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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

अगर आपने हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़ ’ को पढ़ा हो तो इस बात को पकड़ने में शायद आपको एक क्षण भी नहीं लगेगा सांप्रदायिक नफरत फैलाने के उद्देश्य से भारत में अभी चल रहे ‘लव जेहाद’ नामक अनोखे अभियान का मूल स्रोत क्या है। हिटलर यहूदियों के बारे में यही कहा करता था कि ‘‘ये गंदे और कुटिल लोग मासूम ईसाई लड़कियों को बहला-फुसला कर, उनको अपने प्रेम के जाल में फंसा कर उनका खून गंदा किया करते हैं।’’

यहां हम हिटलर के शासन (थर्ड राइख) के दुनिया के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार विलियम एल. शिरर की पुस्तक ‘The Rise and Fall of Third Reich’ के एक छोटे से अंश को रख रहे हैं, जिसमें शिरर ने हिटलर की ऐसी ही घृणित बातों को उद्धृत करते हुए उनको विश्लेषित किया है। शायद, इसके बाद भारत में संघ परिवार के लोगों के ‘लव जेहाद’ अभियान की सचाई के बारे में कहने के लिये और कुछ नहीं रह जायेगा। शिरर अपनी इस पुस्तक के पहले अध्याय ‘Birth of the Third Reich’ के अंतिम हिस्से में लिखते हैं :

‘‘ हिटलर एक दिन वियेना शहर के भीतरी हिस्से में घूमने के अपने अनुभव को याद करते हुए कहता है, ‘‘अचानक मेरा सामना बगलबंद वाला काला चोगा पहने एक भूत से होगया। मैंने सोचा, क्या यह यहूदी है? लिंत्स शहर में तो ऐसे नहीं दिखाई देते। मैंने चुपके-चुपके उस आदमी को ध्यान से देखा, उसके विदेशी चेहरे, उसके एक-एक नाक-नक्शे को जितना ध्यान से देखता गया, मेरे अंदर पहले सवाल ने नया रूप ले लिया। क्या वह जर्मन है?’’(अडोल्फ हिटलर, ‘माईन काम्फ़ ’, अमरीकी संस्करण, बोस्तोन, 1943, पृष्ठ : 56)

‘‘हिटलर के जवाब का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी वह कहता है, जवाब के पहले उसने ‘‘किताबों के जरिये अपने संदेह को दूर करने का फैसला किया।’’ उन दिनों वियेना में जो यहूदी-विरोधी साहित्य काफी बिक रहा था, वह उसमें खो गया। फिर सड़कों पर सारी स्थितियों को करीब से देखने लगा। वह कहता है, ‘‘मैं जहां भी जाता, हर जगह मुझे यहूदी नजर आने लगे और मैं उन्हें जितना अधिक देखता, वे मुझे बाकी लोगों से अलग दिखाई देने लगे। …बाद में चोगा पहने लोगों की गंध से मैं बीमार सा होने लगा।’’(वही, पृ : 56-57)

‘‘इसके बाद, वह कहता है, ‘‘उसने उन ‘चुनिंदा लोगों’ के शरीर पर नैतिक धब्बों को देख लिया। …खास तौर पर पाया कि सांस्कृतिक जीवन में ऐसी कोई गंदगी या लंपटगिरी नहीं है, जिसके साथ कोई न कोई यहूदी न जुड़ा हुआ हो। इस मवाद को यदि आप सावधानी से छेड़े तो रोशनी गिरते ही किसी सड़े हुए अंग के कीड़ों की तरह चौंधिया कर ये किलबिलाते दिख जायेंगे।’’ वह कहता है, उसने पाया कि वैश्यावृत्ति और गोरे गुलामों के व्यापार के लिये मुख्यत: यहूदी जिम्मेदार हैं। इसे ही आगे बढ़ाते हुए कहता है, ‘‘पहली बार जब मैंने बड़े शहर की गंदगी में इस भयानक धंधे को चलाने वाला घुटा हुआ, बेशर्म और शातिर यहूदी को देखा तो मेरी पीठ में एक सनसनी दौड़ गयी।’’(वही, पृ : 59)

‘‘यहूदियों के बारे में हिटलर की इन उत्तेजक बातों का काफी संबंध उसकी एक प्रकार की विकृत कामुकता से है। उस समय वियेना के यहूदी-विरोधी प्रकाशनों का यह खास चरित्र था। जैसाकि बाद में फ्रंखोनिया के हिटलर के एक खास चमचे, न्यूरेमबर्ग के अश्लील साप्ताहिक ‘Der Stuermer’ के मालिक में देखा गया, वह एक घोषित विकृत मानसिकता का व्यक्ति था और हिटलर के शासन (थर्ड राइख) का सबसे घृणास्पद व्यक्ति था। मीन कैम्फ में यहूदियों की ऐसी-तैसी करने के लिये जघन्य संकेतों वाली बातें भरी हुई हैं कि यहूदी मासूम ईसाई लड़कियों को फांसते हैं और इसप्रकार उनके खून को गंदा करते हैं। हिटलर ही ‘‘घिनौने, कुटिल, चालबाज हरामी यहूदियों द्वारा सैकड़ों हजारों लड़कियों को फुसलाने की डरावनी कहानियां’’ लिख सकता है। रूडोल्फ ओल्डेन कहता है कि हिटलर के इस यहूदी-विरोध की जड़ में उसकी दमित कामुक वासनाएं हो सकती है। यद्यपि तब वह बीस-पच्चीस साल का था। जहां तक जानकारी है, वियेना की उसकी यात्रा में उसका औरतों से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं हुआ था।

‘‘हिटलर आगे कहता है, ‘‘धीरे-धीरे मैं उनसे नफरत करने लगा। यही वह समय था जब मेरे जीवन में सबसे बड़ा आत्मिक भूचाल आया था। मैं अब कमजोर घुटनों वाला शहरी नहीं रह गया। यहूदी-विरोधी होगया।’’ (वही, पृ : 63-64)

‘‘अपने बुरे अंत के समय तक वह एक अंधा उन्मादी ही बना रहा। मौत के कुछ घंटे पहले लिखी गयी अपनी अन्तिम वसीयत में भी उसने युद्ध के लिये यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि इस युद्ध को उसीने शुरू किया था जो अब उसे और थर्ड राइख को खत्म कर रहा था। यह धधकती हुई नफरत, जिसने उस साम्राज्य के इतने सारे जर्मनों को ग्रस लिया था, अंतत: इतने भयंकर और इतने बड़े पैमाने के कत्ले-आम का कारण बनी कि उसने सभ्यता के शरीर पर ऐसा बदनुमा दाग छोड़ दिया है जो उस समय तक कायम रहेगा जब तक इस धरती पर इंसान रहेगा।’’ (William L. Shirer, The Rise and Fall of the Third Reich, Fawcett Crest, New York, छठा संस्करण, जून 1989, पृष्ठ : 47-48)

यहां उल्लेखनीय है कि भारत में संघ परिवारियों के बीच हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़ ’ एक लोकप्रिय किताब है, जबकि साधारण तौर पर इस किताब को दुनिया में बहुत ही उबाऊ और अपठनीय किताब माना जाता है। लेकिन, जर्मन इतिहासकार वर्नर मेसर के शब्दों में, ‘‘लोगों ने हिटलर की उस अपठनीय पुस्तक को गंभीरता से नहीं पढ़ा। यदि ऐसा किया गया होता तो दुनिया अनेक बर्बादियों से बच सकती थी।’’ (देखें, हिटलर्स माईन काम्फ़ : ऐन एनालिसिस)

पूरी तरह से हिटलर के ही नक्शे-कदम पर चलते हुए भारत में सांप्रदायिक नफरत के आधार पर एक फासिस्ट और विस्तारवादी शासन की स्थापना के उद्देश्य से आरएसएस का जन्म हुआ था। इसके पहले सरसंघचालक, गुरू गोलवलकर के शब्दों में, “अपनी जाति ओर संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों – यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहां अपने सर्वोंच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हो, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता है। हिंदुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।’’(एम.एस.गोलवलकर, वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, पृष्ठ : 35)

‘लव जेहाद’ के मौजूदा प्रसंग से फिर एक बार यही पता चलता है कि संघ परिवार के लोग आज भी कितनी गंभीरता से हिटलर की दानवीय करतूतों से अपना ‘सबक’ लेकर ‘मूलगामी फर्क वाली जातियों और संस्कृतियों के सफाये’ के घिनौने रास्ते पर चलना चाहते हैं।
– अरुण माहेश्वरी
साभार

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खुद को खत्म कर देने का ख़याल
मैंने सर संघचालक को जो चिटठी लिखी, उसका कोई जवाब नहीं आया, मैं हर स्तर पर जवाब माँगता रहा, लड़ता रहा लेकिन हर स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी थी, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, कोई भी इस घटना की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं था, सबको लगता था कि यह एक बहुत ही सामान्य घटना है, ऐसा तो होता ही रहता है, इसमें क्या बड़ी बात है, जिससे मुझे इतना नाराज और तनावग्रस्त होना चाहिए। मैंने इतनी पीड़ा कभी नहीं महसूस की थी पहले, जितनी उन दिनों कर रहा था, वे दिन वाकई बेहद दुखद थे, मैं अक्सर खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाता था, कुछ भी करने और सोचने की शक्ति नहीं बची थी, मैं अवसाद की स्थिति में जा रहा था, मुझे कहीं भी सुना नहीं जा रहा था, जो बात मेरे अन्दर इतनी उथल पुथल मचाए हुए थी, उससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा, दुनिया तो वैसे ही चल रही थी, जैसी पहले चलती थी। मैं इतना निराश था कि मेरे दिमाग में खुद को खत्म कर देने के खयाल आने लगे, मैंने खुदकशी के बारे में सोचा, मैंने मरने की कईं तरकीबें सोची, कुएँ में कूद जाना, फाँसी लगाना या जहर खा कर मुक्त हो जाना, कुछ तो करना ही था, इसलिए विषपान का विकल्प ही मुझे सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ा, घर में चूहे मारने की दवा मौजूद थी, एक रात खाने के साथ ही मैंने उसे खा लिया और सो गया, मुझे नींद का आभास हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अब मेरी जिन्दगी की फिर कोई सुबह नहीं होगी। मैं सोया हुआ था, शायद नींद में था या जग रहा था मैं जी रहा था या मैं मर रहा पेट में दर्द की एक भयंकर लहर सी उठी। उल्टी करने की अदम्य इच्छा और जरूरत ने मुझे झकझोर दिया, मैं दर्द के मारे दोहरा हो रहा था, मैं उठ बैठा और उल्टियाँ करने को बाहर भागा उल्टियों के चलते बुरा हाल था, कलेजा मुँह को आने लगा, अंतडि़याँ खिंची चली आती थी, सिर चकराता था और बेहोशी जारी थी, अचानक बिगड़ी तबियत से परिजन चिंतित हो उठे, बड़े भाईसाहब को तुरंत बुलाया गया, वे आए तब तक मेरी आँखें बंद होने लगी, भाईसाहब ने पूछा कि अचानक क्या हुआ, मैं बामुश्किल सिर्फ इतना बता पाया कि मैंने चूहे की दवा खायी। बाद में मुझे बताया गया कि भाईसाहब गाँव से डॉक्टर को लेने को भागे, डॉ0 सुरेश शर्मा तुरंत भागते हुए आ पहुँचे, उन्होंने ग्लूकोज में कई सारे इंजेक्शन डाले और इलाज प्रारंभ किया, चूँकि पुलिस और अन्य लोगों तक बात नहीं पहँुचे इसलिए अगले कई घंटों तक घर में ही गुपचुप इलाज चलाया गया, मेरे बड़े भाई बद्री जी भाईसाहब का इतना बड़प्पन रहा कि उन्होंने कभी भी किसी को इस घटना का जिक्र नहीं किया, मैं उनकी सक्रियता और डॉ0 शर्मा के त्वरित इलाज की वजह से बच गया पर ऐसी बातें अंततः बाहर आ ही जाती है, डॉ0 साहब ने गोपनीयता भंग कर दी, बात आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई, मैं स्वस्थ तो हो गया पर लज्जा और ग्लानि से भर गया, मैं उन दिनों हर जगह असफलता का सामना कर रहा था, आत्महत्या के प्रयास में भी सफल नहीं हो पाया, हर जगह की तरह यहाँ भी मैं हार गया था, मौत हार गई, जिन्दगी जीत गई थी, मुझे लगता था कि हर गाँव वासी को मेरी इस नादानी के बारे में जानकारी है इसलिए मैं मारे शर्म के कई महीनों तक लोगों का सामना नहीं कर पाता था, मैं वापस भीलवाड़ा चला गया। शहर आकर मैंने सोचना शुरू किया, खुद से ही पूछने लगा कि मैं क्यों मर रहा था और किनके लिए मर रहा था, किस बात के लिए? मेरे मर जाने से किसको फर्क पड़ने वाला था? ठन्डे दिमाग से सोचा तो अपनी तमाम बेवकूफियों पर सिर पीट लेने को मन करने लगा, मरने को तो मैं पहले भी उनके प्यार में राजी था अयोध्या जाकर और मरने को तो मैं बाद में भी तैयार हो गया था उनके नफरत भरे व्यवहार के कारण पर दोनों ही स्थिति मंे मरना तो मुझे ही था, कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-रोते क्या वे मेरी जिन्दगी के मालिक हैं? क्या मेरे जीने के लिए आरएसएस का प्यार या नफरत जरुरी है? मुझे क्यों मरना चाहिए, मुझे उनसे क्यों सर्टिफिकेट चाहिए, वे कौन होते हैं मेरे जीवन और सोच को नियंत्रित करने वाले? मैं अब तक भी उनके साथ क्यों बना हुआ हूँ? मैं ऐसे घटिया और नीच सोच विचार और पाखंडी व्यवहार वाले लोगों के साथ क्यों काम करना चाहता हूँ,जो मेरे घर पर बना खाना तक नहीं खा सकते हैं! मैं ऐसे लोगों का हिन्दू राष्ट्र क्यों बनाना चाहता हूँ? मैं एक ऐसा धार्मिक राष्ट्र बनाने का आकांक्षी क्यों था जिसमें मेरे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होने वाला है आखिर क्यों?
ऐसे ही जलते हुए सैंकड़ों सवालों ने मुझे जकड़ लिया था खूब अन्तद्र्वन्द्व मनन चिंतन और थक जाने की स्थिति तक मंथन के पश्चात मैंने तय किया कि मैं आरएसएस को न केवल पूरी तरह नकार दूँगा बल्कि उनके द्वारा मेरे साथ किए गए जातिगत भेदभाव को भी सबके समक्ष उजागर करूँगा, इस दोगले हिन्दुत्व और हिन्दुराष्ट्र की असलियत से सबको वाकिफ करवाना मेरा आगे का काम होगा। मैंने संकल्प कर लिया कि संघ परिवार के चेहरे से समरसता के नकाब को नोंचकर इनका असली चेहरा मैं लोगों के सामने लाऊँगा। मैंने अपनी तमाम सीमाओं को जानते हुए भी निश्चय कर लिया था कि मैं संघ परिवार के पाखंडी हिन्दुत्व को बेनकाब करूँगा और मैं अपनी पूरी ताकत के साथ अकेले ही आरएसएस जैसे विशालकाय अर्धसैनिक सवर्ण जातिवादी संगठन से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा। मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाए सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक भीम प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके विघटनकारी विचारों की मुखालिफत बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये करूँगा, यह जंग जारी रहेगी।

-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
(लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा: हिन्दू तालिबान’ का पहला भाग)
मोबाइल: 09571047777edc58-01

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बन्धु, खाना पैक कर दो
मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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पुलिस वाले लाठियाँ लिए टूट पडे़
मैं इस उपद्रव बनाम आन्दोलन का हिस्सा था और कुछ हद तक अगुवाई में भी था, इसलिए थोड़ी बहुत देर तो पथराव में भागीदार रहा, फिर जब आस पास के लोग छँटने लगे तो मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अकेले ही पत्थर फेंक रहा हूँ, कहीं पुलिस की लाठी गोली का शिकार हो गया, तो भय का अहसास हुआ इधर-उधर देखा, सामने ही भीमगंज स्कूल था, दौड़कर उसमंे घुस गया और बच्चों के बीच छिप कर बैठ गया, काफी देर तक बाहर से गोलियाँ चलने की आवाजें आती रही, पता चला कि कफ्र्यू लगाने की घोषणा की जा चुकी है, अब शायद बाहर जाना संभव नहीं हो पाएगा, तब चिंता हुई, क्या करूँ, कैसे बाहर जाऊँगा, पर यह सोच कर शांत रहा कि इतने सारे बच्चों को भी तो पहँुचाया जाएगा, उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।
उपद्रव के शांत होते ही पुलिस की सुरक्षा में बच्चों को घर पहँुचाने का इंतजाम किया गया, पुलिस और शिक्षकों ने मिल कर सब बच्चों को बाहर निकाला, मैं भी अन्य बच्चों के साथ-साथ बाहर तक आया, ज्यों ही गली में पहँुचा, पाँच छह पुलिसवाले लाठियाँ लिए मुझ पर टूट पड़े, मैं समझ ही नहीं पाया कि इतने विद्यार्थियों में उन्होंने मुझ अकेले को ही कैसे पहचान लिया? मैं भी तो शेष बच्चों की तरह ही दुबला पतला किशोर था, उन्होंने कैसे जाना कि मैं स्टूडेंट नहीं उपद्रवकारी हूँ। मैं उस वक्त अपने ललाट पर तिलक और केसरिया पट्टी जो सिर पर बाँध रखी थी, उसे तो भूल ही चुका था, पुलिसकर्मी मुझ पर धुआँ धार लाठियाँ फटकार रहे थे, मैं गिरते पड़ते आगे-आगे भाग रहा था और वे पीछे-पीछे। अनगिनत लाठियों के वार से उठे दर्द से बिलबिलाता, पुलिस से बचता बचाता मैं भाग कर किसी तरह मानिकनगर होकर महात्मा गाँधी अस्पताल पहँुच गया, जहाँ पर सैंकड़ों की तादाद में आक्रोशित हिन्दू खड़े थे, दोनों मृतकों की लाशें वहाँ पहँुच चुकी थी, कई सारे घायल लोग भी वहाँ लाए जा रहे थे, मैं भी लहूलुहान था, मेरा भी प्राथमिक उपचार किया गया, वहाँ से मुझे संघ कार्यालय पहँुचाया गया, जहाँ पर कफ्र्यू के अगले पाँच दिनों तक मेरी चोट खाई पीठ की मालिश की गई, पंचमुखी बालाजी रिको एरिया के महंत लाल बाबा प्रेमदास महाराज भी हमारे साथ थे और भी लोग थे, किसी तरह वे बुरे दिन बीते, दर्द निवारक गोलियों से दर्द गया तो घर की याद आई, गाँव लौट कर आया, इस पूरे घटनाक्रम से मन में अजीब सा महसूस होने लगा, लगने लगा कि किसी न किसी दिन या तो पुलिस के हाथों अथवा विधर्मी लोगों के हाथों मारा जाऊँगा, हालाँकि उन दिनों बहुत बेचैनी थी फिर भी संघ के प्रतिष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं आई थी, संघ कार्य को भगवान का काम मानने की प्रवृति इतनी हावी थी कि आरएसएस के खिलाफ एक भी शब्द मुझे बर्दाश्त नहीं होता था, मेरे पिताजी जो कि जन्मजात कट्टर किस्म के कांग्रेसी थे, जो मुझे खाकी नेकर और काली टोपी पहने शाखा में जाते वक्त अक्सर रोकते थे और टोकते हुए कहते थे-यह तुम्हारी बनिया बामन पार्टी कभी हम किसानों और नीची जात वालों की सगी नहीं होगी, ये मियाओं से लड़ाने के लिए हमें काम में लेते हैं, खुद तो लड़ नहीं सकते, डरपोक हैं। मुझे अपने पिताजी की बातों में कांग्रेसी शाख की बू आती थी, मुझे लगता था कि वे भी जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण की ओछी और घिनौनी राजनीति के एक मोहरे मात्र हैं, उनको राष्ट्रभक्ति का तनिक भी ज्ञान नहीं है, वरना भला भारत माता की सेवा में लगे एक पवित्र और राष्ट्रवादी संगठन के खिलाफ वे ऐसी बातें कह सकते हैं? मैंने उनकी कभी भी इस मामले में बात नहीं मानी, पहली बार आरएसएस की चड्डी पहनने से लेकर अयोध्या भाग जाने और अब जिला मुख्यालय से बुरी तरह से पिटकर आने तक के हर मौके पर वे विरोध में कर रहे थे। वैसे तो वे शुरू से ही मेरे शाखा में जाने के विरोधी ही थे, कभी कभार बहुत नाराज हो जाते तो मुझे और आरएसएस दोनों को ढेर सारी अश्लील गालियाँ देते। मुझे बुरा तो बहुत लगता, मन होता था कह दूँ कि मुझे दे दो गालियाँ पर संघ को क्यों देते हो? पर सच बताऊँ तो कभी इतनी हिम्मत नहीं हो पाई, सो मन ही मन कुढ़ता रहता था। शायद वे चाहते थे कि या तो मैं पढूँ अथवा खेतों में काम में मदद करूँ, पर मैं सोचता कि-मैं और खेतों में काम? मैं संघ जैसे महान संगठन का स्वयंसेवक, राष्ट्र निर्माण में निमग्न और वे चाहते हैं कि मैं मानव निर्माण की इस फैक्टरी को छोड़ कर उनके साथ भेड़ें चराऊँ? मैं प्रचारक बनने की क्षमता वाला इन्सान चरवाहा बन जाऊँ, नहीं बाबा नहीं, यह कभी भी नहीं होगा, मैंने ठान लिया था कि संघ कार्य जिन्दगी में कभी भी नहीं छोडूँगा, परम पूज्य डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने कहा था कि संघ का कोई भी स्वयंसेवक होता या नहीं होता, वह काम करे या नहीं करे सदैव ही स्वयंसेवक बना रहता है, इसलिए मैं तो सदा सदा स्वयंसेवक बना रहूँगा और सक्रिय ही रहूँगा। पिताजी और घर वाले कुछ भी सोचें या कहें, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वैसे भी उन जैसे कांग्रेसियों को कभी संघ का ईश्वरीय काम समझ में न तो आया है और न ही आएगा, हम पिता पुत्र के बीच का रिश्ता भी कांग्रेस-आरएसएस के बीच के रिश्ते जैसा रूप लेता जा रहा था, उनका टोकना और चेताना जारी था और मेरी नहीं मानने और अधिकाधिक संघ कार्य में जुटे रहने की जिद जारी थी।
जब मेरे गाँव आई अस्थि कलश यात्रा
अयोध्या में मरे कारसेवकों और भीलवाड़ा में मारे गए रतन लालों को हुतात्मा (शहीद आत्मा) घोषित किया जा चुका था, अब उनकी हड्डियों की कलश यात्रा गाँव-गाँव घुमाई जा रही थी, साधु-संत, संघ, विहिप के पदाधिकारी गण और नौजवान स्वयंसेवक इस यात्रा में साथ चल रहे थे, गाँव-गाँव घूमते हुए मेरे गाँव भी आ पहँुची रामभक्तों की अस्थि कलश यात्रा, रात के 9 बजे मेरे गाँव पहँुचने पर यात्रा का हमने भव्य स्वागत किया, हम युवाओं ने अपनी दलित बस्ती को फूल पत्तियों की बन्दनवार से सजाया, ढोल, थाली, मांदल और शंख बजाते हुए नाचते गाते हुए हमने यात्रा का ‘न भूतो ना भविष्यति’ सत्कार किया। सभा हुई, अयोध्या के राम जन्मस्थल पर मुल्ला यम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई बर्बरता पर एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया और बाद में संतों और अन्य हिन्दू नेताओं ने भीलवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार का बेहद मार्मिक वर्णन किया, मजे की बात यह थी कि उस दिन हुए उपद्रव के दौरान इनमंे से एक भी व्यक्ति को कोई चोट नहीं पहँुची थी लेकिन ऐसा आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया कि मौजूद लोगों की ऑंखें भर आईं, हालाँकि मैं खुद भीलवाड़ा में पुलिस जुल्म का शिकार हुआ था, लेकिन इतने मार्मिक अंदाज में मैं भी इस बात को नहीं रख पाता, जितने अच्छे तरीके से उन लोगों ने रखा, जो वहाँ उस रोज मौजूद ही नहीं थे, शायद यही ट्रेनिंग है जो संघ में सीखनी पड़ती है, विद्वान लोग जल्दी ही सीख जाते हंै, वैसे भी इस देश में भूख पर भाषण भूखे इन्सान से ज्यादा अच्छा वे लोग देते हैं जिनका पेट भरा होता है, यहाँ भी वही हो रहा था, हृदय को छू लेने वाले भाषण ‘हिन्दुवः सोदरा सर्वे ‘मतलब कि’ हिन्दू-हिन्दू भाई भाई के नारे लगाए गए, हिन्दू समाज में फैली असमानता की सामाजिक विकृति पर प्रहार किया गया, हिन्दू एकता और संगठित रहने पर बल देते हुए तथा सभी वंचित समुदायों के समाज जनों को गले लगाने के आह्वान के साथ सभा का समापन हुआ।
सभा की समाप्ति पर मैंने सब लोगों से अपने घर भोजन करने का आग्रह किया, हमने अपने घर पर खीर पूरी का भोजन सबके लिए तैयार किया था, जब खाना बन रहा था, तब भी आदतन पिताजी ने टोका टोकी की थी कि-‘क्यों खाने का सामान खराब कर रहे हो, ये लोग यहाँ नहीं खाने वाले हैं, पाखंडी हैं सब, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं, इनके अन्दर हमारे लिए जहर भरा हुआ है। मैं जल भुन गया, पहली बार मैंने अपनी तमाम ताकत बटोर कर आखिर प्रतिवाद कर ही दिया-आप क्या जानते हैं संघ के बारे में? मैं पाँच साल से उनके साथ हूँ, उनके सबसे बड़े कार्यालय का प्रमुख हूँ, कितने ही स्वयंसेवकों के घर जा कर मैंने खाना खाया है, हमारे संघ में आपके गाँव की तरह छुआछूत और जाति भेदभाव नहीं चलता है, यह सब आपकी कांग्रेस की देन है, पिताजी बोले-‘बेटा कांग्रेस तो हम नीची कौम के लिए माँ का पेट है, तुम इसे कभी नहीं समझोगे। अच्छी बात है अगर तुम्हारी संस्था में सब जातियाँ बराबर हो गई है, तो बनाओ खाना मुझे भी उन्हें खिला कर खुशी होगी, हम बाप बेटे के बीच में यह एक प्रकार का युद्ध विराम था मैं भी राजी और वे भी नाराज नहीं, खाना तैयार था और अब खाने वाले भी तैयार होने वाले थे। मैं बेहद प्रसन्नता और विजयी मुद्रा में भाग-भाग कर काम कर रहा था मैं अपनी जिन्दगी में पहली और आखिरी बार शायद इस अस्थि कलश यात्रा के उसी दिन नाचा भी और गाया भी। मैंने ही आज की सभा का संचालन भी किया था ,मेरे उत्साह और हर्ष की कोई सीमा नहीं थी, मुझे लग रहा था कि मेरे घर रामभक्त नहीं बल्कि साक्षात् भगवान श्री राम पधार रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे शबरी के बेर खाने उसकी झोंपडी चले गए थे राम। मैं मन ही मन इसलिए भी खुश था कि आज अपने कांग्रेसी पिता को मैं गलत साबित करने जा रहा था, मैंने उनके प्रभुत्व वाले कांग्रेसी गाँव में हिन्दुत्व का झंडा गाड़ दिया था आज की इस श्रद्धांजलि सभा का सफल आयोजन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा में बढ़ता हुआ सफल कदम था, मैंने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर आज ही दो स्टीकर लगाए थे-गर्व से कहो हम हिन्दू हैं और बड़े भाग्य से हम हिन्दू हैं।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
edc58-01

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अम्बेडकर छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाएगी
गाँव से जो संघ के साथ सफर शुरू हुआ, वह तहसील मुख्यालय मण्डल होते हुए जिला स्तर भीलवाड़ा तक पहुँच गया, भीलवाड़ा शहर में मैं अम्बेडकर आवासीय छात्रावास का छात्र था, पर वहाँ भी आरएसएस के ही गुणगान करता था, चूँकि मैं नेकर पहन कर रोज शाम शाखा में जाता था, इसलिए कुछ सीनियर छात्र मुझे चड्डा साहब कह कर भी चिढ़ाते थे, लेकिन मुझमें श्रेष्ठता का भाव इतना प्रबल हो चुका था कि मैं अपने आगे सब को हीन मानता था, मुझे लगता था कि ये तुच्छ लोग अभी जानते नहीं हैं कि मैं कितनी महान ईश्वरीय कार्य योजना का हिस्सा हूँ, जिस दिन जान जाएँगे, ये सब लोग नतमस्तक हो जाएँगे। मैं अपनी ही धुन में सवार था, दलित और आदिवासी समुदाय के कई अन्य छात्र जो मेरे साथ हाॅस्टल में रहते थे, मैं उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के बारे में जानकारियाँ देता था, उनमें से दो चार को तो मैं शाखा में ले जाने में भी सफल रहा, लेकिन वे जल्दी ही भाग छूटे, उन्हें संघ के ड्रेस और तौर तरीके पसंद नहीं आए फिर भी मैं डटा हुआ था, इस बीच भीलवाड़ा के नगर प्रचारक जी का आगमन हमारे छात्रावास में हुआ, मैं तो बहुत खुश था कि प्रचारक महोदय हमारे द्वार आ रहे हैं, वे वाकई आए, उन्होंने अम्बेडकर छात्रावास के स्टूडेंट्स के रंग ढंग देखे और मुझसे बोले-आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए, इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचार धारा ही भ्रष्ट हो जाएगी। अब मैं विचारधारा को बचाने के लिए अम्बेडकर छात्रावास छोड़कर आरएसएस के जिला कार्यालय पहँुच गया था, जहाँ पर जल्दी ही मुझे जिला कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिल गया, मुझमें शुद्धता और श्रेष्ठता का भाव और सघन हो गया, मुझे अपने हिन्दू होने पर बड़ा गर्व पैदा हो गया था, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता था, मानू भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे मन में समाया हुआ था कि हम हिन्दुओं ने ही दुनिया को सभ्यता सिखाई, हमने अंक और दशमलव दिया, हमारे वेद ईश्वरीय हैं, जिनके मुकाबले ज्ञान में विश्व के सभी धर्म ग्रन्थ बौने दिखाई पड़ते हैं, हमारे यहाँ हर प्राणी में भगवान माने गए और नारियों को देवियाँ, ऐसी महानतम संस्कृति का हिस्सा होना सबसे अधिक पुण्य और गर्व का ही तो काम है, उन दिनों हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान-माँग रहा है सकल जहान जैसे नारे लगा कर सीना फूल जाता था, संघ से पूरी तरह से सराबोर हो जाने के कारण किसी और विचार के लिए मेरे दिमाग में जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए मनुस्मृति पर गर्व करना तो आ गया पर भारत का संविधान किस चिडि़या का नाम है, यह पता ही नहीं था, उन दिनों मैंने महाराणा प्रताप का यशोगान तो खूब गाया, पर भीलू राना पूंजा के बारे में कुछ भी नहीं जाना। मीरा के प्रेम और भक्ति के पद पायोजी म्हे तो राम रतन धन पायो तो याद रहा पर संत रैदास से जान पहचान ही नहीं हो सकी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, की कीर्ति पताका तो फहराई, लेकिन कौन थी झलकारी बाई, कुछ पता नहीं लगा, अगर जाना भी तो वंचितों का यही इतिहास, जिसमें राम को जूठे बैर खिलाती शबरी, द्रोणाचार्य को श्रद्धावनत होकर अँगूठा काट कर देता गुरु भक्त एकलव्य, सीना चीरकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते हनुमान, कपडे़ धोते धोबी, जूते बनाता चर्मकार, सफाई करता स्वच्छकार यानी कि वही प्राचीन जाति व्यवस्था और वही पुश्तैनी कर्म!
उन दिनों मेरे आदर्श अम्बेडकर, फुले, कबीर या बुद्ध नहीं थे, क्योंकि इन्हें तो जाना ही नहीं, जिन्हें जान पाया वे राष्ट्रनायक थे सावरकर, तिलक, गोखले और हेडगेवार तथा गुरूजी गोलवलकर ये ही आदर्श थे और ये ही मेरी प्रेरणा के स्रोत थे, नगर प्रचारक जी ने सही ही कहा था कि अगर मैं अम्बेडकर छात्रावास में टिक जाता तो शायद मेरी विचारधारा जल्दी ही भ्रष्ट हो जाती।
आचार्य रजनीश, आरएसएस और मैं
विचारधारा की चूल हिलने की शुरुआत मेरे संघ कार्यालय में रहते हुए अनायास ही हो गई, उन्हीं नगर प्रचारक महोदय के साथ एक दिन मैं तीरथ दास जी नामक स्वयंसेवक के घर गया, जो हाल में ओशो रजनीश से प्रभावित होकर संघ कार्य में शिथिलता बरतने लगे थे, हम उन्हें समझाने और वापस सही रास्ते पर लाने गए, हमें लगा कि वे वैचारिक विचलन के शिकार हो गए हैं, उनसे नगर प्रचारक जी ने लम्बी बातचीत की, लेकिन वे टस से मस भी नहीं हुए, आते वक्त उन्होंने एक अखबार ओशो टाइम्स भेंट किया, जो प्रचारक जी ने तो हाथ में भी नहीं लिया पर मैं ले आया और जिला कार्यालय में बैठ कर पढ़ने लगा, प्रचारक जी को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने ओशो टाइम्स मेरे हाथों से छीनकर फेंकते हुए कहा-यह आदमी विचारों में भटकाव लाता है, गुमराह कर देता है, इसको जिन्दगी में कभी मत पढ़ना।
मैं स्तब्ध रह गया, मेरे मन में यह सवाल उठा कि पढ़ने से विचारधारा में भटकन कैसे आ सकती है? इस एक घटना ने मेरी रुचि ओशो के साहित्य में जगा दी, मैंने चोरी छिपे ओशो टाइम्स पढ़ना शुरू कर दिया और इस तरह मेरे मस्तिष्क की अन्य खिड़कियाँ भी खुलने लगी और संघ की पवित्र और शुद्ध विचारधारा अंततः भ्रष्ट होने लगी।
गुलमंडी क्या पाकिस्तान में है ?
मेरे प्रचारक बनने का सपना भले ही धराशायी हो गया था और थोड़ा बहुत ओशो को भी पढ़ने लगा था, मगर संघ, राष्ट्र निर्माण और हिन्दुत्व से मोह बरकरार था, अम्बेडकर छात्रावास छोड़ देने के बाद पूरी तरह से आरएसएस के जिला कार्यालय में रहते हुए एक निष्ठावान स्वयंसेवक के तौर पर मैं अब भी कार्यरत था। किसी विकल्प या वैकल्पिक विचारधारा के बारे में सोचने जितना खुलापन अभी नहीं आ पाया था इसलिए हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु रात दिन लगा हुआ ही था, अयोध्या की पहली कारसेवा की असफलता के बावजूद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू जन मानस में उबाल आया हुआ था, संघ परिवारीय संस्थाएँ मंदिर बनाओ या गद्दी छोड़ो आन्दोलन चला रही थीं। 12 मार्च 1992 का दिन था, हम राम मन्दिर निर्माण की माँग को लेकर एक विशाल जुलूस सांगानेरी गेट भीलवाड़ा से प्रारम्भ करके मुस्लिम बहुल इलाके गुलमंडी में होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक ले जाना चाहते थे, हजारों की तादाद में उत्साही रामभक्त सिर पर भगवा पट्टी बांधकर सौगन्ध राम की खाते हैं, के नारे लगाते हुए दूधाधारी मन्दिर के बाहर खड़ेे थे। हालाँकि प्रदेश में भाजपा का राज था, ौरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और बंशी लाल पटवा भीलवाड़ा के विधायक, मतलब यह कि प्रदेश में अपनी ही सरकार थी, लेकिन पुलिस वाले रास्ता रोके खड़े थे, जुलूस आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था।
उस दिन शुक्रवार था, जुम्मे की नमाज और हमारे जुलूस का वक्त लगभग एक ही होने की वजह से पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती नजर आ रही थी, इसलिये प्रशासन हम आन्दोलनकारियों को समझाने की कोशिश में लगा था, पुलिसया रिपोर्टों ने दोनों समुदायों के बीच भिडंत की आशंका जताई थी, पुलिस ने राम के भक्तों से रास्ता बदल देने का आग्रह किया, पर स्टेट में संघ की ही सत्ता थी, इसलिए हम तो बेखौफ थे पुलिस जरुर दबी हुई सी थी, उनके आला अधिकारियों ने हमारे बड़े नेताओं से खूब मिन्नतें की, हम कहाँ मानने वाले थे। हमने रास्ता बदलने से यह कह कर साफ इंकार कर दिया कि हमारा जुलूस गुलमंडी में क्यों होकर न जाएँ, वह क्या पाकिस्तान में है? हमने कहा-जाएँगे तो उधर से ही, चाहे जो हो जाएँ। अभी पुलिस और रामभक्तों में तकरार चल ही रही थी कि जुलूस के पीछे से पथराव शुरू हो गया, स्थितियाँ बिगड़ती देखकर पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, घुड़सवार पुलिस ने रामभक्तों को निर्ममता से कुचला, फिर भी स्थिति बेकाबू ही बनी रही, हालात और बिगड़े तो हवाई फायर हुए और अंततः कई राउंड गोलियाँ बरसाई गई, जिसमें दो लोग शहीद हो गए। एक खामोर के रतन लाल थे तो दूसरे भीलवाड़ा के रतन लाल, एक सेन थे तो दूसरे जैन, दोनों का ही राम जन्मभूमि आन्दोलन और इस उपद्रव से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था, हकीकत तो यह थी कि भीलवाड़ा निवासी रतन लाल जैन डेयरी में रात्रिकालीन ड्यूटी करके लौटे थे और दिन के वक्त घर में आराम कर रहे थे, धाय धाय की आवाजों से जगे और बाहर यह देखने निकले कि हो क्या रहा है, इतने में पुलिस की एक गोली उनकी छाती में समा गई, दूसरे खामोर गाँव के निवासी रतन लाल सेन बाजार में खरीददारी करने आए हुए थे और पुलिस की गोली के शिकार हो गए, लेकिन संयोग से दोनों ही मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए दोनों को शहीद घोषित करके उनका अस्थि कलश निकाले जाने की घोषणा तुरत फुरत ही कर दी गयी।
हालाँकि दोनों ही मृतकों का राम जन्मभूमि और संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने दुर्घटनावश ही अपने प्राण खोए थे मगर फिर भी उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया, अच्छा हुआ कि दोनों मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए ‘शहीद’ हो गए, मुसलमान होते तो ‘ढेर‘ हो जाते।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी के बिक्री बाजार का अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे – थोक व्यापारियों के रोज़ी – रोजगार कि आवश्यकता है | उनके जीवन – अस्तित्व की शर्त है |
केन्द्रीय सचिवो कि समिति द्वारा फुटकर दुकानदारी के मल्टी ब्रांड कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट की सिफारिश कर दी गयी है | अभी यह छूट 51 % निवेश के लिए की गयी है | विदेशी निवेश वाले इन रिटेलो स्टोरों को विभिन्न प्रान्तों में खोलने का अधिकार राज्य सरकारों को देने का प्रस्ताव किया गया है | फिर इस प्रस्ताव में मल्टी ब्रांड रिटेल के ताकतवर – माल , शाप से छोटे स्तर के उद्यमों एवं किराना स्टोरों के सुरक्षा के उपाय तय करने व उसे लागू करने का भी अधिकार राज्य सरकार के हाथो में देने का प्रस्ताव किया गया है | सचिव समिति के प्रस्ताव में अभी विदेशी निवेश के रिटेल स्टोरों को 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में खुदरा व्यापार की छूट दी गयी है | इस आधार पर अभी देश के 35 शहरों को इसके लिए उपयुक्त बताया गया है | अभी सचिव समिति के इस निर्णय पर मंत्रीमंडल का निर्णय आना बाकी है | पर इस प्रस्ताव से फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में मल्टी ब्रांड रिटेल व्यापार में विदेशी निवेश को अब सुनिशिचत माना जा रहा है | सचिव समिति के इस प्रस्ताव का कही – कही स्थानीय फुटकर दुकानदारों द्वारा थोड़ा विरोध भी किया गया | पर वह एक – दो दिन में ही खत्म भी हो गया | जबकि देश की बड़ी औद्योगिक एवं वाणीजियक कम्पनियों के राष्ट्र स्तर के ‘ पिक्की ‘ व सी0 आई0 आई0 और रिटेल क्षेत्र में लगी बड़ी भारतीय कम्पनियों ने सचिव समिति के प्रस्ताव का स्वागत किया है | अभी दो – तीन साल पहले स्थानीय स्तर के फुटकर दुकानदारों के संगठनों द्वारा फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में विदेशी ही नही देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने का विरोध किया जा रहा था |फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बड़ी कम्पनियों के आ जाने से फुटकर दुकानदारों के बिक्री बाज़ार में भारी कटौती के साथ उनकी बर्बादी की चर्चाये भी हो रही हैं | पर धीरे – धीरे यह विरोध मद्धिम पड़ गया | अब यही बाते फुटकर व्यापार में विदेशी निवेश के बारे में भी कही जा रही है और वह गलत भी नही है | इसके वावजूद इस बार उस प्रचार माध्यमो में चर्चा ही बहुत कम है | फिर उसका विरोध तो और भी कम है ऐसा लगता है , जैसे फुटकर दुकानदारों ने जाने या अनजाने में यह मान लिया है की उनके विरोध से कुछ नही होगा | जो सत्ता सरकार चाहेगी , वही होगा | यही असली हार है | संघर्ष में मिली हार बड़ी हार नही होती | क्योंकि उस हार से पराजितो को अपनी कमिया देखने व दूर करने एवं पुन: संघर्ष के जरिये उसे विजय में बदल देने के लिए प्रयास करने की हर सम्भावना मौजूद रहती है | लेकिन बिना संघर्ष के ही हार मान लेने पर तो विजय कदापि सम्भव नही है |किसान भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष में है |ज्यादातर जगहों पर थक – हारकर मुआवजा ले चुके है | जमीन छोड़ चुके हैं |पर उन्होंने अभी संघर्ष नही छोड़ा हैं | इसलिए अब कही – कही उनको जीत भी मिल रही है |उनकी भूमि का अधिग्रहण रदद भी हो रहा है | कल को यह जीत बढ़ सकती है | राष्ट्रव्यापी जीत में बदल सकती है | फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी का अधिग्रहण किया जा रहा है | इनके बिक्री बाज़ार का अधिग्रहण भी अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे – थोक व्यापारियों के रोजी – रोजगार की आवश्यकता है | उनके जीवन – अस्तित्व की शर्त है | उन्हें किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारी में बड़ी कम्पनियों का विरोध करना ही पड़ेगा | इसी के साथ उन्हें पिछले 20 सालो से लागू होती रही उन वैश्वीकरणवादी , उदारीकरणवादी नीतियों का भी विरोध करना होगा , जिसके अंतर्गत बड़ी कम्पनियों के छूटो , अधिकारों को हर क्षेत्र में बढाया जा रहा है तथा विभिन्न क्षेत्रो में जनसाधारण हिस्सों के छूटो , अधिकारों को खुलेआम काटा – घटाया जा रहा है |इसमें उन्हें देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने के प्रति नर्म और विदेशी निवेश के प्रति ही विरोध में भी बहकने से भी बचना होगा | फुटकर व्यापार के संदर्भ में हम स्पष्ट देख सकते है कि इस क्षेत्र में विदेशी निवेश का अनुमोदन खुद इस देश के बड़े कम्पनियों के संगठन कर रहे है | इसका साफ़ मतलब है इस देश कि बड़ी कम्पनिया यहा के फुटकर दुकानदारों के साथ नही है | बल्कि उनके विरोध में विदेशियों के साथ खड़े है | आम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे डीलरो , स्टाकिस्टो को देशी व विदेशी बड़ी कम्पनियों के अधिग्रहण के विरोध में खड़ा होना होगा | इसी तरह से उन्हें फुटकर व्यापार के बारे में बड़ी कम्पनियों के हिमायतियो तथा सरकारों द्वारा चलाए जा रहे तर्को – कुतर्को का भी संगठित रूप में जबाब देने के लिए स्वंय को तैयार करना होगा |

उदाहरण —-(1) उन्हें यह तथ्य जरुर जानना चाहिए कि इस देश में लगभग 4 करोड़ लोगो को इस क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है | ( 2) इस तरह देश के कुल रोजगार का 11% हिस्सा फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | इस मामले में यह कृषि के बाद स्वरोजगार का दुसरा बड़ा क्षेत्र है संभवत: 4 करोड़ लोगो के परिवारों कि 20 या 22 करोड़ कि आबादी का जीवन – यापन फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | ( 3) खुदरा व्यापार में देश की बड़ी कम्पनियों और अब विदेशी निवेश के लिए यह तर्क भी दिया जाता है कि ‘ फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बिचौलियों की समाप्ति हो जायेगी | किसान व उत्पादन में लगी अन्य छोटी इकाइयों द्वारा अपना माल , सामान सीधे माल शापिंग माल को दिया जाएगा | जहा से वह सीधे उपभोक्ता के हाथ पहुच जाएगा |’ कोई भी आदमी समझ सकता है कि फुटकर व्यापार अपने आप में बिचौलियागिरी का धंधा है | चाहे वह छोटी दुकानदारी के रूप में हो या फिर माल शाप के रूप में हो | फिर इन सबके साथ डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे बिचौलियों का समूह भी खड़ा रहता है | अत: फुटकर दुकानदारी के जरिये बिचौलियागिरी को समाप्त करने का ब्यान भी एक धोखा है |(4)जहा तक किसानो को शापिंग माल में अपना माल बेहतर मूल्य पर बेचने और उपभोक्ता द्वारा सस्ता खरीदने की बात है तो दोनों ही बाते गलत है | फुटकर व्यापार में बड़ी कम्पनियों के आगमन से बहुतेरे फुटकर दुकादारो को अपना माल बेचने और उपभोक्ता द्वारा उन दुकानदारों से मोल भाव कर सौदा लेने की क्षमताओं में गिरावट आ जानी है | क्योंकि अब बाज़ार पर थोड़े से , पर विशालकाय माल शाप के मालिको का एकाधिकार बढ़ जाना है | और किसानो व अन्य उत्पादकों की तथा उपभोक्ताओं की यह मजबूरी बढती जायेगी कि वह बाज़ार पर अधिकार जमाए हुए बड़ी कपनियो के आगे समर्पण कर दे | उसी के निर्देशानुसार चले | ( 5) अभी तक कि बाज़ार व्यवस्था स्थानीय स्तर पर बाज़ार का संतुलन स्थानीय खरीद – बिक्री पर टिका हुआ है | क्योंकि हर आदमी स्थानीय स्तर पर खरीदने के लिए वहा के स्थानीय लोगो के साथ अपना शारीरिक व मानसिक श्रम या अपना माल , सामान बेचता रहा है | लेकिन फुटकर व्यापार में देशी व विदेशी धनाढ्य कम्पनियों के बढ़ते चढ़ते घुसपैठ से अपने स्थानीय लेन- देन के सम्बन्ध व संतुलन में दरकन टूटन का आना निश्चित है |क्योंकि फुटकर दुकानदार केवल स्थानीय स्तर का विक्रेता ही नही है , बल्कि वह स्थानीय स्तर पर उत्पादित मालो , सामानों का खरीदार होने के साथ – साथ शिक्षा , चिकित्सा , न्याय , कानून आदि कि सेवाओं का खरीदार भी होता है | बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर बाज़ार व्यापार के अधिकाधिक अधिग्रहण के साथ स्थानीय स्तर के खरीद – बिक्री के आपसी संबंधो का भी अधिग्रहण हो जाता है | जिसका परिणाम अन्य क्षेत्र के लोगो के पेशे , धंधे के टूटन के रूप में ही आना निश्चित है |
इसलिए फुटकर दुकानदारी से टूटकर तथा स्थानीय , व्यापारिक , सामाजिक संबंधो से टूटकर स्थानीय फुटकर दुकानदारों में भी संकट का तेज़ी से बढना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है |
इसीलिए किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारों को भी अपना स्थानीय समितिया बनाकर देश की बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर दुकानदारी का किए जा रहे अधिग्रहण के विरुद्ध ,फुटकर दुकानदारी में विदेशी निवेश के विरुद्ध केंद्र सरकार द्वारा बनाये जा रहे कानून के विरुद्ध तथा प्रांतीय व स्थानीय स्तर पर उन्हें दिए जा रहे छूट के विरुद्ध संघर्ष में उतर जाना चाहिए | इसी के साथ उन्हें किसानो , मजदूरों एवं अन्य कारोबारियों के साथ इस घुसपैठ को बढाने वाली वैश्वीकरणवादी नीतियों को खारिज किए जाने के लिए और अपने अस्तित्व कि रक्षा के लिए करो या मरो का नारा बुलंद करके आन्दोलन शुरू कर देना चाहिए |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

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छत्तीसगढ़ राज्य ने भारत सरकार द्वारा 03.05.2011 को दाखिल किए गए हलफनामे पर बहुत विश्वास व्यक्त किया। इस हलफनामे में एस0पी0ओ0 की नियुक्ति, सेवा शर्ते एवं प्रशिक्षण से सम्बंधित चर्चा हैं। भारत सरकार द्वारा जो नीति सम्बंधी वक्तव्य दिए गए कि कैसे बाएँ बाजू वाले उग्र्रवाद से निपटा जाए-यह भी उस शपथ पत्र में सम्मिलित हैं। भारत सरकार के हलफनामे की संक्षिप्त रूपरेखा निम्नलिखित है:- 1. पुलिस एवं पब्लिक व्यवस्था राज्य का विषय है एवं राज्य सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है। कुछ विशिष्ट मामलों में केन्द्रीय सरकार, एस0आर0ई0 योजना के माध्यम से राज्य सरकार के प्रयासों के पूरक के रूप में कार्य करती है। यह योजना इसलिए विकसित की गई है कि उन राज्यों की सहायता की जाए जो सुरक्षा सम्बधी समस्याओं से जूझ रहे हैं जिसमें कि बाएँ बाजू का उग्रवाद भी शामिल है। वर्तमान समय में यह योजना 9 राज्यों (जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है) तथा 83 जिलों में लागू है। इस एस0आर0ई0 योजना में राज्य की सुरक्षा सम्बंधी गतिविधियों पर खर्चे की भरपाई भारत सरकार द्वारा की जाती है। यह भी कहा गया है कि एस0पी0ओ0 को दिए जाने वाले वेतन भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न हैं। सर्वाधिक वेतन 3000 है और कम से कम 1500 है। 2. भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जहाँ तक एस0पी0ओ0 की नियुक्ति एवं कार्य प्रणाली का सम्बन्ध है, उसकी भूमिका हर राज्य के लिए एस0पी0ओ0 की संख्या की अपर सीमा के निर्धारण को सहमति प्रदान करने तक है तथा एस0पी0ओ0 की नियुक्ति, प्रशिक्षण, स्थानान्तरण की जिम्मेदारी सम्बंधित राज्य की है। भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य सरकारें कानून के अनुसार बिना केन्द्र सरकार तथा गृह विभाग के अनुमोदन के एस0पी0ओ0 की नियुक्ति कर सकती है। 3. भारत सरकार ने वक्तव्य दिया है कि ऐतिहासिक रूप से भिन्न-भिन्न राज्यों में एस0पी0ओ0 ने कानून व्यवस्था एवं सशस्त्र विद्रोह से निपटने के लिए विशिष्ट भूमिका अदा की है। इस सम्बन्ध में बाएँ बाजू के उग्रवाद के बारे में भारत सरकार ने अपने हलफनामे में टिप्पणी की है कि पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने जन मिलीशिया नामक एक सेना को स्थानीय लोगों से बनाया है जिनका, स्थानीय क्षेत्र, बोली एवं स्थानीय जनसंख्या से, परिचय होता है। राज्य सरकारों द्वारा एस0पी0ओ0 की नियुक्ति के पीछे जो तर्क है वह यह है कि स्थानीय होने के नाते वे माओवादी उग्रवादियों से अच्छी तरह से निपट सकते हैं। लगभग 70046 एस0पी0ओ0 की नियुक्ति एस0आर0ई0 के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न राज्यों के द्वारा की गई थी। उनके वेतन आदि का भुगतान भारत सरकार द्वारा किया गया। 33. यहाँ पर यह कहना आवश्यक है भारत सरकार के हलफनामे से यह स्पष्ट नहीं है कि छत्तीसगढ़ में एस0पी0ओ0 के प्रयोग से विशिष्ट पहलुओं पर सरकार का रवैया क्या है? जैसे कि एस0पी0ओ0 को हथियार प्रदान करना, उनके प्रशिक्षण की प्रकृति एवं उनको सौंपे गए दायित्व। हलफनामे की भाषा से स्पष्ट है कि एस0पी0ओ0 पुलिस बलों की संख्या बढ़ाएँगे। इसमें यह नहीं बताया गया है कि बलवर्धक सेना की अवधारणा क्या है और कैसे इसे बलवर्धक बनाया जाएगा। बगैर अवधारणा की व्याख्या किए हुए केन्द्रीय सरकार का कथन है कि एस0पी0ओ0 ने सूचना एकत्रित करने, स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा, एवं गड़बड़ी वाले क्षेत्रों में सम्पत्ति की सुरक्षा करने मंे विशिष्ट भूमिका अदा की है। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार ने 3 अन्य बातें एस0पी0ओ0 के बारे में कही है:- 1. जिला पुलिस की सहायता महत्वपूर्ण है क्योंकि वे नियमित रूप से एक स्थान पर रहते हैं जबकि सेना/ सी0पी0एम0एफ0 अक्सर एक स्थान पर लगाई जाती है, फिर हटा लिया जाता है, फिर अन्यत्र लगाया जाता है। 2. केन्द्र सरकार यह चाहती है कि एस0पी0ओ0 को कानूनी रूप से शक्ति, जुर्माना, अधीनता आदि के सम्बन्ध में दूसरे पुलिस अधिकारियों के बराबर समझा जाए। 3. एस0पी0ओ0 की राज्य सरकार की क्रियात्मक योजना में सशस्त्र विद्रोह से निपटने, आतंकवादियों से लड़ने एवं कानून व्यवस्था बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। 33. इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार द्वारा यह भी कहा गया है कि प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की शक्ति बढ़ाने की आवश्यकता है। राज्य सरकार द्वारा बहुत से कदम उठाए जाने के बावजूद भी सी0पी0आई0 माओवादियों ने अंधाधुंध रूप से राज्य में हिंसा को फैलाया। इस सम्बन्ध में केन्द्र सरकार का कथन है कि वर्ष 2010 में कुल 1003 लोग, जिनमें कि 18 नागरिक, 285 सुरक्षा बलों के लोग, पूरे भारत वर्ष में नक्सल वादियों के द्वारा मारे गए। मारे गए नागरिकों में से 323 लोगों को केवल पुलिस का मुखबिर समझ कर मार दिया गया। 34. केन्द्र सरकार अपने हलफनामे को इस प्रकार से समाप्त करती है ‘‘केन्द्र सरकार निर्दोष नागरिकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा प्रदान करने के लिए कटिबद्ध है। भारत सरकार ने राज्य सरकारों पर जोर दिया है कि माओवादी हिंसा से निपटते समय सुरक्षा बल अत्यन्त सतर्कता एवं संयम से कार्य करें। भारत सरकार राज्य सरकारांे को, सम्पूर्ण जाँच एवं पुष्टि के बाद कांस्टेबिल के प्रशिक्षण स्तर सुधारने के लिए, मानवाधिकारों के सम्बन्ध में उनको शिक्षित करने के लिए विशेष निर्देश प्रेषित करेगी। उसमें यह भी कहा है कि कांस्टेबिल और एस0पी0ओ0 जब प्रभावित क्षेत्रों में कोई अभियान चला रहे हों तो उनके अंदर कठोर अनुशासन और कानून का पालन सुनिश्चित करें। 35. यहाँ पर यह भी कहना आवश्यक है कि वह कानूनी व्यवस्था जिसके तहत एस0पी0ओ0 की नियुक्ति की गई एवं जिसके तहत उनके कर्तव्यों एवं भूमिका की विवेचना की गई है निम्नलिखित हंै:- इण्डियन पुलिस एक्ट की धारा 17 में विशिष्ट पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि जब ऐसा प्रतीत होगा कि किसी अवैध जनसमूह के इकट्ठा होने के कारण दंगा अथवा शांतिभंग की बाधा उत्पन्न हुई है एवं पुलिस बल जो सामान्यतः लगाई गई है वह शंाति को बहाल करने में अपर्याप्त है अथवा नागरिकों की सुरक्षा एवं उनकी सम्पत्ति की सुरक्षा करने में समर्थ नहीं है तो ऐसे समय में कोई पुलिस अधिकारी जो इंस्पेक्टर स्तर के नीचे का नहीं है वह निकटवर्ती मजिस्टेªट के समक्ष इस आशय का प्रार्थना पत्र दे सकता है कि वह अपने पड़ोस के व्यक्तियों में से जितनी कि उसको आवश्यकता हो, की नियुक्ति विशिष्ट पुलिस अधिकारी के रूप में उतने समय के लिए एवं उस सीमा तक कर सकता है जितना कि वह आवश्यक समझे, यदि मजिस्टेªट जिसको आवेदन दिया गया है इसके विपरीत फैसला न दे। विशिष्ट पुलिस अधिकारियों की शक्तियाँ विशिष्ट पुलिस अधिकारी को वही शक्तियाँ, विशेष अधिकार एवं सुरक्षा प्रदान की जाएगी जितनी कि उसको अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक हो एवं उनको वही दण्ड दिया जाएगा एवं वे उसी पुलिस अधिकारी के अधीन होंगे जैसा कि सामान्य पुलिस अधिकारी। विशिष्ट पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्त होने के पश्चात यदि कोई व्यक्ति बिना उचित कारण के अपने कर्तव्य की अवहेलना करता है या पूरा करने से इंकार करता है या कानूनी आदेशों या निर्देशों को मानने से इंकार करता है तो उसके ऊपर मजिस्टेªट के समक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है एवं सजा होने पर उस पर प्रत्येक अवज्ञा के लिए 50 रूपये तक जुर्माना किया जा सकता है। 36. सन् 2007 में छत्तीसगढ़ राज्य ने छत्तीसगढ़ पुलिस एक्ट 2007 का प्रावधान किया, इस पुलिस एक्ट के कुछ सम्बंधित अंश यहाँ पर उद्घृत किए जाते हैं:- धारा-1 सरकारी गजट में प्रकाशन के दिवस से यह कानून अस्तित्व में माना जाएगा। धारा-2 (एन0) पुलिस अधिकारी से तात्पर्य पुलिस बल के किसी सदस्य से है जिसकी नियुक्ति इस अधिनियम के तहत या अधिनियम के शुरू होने से पहले की गई एवं इसमें भारतीय पुलिस सेवा अथवा किसी दूसरे पुलिस बल का सदस्य जो राज्य पुलिस के लिए आन डेपुटेशन भेजा गया है, सम्मिलित है। धारा-2 (के.) निर्धारित से तात्पर्य कानून द्वारा निर्धारित से है। धारा-9 (एल.) पुलिस कप्तान, किसी भी समय लिखित आदेश से किसी भी व्यक्ति को विशिष्ट पुलिस अधिकारी के रूप में उतने समय के लिए नियुक्त कर सकता है जितना की पुलिस आदेश में वर्णित हो। धारा-23 एक पुलिस अधिकारी के निम्नलिखित कार्य एवं उत्तरदायित्व होंगेः- अ. कानून को लागू करना, जीवन, स्वतंत्रता, सम्पत्ति एवं व्यक्ति के अधिकारों एवं गौरव को सुरक्षा प्रदान करना। ब. अपराध एवं सार्वजनिक गड़बड़ी को रोकना। स. जन व्यवस्था बनाए रखना। य. आन्तरिक सुरक्षा की देख-रेख करना। आतंकवादी गतिविधियों को रोकना, नियंत्रित करना एवं सार्वजनिक शान्ति को भंग होने से बचाना। र. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना। ल. अपराध का पता लगाना एवं अपराधियों को कानून की परिधि में लाना। व. उन व्यक्तियों को गिरफ्तार करना जिनको गिरफ्तार करने के लिए वह कानूनी रूप से अधिकृत है एवं जिनकी गिरफ्तारी के लिए उपयुक्त आधार मौजूद हों। श. पारस्परिक एवं मानवनिर्मित विपदा परिस्थितियों में मानवों की सहायता करना एवं दूसरी एजेन्सियों की राहत कार्यों में मदद करना। ख. व्यक्तियों एवं गाडि़यों को सुव्यवस्थिति करना एवं ट्रैफिक को नियमित एवं नियंत्रित करना। ष. सार्वजनिक शान्ति एवं अपराध से सम्बन्धित मामलों के सम्बन्ध में उनके कर्तव्य के निवर्हन मे ंसुरक्षा प्रदान करना। क्ष. ऐसे कर्तव्यों को करना एवं उत्तरदायित्वों को पूरा करना जो कानून द्वारा आदेशित किए गए हों अथवा किसी ऐसे अधिकारी के द्वारा निर्गत किए गए हो जो कानून के अन्तर्गत इस प्रकार के आदेशों को निर्गत करने के लिए अधिकृत हो। धारा 24 प्रत्येक पुलिस अधिकारी को हर समय ड्यूटी पर समझा जाएगा जबकि उसकी नियुक्ति राज्य के अन्दर व बाहर पुलिस अधिकारी के रूप में की गई हो। धारा 25 कोई पुलिस अधिकारी किसी रोजगार या कार्य में इस धारा के तहत अपने कर्तव्यों को छोड़कर लिप्त नहीं हो सकता। उसको तभी ऐसा करने की अनुमति मिल सकती है जबकि राज्य सरकार द्वारा लिखित में ऐसा करने की इजाजत दी गई हो। धारा 50 (1) राज्य सरकार इस धारा की उद्देश्य की पूर्ति के लिए कानून का निर्माण कर सकती है। शर्त यह है कि वर्तमान पुलिस कानून तब तक जारी रहेंगे जब तक उनमे परिवर्तन न किया जाए या जब तक उन्हें रद्द न किया जाए। धारा 50 (2) इस धारा के तहत निर्मित सभी कानून जितनी जल्दी सम्भव हो सके राज्य विधायिनी के सम्मुख प्रस्तुत किए जाएँगें। धारा 53 (1) भारतीय पुलिस एक्ट 1861 की धारा 5 छत्तीसगढ़ राज्य के उपयोग के लिए रद्द की जाती है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि न तो धारा 9 (1) न धारा 9 (2) के अंतर्गत ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख है जिसके द्वारा पुलिस कप्तान किसी व्यक्ति को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त कर सकें। बिना किसी सीमा निर्धारण के ऐसा करना उनको विवेक प्रदान करना है जैसे कि एस0पी0ओ0 की संख्या कितनी होगी एवं उनकी नियुक्ति, उनका प्रशिक्षण किस प्रकार का होगा आदि। इस प्रकार की शक्ति का प्रदान करना संविधान की धारा 24 का उल्लघंन होगा। दण्ड संहिता 2007 की
धारा 9 (1) एवं धारा 9 (2) की तुलना भारतीय पुलिस एक्ट की धारा 17 जो कि अंग्रेजी युग का कानून है, से की जा सकती है। इस धारा के अंतर्गत ऐसी परिस्थितियों का वर्णन है जिसमें इस प्रकार की नियुक्तियों के लिए अनुमति दी जा सकती है, अगर शर्तें पूरी हो रही हों। भारतीय दण्ड संहिता 2007 की धारा 9 (2) में इस प्रकार की परिस्थितियों का उल्लेख नहीं किया गया है। इसी प्रकार दण्ड संहिता 2007 की धारा 23 में वर्णित कार्य एवं उत्तरदायित्व जैसा कि एक एस0पी0ओ0 को दिया जा सकता है, धारा 23 (ए0)(एच0) एवं धारा 23 (1) (आई)(ए0) को छोड़कर सभी में समाप्त कर दिया गया है।
39. हालाँकि छत्तीसगढ़ राज्य ने इस अदालत द्वारा इस मामले की विस्तार पूर्वक सुनवाई करने के उपरान्त नवीन विनियमतीकरण प्रक्रियाआंे की सूची दाखिल कर दी है, फिर भी हमने उसका पुनरावलोकन किया है। हम नवीन नियमावली से न ही प्रभावित हैं और न ही यह नियमावली ऐसा विश्वास जागृत करती है जिससे की स्थिति पहले से बेहतर हो सके।
40 इस नवीन नियमावली के कुछ अंश यहाँ पर साक्ष्य के रूप में वर्णित किए जाते हैं। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति हेतु जिन परिस्थितियों का उल्लेख है उनमें वह परिस्थिति भी शामिल है जिसमें आंतकवादी या उग्रवादी घटनाएँ अथवा इन घटनाओं का भय शामिल हो। अर्हता के सम्बन्ध में नियम यह कहते हैं कि अगर दूसरी अन्य योग्यताएँ पूरी हों तो वह व्यक्ति जो 5वीं पास हैं उसको वरीयता दी जाएगी। इसके अतिरिक्त नियमों में यह भी कहा गया है कि क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं को रोकने एवं नियंत्रित करने में एस0पी0ओ0 पुलिस की सहायता करेंगे, क्योंकि आतंकवादी एवं उग्रवादी घटनाएँ इन परिस्थितियों में शामिल हैं। क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं से यह स्पष्ट है कि एस0पी0ओ0 की नियुक्ति सशस्त्र विद्रोह दमन करने के लिए की गई है। नियमावली की भाषा से यह स्पष्ट है कि उनकी भूमिका केवल मार्गदर्शक एवं पथ प्रदर्शक तक नहीं सीमित है। वहाँ उन्हें उग्रवादियों तथा आतंकवादियों से सीधे लड़ना भी है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त व्यक्तियों को दिया जाना है, यदि पुलिस कप्तान के विचार में उनके लिए प्रशिक्षण आवश्यक है। किसी भी दशा में प्रशिक्षण तभी दिया जाएगा जबकि नियुक्त व्यक्ति को कम से कम एक वर्ष के लिए नियुक्त किया गया हो एवं उसको सुरक्षा के लिए हथियार प्रदान किए गए हों। ऐसा प्रशिक्षण कम से कम 3 महीने के लिए होगा। यह नियुक्ति पूरी तरह से अस्थायी होगी एवं पुलिस कप्तान के द्वारा बिना कारण बताए ही ये सेवाएँ समाप्त की जा सकती हैं। एस0पी0ओ0 को वही वेतन एवं दूसरे लाभ प्राप्त होंगे जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर स्वीकृत किए जाएँगे।
41. यहाँ पर हमें इन मामलों में भारत सरकार की भूमिका पर सर्वाधिक आश्चर्य है। वास्तव में यह सत्य है कि पुलिस एवं कानून व्यवस्था राज्य का विषय है फिर भी भारत सरकार को अपनी भूमिका पर और बल देना चाहिए। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा की जाएगी एवं केन्द्र सरकार की भूमिका एस0पी0ओ0 की कुल संख्या के निर्धारण में सहमति प्रदान करना एवं उनको दिए गए वेतन की वापसी करना है। केन्द्र सरकार ने कोई निर्देश नहीं दिए कि एस0पी0ओ0 की नियुक्ति कैसे की जाएगी, उनका प्रशिक्षण किस प्रकार होगा एवं उनको किस उद्देश्य के लिए लगाया जाएगा। इस सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं किया है। संविधान के अनुच्छेद 355 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि केन्द्र सरकार का यह दायित्व होगा कि वह प्रत्येक राज्य को बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अव्यवस्था से सुरक्षा प्रदान करे। वह यह भी सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य संविधान के उपबंधों के अनुसार अपना कार्य सम्पादित कर रहा है। संविधान राज्य पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एवं कुछ दशाओं में जो नागरिक नहीं हैं उनकी भी सुरक्षा के दायित्व को पूरा करे एवं भारत के लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे जिससे कि उनकी मानवीय गरिमा अक्षुण्य बनी रहे एवं भाईचारे की परिधि में वे जीवन व्यतीत करें। यह अत्यन्त आश्चर्य जनक है कि केन्द्रीय सरकार ने इस निर्देश के उपरान्त छत्तीसगढ़ राज्य में एस0पी0ओ0 के सम्बन्ध में अपनी भूमिका को रेखांकित किया। उसका यह दावा कि उसकी भूमिका सीमित है, उचित नहीं है। केन्द्र सरकार के हलफनामे पर एक सरसरी नजर भी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह इसलिए दाखिल किया गया है ताकि सरकार कम उत्तरदायित्व का बहाना बनाकर कानूनी शरण ले सके। सरकार को चाहिए था कि वह गम्भीर संवैधानिक मुद्दों पर अपनी चिन्ता व्यक्त करती।
42. मामले की सच्चाई यह है कि केन्द्र सरकार द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता ही छत्तीसगढ़ राज्य को इस योग्य बना रही है कि वह अर्द्ध साक्षर आदिवासी नौजवानों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करे। उनको हथियार प्रदान किए जा रहे हैं ताकि वे उन कार्यों को पूरा कर सकें जिसको पूरा करने का दायित्व नियमित एवं औपचारिक रूप से गठित पुलिस बलांे पर है। इस प्रकार के हजारों एस0पी0ओ0 की नियुक्ति की जा चुकी है एवं उनको तीन हजार प्रतिमाह वेतन भी दिया जा रहा है। केन्द्र सरकार उसकी भरपाई भी कर रही है। केन्द्र सरकार ने यह उचित नहीं समझा कि वह आदिवासी नवयुवकों, की माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने में उनकी क्षमता का मूल्यांकन करे। केन्द्र सरकार विश्वास करती है कि उसका संवैधानिक उत्तरदायित्व केवल इतना है कि वह एस0पी0ओ0 की अधिकतम संख्या का
निर्धारण करे। राज्य द्वारा, दिए गए धन का प्रयोग किस प्रकार किया जाएगा, यह उसकी चिन्ता का विषय नहीं है। अपने सितम्बर में दिए हुए हलफनामे में, केन्द्र सरकार ने बल दिया है कि वह केवल राज्य सरकार को निर्देश प्रदान करती है कि वे किस प्रकार कान्सटेबिल एवं एस0पी0ओ0 की गूढ़ जाँच के उपरान्त नियुक्त करे। उनके प्रशिक्षण का स्तर सुधारे तथा उन्हें मानवाधिकार के बारे में शिक्षित करे। यह सब हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए विवश कर देता है कि केन्द्र सरकार ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन ठीक प्रकार से नहीं किया है। यह सच्चाई कि अब भी केन्द्र सरकार यह समझती है कि उसका उत्तरदायित्व केवल राज्य सरकार को निर्देश देने तक सीमित है, हमें यह कहने पर विवश कर देती है कि क्या केन्द्र सरकार उस खराब स्थिति को सुधारने में आवश्यक कदम उठाएगी जिसकी उत्पत्ति के लिए जाने अनजाने में वह स्वयं जिम्मेदार है।
43. अब यह स्पष्ट है, जैसा कि वादियों के द्वारा कहा गया है, कि हजारों आदिवासी नौजवान, केन्द्र सरकार की सहमति से राज्य सरकार द्वारा माओवादियों से लड़ने के लिए नियुक्त किए जा रहे हैं। आँकडे़, जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य एवं केन्द्र सरकार के हलफनामे में कहा गया है, यह स्पष्ट करते हैं कि दावे के विपरीत आदिवासी नवयुवकों को लड़ाई विहीन भूमिका के लिए जैसे पथ प्रदर्शक, मार्गदर्शक, गुप्तचर एवं कानून व्यवस्था को बनाए रखने के स्थान पर उनका प्रयोग माओवादी एवं नक्सलियों से लड़ने के लिए किया जा रहा है। राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार दोनों यह स्वीकार करती हैं कि राहत शिविर एवं सुदूर गाँव, जिनमें कि एस0पी0ओ0 की भर्ती की जाती है एवं जहाँ उन्हें कार्य करने के लिए निर्देशित किया जाता है उन टावरों पर हजारांे आक्रमण किए गए हैं। इससे यह स्पष्ट है प्रत्येक हमले में एस0पी0ओ0 को माओवादियों से खुली लड़ाई लड़नी पड़ी होगी। छत्तीसगढ़ राज्य ने यह स्पष्ट किया है कि हजारों आम नागरिकों को नक्सलवादियों द्वारा उन्हें पुलिस का मुखबिर कहकर मार दिया गया है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि एस0पी0ओ0, माओवादी एवं नक्सलवादियों के द्वारा किए गए हमलों का सीधा एवं प्रथम निशाना हैं न कि यदा कदा किए गए आकस्मिक हमलों का शिकार। नए नियम से स्थिति और बदतर हो जाती है क्योंकि उसमें कहा गया है कि जिन व्यक्तियों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया, वे पुलिस की विशिष्ट समस्याओं को रोकने एवं नियंत्रित करने में मदद करेंगे, जिसमें आतंकवादी एवं उग्रवादी गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
ऐसा कोई निर्देश नहीं है कि वे लड़ाईविहीन भूमिका में प्रयोग किए जाएँगे या ऐसी भूमिका के लिए प्रयोग किए जाएँगे जहाँ उन्हें उग्रवादी एवं आतंकवादी आक्रमण का भय न हो।
43. यह पूरी तरह से स्पष्ट है जैसा कि वादियों ने भी कहा है, हजारों आदिवासी नवयुवकों का जीवन जिन्हें एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया है गंभीर खतरे में है क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में माओवादी/ नक्सलियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने में लगे हुए हैं। 173 एस0पी0ओ0 ने एक खूँखार लड़ाई में अपने जीवन का बलिदान दे दिया जैसा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया है। यह इस बात का स्पष्ट सुबूत है। यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 538 पुलिस एवं सी0ए0पी0एफ0 कर्मचारी भी मारे गए हैं। 2004 से 2011 के मध्य में छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ गतिविधियों में नियमित सुरक्षा बलों की 40 बटालियनें तैनात की गईं। यदि प्रत्येक बटालियन की औसत तादाद 1000 से 1200 के बीच लगाई जाए तो औपचारिक सुरक्षा कर्मियों की मृत्यु का औसत, कुल सुरक्षाकर्मियों की तुलना में मोटे तौर पर 538 और 45 से 50 हजार के मध्य औसत है। यह अपने आप में स्वयं एक चिंता का विषय है। एस0पी0ओ0 की संख्या पिछले वर्ष 3000 थी एवं अब वह 6500 हो गई हैं। मारे गए एस0पी0ओ0 की संख्या लगभग 3 हजार है। इस संख्या का अनुपात एस0पी0ओ0 की कुल संख्या के अनुपात में बहुत अधिक है। सामान्य सुरक्षा बलों की तुलना में एस0पी0ओ0 की मृत्यु की उच्च दर इस बात को सूचित करती है कि एस0पी0ओ0 प्रथम पंक्ति की लड़ाई में लगे हुए हैं अथवा अपनी भूमिका के कारण अत्यधिक खतरनाक परिस्थितियों में रखे जा रहे हैं एवं उनकी सुरक्षा की सामान्य पुलिस बलों की तुलना मंे पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई है।
44. यह बात भी हमें स्पष्ट है कि स्थानीय नवजवानों को माओवादी सशस्त्र विद्रोह के विरुद्ध प्रयोग करने की नीति के कारण नवजवान आदिवासी दांतेवाड़ा और छत्तीसगढ़ के दूसरे जिलों में एक प्रकार से मौत के कुओं में सबसे आसान शिकार बन गए हैं। इन नवयुवकों को दिया हुआ प्रशिक्षण भी अपर्याप्त है। आधुनिक सशस्त्र विद्रोह से निपटने के लिए अत्याधुनिक हथियारों, आँकड़ों के विश्लेषण निरीक्षण आदि की आवश्यकता है। विभिन्न रिपोर्टों के आधार पर एवं जैसा कि राज्य स्वयं दावा करता है क माओवादी अपने आपको अधिक वैज्ञानिक तरीके से लैस कर रहे हैं एवं उनके पास आधुनिकतम् किस्म के हथियार मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि नवयुवकों के पास किसी प्रकार की औपचारिक शिक्षा नहीं है। दो महीने के अंदर विश्लेषणात्मक क्षमता, कानूनी दाँव पेंच एवं इस क्षेत्र में अन्य पहलुओं को कैसे सीख लेंगे। उनका यह भी दावा है कि यह प्रशिक्षण माओवादियों के सशस्त्र विद्रोह को दमन करने के लिए पर्याप्त है। यह दावा अत्यन्त आश्चर्यजनक है।
45. छत्तीसगढ़ राज्य ने स्वयं कहा है कि इन आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करते समय उन लोगों को अधिक वरीयता दी जाएगी जो कक्षा 5 उत्तीर्ण हंै। इससे यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि अधिकतर भर्ती किए गए एस0पी0ओ0 कक्षा 5 भी उत्तीर्ण नहीं है। नए नियमों से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ राज्य इन कम पढ़े लिखे नवयुवकों को एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त करता रहेगा। यह
अत्यधिक आश्चर्यजनक है कि छत्तीसगढ़ राज्य यह आशा करता है कि ये नवजवान आई0पी0सी0 एवं इण्डियन पुलिस कोड एवं भारतीय दण्ड संहिता जैसे जटिल विषयों को आसानी से सीख सकेंगे। इससे भी ज्यादा आश्चर्य जनक बात यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि इस प्रकार का प्रशिक्षण एक घण्टे प्रतिदिन के हिसाब से 24 वादनों में उन्हें प्राप्त करा दिया गया है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राज्य यह भी दावा करता है कि 12 अतिरिक्त वादनों में मानवाधिकार एवं भारतीय
संविधान के अन्य अनुबन्ध का भी प्रशिक्षण दिया गया है। इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार दावा करती है कि उसने 6 वादनों में उन्हें पुलिस प्रक्रिया की वैज्ञानिक एवं विस्फोट सम्बंधी जानकारी प्रदान कर दी है। ये सारी चीजें एक महीने की अलग से टेªनिंग प्रदान करके ऐसे नवयुवकों को दी गई है जो 5वीं भी नहीं पास हैं।
46. हमारा विचार है कि ये दावे विश्वसनीय नहीं हंै। यदि कोई व्यक्ति यह भी मान ले कि इस प्रकार के पाठ वास्तव में पढ़ाए गए, तो भी किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि आदिवासी नवयुवक जो कक्षा 5 भी उत्तीर्ण नहीं हैं वे पढ़ाए जाने वाले विषयों को बारीकी से समझ सकेंगे एवं माओवादियों के द्वारा जारी सशस्त्र विद्रोह का मुकाबला करने की क्षमता प्राप्त कर सकेंगे।
47. छत्तीसगढ़ राज्य स्वीकार करता है कि इन आदिवासी नवजवानों में
अधिकतर नवयुवकों को, जिनको कि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किया गया है, हथियार और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ प्रदान की गई हैं एवं नए नियमों के तहत भविष्य में भी प्रदान की जाती रहेंगी। छत्तीसगढ़ राज्य ये दावा करता है कि यह हथियार उन्हें आत्म सुरक्षा हेतु दिए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि आदिवासियों की शिक्षा एवं प्रशिक्षण को मद्देनजर रखते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनके पास आवश्यक विश्लेषणात्मक एवं बौद्धिक क्षमता नहीं होगी, कि वे आत्म सुरक्षा जैसे विधिक शब्द की परिभाषा को समझ सकें। यदि इसका गलत प्रयोग किया गया तो उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक चार्ज लगाए जाएँगे। यदि हम कुछ क्षण के लिए यह स्वीकार कर लंे कि नवजवानों को गुप्त सूचना एकत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है, तब भी इस प्रकार की भूमिका अत्यधिक खतरनाक है। उनको ऐसी परिस्थितियों में रखा जा रहा है जिसमें कि आत्म सुरक्षा एवं अनचाही फाइटिंग की विभाजन रेखा बहुत बारीक हो जाती है। इस कार्य के लिए उच्च श्रेणी के विवेक की आवश्यकता होती है। उनके शैक्षिक स्तर को देखकर यह स्पष्ट है कि उनके अन्दर इस प्रकार के निर्णय लेने की क्षमता नहीं होगी एवं निम्न शैक्षिक स्तर के कारण यदि उन्हंे प्रशिक्षण दिया गया तो भी उनके अंदर यह क्षमता विकसित नहीं होगी।
48. छत्तीसगढ़ राज्य दावा करता है कि वह ऐसे आदिवासी नवयुवकों की भर्ती कर रहा है जो इस सम्बन्ध में स्वयं सेवक के रूप में तैयार हंै। यह भी दावा किया गया है कि अधिकतर नवजवान जो इस प्रकार के कार्य के लिए आगे आ रहे हैं उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित किया गया है क्योंकि वे अथवा उनका परिवार नक्सली हिंसा के शिकार हो चुके हैं एवं वे अपने परिवार को नक्सलियों के हमले से सुरक्षित करना चाहते हैं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अगर छत्तीसगढ़ सरकार के इन दावों को सही भी मान लिया जाए तब भी इससे छत्तीसगढ़ राज्य का नैतिक अपराध कम नहीं होता तथा इससे मानव अधिकारों के उल्लंघन की समस्या का समाधान नहीं हो जाता।
49. उनके निम्न शैक्षिक स्तर को
ध्यान में रखते हुए हम यह नहीं कह सकते कि वे सशस्त्र विद्रोह की कार्यवाहियों को, चाहंे वे आत्म सुरक्षा में ही क्यों न हों, समझ सकते हैं एवं अपने कार्य के कारण जिन अनुशासनात्मक एवं अपराध सम्बंधी धाराओं के वे भागीदार हो जाते हैं उनको भी वे नहीं समझ सकते हैं। आधुनिक न्याय शास्त्र के अनुसार हमें स्वतंत्र इच्छा एवं अभिलाषा की जटिल अवधारणा की मात्रा का मापन करना होगा। हमारे पास कोई ऐसी कसौटी नहीं है जिसके द्वारा हम उन एस0पी0ओ0 के रूप मंे नियुक्त नवजवानों की सहमति का मापन कर सकें। अतएवं हम यह नहीं कह सकते कि इन नवजवानों ने अपनी इच्छा से एस0पी0ओ0 बनने की सहमति प्रदान की।


इसके अतिरिक्त बहुत से नवयुवक बदले की भावना से प्रेरित हैं एवं उनके अन्दर क्रोध की भवना विद्यमान है। अतएव इस प्रकार के नवयुवकों को सशस्त्र विद्रोह को दमन करने की गतिविधियों में लगाने से परिणाम उल्टा हो सकता है। प्रथम यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि माओवादियों के द्वारा नए-नए तरीके प्रयोग किए जाने के कारण सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों को दमन करने के लिए एक शान्त एवं बुद्धिमान व्यक्ति की आवश्यकता है ताकि वह वर्तमान तथा भविष्य की
गतिविधियों का ठीक से विश्लेषण करे। क्रोध एवं घृणा की भावना इस प्रकार के विश्लेषण को अवरुद्ध कर देगी। द्वितीय क्रोध एवं घृणा की भावना दूसरे व्यक्ति के अन्दर शक की भावना उत्पन्न करेगी। यदि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त आदिवासी नवयुवकों के प्रमुख कार्यों में से एक कार्य माओवादियों अथवा उनके शुभचिंतकों की पहचान करना है तो इसकी पूरी संभावना है कि उनकी पहचान करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है अथवा प्रभावित होगी। स्थानीय शत्रुता, सामान्य सामाजिक संघर्ष एवं एस0पी0ओ0 के दमनकारी रवैय्ये के कारण पूरी संभावना है कि वे व्यक्ति जो माओवादी गतिविधियों से जुड़े हुए नहीं हैं उनको माओवादी अथवा माओवादी शुभचिंतक के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप गाँव का वातावरण प्रदूषित होगा एवं ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी जिसमें निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकारों का हनन किया जाएगा एवं कुछ और लोग भी राज्य के विरुद्ध हथियार लेकर खड़े हो जाएँगे।
51. बहुत से आदिवासी नवयुवक जिनके परिवारों के खिलाफ माओवादियों ने हिंसा की वारदातें की हैं वे पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुके हैं। निरन्तर क्रोध एवं घृणा की भावना रखने एवं उससे ग्रसित रहने के कारण वे अमानुषिकता के स्तर तक पहुँच चुके हैं। एक सभ्य एवं उत्तरदायी समाज की भूमिका द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करना है जिससे कि वे खराब अवस्था से वापस लौट सकें अथवा सामान्य मार्ग पर फिर से वापस आ सकें एवं उनका क्रोध एवं बदले की भावना शांत हो सके। ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करना एवं राज्य के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए उनको प्रयोग करना एक सभ्य समाज के नियमों के विपरीत है। कुछ भटके हुए नीति
निर्धारिकों के द्वारा इस प्रकार की स्थिति का नाजायज फायदा उठाना सबसे गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है।
52. छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दाखिल इन हलफनामों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि आदिवासी नवयुवकों को एस0पी0ओ0 के रूप में भर्ती करने का मुख्य प्रयोजन सामान्य सुरक्षा बलों की कमी को दूर करना है। यह परिस्थिति राज्य के सामाजिक और आर्थिक नीतियों की देन है। निजीकरण की नीति के कारण राज्य ने अपने आप को कमजोर कर लिया है एवं वह पर्याप्त आर्थिक संसाधन, सामाजिक गड़बड़ी को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगा पा रहा है। इन आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जबकि उनके अंदर आवश्यक शिक्षा एवं क्षमता विद्यमान नहीं है, सीधा अर्थ यही है कि सरकार एस0पी0ओ0 की कार्य क्षमता के बारे में उतना चिंतित नहीं है जितना कि वह धन के बारे में चिंतित है।
53. छत्तीसगढ़ राज्य का दावा है कि इस प्रकार का रोजगार प्रदान करके वह नए लोगों को रोजी दे रहा है एवं परिणाम स्वरूप संविधान की धारा-2 में वर्णित मूल्यों को प्रोत्साहित कर रहा है। अतः अदालत यह समझ पाने में असफल है कि मात्र साक्षर नवजवानों को सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों में लगाना, जहाँ कि उनके जीवन को ही गंभीर खतरा है, रोजगार किस प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार की
अवधारणा आवश्यक रूप से आदिवासी नवयुवकों के जीवन का अपमान है एवं मानव की गरिमा को नष्ट करना है।
54. हमें यह स्पष्ट है एवं छत्तीसगढ़ राज्य ने यह कहा भी है कि आदिवासी नवयुवक जो एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किए जाते हंै, को हथियार इस आधार पर दिया जा रहा है कि उन्हें वैधानिक रूप से पुलिस बल का सम्पूर्ण सदस्य समझा जाता है एवं उनको वही जिम्मेदारियाँ एवं उत्तरदायित्व दिए जा रहे हैं एवं उन पर भी वही अनुशासन संहिता लगाई जाती है जो सामान्य पुलिस बल पर। इन उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों में अपने जीवन को जोखिम में भी डालना है, फिर भी केन्द्र सरकार एवं छत्तीसगढ़ सरकार का विश्वास है कि इस दुरूह कार्य को करने के लिए उन्हें केवल 3000 रूपये का मानदेय प्रदान किया जाए।
55. आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति प्रकृति से अस्थाई है। वास्तव में उनको एक साल के लिए नियुक्त किया जाता है एवं अन्य एक साल के लिए इन्क्रीमेंट दिया जा सकता है। यह अत्यन्त संक्षिप्त समय है। नए नियमों के अन्तर्गत बिना किसी कारण के पुलिस अधीक्षक के द्वारा उनकी सेवाएँ समाप्त की जा सकती हैं। संक्षिप्त समय की यह नियुक्ति अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देती है जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा स्वीकार किया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य में माओवादी गतिविधियाँ 1980 के दशक से चल रही हैं एवं पिछले एक दशक में यह और भी अधिक शक्तिशाली हो गई है। छत्तीसगढ़ राज्य यह भी स्वीकार करता है कि उन्हें इन एस0पी0ओ0 को हथियार प्रदान करना है क्योंकि माओवादियों से उनके जीवन को गंभीर खतरा है। वास्तव में माओवादी, सामान्य नागरिकों को भी, पुलिस का मुखबिर कहकर मार देते हैं। स्पष्ट रूप से इन परिस्थितियों में यह कहना तर्कसंगत होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति उन्हें माओवादियों का स्पेशल निशाना बनने पर मजबूर कर देती है। छत्तीसगढ़ राज्य के पास कोई ऐसी योजना नहीं है जिसके द्वारा वह इन नवयुवकों की रक्षा कर सके। सेवा समाप्ति के पश्चात इन नवयुवकों को अपने हथियारों को जमा करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ कही भी माओवादी उन्हें पाएँगे, सीधा निशाना बना लेंगे। छत्तीसगढ़ राज्य ने यह भी बताया है कि नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 में से 1200 को अनुशासन हीनता एवं कर्तव्य की अवहेलना के कारण सेवा से निकाला जा चुका है। यह असाधारण रूप से एक बड़ी संख्या है। पिछले वर्ष तक नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या केवल 3000 थी। अब यह संख्या 6500 है। यह तथ्य कि भर्ती किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या में से 40 प्रतिशत को अनुशासन हीनता के लिए सेवा से निकाला गया है-इससे यह साबित होता है कि सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है। इस प्रकार की नीतियों को जारी रखने का परिणाम यह होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एक बड़ी संख्या, जब एस0पी0ओ0 के रूप में उनकी संक्षिप्त नियुक्ति समाप्त हो जाएगी तो वे एक बड़े खतरे में पड़ जाएँगे।
56. उपर्युक्त को केवल कोरी कल्पना नहीं समझा जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दिए गए आँकड़ों एवं परिस्थितियों से उपर्युक्त नतीजा स्पष्ट है। फिर भी यह समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। समस्या और भी खराब हो जाती है क्योंकि जिन क्षेत्रों में एस0पी0ओ0 की नियुक्ति हुई है वहाँ के सामाजिक ढाँचे के नष्ट होने की प्रबल संभावना है।
57. हम बार-बार छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार से पूछ चुके हैं कि वे इन नवयुवकों को दिए हुए हथियारों को क्यों वापस ले लेंगे। अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है। यदि इन हथियारों की वापसी के लिए बल का प्रयोग किया जाता है, बिना यह आश्वासन दिए कि वे अपने जीवन की सुरक्षा, सेवा समाप्त के उपरान्त, किस प्रकार करेंगे तो यह संभावना बलवती है कि ये नवजवान हथियारों को वापस करने से इंकार कर सकते हैं। परिणाम स्वरूप हमारे पास सशस्त्र नवयुवकों की एक बड़ी संख्या होगी जो अपने जीवन को बचाने के लिए भयभीत इधर उधर दौड़ रहे होंगे और कानून का उल्लंघन कर रहे होंगे। ऐसी परिस्थिति में यह भी संभव है कि वे राज्य के खिलाफ खड़े हो जाएँ या कम से कम सुरक्षा बलों के खिलाफ भी हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं अथवा अपने जीविकोपार्जन के लिए हथियारों का प्रयोग समूह बनाकर समाज के विरुद्ध स्वयं कर सकते हैं।
58. मानवाधिकार संगठनों द्वारा यह बात बार-बार कही जा रही है कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति के कारण, जिनको कोया कमाण्डो अथवा सलवा जुडूम भी कहा जाता है,
मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अतिरिक्त बहुत सी लूट, हिंसा एवं आगजनी की घटनाओं के पीछे इन्हीं एस0पी0ओ0 का हाथ बताया जा रहा है। अदालत की राय में ऐसी घटनाएँ एस0पी0ओ0 के ऊपर उचित नियंत्रण के अभाव में घटित हो रही हैं। एस0पी0ओ0 के कारण समाज के दूसरे वर्गों के
मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
59. उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अदालत का यह विचार है कि भारतीय संविधान की धारा 21 एवं धारा 14 का उल्लंघन किया गया है एवं यदि इन्हीं कम पढ़े लिखे आदिवासी नवयुवकों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में जारी रखी गई तो मानवाधिकारों का हनन भविष्य में भी जारी रहेगा।
60. धारा 14 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि नवयुवकों को उसी स्तर के खतरें में डालना जिस स्तर में विकसित पुलिस बल के सदस्य डाले जाते हैं, जिनका शैक्षिक स्तर बेहतर होता है, जिनको बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है एवं जिनके अन्दर इस प्रशिक्षण से लाभ उठाने की बेहतर क्षमता होती है, ऐसा करना दो असमान व्यक्तियों को समान मानने के बराबर है। इसके अतिरिक्त ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर, निम्न बौद्धिक स्तर के कारण माओवादियों से लड़ने में इतने प्रभावकारी नहीं सिद्ध हो सकते जितना कि नियमित पुलिस बल के सदस्य। अतएव एस0पी0ओ0 के रूप में इनकी नियुक्ति अतर्कसंगत, स्वैच्छिक एवं पागलपन है।
61. धारा 21 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त इन नवयुवकों की सहमति प्राप्त होने के बावजूद ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर के कारण उन खतरों को नही समझ सकते हैं जो उनके सामने आने वाले हैं। न तो उनके पास वह क्षमता है जो इस प्रकार के खतरों से निपटने के लिए होनी चाहिए और न ही उनके पास वह विवेक है जो इस प्रकार का कर्तव्य निर्वहन करते समय किसी व्यक्ति के पास होना चाहिए। अपनी निम्न शैक्षिक उपलब्धियों के कारण, वे वह लाभ प्राप्त न कर सकेंगे जो इस प्रकार के प्रशिक्षण से होना चाहिए। परिणाम स्वरूप ऐसे नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जिनके कर्तव्य में सशस्त्र विद्रोह से लड़ना सम्मिलित है, यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्हें कठोर प्रशिक्षण प्रदान कर दिया गया है तब भी इन नवयुवकों के जीवन को जानबूझकर दाँव पर लगाना है।
62. निश्चित रूप से उन सीमाओं एवं क्षमताओं के अंदर, जिसके द्वारा जीवन का आनंद उठाया जाता है, मानव की गरिमा का सम्मान भी सम्मिलित है, चाहें वह व्यक्ति निर्धन हो, अशिक्षित हो अथवा कम पढ़ा लिखा हुआ हो, अथवा उसके अन्दर अपने विवेक को प्रयोग करने की क्षमता कम हो। हमारे संविधान की प्रस्तावना इस बात पर जोर देती है कि हमारे राष्ट्र का ध्येय मानव गरिमा का विकास भी है। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति आवश्यक रूप से मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
63. ऐसे अनुपयुक्त नवजवानों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में करना एवं उन्हें हथियार सौंपना, समाज के अन्य लोगों के जीवन को खतरे में डालना है एवं यह संविधान की धारा 21 का उल्लंघन भी है।
64. एस0पी0ओ0 को मानदेय प्रदान करना एवं उन्हें केवल एक संक्षिप्त समय के लिए नियुक्त करना संविधान की धारा 14 एवं धारा 21 का उल्लंघन है। हम इसका विस्तार से वर्णन पहले ही कर चुके हैं। इन नवयुवकों को केवल मानदेय देना हालाँकि वे नियमित पुलिस बल की तुलना में अधिक खतरे में रहते हैं, उनके जीवन की गरिमा एवं मूल्य को घटाना है। इसके अतिरिक्त इन नवयुवकों की निर्धनता को दृष्टिगत करते हुए तथा क्रोध एवं बदले की भावना जो उनमें विद्यमान है एवं पूर्व में उनके साथ हुए आचरण के कारण, उनको जोखिम भरे कार्य में लगाना एवं भावनाओं को भड़काना, मानवता एवं मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
65. यह पहले ही कहा जा चुका है कि इन नवयुवकों की अस्थाई सेवा के कारण, सेवा समाप्ति के उपरान्त, उन्हें माओवादियों का निशाना बनने के लिए विवश कर देती है। इसके कारण सम्पूर्ण समाज, व्यक्तियों एवं समूहों को जोखिम में डालना है। यह धारा 21 का स्पष्ट उल्लंघन है।
66. उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में, यह अदालत उचित आदेश पारित करती है। फिर भी यहाँ पर हमारे समक्ष कुछ महत्वपूर्ण मामले हैं जिनके ऊपर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना पड़ेगा। यह आवश्यकता इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार इस बात का दावा करती है कि इन नवयुवकों की भर्ती आवश्यक है एवं माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त बहुत से नवयुवक बदले की भावना से प्रेरित हैं एवं उनके अन्दर क्रोध की भवना विद्यमान है। अतएव इस प्रकार के नवयुवकों को सशस्त्र विद्रोह को दमन करने की गतिविधियों में लगाने से परिणाम उल्टा हो सकता है। प्रथम यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि माओवादियों के द्वारा नए-नए तरीके प्रयोग किए जाने के कारण सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों को दमन करने के लिए एक शान्त एवं बुद्धिमान व्यक्ति की आवश्यकता है ताकि वह वर्तमान तथा भविष्य की
गतिविधियों का ठीक से विश्लेषण करे। क्रोध एवं घृणा की भावना इस प्रकार के विश्लेषण को अवरुद्ध कर देगी। द्वितीय क्रोध एवं घृणा की भावना दूसरे व्यक्ति के अन्दर शक की भावना उत्पन्न करेगी। यदि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त आदिवासी नवयुवकों के प्रमुख कार्यों में से एक कार्य माओवादियों अथवा उनके शुभचिंतकों की पहचान करना है तो इसकी पूरी संभावना है कि उनकी पहचान करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है अथवा प्रभावित होगी। स्थानीय शत्रुता, सामान्य सामाजिक संघर्ष एवं एस0पी0ओ0 के दमनकारी रवैय्ये के कारण पूरी संभावना है कि वे व्यक्ति जो माओवादी गतिविधियों से जुड़े हुए नहीं हैं उनको माओवादी अथवा माओवादी शुभचिंतक के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप गाँव का वातावरण प्रदूषित होगा एवं ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी जिसमें निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकारों का हनन किया जाएगा एवं कुछ और लोग भी राज्य के विरुद्ध हथियार लेकर खड़े हो जाएँगे।
51. बहुत से आदिवासी नवयुवक जिनके परिवारों के खिलाफ माओवादियों ने हिंसा की वारदातें की हैं वे पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुके हैं। निरन्तर क्रोध एवं घृणा की भावना रखने एवं उससे ग्रसित रहने के कारण वे अमानुषिकता के स्तर तक पहुँच चुके हैं। एक सभ्य एवं उत्तरदायी समाज की भूमिका द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करना है जिससे कि वे खराब अवस्था से वापस लौट सकें अथवा सामान्य मार्ग पर फिर से वापस आ सकें एवं उनका क्रोध एवं बदले की भावना शांत हो सके। ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करना एवं राज्य के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए उनको प्रयोग करना एक सभ्य समाज के नियमों के विपरीत है। कुछ भटके हुए नीति
निर्धारिकों के द्वारा इस प्रकार की स्थिति का नाजायज फायदा उठाना सबसे गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है।
52. छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दाखिल इन हलफनामों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि आदिवासी नवयुवकों को एस0पी0ओ0 के रूप में भर्ती करने का मुख्य प्रयोजन सामान्य सुरक्षा बलों की कमी को दूर करना है। यह परिस्थिति राज्य के सामाजिक और आर्थिक नीतियों की देन है। निजीकरण की नीति के कारण राज्य ने अपने आप को कमजोर कर लिया है एवं वह पर्याप्त आर्थिक संसाधन, सामाजिक गड़बड़ी को नियंत्रित करने के लिए नहीं लगा पा रहा है। इन आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जबकि उनके अंदर आवश्यक शिक्षा एवं क्षमता विद्यमान नहीं है, सीधा अर्थ यही है कि सरकार एस0पी0ओ0 की कार्य क्षमता के बारे में उतना चिंतित नहीं है जितना कि वह धन के बारे में चिंतित है।
53. छत्तीसगढ़ राज्य का दावा है कि इस प्रकार का रोजगार प्रदान करके वह नए लोगों को रोजी दे रहा है एवं परिणाम स्वरूप संविधान की धारा-2 में वर्णित मूल्यों को प्रोत्साहित कर रहा है। अतः अदालत यह समझ पाने में असफल है कि मात्र साक्षर नवजवानों को सशस्त्र विद्रोह की गतिविधियों में लगाना, जहाँ कि उनके जीवन को ही गंभीर खतरा है, रोजगार किस प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार की
अवधारणा आवश्यक रूप से आदिवासी नवयुवकों के जीवन का अपमान है एवं मानव की गरिमा को नष्ट करना है।
54. हमें यह स्पष्ट है एवं छत्तीसगढ़ राज्य ने यह कहा भी है कि आदिवासी नवयुवक जो एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त किए जाते हंै, को हथियार इस आधार पर दिया जा रहा है कि उन्हें वैधानिक रूप से पुलिस बल का सम्पूर्ण सदस्य समझा जाता है एवं उनको वही जिम्मेदारियाँ एवं उत्तरदायित्व दिए जा रहे हैं एवं उन पर भी वही अनुशासन संहिता लगाई जाती है जो सामान्य पुलिस बल पर। इन उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों में अपने जीवन को जोखिम में भी डालना है, फिर भी केन्द्र सरकार एवं छत्तीसगढ़ सरकार का विश्वास है कि इस दुरूह कार्य को करने के लिए उन्हें केवल 3000 रूपये का मानदेय प्रदान किया जाए।
55. आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति प्रकृति से अस्थाई है। वास्तव में उनको एक साल के लिए नियुक्त किया जाता है एवं अन्य एक साल के लिए इन्क्रीमेंट दिया जा सकता है। यह अत्यन्त संक्षिप्त समय है। नए नियमों के अन्तर्गत बिना किसी कारण के पुलिस अधीक्षक के द्वारा उनकी सेवाएँ समाप्त की जा सकती हैं। संक्षिप्त समय की यह नियुक्ति अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देती है जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा स्वीकार किया गया है। छत्तीसगढ़ राज्य में माओवादी गतिविधियाँ 1980 के दशक से चल रही हैं एवं पिछले एक दशक में यह और भी अधिक शक्तिशाली हो गई है। छत्तीसगढ़ राज्य यह भी स्वीकार करता है कि उन्हें इन एस0पी0ओ0 को हथियार प्रदान करना है क्योंकि माओवादियों से उनके जीवन को गंभीर खतरा है। वास्तव में माओवादी, सामान्य नागरिकों को भी, पुलिस का मुखबिर कहकर मार देते हैं। स्पष्ट रूप से इन परिस्थितियों में यह कहना तर्कसंगत होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति उन्हें माओवादियों का स्पेशल निशाना बनने पर मजबूर कर देती है। छत्तीसगढ़ राज्य के पास कोई ऐसी योजना नहीं है जिसके द्वारा वह इन नवयुवकों की रक्षा कर सके। सेवा समाप्ति के पश्चात इन नवयुवकों को अपने हथियारों को जमा करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ कही भी माओवादी उन्हें पाएँगे, सीधा निशाना बना लेंगे। छत्तीसगढ़ राज्य ने यह भी बताया है कि नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 में से 1200 को अनुशासन हीनता एवं कर्तव्य की अवहेलना के कारण सेवा से निकाला जा चुका है। यह असाधारण रूप से एक बड़ी संख्या है। पिछले वर्ष तक नियुक्त किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या केवल 3000 थी। अब यह संख्या 6500 है। यह तथ्य कि भर्ती किए गए एस0पी0ओ0 की संख्या में से 40 प्रतिशत को अनुशासन हीनता के लिए सेवा से निकाला गया है-इससे यह साबित होता है कि सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है। इस प्रकार की नीतियों को जारी रखने का परिणाम यह होगा कि आदिवासी नवयुवकों की एक बड़ी संख्या, जब एस0पी0ओ0 के रूप में उनकी संक्षिप्त नियुक्ति समाप्त हो जाएगी तो वे एक बड़े खतरे में पड़ जाएँगे।
56. उपर्युक्त को केवल कोरी कल्पना नहीं समझा जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दिए गए आँकड़ों एवं परिस्थितियों से उपर्युक्त नतीजा स्पष्ट है। फिर भी यह समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। समस्या और भी खराब हो जाती है क्योंकि जिन क्षेत्रों में एस0पी0ओ0 की नियुक्ति हुई है वहाँ के सामाजिक ढाँचे के नष्ट होने की प्रबल संभावना है।
57. हम बार-बार छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार से पूछ चुके हैं कि वे इन नवयुवकों को दिए हुए हथियारों को क्यों वापस ले लेंगे। अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है। यदि इन हथियारों की वापसी के लिए बल का प्रयोग किया जाता है, बिना यह आश्वासन दिए कि वे अपने जीवन की सुरक्षा, सेवा समाप्त के उपरान्त, किस प्रकार करेंगे तो यह संभावना बलवती है कि ये नवजवान हथियारों को वापस करने से इंकार कर सकते हैं। परिणाम स्वरूप हमारे पास सशस्त्र नवयुवकों की एक बड़ी संख्या होगी जो अपने जीवन को बचाने के लिए भयभीत इधर उधर दौड़ रहे होंगे और कानून का उल्लंघन कर रहे होंगे। ऐसी परिस्थिति में यह भी संभव है कि वे राज्य के खिलाफ खड़े हो जाएँ या कम से कम सुरक्षा बलों के खिलाफ भी हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं अथवा अपने जीविकोपार्जन के लिए हथियारों का प्रयोग समूह बनाकर समाज के विरुद्ध स्वयं कर सकते हैं।
58. मानवाधिकार संगठनों द्वारा यह बात बार-बार कही जा रही है कि आदिवासी नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति के कारण, जिनको कोया कमाण्डो अथवा सलवा जुडूम भी कहा जाता है,
मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अतिरिक्त बहुत सी लूट, हिंसा एवं आगजनी की घटनाओं के पीछे इन्हीं एस0पी0ओ0 का हाथ बताया जा रहा है। अदालत की राय में ऐसी घटनाएँ एस0पी0ओ0 के ऊपर उचित नियंत्रण के अभाव में घटित हो रही हैं। एस0पी0ओ0 के कारण समाज के दूसरे वर्गों के
मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
59. उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अदालत का यह विचार है कि भारतीय संविधान की धारा 21 एवं धारा 14 का उल्लंघन किया गया है एवं यदि इन्हीं कम पढ़े लिखे आदिवासी नवयुवकों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में जारी रखी गई तो मानवाधिकारों का हनन भविष्य में भी जारी रहेगा।
60. धारा 14 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि नवयुवकों को उसी स्तर के खतरें में डालना जिस स्तर में विकसित पुलिस बल के सदस्य डाले जाते हैं, जिनका शैक्षिक स्तर बेहतर होता है, जिनको बेहतर प्रशिक्षण दिया जाता है एवं जिनके अन्दर इस प्रशिक्षण से लाभ उठाने की बेहतर क्षमता होती है, ऐसा करना दो असमान व्यक्तियों को समान मानने के बराबर है। इसके अतिरिक्त ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर, निम्न बौद्धिक स्तर के कारण माओवादियों से लड़ने में इतने प्रभावकारी नहीं सिद्ध हो सकते जितना कि नियमित पुलिस बल के सदस्य। अतएव एस0पी0ओ0 के रूप में इनकी नियुक्ति अतर्कसंगत, स्वैच्छिक एवं पागलपन है।
61. धारा 21 का उल्लंघन किया गया है क्योंकि एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्त इन नवयुवकों की सहमति प्राप्त होने के बावजूद ये नवयुवक निम्न शैक्षिक स्तर के कारण उन खतरों को नही समझ सकते हैं जो उनके सामने आने वाले हैं। न तो उनके पास वह क्षमता है जो इस प्रकार के खतरों से निपटने के लिए होनी चाहिए और न ही उनके पास वह विवेक है जो इस प्रकार का कर्तव्य निर्वहन करते समय किसी व्यक्ति के पास होना चाहिए। अपनी निम्न शैक्षिक उपलब्धियों के कारण, वे वह लाभ प्राप्त न कर सकेंगे जो इस प्रकार के प्रशिक्षण से होना चाहिए। परिणाम स्वरूप ऐसे नवयुवकों की एस0पी0ओ0 के रूप में नियुक्ति जिनके कर्तव्य में सशस्त्र विद्रोह से लड़ना सम्मिलित है, यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्हें कठोर प्रशिक्षण प्रदान कर दिया गया है तब भी इन नवयुवकों के जीवन को जानबूझकर दाँव पर लगाना है।
62. निश्चित रूप से उन सीमाओं एवं क्षमताओं के अंदर, जिसके द्वारा जीवन का आनंद उठाया जाता है, मानव की गरिमा का सम्मान भी सम्मिलित है, चाहें वह व्यक्ति निर्धन हो, अशिक्षित हो अथवा कम पढ़ा लिखा हुआ हो, अथवा उसके अन्दर अपने विवेक को प्रयोग करने की क्षमता कम हो। हमारे संविधान की प्रस्तावना इस बात पर जोर देती है कि हमारे राष्ट्र का ध्येय मानव गरिमा का विकास भी है। एस0पी0ओ0 की नियुक्ति आवश्यक रूप से मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
63. ऐसे अनुपयुक्त नवजवानों की नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में करना एवं उन्हें हथियार सौंपना, समाज के अन्य लोगों के जीवन को खतरे में डालना है एवं यह संविधान की धारा 21 का उल्लंघन भी है।
64. एस0पी0ओ0 को मानदेय प्रदान करना एवं उन्हें केवल एक संक्षिप्त समय के लिए नियुक्त करना संविधान की धारा 14 एवं धारा 21 का उल्लंघन है। हम इसका विस्तार से वर्णन पहले ही कर चुके हैं। इन नवयुवकों को केवल मानदेय देना हालाँकि वे नियमित पुलिस बल की तुलना में अधिक खतरे में रहते हैं, उनके जीवन की गरिमा एवं मूल्य को घटाना है। इसके अतिरिक्त इन नवयुवकों की निर्धनता को दृष्टिगत करते हुए तथा क्रोध एवं बदले की भावना जो उनमें विद्यमान है एवं पूर्व में उनके साथ हुए आचरण के कारण, उनको जोखिम भरे कार्य में लगाना एवं भावनाओं को भड़काना, मानवता एवं मानव की गरिमा को ठेस पहुँचाना है।
65. यह पहले ही कहा जा चुका है कि इन नवयुवकों की अस्थाई सेवा के कारण, सेवा समाप्ति के उपरान्त, उन्हें माओवादियों का निशाना बनने के लिए विवश कर देती है। इसके कारण सम्पूर्ण समाज, व्यक्तियों एवं समूहों को जोखिम में डालना है। यह धारा 21 का स्पष्ट उल्लंघन है।
66. उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में, यह अदालत उचित आदेश पारित करती है। फिर भी यहाँ पर हमारे समक्ष कुछ महत्वपूर्ण मामले हैं जिनके ऊपर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना पड़ेगा। यह आवश्यकता इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार इस बात का दावा करती है कि इन नवयुवकों की भर्ती आवश्यक है एवं माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।


वास्तव में हमें यह ध्यान में रखना होगा कि राज्य को माओवादी एवं नक्सली हिंसा के कारण अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि राज्य की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों एवं सरकार की नीतियों के कारण उग्रवाद का जन्म हुआ हो। किसी राज्य का तख्ता पलटना एवं उसके एजेंटों की हत्या करना एवं निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हिंसा की वारदातंे करना, सुव्यवस्थित जीवन को समाप्त करना है। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इस उग्रवाद का मुकाबला करे एवं नागरिकों की सुरक्षा का प्रबंध करे। राज्य का यह मौलिक उŸारदायित्व है। जब न्यायपालिका राज्य की नीतियों को अवैध घोषित कर देगी, जो आतंकवाद एवं उग्रवाद से निपटने के लिए बनाई र्गइं हैं तथापि हम सुरक्षा सम्बंधी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते हैं जिसके लिए दक्षता एवं उत्तरदायित्व का भार कार्यपालिका पर है जिस पर विधायिका का नियंत्रण होता है। न्यायपालिका इन मामलों में संवैधानिक मूल्यों, उद्देश्यों, मौलिक अधिकारों जैसे समानता एवं जीवन के अधिकार की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप करती है। न्यायपालिका को यह अधिकार प्राप्त है। संवैधानिक बेंच के हाल ही के निर्णय में जी0वे0 के0 इण्डस्ट्रीज बनाम आई0टी0 मामले में, इस अदालत ने कहा था कि ‘‘हमारे संविधान ने राज्य के सभी अंगों को राष्ट्र की सुरक्षा, कल्याण, एवं हित की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा है। उन्हें इस कार्य को पूरा करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। न्यायिक पुनरावलोकन की शक्तियाँ इसलिए प्रदान की गई हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये शक्तियाँ संविधान में वर्णित सीमाओं के अनुसार प्रयोग की गई हैं। परिणाम स्वरूप यह आवश्यक है कि राज्य को प्रदान की र्गइं इस प्रकार की शक्तियाँ न्यायिक आदेश के द्वारा सीमित न हों, यहाँ तक कि राज्य के अंग अपने संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने में अक्षम हो जाएँ। शक्तियाँ जो संविधान के द्वारा प्रदान की गई हैं अथवा उसमें निहित हैं, उन्हें आवश्यक रूप से स्वीकार किया जाए। फिर भी
संविधान का यह मूल तत्व है कि राज्य का कोई भी अंग उन शक्तियों के बाहर न जाए जो संविधान में वर्णित है। उस संतुलन को बनाए रखना न्यायपालिका का कार्य है। न्यायिक संयम, सरकार की समानवर्ती शाखाआंे के अधिकारों की चर्चा के समय, आवश्यक है। परन्तु संयम का तात्पर्य उस कर्तव्य का परित्याग नहीं है।
68. जैसा कि हमने इस मामले की सुनवाई की है, हम वास्तव में एक दूसरे की बारीक सीमाओं से परिचित हैं। इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए हम तथ्यों एवं
संवैधानिक मूल्यों से मार्गदर्शित हंै। मौलिक मूल्य यह है कि राज्य के प्रत्येक अंग का यह दायित्व है कि संवैधानिक उत्तरदायित्व की परिसीमाओं में रहकर कार्य करे। यही कानून का राज्य है।
69. यह सत्य है कि आतंकवाद एवं उग्रवाद की समस्या संसार के कई देशों में है एवं भारत दुर्भाग्यवश कई दशकों से इसका शिकार रहा है। आतंकवाद एवं उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई संवैधानिक प्रजातंत्रों के द्वारा हर प्रकार के माध्यमों से प्रभावकारी नहीं बनाया जा सकता है। कार्यकुशलता सभी मूल्यों की इकलौती कसौटी नहीं है। वे माध्यम जिन्हें हम किसी विशिष्ट समस्या से निपटने के लिए इस्तेमाल करते हैं वे अन्य संवैधानिक उद्देश्यों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। अतएव सम्पूर्ण सक्षम तरीके अगर वास्तव में वे सक्षम हंै, तो भी उन्हें वैधानिक नहीं माना जा सकता।
70. जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि माओवादी नक्सलवादी हिंसा के खिलाफ लड़ाई केवल एक कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में नही देखी जा सकती जिसको कि हम किसी भी माध्यम से निपटारा कर सकते हैं। मौलिक समस्या राज्य की सामाजिक और आर्थिक नीतियों में छिपी हुई है। ये नीतियाँ ऐसे समाज पर लागू की जा रही हैं जो घोर विषमताओं एवं असमानताओं से भरा हुआ है। अतएव माओवादियों एवं नक्सलवादियों के खिलाफ लड़ाई केवल नैतिक, संवैधानिक एवं कानूनी लड़ाई नहीं है। हमारा संविधान उन निर्देशों की व्यवस्था करता है जिसके अनुसार राज्य को कार्य करना है एवं अपनी शक्ति का प्रयोग भी करना है एवं उसे बनाए भी रखना है। इन निर्देशों का अतिक्रमण ही अवैध रूप से कार्य करना है जिससे राज्य एवं संविधान की नैतिक और वैधानिक शक्ति खतरे में पड़ जाती है। यह अदालत इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि आतंकवादी गतिविधियाँ नागरिकों और राज्य को कितना क्षति पहुँचा रही हैं। फिर भी हमारा
संविधान जिसमें कि मानव बुद्धिमत्ता कूट-कूट कर भरी हुई है, यह चेतावनी देता है कि उद्देश्य की प्राप्ति यह साबित नहीं करता कि अपनाए गए माध्यम भी उचित थे। उद्देश्यों का एक आवश्यक एवं अभिन्न अंग, राज्य शक्ति के प्रयोग के
माध्यमों को, संवैधानिक सीमाओं के अन्तर्गत रखना है। इसके विपरीत कार्य करना
अवैध रूप से कार्य करना है।
71. कानून की प्रतिक्रिया संवैधानिक अनुमति की सीमाओं के अन्तर्गत तर्क संगत होनी चाहिए। इसका आवश्यक रूप से तात्पर्य दो प्रकार का मार्ग हैः-
1. उन सभी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों को दुरुस्त करना जिससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है एवं जिसकी परिणति आतंकवाद के रूप में होती है।
2. सुप्रशिक्षित एवं पेशेवर कानून लागू करने वाली क्षमताओं एवं शक्तियों को विकसित करना जो संविधान की सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करें।
72. माओवादियों तथा नक्सलवादियों से निपटने के लिए एस0पी0ओ0 जैसे एक समूह का गठन जिनको अस्थाई रूप से नौकरी दी जाती है एवं मानदेय प्रदान किया जाता है एवं जिनमें से बहुत से व्यक्ति
क्रोध, घृणा एवं बदले की भावना से प्रेरित हैं। ये सारी प्रतिक्रिया ऊपर दिए हुए मानकों के प्रतिकूल है। हम इस सम्बन्ध में विस्तार से परिचर्चा कर चुके हैं। यहाँ पर हम एक बात और कहना चाहते हैं। यह स्पष्ट है कि राज्य एस0पी0ओ0 का प्रयोग मौजूदा नियमित पुलिस बल की कमी को पूरा करने के लिए कर रहा है। आवश्यकता लम्बे समय के लिए है। परिणाम स्वरूप राज्य का यह कार्य अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों का परित्याग करना है। आवश्यकता इस बात की है कि पूरी तरह से एक प्रशिक्षित, नियमित पुलिस बल का गठन किया जाए, जिसमंे पर्याप्त मात्रा में सदस्य मौजूद हों एवं जिनकी नियुक्ति स्थाई आधार पर की जाए। यह राज्य के आवश्यक कार्यों में से है तथा इसकी पूर्ति एक अस्थाई पुलिस बल से नहीं की जा सकती है। एस0पी0ओ0 की छत्तीसगढ़ राज्य में नियुक्ति राज्य द्वारा संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन है।
73. केन्द्र सरकार एवं छत्तीसगढ़ राज्य ने एस0पी0ओ0 की नियुक्ति को सही ठहराने की कोशिश इस आधार पर की है वे माओवादी हिंसा से निपटने के लिए प्रभावकारी एवं बलवर्धक हैं। इस प्रकार के कार्य का प्रतिकूल प्रभाव, वर्तमान एवं भविष्य में, समाज पर अत्यन्त घातक है। राज्य की ऐसी नीतियाँ संविधान की धारा 14 एवं 21 का उल्लंघन करती हंै। किसी भी बल की प्रभावकारिता, संवैधानिक अनुमति का आँकलन करने के लिए, इकलौता मानक नहीं हो सकता और न उसे होना चाहिए। एस0पी0ओ0 माओवादी एवं नक्सलवादी गतिविधियों से निपटने में कितने प्रभावकारी रहे हैं इस बारे में संदेह है। यदि हम केवल तर्क के रूप में यह मान लें कि एस0पी0ओ0 वास्तव में माओवादियों के खिलाफ प्रभावकारी थे, तो यह लाभ, हानि केवल इस अर्थ में हुई है कि संविधान के प्रति वफादारी का बहुत बड़ा ह्रास हुआ है। एक सामाजिक व्यवस्था चैपट हुई है। संविधान के बल में भी ह्रास हुआ है। संवैधानिक निष्ठा इस बात की अनुमति नहीं प्रदान करता है और न कर सकता है और न करना चाहिए कि हम एस0पी0ओ0 जैसे बल का गठन करें। संवैधानिक औचित्य, ऐसे शब्दों के प्रयोग जैसे बलवर्धक आदि से, नहीं ठहराये जा सकते। संवैधानिक निर्णय एवं नागरिकों की सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा ऐसा पवित्र दायित्व है जिसे उपर्युक्त तर्क एवं शब्दों के आधार पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।


आदेश
74. यह अदालत आदेश देती है कि-
1. छत्तीसगढ़ राज्य तुरन्त राज्य में माओवादी गतिविधियों से निपटने, उसे कम करने या समाप्त करने के लिए एस0पी0ओ0 का प्रयोग किसी भी प्रकार, किसी भी ढंग से या किसी स्वरूप में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, करने से तुरन्त रुक जाए एवं परहेज करे।
2. भारत सरकार एस0पी0ओ0 की भर्ती के प्रयोजन हेतु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धन देने से तुरन्त रुक जाए।
3. छत्तीसगढ़ राज्य तत्काल प्रभाव से हर संभव प्रयास करे कि एस0पी0ओ0 को जारी किए गए सभी प्रकार के हथियार अथवा अन्य सामग्री तुरन्त वापस ले लिए जाएँ। हथियार की परिभाषा में बन्दूकें, रायफल, लांचर आदि सभी शामिल हैं।
4. छत्तीसगढ़ राज्य तत्काल प्रभाव से यह व्यवस्था करेगा कि वह ऐसे लोगों को जिनकी नियुक्ति एस0पी0ओ0 के रूप में की गई थी, के जीवन की रक्षा करने के लिए उचित कदम उठाएगा।
5. छत्तीसगढ़ राज्य ऐसे उचित कदम उठाएगा जिससे कि वह किसी भी समूह जिनमंे कि सलवा जुडूम अथवा कोया कमाण्डोज़ भी सम्मिलित हैं, की गतिविधियों को रोकेगा, जो कानून को व्यक्तिगत हाथों में लेते हैं, असंवैधानिक रूप से कार्य करते हैं या किसी भी इंसान के मानवाधिकारों का हनन करते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा उठाए गए कदम केवल सलवा जुडूम या कोया कमाण्डों के आपराधिक कार्य तक सीमित नहीं होंगे, बल्कि उनके खिलाफ जाँच भी की जाएगी और उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाया जाएगा।
(75) उपयुकर््त के अलावा हम एस0पी0ओ0 की नियुक्ति नियमित पुलिस बल के रूप में करने के लिए असंवैधानिक घोषित करते हैं। हमारा यह भी विचार है कि माओवादी नवजवान जिनकी पूर्व में नियुक्ति माओवादियों और नक्सलवादियों से लड़ने के लिए की गई, उन्हें एस0पी0ओ0 के उन कार्यों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है जैसा कि सी0पी0ए0 2007 की धारा 23 (वन) (एच) एवं 23 (वन) (आई) में वर्णित है। शर्त यह है कि उन्हें किसी ऐसे कार्य में न लगाया जाय जिनसे माओवादी, नक्सलवादी एवं बाएँ बाजू उग्रवाद से लड़ने की संज्ञा दी जा सके। या जिससे दूसरे व्यक्तियों के मानवाधिकारों का हनन हो जैसा कि स्वामी अग्निवेश द्वारा अपने वक्तव्य में कहा गया है।
(76) अब हम अपना ध्यान उन आरोपों की ओर करते हैं जिन्हें स्वामी अग्निवेश के द्वारा लगाया गया है। मोरपल्ली, टैडमेल्टा एवं टिम्मापुरम के गाँवों में कथित रूप से एस0पी0ओ0, कोया कमाण्डोज एवं सलवा जुडूम के द्वारा स्वामी अग्निवेश एवं अन्य लोगों के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ मार्च 2011 मंे अंजाम दी र्गइं, जबकि वे हिंसा से ग्रसित क्षेत्रों में राहत सामग्री उपलब्ध करा रहे थे।
77. इस सम्बन्ध में, हम छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा दाखिल किए गए हलफनामों का उल्लेख करते हैं। अदालत आश्चर्य से यह कहने पर मजबूर है कि उक्त शपथ पत्र मात्र अपने आपको सही साबित करने एवं औचित्य ठहराने के उद्देश्य से दाखिल किए गए हैं। उक्त कार्य को छत्तीसगढ़ राज्य ने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व को पूरा करने अर्थात हिंसा से निपटने के लिए नहीं किया है। छत्तीसगढ़ राज्य का हलफनामा अपने आप में एक दलील है कि उक्त तीनों गाँवों में हिंसा की वारदातंे हुई हैं। भिन्न-भिन्न लोगों के द्वारा स्वामी अग्निवेश एवं उनके सहयोगियों के विरुद्ध हिंसा की घटनाएँ घटित हुईं। हम यह भी नोट करते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य के द्वारा जाँच आयोग गठित किया जाएगा जिसकी अध्यक्षता उच्च न्यायालय के कार्यरत अथवा अवकाशप्राप्त न्यायाधीश के द्वारा की जाएगी। अदालत की राय में, राज्य के द्वारा उठाए गए कदम अपर्याप्त हैं एवं छत्तीसगढ़ राज्य की परिस्थिति को देखते हुए वे किसी संतोषजनक नतीजे तक नहीं पहुँचेंगे। इस अदालत ने पूर्व में कहा था कि जाँच आयोग, जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य ने व्यवस्था की है, का अधिकाधिक नतीजा यह हो सकता है कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। फिर भी वे कानूनी प्रक्रिया को पूरा नहीं करते हैं जिसके अनुसार नागरिकों के विरुद्ध अपराधों की पूरी जाँच की जाए एवं जो व्यक्ति आपराधिक
गतिविधियों में सम्मिलित हो उसको दण्डित किया जाए। अतएव हम निम्नलिखित आदेश पारित करने के लिए विवश हैं:-
78. हम आदेशित करते हैं कि केन्द्रीय जाँच ब्यूरो तुरन्त इस सम्पूर्ण प्रकरण की जाँच करे एवं उन सभी व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित करे जो
1. इस घटना के लिए उत्तरदायी हंै जो मार्च 2011 में मोरपल्ली, टैडमेल्टा एवं टिम्मापुरम में घटित हुई एवं जो दान्तेवाड़ा एवं पड़ोसी जिलों में स्थित है।
2. मार्च 2011 में स्वामी अग्निवेश एवं उनके सहयोगियों के विरुद्ध हुई हिंसा की घटनाओं की जाँच करना जबकि वे राज्य की यात्रा पर गए थे।
79. हम यह भी निर्देशित करते हैं कि केन्द्रीय जाँच ब्यूरो अपनी प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट आज से छः हफ्ते के अन्दर दाखिल करे।
80. हम छत्तीसगढ़ राज्य एवं भारत सरकार को निर्देशित करते हैं कि आज की तिथि से छः सप्ताह के अन्दर सभी आदेशों एवं निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
81. सितम्बर 2011 के प्रथम सप्ताह में अग्रिम आदेशों के लिए अभिसूचित।

समाप्त

अनुवादक : मो0 एहरार
मो 08009513858

 

 

 

 

 

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