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विद्या कानूगा या मुंशी का जन्म एक गुजराती परिवार में 5 दिसंबर 1919 को बंबई में हुआ था। उनके पिता वकील थे और माता सामाजिक कार्यकर्ता। स्कूल परीक्षा में लड़कियों में उनका स्थान प्रथम आया था। इसके बाद उन्होंने बंबई के एलफिन्स्टन कॉलेज में आई.एस.सी.में दाखिला लिया। 1938 में उन्होंने मेडिसिन पढ़ने इंगलैंड जाने का फैसला किया। उनके इस फैसले का परिवार के अंदर और बाहर काफी विरोध हुआ। लेकिन उनकी नानी ने उनके समर्थन में दृढ़ स्थिति अपनाई और कहाः ‘‘उसे क्यों नहीं जाना चाहिए? उसके पिता के पास पैसा है और लड़की के पास बहादुरी है।’’ उन दिनों ऐसे कामों में काफी साहस की जरूरत हुआ करती थी इंगलैंड मेंः कम्युनिज्म की ओर विद्या को उसके चाचा ने राजनीति से परिचित कराया। उसके पिता ने उसे पुस्तकों से परिचित कराया। विद्या 1938 में इंगलैंड पहुंची। जब तक वह प्र्री-मेडिकल परीक्षाओं के लिए तैयार होती, द्वितीय विश्वयु( छिड़ चुका था। इसलिए भारत लौटने के बजाय उसने न्यूकासल, डरहम में किंग्स कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहीं उसका परिचय कम्युनिस्ट विचारधारा से हुआ। तीन वर्षोंं बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और वहीं पूरा वक्ती कार्यकर्ता बन गई। वह ‘फेडिंड’ ;फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स इन ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड की सचिव बन गई। वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य भी बन गई। वह भारतीय कमयुनिस्टों और राष्ट्रवादियों के संपर्क में आई। वह वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेने लगी।खासकर फासिज्म-विरोधी कार्यक्रमों में वह सक्रिय रहती। पोस्टरों के जरिए संघर्ष 1943 में विद्या कानूगा ‘पोस्टरों’ की दुनिया से वाकिफ हुई। उनके और उसके मित्रों ने शेफील्ड ;इंगलैंड में प्रथम पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की। इसमें बंगाल के महा-अकाल में पीड़ित जनता का दुख-दर्द प्रदशि्र्ात किया गया था। इससे प्राप्त पैसे अकाल-पीड़ित लोगों के लिए भारत भेजे गए। विद्या कहती हैः ‘‘तब से मैंने विभिन्न विषयों पर कई पोस्टर बनाए हैंः महिला और युवा प्रश्नों पर, मजदूरों की छंटनी पर, सांप्रदायिक शांति के बारे में। पोस्टर की दृश्य शक्ति को कम के नहीं आंका जा सकता।’’अधिकतर पोस्टर इतिहास के गर्त में लुप्त हो चुके हैं।1 मार्च 2014 को कलकत्ता में एक पोस्टर प्रदर्शनी लगी जिसमें विद्या मुंशी प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित की गईं। यह उचित ही था और वे एक ‘व्हील चेयर’ पर बैठकर आईं। उन्हें चारों ओर से युवा महिलाओं ने घेर लिया जो उनसे बातें करना चाहती थीं और उन्हें सुनना चाहती थीं। इस प्रकार की प्रदर्शनी शायद विश्व भर में पहली बार लगी। ‘स्वयं‘, ‘जुबान’, ‘सी-गल’फाउंडेशन जैसे संगठनों ने इसे आयोजित किया था। इसमें 157 असाधारण पोस्टर प्रदर्शित किए गए थे। उनकी व्यापक दृष्टि ने सभी को आकर्षित कर लिया। विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना, 1945 वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ डेमोक्रेटिक यूथ ;डब्ल्यू.एफ.डी.वाई.या विश्व युवा फेडरेशन की स्थापना लंदन में अक्टूबर-नवंबर 1945 में उद्घाटन सम्मेलन में की गई। विद्या ने उसमें ए.आईएस.एफऔर ‘फेडिन्ड’ के प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया। सम्मेलन में 67 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।भारत से विद्या कानूगा के अलावा केवायूं बूमला और ए.एच.सादर भी शामिल हुए। एम.राशीद पर्यवेक्षक थे। वे सभी‘फेडिन्ड’ की ओर से शामिल हुए।विद्या कानूगा विश्व युवा सम्मेलन के कमिशन नं.3 की सचिव भी चुनी गई। इस कमिशन के अध्यक्ष चेकोस्लोवाकिया के डॉ. हाएक थे। कमिशन का विषय थाः ‘‘स्थाई और टिकाऊ शांति कीस्थापना में युवाओं की भूमिका’’। डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. की परिषद की प्रथम बैठक पैरिस में 19 जुलाई से5 अगस्त 1946 को आयोजित की गई। विद्या कानूगो इसमें भी शामिल हुईं। उन्हें वहां गठित ‘औपचारिक ब्यूरो’का सचिव बनाया गया । यह तय पाया गया कि खाद्यों के बंटवारे में भारत को प्राथमिकता दी जाय।विद्या कानूगा ने विश्व महिला जनवादी फेडरेशन ;वीमेन्स इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन-डब्ल्यू.आई.डी.एफ. के संस्थापना सम्मेलन में पैरिस,1945 में भी भाग लिया। उनके साथ भारत से महिला आत्मरक्षा समिति की ओर से इला रीड ने भी भाग लिया।यह सम्मेलन 26 नवंबर से 1 दिसंबर 1945 को वेलोड्रोम ‘डी’ हाइवर;विन्टर स्टेडियम में संपन्न हुआ। यहविशाल उद्घाटन समारोह था।विद्या कानूगा 1948 में भारतलौट आईं। वे उस वक्त डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।उन्होंने फरवरी 1948 में कलकत्ता में आयोजित दक्षिण-पूर्वी एशियाई युवा सम्मेलन की तैयारी समिति में हिस्सालिया।महिला आंदोलन औरपत्रकारिता के क्षेत्रों मेंविद्या मुंशी ने एन.एफ.आई.डब्ल्यू.;भारतीय महिला फेडरेशन के स्थापना सम्मेलन, कलकत्ता, 1954 में सक्रिय हिस्सा लिया। वे इसके प्रेस संपर्क समिति में थीं। इस प्रकार वे भारतीय महिला फेडरेशन की संस्थापकों में थीं। वे काफी समय तक इसकी कार्यकारिणी की सदस्य भी चुनी गई, जैसे 1973 और 1999 में।इंगलैंड से लौटने के बाद उनका विवाह सुप्रसि( पत्रकार और भूगर्भशास्त्री सुनील मुंशी से हुआ।सुनील पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे और बंबई से प्रकाशित ए.आई.एस.एफ की पत्रिका ‘द स्टूडेंट’ के संपादक भी रहे। विद्या भी उसमें लिखती रहीं।विद्या की बंगला भाषा की जानकारी बहुत अच्छी नहीं थी। फिर भी उन्हें ‘चलार पथे’’ नामक बंगला पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने कड़ी मेहनत करके जल्द ही भाषा सीख ली।इस बीच वे सुप्रसि( अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ की कलकत्ता संवाददाता बन गईं। यह काम उन्होंने 1952 से 1962 तक किया। विद्या मुंशी को सामान्यतः भारत की प्रथम महिला पत्रकार के तौर पर जाना जाताहै।ब्लिट्ज में काम के दौरान उन्होंने कई असाधारण ‘स्टोरीज’ खोज निकालीं। एक थी दो कनाडियन पायलटों के बारे में जो हांगकांग से सोने की तस्करी करके सुंदर बन के जंगलों में गिराने वाले थे। फिर नावोंसे उसे कलकत्ता लाने की योजना थी। दूसरा ‘स्कूप’ था आसनसोल में चिनाकुरी खदानों में दुर्घटना के बारे में। इसमें सैंकड़ों खदान मजदूरों की जानें गईं। सुप्रसि( रंगकर्मी उत्पल दत्त ने इस विषय पर ‘अंगार’ नामक नटक का मंचन किया। उन दिनों पत्रकारिता काफी कठिन हुआ करती थी। एक बार 1953 में पुलिस ने पत्रकारों की जमकर पिटाई कर दी। विद्या मुंशी की भी खूब पिटाई हुई। वे ट्राम के किरायों में वृ( का आंदोलन रिपोर्ट कर रही थीं। पुलिस ने उनसे खूब पूछताछ की लेकिन विद्या ने ‘ब्लिट्ज’ को फंसने नहीं दिया। पुलिस के अत्याचारों की जांच के लिए जस्टिस पी.बी. मुखर्जी कमिशन बिठाया गया। महिला समस्याओं का अध्ययन विद्या मुंशी 1954-55 से ही महिला आंदोलन में सक्रिय भाग लेने लगीं। वे बंगला भाषा में इतनी तेज हो गईं कि महिला आंदोलन के संबंध में वे अक्सर बंगला में ही लिखतीं। उन्होंने प. बंगाल में महिलाओं की स्थिति; 1970-2000 नामक रिपोर्ट के लिए महिलाओं की हिस्सेदारी के संबंध में एक अध्याय लिखा। ‘राजनैतिकि हिस्सेदारी’’ संबंधी यह अध्याय तथ्यों से भरा हुआ है। उन्होंने विस्तृत संस्मरण लिखा है जिसका शीर्षक है ‘‘इन रिट्रोस्पेक्टःवार-टाइम मेमोरीज एंड थॉट्स ऑनवीमेन्स मूवमेंट’ ;यु(काल संबंधी कुछ संस्मरण और महिला आंदोलन के बारेमें कुछ विचारद्ध। वे पश्चिम बंग महिला समिति की अध्यक्ष, भारतीय महिला फेडरेशन की 1986 से 1989 तक राष्ट्रीय सचिव एवं कई वर्षोंं तक फेडरेशन की कार्यकारिणी सदस्य रहीं।महिला आंदोलन संबंधी उनके विचार बड़े ही व्यापक थे। शमिता सेन को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा : ‘‘अब गांधीवादी, मार्क्सवादी और नारीवादी महिला प्रश्नों पर एक दूसरे से सहयोग करते हुए काम कररहे हैं। हम साथ मिलकर काम कर सकते हैं और करना चाहिए।’’ 1994 में उन्होंने एक पुस्तिका लिखी। जिसका शीर्षक थाः ‘परिवार को जनवादी बनाओःइसके अधिकारां का फैलाव एवं इसकी रक्षा करो’। इसके अलावा उन्होंने भारतीय महिला फेडरेशन का एक संक्षिप्त इतिहास भी लिखा है।विद्या मुंशी का एक पत्रकार के रूप में चित्रण 10 एपिसोड वाले एक वेब-सीरिज में भी किया गया है। यह 1959 के सुप्रसि( नानावटी मर्डरकेस से संबंधित है। इसका शीर्षक है‘‘द वर्डिक्टः स्टेट वर्सेज नानावटी’;नानावटी केस के फैसले के बारे मेंद्ध। विद्या मुंशी ने विभिन्न विषयों पर बहसों, चर्चाओं और विवादों में भाग लिया जिनमें महिला आंदोलन, नारीवाद से लेकर अंतर्राष्ट्रीय विषय शामिल थे। वे प. बंगाल पार्टी के दैनिक अखबार‘कालान्तर’ के बोर्ड की सदस्य थी। वे राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की प्रमुख भी थीं, साथ ही वे महिलाकमिशन में भी थीं। उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर महिला संगठन और आंदोलन के जनवादी करण के लिए निरंतर संघर्ष किया। उन्होंने ‘इप्टा’ के लिए भी लिखा। अपने अंतिम वर्षोंं में वे लकवे से आंशिक रूप से ग्रसित रहीं। सन 2002 में उन्हें मस्तिष्क का पक्षाघात हुआ। फिर भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा। वे घंटों कुर्सी पर बैठे पढ़ा करतीं और दस्तावेजों का अध्ययन किया करतीं। इसके लिए मोटा चश्मा और ‘मैग्निफांइग ग्लास’ का प्रयोग करतीं। वे बांए हाथ से नोट्स लिया करतीं। उन्होंने महिला आंदोलन के विषय में काफी तथ्य और आंकड़े इकट्ठा किए। उन्होंने महिला तथा पार्टी आंदेलन से संबंधित इतिहास और दस्तावेजी तथ्य सुनील मुंशी को ‘डिक्टेट’ कराए। सुनील ने विस्तार सेडिक्टेशन लिया।विद्या मुंशी की मृत्यु 8 जुलाई2014 को लंबी बीमारी के बाद कलकत्ते में 94 वर्ष की आयु में होगई।

बाराबंकी। देश की जन विरोधी केन्द्र सरकार ने देश व देश की जनता को बरबाद करने पर उतारू है, चाहे किसान हो, मजदूर हो, छात्र हो, महिलाएं हो, बेरोजगार हों, गरीब हो, सबके अहित के लिए अभियान चला रखा है। किसानों की बरबादी के लिए कृषि कानून 2020 जबरन लागू कर रही है, जिसके विरोध में किसान दिल्ली की सीमाओं पर 80 दिनों से धरना दे रहे हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था चैपट है, बेरोजगारों को नौकरी नहीं है, पढ़ाई इतनी महंगी हो गयी है कि गरीब आदमी अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकता है, श्रमिक हित के कानून समाप्त किये जा रहे हैं। देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियां तेजी से अपने चहेते उद्योगपतियों को बेच रही है। देश की संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है, सरकार इनका अपने विरोधियों को डराने और दबाने के लिए दुरूपयोग कर रही है। इसी तरह डीजल, पेट्रोल और एल0पी0जी0 सिलेंडर की कीमत भी आसमान छू रही है, जब देश में कच्चा तेल 150 डालर प्रति बैरल था तब डीजल 54 रूपये लीटर, पेट्रोल 80 रूपये लीटर तथा एलपीजी सिलेंडर 424 रूपये में था और अब कच्चा तेल 50 डालर प्रति बैरल है तब डीजल 80 रूपये, पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर, एलपीजी सिलेंडर 780 रूपये तक पहुंच गया है, जिससे आमजन की रसोई पर विपरीत असर पड़ रहा है, डीजल के दामों की वृद्धि की वजह से देश में यातायात, कृषि क्षेत्र, ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र में लागत बढ़ेगी, यातायात और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमत बढ़ेगी, जिससे आम जनता का महंगाई से जीना दूभर हो जायेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा और मांग की कि- डीजल पेट्रोल पर सभी उपकर तत्काल हटाये जाये, पेट्रोलियम पदार्थ को वैट से हटाकर जी0एस0टी0 के दायरे में लाया जाये। तीनों काले कानून कृषि बिल रद्द किया जाये। एम0एस0पी0 की गारंटी का कानून बनाया जाये। किसान आन्दोलन में शामिल किसानों और आन्दोलन का समर्थन करने वालों को प्रताड़ित करना बंद किया जाये।
ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में रणधीर सिंह सुमन, सदस्य राज्य परिषद बृजमोहन वर्मा,जिला सचिव शिवदर्शन, सह सचिव प्रवीण कुमार कोषाध्यक्ष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विनय कुमार सिंह,अध्यक्ष किसान सभा गिरीश चन्द्र, रामनरेश, आशीष शुक्ला, संदीप तिवारी, अंकुल वर्मा, श्याम सिंह ,गाजी अमान अधिवक्ता आदि थे।

बाराबंकी। सरकार किसानों के खून से होली खेल रही है, किसान आन्दोलन में अब तक लगभग 300 किसानों की मौत हो चुकी है, सरकार संवेदनहीन हो चुकी है, यह आरोप लगाते हुए आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने ग्राम पंचायत बस्ती में किसानों की श्रद्धांजलि सभा में कहा कि सरकार किसान विरोधी है लेकिन यह आन्दोलन गांव-गांव फैल चुका है, कानून वापस लेने होंगे।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किसानों के चित्र के ऊपर पुष्पांजलि करते हुए कहा कि किसान किसी भी कीमत पर दबने वाला नहीं है, चुनाव में सत्तारूढ़ दल हम दो हमारे दो ही बचेगी।
किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि कृषि क्षेत्र के तीनों कानूनों को सरकार को समाप्त कर इस देश की रक्षा करना चाहिए, किसान मजदूर नहीं रहेगा तो देश नहीं रहेगा, देश नागरिकों से होता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन को पार्टी का पूरा समर्थन है और पार्टी किसी भी कीमत पर अपने पैर वापस नहीं लेगी। वहीं पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो बाराबंकी का भी किसान दिल्ली जायेगा।
श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता छेतर सिंह ने की तथा संचालन राम विलास वर्मा ने किया श्रद्धांजलि सभा का आयोजन नैमिष कुमार सिंह ने किया था। सभा में गिरीश चन्द्र, रामनरेश माती, दिलीप सहित सैकड़ों किसान नेता मौजूद थे।

गोपाल मुकुंद ;बालाजी हुद्दार की कहानी किसी रहस्य-रोमांच कथा से कम नहीं है। उनका जीवन रोमांचकारी था और वे पहले तो आर.एस.एस. के ‘सरकार्यवाह’’ रहे, फिर स्पेन में फासिस्ट विरोधी गृहयुद्ध  में लड़े और लौट कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए! गोपाल मुकुंद का जन्म 1902 में मांडला ;अब मध्यप्रदेश में हुआ था। गोपाल को 4 वर्ष की उम्र में नागपुर लाया गया जहां उधोजी नामक एक ब्राह्मण महिला ने उसे गोद लिया। गोपाल ने नागपुर के मौरिस कॉलेज से ग्रेज्यूएशन किया और फिर गर्ल्स मिशन स्कुल में पढ़ाने लगे। 1920 में वह विद्यार्थी नेता भी बन गए।

हुद्दार के आरंभिक जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है। उनकी पत्नी का नाम मनोरमा था।हुद्दार ने अपना राजनैतिक जीवन हिन्दू महासभा से आरंभ किया। जल्द ही, 1925 में आर.एस.एस. की स्थापना की गई। डॉ. हेडगेवार ने जिन थोड़े-से लोगों को स्थापना के लिए चुना उनमें बालाजी हुद्दार भी थे। जल्द ही वे आर.एस.एस. के ‘‘सरकार्यवाह’’;महासचिव बनाए गए। साथ ही हुद्दार हिन्दू महासभा और आर.एस.एस. के सुप्रसिद्ध नेता डॉ. बी.एस. मुंजे के भी काफी नजदीक थे।आर.एस.एस. से मोह भंग जल्द ही हुद्दार का आर.एस.एस.से मोहभंग होने लगा। वे अवश्य इसके सरकार्यवाह थे लेकिन इसके हिन्दू सांप्रदायिक संकीर्ण विचारों से अलग होने लगे। उन्होंने पाया कि इस नामपर आर.एस.एस. स्वयं को ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रखे हुए है। हुद्दार की कांग्रेस के प्रति भी सहानुभूति बढ़ने लगी।वे क्रांतिकारी आंदोलनों की ओर आकर्षित होने लगे। उनका संपर्क बंगाल के क्रांतिकारी संगठन युगांतर से हुआ। बालाघाट में 1931 में उन्हें शस्त्रास्त्र इकट्ठा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह कांड ‘बालाघाट षड्यंत्र केस’ के नाम से जाना जाताहै। उन्हें 1935 में रिहा किया। रिहा होने पर अपने कुछ सहयोगियों के साथ उन्होंने सावधान नामक साप्ताहिक पत्रिका का नागपुर से प्रकाशन आरंभ किया। आर.एस.एस. से उनकी दूरी और भी बढ़ गई। इस बीच उनकी रूचि पत्रकारिता और सैनिक विज्ञान में बढ़ गईं। वे अधिक जानकारी लेना चाहते थे इसलिए इंगलैंड जाने का निर्णय लिया।भवानी शंकर नियोगी ऐसे जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ सहायता किया करते। उन्होंने हुद्दार को 1000/ रु. दिए। अन्य मित्रों ने भी सहायता की और हुद्दार इंगलैंड के लिए चल पड़े और इस प्रकार एक असाधारण जीवन-यात्रा का प्रारंभ हुआ।

इंगलैंड में

जब बालाजी हुद्दार इंगलैंड पहुंचे तो उस वक्त योरप समूचे विश्व के लिए महत्वपूर्ण घटनाओं से गुजर रहा था। इटली में मुसोलिनी पहले ही सत्ता में आ चुका था। हिटलर और उसकी नाजी पार्टी जर्मनी में 1933 में सत्ता में आ गईं समूचे योरूप और विश्व के लिए खतरनाक समय आ पहुंचा। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एक ;एमआइ 5 हुद्दार की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हुए थी। उनका सारा पत्राचार और कई दस्तावेज उसके हाथ पहुंच रहा था। उनकी रिपोर्टोंं के अनुसार हुद्दार ब्रिटिश सेना में संपर्क बनकर भारत में उनके कैंटोनमेंट्स पर हमला करने की योजना में शामिल थे।बालाजी हुद्दार ने भारत लौटकर आजादी के संघर्ष में हिस्सा लेने का फैसला कर लिया।

स्पेन के गृहयुद्ध ;1937-39 में

हुद्दार आजकल स्पेन के गृहयुद्ध के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध था। 1936 के आम चुनावों में स्पेन और फ्रांस में पॉपुलर फ्रंट ;जन-मोर्चा की सरकारें बनीं। इससे फासिज्म को रोकने में सहायता मिली। स्पेन में प्रगतिशील,जनवादी और वाम दलों की सरकार बनी और स्पेन रिपब्लिकन ;गणतांत्रिक स्पेन कहलाया। लेकिन स्पेन के फासिस्ट और विद्रोही जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको ने सशस्त्र क्रांतिकारी के जरिए गणतांत्रिक सरकार गिराने का अभियान शुरू कर दिया। स्पेन में गृहयुद्ध आरंभ हो गया। इटली और जर्मनी ने जनरल फ्रांको की सक्रिय सैनिक सहायता की। भूमध्यसागर के तटीय देशों, अफ्रीकी किनारों से मोरक्कन, स्पेनी, इटालियन, जर्मन,इ. फौजें स्पेन में उतारी जाने लगीं।तुमुल युद् धछिड़ गया जिसमेंआखिरकार गणतांत्रिक स्पेनी सरकारकी 1939 में पराजय हो गई। जनरल फ्रांको ने स्पेन पर कब्जा कर लिया।रिपब्लिकन स्पेन के समर्थन में सारे योरप और विश्व में एकजुटता आंदोलन छिड़ गया। इतना ही नहीं, स्पेन में लड़ने के लिए विभिन्न देशों में स्वयंसेवक भर्ती किए जाने लगे। लोग,खासकर युवा और बुद्ध जीवी स्पेन में लड़ने के लिए आगे आए। इसके परिणाम स्वरूप ‘‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’’;अंतर्राष्ट्रीय दस्तों का गठन किया जाने लगा।महान विश्व हस्तियों ने समर्थन कियाः अल्बर्ट आंइस्टीन, अर्नेस्ट हेमिंगवे, आंद्रे माल्रो, जोलियो क्यूरी,ज्यॉर्जी दिमित्रोव तथा अन्य। कई ब्रिटिश व अन्य देशों के कम्युनिस्ट एवं दूसरे लोग स्पेन में लड़ते हुए मारे गए, जैसेसुप्रसिद्ध लेखक क्रिस्टोफर कॉडवेल,राल्फ फॉक्स, इ.।इन घटनाओं में स्पेन के समर्थनमें जवाहरलाल नेहरू की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे।सितंबर 1936 से ही विभिन्न देशों से स्वयंसेवक स्पेन पहुंचने लगे थे। सारी दुनिया से 32 हजार से अधिक स्वयंसेवक फ्रांको से लड़ने स्पेन पहुंचे। इनमें छह भारतीय भी थे। इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता लुईगी लोन्गो अभियान का संयोजन अंतर्राष्ट्रीय ब्रिगेडों के कमिसार-जनरलके रूप में कर रहे थे।

अंतर्राष्ट्रीय ब्रिगेडः हुद्दार स्पेन में

इन घटनाओं का बालाजी हुद्दारपर गहरा प्रभाव पड़ा। वे लंदन में कम्युनिस्टों की सभाओं में जाने लगे। अलाव कई सारी फासिस्ट-विरोधी सभाओं और बैठकों में उन्होंने भाग लिया। ब्रिटेन में संयुक्त राष्ट्रीय कमिटिका गठन हुआ जिसकी अध्यक्ष एथॉलकी ड्यूचेस थीं। इसमें एंगलिकन चर्चभी शामिल हुआ।ब्रिटेन से 200 से भी अधिकवालंटियर स्पेन जाने को तैयार हो गए।सरकार ने उनके रास्ते में बाधाएं खड़ीकरने की कोशिशें कीं। इसलिए उन्हेंकाफी घूमकर जाना पड़ता था।बालाजी हुद्दार भी इनमें शामिल होगए। उनके अलावा पांच अन्य भारतीयभी थेः सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट साहित्यकार मुल्कराज आनंद, तीन डॉक्टरः अटल मेनहन लाल, अ ̧यूब अहमद खान नक्शबंदी, और मैनुएल रोचा पिन्टो तथा एक विद्यार्थी रामास्वामी वीरप्पन। मेनहन लाल कनाड़ा से आए।नॉर्मन बेथ्यून के साथ स्पेन में हो लिए।फिर वे उनके साथ चीन चले गए और जापानी फौजों से लड़ाई में भाग लिया।वे चीन में ही बस गए और वहीं 71वर्ष की आयु में 1957 में मौत हो गई।नक्शबंदी 1947 के बाद लाहौरके मेयो हॉस्पिटल में ऑर्थोपीडिक्स केप्रथम प्रोफेसर बने।बालाजी हुद्दार 16 अक्टूबर1937 को स्पेन पहुंचे। उन्हें बड़ी हीकठिन और टेढ़े-मेढ़े रास्तों से जानापड़ा। पहले वे फ्रांस पहुंचे और फिरपाइरीनीज पहाड़ों की श्रेणियां पार करकेस्पेन पहुंचे। उन्होंने अल्बासीट नामकस्थान पर ‘जॉन स्मिथ’ के रूप में अपनानाम लिखाया। कई देशों में ऐसे स्वयंसेवक बनने पर पाबंदी थी। वहां कई ‘जॉन स्मिथ’ थे। हुद्दारको पहचानने के लिए उन्हें ‘ईराकियन जॉन’ कहा जाने लगा।हुद्दार की बटालियन का नामसुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता सकलत वालाके नाम पर ‘‘सकलतवाला बटालियन’रखा गया। उसने कई लड़ाइयों में भागलिया। उन्हें ‘‘अब्राहम लिंकन ब्रिगेड’का हिस्सा बनाया गया जिसमें कईअमरीकी, बाल्कन और फ्रैंको-बेल्जियमभी थे।स्पेनी संघर्ष के समर्थन मेंसकलतवाला की 18 वर्षीय पुत्री सेहराने ‘‘स्पेन-भारत संध्या’ का आयोजन मार्च 1937 में लंदन में किया। इसेभारत-स्पेन समिति ने आयोजित कियाथा। जवाहरलाल नेहरू भी इसमें शामिल हुए। नेहरू ने रिपब्किलन स्पेन के पक्ष में जोरदार संघर्ष छेड़ दिया। वे स्पेनके मोर्चे पर जनरल लिस्टर के हेडक्वार्टर भी गए और कैटलोनिया के राष्ट्रपति लूइस काम्पानिस से मिले। इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं। हुद्दार 11 फरवरी 1938 को उत्तरी स्पेनके टाराजोना नामक स्थान पर ट्रेनिंग के लिए गए। उन्हें बार्सिलोना से 100मील दक्षिण कैटालोनिया में गैन्डे सानामक स्थान में पंद्रहवीं ब्रिगेड में वहां के बचाव की लड़ाई में लगाया गया।नेहरू और कृष्ण मेनन ने उन्हें तब संबोधित किया जब वे एब्रो नदी पार करने की तैयारियां कर रहे थे। इससे पहले नेहरू ने स्पेनी कम्युनिस्ट पार्टी की अध्यक्ष डोलोरिस इबासरी के साथ मिलकर स्पेन की सहायता की और एक रैली को संबोधित किया।

हुद्दार की गिरफ्तारी

जब उनकी बटालियन बार्सिलेनाकी ओर पीछे हट रही थी, तब हुद्दारऔर कई अन्य लड़ाकुओं को फ्रांकोकी फौजों ने पकड़ लिया। वे यु(बंदीबना लिए गए। उन्हें पकड़कर ‘‘सानपेड्रो दे कार्देना’ नामक स्थान पर बंदीके रूप में रखा गया। उनके साथ रहनेवाले एक अन्य बंदी इवोर हिकमैनउन्हें ‘इराकिना मित्र’ कहा करते। हुद्दार बंदीगृह में हाथ देखकर भविष्य बताने वाले के रूप में प्रसिद्ध हो गए। इसका उल्लेख उनके सेल में एक अन्य बंदी कार्ल गेजर ने किया है।हुद्दार कैदियों को भारत की आजादी के आंदोलन, गांधी और नेहरू के बारे में बताया करते और लेक्चर भी दिया करते।

ब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़ने लगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नल भी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकी मुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसे लगातार पूछताछ की। आखिर कार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव में बालाजी हुद्दार हैं। वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी के कैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुर के बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया। इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीय वाद पूरे जोरों पर था! रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियन स्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों के स्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसिब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसि( ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता रजनी पाम दत्त ;आरपीडीद्ध ने की।भारत वापसीएक महीने बाद बालाजी हुद्दार बंबई वापस आ गए। बंदरगाह पर उनकाभारी स्वागत हुआ जिसमें भारी संख्या में मजदूर भी पहुंचे। कई यूनियनों तथाकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने उनके सम्मान में आम सभाएं आयोजित कीं। स्पेन मेंअपने अनुभवों और फासिज्म-विरोधी एवं मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वेकम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गए। वे औपचारिक रूप से 1940 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे नागपुर में पार्टी कार्य में लग गए।वे द्वन्द्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा स्पेनी गृहयुब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसिब्रिटिश सरकार पर ब्रिटिश ब्रिगेड के कैदियों के छुड़ाने का दबाव बढ़नेलगा। फलस्वरूप बातचीत करने एक टीम स्पेन गई। इसमें एक रिटायर्ड कर्नलभी थे जिनका बेटा भी उन कैदियों में एक था। जब ये कर्नल कैम्प गए तो उनकीमुलाकात एक ‘जॉन स्मिथ’ से हुई जो भारतीय लग रहे थे। उन्होंने उनसेलगातार पूछताछ की। आखिरकार इस जॉन स्मिथ ने मान लिया कि वे वास्तव मेंबालाजी हुद्दार हैं।वहां दिलचस्प बात यह है कि ये कर्नल कभी नागपुर के पास काम्टी केकैन्टोनमेंट के कमांडर रह चुके थे! फिर क्या था?! दोनों कैदियों के बीच नागपुरके बारे में खूब बातें हुईं। उन्होंने हुद्दार की रिहाई के लिए सारा जोर लगा दिया।इस स्पेनी जेल में अंतर्राष्ट्रीयवाद पूरे जोरों पर था!रिहा होने पर हुद्दार ब्रिटेन वापस आ गये। 12 नवंबर 1928 को इंडियनस्वराज लीग ने लंदन के एसेक्स हॉल में इंटरनेशनल ब्रिगेड के सदस्यों केस्वागत के लिए एक आम सभा की। इसमें मुख्य अतिथि गोपाल मुकुंद हुद्दार थे।आमंत्रण पत्र पर उन्हें ‘एकमात्र भारतीय’ बताया गया। मीटिंग की अध्यक्षतासुप्रसि( ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता रजनी पाम दत्त ;आरपीडीद्ध ने की।भारत वापसीएक महीने बाद बालाजी हुद्दार बंबई वापस आ गए। बंदरगाह पर उनकाभारी स्वागत हुआ जिसमें भारी संख्या में मजदूर भी पहुंचे। कई यूनियनों तथाकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने उनके सम्मान में आम सभाएं आयोजित कीं। स्पेन मेंअपने अनुभवों और फासिज्म-विरोधी एवं मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वेकम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गए। वे औपचारिक रूप से 1940 मेंभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे नागपुर में पार्टी कार्य में लग गए।वे द्वन्द्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा स्पेनी गृहयु( पर लेक्चर दियाकरते।1952 के बाद कई कारणों से वे सक्रिय राजनीति से दूर जाने लगे। फिर भी वे पार्टी के साथ बने रहे। 1972 में कॉ.ए.बी. बर्धन के एक मित्र बर्लिन गएजहां उनकी मुलाकात इंटरनेशनल ब्रिगेड के एक जर्मन से हुई। उस जर्मन ने हुद्दार को याद किया और उनके लिए एक मेडल तथा ‘थालमन बटालियन’ का चिन्ह हुद्दार के लिए दिया। ;अर्न्स्ट थालमन जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे जिन्हें हिटलर के यातना-शिविर में गोली मार दी गई थी । वे मित्र कॉ. बर्धन तक मेडल इ. ले आए। इन्हें कॉ. बर्धन ने स्वयं हुद्दार तक पहुंचा दिया। गोपाल मुकुंद हुद्दार की मृत्यु 1981 में हो गई।

police stop protest rally of all india kisan sabha in barabanki
बाराबंकी। किसान आन्दोलन के समर्थन में तीन कृषि काले कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर आॅल इण्डिया किसान सभा के जलूस निकाला जिसको भारी पुलिस बल ने रोक दिया और वहीं पर मजिस्टेªेट बुलाकर ज्ञापन दिलाया, इसके पूर्व आॅल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि मोदी गिरोह ने जो रूपये अडानी और अम्बानी से लिए हैं उसी कारण किसानों की मांग नही मानी जा रही है, पूरी दुनिया मोदी की इस हरकत पर थू-थू कर रही है किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए संघी गुण्डों ने लाल किले पर उत्पात मचाया, संघियों की पुरानी आदत है, मुंह में राम बगल में छूरी।
किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा मोदी हमेशा झूठ बोलकर देश की अर्थ व्यवस्था को बरबाद कर दिया है और अब देश की परिसम्पत्तियों को टुकड़ों-टुकड़ों में बेच रहे हैं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने किसान आन्दोलन का समर्थन करते हुए कहा कि मोदी सरकार की विदाई ही देश बचाने के लिए आवश्यक है और देश की जनता इनकी विदाई शीघ्र ही कर देगी। पार्टी के जिला सहसचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि एक तरफ पेट्रोल, डीजल, गैस के दाम सरकार बढ़ा रही है और जनता को परेशान किया जा रहा है सिर्फ साम्प्रदायिक्ता का इंजेक्शन जनता को लगा रहे हैं।
किसान सभा के प्रदर्शन कारियों में राम नरेश, गिरीश चन्द्र, नैमिष सिंह, प्रतीक शुक्ला, महेन्द्र यादव, आशीष शुक्ला, श्याम सिंह, अंकुल वर्मा, पंडित आकाश शर्मा, अशोक कुमार मौर्या आदि प्रमुख लोग थे।ریاست اتر پردیش کے بارہ بنکی میں کسانوں کے احتجاج کی حمایت میں ریلی نکال کر ضلع مجسٹریٹ کے دفتر پر
آل انڈیا کسان سبھا کے کارکنان اپنے دفتر سے چند ہی قدم آگے بڑھے تھے، لیکن پولیس نے انہیں وہیں روک کر مجسٹریٹ کو میمورنڈم دلا دیا۔
میمورنڈم دینے جا رہے کمیونسٹ پارٹی آف انڈیا کی کسان تنظیم آل انڈیا کسان سبھا کے کارکنان کو پولیس نے روک دیا۔

अतुल अंजान के लिए इमेज नतीजे

किसानों द्वारा 6 फरवरी को राष्ट्रव्यापी सड़क जाम –एंबुलेंस , ऑयल टैंकर स्कूल बसों मिल्क वॉटर दूध पानी टैंकर, वरिष्ठ नागरिकों को आवागमन छूट केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कानून विदेशी व घरेलू कारपोरेट को किसानों की जमीन व बाजार सौंपने की योजना है l किसानों के विरुद्ध केंद्र सरकार ने “युद्ध” का ऐलान कर दिया है और जनतांत्रिक मूल्यों के सारे मानदंडों को तबाह करते हुए निम्न स्तर पर सरकारी दमनlत्मक कार्यवाही को लागू कर दिया है l बढ़ती हुई महंगाई , बेकारी और आर्थिक कुशासन के चलते केंद्र सरकार किसानों पर एकतरफा कार्रवाई कर के अपने किले की रक्षा करना चाहती है आजाद भारत में दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर जिस प्रकार कंक्रीट के ब्लॉक खड़े किए गए हैं लंबे कटीले बुलेट तार युक्त लक्ष्य बिछाए गए हैं दीवार बन रही है और सड़क पर नुकीले की गाड़ दिए गए हैं यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक शर्मनाक स्थिति है l उक्त विचार व्यक्त करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार “अनजान: ने कहा कि देश के राजनीतिक सत्ता केंद्र पर लगभग 70 दिन से लाखों किसान धरना देकर बैठे हैं और सारे देश के विभिन्न जिलों और कस्बों में लाखों लाख किसान प्रदर्शन कर कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते हुए उसे समर्थन कानूनी जामा दिए जाने एवं तीनों कानून को वापस करने के लिए आंदोलनरत है l दिल्ली में धरना स्थल पर बिजली, पानी और इंटरनेट की सुविधाओं को केंद्र सरकार ने किसानों का मनोबल तोड़ने के लिए काट दिया है l केंद्र सरकार ने अब दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर किसानों के समर्थकों , को को आने से रोकने के लिए
फौलादी दीवार खड़ी कर दी है l लंबे कटीले ब्लेड व तार बिछा दिए हैं और सड़क पर 200 मीटर तक किले गाड़ दी गई है l यह सब एक जनतांत्रिक देश में अन्नदाता को और उसके मनोबल को तोड़ने के लिए किया जा रहा है l स्वामीनाथन आयोग के पूर्व सदस्य अतुल कुमार “अनजान” ने आगे कहा कि देश के किसान एवं अन्य जन संगठन 6 फरवरी को सारे देश में दोपहर 12:00 से 3:00 तक राष्ट्रव्यापी सड़क जाम करके सरकार और जनता का ध्यान आकृष्ट करेंगे l जाम के दौरान एंबुलेंस , स्कूल बस , ऑयल टैंकर , दूध टैंकर और वरिष्ठ नागरिकों को ले जा रहे हैं वाहनों को किसान कार्यकर्ता विशेष रूप से आवागमन की छूट देंगे l
उन्होंने आगे कहा कि देशभर में किसानों के समर्थन में पंचायत और महापंचायत का आयोजन किया जाएगा l जब तक सरकार किसानों के नैतिक एवं तर्कसंगत मांगों को स्वीकार नहीं करती , आंदोलन को जारी रखा जाएगा l

हैदराबाद: भारतीय कम्युनिस्ट पार्ट के महासचिव डी राजा ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ दिया। राजा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय परिषद में अपनाए गए प्रस्तावों पर यहां एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, जहां पार्टी ने चल रहे किसानों के विरोध को अपना समर्थन देने का फैसला किया।पूर्व राज्यसभा सांसद ने कहा कि जब से भाजपा सत्ता में आई है, तब से यह संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन कर रही है। राजा ने कहा कि भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने “विभाजनकारी, संप्रदायवादी, सांप्रदायिक और फासीवादी एजेंडे” का अनुसरण कर रहे थे।उन्होंने कहा कि बीजेपी न केवल भारतीय राज्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है, बल्कि उसके चरित्र को बदलने की भी पूरी कोशिश कर रही है।केंद्र की निंदा करते हुए, राजा ने कहा कि अगर कोई भी सरकार और उसकी नीतियों पर सवाल उठाता है, तो क्या यह बुद्धिजीवी, कार्यकर्ता, छात्र, शिक्षाविद हैं, उन्हें “राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी” करार दिया गया और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम ( यूएपीए)।“मैं वरवारा राव का नाम लेता हूं जो हैदराबाद से हैं। वे एक प्रसिद्ध कवि हैं। उसकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सभी जानते हैं। जेल में क्यों रखा जा रहा है? ” राजा ने  पूछा।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डी राजा हैदराबाद में मीडिया से बात करते हुए।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने खेत कानूनों पर केंद्र पर हमला किया, लाल किले का उल्लंघन कड़ी सुरक्षा के बीच भाजपा साजिस कर्ताओं  को लाल किले तक पहुंचने के पीछे एक साजिश का आरोप लगाते हुए, रेड्डी ने कहा कि केंद्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के नाम पर आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहा है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव सुरवाराम सुधाकर रेड्डी शनिवार को मखदूम भवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के लिए एक ही रास्ता है कि वह तीन “कृषि विरोधी कानूनों”, और “मजदूर विरोधी, सार्वजनिक बिजली कानूनों” को निरस्त करे और किसानों को दिल्ली की सीमाओं से वापस जाने  के लिए राजी करे।

CPI former general secretary Suravaram Sudhakar Reddy addressing CPI national council meeting at Makhdoom Bhawan on Saturday. (Photo | Vinay Madapu, EPS)

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने शनिवार को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं पर चर्चा के लिए हैदराबाद में अपनी राष्ट्रीय परिषद की बैठक आयोजित की। बैठक को संबोधित करने के बाद, भाकपा महासचिव डी राजा बीमार पड़ गए और उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। पार्टी सूत्रों ने कहा कि उन्हें निर्जलीकरण और रक्त शर्करा के स्तर में गिरावट का सामना करना पड़ा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव सुरवाराम सुधाकर रेड्डी ने राजा की अनुपस्थिति में मीडिया को संबोधित किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव डी राजा ने संबोधित किया मखदूम भवन में राष्ट्रीय परिषद की बैठक शनिवार को हैदराबाद में पार्टी ने आरोप लगाया कि कोविद -19 के प्रसार को रोकने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी “बुरी तरह विफल” थे। पार्टी ने मांग की कि केंद्र को उन लोगों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए जो चल रहे बजट सत्र में प्रवासी मजदूरों और बेरोजगारों जैसे महामारी से प्रभावित थे।

सुधाकर रेड्डी ने गणतंत्र दिवस पर कड़ी सुरक्षा के बीच किसानों को लाल किले तक पहुंचने की अनुमति देने के पीछे एक साजिश का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के नाम पर आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहा है। “मीडिया को किसने सूचित किया कि किसान सुबह 11 बजे के निर्धारित समय के बजाय सुबह 6 बजे रैली निकालेंगे? सिंघू सीमा की अपेक्षा सभी सीमाओं से किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति थी। ट्रैक्टर रैली को एक लाख ट्रैक्टरों के साथ आयोजित किया गया था, लेकिन किसी भी राष्ट्रीय मीडिया ने इसका प्रसारण नहीं किया, जबकि वे केवल अप्रिय घटनाओं का प्रसारण करते हैं, ”रेड्डी ने कहा। संयुक्त राज्य अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बारे में बात करते हुए, रेड्डी ने कहा कि ट्रम्प की चुनाव में  पराजय लोकतंत्र के लिए एक राहत थी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने शनिवार को केंद्र सरकार से किसानों की मांग के अनुरूप तीनों नए कृषि कानूनों को निरस्त करने की अपील की और कहा कि आगे बढ़ने का केवल यही एक रास्ता है। साथ ही इस बात पर जोर दिया कि सरकार मुद्दे को बातचीत के माध्यम से सुलझाए।

Congress needs to be more accommodating towards partners says S Sudhakar  Reddy

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘हम मांग करते हैं कि सरकार तीनों कृषि कानूनों और बिजली क्षेत्र संबंधी कानून को वापस ले जैसा कि किसान मांग कर रहे हैं और आगे बढ़ने का केवल यही एक रास्ता है। हमारी पार्टी का मानना है कि शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने रहे किसानों को हटाया नहीं जाना चाहिए।’’

रेड्डी हैदराबाद में आयोजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय परिषद की बैठक में चर्चा को लेकर जानकारी दे रहे थे। उन्होंने 26 जनवरी की हिंसा के संबंध में सत्तारूढ़ भाजपा पर आंदोलन को कमजोर करने के लिए साजिश रचने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘‘सिंघू के अलावा अन्य सीमाओं से दिल्ली शहर में ट्रैक्टरों को जाने दिया गया। जब 6,000 पुलिसकर्मी और अन्य सुरक्षा बल तैनात थे तो ट्रैक्टर लालकिले तक कैसे पहुंचे? उन्होंने झंडे कैसे फहराये? यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि ये सभी एक साजिश है?’’ उन्होंने दावा किया कि इसका खुलासा तब हुआ जब किसान नेताओं ने साजिश उजागर की।

बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न नेता:के.टी.के. थंगमणि

के.टी.के. थंगमणि संक्षेप में ‘के.टी.के.’ के नाम से जाने जाते थे। वे मद्रास प्रेसिडेंसी  और  बाद  में  तमिलनाडु  में पार्टी और मजदूर आंदोलनों के महारथी थे।  उनका  जन्म  19  मई  1914 को मद्रास प्रेसिडेंसी के मदुरई जिले केथिरूमंगलम में हुआ। उनके पिता का नाम  कुलै ̧या  नाडर  और  माता  का कलिअम्मल था। पिता बहुत धनवानथेः वे रैली इंडिया लिमिटेड नामक एक ब्रिटिश  कंपनी  की  ओर  से  जावा;इंडोनेशिया से आयात की जाने वाली चीनी के एकमात्र वितरक थे। इसके अलावा  उनकी  दो  कपड़ा  मिलें  थीं,एक थिरूमंगलम में और दूसरी थेनी जिले में।

शिक्षा-

‘के.टी.के’ ने अपनी स्कूली शिक्षा के.एस.आर. विद्यालय, तिरूमंगलम में पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1935में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर केबी.ए.  ;ऑनर्स किया।  उसी  वर्ष  वे उच्चतर  शिक्षा  के  लिए  इंगलैंड  चले गए। लंदन यूनिवर्सिटी से उन्होंने मिडल टेम्पल लॉ कॉलेज से अप्रैल 1940में बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त हो गई।इंग्लैंड मेंः 

मार्क्सवाद का प्रभाव 

 लंदन में पढ़ाई के दौरान ‘‘के.टी.के’ का संपर्क कई सारे उन भारतीय विद्यार्थियों से हुआ जो आगे चलकर महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट और आजादी के बाद भारत के नेता बने। इनमें शामिल थे,  एन.के.  कृष्णन,  पार्वती  कृष्णन,इंद्रजीत  गुप्त,  ज्योति  बसु,  निखिल चक्रवर्ती, मोहन कुमार मंगलम, इंदिरागांधी, फिरोज गांधी, डा. ए.के. सेन,इ.।उस वक्त एन.के. कृष्णन ‘इंडियन मजलिस’  के  संगठन  मंत्री  थे।  यह भारतीय विद्यार्थियों का संगठन था। के.टी.के इसमें सक्रिय हो गए। जल्द ही वे मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने लगे।थंगमणि उस मीटिंग में उपस्थित थे जिसेमं माइकेल ओ’ डायर की हत्या हुई। यह घटना 13 मार्च 1940 की है जब ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में ओ’डायर पर गोलियां चलाईं जिसे  के.टी.के    ने  अपनी  लाखों  से देखा।  माइकेल  ओ’डायर  उस  वक्त पंजाब के गवर्नर थे जब अप्रैल 1919में  जनरल  डायर  की  देख रेख  में जालियांवाला  गोलीकांड  किया  गया जिसमें सैकड़ों लोग गोलियों से भून दिए गए थे।इससे पहले के.टी.के की मुलाकात नेता सुभाष चन्द्र बोस से डबलिन, आयरलैंड में हुई। बोस 1935-38 के दौरान योरप के दौरे पर थे। उन्हें लंदन नहीं जाने दिया गया था।

भारत वापसी  

बार-एट-लॉ  मिलने  के  बाद थंगमणि  भारत  लौट  आए  और  जून1940 में मद्रास हाईकोर्ट में वकील बन गए। ‘के.टी.के’ बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे हॉकी के बहुत ही अच्छे खिलाड़ी  थे।  वे  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘आत्म-सम्मान आंदोलन में भी सक्रिय रहे।इस बीच सी.पी. अधिथानर ने, जो सिंगापुर में कानून की प्रैक्टिस कर रहे थे, के.टी.के  को सिंगापुर बुलाया। वहां के.टी.के ने प्रैक्टिस शुरू कर दी और वहां डेढ़ साल से भी अधिक रहे। उनकी शादी  ए.  रामास्वामी  नाडार  की  पुत्री बहिअम्मल  के  साथ  31  अक्टूबर1941 को हुई। नाडार सिंगापुर में एक धनी उद्यमी और उद्योगपति थे।इस  बीच  के.टी.के  मलाया  की कम्युनिस्ट  पार्टी  के  सम्पर्क  में  आए।उनके कम्युनिस्ट विचार अधिक गहरे हुए। 1942 में सिंगापुर पर जापानी सेना  ने  बमबारी  शुरू  कर  दी।फलस्वरूप थंगमणि, उनकी पत्नी और आधिथानर को सिंगापुर छोड़ मद्रास वापस आना पड़ा।सिंगापुर निवास के दौरान के.टी.के की मुलाकात वियतनाम के भावी नेता हो ची मिन्ह के साथ हुई। आगे जब सफल  क्रांति  के  बाद  हो  ची  मिन्ह वियतनाम के प्रमुख के रूप में भारत आए तो उनकी मुलाकात फिर के.टी.के से हुई।इस  बीच  1942  का  आंदोलन समूचे  भारत  में  फैल  गया।  मद्रास प्रेसीडेंसी में भी आंदोलन फैल गया।तिरूनववेली, रामनाथ पुरम, मदुरई तथा अन्य स्थानों पर कांग्रेस के तथा अन्य स्वयंसेवकों  ने  आंदोलन  किए  और गिरफ्तारियां दीं। कुलशेखर नपट्टिनम;तिरूनलवेली में कांग्रेस के स्वयंसेवकों एवं पुलिस के बीच झड़पें हुई। अंग्रेज पुलिस अफसर डब्ल्यू लोन ने गोलियां चलाई जिससे झडपें तेज हो गईं और लोन मारा गया। इसकी हत्या का दोष का शी राजन और राजगोपालन पर डाला गया।के.टी.के ने उनका मुकदमा अपने हाथों  में  लिया।  यह  एक  ऐतिहासिक मुकदमा  बन  गया।  दोनों  अभियुक्तों को जिला कोर्ट और हाई कोर्ट ने फांसीकी  सजा  सुनाई।  प्रसिद्ध कम्युनिस्ट एडवोकेट ए. रामचंद्र ने भी यह केस लड़ा।प्रीवी  काउंसिल  के  सामने  दूसरी अपील की गई। उस जमाने में सुप्रीमकोर्ट  नहीं  हुआ  करता  था।  सुप्रसिद्ध ब्रिटिश कम्युनिस्ट वकील डी.एन. प्रिट से के.टी.के थंगमणि ने सम्पर्क किया और  प्रिट  ने  केस  लड़ा।  केस  काफी कठिनाइयों के बीच लड़ा गया। मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलजुलकर उन दोनों की रिहाई के सवाल पर संघर्ष किया।आखिर कार  फांसी  की  सजा  को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।यह बहुत बड़ी सफलता थी जो लंबी और कठिन लड़ाई के बाद हासिल की जा सकी। के.टी.के ने 1942 से 1946तक प्रैक्टिस थी।

ट्रेड यूनियन आंदोलन में 

के.टी.के  थंगमणि  1943  मेंकम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे पहले  ही  ट्रेड  यूनियन  आंदोलन  में सक्रिय हो चुके थे। उनकी मुलाकात कांग्रेस के सुप्रसिसिद्ध नेता, तमिल विद्वानऔर टी यू नेता थिरू वी.का. तथा अन्य से हुई। उन्होंने सिंगारवेलु की देखरेख में मजदूरों में सक्रिय कार्य किया।के.टी.के ने मदुरई में बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। वे टी.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट यूनियन और एस.आर.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष रहे। यूनियन के कामों के दौरान वे कई बार गिरफ्तार हुए। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों की भी यूनियन बनाई। इसके अलावा उन्होंने कपड़ा और हैंडलूम मजदूरों के बीच भी काम किया।ये मजदूर आजाद हिन्द फौज और रॉयल इंडियन नेवी के नौ सैनिकों के समर्थन में भी उतरे।1945  में  मदुरई  में  मद्रास प्रादेशिक ट्रेड यूनियन कांग्रेस ;एटक से सम्बद्ध  का  सम्मेलन  हुआ।  इसकी स्वागत  समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के थंगमणि थे। 1946 में उन्होंने एस.आर.वी.एस.  की  हड़ताल  का  नेतृत्व किया। अंग्रेज सुपरिटेंड्ट ऑफ पुलिस ने के.टी.के से हड़ताल न करवाने की अपील की। के.टी.के ने जवाब में कहा कि वे खुद इंगलैंड में अपनी आंखों से ब्रिटिश मजदूर वर्ग के लड़ाकू संघर्ष देख चुके हैं। पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनेकी जेल की सजा दी गई।1948  में  वे  फिर  एस आर वी हड़ताल  में  गिरफ्तार  कर  लिए  गए। इस बार उन्हें 4 साल की सजा मिली और 1952 में ही छूट पाए। उन्होंने पोर्ट एंड डॉक ;बंदरगाह मजदूरों के बीच भी काम किया। उन्हें मजदूर वर्ग के सर्वोच्च नेता एस.ए. डांगे तथा ए.एस.के. अ ̧यंगर, कल्याणसुंदरम एवं अन्य के साथ काम करने का मौका मिला।

एफ.एस.यू. का गठन 

1943  में  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन’ ;एस.एस.यू. अर्थात सोवियत संघ के मित्र नामक संगठन की स्थापना की गई। आजादी के बाद यही संगठन ‘इस्कस’बन  गया।  सुप्रसिद्ध कांग्रेस  नेता  एवं तमिल विद्वान थिरू वी. कल्याण सुंदरम इसके  प्रथम  अध्यक्ष  एवं  के.बालदंडा युधम सचिव चुने गए। मदुरई में 1943 में इसका प्रथम अधिवेशन आयेजित किया गया। इसकी स्वागत समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के  थंगमणि बनाए  गए।  इसमें  कम्युनिस्टों  एवं कांग्रेसियों  ने  संयुक्त  रूप  से  हिस्सा लिया। एक कला एवं फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई जिसका उद्घाटन मदुरई जिला एवं सेशन्स जज एस.ए.पी. अ ̧यर ने किया। सम्मेलन में 10 हजार से भी अधिक लोग शामिल हुए।

मदुरई षडयंत्र केस 

 दिसंबर  1946  में  के.टी.केथंगमणि को 135 अन्य कम्युनिस्टों के साथ सुप्रसिद्ध ‘मदुरई षडयंत्र केस’ में  गिरफ्तार  कर  लिया  गया।  अन्य गिरफ्तार नेताओं में पी. माणिकम, पी.राममूर्ति,  शांतिलाल,  सुबै ̧या,  एस.कृष्णमूर्ति, इत्यादि थे।लेकिन वे सभी भारत की आजादी से  एक  दिन  पहले  14  अगस्त 1947  को  बिना  मुकदमे  के  रिहा कर  दिए  गए।  मदुरई  की  एक  आम सभा में उनका भारी स्वागत किया गया।

‘बी.टी.आर.’ काल  

फरवरी-मार्च 1948 में सम्पन्न भाकपा  की  दूसरी  पार्टी  कांग्रेस;कलकत्ता के लिए के.टी.के प्रतिनिधि चुने गए लेकिन वे इसमें शामिल नहीं हो पाए। वे 30 जनवरी 1948 को ही टीवीएस और एस आर वी एस ट्रांसपोर्ट कम्पनियों में हड़ताल के सिलसिले मेंगिरफ्तार कर लिए गए।1948  में  इस  पार्टी  कांग्रेस  से कुछ पहले से ही वाम-संकीर्णतावादी दुस्साहसिक ‘बीटीआर’ लाइन हावी हो गई। मद्रास प्रदेश की पार्टी को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा। के.टी.के  तथा  134  अन्य  पार्टी नेता गिरफ्तार कर वेल्लोर जेल में बंद कर दिए गए। इनमें ए एस के अ ̧यंगर,गोपालन तथा अन्य शामिल थें11 फरवरी 1950 को सेलम डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल जेल में पुलिस द्वारा गोलीकांड में 22 कम्युनिस्ट मारे गए। उस वक्त ‘बीटीआर’ लाइन के  तहत जेल में ‘वर्ग-संघर्ष’ चलाने की नीति से भी कई अनावश्यक घटनाएं घटीं जिनसे पार्टी को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। पुलिस और अधिकारियों का रूख दमनकारी था सो अलग। के.टी.के तथा अन्य साथियों ने वेल्लोर जेल में 26 दिनों तक भूख हड़ताल थी। पुलिस ने अमानवीय लाठीचार्ज किया जिसमें के.टी.के बाएं हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया।उन्हें 1952 के प्रथम सप्ताह में रिहा कर दिया गया। पार्टी ने उन्हें ट्रेडयूनियन आंदोलन की देखभाल करने का जिम्मा दिया और वे मद्रास में एटककार्यालय से काम करने लगे।

चुनावों में हिस्सेदारी 

थंगमणि पार्टी द्वारा 1952 के आम चुनावों में मदुरई लोकसभा सीट सेखड़े किए गए। वे मात्र कुछ सौ वोटों से ही हार गए। उन्हें फिर 1957 के चुनावों में उसी सीट से खड़ा किया गया। इस बार वे लोकसभा के लिए चुन लिए गए। संसद में उन्हांने प्रभावशाली और सक्रिय वक्ता के रूप में अपना स्थान बनाया। उन्होंने संसद में मजदूरों और किसानों की समस्याएं विशेष तौर पर उठाई। वे प्रथम सांसद थे जिन्होंने ‘प्रश्नकाल’ का विशेष सदुपयोग कियाः उन्होंने जनता के एक हजार से भी अधिक प्रश्न उठाए। उन्होंने पब्लिक सेक्टर और राष्ट्रीयकरण के मसलों पर खास ध्यान दिलाया। ट्रांसपोर्ट मजदूरों के नेता होने के नाते उन्होंने मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट, 1961 को पास कराने में विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने 1957 में बीजिंग ;उस वक्त पीकिंग में सम्पन्न डब्ल्यू एफ टी यू के सम्मेलन में भाग लिया। 1961 में उन्होंने अजय घोष, भूपेश गुप्ता तथा अन्यके साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से तुग के साथ बातचीत करने भाकपा प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। जब थंगमणि दिल्ली में थे तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे योजना कमिशन की समितियों में काम करने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे एक साल काम करते रहे।1971 में के.टी.के तमिलनाडु विधानसभा में मदुरई से चुने गए। 1971से 76 के बीच उन्होंने विधानसभा ामें जनता की आवाज जोरदार तरीके से उठाई। तमिलनाडु एटक के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव की हैसियत से 50 वर्षों से भी अधिक काम करते रहे। वे कई वर्षों तक एटक के उपाध्यक्ष रहे। उनकी 80वें जन्मदिन के अवसर पर तमिलनाडु की पार्टी और एटक ने विशेष ‘सुवेनर’ ;विशेष अंक प्रकाशित किया। हीरेन मुखर्जी ने उनका जीवन गांधीवादी आदर्शों पर चला बताया। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने अंतिम वर्ष उन्होंने राज्य पार्टी हेडक्वार्टर ‘बालन इल्लम’ में बिताए। के.टी.के. थंगमणि की मृत्यु वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2001 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले