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बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न नेता:के.टी.के. थंगमणि

के.टी.के. थंगमणि संक्षेप में ‘के.टी.के.’ के नाम से जाने जाते थे। वे मद्रास प्रेसिडेंसी  और  बाद  में  तमिलनाडु  में पार्टी और मजदूर आंदोलनों के महारथी थे।  उनका  जन्म  19  मई  1914 को मद्रास प्रेसिडेंसी के मदुरई जिले केथिरूमंगलम में हुआ। उनके पिता का नाम  कुलै ̧या  नाडर  और  माता  का कलिअम्मल था। पिता बहुत धनवानथेः वे रैली इंडिया लिमिटेड नामक एक ब्रिटिश  कंपनी  की  ओर  से  जावा;इंडोनेशिया से आयात की जाने वाली चीनी के एकमात्र वितरक थे। इसके अलावा  उनकी  दो  कपड़ा  मिलें  थीं,एक थिरूमंगलम में और दूसरी थेनी जिले में।

शिक्षा-

‘के.टी.के’ ने अपनी स्कूली शिक्षा के.एस.आर. विद्यालय, तिरूमंगलम में पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1935में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर केबी.ए.  ;ऑनर्स किया।  उसी  वर्ष  वे उच्चतर  शिक्षा  के  लिए  इंगलैंड  चले गए। लंदन यूनिवर्सिटी से उन्होंने मिडल टेम्पल लॉ कॉलेज से अप्रैल 1940में बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त हो गई।इंग्लैंड मेंः 

मार्क्सवाद का प्रभाव 

 लंदन में पढ़ाई के दौरान ‘‘के.टी.के’ का संपर्क कई सारे उन भारतीय विद्यार्थियों से हुआ जो आगे चलकर महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट और आजादी के बाद भारत के नेता बने। इनमें शामिल थे,  एन.के.  कृष्णन,  पार्वती  कृष्णन,इंद्रजीत  गुप्त,  ज्योति  बसु,  निखिल चक्रवर्ती, मोहन कुमार मंगलम, इंदिरागांधी, फिरोज गांधी, डा. ए.के. सेन,इ.।उस वक्त एन.के. कृष्णन ‘इंडियन मजलिस’  के  संगठन  मंत्री  थे।  यह भारतीय विद्यार्थियों का संगठन था। के.टी.के इसमें सक्रिय हो गए। जल्द ही वे मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने लगे।थंगमणि उस मीटिंग में उपस्थित थे जिसेमं माइकेल ओ’ डायर की हत्या हुई। यह घटना 13 मार्च 1940 की है जब ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में ओ’डायर पर गोलियां चलाईं जिसे  के.टी.के    ने  अपनी  लाखों  से देखा।  माइकेल  ओ’डायर  उस  वक्त पंजाब के गवर्नर थे जब अप्रैल 1919में  जनरल  डायर  की  देख रेख  में जालियांवाला  गोलीकांड  किया  गया जिसमें सैकड़ों लोग गोलियों से भून दिए गए थे।इससे पहले के.टी.के की मुलाकात नेता सुभाष चन्द्र बोस से डबलिन, आयरलैंड में हुई। बोस 1935-38 के दौरान योरप के दौरे पर थे। उन्हें लंदन नहीं जाने दिया गया था।

भारत वापसी  

बार-एट-लॉ  मिलने  के  बाद थंगमणि  भारत  लौट  आए  और  जून1940 में मद्रास हाईकोर्ट में वकील बन गए। ‘के.टी.के’ बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे हॉकी के बहुत ही अच्छे खिलाड़ी  थे।  वे  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘आत्म-सम्मान आंदोलन में भी सक्रिय रहे।इस बीच सी.पी. अधिथानर ने, जो सिंगापुर में कानून की प्रैक्टिस कर रहे थे, के.टी.के  को सिंगापुर बुलाया। वहां के.टी.के ने प्रैक्टिस शुरू कर दी और वहां डेढ़ साल से भी अधिक रहे। उनकी शादी  ए.  रामास्वामी  नाडार  की  पुत्री बहिअम्मल  के  साथ  31  अक्टूबर1941 को हुई। नाडार सिंगापुर में एक धनी उद्यमी और उद्योगपति थे।इस  बीच  के.टी.के  मलाया  की कम्युनिस्ट  पार्टी  के  सम्पर्क  में  आए।उनके कम्युनिस्ट विचार अधिक गहरे हुए। 1942 में सिंगापुर पर जापानी सेना  ने  बमबारी  शुरू  कर  दी।फलस्वरूप थंगमणि, उनकी पत्नी और आधिथानर को सिंगापुर छोड़ मद्रास वापस आना पड़ा।सिंगापुर निवास के दौरान के.टी.के की मुलाकात वियतनाम के भावी नेता हो ची मिन्ह के साथ हुई। आगे जब सफल  क्रांति  के  बाद  हो  ची  मिन्ह वियतनाम के प्रमुख के रूप में भारत आए तो उनकी मुलाकात फिर के.टी.के से हुई।इस  बीच  1942  का  आंदोलन समूचे  भारत  में  फैल  गया।  मद्रास प्रेसीडेंसी में भी आंदोलन फैल गया।तिरूनववेली, रामनाथ पुरम, मदुरई तथा अन्य स्थानों पर कांग्रेस के तथा अन्य स्वयंसेवकों  ने  आंदोलन  किए  और गिरफ्तारियां दीं। कुलशेखर नपट्टिनम;तिरूनलवेली में कांग्रेस के स्वयंसेवकों एवं पुलिस के बीच झड़पें हुई। अंग्रेज पुलिस अफसर डब्ल्यू लोन ने गोलियां चलाई जिससे झडपें तेज हो गईं और लोन मारा गया। इसकी हत्या का दोष का शी राजन और राजगोपालन पर डाला गया।के.टी.के ने उनका मुकदमा अपने हाथों  में  लिया।  यह  एक  ऐतिहासिक मुकदमा  बन  गया।  दोनों  अभियुक्तों को जिला कोर्ट और हाई कोर्ट ने फांसीकी  सजा  सुनाई।  प्रसिद्ध कम्युनिस्ट एडवोकेट ए. रामचंद्र ने भी यह केस लड़ा।प्रीवी  काउंसिल  के  सामने  दूसरी अपील की गई। उस जमाने में सुप्रीमकोर्ट  नहीं  हुआ  करता  था।  सुप्रसिद्ध ब्रिटिश कम्युनिस्ट वकील डी.एन. प्रिट से के.टी.के थंगमणि ने सम्पर्क किया और  प्रिट  ने  केस  लड़ा।  केस  काफी कठिनाइयों के बीच लड़ा गया। मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलजुलकर उन दोनों की रिहाई के सवाल पर संघर्ष किया।आखिर कार  फांसी  की  सजा  को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।यह बहुत बड़ी सफलता थी जो लंबी और कठिन लड़ाई के बाद हासिल की जा सकी। के.टी.के ने 1942 से 1946तक प्रैक्टिस थी।

ट्रेड यूनियन आंदोलन में 

के.टी.के  थंगमणि  1943  मेंकम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे पहले  ही  ट्रेड  यूनियन  आंदोलन  में सक्रिय हो चुके थे। उनकी मुलाकात कांग्रेस के सुप्रसिसिद्ध नेता, तमिल विद्वानऔर टी यू नेता थिरू वी.का. तथा अन्य से हुई। उन्होंने सिंगारवेलु की देखरेख में मजदूरों में सक्रिय कार्य किया।के.टी.के ने मदुरई में बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। वे टी.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट यूनियन और एस.आर.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष रहे। यूनियन के कामों के दौरान वे कई बार गिरफ्तार हुए। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों की भी यूनियन बनाई। इसके अलावा उन्होंने कपड़ा और हैंडलूम मजदूरों के बीच भी काम किया।ये मजदूर आजाद हिन्द फौज और रॉयल इंडियन नेवी के नौ सैनिकों के समर्थन में भी उतरे।1945  में  मदुरई  में  मद्रास प्रादेशिक ट्रेड यूनियन कांग्रेस ;एटक से सम्बद्ध  का  सम्मेलन  हुआ।  इसकी स्वागत  समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के थंगमणि थे। 1946 में उन्होंने एस.आर.वी.एस.  की  हड़ताल  का  नेतृत्व किया। अंग्रेज सुपरिटेंड्ट ऑफ पुलिस ने के.टी.के से हड़ताल न करवाने की अपील की। के.टी.के ने जवाब में कहा कि वे खुद इंगलैंड में अपनी आंखों से ब्रिटिश मजदूर वर्ग के लड़ाकू संघर्ष देख चुके हैं। पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनेकी जेल की सजा दी गई।1948  में  वे  फिर  एस आर वी हड़ताल  में  गिरफ्तार  कर  लिए  गए। इस बार उन्हें 4 साल की सजा मिली और 1952 में ही छूट पाए। उन्होंने पोर्ट एंड डॉक ;बंदरगाह मजदूरों के बीच भी काम किया। उन्हें मजदूर वर्ग के सर्वोच्च नेता एस.ए. डांगे तथा ए.एस.के. अ ̧यंगर, कल्याणसुंदरम एवं अन्य के साथ काम करने का मौका मिला।

एफ.एस.यू. का गठन 

1943  में  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन’ ;एस.एस.यू. अर्थात सोवियत संघ के मित्र नामक संगठन की स्थापना की गई। आजादी के बाद यही संगठन ‘इस्कस’बन  गया।  सुप्रसिद्ध कांग्रेस  नेता  एवं तमिल विद्वान थिरू वी. कल्याण सुंदरम इसके  प्रथम  अध्यक्ष  एवं  के.बालदंडा युधम सचिव चुने गए। मदुरई में 1943 में इसका प्रथम अधिवेशन आयेजित किया गया। इसकी स्वागत समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के  थंगमणि बनाए  गए।  इसमें  कम्युनिस्टों  एवं कांग्रेसियों  ने  संयुक्त  रूप  से  हिस्सा लिया। एक कला एवं फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई जिसका उद्घाटन मदुरई जिला एवं सेशन्स जज एस.ए.पी. अ ̧यर ने किया। सम्मेलन में 10 हजार से भी अधिक लोग शामिल हुए।

मदुरई षडयंत्र केस 

 दिसंबर  1946  में  के.टी.केथंगमणि को 135 अन्य कम्युनिस्टों के साथ सुप्रसिद्ध ‘मदुरई षडयंत्र केस’ में  गिरफ्तार  कर  लिया  गया।  अन्य गिरफ्तार नेताओं में पी. माणिकम, पी.राममूर्ति,  शांतिलाल,  सुबै ̧या,  एस.कृष्णमूर्ति, इत्यादि थे।लेकिन वे सभी भारत की आजादी से  एक  दिन  पहले  14  अगस्त 1947  को  बिना  मुकदमे  के  रिहा कर  दिए  गए।  मदुरई  की  एक  आम सभा में उनका भारी स्वागत किया गया।

‘बी.टी.आर.’ काल  

फरवरी-मार्च 1948 में सम्पन्न भाकपा  की  दूसरी  पार्टी  कांग्रेस;कलकत्ता के लिए के.टी.के प्रतिनिधि चुने गए लेकिन वे इसमें शामिल नहीं हो पाए। वे 30 जनवरी 1948 को ही टीवीएस और एस आर वी एस ट्रांसपोर्ट कम्पनियों में हड़ताल के सिलसिले मेंगिरफ्तार कर लिए गए।1948  में  इस  पार्टी  कांग्रेस  से कुछ पहले से ही वाम-संकीर्णतावादी दुस्साहसिक ‘बीटीआर’ लाइन हावी हो गई। मद्रास प्रदेश की पार्टी को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा। के.टी.के  तथा  134  अन्य  पार्टी नेता गिरफ्तार कर वेल्लोर जेल में बंद कर दिए गए। इनमें ए एस के अ ̧यंगर,गोपालन तथा अन्य शामिल थें11 फरवरी 1950 को सेलम डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल जेल में पुलिस द्वारा गोलीकांड में 22 कम्युनिस्ट मारे गए। उस वक्त ‘बीटीआर’ लाइन के  तहत जेल में ‘वर्ग-संघर्ष’ चलाने की नीति से भी कई अनावश्यक घटनाएं घटीं जिनसे पार्टी को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। पुलिस और अधिकारियों का रूख दमनकारी था सो अलग। के.टी.के तथा अन्य साथियों ने वेल्लोर जेल में 26 दिनों तक भूख हड़ताल थी। पुलिस ने अमानवीय लाठीचार्ज किया जिसमें के.टी.के बाएं हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया।उन्हें 1952 के प्रथम सप्ताह में रिहा कर दिया गया। पार्टी ने उन्हें ट्रेडयूनियन आंदोलन की देखभाल करने का जिम्मा दिया और वे मद्रास में एटककार्यालय से काम करने लगे।

चुनावों में हिस्सेदारी 

थंगमणि पार्टी द्वारा 1952 के आम चुनावों में मदुरई लोकसभा सीट सेखड़े किए गए। वे मात्र कुछ सौ वोटों से ही हार गए। उन्हें फिर 1957 के चुनावों में उसी सीट से खड़ा किया गया। इस बार वे लोकसभा के लिए चुन लिए गए। संसद में उन्हांने प्रभावशाली और सक्रिय वक्ता के रूप में अपना स्थान बनाया। उन्होंने संसद में मजदूरों और किसानों की समस्याएं विशेष तौर पर उठाई। वे प्रथम सांसद थे जिन्होंने ‘प्रश्नकाल’ का विशेष सदुपयोग कियाः उन्होंने जनता के एक हजार से भी अधिक प्रश्न उठाए। उन्होंने पब्लिक सेक्टर और राष्ट्रीयकरण के मसलों पर खास ध्यान दिलाया। ट्रांसपोर्ट मजदूरों के नेता होने के नाते उन्होंने मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट, 1961 को पास कराने में विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने 1957 में बीजिंग ;उस वक्त पीकिंग में सम्पन्न डब्ल्यू एफ टी यू के सम्मेलन में भाग लिया। 1961 में उन्होंने अजय घोष, भूपेश गुप्ता तथा अन्यके साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से तुग के साथ बातचीत करने भाकपा प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। जब थंगमणि दिल्ली में थे तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे योजना कमिशन की समितियों में काम करने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे एक साल काम करते रहे।1971 में के.टी.के तमिलनाडु विधानसभा में मदुरई से चुने गए। 1971से 76 के बीच उन्होंने विधानसभा ामें जनता की आवाज जोरदार तरीके से उठाई। तमिलनाडु एटक के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव की हैसियत से 50 वर्षों से भी अधिक काम करते रहे। वे कई वर्षों तक एटक के उपाध्यक्ष रहे। उनकी 80वें जन्मदिन के अवसर पर तमिलनाडु की पार्टी और एटक ने विशेष ‘सुवेनर’ ;विशेष अंक प्रकाशित किया। हीरेन मुखर्जी ने उनका जीवन गांधीवादी आदर्शों पर चला बताया। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने अंतिम वर्ष उन्होंने राज्य पार्टी हेडक्वार्टर ‘बालन इल्लम’ में बिताए। के.टी.के. थंगमणि की मृत्यु वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2001 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले

पुचलपल्ली सुंदुरै ̧या का जन्म 1मई1913 को अलगनी पाडु ;वर्तमान विडावलूर  मंडल  नल्लोर  जिला,आंध्रप्रदेश  में  हुआ  था।  उनका  मूलनाम पुचलपल्ली सुंदररमी रेड्डी था। वे  एक  सामंत  परिवार  के  थे।  उनके पास 50 एकड़ सिर्फ धान की ही खेती थी। माता का नाम शेषम्मा था। अछूतों के प्रश्न पर उनका गांव वालों से झगड़ा होने लगा। दो वर्षोंं तक गांव के स्कूलमें तेलुगू पढ़ी। फिर बहनोई के साथ रहने लगे। इस बीच पिता की मृत्यु होगई।  वे  बहनोई  की  बदली  के  साथनयी जगह जाने लगे। मद्रास पहुंचकर तीन वर्ष पढ़ाई की, 1929 में एन्टें्रस पास किया और  लायोला कॉलेज में भर्ती हो गए। तेलुगू रामायण प्रेम से पढ़  रखी  थी।  1924  आते-आते राष्ट्रीय साहित्य और राष्ट्रीय अंदोलन का चस्का लग गया। फिर 1925 से उन्होंने  गांधी  साहित्य  को  खूब  पढ़ा,फिर रामतीर्थ, विवेकानंद, तिलक, योग,इ. पढ़ा। 1927  में  मद्रास  में  कांग्रेस अधिवेशन  आयोजित  किया  गया  जो उन्हें  देखने  को  मिला  जिससे  उनमें राष्ट्रीय  भावनाएं  जगाने  में  सहायता मिली।  1928  में  साइमन  कमीशन जब मद्रास आया तो सुंदरै ̧या ने विरोध प्रदर्शनों में जमकर भाग लिया।कॉलेज में वे गणित, रसायन और भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी थे लेकिन साथ ही राजनीति और अर्थशास्त्र भी पढ़ा  करते।  1930  में  गांधी जी  के आवाहन पर नमक-आंदोलन में शामिल हो गए। वे आंदोलन के ‘सोदर समिति’के केंद्र पश्चिम गोदावरी चले गए। वे नमक सत्याग्रह के दो सौ स्वयंसेवकों के कप्तान बना दिए गए। फिर कॉलेज छोड़कर गांव चले गए। गांव में देखा कि खेत मजदूरों को बहुत कम मजदूरी मिलती है। उन्होंने मांग की कि मजदूरी चौगुनी बढ़ाई जाए। चारों ओर आंदोलन छिड़ गया।17  वर्ष  की  उम्र  में  उन्हें  ‘कैदी बाल स्कूल’’ में गिरफ्तार कर तंजौर भेज दिया गया। जेल में सोवियत रूसके बारे में पुस्तकें पढ़ने का मौका मिला।वहां उन्होंने हिन्दी भी पढ़ी। खराब बर्ताव का विरोध करने के लिए साथियों के साथ भूख-हड़ताल भी की।

अमीर हैदर खान से मुलाकात 

गांधी-इरविन  समझौते  के  बाद;1931  उन्हें  जेल  से  रिहा  किया गया। पहले बंगलौर और फिर मदास पहुंच गए। वहां अमीर हैदर खान तथा अन्य कई कम्युनिस्टो एवं सोशलिस्टों के साथ मुलाकात हुई। इनमें सिंगारवेलु, घाटे  तथा  कई  अन्य  शामिल  थे।  वे कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर झुकने लगे।इस बीच गांव लौटकर अछूतों और खेतिहर मजदूरों को संगठित करना शुरू किया। अछूतों को कुएं पर जाने नहीं दिया जाता था। कुछ दर्जन युवाओं को संगठित कर उन्होंने कुएं पर जाने का अधिकार छीना। इसके अलावा खेतिहर मजदूरों के लिए सहकारी दुकान बनाई।साक्षरता  अभियान  के  लिए  स्कूल,पाठशाला और पुस्तकालय खोला।वे दक्षिण में घाटे के सहायक के रूप में काम करने लगे।कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय1934 में सी.एस.पी.की स्थापना हुई। कम्युनिस्ट पार्टी के लोग सी.एस..पी. तथा कांग्रेस में काम करने लगे। पार्टी  के  काम  से  मलाबार  गए  जहां उनकी ई.एम.एस. से मुलाकात हुई। वे उन्हें  सी.एस.पी.  में  ले  आए  और  वे धीरे-घीरे कम्युनिस्ट पार्टी की ओर आने लगे। ई.एम.एस. कांग्रेस में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगे।1936 में आंध्र की सी.एल.पी.में कम्युनिस्टों का वर्चस्व था, कांग्रेस में भी अच्छा प्रभाव था। 1937 मेंउन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल  की  सजा  हुई  लेकिन  आंध्र  में कांग्रेस मंत्रिमंडल बनने के बाद चार महीनों  बाद  ही  छोड़  दिया  गया।1937 में ही वे आंध्र सी.एस.पी. के सचिव बनाए गए। युवाओं के राजनैतिक प्रशिक्षण के लिए कोत्थपटनम् में ग्रीष्म स्कूल संगठित किया गया।घाटे  लिखते  है  कि  1934  में मद्रास पहुंचने पर वे कम्युनिस्ट गुरुप के प्रमुख साथियों से मिले जिनमें आंध्र से सुंदरै ̧या, मद्रास से ‘ए.एस.के.’ एवं अन्य साथी थे।सुंदरै ̧या ने मद्रास तथा आंध्र क्षेत्रमें‘लेबर  प्रोटेक्शन  लीग’  के  गठन  में सहायता की . उनके साथ सिंगारवेलु,ए.एस.के., अमीर हैदर तथा अन्य साथी भी थे।सुंदरै ̧या, घाटे तथा अन्य साथियों की कोशिशों से केरल से कृष्ण पिल्लै,ई.एम.एस. तथा अन्य साथी सी.एस.पी से भाक.पा. में शामिल हो गए। सज्जाद जहीर, दिनकर मेहता, ई.एम.एस. तथा सोली  बाटलीवाला  सी.एस.पी.  की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी थे।1939 में भा.क.पा. पर पाबंदी लगा  दी  गई।  सुंदरै ̧या  समेत  बहुत सारे नेता अंडरग्राउंड चले गए। एक बार सुंदरै ̧या को पुलिस से बचने केलिए पचास मील भागना पड़ा था। इसक्षेत्र  में  गैर-कानूनी  पार्टी  का  खुला अखबार ‘स्वतंत्र भारत’ छपता था, तीनह जार प्रतियों में। आंध्र पार्टी ‘प्रजाशक्ति’ साप्ताहिक प्रकाशित किया करती थी जो 10 हजार से भी अधिक छपता था। वह डेढ़ हजार गांवों तक पहुंचती थी। सुंदरै ̧या जननेताऔर किसान के रूप में उभर रहे थे।1936  में  वे  अखिल  भारतीय किसान सभा के पदाधिकारी चुने गए।1934 में पी. सुंदरै ̧या को भा.क.पा.  की  केंद्र  समिति  ;सी.सी  का सदस्य बनाया गया। 1936 में घाटे और सुंदरै ̧या की देखरेख में तमिलनाडु पार्टी इकाई की स्थापना की गई। उस वक्त वह मद्रास प्रेसिडेन्सी का हिस्सा था।  उन्होंने  ए.एस.के  

अयंगर,जीवानंदन, बी.श्रीनिवासन राव, एस.वी. घाटे, इ. के साथ काम किया।1943 में भाकपा की प्रथम पार्टी कांग्रेस  ;बंबई  में  सुंदरै ̧या  फिर  से केंद्रीय समिति में चुने गए।तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह,1946-50निजाम  के  हैदराबाद  रजवाड़े  में सामंती संबंधों एवं अत्याचारों का पूरा बोलाबाला  था।  विशेषकर  उसके तेलंगाना क्षेत्र में सामंत विरोधी संघर्ष तेजी से सशस्त्र संघर्ष का रूप धारणकर रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आंध्र महासभा के गठन से किसानों,खासकर  गरीब  किसानों  औरखेत-मजदूरों का संघर्ष तेज हो गया।महासभा एक प्रकार का व्यापक संयुक्त मोर्चा  था  जिसमें  कांग्रेस  भी  शामिल थी।पार्टी  ने  केंद्रीय  नेतृत्व  से  संपर्क किया और कॉ. पी.सी. जोशी तथा अन्य नेताओं से बातचीत की। पी.सी. जोशी ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ने की अनुमति दे दी। यह सामंत-विरोधी, निजाम -विरोधी संघर्ष था। इसके अलावा यह निजामके हैदराबाद रजवाड़े के खिलाफ थाजो भारत की आजादी को मान्यता नहीं दे  रहा  था  और  स्वतंत्र  होना  चाहता था।  कुल  मिलाकर  यह  एक  व्यापक सामंत विरोधी मोर्चा था।पी.  सुंदरै ̧या  तेलंगाना  संघर्ष  के नेताओं  में  थे।  अन्य  नेताओं  में  सी.राजेश्वर  राव, रावी नारायण रेड्डी,बद्दम यल्ला रेड्डी, के.एल. महेंद्रा, इ.थे। इस संघर्ष के दौरान करीब 2500 गांव  आजाद  किए  गए  और  हजारों भूमिहीनों में जमीनें बांटी गई। ये ‘मुक्तक्षेत्र’ जिन्हें स्थापित करने का मुख्य श्रेय कम्युनिस्ट पार्टी को जाता है।‘बी.टी.आर. लाइन’,1948-50जैसा कि सुविदित है 1948 की दूसरी पार्टी कांग्रेस से कुछ पहले ही पार्टी पर संकीर्णतावादी दुस्साहिक लाइन हावी हो गई जो संपूर्ण पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हुई। 13 सितंबर1948 को तब स्थिति गुणात्मक रूपसे  बदल  गई  जब  भारतीय  फौजें हैदराबाद रजवाड़े में प्रवेश कर गई।निजाम  का  मंत्रिमंडल  गिरफ्तार  कर लिया गया और निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। एक नई सरकार का गठन हुआ और हैदराबाद भारत में मिल गया।भूमि  सुधारों  का  कार्य  भी  आरंभ  हो गया। इस कर्रवाई के फलस्वरूप तेलंगाना सशस्त्र  आंदोलन  में  फूट  पड़  गई।किसानों का बड़ा हिस्सा संघर्ष से अलग हो गया। उन्हें अब सशस्त्र संघर्ष की आवश्यकता  नहीं  रही।  कम्युनिस्ट किसानों से अलग-थलग पड़ने लगे और उन्हें जंगलों का सहारा लेना पड़ा।‘बी.टी.आर. लाइन’ तेलंगाना संघर्षको ‘भारतीय क्रांति’ के अभिन्न अंग केरूप  में  देखती  थी।  इसलिए  उसने भारतीय फौजों के प्रवेश के बाद संघर्ष तेज  करने  का  आत्मघाती  रूखअ पनाया।  अब  भारतीय  पुलिस  और फौज  से  भिंड़त  होने  लगी  जिससे आखिरकार संघर्ष की भारी नुकसान उठाते हुए पराजय हो गई। इस प्रकार1948-50 का दौर तेलंगाना संघर्ष के  पीछे  हटने  और  पराजय  का  दौर था। छापेमार दस्तों को गांवों को छोड़ जंगलों की शरण लेनी पड़ी।‘आंध्र लाइन’1948-50  मे  अपनाई  गई सशस्त्र  संघर्ष  में  भी  दो  लाइनें  थींःहथियारबंद विद्रोह और छापेमार युद्ध की  लाइनें।  इन्हें  ‘रूसी’  और  चीनी’नमूने की सशस्त्र लाइनें भी कहा जाता था।  अधिकतर  आंध्र  के  साथ  चीनी किस्म  के  छापेमार  युद्ध के  हिमायती थे। इनमें सुंरदै ̧या, सी. राजेश्वर राव तथा अन्य थे। बी.टी.आर. देशव्यापी  जनविद्रोह ;रूसी तरीका के हिमायती थे।1950 में बी.टी.आर. को अपने पद से हटा दिए जाने के बाद उसपर कुछ महीनों के लिए ‘आंध्र लाइन’ हावी हो गई। सी. राजेश्वर राव भा.क.पा. के महामंत्री बनाए गए। वे गुरिल्ला युद्धके  हिमायती  थे।  नई  केंद्रीय  समिति और पॉलिट ब्यूरो में सुंदरै या भी शामिल कर लिए गए। वे ‘बी.टी.आर. लाइन’के आलोचक थे लेकिन सशस्त्र संघर्ष के समर्थक। कुछ ही महीनों के बाद ‘सी.आर. की जगह अजय घोष महासचिव बनाए गए और सशस्त्र संघर्ष की लाइन छोड़ दी गई तथा पार्टी देश की मुख्यधारा में शामिल हो गई।सुंदरैया तेलंगाना कमेटी के इंचार्ज बने जो आंध्र पी.सी. से अलग थी। 1952 के आम चुनावों के बाद सुंदरै ̧या मद्रास से राज्य सभा के लिए चुने गए। वे कम्युनिस्ट ग्रुप के नेता चुने गए। वे तीन बार आंध्र प्रदेश असेम्बली मेंचुने गए। वे काफी समय तक भा.क.पा. की केंद्रीय समिति और पॉलिट ब्यूरो के सदस्य बने रहे। 1958 में अमृतसर पार्टी कांग्रेस में वे केंद्रीय कार्यकारिणी और सेक्रेटारिएट में चुने गऐ।सुंदरै ̧या  प्रथम पार्टी कांग्रेस में केंद्रीय समिति में चुने गए, फिर 1948 में।फिर वे 1950 में पॉलिट ब्यूरो में आए और 1954 और 1956 में भी।भा.क.पा. ;मार्क्सवादी में शामिल1964 में पार्टी में फूट और भा.क.पा.सी.पी.एम.के गठन केबाद पी. सुंदरै ̧या सी.पी.एम. में चले गए वे आरंभ से ही अर्थात 1964 से ही भा.क.पा. ;मार्क्सवादी के महासचिव बनाए गए।

भारत की कम्युनिस्ट  पार्टी मार्क्सवादी के महासचिव पद से इस्तीफा

1976 में सुंदरै ̧या ने सी.पी.एम. के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया।इसके कारणों का विस्तृत वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक माइ रेजिग्जेशन ;मेराइस्तीफा1991नामक पुस्तक में दिया है।दिनांक 22 अगस्त 1975 के केंद्रीय समिति के नाम अपने पत्र में उन्होंने विस्तार से उन कारणों की चर्चा की जिनके कारण आगे उन्होंने महासचिव पद से इस्तीफा दिया। इन कारणों मे जे.पी. आंदोलन में जनसंघ/आर.एस.एस. का साथ देने का विरोध, जनसंगठनों संबंधी कार्यनीति-गत मतभेदों, केंद्रीय नेतृत्वकारी इकाइयों की कार्यशैली, इ. संबंधी मतभेदों की चर्चा की। सुंदरै ̧या के मतभेदों की जड़ें 1948-50 के ‘बी.टी.आर.दौर’ में जाती हैं जब सशस्त्र समाजवादी क्रांति का नारा दिया गया था। उस वक्त भी वे बी.टी.आर. लाइन से पूरी तरह सहमत नहीं थे और बाद में अधिक दूर चले गए। बाद में उन्होंने पूंजीवादी जनतांत्रिक प्रक्रिया और उसकी संभावनाओं को अधिक महत्व दिया। उन्होंने हमेशा ही आर.एस.एस.-जनसंघ ;बाद में भाजपा की ओर से सांप्रदायिक-फासिज्मके खतरे से बार-बार ध्यान खींचा और इस बिंदु पर कोई समझौता नहीं किया।सुंदरै ̧या 1951 के पार्टी कार्यक्रम तथा ‘नीतिगत वक्तव्य’ के हिमायती थे।उनकी शिकायत थी कि बिना सलाह या बहस के इन दस्तावेजों में 1964 के बाद अनावश्यक परिवर्तन किए गए। वे भारतीय विशेषताओं पर अधिकाधिक जोर देने लगे थे।वे नई टेक्नोलॉजी का विरोध करने के भी खिलाफ थे। उन्होंने ट्रेड यूनियनसे कहा कि सिर्फ बेरोजगारी बढ़ने को कारण बता कर नई तकनीकों का विरोध नहीं  किया  जा  सकता।  हमें  टेक्नोलॉजी  -विरोधी  होने  की  छवि  नहीं  बनानी चाहिए।अपने पद से इस्तीफा देने के बाद पी. सुंदरै ̧या आंदोलन की स्थिति से काफी निराश रहे। उनकी मृत्यु 19 मई 1985 को हो गई।

बाराबंकी। मोदी की किसान विरोधी नीतियों के कारण हरियाणा में ढाई घण्टे तक पुलिस ने आंसू गैस के गोले किसानों पर दागे किसानों को लाठियों से बुरी तरह से पीटा गया, यह बात आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने बिशुनपुर में किसान आन्दोलन में शहीद किसानों की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि अंगे्रजी सरकार को भी मोदी सरकार ने अत्याचार में पीछे छोड़ दिया है, किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि सरकार किसान नेताओं का दमन कर रही है झूठे मुकदमें लिख रही है, लेकिन देश के किसान पीछे हटने वाले नहीं है, आन्दोलन जारी रहेगा। किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि मोदी सरकार अडानी अम्बानी के हाथों किसानों की जमीनों को देना चाहती है, इसीलिए किसानों के लिए तीन नये कानूनों का निर्माण किया है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि पार्टी के किसान नेताओं के ऊपर फर्जी मुकदमें कायम किये जा रहे हैं, हद तो यहां तक हो गई है कि मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में किसान नेताओं के ऊपर गुण्डा एक्ट के मुकदमें कायम किये गये हैं सरकार दमन पर उतारू है, हम किसान आन्दोलन से पीछे हटने वाले नहीं हैं। श्रद्धांजलि सभा को किसान नेता महेन्द्र यादव, दीपक वर्मा ने भी सम्बांधित किया, श्रद्धांजलि सभा में अलाउद्दीन अली, अमर सिंह प्रधान, श्याम सिंह, राहुल पाण्डेय, अंकुल तिवारी, अंशुमान तिवारी, रामू रावत, श्यामू रावत, राजेश सिंह,  विष्णु त्रिपाठी आदि प्रमुख लोग मौजूद थे।

 

इस चित्र का आल्ट गुण खाली है; इसका फ़ाइल नाम IMG-20210101-WA0379.jpg है

बाराबंकी। इस शीत लहर में खुली सड़क पर लाखों किसान बैठे हैं, लेकिन अडानी-अम्बानी के मोह के कारण मोदी सरकार किसानों की मांग को नहीं मान  रही है, यह बात आॅल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने ककरहिया गांव में किसान आन्दोलन में शहीद किसानों की श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि सरकार आम जनता की नहीं है बल्कि अडानी और अम्बानी की सरकार है। किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान शक्ति के आगे सरकार को झुकना होगा अन्यथा मोदी सरकार के लिए किसान आन्दोलन उनकी विदाई का आन्दोलन होगा। जिला उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि प्रदेश सरकार किसान नेताओं के ऊपर फर्जी मुकदमें कायम कर रही है। जनपद में भी हम लोगों के ऊ मुकदमें कायम किये गये हैं, लेकिन हम लोग डरने वाले नहीं हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि हमारी पार्टी किसानों के साथ है, और आन्दोलन में हमेशा सक्रिय रहेगी, पार्टी के जिला सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि जनपद में किसानों का धान आठ-नौ सौ रूपये प्रति कुन्टल बिक रहा है और सरकार धान खरीद का नाटक कर रही है। सभा का आयोजन आॅल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के जिलाध्यक्ष महेन्द्र यादव ने किया था। जनसभा में मुनेश्वर बक्स, श्याम सिंह, अंकुल वर्मा, राम नरेश माती, गिरीश चन्द्र, विष्णु त्रिपाठी, डाॅ0 अलाउद्दीन, यशवंत सिंह आदि प्रमुख किसान नेता मौजूद थे।

बाराबंकी/ न जातिवाद न धर्मवाद और गैर कांग्रेसवाद देश को बचाना है तो अब गैर भाजपावाद के रास्ते पर देश को चलाना होगा।
    यह सलाह आल इण्डिया किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव व कम्युनिस्ट पाटी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अतुल कुमार अंजान ने देवा रोड स्थित गाँधी भवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में दिया उन्होंने कहा देश इस वक्त संकट कालीन दौर से गुजर रहा है। देश का नौजवान व मजदूर किसान का भविष्य अंधकारमय है। देश के हर नागरिक को नई आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आना होगा और किसानों को इस आन्दोलन को घर-घर पहुँचना होगा। खेत बचेगा तो किसान बचेगा और हिन्दुस्तान बचेगा। अतुल अंजान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधे आक्रमण करते हुए का कि वे सत्ता में बने रहने के लिए देश की जनता को बराबर गुमराह कर रहे है उनके दस वाक्यों में नौ वाक्य झूठ पर आधारित होते है और विडम्बना यह है कि देश की जनता अभी तक झूठ बर्दाश्त करती रही, अज्ञानी ज्ञान बाँट रहें है।
    हिन्दी मासिक पत्रिका परिकल्पना के प्रधान सम्पादक और सुप्रसिद्ध ब्लागर रविन्द्र प्रभात ने कहा देश की संस्कृति और समरसता को छिन भिन्न  कर सत्ता हथियाने वाली साम्राज्यवादियों के गुलामी की ओर ले जा रहें है। रिहाई मंच के संयोजक एडवोकेट मो0 शुऐब ने कहा कि दिल्ली के बार्डर पर धरना दे रहें किसानों की अकेले की लड़ाई नहीं है। देश के खाद्यन्न को अपने चहेते पूंजीपतियों के हवाले मोदी जी कर देना चाहते है। हरित क्रान्ति के सूरमाओं के परिश्रम की बलि चढ़ा देना चाहते है। अन्न दाताओं को हमें इस लड़ाई में पूर्ण समर्थन देना ही सच्चा राष्ट्रवाद है। कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य कौंसिल के सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि 26 दिसम्बर 1925 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में मौलाना हसरत मोहानी ने मुकम्मल आजादी के के नारे के साथ की थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके वजूद के आने से रोकने के लिए देश भर में हजारों की संख्या में लोगों की गिरफ्तारियाँ की गयी थी। बावजूद इसके कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया और जन मुद्दों पर जमकर संघर्ष किया और आगे भी करते रहेंगें।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव एडवोकेट बृजमोहन वर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि देश आर्थिक गुलामी की ओर अग्रसर है और जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेज शासकों की मुखबरी किया करते थे वह साम्राज्यवादियों की ऐजेन्ट की भूमिका में है। अन्त में उन्होंने कार्यक्रम में पधारे समस्त अतिथियों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।
    कार्यक्रम में वामपंथी विचारधारा के लेखक अनिल राजिमवाले द्वारा रचित पुस्तिका ’’मुखबिर राज और आजादी के महानायक भाग-2 का विमोचन मुख्य अतिथि अतुल कुमार अंजान सहित अन्य अतिथिगणों ने किया। उर्दू दैनिक इंकलाब के जिला संवाददाता तारिक खान द्वारा संचालित कार्यक्रम में डाॅ0 कौसर हुसैन और शिवदर्शन वर्मा ने भी अपने विचार रखे।


    इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख व्यक्तियों में साहित्यकार डाॅ0 विनय राज, पंण्डित राजनाथ शर्मा, मूसा खा ईंसान, डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित, डाॅ0 एस0एम0 हैदर, कामरेड प्रवीन कुमार, विनय कुमार सिंह, पत्रकार फैजान मुसन्ना महन्त बी0पी0दास, पर्यावरण विद्य हाजी सलाउद्दीन किदवाई, एडवोकेट विजय प्रताप सिंह, आनन्द सिंह, अरविन्द सिहं, नीरज वर्मा, गौरी रस्तोगी, अंशूलता मिश्रा, गाजी अमान, अलाउद्दीन, श्याम सिंह, भूपेन्द्र पाल सिंह, शिवम सिंह, आशीष शुक्ला, महेन्द्र यादव, अंकित चैधरी, दल सिंगार, अविनाश वर्मा, आदि रहे।

S.V. Ghate : our first general secretary

 सच्चिदानंद विष्णु घाटे का जन्म14  दिसंबर  1896  को  मंगलौर;कर्नाटक के  एक  निम्न  मध्य वर्गीय परिवार में हुआ। उनके बड़े भाई तथा पिता पुरोहित थे। चारां ओर सनातनी पुरातनपंथी  वातावरण  व्याप्त  था।प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने विद्रोही रूप धारण  कर  लिया।  वे  पहले  तो गैर-सनातनी बन गए, फिर नास्तिक।वे  पुरोहिती  वातावरण  को  पूरी  तरहना पसंद करने लगे। उन्होंने अपनी टीक;चोटीद्ध काट डाली और अंग्रेजी स्टाइलमें  बाल  रखने  लगे।  उनकी  चाची  ने उनका बाथरूम जाना बंद कर दिया।विरोध में उन्होंने गरम पानी से नहाना बंद कर दिया जो मृत्यु-पर्यन्त उनका कार्यक्रम रहा! एक बार पूजा के बाद उन्होंने शालिग्राम पत्थर फेंक दिया।वे जानवरों को पसंद किया करते थे। स्कूल में उनका एक प्रिय बछड़ा था जो उनके पीछे-पीछे जाया करता था।  मेरठ  जेल  में  भी  उनका  अपना हिरण था।सच्चिदानंद ने के.ई.एम. हाईस्कूल से 1914 में मैट्रिक पास किया। वे वाद-विवाद समिति के सचिव थे। फिर वे  सेंट  एलोयसियस  कॉलेज  में  भर्ती हुए  और  वहां  से  1917  में इंटरमीडिएट  पास  किया।  उस  समय एनी बेसेंट के नेतृत्व में ‘होम रूल लीग’का आंदोलन चल रहा था। सच्चिदानंद ने उनके दैनिक अखबार ‘न्यू इंडिया’का प्रचार किया।फिर वे बंबई के सिडेन हैम कॉलेज में बी.कॉम में भर्ती हो गए जबकि उन्हें गणित से सख्त नफरत थी! वे ही बादमें भा.क.पा. के कोषाध्यक्ष बने! बीमार  पड़ने  के  कारण  वे अहमदाबाद  चले  गए  और  पूरा  एक साल ;1918 बिताया। वहां उनकी मुलाकात सी.जी. शाह से हुई जो बाद में उनके सहयोगी बने।समाजवाद की ओर1919 में वे बंबई वापस आ गए और एक बीमा कंपनी में नौकरी कर ली। कंपनी दिवालिया हो गई। इस बीच उनकी  मुलाकात  मंगलौर-निवासी गोपाल भट से हुई जो गिरगांव के श्रीकृष्ण लॉज के मालिक थे। उन्होंने घाटे कोमैनेजर नियुक्त किया। उन्हें ग्राहकों केबिल  जमा  करने  होते  थे  और  फिर सिनेमा जाने की पूरी आजादी थी! वे सेंट जेवियर कॉलेज में भर्ती हो  और  वहां  से  1923  में  बी.ए.;ऑनर्स किया।इस  बीच  सी.जी.  शाह  बंबई  आ गए थे और स्कूल टीचर का काम कर रहे थे। वे आर.बी. लोटवाला के निजी सचिव  और  लाइब्रेरी  के  इन्चार्ज  थे।लोटवाला अकसर ही विदेश जाया करतेऔर वहां से पुस्तकें लाया करते। इससे घाटे का सम्पर्क समाजवादी साहित्य से हुआ। वे बहुत तेजी से ढेर सारी पुस्तकें और पत्रिकाएं पढ़ते। सी.जी. शाह और घाटे ने एक अध्ययन मंडली बनाई। कुछ समय बाद घाटे ने एस.ए. डांगे द्वारा प्रकाशित द सोशलिस्ट पढ़ा और बड़े ही प्रभावित हुए। उन्होंने डांगे को बुला  भेजा।  डांगे  उस  समय  ‘कामतचाल’ में रहा करते। दोनों में खूब बातें हुई।जल्द ही वे दोनों तथा उनका ग्रुप बंबई कांग्रेस में काम करने लगा। वे कांग्रेस में मूलगामी दल बन गए। एम.एन.राय मास्को से भारतीय कम्युनस्टिं को नियंत्रित करने और मनमाना आदेश देने की कोशिश कर रहे थे। घाटे समेत भारतीय कम्युनिस्टों को यह सब पसंद नहीं था।लॉज में घाटे की स्थिति पार्टी द्वारा गुप्त कार्य के अनुकूल थी। घाटे को विदेशी संपर्क बनाने तथा कॉमिन्टर्न से संपर्क  में  रहने  का  काम  दिया  गया।उन्होंने साथ ही संगठन और साहित्य का  इंतजाम  शुरू  किया।  इस  प्रकार घाटे का निवास अंडरग्राउंड क्रांतिकारियों  और कम्युनिस्ट गतिविधियों का केंद्र बन गया। विदेशों में संदेश और व्यक्ति भेजे जाते।मार्च 1924 में डांगे को कानपुर षड्यंत्र  केस  में  गिरफ्तार  कर  लिया गया।  घाटे  ने  जोगलेकर,  निम्बकर,मिरजÛकर, वी.एच. जोशी, इ. के साथमिलकर डिफेंस कमिटि बनाई।कानपुर स्थापना सम्मेलन, 19251925 के आरंभ में सत्यभक्त ने सभी  कम्युनिस्टों  से  संपर्क  स्थापित करना आरंभ किया। अ.भा. कम्युनिस्ट सम्मेलन  25  दिसंबर  1925  से कानपुर में आरंभ हो गया। इसमें एस.वी. घाटे प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। सम्मेलन में केंद्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारी चुने गए। घाटे और बगरहट्टा पार्टी के दो महासचिव चुनेगए।  प्रमुख  भूमिका  घाटे  की  थी। 1927 में बंबई में कार्यकारिणी की विस्तारित बैठक में पार्टी का संविधान बदला गया और घाटे पार्टी के एकमात्र महासचिव बनाए गए।सम्मेलन के बाद मजदूर किसान पार्टियों का गठन किया गया। बंगाल मेंफरवरी 1926 में इसकी स्थापना कीगई। घाटे की देखरेख में बंबई में मजदूरकिसान पार्टी का गठन 1927 में किया गया जिसमें मिरजÛकर, निम्बकर तथाअन्य  साथियों  का  भी  योगदान  रहा।वास्तव में यह ग्रुप बंबई कांग्रेस प्रदेशकमेटी के अंदर एक सोशलिस्ट ग्रुप केरूप  में  काम  कर  रहा  था।  1927आते-आते  इस  ग्रुप  ने  मजदूरों  केविभिन्न तबकों में अपना प्रभाव बनालिया था और उनकी ट्रेड यूनियनों कागठन कर लिया था।1927 के आरंभ में टेक्सटाइलमजदूरों के बीच हलचल शुरू हो गईथी और उनकी हड़तालें होने लगी थी।इन हड़तालों ने 1928 आते-आतेबडे़ आंदोलन का रूप धारण कर लियाथा।  अप्रैल  1928  में  लगभग  डेढ़लाख  मजदूरों  ने  6  महीने  हड़तालेआरंभ कर दी। इन सारी गतिविधियोंमें पार्टी के महासचिव के रूप में एस.वी. घाटे की महत्वपूर्ण भूमिका रही।1927 में मजÛदूर किसान पार्टीकी ओर से बड़े पैमाने पर मजदूर दिवस मनाया गया। 1927 में ही भारत में साईमन कमिशन आया। उसके विरोधमें बंबई में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन औ रहड़तालों  का  तांता  लग  गया।  बंबई कई दिनों तक बंद रही और साईमन कमिशन  ने  शहर  में  प्रवेश  करने  की हिम्मत नहीं की। वह बाहर-बाहर सेही पूना चला गया। कमिशन के सात सदस्यों का विरोध करने के लिए सात पुतले जलाए गए, साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी ने 50,000 हजÛार मजÛदूरों काविशाल जुलूस निकाला। घाटे इन सारीगतिविधियों के केंद्र में रहे।जनवरी  1927  में  शापुरजी सकलतवाला बंबई आए वे इंगलैंड से आए थे और तब तक ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बन चुके थे। घाटे औरमिरजÛकर ने उनसे मुलाकात की औरउनके सम्मान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया।घाटे  संयुक्त  हड़ताल  कमेटी  के सदस्य थे जिसमें एन.एम.जोशी, डांगे,जोगलेकर तथा अन्य सदस्य भी शामिल थे। घाटे गिरणी कामगार यूनियन के केंद्र के इंचार्ज थे और कोषाध्यक्ष भी थे।1928  के  दिसंबर  में  अखिल भारतीय मजदूर और किसान पार्टी का सम्मेलन कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल मेंहुआ, उसके साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी की  भी  बैठक  हुई।  इस  सम्मेलन  में घाटे  की  महत्वपूर्ण  भूमिका  रही  और उन्होंने  सही  तरीके  से  दिशा निर्देशनकिया।मेरठ षड््यंत्र केस 1929-331929 के मार्च महीने में समूचे भारत से 32 कम्युनिस्ट एवं मजदूरनेताओं को गिरफ्तार कर मेरठ जेल में बंद  कर  दिया  गया।  उन्हें  वहां अलग-अलग सेलों में डाला गया जहां परिस्थितियां अत्यंत ही खराब थी। कई सप्ताह के संघर्ष के बाद ही कैदियों को एक  जगह  रहने  की  इजाजत  मिली।इन गिरफ्तार साथियों में एस.वी. घाटे भी  थे,  उन्हें  12  साल  के  कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। बाद मेंये सजÛा घटा दी गई। घाटे तथा अन्य साथियों को 1933 के अंत में रिहाकर दिया गया। महात्मा गांधी कम्युनिस्टोंसे मिलने मेरठ आए। जनवरी 1934में घाटे बंबई वापस आ गए। मेरठ से रिहा होने के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन का पुनर्गठन किया गया। 1934 में घाटे को फिर गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी तबियत खराब रहने लगी।1935  में  पी.सी.  जोशी  पार्टी  के महासचिव बनाये गए। इस बीच घाटे ने जेल से भागने की कोशिश की, उन्हें छः महीने सतारा के जेल में रहना पड़ा जहां वो बिल्कुल ही अकेले रहते थे।रिहा होने के बाद वे मद्रास चले गए।मद्रास में गतिविधियां इस बीच कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी;सी.एस.पी. का गठन 1934 में किया गया। एस.वी. घाटे इस पार्टी के अखिल भारतीय  नेतृत्व  में  आ  गए।  घाटे  ने दक्षिण  भारत  में  सी.एस.पी.  और कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। द. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी  का  गठन  घाटे  के  जीवन  का महत्वपूर्ण अंग है। एम-सिंगारवेलु के साथ  मिलकर  उन्होंने  पार्टी  की  कई इकाइयों  का  गठन  किया।  साथ  हीउन्होंने  कई  ट्रेड  यूनियन  संगठन  भी बनाए।  उस  समय  मद्रास  में  न्यूएज नामक  मासिक  पत्रिका प्रकाशित हुआ करती थी। घाटे ने इसका प्रकाशन  अपने  हाथों  में  ले  लिया।आखिरकार घाटे, सिंगारवेलु और आमिर हैदर खान की कोशिशों के फलस्वरूप मद्रास प्रेसीडेंसी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी क गठन किया गया।1940  में  उन्हें  गिरफ्तार  करमंगलौर में नजरबंद कर दिया गया।फिर वेल्लोर जेल भेज दिए गए। इसके बाद  1940  में  ही  उन्हें  कोटा  केनजदीक देवली कैम्प स्थानांतरित करदिया गया। वहां उनकी मुलाकÛात बाबासोहन सिंह भकना, धनवंतरी, सोहनसिंह जोश, इ. से हुई। घाटे ने देवली मेंपंजाब के भाकपा के कम्युनिस्टों और‘कीर्ति  कम्युनिस्टों’  के  बीच  मतभेदोंऔर विवादों को हल करने में महत्वपूर्णभूमिका  अदा  की।  इसके  फलस्वरूपकीर्ति पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीमें शामिल हो गई।1942 में घाटे को राजामुंदरी जेलऔर  फिर  वेल्लोर  जेल  स्थानांतरितकिया  गया।  उन्हें  अप्रैल  1944  मेंरिहा  किया  गया।  इस  बीच  पार्टी  केप्रथम कांग्रेस बंबई ;1943द्ध में हुई।अपनी अनुपस्थिति में ही पार्टी की केंद्रीयसमिति  का  सदस्य  चुन  लिया  गया।जेल से छूटने के बाद वे बंबई आ गए।वहां  वे  पार्टी  के  वित्तीय  मामलों  कीदेखरेख करने लगे।आजÛादी के बादआजÛादी के बाद नई परिस्थिति मेंजोशी  के  नेतृत्व  में  पार्टी  ने  देश  कीआजÛादी का स्वागत किया। लेकिन जल्दही  पार्टी  पर  वाम  संकीर्णतावादीदुस्साहसिक लाइन हावी हो गयी। जोशीकी जगह रणदिवे पार्टी के महासचिवबने। घाटे ने बी.टी.आर. लाइन का विरोध किया। इस बीच घाटे को अंडरग्राउंडजाना पड़ा। वे गिरफ्तार कर लिये गए।उन्हें 1950 में रिहा किया गया। घाटे,अजय घोष और डांगे ने पार्टी नेतृत्वद्वारा अपनाई गई नीतियों का विरोधकिया।सितंबर 1950 में घाटे, डांगे औरअजय  घोष  ने  पार्टी  की  नीतियों  कीआलोचना करते हुए और बेहतर दिशादर्शाते हुए एक दस्तावेज तैयार किया।इसे ‘‘थ्री पीजÛ लेटर’ कहते है। इसकेबाद  अप्रैल  1951  में  पार्टी  का कार्यक्रम तैयार हुआ। इस प्रकार पार्टी धीरे-धीरे सही दिशा की ओर चल पड़ी।घाटे अपने संस्मरणों में कहते हैपार्टी को पूंजीवादी जनवादी क्रांति की वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए थी।रणदिवे द्वारा यह कहना कि देश को आजÛादी नहीं मिली है गलत नीति थी।केंद्रीय समिति के सदस्य के रूप में घाटे अपनी आंशिक गलती स्वीकार करते हैं।घाटे 1948 की दूसरी पार्टी कांग्रेस की तैयारियों के लिए पहले ही कलकत्तापहुंचे।जनवरी 1950 में मास्को से प्रकाशित कॉमिन्फॉर्म की पत्रिका ‘फॉर एलास्टिंग पीस’ में प्रकाशित संपादकीय बी.टी.आर. की लाइन से अलग था। इसतथा अन्य घटनाओं के फलस्वरूप बी.टी.आर. को इस्तीफा देना पड़ा औरराजेश्वर राव थोड़े समय के लिए महासचिव बने। पार्टी की हालत बदहाल थी।कोई किसी से बात नहीं करता था। पार्टी हेडर्क्वाटर समाप्त-प्राय हो चुका था।सभी निराश और पस्त हो गए थे।ऐसे में घाटे सभी से मिलकर उन्हें काम के लिए प्रोत्साहित किया करते। घाटेलिखते हैं कि वे, डांगे और अजय घोष पार्टी के बचे-खुचे अवशेषों से पार्टी कोफिर से जीवित करने में लग गए। पार्टी का अंडरग्राउंड सम्मेलन 1951 मेंकिया गया जिसमें घाटे उपस्थित थे। पार्टी का कोषाध्यक्ष होने के अलावा घाटे नेप्रकाशन विभाग और प्रेस भी संभाला। वे लगातार नेतृत्व में बने रहे।पार्टी में फूट ;1964द्धघाटे ने अक्टूबर 1962 में किए गए चीनी आक्रमण का जोरदार विरोधकिया। जून 1963 में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने घाटे के नेतृत्व में केंद्रीयकंट्रोल कमिशन को पार्टी में चल रही समानांतर सांगठनिक गतिविधियों औरगुटबाजी की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। घाटे ने अपनी रिपोर्ट अप्रैल1964 तक तैयार कर ली। पूरे दस महीनों तक घाटे और उनके साथियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में घूमकर सबूत इकट्ठा किए। उन्होंने गुटबाजी का पूरा पर्दाफाश किया। अप्रैल 1964 में ही पार्टी में फूट पड़ गई।घाटे  निरंतर  पार्टी  की  केंद्रीय  समिति  में  रहे।  अमृतसर  ;1958  से  वे राष्ट्रीय परिषद और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। वे पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे और केंद्रीय कंट्रोल कमिशन के सदस्य भी।वे कई भाषाएं जानते थेः मराठी, बंगला, कन्नड़, तमिल, हिन्दी, अंग्रेजी, इ।उनकी मृत्यु 28 नवंबर 1970 के दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद हो गई।

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बाराबंकी किसान आंदोलन में अब तक लगभग 39 किसान शहीद हो चुके हैं और प्रधानमंत्री कच्छ के किसानों के पास जाकर बात कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली में बैठे किसानों के पास जाकर बात करने का समय नहीं है अखिल भारतीय किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने शहीद किसानों की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को चाहिए कि अडानी अंबानी का मोह छोड़कर किसान हित में बात कर अविलंब नए कृषि कानूनों को रद्द करें किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि सरकार किसानों की बलि ले रही लेकिन किसानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी अडानी सरकार नेस्तनाबूद हो जाएगी किसान सभा के जिला उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि चार किलो 4 किलो धान बेचकर 1 किलो आलू किसानों ने खरीदा है यह बात सरकार को मालूम है लेकिन अडानी, अंबानी के रुपयों के कारण सरकार बड़े-बड़े विज्ञापन किसान आंदोलन के खिलाफ प्रकाशित करा रही है लेकिन इससे किसान गुमराह नहीं होगा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि न्यूनतम कृषि मूल्य कानून लागू होने के बावजूद भी धान किसान को सरकार मूल्य नहीं दिला रही है पार्टी के जिला सह सचिव डॉक्टर कौशल हुसैन ने कहा कि मोदी जब मध्यप्रदेश में बोल रहे थे यह वही मध्यप्रदेश है जहां पर 45 मंडियां बंद हो गई है पार्टी के सचिव सुदर्शन वर्मा ने कहा किसान आंदोलन के खिलाफ सरकार चाहे कितना ही संघी कार्यकर्ताओं से दुष्प्रचार करवाएं लेकिन आंदोलन जारी रहेगा श्रद्धांजलि सभा में महेंद्र यादव अध्यक्ष ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन आशीष शुक्ला अध्यक्ष अखिल भारतीय नौजवान सभा रमेश कुमार राम दुलारे राम जी कुलदीप अनुज वर्मा सर्वेश भूपेंद्र सिंह अंकित यादव अर्पित वर्मा ज्ञानेश्वर वर्माआदि प्रमुख लोग थे।।

 बाराबंकी। सरकार किसान की मांग तो मान ले लेकिन सत्तारूढ़ दल ने जो रूपया अडानी अम्बानी से लेकर जिलो-जिलों में बीस-बीस करोड़ की लागत से जिला कार्यालय बनवाए है और लाखों करोड़ रूपये चुनाव में खर्च करके सत्ता हासिल की है उसकी वापसी कैसे हो इसीलिए सरकार किसानों की मांगों को नहीं मान रही है और सम्पत्तियाँ बेचों अभियान चल रही है।
    यह बात दिल्ली में चल रहे किसान आन्दोलन के समर्थन में चले रहे गाँधी प्रतिमा के सामने धरना दे रहे किसान सभा के लोगों को सम्बोधित करते हुए प्रान्तीय उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसान मजदूर व्यापारी या नब्बे प्रतिशत जनता का रूपया छीनकर सरकार अडानी, अम्बानी को दे रही है। इसी वजह से देश में अव्यवस्था का दौर जारी है।
    किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान आन्दोलन में ज्यादा से ज्यादा किसानों को शामिल होकर अपनी बात करना होगा सरकार चाहती है आन्दोलन हिंसक हो जाय वह नहीं होगा। देश का आन्दोलन सरकार के पतन का कारण होगा।
    भारतीय कम्युनिट पार्टी के जिला सहसचिव डाॅ0 कौसर हुसैन ने कहा कि यह आन्दोलन किसानों के जीवन मरण का आन्दोलन है। सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि जनपद में किसानोें की धान की उपज का कोई खरीददार नहीं है। एक हजार रूपये प्रति कुन्तल धान बिक रहा है। किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि आन्दोलन तेज किया जायेगा। सरकार किसानों के खिलाफ कितनी अफवाहें फैलावे जनता अब जुमलेबाजों को समझ रही है।
    धरना सभा को आल इण्डिया स्टूडेन्टस फेडरेशन के महेन्द्र यादव नौजवान सभा के जिला अध्यक्ष आशीष शुक्ला, जिला लाल, दीपक वर्मा, ज्ञानेश्वर वर्मा, गिरीश चन्द्र रामनरेश आदि ने सम्बोधित किया। धरना सभा में प्रमेन्द्र कुमार, मुनेश्वर गोस्वामी, कैलाश चन्द्र, अमर सिंह, सर्वेश कुमार, कुलदीप, बीरेन्द्र कुमार वर्मा आदि लोग मौजूद रहे।

बाराबंकीः मोदी सरकार अडानी, अम्बानी की नौकर सरकार है उन्ही के इशारे पर कृषि क्षेत्र के काले कानून बनाये गए हैं और किसान आन्दोलन की मांगे सरकार नहीं मान रही है, आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने किसान सभा द्वारा दिल्ली किसान आन्दोलन कारियों के समर्थन में निकाले गए जलूस को जिलाधिकारी कार्यालय के सामने सम्बोधित करते हुए कहा कि ’’किसान और मजूदर मोदी सरकार को उखाड़ फेकेगा’’ क्योंकि अडानी और अम्बानी को फायदा देने के लिए बनाये गए कानूनों को सरकार रद्द नहीं करने जा रही है। 


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि किसानांे के समर्थन में आज भारत बंद पूर्णतया सफल है। पार्टी के जिला सह सचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि किसान विरोधी तत्वों को जनपद मंे किसानों की धान खरीद का नाटक दिखाई नहीं देता है, जबकि शहर में हजारों ट्रालियों पर लदा धान खड़ा है’ किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि धान खरीद को लेकर आन्दोलन चलाया जायेगा और इस सरकार की जुमलेबाजी की पोल खोला जायेगा। किसान सभा के जिला उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार ने कहा कि सरकार किसानों के जल, जंगल, जमीन अम्बानी और अडानी को बेच देना चाहते हैं।


छाया चैराहे से जलूस पुलिस लाइन चौराहा होते हुए सरकार  विरोधी गगन भेदी नारे लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक गया, जलूस गिरीश चन्द, पवन कुमार, रमेश कुमार, अमान गाजी, आशीष शुक्ला, मनोज कुमार, पवन वर्मा, संदीप तिवारी, महेन्द्र यादव, नैमिष सिंह, अंकित यादव, लव त्रिपाठी, आशीष वर्मा, भूपेन्द्र प्रताप सिंह, ज्ञानेश्वर वर्मा, अमर सिंह गुड्डू, राज कुमार, सहजराम वर्मा आदि प्रमुख किसान नेता थे अंत में राष्ट्रपति को सम्बोधित एक ज्ञापन जिला प्रशासन को दिया।