Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘Uncategorized’ Category


हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिन्दगी के टुकड़े
कत्ल हुए ज़ज़्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घट्ठों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी…..
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे कि अब तक लड़े क्यांे नहीं

हम लड़ेंगे अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी……

-पाश

Read Full Post »

ममता बनर्जी को मिथ बनाने की आदत है वह उनमें जीती हैं। ममता बनर्जी निर्मित पहला मिथ है माकपा शैतान है। दूसरा मिथ है मैं तारणहार हूँ। तीसरा मिथ है माओवादी हमारे बंधु हैं। चौथा मिथ है हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा है और पांचवां मिथ है ‘हरमदवाहिनी’। इन पांचों मिथों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। छद्म मिथों को बनाना फिर उन्हें सच मानने लगना यही ममता की आयरनी है। यहीं पर
उसके पराभव के बीज भी छिपे हैं। ममता बनर्जी अधिनायकवादी भाषा का प्रयोग करती हैं उनकी आदर्श भाषा का नमूना है ‘हरमदवाहिनी’ के नाम से गढ़ा गया मिथ। ‘हरमदवाहिनी’ काल्पनिक सृष्टि है। यह मिथ लालगढ़ में पिट गया है। वहां के साधारण किसान और आदिवासी समझ गए हैं कि इस नाम से पश्चिम बंगाल में कोई संगठन नहीं है। यह थोथा प्रचार है। लालगढ़ में ‘हरमदवाहिनी’ के कैंपों की एक सूची तृणमूल
कांग्रेस और माओवादी बांट रहे हैं। इस सूची में 86 कैंपों के नाम हैं और इनमें कितने लोग हैं उनकी संख्या भी बतायी गयी है। उनके अनुसार ये माकपा के गुण्डाशिविर हैं और माकपा के अनुसार ये माओवादी हिंसाचार से पीड़ितों के शरणार्थी शिविर हैं। सच क्या है इसके बारे में सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं। किस कैंप में कितने गुण्डे या शरणार्थी हैं यह आधिकारिक तौर पर कोई नहीं जानता।
विगत दो साल में माओवादियों ने लालगढ़ में आतंक की सृष्टि की है । 200 से ज्यादा माकपा के निर्दोष सदस्यों और हमदर्दों की हत्याएं की हैं। सैंकड़ों को बेदखल किया है। इनमें से अनेक लोग बड़ी मुश्किल से पुलिसबलों की मदद से अपने घर लौटे हैं। लालगढ़ के विभिन्न इलाके स्वाभाविक छंद में लौट रहे हैं। यह बात ममता एंड कंपनी के गले नहीं उतर रही है। ममता एंड कंपनी ने माकपा के ऊपर लालगढ़
में हमले, लूटपाट, हत्या, औरतों के साथ बलात्कार आदि के जितने भी आरोप लगाए गए हैं वे सब बेबुनियाद हैं। लालगढ़ में एक साल में एक भी ऐसी घटना नहीं घटी है जिसमें माकपा के लोगों ने किसी पर हमला किया हो ,इसके विपरीत माओवादी हिंसाचार ,हत्याकांड,जबरिया चौथ वसूली और स्त्री उत्पीडन की असंख्य घटनाएं मीडिया में सामने आई हैं।
असल में ममता बनर्जी और माओवादी ‘हरमदवाहिनी’ के मिथ के प्रचार की ओट में लालगढ़ के सच को छिपाना चाहते हैं। उनके पास माकपा या अर्द्ध सैन्यबलों के लालगढ़ ऑपरेशन के दौरान किसी भी किस्म के अत्याचार,उत्पीड़न आदि की जानकारी है तो उसे मीडिया ,केन्द्रीय गृहमंत्री और राज्यपाल को बताना चाहिए। उन्हें उत्पीडि़तों के ठोस प्रमाण देने चाहिए। उल्लेखनीय है माकपा ने यह कभी नहीं
कहा कि उनके लालगढ़ में शिविर नहीं हैं। वे कह रहे हैं उनके शिविर हैं और इनमें माओवादी हिंसा से पीडित शरणार्थी रह रहे हैं। ममता बनर्जी जिन्हें गुण्डाशिविर कह रही हैं वे असल में शरणार्थी शिविर हैं । सवाल उठता है माकपा और वामदलों को लालगढ़ में राजनीति करने हक है या नहीं ? ममता और माओवादी चाहते हैं कि उन्हें लालगढ़ से निकाल बाहर किया जाए। इसके लिए ममता बनर्जी ने माओवादी और
पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के हिंसाचार तक का खुला समर्थन किया है।
माकपा के लोग लालगढ़ में हमले कर रहे होते,बलात्कार कर रहे होते.उत्पीड़न कर रहे होते तो कहीं से तो खबर बाहर आती। लालगढ़ से साधारण लोग बाहर के इलाकों की यात्रा कर रहे हैं। प्रतिदिन सैंकड़ों-हजारों लोग इस इलाके से बाहर आ जा रहे हैं। इसके बाबजूद माकपा के द्वारा लालगढ़ में अत्याचार किए जाने की कोई खबर बाहर प्रकाशित नहीं हुई है। कुछ अर्सा पहले ममता बनर्जी की लालगढ़ रैली में
लाखों लोग आए थे। माओवादी भी आए थे। ममता बनर्जी ने माकपा के द्वारा लालगढ़ में सताए गए एक भी व्यक्ति को उस रैली के मंच पर पेश नहीं किया । माओवादियों के दोस्त मेधा पाटकर और अग्निवेश भी मंच पर थे वे भी किसी उत्पीडि़त को पेश नहीं कर पाए। नंदीग्राम में जिस तरह तृणमूल कांग्रेस ने माकपा के अत्याचार के शिकार लोगों को मीडिया के सामने पेश किया था वैसा अभी तक लालगढ़ में वे नहीं कर
पाए हैं। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि माकपा साधुओं का दल है। वह संतों का दल नहीं है। वह संगठित कम्युनिस्ट पार्टी है। उसके पास विचाराधारा से लैस कैडरतंत्र है जो उसकी रक्षा के लिए जान निछाबर तक कर सकता है। विचारधारा से लैस कैडर को पछाड़ना बेहद मुश्किल काम है। माकपा के पास गुण्डावाहिनी नहीं है विचारों के हथियारों से लैस पैने-धारदार कैडर हैं। उनके पास पश्चिम बंगाल में
हथियारबंद गिरोहों से आत्मरक्षा करने और लड़ने का गाढ़ा अनुभव है। उनके साथ अपराधियों का एकवर्ग भी है। जिनसे वे सहयोग भी लेते हैं। लेकिन लालगढ़ जैसे राजनीतिक ऑपरेशन को सफल बनाने में गुण्डे मदद नहीं कर रहे वहां विचारधारा से लैस कैडर जान जोखिम में डालकर जनता को एकजुट करने और माओवादी हिंसाचार का प्रतिवाद करने का काम कर रहे हैं। माओवादी हिंसा का प्रतिवाद देशभक्ति है
,लोकतंत्र की सबसे बड़ी सेवा है।
लोकतंत्र में माकपा को अपने जनाधार को बचाने का पूरा हक है। केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा माओवाद के खिलाफ अभियान में माकपा के कैडर लालगढ़ में जनता और पुलिसबलों के बीच में सेतु का काम कर रहे है। वे लालगढ़ में लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रहे हैं । लोकतंत्र की खातिर मारे जा रहे हैं। वे न गुण्डे हैं और न महज पार्टी मेम्बर हैं। वे लोकतंत्र के रक्षक हैं । लालगढ़ में माकपा
की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है और उसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। ममता जानती हैं कि माओवाद प्रभावित इलाकों में विधानसभा की 46 सीटें हैं और ये सीटें तृणमूल कांग्रेस के प्रभावक्षेत्र के बाहर हैं और इन सीटों पर वे किसी न किसी बहाने सेंधमारी करना चाहती हैं जो फिलहाल संभव नहीं लगती और यही लालगढ़ की दुखती रग है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी

Read Full Post »


जिस न्यायिक निर्णय का पूरा देश साँस रोककर इन्तिज़ार कर रहा था, आखिरकार वह आ ही गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में विवादित भूमि के मालिकाना हक संबंधी सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा व अन्यों द्वारा दायर दावों का निराकरण कर दिया है। इस निर्णय की प्रशंसा भी हुई है और निंदा भी। निंदकों में मुख्यतः मुकदमे के पक्षकार हैं। जो लोग इस विवाद का स्थाई समाधान चाहते हैं वे कहते हैं कि इस निर्णय ने तीनों पक्षकारों (रामलला विराजमान को भी अदालत ने एक पक्षकार माना है) के बीच विवाद के सुलझाव का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। अब हिन्दू वहाँ मंदिर बना सकते हैं और मुसलमान- अगर चाहें तो-वहाँ एक मस्जिद का निर्माण कर सकते हैं और देश इस विवाद को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ सकता है।
आखिर इस विवाद का कभी तो अंत होना चाहिए ताकि देश आगे बढ़ सके। अगर इस निर्णय से यह लक्ष्य प्राप्त हो गया होता तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था। परंतु तथ्य यह है कि दोनों पक्षकार इस निर्णय से असंतुष्ट हैं और उच्चतम न्यायालय में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं। यह निर्णय किसी भी प्रकार का समझौता या मेल-मिलाप कराने में तो सफल हुआ ही नहीं है बल्कि इससे एक अत्यंत ख़तरनाक नज़ीर की स्थापना हो गई है। ‘शांति और समझौता बेशक बहुत महत्वपूर्ण हैं परंतु अगर इन्हें संवैधानिक, प्रजातंत्र और कानून के राज की कीमत पर हासिल किया जाता है तो इनसे फायदे से अधिक नुकसान होने की आशंका होती है।
अयोध्या मामले का निर्णय कानून पर नहीं वरन् आस्था पर आधारित है। तीन में से दो जजों ने ऐतिहासिक प्रमाणों और देश के कानून को दरकिनार कर केवल हिन्दुओं की आस्था के आधार पर यह मान लिया कि राम एक स्थान विशेष पर जन्मे थे और यह भी कि वहाँ बारहवीं सदी में बनाया गया एक मंदिर अस्तित्व में था। मजे की बात यह है कि दोनों जजों ने यह भी स्वीकार किया कि वे इतिहास व पुरातत्व विज्ञान के बारे में कुछ नहीं जानते। तीसरे जज खान का यह कहना है कि यद्यपि उक्त स्थान पर राम मंदिर के होने का कोई प्रमाण नहीं है तथापि शांति व समझौते की खातिर विवादित भूमि को तीनों पक्षकारों के बीच बाँटना उचित होगा। इस तरह, एक ओर रामलला और दूसरी ओर निर्मोही अखाड़े को भूमि दे दी गई। लगे हाथ, सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी जमीन में हिस्सा दे दिया गया।
पक्षकारों के अलावा कई विधिवेत्ताओं ने भी उच्च न्यायालय के निर्णय की कड़ी निंदा की है और यह आशा व्यक्त की है कि उच्चतम न्यायालय केवल और केवल संवैधानिक व कानूनी दृष्टिकोण से इस मामले में अंतिम फैसला करेगा। इस प्रक्रिया में काफी समय लगने की संभावना है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में तीनों जजों ने शांति और समझौते को अधिक महत्व दिया है और प्रजातांत्रिक भारत के संवैधानिक मूल्यों को कम। कानून का न तो पक्षकारों और न ही जजों की आस्था से कोई लेना-देना है और न ही होना चाहिए। भारत जैसे देश में, जहाँ पिछले साठ सालों से न्यायापालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित रखा गया है, कोई भी न्यायिक निर्णय केवल कानून पर आधारित होना चाहिए।
यह शायद पहली बार है कि देश के किसी उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर, केवल आस्था को प्रधानता दी है। अदालत को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि उसके निर्णय से समझौता या मेलमिलाप होता है या नहीं। अदालत को तो कानून के अनुसार काम करना चाहिए। बेशक, अदालत सभी पक्षकारों से यह अपील कर सकती है कि वे अदालती लड़ाई में अपना समय व धन बर्बाद करने के बजाय आपसी बातचीत से विवाद का हल खोज लें। परंतु यह पक्षकारों पर निर्भर है कि वे अदालत की अपील को स्वीकार करें या न करें। अगर वे ऐसा नहीं करते तो जजांे का यह कर्तव्य है कि वे कानून के अनुरूप अपना निर्णय सुनाएँ।
जो लोग इस निर्णय को शांति की जीत और एक पुराने विवाद का सुखद अंत निरूपित कर रहे हैं वे या तो इसके दूरगामी परिणामों से वाक़िफ़ नहीं हैं या हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र के लिए उनके मन में आदर व सम्मान का भाव नहीं है। खुशी मनाने वालों की सोच चाहे जो हो परंतु यह साफ है कि इस निर्णय से अदालतों की कार्यप्रणाली में एक ख़तरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत हुई है। आगे चलकर, जज अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप निर्णय देने लगेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय का कोई भी निर्णय, भविष्य के निर्णयों का आधार बन सकता है।
यदि इसी तर्क को हम आगे बढ़ाएँ तो क्या इससे यह ध्वनित नहीं होता कि चूँकि प्रजातंत्र में संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का अधिक महत्व है और अल्पसंख्यकों के धार्मिक विश्वासों का कम। क्या इससे हमारा न्यायतंत्र बहुसंख्यकवादी नहीं हो जाएगा? क्या इससे कानून और संविधान में अल्पसंख्यकों व कमजोर वर्गांे की सुरक्षा के लिए किए गए प्रावधान अर्थहीन नहीं हो जाएँगे? क्या इससे अल्पसंख्यकांे की देश के न्यायतंत्र और संविधान पर आस्था कम नहीं होगी? अगर हम संविधान और कानून की सर्वोच्चता में आस्था रखते हैं तो हमें इस निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाने ही होंगे। निःसंदेह, धार्मिक आस्था और विश्वास, व्यक्तियों व धार्मिक समुदायों के लिए बहुत महत्व रखते हैं परन्तु जहाँ तक राष्ट्र का प्रश्न है, उसके लिए संविधान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत एक विविधवर्णी राष्ट्र है जहाँ विभिन्न आस्थाओं वाले लोग रहते हैं। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण और आस्था की आजादी देता है परंतु राष्ट्र के लिए कानून उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी व्यक्ति के लिए उसकी आस्था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
वैसे भी, हिन्दू धर्म अपने आप में एकसार नहीं है। हिन्दुओं में दक्षिण भारत के द्रविड़ भी शामिल हैं पंरतु उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ, उत्तर भारत की आर्य परंपराओं से सर्वथा भिन्न हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने हाल में यह आरोप लगाया है कि आर्य देवी-देवता, द्रविड़ों पर थोपे जा रहे हैं।
स्पष्टतः, इलाहाबाद उच्च न्यायालय जिस “हिन्दू आस्था“ की बात कर रहा है वह भी विभाजित है। उन धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के अतिरिक्त जो संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, अन्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों वाले व अन्य भाषा-भाषी हिन्दू भी वह “आस्था“ नहीं रखते जिसकी न्यायालय ने चर्चा की है। कुल मिलाकर, आस्था के आधार पर न्यायिक फैसले होने से सभी अल्पसंख्यक समूहों व विशेषकर प्रभावित होने वाले अल्पसंख्यकों पर, यह दबाव बनता है कि वे बहुसंख्यकों की मान्यताओं के समक्ष अपने घुटने टेक दंे।
जो कुछ मैंने ऊपर कहा, उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अयोध्या जैसे विवादों को बातचीत और आपसी समझौते से नहीं सुलझाया जाना चाहिए। अगर अयोध्या विवाद, संवाद और न्यायपूर्ण लेन-देन के आधार पर सुलझ जाता है तो मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी। इस मामले के सबसे पुराने पक्षकारों में से एक-श्री हाशिम अंसारी, जो सन् 1960 के दशक से इस मुकदमे को लड़ रहे हैं-ने निर्णय के बाद हनुमानगढी़ मंदिर के मुख्य पुजारी से मुलाकात की। यह एक प्रशंसनीय पहल है। उन्होंने मुख्य पुजारी श्री ज्ञान दास से अनुरोध किया कि वे निर्माेही अखाड़े को इस बात के लिए राजी करें कि आपसी संवाद और सहमति के जरिए इस विवाद का कोई हल निकाला जाए।
भारत एक महान प्रजातंत्र है और हमें इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने के बजाय भविष्य की ओर देखना चाहिए। भूत से भविष्य कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा कोई मुद्दा उठ खड़ा होता भी है तो उसे आपसी समझ और सहयोग से इस ढंग से निपटाया जाना चाहिए कि किसी पक्ष को यह महसूस न हो कि उसकी हार हुई है। राजनैतिक दलों द्वारा इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर उनका इस्तेमाल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए करना देश के लिए अहितकर है। भाजपा ने ठीक यही किया है।
यह अत्यंत खेद का विषय है कि बाबरी मस्जिद को ढहाने के गैर-कानूनी, असंवैधानिक व गैर-प्रजातांत्रिक षड्यन्त्र को अंजाम देने वाले तत्व, इस निर्णय को अपनी जीत मानकर जश्न मना रहे हैं। वे आस्था की न्याय पर विजय को अपनी विजय बता रहे हैं। यह अत्यंत ख़तरनाक व निंदनीय प्रवृत्ति है। मस्जिद ढहाने वालों को आज तक कोई सजा न मिलना भी भारतीय संविधान का अपमान है। उन्हें उनके इस कृत्य का-जो हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के विरुद्ध था-कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
ऐसे मामलों में समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हमारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, शांति कार्यकर्ताओं और उन सबको, जो संवैधानिक व प्रजातांत्रिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, आगे बढ़कर दोनों पक्षों पर सार्थक आपसी संवाद करने का दबाव बनाना चाहिए ताकि इस विवाद को अदालत की चहारदीवारी के बाहर सुलझाया जा सके।
सन् 2000 के शुरू में, कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की मदद से इस विवाद के शांतिपूर्ण निपटारे की पहल की थी परंतु विहिप ने उनका घेराव किया और उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। इस बार, द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने ऐसी ही पहल की है। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड को इस कार्य में शंकराचार्य को पूरा सहयोग देना चाहिए।
इसके साथ ही, हमें भारत के आमजनों की भी दिल खोलकर प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने शांति व सौहार्द बनाए रखा और अयोध्या निर्णय के बाद कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं आई। आमजनों ने हमारे राजनेताओं से अधिक परिपक्वता व समझदारी प्रदर्शित की है।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में मुसलमानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। निर्णय के पहले की जुमे की नमाजों में देश की लगभग सभी मस्जिदों के इमामों ने मुसलमानों से शांति बनाए रखने और निर्णय को-चाहे वह उनके पक्ष में हो या विरुद्ध-स्वीकार करने की अपीलें कीं। इसके विपरीत, सन् 1980 के दशक के मध्य से लेकर अंत तक मुसलमान, बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर अत्यंत संवेदनशील और उत्तेजित थे।
मुसलमानों को अब यह अहसास हो गया है कि प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में ही उनका सुखद व सुरक्षित भविष्य छुपा हुआ है। उन्हें इस बात का अहसास है कि टकराव से केवल हिंसा और बर्बादी होगी और सभी भारतीयों की भलाई में ही उनकी भलाई निहित है। इस बार हिन्दुओं और मुसलमानों ने जबरदस्त एकजुटता का परिचय दिया और अतिवादियों को-जो उत्तेजक वक्तव्यांे के जरिए माहौल को बिगाड़ते थे- दरकिनार कर दिया। अब तो अतिवादी भी अत्यंत समझदारी की बातें कर रहे हैं। उन्हें भारत की जनता ने इसके लिए मजबूर किया है। कोई भी जागृत समाज अपने राजनेताओं पर किस तरह नियंत्रण रख सकता है, यह उसका उदाहरण है। बेहतर होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे खटखटाने के पहले, अयोध्या मामले का बातचीत से हल खोजने की गंभीर कोशिश की जाए और हमारे देश जैसे प्रजातंत्र में यह काम केवल समाज कर सकता है।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर
मोबाइल: 0986944999
(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।)

Read Full Post »


इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाया गया निर्णय (सितंबर 2010), भारत के न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। एक अर्थ में यह बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की घटना का समापन पर्व है क्योंकि अदालत ने इस गैर-कानूनी कृत्य को विधिक स्वीकृति प्रदान कर दी है।
इस निर्णय का न तो भारतीय संविधान में निहित मूल्यों से कोई लेना देना है और न ही संविधान में वर्णित नीति निदेशक तत्वों से। इस निर्णय की जड़ें भारत के कानून में ही नहीं हैं।
यह सही है भारत के अधिकांश लोग, इस निर्णय पर अपनी प्रतिक्रिया देने से बचे। जो आलोचना हुई भी वह अत्यंत दबी जुबान में हुई। ऐसा दावा किया जा रहा है कि यह एक संतुलित निर्णय है जिससे सभी पक्ष प्रसन्न और संतुष्ट हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वर्तमान परिस्थितियों में इससे बेहतर निर्णय नहीं दिया जा सकता था।
निर्णय के पहले, देश के वातावरण में तनाव, अनिश्चय व आशकाएँ व्याप्त थीं। हिन्दुओं को डर था कि अगर हिंसा होती है और उसके शिकार वे या उनके प्रियजन होते हैं तो यह एक बड़ी मुसीबत होगी। मुस्लिम अल्पसंख्यक भी डरे हुए थे। उन्हें डर था कि हिंसा में उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाएगा और उनकी जानें जाएँगी।
सौभाग्यवश-उन तत्वों ने, जो कि विभिन्न दंगा जाँच आयोगों के अनुसार हिंसा के लिए जिम्मेदार रहे हैं- निर्णय का जश्न मनाने के लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया, जैसा कि उन्होंने सन् 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद किया था। इस बार, शायद संघ परिवार व समाज का सांप्रदायिक तबका, सन् 1992 की तुलना में कहीं अधिक खुश था परंतु उसने अपनी खुशी को प्रकट करने के लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया।
सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि मुसलमानों ने इस निर्णय के बाद चैन की साँस ली है क्योंकि उन्हें 1992 जैसी हिंसा नहीं झेलनी पड़ी। परंतु यह भी उतना ही सच है कि अदालत के निर्णय ने उन्हें निराश किया है। उन्हें ऐसा लगा कि यह निर्णय, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा में पहला कदम है। मुसलमानों के एक बड़े तबके का मानना है कि कानून भी उनके न्यायपूर्ण अधिकार की रक्षा नहीं कर सका। गहरी कुंठा, गुस्सा और निराशा का भाव इस निर्णय पर उन मुसलमानों की प्रतिक्रिया का केन्द्रीय तत्व है, जिन्होंने अपनी बात कहने की “हिम्मत“ दिखाई। सांप्रदायिक दुष्प्रचार के जरिए हाशिए पर धकेल दिए गए मुसलमानों का एक बड़ा तबका मन मसोस कर “आइए, हम आगे बढ़ंे“ के आह्वान को तवज्जो दे रहा है। दोनों पक्षों के बीच का विरोधाभास स्पष्ट है। जहाँ एक पक्ष को वह मिल गया है जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता था, वहीं दूसरे पक्ष में यह भावना प्रबल है कि उसके साथ एक बार फिर धोखा हुआ है।
संघ परिवार आह्लादित है कि भव्य राम मंदिर के निर्माण का पथ प्रशस्त हुआ है और उसकी मुसलमानों से यह अपेक्षा है कि इस “राष्ट्रीय संकल्प“ की पूर्ति में वे सहयोग करें।
स्पष्टतः यह राष्ट्रीयता की भिन्न व परस्पर विरोधी परिभाषाओं का मामला है। जिस राष्ट्रीयता की बात संघ परिवार कर रहा है वह धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र, स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों व हमारे संविधान में निहित सिद्धांतों का विरोधी है। वैसे भी, हम आर0एस0एस0 जैसे संगठन से और कोई अपेक्षा कर भी कैसे सकते हैं। संघ तो आधुनिक वेशभूषा में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का पैरोकार है। संघ की दृष्टि में अदालत के निर्णय ने सन् 1949 में विवादित ढाँचे में मूर्तियों की स्थापना और सन् 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाने के घोर गैर-कानूनी कृत्यों को विधिक मान्यता प्रदान कर दी है। भारतीय समाज ने भी इन दोनों जघन्य अपराधों को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया अत्यंत शर्मनाक रही है। हम सब जानते हैं कि कांग्रेस, सांप्रदायिक हिंसा के तांडव की मूकदर्शक रही है। कई मौकों पर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों व शीर्ष नेताओं ने सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। कांग्रेस ने निर्दोंषों का खून बहते चुपचाप देखा है।
हालिया निर्णय पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया ढुलमुल रही है। कांग्रेस सिर्फ इसलिए खुश है क्योंकि देश में शांति बनी हुई है। उसके लिए इस तथ्य का कोई महत्व नहीं है कि यह शांति, सौहार्द से नहीं उपजी है वरन् आमजनों के एक बड़े तबके द्वारा अन्याय और अपमान के घूँट को चुपचाप पी जाने का नतीजा है। कांग्रेस ने तो संवैधानिक मूल्यों व कानून के राज के पक्ष में बोलना बहुत पहले ही छोड़ दिया था। उसके लिए तो चुनावी गणित अधिक महत्वपूर्ण है। सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता, कांग्रेस की अवसरवादी सांप्रदायिक नीतियों से मेल नहीं खाती।
इन सबके बावजूद, इस देश में ऐसे लोग हैं जो इस निर्णय से व्यथित हैं और इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। ये लोग यह मानते हैं कि यह निर्णय बहुवाद, प्रजातंत्र व भारतीयता के विरुद्ध है।
नौकरशाही व राज्यतंत्र के अन्य हिस्से संतुष्ट हैं क्योंकि सतही तौर पर ही सही पंरतु देश में शांति बनी हुई है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि न्याय हो रहा है या नहीं, देश की व्यवस्था कानून के अनुरूप चल रही है या नहीं। वैसे भी, व्यवस्था के एक बड़े हिस्से पर संकीर्ण सांप्रदायिक विचारधारा का रंग चढ़ गया है और उसने हिन्दुत्व की विचारधारा को आत्मसात कर लिया है। भारतीय राज्य के इस्पाती ढाँचे को घुन लग गया है। उसका एक छोटा हिस्सा तो खुलकर हिन्दू राष्ट्र की वकालत कर रहा है और एक बड़ा हिस्सा प्रजातांत्रिक मूल्यों के क्षरण को चुपचाप देख रहा है। प्रजातांत्रिक मूल्यों के क्षरण के पीछे कई कारक हैं। इनमें शामिल हैं अनवरत जारी सांप्रदायिक दुष्प्रचार, वैश्वीकरण के कुप्रभाव व इनके कारण हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तन।
जाहिर है कि हमारे सामने एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा हुआ है और वह यह है कि इन परिस्थितियों में भारतीय संविधान की रक्षा कौन करेगा? राजनैतिक नेतृत्व केवल सतही शांति से संतुष्ट है और उसे इस बात की कोई फिक्र नहीं है कि देश के सभी नागरिकों के साथ न्याय हो रहा है या नहीं। इससे भारतीय संविधान के मूल्यों और न्याय के सिद्धांतों को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
अयोध्या मामले में अदालती निर्णय और उस पर प्रतिक्रिया उन सबके लिए अत्यंत गहन व गंभीर चिंता का विषय है जो भारतीय संविधान में आस्था रखते हैं और हिन्दू राष्ट्र का झंड़ा नहीं थामे हुए हैं। आज समाज में साम्प्रदायिक सोच का बोलबाला है। भारत की संवैधानिक और विधिक नींव की चूलें हिला देने वाला यह निर्णय, भारतीय गंणतंत्र पर इसके पूर्व हुए हमलों से कहीं अधिक गंभीर व ंिचंताजनक है। महात्मा गांधी की हत्या, सिक्ख-विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद का विध्वंस, पाॅस्टर ग्राहम स्टेन्स की हत्या, गुजरात कत्लेआम और कंधमाल हिंसा से भी अधिक चिंताजनक हैं यह निर्णय, उसका निहितार्थ व उसपर प्रतिक्रियाएँ। सिक्ख-विरोधी हिंसा को छोड़कर धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक भारत की अवधारणा पर हुए अन्य सभी हमलों के मूल में हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा थी और संविधान पर संघ परिवार द्वारा प्रायोजित व अंजाम दिए गए इन हमलों के दौरान कांग्रेस ने घोर अवसरवादिता का प्रदर्शन किया। उसने इन सभी मामलों में केवल दर्शक की भूमिका निभाई। एक तरह से उसने भारतीय राष्ट्र के संस्थापकों के सिद्धांतों की इन खुली अवहेलनाओें में सहायक की भूमिका का निर्वहन किया। इस घटनाक्रम को हम क्रिकेट की दुनिया के एक उदाहरण से समझ सकते हैं। भारतीय संवैधानिक मूल्य बल्लेबाज हैं, आर0एस0एस0- हिन्दुत्व राजनीति गेंदबाज हैं, कांग्रेस फील्डर है और सामूहिक साम्प्रदायिक सोच वह अम्पायर है जो गेंदबाज की हर अपील पर अपनी अँगुली उठाकर बल्लेबाज को आउट करार दे देता है। राज्यतंत्र का एक बड़ा हिस्सा इस मैच के लिए ऐसी पिच तैयार करता है जो गेंदबाज के लिए सबसे उपयुक्त व सुविधजनक हो। यह घटनाक्रम हमें नाजी जर्मनी की याद भी दिलाता है जहाँ यहूदियों, कम्युनिस्टों और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं का दानवीकरण कर देश का वातवरण ऐसा बना दिया गया था कि फासीवादी मूल्य राज्यतंत्र और आमजनों के दिलो दिमाग पर छा गए और अल्पसंख्यकों व अन्य कमजोर वर्गों के दमन को सामाजिक स्वीकृति मिल गई।
हिंसा की हर घटना साम्प्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देती है। अयोध्या मामले में जो निर्णय आया है वह तो दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है ही उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि निर्णय का सभी संबंधित पक्षों ने स्वागत किया है।
प्रगतिशील ताकतों और धर्मनिरपेक्ष आंदोलन को गंभीर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। एक ओर संघ परिवार हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे को ध्वस्त करने के लिए एक के बाद एक हमले किए जा रहा है और दूसरी ओर सत्ताधारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं कर रही है। ऐसे में भारतीय धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कौन करेगा? भारत के संविधान और स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों को कौन बचाएगा? समय आ गया है कि प्रगतिशील, उदारवादी और प्रजातान्त्रिक ताकतें खुलकर मैदान में आएँ। यह उनके लिए करो या मरो का संघर्ष है। समाज में व्याप्त साम्प्रदायिकता, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर हमले और अदालतों द्वारा भारतीय कानून की अवहेलना अत्यंत गंभीर चिंता का विषय हैं।

-राम पुनियानी
मोबाइल: 09322254043
(लेखक आई0आई0टी0 मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Read Full Post »


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सचिव एवं पार्टी मुखपत्र न्यू एज के संपादक शमीम फैजी ने अयोध्या विवाद पर हाल ही में आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर अपनी बेबाक राय रखी, साथ ही उन्होंने देश में मुसलमानों के वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने और उसमें वामपंथी विफलताओं और योगदान को भी रेखांकित किया। उनसे यह सारी बातचीत की दिल्ली के स्थापित युवा स्तंभकार एवं पत्रकार महेश राठी ने।

प्र0-अयोध्या विवाद पर हाल ही में आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद देश में एक अलग तरह की बहस शुरू हो गई है कि यह एक अदालती फैसला नहीं बल्कि पंचायती फैसला है। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

शमीम फैजी- इसमें दो बिन्दु हैं- पहला यह कि उस सम्पति के मालिकाना हक का मामला हाईकोर्ट की बेन्च के सामने था और मामले को उस दलील के आधार पर हल करने के बजाए आस्था के आधार पर हल करने का प्रयास किया गया है। इसे पंचायती फैसला कहना भी कतई ठीक नहीं है, यह धर्म निरपेक्ष संविधान के विरुद्ध आस्था को बुनियाद बना कर दिया गया फैसला है। आस्था को बुनियाद बनाकर दिए गए इस फैसले ने देश को एक थियोक्रटिस्ट स्टेट बनाने की नींव रख दी है। अब सुप्रीम कोर्ट में जाना है तो इसी पहलू को चुनौती दिया जाना चाहिए। इस फैसले को पंचायती कहने की बुनियाद जमीन को तीन हिस्सो में बाँटे जाने के कारण है। यहाँ भगवान राम को एक पार्टी माना गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को इसलिए नहीं माना गया कि उनकी अपील कुछ देर से आई थी। यदि एक तरफ कोर्ट अपील को देर से मान रहा है तो उनको हिस्सा क्यों दिया गया। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि मालिकाना हक के मुकदमे में बँटवारे का फैसला सुनाया गया हो। यह पंचायती नहीं देश के धर्म निरपेक्ष चरित्र के खिलाफ गैर संवैधानिक फैसला है।

प्र0. आज़ाद भारत में और आज़ादी से पहले भी देश में कई आन्दोलन हुए हैं और उनका समाज व राजनीति पर प्रभाव भी रहा है। अयोध्या विवाद से जुड़कर यह जो इतनी लम्बी राजनीति हुई है समाज और राजनीति पर आप उसका क्या प्रभाव देखते हैं?

शमीम फैजी- यह सारा मामला 1986 से शुरू हुआ जब राजीव गांधी ने शाहबानो केस में मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने हथियार डाले। उसके बाद उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में अपना अकाउंट बनाए रखने के लिए एक अदालती फ्राड के जरिए विवादास्पद जगह का ताला खुलवाकर पूजा शुरू करवाई। वह राजीव गांधी ही थे जिन्होंने अयोध्या से अपने चुनावी अभियान को शुरू करते हुए रामराज्य की घोषणा कर डाली। राजीव गांधी सम्प्रदायवादी नहीं थे मगर उन्होंने साम्प्रदायिक कार्ड का इस्तेमाल किया। जिसके बाद हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायवादियों ने उनके इस कार्ड का खूब फायदा उठाया। 1990 में राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का सीधा संबंध नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को लागू करने की साजिश से जुड़ा हुआ है। जब देश को नव-उदारवाद के हवाले किया जा रहा था तो देश की जनता मन्दिर-मस्जिद की बेमानी बहस में उलझी हुई थी। आज फिर से फैसला ऐसे वक्त पर आया है जब मनमोहन सिंह की सरकार अमेरिका के सामने घुटने टेक रही है। अपने असली गुनाह छिपाने के लिए मन्दिर मस्जिद विवाद को हवा दी जा सकती है। इस मसले को जिन्दा रखने के लिए समझौते के नाटक से लेकर कुछ भी किया जा सकता है। दरअसल यू0पी0 ए-1 वामपक्ष के समर्थन पर टिकी सरकार थी। वामपक्ष ने जहाँ राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना कानून बनवाने में, आर0टी0आई0 अधिनियम लागू करवाने में सरकार को बाध्य किया वहीं राजेन्द्र सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा कमेटी भी बनवाई थी। इन कमेटियों की रिपोर्टों के कारण मुसलमान राजनीति का एजेंडा भावनात्मक से ज्यादा आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक सवालों पर केन्द्रित हुआ। अब कोशिश यह होगी कि मुसलमान सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा को भूलकर मन्दिर-मस्जिद के भावनात्मक सवालों में उलझ जाएँ।

प्र0-बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद के प्रभाव के रूप में क्या आप देश में एक तरह के साम्प्रदायिक नस्लवाद का उभार भी देखते हैं?

शमीम फैजी- यह बिल्कुल साफ है कि पिछले दशक में चाहे खुलेआम दंगे न हुए हों मगर भावनात्मक स्तर पर साम्प्रदायिक सोच बढ़ी है। अल्पसंख्यकों में मुसलमानों की तादाद अधिक है इसीलिए खास निशाना वही हैं। राजधानी तक में मुसलमानों को मकान किराए पर देने से इंकार किया जाता है। जो पहले से मिली जुली आबादी में रहते हैं या वहाँ उनकी संपत्ति है तो कोशिश यह होती है कि वे उसे छोड़कर चले जाएँ। कोशिश यह होती है कि वे अपने-अपने पाकिस्तान में रहें, जैसा कि मुस्लिम बहुल आबादी को कहा जाता है। जमीन पर धर्म निरपेक्षता कमजोर हुई है। हालाँकि इसके लिए धर्म निरपेक्ष शक्तियाँ भी जिम्मेदार हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में हैं भाई-भाई सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है। व्यवहार में जमीन पर यह दिखाई नहीं देता है। धर्म निरपेक्षता का एक अर्थ धर्म और राजनीति को अलग रखना भी है। मगर वामपक्ष को छोड़कर सभी पार्टियों द्वारा रमजानों में रोजा इफ्तार का नाटक क्या है? महाराष्ट्र में गणेश उत्सव व नवरात्र पूजा राजनैतिक दलों के नाम व संरक्षण में होते हैं। अब काली पूजा के नाम पर भी यही सब शुरू हो गया है। क्या धर्म का राजनीति के साथ उपयोग नहीं है।

प्र0-देश में इस साम्प्रदायिकता की राजनीति और साम्प्रदायिक सद्भाव के बिगड़ने में कांग्रेस की क्या भूमिका देखते हैं?

शमीम फैजी- अलग अलग समय पर कांग्रेस ने साॅफ्ट हिन्दुत्व का खेल खेला है। पं0 जवाहर लाल नेहरू के जमाने में कांग्रेस में ऐसा था कि जो खुलेआम हिन्दुत्ववादी थे उन तक को कैबिनेट में स्थान मिला था, जैसे गोविन्द बल्लभ पंत और श्यामा प्रसाद मुखर्जी। फिर भी पंडितजी ने कभी साम्प्रदायिकता से समझौता नहीं किया। मगर इंदिरा गांधी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। जब इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ का नारा और दिखावे का समाजवाद विफल हो गया तो वे साम्प्रदायिक भावनाओं का इस्तेमाल करने लगीं। विश्व हिन्दू परिषद तक उनके आशीर्वाद से कर्ण सिंह ने स्थापित की, हरिद्वार में भारत माता मन्दिर के उद्घाटन में वे देवरस के साथ थीं। पंजाब में सिख आतंकवाद और भिंडरवाले पर भी उनकी मेहरबानी थी। खालिस्तानी खतरे को दिखाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नारे दिए। यहाँ तक कहा कि देश की एकता को असली खतरा अल्पसंख्यकों से ही है। 21वीं सदी का सपना दिखाने वाले राजीव गांधी ने भी शाहबानो केस में मुस्लिम कट्टरपंथ का और बाबरी मामले पर हिन्दू कट्टरपंथ का इस्तेमाल किया। आज कांग्रेस और भाजपा दोनांे ही कई मामलों में एक सी भाषा बोलते हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर कांग्रेस ने ढील दिखाई क्योंकि कांग्रेस को न्युक्लियर डील मामले पर भाजपा का साथ चाहिए था। राहुल गांधी आर0एस0एस0 और सिमी को एक जैसा बताते हैं, फिर सिमी पर प्रतिबंध तो आर0एस0एस0 पर क्यों नही? इसका राहुल कोई जवाब नहीं देते हैं। समझौता एक्सप्रेस से अजमेर तक दर्जनों बम काण्ड हो चुके हैं पर भारत सरकार उनकी जाँच पर संजीदा नहीं है। कांग्रेस के लिए धर्म निरपेक्षता एक मुखौटा है जब चाहे पहन लिया जब चाहे उतार दिया।

प्र0-विववादास्पद अयोध्या मामले का एक सर्वमान्य हल आप क्या देखते हैं?

शमीम फैजी- केवल सुप्रीम कोर्ट। सुप्रीम कोर्ट को देश के संविधान के मुताबिक फैसला करना चाहिए और उसे लागू करना चाहिए। बातचीत और समझौता सिर्फ उलझाने और मुद्दे को जिन्दा रखने का ही मक़सद है।

प्र0-वाम शासित राज्यों में मुसलमानों की स्थिति खासतौर पर पं0 बंगाल में काफी खराब है। राजेन्द्र सच्चर कमेटी रिपोर्ट की रोशनी में आपने भी अपनी एक किताब में इसे रेखांकित किया है। केवल सवाल उठाने से आगे भाकपा इस मसले पर क्या जरूरी कदम उठा रही है?

शमीम फैजी- पार्टी ने मुस्लिम अल्पसंख्यकों के सवालों को प्रमुखता से उठाया है। केरल की अच्यूतमेनन सरकार के जमाने में अल्पसंख्यकों के हक़ों को संजीदगी से लागू किया गया। पं0 बंगाल में एक बड़ी गलती जरूर हुई है। हालाँकि भूमि सुधारों के तहत जमीन के बँटवारे में मुस्लिम अल्पसंख्यकों का बराबरी से ध्यान रखा गया है, वामपंथी सरकार में उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया और राज्य में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ है। फिर भी बदकिस्मती इस बात की है कि राज्य में राजनेताओं और नौकरशाहों दोनांे का एक हिस्सा ऐसा है जो यह सोचता है कि मुसलमानों की जान माल की सुरक्षा करके उन्हें अपना वोट बैंक बनाए रखा जाए। मगर जान माल की रक्षा के अलावा उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ नहीं किया गया। राजेन्द्र सच्चर कमेटी रिपोर्ट पर दो बार भाकपा ने सरकार को ज्ञापन देकर अल्पसंख्यकों के बारे में अपनी माँगें रखी हैं। हमारे ज्ञापन पर ही सरकार ने ओ0बी0सी0 आरक्षण को सात प्रतिशत से बढ़ाकर सत्रह प्रतिशत कर दिया है जिसमें मुस्लिमों को दस प्रतिशत देने का प्रावधान है। हालाँकि वामपंथी सरकार को अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

प्र0-और अब एक आखिरी सवाल, हिन्दुस्तान के मुस्लिम अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए क्या रास्ता आप देखते है? कोई रोड मैप जो उनके बेहतर भविष्य के लिए अपने दिमाग में सोचते हों?

शमीम फैजी- सच्चर कमेटी रिपोर्ट के बाद यूथ में जागरूकता आई है। दुर्भाग्य से जो मुसलमानों के स्थापित नेता हैं वे उनके वास्तविक सवालों के बजाए अरब जगत की बात करते हुए, फिलिस्तीन का रोना रोकर, अलीगढ़ और जामिया के लिए लड़ने की बात करके ही उन मुसलमानों को बहकाते हैं जो कभी अपने बच्चे को प्राथमिक शिक्षा दिलवाने की स्थिति में भी नहीं हैं। बदलाव उसी सूरत में आएगा कि मुस्लिम नौजवान अपनी पसन्द के धर्म निरपेक्ष जनवादी दलों में शामिल हों और उन दलों को मुसलमानों की सामाजिक राजनैतिक व शैक्षिक जरूरतों के अनुसार नीति निर्धारित करने के लिए मजबूर करें।

-महेश राठी
मोबाइल- 09891535484

Read Full Post »


‘इस दृष्टिकोण से हिन्दुस्थान की विदेशी नस्लों को या तो निश्चित तौर पर हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिए, हिन्दू धर्म का सम्मान तथा उस पर श्रद्धा रखना सीखना चाहिए, हिन्दू नस्ल और संस्कृति यानी हिन्दू राष्ट्र के गौरवान्वन के अलावा किसी और विचार को मन में नहीं लाना चाहिए और हिन्दू नस्ल में समाहित हो जाने के लिए अपनी पृथक पहचान त्याग देनी चाहिए या फिर वे इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र के गुलाम होकर रह सकते हैं, बिना किसी दावे के, बिना किसी भी विशेषाधिकार के और उससे भी आगे बिना किसी भी वरीयतापूर्ण व्यवहार के, यहाँ तक कि उन्हें कोई नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे। उनके लिए कोई और रास्ता अपनाने की छूट तो कम से कम नहीं ही होनी चाहिए। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं, हमें उन विदेशी नस्लों से जिन्होंने रहने के लिये हमारे देश को चुना है, ऐसे ही निपटना चाहिए जैसे प्राचीन राष्ट्र निपटते हैं’’-
आर0एस0एस0 के द्वितीय सरसंघचालक सदाशिव माधव गोलवलकर की किताब ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ से (पेज 47)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना से ही हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना के लक्ष्य को लेकर संचालित रहा है। इसके प्रमुख सिद्धांतकार गोलवलकर और उनके प्रेरणास्रोत सावरकर इस हिन्दुत्व को स्पष्ट तौर पर एक ऐसे देश के रूप में परिभाषित करते हैं जिस पर केवल हिन्दुओं का हक है और इससे अलग धर्म को मानने वाले उनकी दृष्टि में केवल ‘विदेशी’ हैं। ऊपर उद्धृत किताब के पेज 43 पर गोलवलकर साफ कहते हैं कि ‘’हिन्दुस्तान एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है और इसे निश्चित तौर पर होना ही चाहिए, और कुछ और नहीं केवल एक हिन्दू राष्ट्र। वे सभी लोग जो राष्ट्रीय यानी कि हिन्दू नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा को मानने वाले नहीं होते वे स्वाभाविक रूप से वास्तविक ‘राष्ट्रीय’ जीवन के खाँचे से बाहर छूट जाते हैं।
हम दुहराते हैं- ‘हिन्दुओं की धरती हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट्र रहता है और रहना ही चाहिए- जो आधुनिक विश्व की वैज्ञानिक पाँच जरूरतों को पूरा करता है। फलतः केवल वही आंदोलन सच्चे अर्थों में ‘राष्ट्रीय’ हैं जो हिन्दू राष्ट्र के पुनर्निर्माण, पुनरोद्भव तथा वर्तमान स्थिति से इसकी मुक्ति का उद्देश्य लेकर चलते हैं। केवल वही राष्ट्रीय देशभक्त हैं जो अपने हृदय में हिन्दू जाति व राष्ट्र के गौरवान्वीकरण की प्रेरणा के साथ कार्य को उद्यत होते हैं और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। बाकी सभी या तो गद्दार हैं और राष्ट्रीय हित के शत्रु हैं या अगर दयापूर्ण दृष्टि अपनाएँ तो बौड़म हैं’’। यही संघ का सच है, उसका राष्ट्रवाद है और उसकी देशभक्ति है। इसीलिए इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रत्यक्ष-परोक्ष घृणा पर ही पलता है। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस इसी घृणा की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति थी। लेकिन उस दौर का उन्माद बनाए रख पाने में संघ और उसके गिरोह सफल नहीं हो पाए और केन्द्रीय सत्ता के साथ-साथ उत्तर-प्रदेश की सत्ता भी जल्दी ही उनके हाथों से निकल गई। हालाँकि यह मान लेना कि साम्प्रदायिकता के खूँखार दैत्य से भारत को मुक्ति मिल गई, नादानी और सरलीकरण ही होगा। गुजरात से लेकर कंधमाल तक देश के तमाम हिस्सों में हिन्दुत्व गिरोह ने आतंक के तार फैलाए हैं और पहले मालेगाँव मामले में प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी और फिर अभिनव भारत तथा संघ से जुड़े तमाम लोगों के देशभर में आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के जो सबूत मिले हैं उसकी रोशनी में हम इसकी तैयारियों और खतरनाक मंसूबों को समझ सकते हैं। यहाँ यह बता देना समीचीन होगा कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय में वह डायरी आज भी उपलब्ध है जिसमें हेडगेवार के निकटस्थ सहयोगी बी0डी0 मुंजे ने मुसोलिनी से अपनी मुलाकात और संघ के सैन्यीकरण की योजनाओं पर विस्तार से लिखा है।
ऐसे में पिछले दिनों बाबरी मस्जिद पर हाईकोर्ट का जो फैसला आया उस पर इस गिरोह द्वारा अपनाई गई संत मुद्रा किसी को भी चैंका सकती थी। कल तक ‘आस्था के सवाल अदालत में हल न होने’ की बात करने वाले लोग ‘अदालत के फैसले के पूरे सम्मान’ की ही बात नहीं कर रहे थे अपितु ‘मसले को आपसी बातचीत से सुलझाने’ तक की बात कर रहे थे। इसका एक कारण तो अदालत द्वारा ‘आस्था को तर्क पर वरीयता’ देने वाला फैसला था जिस पर इतना कुछ लिखा और कहा जा चुका है कि कुछ अलग से कहने की जगह मैं बस जस्टिस राजेन्द्र सच्चर को उद्धृत करना चाहूँगा। समयांतर के नवंबर अंक में प्रकाशित साक्षात्कार में वे कहते हैं- ‘यह फैसला बेतुका है, कोई अदालत हिन्दुओं की इस आस्था के आधार पर कि वह राम की जन्मस्थली है इस विवाद का फैसला कैसे कर सकती है? अदालत में आस्था का कोई अर्थ नहीं होता है।‘ और इसी वजह से संघ परिवार ने अपने पक्ष में दिए गए फैसले को बड़ी ‘उदारता’ से स्वीकार किया और इससे जुड़े लोगों ने इसे ‘राम जन्म भूमि आंदोलन के औचित्य’ के स्वीकार का प्रमाण से लेकर ‘राम के चरित्र की प्रामाणिकता पर मुहर भी माना’।
लेकिन यह इकलौता कारण नहीं था। देश भर में मीडिया, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों और आमजनों द्वारा किसी भी हाल में शांति बनाए रखने का और कम से कम तात्कालिक सांप्रदायिक सद्भाव का जो माहौल बनाया गया था उसमें किसी ‘विजय जुलूस’ या भड़काऊ बयान का जो उल्टा प्रभाव पड़ सकता था उससे संघ गिरोह बखूबी परिचित था। इसीलिए ‘फैसले का सम्मान’, ‘बातचीत से सुलझाने’ और अब ‘आगे बढ़ने’ जैसे धोखादेह शब्दों में उसने अपने असली मंसूबों को छिपाना उचित समझा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता और स्थितियाँ सामान्य हुईं इन लोगों ने अपना असली रंग दिखाना शुरु कर दिया है। अलग-अलग मंचों से जो बयान आए उनसे साफ है कि इन्हें उस दो तिहाई जमीन से भी संतोष नहीं जो अदालत ने इन्हें दी है, साथ ही शायद यह डर भी है कि अगर मुस्लिम पक्ष उच्चतम न्यायालय तक जाता है तो फैसला कुछ और भी हो सकता है। इसीलिए जहाँ एक तरफ चाशनी पगे शब्दों की कूटनीति से उन्हें अदालत में दुबारा जाने से रोकने की कोशिश की गई वहीं संत सम्मेलन जैसे मंचों से पूरी जमीन कब्जाने और मुसलमानों को ‘पंचकोशी की पवित्र सीमा के भीतर मस्जिद न बनाने देने’ जैसी बातें करके अपने असली उद्देश्य को पूरा करने की भी भरपूर कोशिश की जा रही है। संघ के इतिहास को जानने वाले लोग उसके दोमुँहेपन से बखूबी परिचित हैं। ऊपर जिस साक्षात्कार का जिक्र किया गया है उसमें जस्टिस सच्चर एक वाजिब सवाल उठाते हैं कि आखिर मुसलमानों से ही क्यों कहा जाए कि आप आगे बढ़ें? यह सवाल संघ परिवार के सामने भी तो रखा जा सकता है। वे क्यों नहीं आगे बढ़ते? यहाँ तक कि इस फैसले के साथ वह जीत का अनुभव तो कर रहे हैं लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। वे वहाँ पूरी भूमि पर राम मंदिर का निर्माण करना चाहते हैं। यदि यह हिन्दू आस्था का सवाल है, तो क्या यह मुस्लिम आस्था का सवाल नहीं है?’
दरअसल, संघ के लिए राम मंदिर आस्था का नहीं राजनीति का सवाल है। वह इसे अपने व्यापक मंसूबों की राह के मील का पत्थर बनाना चाहता है जिससे एक तरफ वह अपने समर्थकों को एक झूठे राष्ट्रवादी गौरव से भर कर और अधिक आक्रामक होने के लिए प्रेरित कर सके तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के मन में भय और पराजयबोध इस क़दर भर जाए कि वे अपनी स्थिति को देश के भीतर ‘दोयम दर्जे’ के नागरिक की तरह स्वीकार कर लंे। वह इस राम चबूतरे पर चढ़ कर हिन्दू राष्ट्र के सिंहासन तक पहुँचना चाहता है। दुर्भाग्य से हमारी वर्तमान राजनीति में सक्रिय अधिकांश दल इस हकीकत को या तो समझ नहीं रहे या हिन्दू मतों की लालच में सब जानते-बूझते हुए खामोश हैं। यह एक ख़तरनाक लक्षण है- हमारे लोकतंत्र के लिए भी और हमारी उस साझा विरासत के लिए भी जिससे देश की अखंडता निर्धारित होती है। राजनैतिक नेतृत्व और न्यायपालिका से भरोसा उठ जाने का जो परिणाम होता है वह हम कश्मीर और उत्तर-पूर्व में पहले से ही देख रहे हैं। असद जैदी समयांतर के उसी अंक में जब यह सवाल उठाते हैं कि ‘क्या हिंदुत्ववादी गिरोह और आपराधिक पूँजी द्वारा नियंत्रित समाचारपत्रों और टी0वी0 चैनलों और उनके शिकंजे में फँसे असुरक्षित, हिंसक और लालची पत्रकार और ‘विशेषज्ञ’ अब इस कल्पित और गढ़ी गई आस्था के लिए परंपरा, ज्ञान, इतिहास, पुरातत्व, कानून, इंसाफ, लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की बलि देंगे? यह अधिकार इन्हें किसने दिया है?’ तो उसके मूल में यही चिंता है।
इसीलिए आज सवाल सिर्फ किसी एक मस्जिद या मंदिर का नहीं रह गया है। सवाल इससे कहीं अधिक व्यापक है। सवाल संघ गिरोह के मंसूबों को पहचानने और इसके खिलाफ व्यापक अभियान चलाए जाने का है। सवाल राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के लम्बे दौर में अर्जित साझा विरासत की रक्षा का है। सवाल भगत सिंह के शोषणमुक्त समाज की स्थापना का है। सवाल यह है कि जब राजनैतिक व्यवस्था के प्रमुख खिलाड़ी, कार्यपालिका और न्यायपालिका उस विरासत को झुठला कर बहुसंख्यक आस्था को अल्पसंख्यक आस्था पर वरीयता दे रहे हैं तो हम क्या इस देश को चुपचाप यूँ ही एक गृहयुद्ध और सर्वसत्तावादी धार्मिक राष्ट्रवाद की गोद में चले जाने देंगे? इस देश के सभी न्यायप्रिय तथा लोकतंत्र समर्थक लोगों के लिए ये सवाल अब केवल अकादमिक बहस नहीं जीवन-मरण के सवाल हैं। हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ हमारी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को एक बर्बर युग की ओर ढकेल देगी।

-अशोक कुमार पाण्डेय
मोबाइल- 09425787930
(लेखक सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं)

Read Full Post »

इंसान को व देश को पंगु, बीमार और कंगाल बनाती मोटरवाहन क्रांति:
साईकिल ही इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन हो सकती है।

दोस्तों,
पिछले दिनों पेट्रोल की कीमत में 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हो गई। डीजल की कीमत भी बढ़ने वाली है। कुछ महीने पहले जब से सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने का फैसला किया, तब से छः बार उनके दाम बढ़ गए हैं। पहले से महंगाई की मार से जूझती जनता पर यह बड़ा अत्याचार है। सरकारों ने पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगा रख है। यदि उसे कम कर दिया जाए तो राहत मिल सकती है।
लेकिन इस संकट से राहत पाने के लिए हम भी कुछ कर सकते हैं, यदि कुछ नए और रचनात्मक तरीके से हम सोचना शुरु करें। यदि थोड़ा विचार करेंगें तो हम पाएंगे कि कई काम पहले हम पैदल या साईकिल से जाकर कर लेते थे, अब
मोटरसाईकिल या कार से करते हैं। क्या यह गैर-जरुरी नहीं है ? जरुरी लग सकता हैं क्योंकि उनकी आदत पड़ गई है। क्या यह आदत हमारे लिए, हमारे नगर के लिए, समाज के लिए और देश के लिए अच्छी है ? पिछले दिनों देश में मोटर-वाहनों की जो बाढ़ आई है, एक तरह की मोटरवाहन क्रांति आई है, जिसमें हम भी बिना सोचे-विचारे बह गए हैं, क्या वह स्वागत-योग्य है ? इसके कारण जो संकट पैदा हो रहे हैं, क्या हमने उन पर सोचा है ?
आइए, विचार करें –
आइए, हम कुछ बातों पर विचार करते हैं:-
1. मोटरवाहनों में प्रयोग होने वाला पेट्रोल/डीजल देश के बाहर से आयात करना पड़ता है, जिससे देश का धन बाहर जाता है। यदि हम पैदल या साईकिल से चलते हैं, तो कोई ईंधन खर्च नहीं होता।
2. मोटरवाहनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां विदेशी है या फिर विदेशी कंपनियों की भागीदारी है। तकनालाॅजी व पुर्जों का भी आयात होता है। विदेशी कंपनियों के मुनाफे व रायल्टी के रुप में भी देश का काफी पैसा बाहर जाता है। दूसरी तरफ, साईकिलें बनाने वाली करीब सारी कंपनियां भारतीय है।
3. मोटरवाहन गाड़ियां बड़े-बड़े कारखानों में बनती है, जो पूरे मशीनीकृत और स्वचालित होते हैं। इनमें बहुत कम रोजगार मिलता है। जबकि साईकिलें व उनके पुर्जें ज्यादातर लघु उद्योगों में बनते हैं, जिनसे ज्यादा रोजगार पैदा होता है।
4. औद्योगीकरण के नाम पर मोटरवाहन कंपनियों को सरकार कई कर-रियायतें, अनुदान, सस्ती जमीन दे रही है। सिंगूर जैसे संघर्ष भी इसके कारण पैदा हो रहे हैं।
5. मोटरवाहनों से हमारी सड़को पर भीड़ बढ़ती जा रही है और पैदल चलने की जगह भी नहीं बची है। टेªफिक जाम होने लगे हैं। बड़े शहरों में पार्किंग की समस्या भी भयानक हो गई है।
6. इन मोटरगाड़ियों के लिए शहरों में सड़कों को चैड़ा किया जा रहा है। उसके लिए अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब हाथठेले वालों, गुमठी वालों, छोटे दुकानदारों को हटाया जा रहा है और उनकी रोजी-रोटी छीनी जा रही है। कई जगह घरों को भी तोड़ा जा रहा है। इसी तरह राजमार्गों को चार लेन-छः लेन बनाने, बायपास और एक्सप्रेस मार्ग बनाने में भारी मात्रा में किसानों को उजाड़ा जा रहा है तथा खेती की जमीन छीनी जा रही है। यदि इसी तरह बड़े पैमाने पर खेतों को खतम किया जाता रहा तो, देश में अन्न संकट पैदा हो सकता है।
7. इन्हीं मोटरगाड़ियों के लिए एक्सप्रेसवे, हाईवे, बायपास, फ्लाईओवर, नए पुल, पार्किंग स्थल आदि बनाने में इस गरीब देश का अरबों-खरबों रुपया बरबाद हो रहा है। यदि इतनी गाड़ियां नहीं होती, तो पुरानी सड़कों और पुराने पुलों से भी काम चल सकता था। इनके कारण सड़कों की मरम्मत पर भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
8. यह मत सोचिए कि मोटरगाड़ियों की संख्या में यह विस्फोट आबादी में वृद्धि के कारण हो रहा है। भारत की आबादी तो केवल दो-ढाई फीसदी की दर से बढ़ रही है, किन्तु गाड़ियों (खास तौर पर कारों व मोटरसाईकिलों) की तादाद हर साल 20-25 प्रतिशत बढ़ रही है। बसों और ट्रकों की संख्या तो ठीक है (उसमें भी कुछ गैर जरुरी परिवहन हो सकता है) किन्तु एक कार सिर्फ एक या दो आदमी को ले जाती है और जगह काफी घेरती है। यह आबादी विस्फोट नहीं, ‘कार विस्फोट’ है, जो मुसीबत पैदा कर रहा है।
9. मोटरवाहनों के कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हमारे राजमार्ग मौत के राजमार्ग बनते जा रहे हैं।
10. मोटरगाड़ियों के धुएं से हवा जहरीली होती जा रही है। दुनिया के पर्यावरण को बिगाड़ने, जलवायु परिवर्तन और धरती के गरम होने में मोटरगाड़ियों का भी योगदान है। इसी तरह शोर भी बढ़ता जा रहा है। ऐसी ही हालत रही तो लोग जल्दी ऊंचा सुनने लगेंगें और बहरापन बढ़ेगा।
11. पैदल या साईकिल से चलने पर शरीर की कसरत होती है। गाड़ियों से चलने से मोटापा,हृदयरोग, रक्तचाप, मधुमेह, कब्ज, बवासीर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। अपना शरीर ठीक रखने के लिए हमंे अलग से जिम, योगासन, भ्रमण, दवाईयों का सहारा लेना पड़ रहा है। यदि पैदल या साईकिल से चलते तो शायद इनकी जरुरत ही नहीं पड़ती (या कम पड़ती)।
12. पृथ्वी पर जितने भी चैपाये हैं, उनमें सिर्फ इंसान ने ही पिछले पैरों पर खड़े होकर चलना सीखा है (चिम्पांजी और कंगारु जरुर दो अपवाद है)। इंसान ने लाखों सालों में यह महारत हासिल की है। यदि गाड़ियों का ऐसा प्रचलन बढ़ता गया, तो कहीं वह पैदल चलना भूल तो नहीं जाएगा ? इतिहास में बड़े-बड़े काम पैदल चलकर ही हुए है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसामसीह, शंकराचार्य और गुरुनानक ने पैदल घूम-घूम कर ही अपना संदेश फैलाया है। व्हेनसांग, फाह्यान और मार्को पोलो ने पैदल ही दुनिया की दूरियां नापी थी।
13. महंगी कारों और मोटरसाईकिलों ने इस देश में विलासिता और शान-शौकत की भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है तथा अमीर-गरीब की खाई को बढ़ाया है। दुनिया में कभी भी सबके पास कार नहीं हो सकती है, लेकिन साईकिल हो सकती है। इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन साईकिल ही हो सकता है।
14. दुनिया के अमीर देशों में भी साईकिलों का प्रचलन और लोकप्रियता बढ़ रही है। वहां के रास्तों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाई जाती है। डेनमार्क की सड़कों पर अब मोटर गाड़ियों से ज्यादा साईकिलें दिखाई देती हैं। फ्रांस में प्रतिवर्ष पूरे देश का चक्कर लगाने वाली एक अंतरराष्ट्रीय साईकिल दौड़ आयोजित होती है, जिसे देखने के लिए लाखों लोग जुटते हंै। इस का नाम ‘टूर डी फ्रांस’ है। पेरिस मंे नगर निगम ने किराये पर देने के लिए 20 हजार साईकिलों की एक जोरदार व्यवस्था की है, जिन्हें 1639 केन्द्रों से कहीं से भी उठा सकते हैं और कहीं भी जमा कर सकते हैं। इसका नाम है ‘वेलिब’ यानी साईकिल की आजादी। यूरोप, अमरीका, कनाडा, आस्टेªलिया आदि में कई नगरों में ऐसी योजनाएं शुरु हुई हैं और ऐसी साईकिल दौड़ें भी लोकप्रिय हो रही है। क्या हम उनसे सीखेंगे ?
हम क्या कर सकते हैं ?
1. कार-मोटर साईकिल की जगह पैदल व साईकिल पर चलना शुरु करें। लंबी दूरी के लिए सार्वजनिक वाहनों (बस, रेलगाड़ी, रिक्शा, टैक्सी आदि) का इस्तेमाल करें।
2. अपने नगर व इलाके में साईकिल का प्रचार करें। साईकिल-दौड़ें व साईकिल-रैलियां आयोजित करें। ‘साईकिल क्लब’ का गठन करें। जीवन भर साईकिल चलाने वाले बुर्जुगों को सम्मानित करें।
3. मोटरवाहन उद्योग को सरकार द्वारा दिए जा रही रियायतों, अनुदान व प्रोत्साहन का विरोध करें। सरकार की परिवहन नीति बदलने के लिए जनमत बनाएं।
4. शहरों के व्यस्त बाजारों और भीड़ वाले इलाकों को ‘वाहन-मुक्त जोन’ बनाने के लिए अभियान चलाएं। सड़कों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाने की मांग करें।
5. बच्चों द्वारा वाहन चलाने पर पूरी तरह रोक लगे और सही प्रशिक्षण व जांच के बगैर किसी को ड्राइविंग लाईसेन्स न दिया जाए, इस दिशा में कोशिश करें।

सुनील
मोबाईल 09425040452

Read Full Post »


ग्यारहवीं योजना में रोजगार

फिर भी सच्चाई के कुछ पहलू छिपाए नहीं जा सकते हैं। नवउदारवादियों को यह मानना पड़ता है 90 प्रतिशत से ज्यादा श्रमिक अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्रा में काम करते हैं। यही नहीं, संगठित क्षेत्रा में, जहां नियमित रूप से मजदूरी और वेतन मिलता है (चाहे वह जिंदा रहने के लिए अपर्याप्त ही क्यों न हो), उसमें पूरी श्रमिकों की संख्या का एक छोटा-सा भाग लगा हुआ है और बाकी या तो अपने स्वयं के किसी कारोबार में लगे हैं अथवा अनियमित दिहाड़ी मजदूर हैं। यदि हम राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के आंकड़ों को ज्यादा उपयुक्त मानें, तब भी 2004-05 में संगठित क्षेत्रा में नियमित मजदूरी अथवा वेतन पाने वाले लोगों की संख्या 3.185 करोड़ थी। इनमें से 88 प्रतिशत श्रमिक संगठित गैर-कृषि कामों में लगे थे। यह भी गौर करने की बात है कि इन सब श्रमिकों में से 10 प्रतिशत से कम माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर पाए थे। इस तरह विश्व बैंक और भारतीय योजना आयोग की रोजगार संबंधी समझ काफी हद तक मनोगत विचारों पर टिकी हुई है जो अर्थव्यवस्था के सर्वमान्य मकसदों के अनुकूल न होकर नवउदारीकरण की इस गंभीरतम सामाजिक असफलता को कम करके दिखाने के लिए उस पर एक वैज्ञानिक मुलम्मा चस्पा करती है। सीधी बात यह है कि देश में 77 प्रतिशत लोग रोजाना सिर्फ 20 रुपए खर्च करने की क्षमता प्राप्त कर पाए हैं। वर्तमान नीतियों के तहत राष्ट्रीय आय बढ़ाने और उद्योगों तथा सेवाओं के क्षेत्रा को सभी सामाजिक नियंत्राणों से मुक्त करके और भारत को देशी-विदेशी पूंजी के लिए अभयारण्य बना कर तेजी से पूंजी संचय और उत्पादन वृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ने के सारे प्रयास न तो रोजगार बढ़ा पाते हैं, न मजदूरी की दर और न ही रोजगार की गारंटी या सुरक्षा। वास्तव में, उत्पादन के मुकाबले रोजगार में बढ़ोतरी के पिछड़ जाने के कारण उत्पादकता में बढ़त का दावा सांख्यकीय तिकड़म भर है। बढ़त कोई वास्तविक या जमीनी सच्चाई यानी खेती या कारखाने में वास्तविक रूप से होने वाला कोई सुधार का नतीजा नहीं, बल्कि उत्पादकता की आकलन पद्धति और परिभाषा में फेरबदल का नतीजा है। विद्यमान उद्योगों आदि काम करनेवालों की संख्या पहले से कम हो जाने के कारण प्रति व्यक्ति उत्पादन ज्यादा नजर आता है।
यहां एक गंभीर बात की तरफ इशारा करना जरूरी है। नवउदारवादी नीतियों का एक मुख्य बिंदु कल-कारखानों यानी विनिर्माण क्षेत्रा और वित्तीय क्षेत्रा और आधुनिक सूचना तकनीकों पर आधारित सेवाओं को नियत्रांण-मुक्त कर और प्रोत्साहन दे कर विकास प्रक्रिया का अग्रिम दस्ता बनाना है। किंतु कल-कारखानों का योगदान न तो राष्ट्रीय आय में और न ही हमारी सारी श्रमशक्ति में इस क्षेत्रा का अनुपात 15-16 प्रतिशत से ज्यादा हो पाया है। सच है कि खेती में श्रमशक्ति का अनुपात घट कर 55 प्रतिशत के करीब आ गया है। बहुत गतिमय मानी जानेवाली सूचना प्रद्योगिकी और तेजी से बढ़ते वित्तीय क्षेत्रा ने हमारी 40 करोड़ से ज्यादा की श्रमशक्ति में महज 60 लाख लोगांे को रोजगार मुहैया कराया है। विनिर्माण क्षेत्रा की तो हालत यह है कि इसके कुल 4.50 करोड़ कर्मचारियों में से 3.34 करोड़ लोग असंगठित/अनौपचारिक काम में ही लगे हुए हैं। संगठित क्षेत्रा में रोजगार को कितना कम महत्त्व दिया जाता है इसका एक उदाहरण यह है कि संगठित क्षेत्रा की कंपनियों की कुल लागत का महज 8 प्रतिशत मजदूरी और वेतन के रूप में खर्च होता है। देश में ब्याज की दर नीची रख कर और टैक्स कानूनों में कंपनियों को पूंजी की घिसावट के लिए 25 प्रतिशत की दर से छूट देकर पूंजी-प्रधान तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। आयातित तकनीकें, मशीनरी और उपभोग वस्तुएं मुख्यतः धनी देशों से खरीदी जाती हैं। वहां एक ओर श्रम की जरूरत को कम करने पर जोर दिया जाता है, दूसरी ओर उच्च आय जमातों के लिए मंहगे साजा-सामान को ज्यादा तरजीह दी जाती है। अतः उत्पादन वृद्धि का नतीजा काफी कम अनुपात में रोजगार बढ़ोतरी के रूप में प्रकट होता है। एक वाक्य में कहें तो जहां उत्पादन और मुनाफे की वृद्धि को विकास का मुख्य उद्देश्य और संकेतक माना जाता है और रोजगार को इन प्रधान उद्देश्यों की प्राप्ति की जरूरी मजबूरी तथा प्रसंगवश प्राप्त नतीजा, वहां रोजगार की स्थिति का लगातार बदतर होते जाना एक अनिवार्य नतीजा ही होगा।
फिर भी उत्पादन वृद्धि को टिकाऊ और सतत बनाए रखने के लिए रोजगार की स्थिति को लगातार सुधारते रहना नवउदारवादियों की एक बड़ी मजबूरी है। बिना रोजगार के, यानी मजदूरी और वेतन लोगों के हाथ में दिए उत्पादक अपना माल बेचने के लिए पर्याप्त बाजार कहां से लाएंगे? इसीलिए कहा गया है कि बिना रोजगार बढ़ाए उत्पादन प्रक्रिया मांग की कमी से बाधित हो जाती है। अनेक लोग आर्थिक जीवन में हाशिए पर आ जाते हैं और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी और गहरा जाती है। यह विश्लेषण दिखाता है कि बेरोजगारी, गरीबी और असमानता का आपस में नजदीकी रिश्ता है। इन तीनों सामाजिक त्रासदियों से लोगों को बचाना आर्थिक-व्यावसायिक आवश्यकता के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक जरूरत भी है, खास कर एक लोकतांत्रिक देश में। कट्टर अनुदारवादी शासकों ने भी रोजगार और समाजिक सुरक्षा बढ़ाने के उपाय यूरोप के कई देशों में शुरू किए थे। इन्हीं कारणों से भारत में भी आर्थिक नीतियों की रोजगार के मामले में असफलता की आंशिक भरपाई के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं। पिछले तीन-चार साल से महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। औद्योगिक, वित्तीय और प्रादेशिक असंतुलन घटाने और दलित जमातों आदि को विशेष रूप से कष्टकर स्थिति से निजात दिलाने के लिए कई छोटे-मोटे प्रयास किए जा रहे हैं। पर इनके लिए न तो पर्याप्त धनराशि का अबंटन किया जाता है और न ही भ्रष्टाचार-मुक्त प्रभावी क्रियान्वयन नीति लागू की गई है। अतः कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि रोजगार सृजन के ये राजनीतिक-प्रशासनिक प्रयास वास्तव में रोजगार सृजन नहीं कर पाते, बल्कि बेरोजगारों को छोटी-मोटी तात्कालिक राहत भर दे पाते हैं। वह भी खर्च की गई राशि और इन रोजगारकारी योजनाओं के पक्ष में पीटे गए ढिंढोरे के मुकाबले बहुत कम।
आमतौर पर इन रोजगारकारी कार्यक्रमों के बेअसर होने का कारण प्रशासन व्यवस्था की खामियों μ नौकरशाही की निष्ठुरता, भ्रष्टाचार, अतिकेंद्रीकरण आदि को बताया जाता है। इस कटु सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि यह एक मूलतः सतही, प्रत्यक्ष दृष्टिमान कारण है। असल बात है कि नवउदारीकरण की मूल नीतियों और जन-सशक्तिकारक, लोकतांत्रिक मूल्यों से ओत-प्रोत रोजगार सृजन की टिकाऊ नीतियों में जन्मजात घोर अंतरविरोध है। नवउदारवाद आर्थिक मामलों में आपूर्ति-वृद्धि को सर्वोच्च अहमियत देता है। इसका ठोस अर्थ है बचत, निवेश, मुक्त या नियंत्राण-नियमन विहीन, निजी मुनाफे को बढ़ाते रहने वाली मौद्रिक, राजकोषीय, उत्पादन और विदेशी लेनदेन संबधी राजकीय नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचलन और अनुपालन। यदि निवेश, उत्पादन और मुनाफे बढ़ते हैं तो नवउदारवादियों को पक्का भरोसा है कि इन प्रक्रियाओं के असर सेे बाजार में मांग अवश्य बढ़ेगी। रोजगार बढ़ना मुख्यतः श्रम की मांग बढ़ने का ही दूसरा नाम है। अतः यदि श्रम बाजार में पूंजीपतियों और निवेशकों पर श्रम को लेकर बंदिशें लगाई जाती हैं तो रोजगार-सृजन में रुकावटें आएंगी। श्रमिकों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति की अनदेखी करके हमारे देश के मुख्यधारा के अर्थशास्त्राी पूंजीपतियों द्वारा संचालित संगठनों के विचारों के सुर-में-सुर मिलाते हुए कहते हैं कि श्रम-संबंधों का निपटारा कानूनों द्वारा नहीं करके बाजार की शक्तियों को करने देना चाहिए। इससे पूंजीधारक अधिकाधिक श्रमशक्ति का इस्तेमाल करने को प्रेरित होंगे। इन पर नियंत्राण उनकी पहलों पर लगाम लगाएंगे। वे निवेश करने से हिचकिचाएंगे। अतः वे मजदूरों की मांग बढ़ाने वाली नीतियों की जगह आपूर्ति-पक्षीय नीतियों के पक्षधर हैं। उनके अनुसार रोजगार के मामले में राज्य की भूमिका मजदूरों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर काम करने की सुविधाएं बढ़ाने, रोजगार के अवसरों और स्थिति के बारे में सूचना तंत्रा को सुधारने-जैसे आपूर्तिपक्षीय कदमों तक सीमित होनी चाहिए। यही नवउदारीकरण का मूल-मंत्रा है। वे श्रम की मांग को पूरी तरह बाजार की ताकतों और प्रक्रियाओं के हवाले छोड़ देते हैं। हां, यदि आपूर्ति पक्ष के रास्ते में कोई श्रम कानून संबंधी रुकावटें हैं, तो नवउदारवादी संगठित क्षेत्रा में रोजगार वृद्धि की मंद चाल का सारा दोष उनके सिर पर मढ़ने में नहीं हिचकिचाते। यहां यह ध्यान देने की बात है कि मौद्रिक और कर्जनीति, कराधान और राजकीय खर्चनीति, विदेशी व्यापार और विदेशी पूंजी संबंधी नीति, वित्तीय क्षेत्रा की अन्य नीतियों आदि के कारण यदि राजकीय खर्च बढ़ता है या राजकीय आमदनी (राजस्व) घटती है, या दोनों नतीजे निकलते हैं, तो इन नीतियों की भारी लागत को आर्थिक क्रियाओं, खासकर आमदनी वृद्धि के लिए उचित माना जाता है। यहां तक कि इन नीतियों का भारी बोझ बेरोजगारों को छोटी-मोटी राहत या रोजगारनुमा कोई झुनझुना पकड़ाने के रास्ते में भी धन की कमी पैदा करता है तो वे इसे किसी परेशानी का सबब नहीं मानते हैं।
भारत में पिछले बीस सालों में रोजगार के मामले में इसी नवउदारवादी सोच की दुंदुभि बजती रही है। राजकीय खर्च और राजस्व की नीतियां पूंजीधारकों-निवेशकों, यहां तक कि कर-चोरों, विदेशों में काला धन जमा कराने वाले सटोरियों और वायदा बाजारों के जुआरियों के हितों, यानी उनकी निद्र्वंद्व मोटी आमदनी का पूरा ध्यान रखती रही हैं। दो-तीन साल पहले राजकोषीय नीतियों में पूंजीपतियों, बड़ी कंपनियों और मोटे आयकरदाताओं को दो लाख करोड़ रुपयों की कर छूट या प्रोत्साहन दिया जाता था, वह अब बढ़कर पांच लाख करोड़ रुपयों का अंक पार कर चुका है, अर्थात् पूरे बजट का लगभग आधा हिस्सा। इस राशि के मुकाबले महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना-जैसे बहु-प्रतीक्षित कार्यक्रम और उसपर अपनी उम्मीद टिकाए 70 करोड़ ग्रामीणों के लिए 2010-11 के बजट में मात्रा 40 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान खुल्लमखुल्ला अन्याय और अलोकतांत्रिक मूल्यों की कहानी कहते हैं। ये तथ्य दिखाते हैं कि नवउदारीकरण राज्य की भूमिका घटाता नहीं है, बल्कि उसे बदलता है। ग्रोथ यानी आर्थिक वृद्धि के अतिभोलेपन भरे लगने वाले उद्देश्य के लिए राज्य सक्रिय, खर्चीली और एकांगी कामकाज पद्धतियां और नीतियां अपनाता है। हर राज्य अपने मुख्य स्तंभों, नेताओं और कर्ताधर्ता लोगों और जमातों की हित-साधना तो करता है किंतु उस पर सामाजिक वैधता और आम स्वीकृति की मोहर लगाने के लिए गरीबों, बेरोजगारों, हाशिए के लोगों के लिए कुछ बहु-प्रचारित किंतु कृपण हाथों से खर्च भी करता है। नवउदारवादी राज्य की ”आम आदमी“ हितैषी नीतियां भी ऐसे ही प्रयासों का प्रमाण हैं।
अतः इन दो दशकों में नवउदारवादी नीतिगत माॅडल ने रोजगार के आंशिक स्वरूप और बढ़ती जरूरत के सामने कुछ दिखावटी, अल्पकालिक, राहतकारी उपाय अपनाए हैं। ये प्रयास आजीविका की अपर्याप्तता और अनिश्चितता की समस्या के गुणात्मक और मात्रात्मक मूल पक्षों को अनुछुआ छोड़ देते हैं। इसी प्रक्रिया को एक कम कष्टकारी या थोड़ा खुशनुमा रंग देने के लिए मुख्यधारा से बाहर के ये लोग अपने तन-मन के जोड़े को संभाले रखने के लिए निजी और पारिवारिक प्रयास करते हैं। तरह-तरह के पापड़ बेल कर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। नीतिकार उन्हें असंगठित-अनौपचारिक ”रोजगार“ के रूप में चिद्दित करके शायद अपने मानस के किसी कोने में छिपे बैठे अपराध बोध को घटाने की कोशिश कर रहे हैं। कल्पना करें कि यदि भारत की इस विशाल और अस्फुटित-प्रच्छन्न क्षमता और प्रतिभावान श्रमशक्ति के पास वास्तव में काम मिले तो भारत समावेशी समृद्धि और मानव विकास की किस स्तर प्राप्त कर सकता है!
सन् 1950 से 1980 तक का अघोषित उदारवाद और पूंजी की चैधराहट वाली, एक सीमा तक अंतर्मुखी नीतियों और सन् 1990 के बाद की डंके की चोट पर अपनाई गई नवउदारीकरण और देशी-परदेशी विभेद के बिना नियंत्राण-नियमन मुक्त नीतियों, दोनों में रोजगार पक्ष यानी आम आदमी और श्रम की दोयम और गौण भूमिका ध्यान देने योग्य है। इससे उत्पन्न सवालों पर गंभीर, जनपक्षीय विवेचना की जरूरत है।
विकास अर्थशास्त्रा की मुख्यधारा का अब तक का विवेचन नवउदारवादीकरण और सबके लिए पर्याप्त और सुरक्षित रोटी-रोजी की व्यवस्था के बीच मौजूद अंतरविरोध को दर्शाता है। इस कारण से आज के भारत में सत्तासीन नवउदारवादी शासन सबके लिए रोजगार के, यानी आर्थिक प्रक्रियाओं में हर नागरिक की प्रभावी और पुख्ता भागीदारी के उद्देश्य और नीतियों से कन्नी काटते हैं। इसलिए सबके लिए प्रभावी रोजगार का रास्ता नहीं पकड़ कर वे सारा जोर गरीबी घटाने के कार्यक्रमों पर लगा देते हैं। इस तरह की नीतियां नरेगा-जैसी असाधारण नीतियों तक को प्रभावी रोजगार का साधन नहीं बनने देती हैं। साथ ही, वे प्रच्छन्न रूप से एकाधिकारी रूप से पूंजी संचयन को बढ़ावा देने और सामाजिक संसाधनों की बर्बादी या उनके अनुपयुक्त इस्तेमाल बढ़ाने वाले अन्य कई कार्यक्रमों को अपनाते हैं। जैसे कि आजकल शिक्षा पर पहले से ज्यादा जोर दिया जा रहा है, किंतु साथ में रोजगार को उपयुक्त और संगत प्राथमिकता नहीं देने के कारण न केवल शिक्षा के मामले में आगे बढ़ाना दुष्कर रहेगा बल्कि शिक्षित बेरोजगारों की फौज में और ज्यादा इजाफा होगा। सामाजिक समावेशन के लिए असली जनोन्मुख विकास जरूरी है। प्रभावी सतत रोजगार इस प्रक्रिया की पहली सीढ़ी है। अन्यथा गरीबी हटाने को रोजगार का चोगा पहनाकर सच्चे विकास से लगातार दूर छिटकाने की प्रक्रिया का कोई ओर-छोर तक नजर नहीं आएगा।

कमल नयन काबरा
(समाप्त)

Read Full Post »


ग्यारहवीं योजना में रोजगार

नवउदारीकरण के बीस सालों में भारत के आर्थिक बढ़त की दर में निश्चित रूप से इजाफा हुआ है। इसके पहले चालीस सालों में भी राष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई थी। कष्ट तब भी था और अब भी है कि देश में उल्लेखनीय बढ़त के बावजूद आजीविका के अवसर नहीं बढ़े हैं। बेरोजगारों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। आजीविका के अवसर उत्पादन पद्धति और प्राद्योगिकी से सीधे-सीधे संबंधित होते हैं। यह संबंध मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तरह का है। इसलिए किसी भी देश की विकास नीति का एक अहम पहलू बेरोजगारों को आजीविका के अवसर प्रदान करना होता है। नीतियों को इस तरह तय करना पड़ेगा ताकि लोगों को ऐसे अवसर पर्याप्त रूप से उपलब्ध हों और इस तरह प्राप्त आय से उत्पन्न मांग के अनुरूप उत्पादन भी बढ़े। उत्पादन की पर्याप्तता का अर्थ केवल कुल उत्पादन की मात्रा या प्रति व्यक्ति उत्पादन से जोड़ना अपूर्ण और भ्रामक होगा, उसे अर्थवान बनाने के लिए यह देखना जरूरी है कि उत्पादन लोगों की जरूरतों और क्रयशक्ति के अनुरूप है या नहीं। यदि उत्पादन की प्रक्रिया में सब लोगों की कार्यक्षमता का उपयोग नहीं हो पाता है अर्थात् लोगों को उत्पाद करने की प्रक्रिया में भागीदारी नहीं मिलती है, तो जाहिर है कि उन्हें उत्पादन या आमदनी में कोई हिस्सा नहीं मिल पाएगा। वैसे भी किसी बाजार और विनिमय अर्थव्यवस्था में काम के बदले आमदनी और संपत्ति मिलती है। हमारे देश में अधिकांश लोग संपत्ति-विहीन हैं। उनके पास खेती और वासगीत जमीन का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं है। ऐसे लोगों की आमदनी का एकमात्रा जरिया काम करके बदले में आमदनी प्राप्त करना होता है। हमारे यहां तो यह कानूनी और औपचारिक व्यवस्था भी नहीं है कि जब किसी के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं हो, तो उसे राज्य अथवा किसी सामाजिक संस्था द्वारा सामाजिक सुरक्षा के बतौर कोई सहायता मिले। सर्वविदित बातों का एक बार फिर से उल्लेख करने मंे हमारा मकसद यह दिखाना है कि भारतवासियों के लिए सबसे गंभीर सवाल है आमदनी या रोजगार के पर्याप्त और टिकाऊ साधन का अभाव। जब लोगों को रोजगार मिलेगा, तो स्पष्ट है कि उत्पादन बढ़ेगा। रोजगार का अर्थ ही है उत्पादन करना। बाजार अर्थव्यवस्था में उत्पादन का एक मकसद उत्पादित माल को बेचकर आमदनी करना है, तो साथ में यह भी कि इस उत्पादित माल से उत्पादनकर्ताओं की जरूरतें पूरी हों, ताकि वे जिंदा रह सकें और अपने परिवार का लालन-पालन कर सकें। इसीलिए डच अर्थशास्त्राी यान टिनबरजेन ने लिखा था कि तीसरी दुनिया के देशों में रोजगार चाहे किसी भी किस्म का हो, वह रोजगारविहीनता से बेहतर है, चाहे वह उत्पादन अथवा आमदनी कितनी भी साधारण या कम क्यों न हो। टिनबरजेन ने रेखांकित किया कि रोजगार के अवसर प्रदान करना गरीबी मिटाने का सबसे कारगर तरीका है। इस बात से यह अर्थ भी निकलता है कि जब रोजगार बढ़ेगा तो उत्पादों को बेच कर मुनाफा कमाने के इच्छुक उद्यमी भी यह कोशिश करेंगे कि उत्पादन लोगों की जरूरतों और मांग के अनुरूप हो μ मात्रा में भी और गुण में भी। इसी तरह के विचार को रेखांकित करते हुए पी.सी. महालनोबीस ने 1955 में लिखा था कि इंसान को बेरोजगार रखने से तो अच्छा है कि मशीनें बिना इस्तेमाल के पड़ी रहें। विकासशील देशों के मामले में गरीबी घटाने और रोजगार बढ़ाने के पारस्परिक संबंध की महत्ता को बताते हुए डडले सीयर्स ने 1979 लिखा था कि सामाजिक विषमता के मसले को सुलझाने के लिए बेरोजगारी के सवाल से निपटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सीयर्स का कहना था कि बेरोजगारी घटाने का अर्थ है गरीबी और असमानता के मुख्य कारण को हटाना।
उपरोक्त विवेचन को सामाजिक-आर्थिक अध्ययनों का निर्विवाद निष्कर्ष माना जा सकता है। किंतु फिर भी व्यवहार में देखा गया है कि पश्चिम के अर्थशास्त्रिायों द्वारा प्रचारित अर्थिक विकास की मुख्यधारा में लगातार रोजगार बढ़ाकर पूर्ण रोजगार की स्थिति की ओर बढ़ने के मुकाबले बचत, निवेश तथा तकनीकी सुधारों के द्वारा उत्पादन कोे लगातार तेजी से बढ़ाने को ज्यादा महत्त्व या प्राथमिकता दी गई है। यहां तक कि उत्पादन बढ़त की उच्चतम प्राथमिकता के फलस्वरूप संभावित रोजगार बढ़त को उसके एक सुफल के रूप में देखा गया है। इस मत में यह विचार नहीं किया गया है कि श्रमिकों की कुल उपलब्ध संख्या के मुकाबले इस प्रकार बढ़ते रोजगार के अवसरों का अनुपात कितना है यानी कितने अरसे तक और कितनी तेजी से बढ़ने पर उत्पादन-वृद्धि की यह प्रक्रिया सबको अजीविका प्राप्ति के पर्याप्त और नियमित अवसर दे पाएगी। वैसे कई देशों का अनुभव यह बताता है कि राष्ट्रीय आय की बढ़त की प्रक्रिया में ऐसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है कि रोजगार के अवसर घट जाते हैं और देश की श्रमशक्ति का एक हिस्सा बेरोजगार बना रह जाता है। दुनियाभर में सदियों और दशकों से लगातार समृद्ध होते देशों में भी सबको सतत, पुख्ता और न्यूनतम आमदनी देने में सक्षम रोजगार के अवसर नहीं मिल पाए हैं। कुल मिलाकर ऐसी ही प्रक्रियाओं का नतीजा है कि पश्चिम में ऊंची प्रति व्यक्ति आय प्राप्त करने में सफल अनेक देशों में श्रमशक्ति के 6 से 8 प्रतिशत तक की संख्या में लोगों के रोजगारविहीन रहने की स्थिति को स्वाभाविक मान लिया गया है। तर्क यह दिया जाता है कि यदि निजी उद्यम अथवा निजी उद्यमियों की आर्थिक स्वतंत्राता बनाए रखनी है तो इतनी और इस तरह की बेरोजगारी इस आजादी की अनिवार्य कीमत है। यहां यह बात गौर करने लायक है कि इन ज्यादातर धनी देशों में कम-से-कम यह व्यवस्था कर दी गई है कि बेरोजगार लोगों को सामाजिक सहायता और सुरक्षा के बतौर बेरोजगारी भत्ता मिलता रहेगा।
स्पष्ट है कि रोजगार को उत्पादन के मुकाबले कम तरजीह देना भारत-जैसे गरीबी, बेरोजगारी और विषमता की विशाल, विकराल और बढ़ती हुई समस्याओं से ग्रस्त देश में कभी भी, किसी भी सामाजिक, आर्थिक और नैतिक विवेचन के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। मुख्य रूप से उत्पादनोन्मुख अर्थिक नीति की वकालत करने वाले या तो सामाजिक सुरक्षा के बारे में सोचते ही नहीं है अथवा यह मानते हैं कि ऐसा कोई भी उपाय वर्तमान राष्ट्रीय क्षमता के बूते की बात नहीं है। इस प्रक्रिया में आम आदमी की जरूरत के साजो-सामान और सेवाओं के उत्पादन को गौण माना जाता है, क्योंकि जिन्हें इस तरह की चीजों की आवश्यकता होती है उनके पास उन चीजों को खरीदने लायक आमदनी नहीं होती है। दूसरी ओर बचत, निवेश और तकनीकी सुधार के द्वारा लगातार उत्पादन बढ़ाने अथवा एक सीमा तक विभिन्न प्रकार की अर्थिक-वित्तीय रणनीतियों द्वारा अपना मुनाफा बढ़ाने में सफल लोगों के हाथ में इतनी क्रयशक्ति होती है कि उनकी तुच्छ-से-तुच्छ या गौण-से-गौण इच्छा की पूर्ति करने के लिए न केवल बेशुमार उत्पादन किया जाता है बल्कि इस अत्यंत छोटे-से तबके को रिझाने-लुभाने के लिए विज्ञापन आदि पर बेतहाशा खर्च किया जाता है। संक्षेप में, इन अर्थव्यवस्थाओं का चरित्रा जनोन्मुख नहीं होकर उत्पादन और मुनाफे पर केंद्रित हो जाता है। हम यहां इन प्रमुख आर्थिक प्रवृत्तियों के चलते पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति के साथ हो रहे खतरनाक खिलवाड़-जैसे अनिवार्य नतीजों पर विचार नहीं कर रहे हैं, किंतु उनका शाश्वत महत्त्व निर्विवाद है।
उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि आजादी के बाद से रोजगार की लगातार उपेक्षा हुई है और इसके बहुत गंभीर दुष्परिणाम आजाद भारत की कई पीढ़ियों के करोड़ों लोगों ने भुगते हैं। साथ ही, इस प्रकार की आर्थिक वृद्धि ने पूरे समाज और अर्थव्यवस्था को एक घोर अमानवीय और अलोकतांत्रिक रूप दे दिया है। यदि ऐसी अन्यायपूर्ण स्थिति के खिलाफ गहन सामाजिक असंतोष का कई रूपों में विस्फोट हो, तो एक लोकतांत्रिक समाज में यह सहज, स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही होगी। फिर भी इन प्रतिक्रियाओं के अनेक रूप हैं जो न केवल बेअसर रहते हैं, बल्कि उन मूल्यों, नीतियों और व्यवस्थाओं की जड़ें भी कमजोर करेंगे, जिनसे सकारात्मक फलों की आशा की जा सकती है।
स्पष्ट है कि भारत में सन् 1990 से शुरू की गई नवउदारीकरण की नीतियों का मुख्य मकसद उत्पादनोन्मुख अर्थव्यवस्था और उद्योगों व सेवाओं पर केंद्रित उसके स्वरूप के रास्ते में आई उन रुकावटों को हटाना था, जो इन्हीं नीतियों के अनिवार्य नतीजे के रूप में स्वयं उसके रास्ते की बाधा बन कर उभरीं। ये बाधाएं उन तबकों के प्रशासकों के लिए सरदर्द थीं, जिन्होंने न केवल इन नीतियों लागू किया, बल्कि उनसे भरपूर लाभ भी उठाया। राज्य की सक्रिय भूमिका केंद्रित नीतियों का तख्तापलट करनेवालों ने पहले से विद्यमान और सन् 1950 से 1990 तक जटिल होती आम आदमी की समस्याओं को अभी भी दरकिनार ही रखा। फलतः बेरोजगारी का मुद्दा भी उपेक्षित रहा। पुरानी नीतियां भी संगठित देशी और विदेशी पूंजी के नेतृत्व में, मुख्यतः उनके ही लाभ के लिए चलाई गई थीं, पर वे कई रुकावटों और अंतरविरोधों में उलझ गई थीं। इन पुरानी नीतियों को ही झाड़-पोंछ कर उन्हें फिर से ज्यादा सक्रिय और प्रभावी बनाने के लिए नवउदारीकरण का दामन थामा गया। इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य अभी भी रोजगार को दोयम दर्जे पर रखना था। इसी प्रकार उत्पादन का स्वरूप भी, या तो अधिकाधिक निर्यातोन्मुख बनाया गया अथवा हिंदुस्तान के संपन्न और मध्यवर्ग की उपभोक्तावादी और पश्चिम की घटिया प्रतिलिपि बनने को तत्पर मानसिकता और आवश्यकता के अनुरूप तय करने की आजादी बाजार की निरकंुश प्रक्रियाओं को दे दी गई। यदि रोजगार वृद्धि और आमदनी में बढ़त के जरिए विषमताओं को दूर करने को नीतियों का मुख्य मुद्दा बनाया जाता तो आम जनता की जरूरत की चीजों और सेवाओं के उत्पादन को प्राथमिकता दी जाती। रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने वाली नीतियां अपनाने पर विदेशी आर्थिक संबंध देसी तथा बाहरी पूंजी की अधिकाधिक मुनाफा कमाने और उनकी अपने निजी साम्राज्यों का विस्तार करने की लालसा और लालच द्वारा निर्धारित नहीं किए जाते। उस बदले सोच के तहत जनोन्मुख और स्वावलंबी समग्र विकास के उद्देश्यों के तहत नीतिगत निर्णय लिए जाते। बाजार की देसी-परदेसी ताकतों को खुली छूट देने और निजीकरण का दायरा बढ़ाकर राज्य को इस पूंजी की चेरी बनाने वाली नीतियों से रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि, खास कर संगठित क्षेत्रा के संगठित रोजगार में वृद्धि की आशा करना वैसे ही होगा जैसे कि बबूल का पेड़ बो कर अंगूर की फसल काटने की आस की जाए।
हां, यह जरूर मानना पड़ेगा कि आजीविका का निश्चित जरिया न होने के बावजूद अपनी अदम्य जीजिविषा और पारंपरिक उद्यमिता के कारण भारत के करोड़ों लोगों ने देश के लाखों किसानों की तरह आत्महत्या का रास्ता नहीं अपनाया। उन्होंने कुछ-न-कुछ जुगाड़ करके जिंदा रहने का कोई-न-कोई रास्ता खोज निकाला, चाहे वह सम्मानजनक हो या असम्मानजनक, कष्टपूर्ण हो या आरामदेह, सरल हो या कठिन, पास हो या दूर। इस तरह आम लोगों द्वारा जुगाड़ करके आजीविका जुटाने के जो तरीके अपनाए गए उन्हें हम तकनीकी भाषा में असंगठित अथवा अनौपचारिक क्षेत्रा के रूप में जानते हैं। इस क्षेत्रा की विषमतामय स्थितियों और सरकारी नीतियों द्वारा उत्पन्न कठिनाइयों, चुनौतियों और असमावेशन के बीच भारत की 92 प्रतिशत से ज्यादा श्रमशक्ति अपने और अपने परिवार को जिंदा रखने के अथक प्रयास करती है। इन असंगठित-अनौपचारिक कामकाज के द्वारा वह अर्थव्यवस्था की बढ़त दर को और देश को एक भयावह आर्थिक और सामाजिक संकट और त्रासदी से बचाए रखती है।
हमने अब तक रोजगार के अहम मसले का एक सरल आर्थिक-समाजिक विवेचन संक्षेप में प्रस्तुत किया है। उसमें प्रादेशिक, शहरी, ग्रामीण और महिला श्रम, बाल श्रम, सुदूर तथा कटे-छंटे आदिवासी लोगों, शिक्षित-अशिक्षित, परंपरागत व आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी और मनोरंजन व विलासिता के अधिकांशतः भोंडे और अपसंस्कृतिमूलक कामकाज में लगे या फंसाए गए लोगों, युवकों तथा प्रौढ़ों आदि की विभिन्न श्रेणियों पर अलग से विचार किया जाना भी संभव है। ये सभी सवाल आय, संपत्ति, क्षमता, शक्ति आदि के समाज में विद्यमान वितरण आदि से कई स्तरों पर और रूपों में जुड़े हुए हैं। यहां हमने इस विविधता और विषमता पर अलग से गौर नहीं किया है। इसी तरह सरकारी और गैर-सरकारी, लघु और बड़े उद्योगों, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों, और सेवाओं और वस्तु उत्पादन आदि विभेद पर भी ध्यान नहीं दिया है। किंतु उत्पादन के स्वरूप की जन-विमुख प्रवृत्तियों की तरफ हमने इशारा जरूर किया है। उनका एक फलितार्थ अर्थव्यवस्था के भीतर पनपते असंतुलनों, अंतरविरोधों और अर्थहीन विकृतियों के रूप में परिलक्षित होता है। अन्य अध्यायों में हमने पिछले 20 साल में हुए परिवर्तनों का उल्लेख किया है। इन परिवर्तनों के दुष्परिणाम विद्यमान बेरोजगारी में वृद्धि, श्रमशक्ति में हर साल शामिल होने वाले नौ करोड़ से ज्यादा युवक-युवतियों की लंबे समय तक बनी रहने वाली रोजगार-हीनता, हताशा और संसाधनों के व्यर्थ जाने के रूप में देखे जा सकते हैं। मुख्य बात यह है कि इस स्थिति के लिए केवल रोजगार के पक्ष की उपेक्षा ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि नवउदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण की नीतियों के अंतर्गत उठाए गए कदमों और उनके नतीजों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। इन बातों का खुलासा करने के लिए हम जन-विरोधी, रोजगार-नाशक और सामाजिक बहिष्करणकारी नीतियों के शिकार लोगों की संख्या और उनके असमावेशीकरण के विभिन्न रूपों का संक्षिप्त लेखा-जोखा प्रस्तुत करना जरूरी समझते हैं।
पिछले 20 सालों में रोजगार की हालत इतनी ज्यादा खराब हुई है कि नवउदारीकरण के सबसे बड़े समर्थक और प्रवर्तक विश्व बैंक तक बिगड़ती रोजगार स्थिति की बात को नकार नहीं पाया है। अभी हाल ही में प्रकाशित उसके एक अध्ययन में यह बताया गया है कि 1983 से 1993 के दस वर्षों में रोजगार 2.1 प्रतिशत की दर से बढ़ा था। इसके बाद के दस वर्षों में यह बढ़त दर घट कर 1.9 प्रतिशत रह गई। इन 20 वर्षों में राष्ट्रीय आय की बढ़त दर औसतन 6 प्रतिशत रही। पिछले तीन सालों में तो यह औसत 8 प्रतिशत हो गया। इस तरह यह साफ नजर आता है कि रोजगार वृद्धि राष्ट्रीय आय वृद्धि की एक-तिहाई और एक-चैथाई के करीब रही। रोजगार की यह मामूली बढ़त हमारी हर साल बढ़ती रोजगार की जरूरतों के बरक्स बहुत नाकाफी रही। इन ”तथ्यों“ के बावजूद विश्व बैंक और नवउदारवादी अपनी जिद से हट नहीं रहे हैं और वे अभी भी राष्ट्रीय आय बढ़त को तेज करके ही बेरोजगारी को मिटाने का हसीन किंतु अप्राप्य सपना देखते हैं। वैसे देखा जाए तो बेरोजगारी की अवधारणा और भारत में बेरोजगारों की तादाद दोनों की नवउदारीकरण के नजरिए से न केवल गलत व्याख्या की जाती है, बल्कि बेरोजगारों की असली संख्या को भी घटाकर बताया जाता है। हम यहां इस सवाल की गहराई में नहीं जाकर केवल एक उदाहरण देंगे। विश्व बैंक के मुताबिक भारत में बेरोजगारों और अर्ध-बेरोजगारों की संख्या को हमारी कुल 41.3 करोड़ की श्रमशक्ति का आठ प्रतिशत बताया जाता है और 10.5 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोजगार-युक्त, किंतु गरीब माना गया है। इसके अनुसार यदि किसी कार्यरत व्यक्ति की आमदनी गरीबी की रेखा से कम है तो उसे कार्यरत गरीब माना जाएगा। इस विचार से जो लोग जिंदा रहने के लिए पर्याप्त ऊर्जा देने वाला खाना खा पाते हैं, वे गरीब नहीं हैं। प्राचीन काल से लेकर अब तक अर्थशास्त्रा के वस्तुपरक सिद्धांतों के अनुसार रोजगार का अर्थ और मकसद होता है एक व्यक्ति द्वारा इतनी आजीविका नियमित और सुनिश्चित रूप से प्राप्त करना कि वह स्वयं अपनी कार्य क्षमता को बरकरार रखते हुए अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। मजदूरी की इस न्यूनतम दर को लोहे की लकीर के समान अपरिवर्तनीय माना गया था। यही नहीं, एडम स्मिथ तक ने मजदूरी की इस दर के निर्धारण में तात्कालिक सांस्कृतिक और सामाजिक जरूरतों को भी शामिल किया था। किंतु अब नवउदारवादी नीतियों के जन-विरोधी और पूंजी और बड़ी कंपनियों के हिमायती चरित्रा को सामाजिक जरूरतों और उद्देश्यों के साथ संगत साबित करने के लिए गरीबी और रोजगार की अवधारणा और उसे नापने के ऐसे तौर-तरीके अपनाए गए हैं कि राष्ट्रीय आय की बढ़त के साथ गरीबी और बेरोजगारी घटती नजर आए। इसलिए गरीबी की रेखा ऐसे स्तर पर तय की गई मानो एक लोकतांत्रिक अधिकारसंपन्न नागरिक और मात्रा पर्याप्त चारे पर जिंदा रहनेवाले जानवर में कोई अंतर न हो। यही नहीं, राष्ट्रीय आय में दर्जनों गुना वृद्धि के बावजूद भारत के नवउदारवादियों ने गरीब आदमी के उपभोग स्तर को सन् 1973-74 से अब तक अपरिवर्तित बनाए रखा है और उसमें उचित वृद्धि से अब भी कतराते हैं।

कमल नयन काबरा
(क्रमश:)

Read Full Post »


प्रदेश में प्रमुख क्षेत्र समिति का चुनाव चल रहा है सत्तारूढ़ दल के साथ राज्य सरकार की मशीनरी मतदाताओं का अपहरण करने में लगी हुई है। कहने को सत्तारूढ़ दल कहता है कि इन चुनावों में वह हिस्सा नहीं ले रहा है और जब परिणाम आ जायेंगे तब ये लोग बहुत गर्व से घोषणा करेंगे की प्रदेश में इतने ब्लाकों पर उनकी पार्टी के लोग निर्वाचित हुए हैं और सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जनता की आवाज है।
बाराबंकी जनपद के रामनगर ब्लाक में क्षेत्रिय विधायक श्री अमरेश शुक्ला सत्तारूढ़ दल के विधायक हैं। तहसील स्तर की सरकारी मशीनरी विधायक साले संजय तिवारी के पक्ष में हर तरह के हथकंडे अपना रही है जिससे ऊब कर सदस्य क्षेत्र पंचायत श्याम लाल यादव के पिता लाल बहादुर ने जिला मजिस्टरेट श्री विकास गोठलवाल को प्रार्थना पत्र देकर मांग की कि उनके लड़के का अपहरण कर लिया गया है। जिला मजिस्टरेट के आदेश पर थाना मसौली जिला बाराबंकी की पुलिस ने अपह्रत मतदाता को बरामद कर लिया जिस पर विधायक अमरेश शुक्ला थाने पहुँच कर श्याम लाल को डरा धमका कर पुन: अपहरण करने की जुगत में लग गए, लेकिन जनता के विरोध के बाद विधायक अपने साथ मतदाता को नहीं ले जा पाए।
क्षेत्र पंचायत प्रमुख के चुनाव में सत्तारूढ़ दल खुले आम गुंडई पर उतर आया है। उनके विधायक गण सरकारी मशीनरी के माध्यम से मतदाताओं का अपहरण करवा रहे हैं। यही हमारा लोकतंत्र है, यही संविधान, यही न्याय है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

Read Full Post »

« Newer Posts - Older Posts »