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Archive for the ‘loksangharsha’ Category

गिरफ्तार हुईं कल्पना

 कल्पना दत्त (बाद में कल्पना जोशी )का जन्म 27 जुलाई 1913 को श्रीपुर, बोउल खाली उपजिला, चटगांव जिला, बंगाल प्रदेश ;अब बांग्लादेश में हुआ था। श्रीपुर मात्र 300 घरों का छोटा-सा गांव था। उनका परिवार पुरातनपंथी
परम्परावादी विचारों का बड़ा जमींदार परिवार था। कल्पना के पिता विनोद बिहारी दत्त थे और माता का नाम
शोभना देवी। परिवार शिक्षित था और इसके सदस्य बाद में स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गए।

शिक्षा और राजनैतिक सक्रियता

 कल्पना की आरंभिक शिक्षा घर पर हुई। उसके बाद उसे डॉ. खास्तगीर बालिका हाई स्कूल में दाखिल करा दिया गया। यह स्कूल परिवार के ही कुछ सदस्यों ने स्थापित किया था। कल्पना पढ़ाई में बड़ी तेज थी और हमेशा अव्वल आया करती। उसने सुप्रसिद्ध  बंगला पुस्तक ‘‘पथेर दाबी’ पढ़ ली, साथ ही कन्हाईलाल तथा कई क्रांतिकारियों की जीवनियां भी पढ़ीं। उसक दो चाचा गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। इसका
उस पर बड़ा असर पड़ा। कल्पना को विज्ञान का बड़ा शौक था। महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय को वह अपना आदर्श मानती थी। कल्पना संस्कृत और गणित में भी बहुत तेज थी।
समय के साथ उसके परिवार में राजनैतिक मतभेद पैदा हो गए। गांधी जी चटगांव आए और इस परिवार की
कपड़े की दुकान पर बंग लक्ष्मी मिल्स के स्वदेशी कपड़े रख गए। परिवार की कई स्त्रियां गांधी का ‘दर्शन’ करने
गईं, यहां तक अपने गहने तक उन्हें दान कर आईं।
कल्पना ने 1929 में चटगांव से मैट्रिक पास किया। उसी वर्ष वहां एक विद्यार्थी सम्मेलन आयोजित किया गया
जिसमें कल्पना ने अपने चाचा की सहायता से भाषण भी दिया। चटगांव के नौजवान क्रांतिकारी संगठनों में
संगठित होने लगे। उसके एक सदस्य पूर्णेन्दु दस्तीदार कल्पना के घर आने-जाने लगे। कल्पना धीरे-धीरे
प्रशिक्षित होने लगी।
कल्पना ने कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में भर्ती ले ली। उसके विषय थे भौतिक शास्त्र, गणित और वनस्पति
शास्त्र। साथ ही उसने व्यायाम, बोटिंग, इ. भी सीखी। उसने हिन्दी और फ्रेंच का भी अध्ययन किया। जल्द ही उसका संपर्क सूर्यसेन, अनंत सिंह, गणेश घोष तथा अन्य प्रसिद्ध  क्रांतिकारियों से हुआ।
उसने लाठी, छुरा, इत्यादि चलाने में ट्रेनिंग पाई।
कल्पना ने अप्रैल 1930 में जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए बेथ्यून कॉलेज मे हड़ताल संगठित की। कॉलेज की महिला प्रिंसिपल ने विद्यार्थियों से दुर्व्यवहार किया। बाद में प्रिंसिपल को माफी मांगनी पड़ी।
कल्पना दत्त ’छात्री संघ’ ;गर्ल स्टूडेंट ऐसोसिएशनमें शामिल हो गई। यह एक अति-क्रांतिकारी संगठन था
जिसमें बीना दास और प्रीतिलता व द्देदार जैसी क्रांतिकारी छात्राएं शामिल थीं।
चटगांव शस्त्रागार पर हमला
क्रांतिकारी युवाओं ने 18 अप्रैल 1931 को चटगांव के ब्रिटिश शस्त्रागार पर हमला कर दिया। इस खबर ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया। खबर तेजी से फैल गई। कल्पना जल्द से जल्द चटगांव चली जाना चाहती थी लेकिन उसे कॉलेज से ट्रांसफर नहीं मिल रहा था। काफी समय बर्बाद हो गया जिसका उसकी पढ़ाई पर असर पड़ा। वह प्राइवेट छात्र के रूप में परीक्षा में बैठी। उसका सेंटर चटगांव में ही पड़ा। कल्पना ने चटगांव कॉलेज में बी.एस.सी. में एडमिशन ले लिया।
वह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए अधीर हो रही थी। उसने पिस्तौल तथा अन्य हथियारों की ट्रेनिंग लेना अधिक सक्रियता से लेना शुरू कर दिया। अपने मैट्रिक के दिनों मे कल्पना एक कम्युनिस्ट साथी के संपर्क में आ चुकी थी जिसका नाम था सुरभा दत्त। इससे उसके विचार बनने लगे थे। कल्पना ने अनन्त सिंह को, जो क्रांतिकारी दल के नेताओं में से एक थे, दल में शामिल होने पर मजबूर कर दिया। उसे रेलवे लाइन उड़ाने के
ग्रुप में शामिल कर लिया गया। इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के सूर्य सेन ने कल्पना दत्त को कलकत्ते से एसिड, रसायन तथा अन्य सामग्री का इंतजाम करने के लिए कहा। कल्पना खुद यह सारा सामान ले आई। वह विस्फोटक तैयार करने की विशेषज्ञ बन गई। उसे ‘एक्शन स्क्वाड’ में शामिल कर लिया गया।
जेल को बम से उड़ने की पहली कोशिश असफल रही। जेल में दिनेश गुप्ता और रामकृष्ण बिस्वास को फांसी
दी जाने वाली थी। कल्पना को 17 दिसंबर 1932 को चटगांव के पहाड़ तली में स्थित योरपियन क्लब के पास से गिरफ्तार कर लिया गया। वह पुरुष वेश में घूम रही थी। इसके एक सप्ताह बाद ही प्रीतिलता वद्देदार
के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने क्लब पर हमला कर दिया। यह हमला जलालाबाद के उस नरंसहार के बदले
में था जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने कई युवाओं की हत्या कर दी थी। प्रीतिलता गंभीर रूप से घायल हो गई और पकड़े
जाने से बचने के लिए उसने सायनाड खाकर आत्महत्या कर ली। प्रीतिलता कल्पना दत्त की सहपाठिनी और
क्रांतिकारी दल में सहयोगिनी थी। पुलिस ने कल्पना को उक्त कांड में फंसाने की कोशिश की लेकिन सबूतों
के अभाव में उसे जमानत पर छोड़ दिया गया। उसे अपने घर में बंदी बनाकर चारों ओर पुलिस का पहरा
बिठा दिया गया। उसे घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।
फिर भी कल्पना मौका पाते ही घर से भाग निकली। उनके पिता को काम से निकाल दिया गया और घर पर
छापा मारकर सारा सामान जब्त कर लिया गया।
कल्पना और सूर्यदा

सूर्यसेन किसी तरह रात और दिन में छिपते तथा भागते रहे और पुलिस के जाल से बचते रहे। इसी दौरान वह पुलिस फायरिंग में घायल हो गई। वह और मणिन्द्र दत्त पूरे दो घंटे एक तालाब के पानी में छिपे रहें। फिर भी वह भागती गई। आखिरकार उसे चटगांव के पास समुद्री किनारे एक छोटे-से कस्बे से गिरफ्तार कर लिया गया।
कल्पना और कई अन्य साथियों को पकड़कर पुलिस ले गई। एक पुलिस अफसर ने उसे थप्पड़ मारा। इस पर
वहां उपस्थित फौजी कमांडर ने थप्पड़ मारने वाले को डांटते हुए कहाः ‘‘उसे उचित सम्मान दो।’’ कल्पना पुलिस
और फौजी अधिकारियों के बीच बड़ी लोकप्रिय हो गई।
सूर्यसेन और तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी की सजा सुनाई गई जबकि कल्पना दत्त को आजन्म कारावास की
सजा मिली। विशेष ट्रिब्यूनल जज ने कहा कि वह सिर्फ 18 वर्ष की थी। उसे अंडमान में काला पानी की सजा
के लिए भेजा जाने वाला था लेकिन महाकवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने हस्तक्षेप कर रुकवा दिया। उसे पहले तो हिजली
और राजशाही जेलों में भेजा गया, फिर सितंबर 1934 से अक्टूबर1935 तक मेदिनीपुर जेल में रखा गया। फिर
दिनाजपुर जेल और उसके बाद मेदिनीपुर जेल में वापस लाया गया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
कल्पना दत्त और अन्य कैदियों की रिहाई के लिए आंदोलन जोर पकड़ता गया तथा सरकार पर दबाव बढ़ता
गया। 1938-39 में कैदियों की रिहाई का आंदोलन तेज हो गया। इसके अलावा गांधीजी और टैगोर ने भी दबाव
बनाया। फलस्वरूप कल्पना दत्त तथा कई अन्य को 1 मई 1939 को रिहा कर दिया गया।
रिहाई के बाद कल्पना को रविन्द्रनाथ टैगोर की ओर से पत्र मिला। इसमें उन्होंने कल्पना को उसके भविष्य के कर्तव्यों का ध्यान दिलाते हुए उसे आशीर्वाद दिया।
कल्पना के अधिकतर साथी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो चुके थे। अभी कल्पना पशोपेश में थी। वह वेदान्त
और गीता के आध्यात्मिक प्रभाव में भी थी। साथ ही उसे कम्युनिस्टों के विचार जरा ज्यादा ही सिधान्तिक लगते थे। उसे महसूस हो रहा था कि ‘जनता के बीच’ काम होना चाहिए। कोई भी कॉलेज कल्पना दत्त को एडमिशन देने
को तैयार नहीं था। आखिरकार उसने 1940 में बी.ए. पास किया ओर एम. ए.;गणित में एडमिशन लिया।
1940-41 में उसे फिर ‘गृह-बंदी’ में रखा गया वापस कलकत्ता लौटकर उसने ‘अध्ययनमंडली’ का गठन किया। साथ ही हस्तलिखित पत्रिका ‘पथेय’ निकालना शुरू किया। उसने लगभग सौ सदस्यों वाली एक नारी समिति भी गठित की।
उसने ‘रात-दिन’ स्कूल स्थापित किए। उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चटगांव पर जापानियों द्वारा बमबारी के दौरान रक्षा-उपायों संबंधी काम किया। इस संदर्भ में उसने महिला आत्मरक्षा समिति’ के गठन में भाग लिया। इस बीच वह दो बार टाइफायड से गंभीर रूप से बीमार हुई।
कल्पना को अब जनता के बीच काम करने के कई अवसर मिले। उसने संथाल मजदूरों, आदिवासियों, सफाई
श्रमिकों, धोबियों, इ. तबकों के बीच, उनकी झुग्गियों में जाकर बहुत सक्रियतासे काम किया। इसके अलावा उसने
1943 के बंगाल में पड़े महा-अकाल में बड़ा काम किया। उसे किसान सभा में भी काम करने का मौका मिला।
कलकत्ता में उसने ट्रामवे तथा अन्य मजदूरों के बीच सक्रिय काम किया।
वह ट्रामवे वर्कर्स यूनियन के ऑफिस में होलटाइमर बन गईं।
इन कार्योंं के दौरान कल्पना दत्त कम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गईं। उन्हें 1942 में, जब वे
टाइफायड से बीमार थीं, सूचना दीगई कि उन्हें भा.क.पा. का सदस्य बना लिया गया है।
दिसंबर 1942 में कल्पना पार्टी स्कूल में भर्ती होने बंबई गईं। वहां उनकी मुलाकात पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी से हुई। उन्हें प्रादेशिक स्तर पर पार्टी संगठनकर्ता बनाया गया।
उनकी चार बहनें भी पार्टी की सदस्य बन गईं। अगस्त 1943 में पी.सीजोशी और कल्पना दत्त की शादी हो गई।
कल्पना जोशी ने कई जनसंघर्षोंं का नेतृत्व किया और कई अन्य में भाग लिया। इनमें से एक था जनवरी 1946 में चटगांव के पाटिया में हड़तालें और प्रदर्शन। यह ब्रिटिश सिपाहियों द्वारा किए गए अत्याचारों के विरोध में था। कल्पना और उसके साथियों ने इनका नेतृत्व किया।
1946 में कल्पना जोशी ने भाक. पा. उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान सभा के लिए चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

कल्पना जोशी 1948 में अंडरग्राउंड चली गईं। 1951 में जब पार्टी पर से पाबंदी हटाई गई तो उन्हें वित्तीय एवं राजनैतिक कारणों से नौकरी करनी पड़ गई। उन्हें प्रो. पी.सीमहालनोबिस के तहत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीच्यूट में काम मिल गया। उन्होंने मुख्यतः नेशनल सैम्पल सर्वे ;एन.एस.एस. में काम किया। वे इंस्टीच्यूट ऑफ स्टडीज इन रश्शियन लैंग्वेज की संस्थापक-डाइरेक्टर भी थीं। उन्होंने ‘चिटगांग आर्मरीरेडर्सःरेमिनिसेन्सेज’ ;चटगांव शस्त्रगार कांड के साथियों के संस्मरण नाम से आत्म-कथात्मक पुस्तक भी लिखी। इसे अंग्रेजी में पी.सी. जोशी और निखिल चक्रवर्ती ने अनूदित किया। जोशी ने इसकी भूमिका भी लिखी। कल्पना ने लिखाः ‘‘हमें अपने स्कूली दिनों में अपने भविष्य का कोई खाका स्पष्ट नहीं था। और तब झांसीं की रानी की कहानी ने हमें प्रेरित कर दिया।’’ कल्पना दत्त जोशी की मृत्यु 5 फरवरी 1995 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले

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बाराबंकी। कुंवर उमेश सिंह विधि व्यवस्था के स्वर्णिम युग के स्वर्णिम व्यक्तित्व के स्वामी थे विधि के क्षेत्र को उन्होंने समृद्धि किया आज जरूरत इस बात की है कि विधि व्यवसाय को पुनः नई ऊचांईयों पर ले जाने की जरूरत है इसलिए अधिवक्ता कुंवर उमेश सिंह के चरित्र को अपनाना पड़ेगा।
यह विचार इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स के राष्ट्रीय महासचिव वाई0एस0 लोहित ने गांधी भवन में आयोजित स्मृति सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमारी न्याय व्यवस्था में जो कमियां आयी है वह व्यवस्थागत है जिनको दूर किया जाना आवश्यक है।


स्मृति सभा को जिला बार एसोसिएशन बाराबंकी एलडर्स कमेटी के अध्यक्ष अधिवक्ता जुबेर अंसारी ने कहा कि ‘‘कुंवर उमेश सिंह सटीक जिरह व बहस करते थे विधि विशेषज्ञ के साथ-साथ वह तीर अंदाजी के भी शौकीन थे।’’
सुप्रसिद्ध खिलाड़ी हाजी सलाउद्दीन ने कुंवर उमेश सिंह के खेल प्रेम को उजागर किया इन्कलाब के ब्योरो चीफ सुप्रसिद्ध पत्रकार मो0 तारिक खान ने कहा कि ‘‘अधिवक्ता कुंवर उमेश सिंह से हमारे पारिवारिक सम्बन्ध थे और वह गुणों के खान थे।’’
स्मृति सभा को उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मुस्तफा खान श्याम सुन्दर दीक्षित, विनय दास, डाॅ0 एस0एम0 हैदर, अनिल निगम, बलराम पाण्डेय, उपेन्द्र सिंह, पंकज अवस्थी, अरविन्द वर्मा, बृजमोहन वर्मा, नरेन्द्र वर्मा पूर्व महामंत्री, हुमायू नईम खान, पंडित राजनाथ शर्मा आदि ने सम्बोधित किया। बृजेश कुमार दीक्षित पूर्व अध्यक्ष, सुरेन्द्र प्रताप सिंह ‘बब्बन’, विजय प्रताप सिंह, पुष्पेन्द्र सिंह, निर्मल वर्मा, नीरज वर्मा, गिरीश चन्द्र, भूपेन्द्र पाल सिंह, राजेन्द्र बहादुर सिंह, श्याम सिंह, राजकुमार सिंह, नरेन्द्र वर्मा, अंकुल वर्मा, गौरी रस्तोगी, प्रवीण कुमार, शिवदर्शन वर्मा, मो0 कदीर, अंशुलता मिश्रा, अशोक कुमार वर्मा मो मोहतसिम व चन्द्र शेखर आदि प्रमुख लोग थे। सभी लोगों ने उनके चित्र पर मल्यार्पण भी किया।
स्मृति सभा की अध्यक्षता पवन कुमार वैश्य, संचालन विभव मिश्रा तथा आयोजन रणधीर सिंह सुमन ने किया था ।

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गरीब-मजदूरों के साथ नहीं हैं माेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलत नीतियों के कारण इस समय देश की हालत खराब है। किसानों, ग्रामीणों सहित महिलाओं की हालत बहुत ही खराब है। ये बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के महासचिव डी राजा ने कही। वे भारतीय खेत मजदूर यूनियन के दो दिवसीय ऑल इंडिया जनरल काउंसिल के अधिवेशन में बोल रहे थे 

अधिवेशन में बोलते सीपीआइ के महासचिव डी राजा। जागरण

सीपीआइ के महासचिव डी राजा ने कहा कि देश के किसान-मजदूरों की हालत बहुत खराब है। वे भारतीय खेत मजदूर यूनियन के दो दिवसीय ऑल इंडिया जनरल काउंसिल के अधिवेशन में बोल रहे थे। उन्‍होंने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा।

गरीब-मजदूरों के साथ नहीं हैं माेदी

डी राजा ने कहा कि मोदी देश की जनता से कहते है कि वे सेवक हैं। लेकिन वे जनता के नहीं बल्कि काॅरपोरेट घराने के सेवक हैं। उन्हें किस प्रकार से लाभ मिले ये देखते हैं। वे मजदूरों व गरीबों के सेवक नही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि सबका साथ, सबका विकास। इसका मतलब क्या है। प्रधानमंत्री गरीब-मजदूर व किसानों के साथ नहीं है।  केवल पैसे वालों और बड़े-बड़े कारपोरेट घराने के मालिकों के साथ हैं। हमारे देश के अंदर रहने वाले मजदूर व किसान गरीबी के अंदर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

भाजपा को हराने के लिए हो जाएं एकजुट

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के महासचिव डी राजा ने कहा कि आने वाले समय में पांच राज्यों में चुनाव होना है। उसकी तारीख भी चुनाव आयोग ने घोषित कर दी है। अब जरूरत भाजपा को हराने के लिए एकजुट होने की है। उसके बाद देश में लोगों को नई सरकार चाहिए। इसके लिए भी अभी से ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। अधिवेशन में महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव एनी राजा, पेरिया सामी, गुलजार सिंह गोडिया, नागेंद्र नाथ ओझा सीताराम शर्मा, कृष्णदेव यादव आदि उपस्थित थे। बैठक में देश के 17 राज्यों के कुल 81 जनरल काउंसिल के सदस्य भाग ले रहे हैं।

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विद्या कानूगा या मुंशी का जन्म एक गुजराती परिवार में 5 दिसंबर 1919 को बंबई में हुआ था। उनके पिता वकील थे और माता सामाजिक कार्यकर्ता। स्कूल परीक्षा में लड़कियों में उनका स्थान प्रथम आया था। इसके बाद उन्होंने बंबई के एलफिन्स्टन कॉलेज में आई.एस.सी.में दाखिला लिया। 1938 में उन्होंने मेडिसिन पढ़ने इंगलैंड जाने का फैसला किया। उनके इस फैसले का परिवार के अंदर और बाहर काफी विरोध हुआ। लेकिन उनकी नानी ने उनके समर्थन में दृढ़ स्थिति अपनाई और कहाः ‘‘उसे क्यों नहीं जाना चाहिए? उसके पिता के पास पैसा है और लड़की के पास बहादुरी है।’’ उन दिनों ऐसे कामों में काफी साहस की जरूरत हुआ करती थी इंगलैंड मेंः कम्युनिज्म की ओर विद्या को उसके चाचा ने राजनीति से परिचित कराया। उसके पिता ने उसे पुस्तकों से परिचित कराया। विद्या 1938 में इंगलैंड पहुंची। जब तक वह प्र्री-मेडिकल परीक्षाओं के लिए तैयार होती, द्वितीय विश्वयु( छिड़ चुका था। इसलिए भारत लौटने के बजाय उसने न्यूकासल, डरहम में किंग्स कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहीं उसका परिचय कम्युनिस्ट विचारधारा से हुआ। तीन वर्षोंं बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और वहीं पूरा वक्ती कार्यकर्ता बन गई। वह ‘फेडिंड’ ;फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स इन ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड की सचिव बन गई। वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य भी बन गई। वह भारतीय कमयुनिस्टों और राष्ट्रवादियों के संपर्क में आई। वह वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेने लगी।खासकर फासिज्म-विरोधी कार्यक्रमों में वह सक्रिय रहती। पोस्टरों के जरिए संघर्ष 1943 में विद्या कानूगा ‘पोस्टरों’ की दुनिया से वाकिफ हुई। उनके और उसके मित्रों ने शेफील्ड ;इंगलैंड में प्रथम पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की। इसमें बंगाल के महा-अकाल में पीड़ित जनता का दुख-दर्द प्रदशि्र्ात किया गया था। इससे प्राप्त पैसे अकाल-पीड़ित लोगों के लिए भारत भेजे गए। विद्या कहती हैः ‘‘तब से मैंने विभिन्न विषयों पर कई पोस्टर बनाए हैंः महिला और युवा प्रश्नों पर, मजदूरों की छंटनी पर, सांप्रदायिक शांति के बारे में। पोस्टर की दृश्य शक्ति को कम के नहीं आंका जा सकता।’’अधिकतर पोस्टर इतिहास के गर्त में लुप्त हो चुके हैं।1 मार्च 2014 को कलकत्ता में एक पोस्टर प्रदर्शनी लगी जिसमें विद्या मुंशी प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित की गईं। यह उचित ही था और वे एक ‘व्हील चेयर’ पर बैठकर आईं। उन्हें चारों ओर से युवा महिलाओं ने घेर लिया जो उनसे बातें करना चाहती थीं और उन्हें सुनना चाहती थीं। इस प्रकार की प्रदर्शनी शायद विश्व भर में पहली बार लगी। ‘स्वयं‘, ‘जुबान’, ‘सी-गल’फाउंडेशन जैसे संगठनों ने इसे आयोजित किया था। इसमें 157 असाधारण पोस्टर प्रदर्शित किए गए थे। उनकी व्यापक दृष्टि ने सभी को आकर्षित कर लिया। विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना, 1945 वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डेमोक्रेटिक यूथ ;डब्ल्यू.एफ.डी.वाई.या विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना लंदन में अक्टूबर-नवंबर 1945 में उद्घाटन सम्मेलन में की गई। विद्या ने उसमें ए.आईएस.एफऔर ‘फेडिन्ड’ के प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया। सम्मेलन में 67 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।भारत से विद्या कानूगा के अलावा केवायूं बूमला और ए.एच.सादर भी शामिल हुए। एम.राशीद पर्यवेक्षक थे। वे सभी‘फेडिन्ड’ की ओर से शामिल हुए।विद्या कानूगा विश्व युवा सम्मेलन के कमिशन नं.3 की सचिव भी चुनी गई। इस कमिशन के अध्यक्ष चेकोस्लोवाकिया के डॉ. हाएक थे। कमिशन का विषय थाः ‘‘स्थाई और टिकाऊ शांति कीस्थापना में युवाओं की भूमिका’’। डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. की परिषद की प्रथम बैठक पैरिस में 19 जुलाई से5 अगस्त 1946 को आयोजित की गई। विद्या कानूगो इसमें भी शामिल हुईं। उन्हें वहां गठित ‘औपचारिक ब्यूरो’का सचिव बनाया गया । यह तय पाया गया कि खाद्यों के बंटवारे में भारत को प्राथमिकता दी जाय।विद्या कानूगा ने विश्व महिला जनवादी फेडरेशन ;वीमेन्स इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन-डब्ल्यू.आई.डी.एफ. के संस्थापना सम्मेलन में पैरिस,1945 में भी भाग लिया। उनके साथ भारत से महिला आत्मरक्षा समिति की ओर से इला रीड ने भी भाग लिया।यह सम्मेलन 26 नवंबर से 1 दिसंबर 1945 को वेलोड्रोम ‘डी’ हाइवर;विन्टर स्टेडियम में संपन्न हुआ। यहविशाल उद्घाटन समारोह था।विद्या कानूगा 1948 में भारतलौट आईं। वे उस वक्त डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।उन्होंने फरवरी 1948 में कलकत्ता में आयोजित दक्षिण-पूर्वी एशियाई युवा सम्मेलन की तैयारी समिति में हिस्सालिया।महिला आंदोलन औरपत्रकारिता के क्षेत्रों मेंविद्या मुंशी ने एन.एफ.आई.डब्ल्यू.;भारतीय महिला फेडरेशन के स्थापना सम्मेलन, कलकत्ता, 1954 में सक्रिय हिस्सा लिया। वे इसके प्रेस संपर्क समिति में थीं। इस प्रकार वे भारतीय महिला फेडरेशन की संस्थापकों में थीं। वे काफी समय तक इसकी कार्यकारिणी की सदस्य भी चुनी गई, जैसे 1973 और 1999 में।इंगलैंड से लौटने के बाद उनका विवाह सुप्रसि( पत्रकार और भूगर्भशास्त्री सुनील मुंशी से हुआ।सुनील पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे और बंबई से प्रकाशित ए.आई.एस.एफ की पत्रिका ‘द स्टूडेंट’ के संपादक भी रहे। विद्या भी उसमें लिखती रहीं।विद्या की बंगला भाषा की जानकारी बहुत अच्छी नहीं थी। फिर भी उन्हें ‘चलार पथे’’ नामक बंगला पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने कड़ी मेहनत करके जल्द ही भाषा सीख ली।इस बीच वे सुप्रसि( अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ की कलकत्ता संवाददाता बन गईं। यह काम उन्होंने 1952 से 1962 तक किया। विद्या मुंशी को सामान्यतः भारत की प्रथम महिला पत्रकार के तौर पर जाना जाताहै।ब्लिट्ज में काम के दौरान उन्होंने कई असाधारण ‘स्टोरीज’ खोज निकालीं। एक थी दो कनाडियन पायलटों के बारे में जो हांगकांग से सोने की तस्करी करके सुंदर बन के जंगलों में गिराने वाले थे। फिर नावोंसे उसे कलकत्ता लाने की योजना थी। दूसरा ‘स्कूप’ था आसनसोल में चिनाकुरी खदानों में दुर्घटना के बारे में। इसमें सैंकड़ों खदान मजदूरों की जानें गईं। सुप्रसि( रंगकर्मी उत्पल दत्त ने इस विषय पर ‘अंगार’ नामक नटक का मंचन किया। उन दिनों पत्रकारिता काफी कठिन हुआ करती थी। एक बार 1953 में पुलिस ने पत्रकारों की जमकर पिटाई कर दी। विद्या मुंशी की भी खूब पिटाई हुई। वे ट्राम के किरायों में वृ( का आंदोलन रिपोर्ट कर रही थीं। पुलिस ने उनसे खूब पूछताछ की लेकिन विद्या ने ‘ब्लिट्ज’ को फंसने नहीं दिया। पुलिस के अत्याचारों की जांच के लिए जस्टिस पी.बी. मुखर्जी कमिशन बिठाया गया। महिला समस्याओं का अध्ययन विद्या मुंशी 1954-55 से ही महिला आंदोलन में सक्रिय भाग लेने लगीं। वे बंगला भाषा में इतनी तेज हो गईं कि महिला आंदोलन के संबंध में वे अक्सर बंगला में ही लिखतीं। उन्होंने प. बंगाल में महिलाओं की स्थिति; 1970-2000 नामक रिपोर्ट के लिए महिलाओं की हिस्सेदारी के संबंध में एक अध्याय लिखा। ‘राजनैतिकि हिस्सेदारी’’ संबंधी यह अध्याय तथ्यों से भरा हुआ है। उन्होंने विस्तृत संस्मरण लिखा है जिसका शीर्षक है ‘‘इन रिट्रोस्पेक्टःवार-टाइम मेमोरीज एंड थॉट्स ऑनवीमेन्स मूवमेंट’ ;यु(काल संबंधी कुछ संस्मरण और महिला आंदोलन के बारेमें कुछ विचारद्ध। वे पश्चिम बंग महिला समिति की अध्यक्ष, भारतीय महिला फेडरेशन की 1986 से 1989 तक राष्ट्रीय सचिव एवं कई वर्षोंं तक फेडरेशन की कार्यकारिणी सदस्य रहीं।महिला आंदोलन संबंधी उनके विचार बड़े ही व्यापक थे। शमिता सेन को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा : ‘‘अब गांधीवादी, मार्क्सवादी और नारीवादी महिला प्रश्नों पर एक दूसरे से सहयोग करते हुए काम कररहे हैं। हम साथ मिलकर काम कर सकते हैं और करना चाहिए।’’ 1994 में उन्होंने एक पुस्तिका लिखी। जिसका शीर्षक थाः ‘परिवार को जनवादी बनाओःइसके अधिकारां का फैलाव एवं इसकी रक्षा करो’। इसके अलावा उन्होंने भारतीय महिला फेडरेशन का एक संक्षिप्त इतिहास भी लिखा है।विद्या मुंशी का एक पत्रकार के रूप में चित्रण 10 एपिसोड वाले एक वेब-सीरिज में भी किया गया है। यह 1959 के सुप्रसि( नानावटी मर्डरकेस से संबंधित है। इसका शीर्षक है‘‘द वर्डिक्टः स्टेट वर्सेज नानावटी’;नानावटी केस के फैसले के बारे मेंद्ध। विद्या मुंशी ने विभिन्न विषयों पर बहसों, चर्चाओं और विवादों में भाग लिया जिनमें महिला आंदोलन, नारीवाद से लेकर अंतर्राष्ट्रीय विषय शामिल थे। वे प. बंगाल पार्टी के दैनिक अखबार‘कालान्तर’ के बोर्ड की सदस्य थी। वे राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की प्रमुख भी थीं, साथ ही वे महिलाकमिशन में भी थीं। उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर महिला संगठन और आंदोलन के जनवादी करण के लिए निरंतर संघर्ष किया। उन्होंने ‘इप्टा’ के लिए भी लिखा। अपने अंतिम वर्षोंं में वे लकवे से आंशिक रूप से ग्रसित रहीं। सन 2002 में उन्हें मस्तिष्क का पक्षाघात हुआ। फिर भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा। वे घंटों कुर्सी पर बैठे पढ़ा करतीं और दस्तावेजों का अध्ययन किया करतीं। इसके लिए मोटा चश्मा और ‘मैग्निफांइग ग्लास’ का प्रयोग करतीं। वे बांए हाथ से नोट्स लिया करतीं। उन्होंने महिला आंदोलन के विषय में काफी तथ्य और आंकड़े इकट्ठा किए। उन्होंने महिला तथा पार्टी आंदेलन से संबंधित इतिहास और दस्तावेजी तथ्य सुनील मुंशी को ‘डिक्टेट’ कराए। सुनील ने विस्तार सेडिक्टेशन लिया।विद्या मुंशी की मृत्यु 8 जुलाई2014 को लंबी बीमारी के बाद कलकत्ते में 94 वर्ष की आयु में होगई।

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बाराबंकी। देश की जन विरोधी केन्द्र सरकार ने देश व देश की जनता को बरबाद करने पर उतारू है, चाहे किसान हो, मजदूर हो, छात्र हो, महिलाएं हो, बेरोजगार हों, गरीब हो, सबके अहित के लिए अभियान चला रखा है। किसानों की बरबादी के लिए कृषि कानून 2020 जबरन लागू कर रही है, जिसके विरोध में किसान दिल्ली की सीमाओं पर 80 दिनों से धरना दे रहे हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था चैपट है, बेरोजगारों को नौकरी नहीं है, पढ़ाई इतनी महंगी हो गयी है कि गरीब आदमी अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकता है, श्रमिक हित के कानून समाप्त किये जा रहे हैं। देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियां तेजी से अपने चहेते उद्योगपतियों को बेच रही है। देश की संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है, सरकार इनका अपने विरोधियों को डराने और दबाने के लिए दुरूपयोग कर रही है। इसी तरह डीजल, पेट्रोल और एल0पी0जी0 सिलेंडर की कीमत भी आसमान छू रही है, जब देश में कच्चा तेल 150 डालर प्रति बैरल था तब डीजल 54 रूपये लीटर, पेट्रोल 80 रूपये लीटर तथा एलपीजी सिलेंडर 424 रूपये में था और अब कच्चा तेल 50 डालर प्रति बैरल है तब डीजल 80 रूपये, पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर, एलपीजी सिलेंडर 780 रूपये तक पहुंच गया है, जिससे आमजन की रसोई पर विपरीत असर पड़ रहा है, डीजल के दामों की वृद्धि की वजह से देश में यातायात, कृषि क्षेत्र, ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र में लागत बढ़ेगी, यातायात और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमत बढ़ेगी, जिससे आम जनता का महंगाई से जीना दूभर हो जायेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा और मांग की कि- डीजल पेट्रोल पर सभी उपकर तत्काल हटाये जाये, पेट्रोलियम पदार्थ को वैट से हटाकर जी0एस0टी0 के दायरे में लाया जाये। तीनों काले कानून कृषि बिल रद्द किया जाये। एम0एस0पी0 की गारंटी का कानून बनाया जाये। किसान आन्दोलन में शामिल किसानों और आन्दोलन का समर्थन करने वालों को प्रताड़ित करना बंद किया जाये।
ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में रणधीर सिंह सुमन, सदस्य राज्य परिषद बृजमोहन वर्मा,जिला सचिव शिवदर्शन, सह सचिव प्रवीण कुमार कोषाध्यक्ष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विनय कुमार सिंह,अध्यक्ष किसान सभा गिरीश चन्द्र, रामनरेश, आशीष शुक्ला, संदीप तिवारी, अंकुल वर्मा, श्याम सिंह ,गाजी अमान अधिवक्ता आदि थे।

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बाराबंकी। सरकार किसानों के खून से होली खेल रही है, किसान आन्दोलन में अब तक लगभग 300 किसानों की मौत हो चुकी है, सरकार संवेदनहीन हो चुकी है, यह आरोप लगाते हुए आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने ग्राम पंचायत बस्ती में किसानों की श्रद्धांजलि सभा में कहा कि सरकार किसान विरोधी है लेकिन यह आन्दोलन गांव-गांव फैल चुका है, कानून वापस लेने होंगे।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किसानों के चित्र के ऊपर पुष्पांजलि करते हुए कहा कि किसान किसी भी कीमत पर दबने वाला नहीं है, चुनाव में सत्तारूढ़ दल हम दो हमारे दो ही बचेगी।
किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि कृषि क्षेत्र के तीनों कानूनों को सरकार को समाप्त कर इस देश की रक्षा करना चाहिए, किसान मजदूर नहीं रहेगा तो देश नहीं रहेगा, देश नागरिकों से होता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन को पार्टी का पूरा समर्थन है और पार्टी किसी भी कीमत पर अपने पैर वापस नहीं लेगी। वहीं पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो बाराबंकी का भी किसान दिल्ली जायेगा।
श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता छेतर सिंह ने की तथा संचालन राम विलास वर्मा ने किया श्रद्धांजलि सभा का आयोजन नैमिष कुमार सिंह ने किया था। सभा में गिरीश चन्द्र, रामनरेश माती, दिलीप सहित सैकड़ों किसान नेता मौजूद थे।

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गोपाल मुकुंद ;बालाजी हुद्दार की कहानी किसी रहस्य-रोमांच कथा से कम नहीं है। उनका जीवन रोमांचकारी था और वे पहले तो आर.एस.एस. के ‘सरकार्यवाह’’ रहे, फिर स्पेन में फासिस्ट विरोधी गृहयुद्ध  में लड़े और लौट कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए! गोपाल मुकुंद का जन्म 1902 में मांडला ;अब मध्यप्रदेश में हुआ था। गोपाल को 4 वर्ष की उम्र में नागपुर लाया गया जहां उधोजी नामक एक ब्राह्मण महिला ने उसे गोद लिया। गोपाल ने नागपुर के मौरिस कॉलेज से ग्रेज्यूएशन किया और फिर गर्ल्स मिशन स्कुल में पढ़ाने लगे। 1920 में वह विद्यार्थी नेता भी बन गए।

हुद्दार के आरंभिक जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है। उनकी पत्नी का नाम मनोरमा था।हुद्दार ने अपना राजनैतिक जीवन हिन्दू महासभा से आरंभ किया। जल्द ही, 1925 में आर.एस.एस. की स्थापना की गई। डॉ. हेडगेवार ने जिन थोड़े-से लोगों को स्थापना के लिए चुना उनमें बालाजी हुद्दार भी थे। जल्द ही वे आर.एस.एस. के ‘‘सरकार्यवाह’’;महासचिव बनाए गए। साथ ही हुद्दार हिन्दू महासभा और आर.एस.एस. के सुप्रसिद्ध नेता डॉ. बी.एस. मुंजे के भी काफी नजदीक थे।आर.एस.एस. से मोह भंग जल्द ही हुद्दार का आर.एस.एस.से मोहभंग होने लगा। वे अवश्य इसके सरकार्यवाह थे लेकिन इसके हिन्दू सांप्रदायिक संकीर्ण विचारों से अलग होने लगे। उन्होंने पाया कि इस नामपर आर.एस.एस. स्वयं को ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रखे हुए है। हुद्दार की कांग्रेस के प्रति भी सहानुभूति बढ़ने लगी।वे क्रांतिकारी आंदोलनों की ओर आकर्षित होने लगे। उनका संपर्क बंगाल के क्रांतिकारी संगठन युगांतर से हुआ। बालाघाट में 1931 में उन्हें शस्त्रास्त्र इकट्ठा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह कांड ‘बालाघाट षड्यंत्र केस’ के नाम से जाना जाताहै। उन्हें 1935 में रिहा किया। रिहा होने पर अपने कुछ सहयोगियों के साथ उन्होंने सावधान नामक साप्ताहिक पत्रिका का नागपुर से प्रकाशन आरंभ किया। आर.एस.एस. से उनकी दूरी और भी बढ़ गई। इस बीच उनकी रूचि पत्रकारिता और सैनिक विज्ञान में बढ़ गईं। वे अधिक जानकारी लेना चाहते थे इसलिए इंगलैंड जाने का निर्णय लिया।भवानी शंकर नियोगी ऐसे जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ सहायता किया करते। उन्होंने हुद्दार को 1000/ रु. दिए। अन्य मित्रों ने भी सहायता की और हुद्दार इंगलैंड के लिए चल पड़े और इस प्रकार एक असाधारण जीवन-यात्रा का प्रारंभ हुआ।

इंगलैंड में

जब बालाजी हुद्दार इंगलैंड पहुंचे तो उस वक्त योरप समूचे विश्व के लिए महत्वपूर्ण घटनाओं से गुजर रहा था। इटली में मुसोलिनी पहले ही सत्ता में आ चुका था। हिटलर और उसकी नाजी पार्टी जर्मनी में 1933 में सत्ता में आ गईं समूचे योरूप और विश्व के लिए खतरनाक समय आ पहुंचा। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एक ;एमआइ 5 हुद्दार की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हुए थी। उनका सारा पत्राचार और कई दस्तावेज उसके हाथ पहुंच रहा था। उनकी रिपोर्टोंं के अनुसार हुद्दार ब्रिटिश सेना में संपर्क बनकर भारत में उनके कैंटोनमेंट्स पर हमला करने की योजना में शामिल थे।बालाजी हुद्दार ने भारत लौटकर आजादी के संघर्ष में हिस्सा लेने का फैसला कर लिया।

स्पेन के गृहयुद्ध ;1937-39 में

हुद्दार आजकल स्पेन के गृहयुद्ध के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध था। 1936 के आम चुनावों में स्पेन और फ्रांस में पॉपुलर फ्रंट ;जन-मोर्चा की सरकारें बनीं। इससे फासिज्म को रोकने में सहायता मिली। स्पेन में प्रगतिशील,जनवादी और वाम दलों की सरकार बनी और स्पेन रिपब्लिकन ;गणतांत्रिक स्पेन कहलाया। लेकिन स्पेन के फासिस्ट और विद्रोही जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको ने सशस्त्र क्रांतिकारी के जरिए गणतांत्रिक सरकार गिराने का अभियान शुरू कर दिया। स्पेन में गृहयुद्ध आरंभ हो गया। इटली और जर्मनी ने जनरल फ्रांको की सक्रिय सैनिक सहायता की। भूमध्यसागर के तटीय देशों, अफ्रीकी किनारों से मोरक्कन, स्पेनी, इटालियन, जर्मन,इ. फौजें स्पेन में उतारी जाने लगीं।तुमुल युद् धछिड़ गया जिसमेंआखिरकार गणतांत्रिक स्पेनी सरकारकी 1939 में पराजय हो गई। जनरल फ्रांको ने स्पेन पर कब्जा कर लिया।रिपब्लिकन स्पेन के समर्थन में सारे योरप और विश्व में एकजुटता आंदोलन छिड़ गया। इतना ही नहीं, स्पेन में लड़ने के लिए विभिन्न देशों में स्वयंसेवक भर्ती किए जाने लगे। लोग,खासकर युवा और बुद्ध जीवी स्पेन में लड़ने के लिए आगे आए। इसके परिणाम स्वरूप ‘‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’’;अंतर्राष्ट्रीय दस्तों का गठन किया जाने लगा।महान विश्व हस्तियों ने समर्थन कियाः अल्बर्ट आंइस्टीन, अर्नेस्ट हेमिंगवे, आंद्रे माल्रो, जोलियो क्यूरी,ज्यॉर्जी दिमित्रोव तथा अन्य। कई ब्रिटिश व अन्य देशों के कम्युनिस्ट एवं दूसरे लोग स्पेन में लड़ते हुए मारे गए, जैसेसुप्रसिद्ध लेखक क्रिस्टोफर कॉडवेल,राल्फ फॉक्स, इ.।इन घटनाओं में स्पेन के समर्थनमें जवाहरलाल नेहरू की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे।सितंबर 1936 से ही विभिन्न देशों से स्वयंसेवक स्पेन पहुंचने लगे थे। सारी दुनिया से 32 हजार से अधिक स्वयंसेवक फ्रांको से लड़ने स्पेन पहुंचे। इनमें छह भारतीय भी थे। इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता लुईगी लोन्गो अभियान का संयोजन अंतर्राष्ट्रीय ब्रिगेडों के कमिसार-जनरलके रूप में कर रहे थे।

अंतर्राष्ट्रीय ब्रिगेडः हुद्दार स्पेन में

इन घटनाओं का बालाजी हुद्दारपर गहरा प्रभाव पड़ा। वे लंदन में कम्युनिस्टों की सभाओं में जाने लगे। अलाव कई सारी फासिस्ट-विरोधी सभाओं और बैठकों में उन्होंने भाग लिया। ब्रिटेन में संयुक्त राष्ट्रीय कमिटिका गठन हुआ जिसकी अध्यक्ष एथॉलकी ड्यूचेस थीं। इसमें एंगलिकन चर्चभी शामिल हुआ।ब्रिटेन से 200 से भी अधिकवालंटियर स्पेन जाने को तैयार हो गए।सरकार ने उनके रास्ते में बाधाएं खड़ीकरने की कोशिशें कीं। इसलिए उन्हेंकाफी घूमकर जाना पड़ता था।बालाजी हुद्दार भी इनमें शामिल होगए। उनके अलावा पांच अन्य भारतीयभी थेः सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट साहित्यकार मुल्कराज आनंद, तीन डॉक्टरः अटल मेनहन लाल, अ ̧यूब अहमद खान नक्शबंदी, और मैनुएल रोचा पिन्टो तथा एक विद्यार्थी रामास्वामी वीरप्पन। मेनहन लाल कनाड़ा से आए।नॉर्मन बेथ्यून के साथ स्पेन में हो लिए।फिर वे उनके साथ चीन चले गए और जापानी फौजों से लड़ाई में भाग लिया।वे चीन में ही बस गए और वहीं 71वर्ष की आयु में 1957 में मौत हो गई।नक्शबंदी 1947 के बाद लाहौरके मेयो हॉस्पिटल में ऑर्थोपीडिक्स केप्रथम प्रोफेसर बने।बालाजी हुद्दार 16 अक्टूबर1937 को स्पेन पहुंचे। उन्हें बड़ी हीकठिन और टेढ़े-मेढ़े रास्तों से जानापड़ा। पहले वे फ्रांस पहुंचे और फिरपाइरीनीज पहाड़ों की श्रेणियां पार करकेस्पेन पहुंचे। उन्होंने अल्बासीट नामकस्थान पर ‘जॉन स्मिथ’ के रूप में अपनानाम लिखाया। कई देशों में ऐसे स्वयंसेवक बनने पर पाबंदी थी। वहां कई ‘जॉन स्मिथ’ थे। हुद्दारको पहचानने के लिए उन्हें ‘ईराकियन जॉन’ कहा जाने लगा।हुद्दार की बटालियन का नामसुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता सकलत वालाके नाम पर ‘‘सकलतवाला बटालियन’रखा गया। उसने कई लड़ाइयों में भागलिया। उन्हें ‘‘अब्राहम लिंकन ब्रिगेड’का हिस्सा बनाया गया जिसमें कईअमरीकी, बाल्कन और फ्रैंको-बेल्जियमभी थे।स्पेनी संघर्ष के समर्थन मेंसकलतवाला की 18 वर्षीय पुत्री सेहराने ‘‘स्पेन-भारत संध्या’ का आयोजन मार्च 1937 में लंदन में किया। इसेभारत-स्पेन समिति ने आयोजित कियाथा। जवाहरलाल नेहरू भी इसमें शामिल हुए। नेहरू ने रिपब्किलन स्पेन के पक्ष में जोरदार संघर्ष छेड़ दिया। वे स्पेनके मोर्चे पर जनरल लिस्टर के हेडक्वार्टर भी गए और कैटलोनिया के राष्ट्रपति लूइस काम्पानिस से मिले। इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं। हुद्दार 11 फरवरी 1938 को उत्तरी स्पेनके टाराजोना नामक स्थान पर ट्रेनिंग के लिए गए। उन्हें बार्सिलोना से 100मील दक्षिण कैटालोनिया में गैन्डे सानामक स्थान में पंद्रहवीं ब्रिगेड में वहां के बचाव की लड़ाई में लगाया गया।नेहरू और कृष्ण मेनन ने उन्हें तब संबोधित किया जब वे एब्रो नदी पार करने की तैयारियां कर रहे थे। इससे पहले नेहरू ने स्पेनी कम्युनिस्ट पार्टी की अध्यक्ष डोलोरिस इबासरी के साथ मिलकर स्पेन की सहायता की और एक रैली को संबोधित किया।

हुद्दार की गिरफ्तारी

जब उनकी बटालियन बार्सिलेनाकी ओर पीछे हट रही थी, तब हुद्दारऔर कई अन्य लड़ाकुओं को फ्रांकोकी फौजों ने पकड़ लिया। वे यु(बंदीबना लिए गए। उन्हें पकड़कर ‘‘सानपेड्रो दे कार्देना’ नामक स्थान पर बंदीके रूप में रखा गया। उनके साथ रहनेवाले एक अन्य बंदी इवोर हिकमैनउन्हें ‘इराकिना मित्र’ कहा करते। हुद्दार बंदीगृह में हाथ देखकर भविष्य बताने वाले के रूप में प्रसिद्ध हो गए। इसका उल्लेख उनके सेल में एक अन्य बंदी कार्ल गेजर ने किया है।हुद्दार कैदियों को भारत की आजादी के आंदोलन, गांधी और नेहरू के बारे में बताया करते और लेक्चर भी दिया करते।

ब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़ने लगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नल भी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकी मुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसे लगातार पूछताछ की। आखिर कार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव में बालाजी हुद्दार हैं। वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी के कैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुर के बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया। इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीय वाद पूरे जोरों पर था! रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियन स्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों के स्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसिब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसि( ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता रजनी पाम दत्त ;आरपीडीद्ध ने की।भारत वापसीएक महीने बाद बालाजी हुद्दार बंबई वापस आ गए। बंदरगाह पर उनकाभारी स्वागत हुआ जिसमें भारी संख्या में मजदूर भी पहुंचे। कई यूनियनों तथाकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने उनके सम्मान में आम सभाएं आयोजित कीं। स्पेन मेंअपने अनुभवों और फासिज्म-विरोधी एवं मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वेकम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गए। वे औपचारिक रूप से 1940 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे नागपुर में पार्टी कार्य में लग गए।वे द्वन्द्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा स्पेनी गृहयुब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसिब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसि( ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता रजनी पाम दत्त ;आरपीडीद्ध ने की।भारत वापसीएक महीने बाद बालाजी हुद्दार बंबई वापस आ गए। बंदरगाह पर उनकाभारी स्वागत हुआ जिसमें भारी संख्या में मजदूर भी पहुंचे। कई यूनियनों तथाकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने उनके सम्मान में आम सभाएं आयोजित कीं। स्पेन मेंअपने अनुभवों और फासिज्म-विरोधी एवं मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वेकम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गए। वे औपचारिक रूप से 1940 मेंभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे नागपुर में पार्टी कार्य में लग गए।वे द्वन्द्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा स्पेनी गृहयु( पर लेक्चर दियाकरते।1952 के बाद कई कारणों से वे सक्रिय राजनीति से दूर जाने लगे। फिर भी वे पार्टी के साथ बने रहे। 1972 में कॉ.ए.बी. बर्धन के एक मित्र बर्लिन गएजहां उनकी मुलाकात इंटरनेशनल ब्रिगेड के एक जर्मन से हुई। उस जर्मन ने हुद्दार को याद किया और उनके लिए एक मेडल तथा ‘थालमन बटालियन’ का चिन्ह हुद्दार के लिए दिया। ;अर्न्स्ट थालमन जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे जिन्हें हिटलर के यातना-शिविर में गोली मार दी गई थी । वे मित्र कॉ. बर्धन तक मेडल इ. ले आए। इन्हें कॉ. बर्धन ने स्वयं हुद्दार तक पहुंचा दिया। गोपाल मुकुंद हुद्दार की मृत्यु 1981 में हो गई।

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police stop protest rally of all india kisan sabha in barabanki
बाराबंकी। किसान आन्दोलन के समर्थन में तीन कृषि काले कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर आॅल इण्डिया किसान सभा के जलूस निकाला जिसको भारी पुलिस बल ने रोक दिया और वहीं पर मजिस्टेªेट बुलाकर ज्ञापन दिलाया, इसके पूर्व आॅल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि मोदी गिरोह ने जो रूपये अडानी और अम्बानी से लिए हैं उसी कारण किसानों की मांग नही मानी जा रही है, पूरी दुनिया मोदी की इस हरकत पर थू-थू कर रही है किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए संघी गुण्डों ने लाल किले पर उत्पात मचाया, संघियों की पुरानी आदत है, मुंह में राम बगल में छूरी।
किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा मोदी हमेशा झूठ बोलकर देश की अर्थ व्यवस्था को बरबाद कर दिया है और अब देश की परिसम्पत्तियों को टुकड़ों-टुकड़ों में बेच रहे हैं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने किसान आन्दोलन का समर्थन करते हुए कहा कि मोदी सरकार की विदाई ही देश बचाने के लिए आवश्यक है और देश की जनता इनकी विदाई शीघ्र ही कर देगी। पार्टी के जिला सहसचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि एक तरफ पेट्रोल, डीजल, गैस के दाम सरकार बढ़ा रही है और जनता को परेशान किया जा रहा है सिर्फ साम्प्रदायिक्ता का इंजेक्शन जनता को लगा रहे हैं।
किसान सभा के प्रदर्शन कारियों में राम नरेश, गिरीश चन्द्र, नैमिष सिंह, प्रतीक शुक्ला, महेन्द्र यादव, आशीष शुक्ला, श्याम सिंह, अंकुल वर्मा, पंडित आकाश शर्मा, अशोक कुमार मौर्या आदि प्रमुख लोग थे।ریاست اتر پردیش کے بارہ بنکی میں کسانوں کے احتجاج کی حمایت میں ریلی نکال کر ضلع مجسٹریٹ کے دفتر پر
آل انڈیا کسان سبھا کے کارکنان اپنے دفتر سے چند ہی قدم آگے بڑھے تھے، لیکن پولیس نے انہیں وہیں روک کر مجسٹریٹ کو میمورنڈم دلا دیا۔
میمورنڈم دینے جا رہے کمیونسٹ پارٹی آف انڈیا کی کسان تنظیم آل انڈیا کسان سبھا کے کارکنان کو پولیس نے روک دیا۔

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अतुल अंजान के लिए इमेज नतीजे

किसानों द्वारा 6 फरवरी को राष्ट्रव्यापी सड़क जाम –एंबुलेंस , ऑयल टैंकर स्कूल बसों मिल्क वॉटर दूध पानी टैंकर, वरिष्ठ नागरिकों को आवागमन छूट केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कानून विदेशी व घरेलू कारपोरेट को किसानों की जमीन व बाजार सौंपने की योजना है l किसानों के विरुद्ध केंद्र सरकार ने “युद्ध” का ऐलान कर दिया है और जनतांत्रिक मूल्यों के सारे मानदंडों को तबाह करते हुए निम्न स्तर पर सरकारी दमनlत्मक कार्यवाही को लागू कर दिया है l बढ़ती हुई महंगाई , बेकारी और आर्थिक कुशासन के चलते केंद्र सरकार किसानों पर एकतरफा कार्रवाई कर के अपने किले की रक्षा करना चाहती है आजाद भारत में दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर जिस प्रकार कंक्रीट के ब्लॉक खड़े किए गए हैं लंबे कटीले बुलेट तार युक्त लक्ष्य बिछाए गए हैं दीवार बन रही है और सड़क पर नुकीले की गाड़ दिए गए हैं यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक शर्मनाक स्थिति है l उक्त विचार व्यक्त करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार “अनजान: ने कहा कि देश के राजनीतिक सत्ता केंद्र पर लगभग 70 दिन से लाखों किसान धरना देकर बैठे हैं और सारे देश के विभिन्न जिलों और कस्बों में लाखों लाख किसान प्रदर्शन कर कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते हुए उसे समर्थन कानूनी जामा दिए जाने एवं तीनों कानून को वापस करने के लिए आंदोलनरत है l दिल्ली में धरना स्थल पर बिजली, पानी और इंटरनेट की सुविधाओं को केंद्र सरकार ने किसानों का मनोबल तोड़ने के लिए काट दिया है l केंद्र सरकार ने अब दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर किसानों के समर्थकों , को को आने से रोकने के लिए
फौलादी दीवार खड़ी कर दी है l लंबे कटीले ब्लेड व तार बिछा दिए हैं और सड़क पर 200 मीटर तक किले गाड़ दी गई है l यह सब एक जनतांत्रिक देश में अन्नदाता को और उसके मनोबल को तोड़ने के लिए किया जा रहा है l स्वामीनाथन आयोग के पूर्व सदस्य अतुल कुमार “अनजान” ने आगे कहा कि देश के किसान एवं अन्य जन संगठन 6 फरवरी को सारे देश में दोपहर 12:00 से 3:00 तक राष्ट्रव्यापी सड़क जाम करके सरकार और जनता का ध्यान आकृष्ट करेंगे l जाम के दौरान एंबुलेंस , स्कूल बस , ऑयल टैंकर , दूध टैंकर और वरिष्ठ नागरिकों को ले जा रहे हैं वाहनों को किसान कार्यकर्ता विशेष रूप से आवागमन की छूट देंगे l
उन्होंने आगे कहा कि देशभर में किसानों के समर्थन में पंचायत और महापंचायत का आयोजन किया जाएगा l जब तक सरकार किसानों के नैतिक एवं तर्कसंगत मांगों को स्वीकार नहीं करती , आंदोलन को जारी रखा जाएगा l

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हैदराबाद: भारतीय कम्युनिस्ट पार्ट के महासचिव डी राजा ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ दिया। राजा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय परिषद में अपनाए गए प्रस्तावों पर यहां एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, जहां पार्टी ने चल रहे किसानों के विरोध को अपना समर्थन देने का फैसला किया।पूर्व राज्यसभा सांसद ने कहा कि जब से भाजपा सत्ता में आई है, तब से यह संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन कर रही है। राजा ने कहा कि भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने “विभाजनकारी, संप्रदायवादी, सांप्रदायिक और फासीवादी एजेंडे” का अनुसरण कर रहे थे।उन्होंने कहा कि बीजेपी न केवल भारतीय राज्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है, बल्कि उसके चरित्र को बदलने की भी पूरी कोशिश कर रही है।केंद्र की निंदा करते हुए, राजा ने कहा कि अगर कोई भी सरकार और उसकी नीतियों पर सवाल उठाता है, तो क्या यह बुद्धिजीवी, कार्यकर्ता, छात्र, शिक्षाविद हैं, उन्हें “राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी” करार दिया गया और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम ( यूएपीए)।“मैं वरवारा राव का नाम लेता हूं जो हैदराबाद से हैं। वे एक प्रसिद्ध कवि हैं। उसकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सभी जानते हैं। जेल में क्यों रखा जा रहा है? ” राजा ने  पूछा।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डी राजा हैदराबाद में मीडिया से बात करते हुए।

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