सदस्य राज्य परिषद बृजमोहन वर्मा,जिला सचिव शिवदर्शन, सह सचिव प्रवीण कुमार कोषाध्यक्ष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विनय कुमार सिंह,अध्यक्ष किसान सभा गिरीश चन्द्र, रामनरेश, आशीष शुक्ला, संदीप तिवारी, अंकुल वर्मा, श्याम सिंह ,गाजी अमान अधिवक्ता आदि थे।

Read Full Post »

बाराबंकी। सरकार किसानों के खून से होली खेल रही है, किसान आन्दोलन में अब तक लगभग 300 किसानों की मौत हो चुकी है, सरकार संवेदनहीन हो चुकी है, यह आरोप लगाते हुए आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने ग्राम पंचायत बस्ती में किसानों की श्रद्धांजलि सभा में कहा कि सरकार किसान विरोधी है लेकिन यह आन्दोलन गांव-गांव फैल चुका है, कानून वापस लेने होंगे।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किसानों के चित्र के ऊपर पुष्पांजलि करते हुए कहा कि किसान किसी भी कीमत पर दबने वाला नहीं है, चुनाव में सत्तारूढ़ दल हम दो हमारे दो ही बचेगी।
किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि कृषि क्षेत्र के तीनों कानूनों को सरकार को समाप्त कर इस देश की रक्षा करना चाहिए, किसान मजदूर नहीं रहेगा तो देश नहीं रहेगा, देश नागरिकों से होता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन को पार्टी का पूरा समर्थन है और पार्टी किसी भी कीमत पर अपने पैर वापस नहीं लेगी। वहीं पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो बाराबंकी का भी किसान दिल्ली जायेगा।
श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता छेतर सिंह ने की तथा संचालन राम विलास वर्मा ने किया श्रद्धांजलि सभा का आयोजन नैमिष कुमार सिंह ने किया था। सभा में गिरीश चन्द्र, रामनरेश माती, दिलीप सहित सैकड़ों किसान नेता मौजूद थे।

Read Full Post »

Older Posts »