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प्रधानमंत्री मोदी जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों व रेल बीमा बैंकिंग आदि क्षेत्रों को बेच रहे हैं उसको पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह से स्थापित किया था उस सबंध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी के तत्कालीन जिला सचिव श्री सूर्य नारायण भट्ट  एडवोकेट ने विश्व वाणी अखबार में 1971   में यह एक लेख लिखा था –

 भारत सोवियत मैत्री
पारस्परिक हितों की समानता एवं  मानवीयता सुमधुर दृढ़ बंधनों से गठित मित्रता ही हमारे अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सुस्थिर एवं लाभप्रद आधार प्रदान करने की क्षमता रखती है। स्वार्थी शोषक प्रवृत्तियां सदैव ही ऐसे गठबंधनों के लिए विष सिद्ध हुई है और आगे भी सिद्ध होती रहेंगी भारत के साथ दूसरे देशों के संबंधों को भी हमें इसी कसौटी से जांचना होगा यदि हम सचमुच अपने देश की विदेश नीति को छुद्र व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठाकर जनसाधारण के हितों की की पोषक बनाना चाहते हैं इसमें संदेह नहीं है कि ताली दोनों हाथों से बजती है एक से नहीं और यदि एक भी पक्ष ने दूसरे पक्ष के हित से किसी भी समय टकराव खाने लगता है तो दोस्ती में भी और वह उपस्थित हो जाना स्वाभाविक है भले ही हमारी भावनाएं कितनी ही उस दिन दोस्ती को कायम रखने के लिए सचेत एवं लगाई थी जब तक विभिन्न देशों के मध्य स्वार्थों एवं शक्तियों का अभिमान है उनके यहां भी स्थाई रूप नहीं ले पाएंगे प्रतियोगिताओं को जागरुक दृष्टि से देखेंगे अपनी नीति से लाभान्वित ही नहीं होंगे सभी देशों से एवं आधार प्राप्त करने की ओर भी उनकी प्रगति होगी
                    भारत सोवियत मैत्री इस युग का बहुचर्चित विषय बन गई है स्वतंत्रता के बाद सोवियत संघ पहला देश है जिसने स्वयं ताका घोषणा के साथ-साथ कुछ उसके पूर्व की अगस्त 1947 में भारत को मान्यता प्रदान की थी भारत का उस समय व्यापार अंग्रेजी भाषा माध्यम से शिक्षा एवं ब्रिटेन के शासनकाल में अर्जित पाश्चात्य संस्कृति के दृष्टिकोण से ब्रिटेन से सर्वाधिक संबंधित था जनता की प्राप्ति और ब्रिटेन की आर्थिक गिरावट ने अमेरिका से उसके संबंधों के प्रसार की सर्वाधिक संभावनाएं उपस्थित कर दी थी हमारे पूरे प्रयास का प्रभाव हमें पश्चिमी राष्ट्रों राष्ट्रों की ओर अधिक खींच रहा था और पूंजीवादी व्यवस्था का चकाचौंध हमें किसी भी अन्य मार्ग को देख ने का अवसर ही नहीं दे रहा था देश में केवल मुट्ठी भर ऐसे व्यक्ति थे जो साम्राज्यवादी पश्चिम से अपने संबंधों में शोषण की दुर्गंध पाते थे और इनमें घटनाओं के बढ़ने का अनुभव कर रहे थे। समाजवादी देशों से भारत के संबंध अधिकाधिक बढ़ाने के पक्ष में थे किंतु उनकी आवाज उस समय नक्कारखाने में  सोवियत संघ ने स्वतंत्र भारत को मान्यता दी नेहरू सरकार ने इसका स्वागत किया क्या इसमें दोनों देशों का हित नहीं था सोवियत संघ ने भारत की जनता में उपनिवेशवाद की कड़ी टूटी देखी स्वतंत्र आर्थिक विकास के लिए जन आकांक्षाओं का उन्मुक्त बढ़ाओ देखा नवोदित देश में विदेशी और पूंजीपतियों का टकराव देखा और इन सबसे अधिक उसने साम्राज्यवादी भेद से जनता का अलगाव देखा प्रगतिशील भारत में अपनी जनता को आर्थिक स्तर पर मजबूत करने का अवसर देख रहा था वह इसमें साम्राज्यवादी आर्थिक शिकंजे को ढीला करने अथवा उसमें मुक्ति का मार्ग देख रहा था साम्राज्यवादी चाहते थे कि भारत राजनैतिक संता का प्रयोग करने के लिए ना करें समाजवादी देशों से अपने स्वतंत्र भारत में उनके पूंजीवादी शोषण के मार्ग जनसाधारण साम्यवाद और समाजवाद के व्यवहार में नहीं समझ पा रहा था

 समाजवाद का आधार शोषण भी आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था है उत्पादन के साधनों को जनता द्वारा जनहित में उपयोग है इसी में     निहित है उसकी मानवीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ता साम्राज्यवादी व्यवस्था का आधार शोषण है मुनाफा है मुट्ठी भर उद्योगपतियों के एकाधिकार में उत्पादन के साधनों को आदि का अधिक जमा करके निर्बाध आदि का अधिक मुनाफा प्राप्त करना है। साम्राज्यवादी देश भारत से अपना व्यापार बढ़ाना चाहते थे स्वतंत्रता के समय लगभग 66% भारत का व्यापार साम्राज्यवादी देशों से था जिसमें 10% के लगभग 10 तथा बाद में अमेरिका से हमारा व्यापार बढ़ गया किंतु यह व्यापार असंतुलित था भारत साम्राज्यवादी देशों का केवल कच्चा माल देता था और उनके मित्रों का बना माल स्वयं लेता था वे चाहते थे कि यही दशा सदैव बनी रहे इस निधि से ना केवल हमारा शोषण होता था वरना हम सदा सदा के लिए सैनिक दृष्टि से कमजोर बने रहने के लिए भी विवश है क्या कोई बेस बगैर अपने इस्पात उद्योग भारी मशीन उद्योग उद्योग तथा धातु उद्योग रसायन उद्योग बिजली उद्योग आदि निर्भरता की सीमा तक विकसित किए हुए अपनी क्षमता को और लंबी बना सकता है कदापि नहीं साम्राज्यवादी देश वह नहीं चाहते थे कि उनके उपनिवेश स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उनसे आर्थिक होल्ड करने लगे सुरक्षा की दृष्टि से स्वावलंबी बने पूछा जा सकता है कि क्या समाजवादी देश नवोदित देशों से आर्थिक और पसंद करेंगे क्या वह नवोदित देशों की सैनिक शक्ति को स्वावलंबी होने देना पसंद करते हैं समाजवादी व्यवस्था में आर्थिक हुड़का यह कहीं प्रश्न ही नहीं उठता है

 आर्थिक और तभी संभव है जब मुनाफा कमाने की छूट हो या मुनाफा कमाना आवश्यक हो समाजवादी नवोदित देशों की सहायता उनसे मुनाफा का नाम कमाने के लिए नहीं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए करते हैं यही उनकी साम्राज्यवादी व्यवस्था पर विजय है जितने नवोदित विकासशील देशों को आत्मनिर्भर बनाने में सफल हो जाएंगे उतने ही देश साम्राज्यवाद के शिकंजे से निकल जाएंगे और साम्राज्यवादी शोषण का अपने देश के हित के लिए सक्रिय विरोध करने की क्षमता प्राप्त कर लेंगे पर घटता है या साम्राज्यवादी खेमे को निर्बल बनाएगा जबकि समाजवादी देशों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा समाजवादी देश नवोदित देशों की आर्थिक उन्नति हमसे भयभीत नहीं होते हैं यदि वे अपने विकास का समाजवादी मार्ग अपना लेते हैं तो उनसे भी खाने जा सकता ही नहीं रह जाती उनका सहयोग परस्पर अधिक संगठित एवं लाभ पत्र बन जाता है यदि वे अपने विकास का स्वतंत्र पूंजीवादी मार्ग अपनाने हैं तो भीम साम्राज्यवादी देशों से निरंतर टकराव का रोड तथा पूंजीवादी से उत्पन्न आंतरिक समस्याएं उनके विकास की को पूरी गति से चलने में अवरोध उत्पन्न करेंगे और आर्थिक दृष्टि से ना वे आगे बढ़े साम्राज्यवादी देशों का स्तर ही प्राप्त कर सकेंगे और नहीं समाजवादी देशों से विकास में विरोध पूर्ण होने की स्थिति प्राप्त कर सकेंगे समाजवादी देशों में होड़ लेने की स्थिति में उनका अपनी स्व अर्जित सुरेंद्र ताऊ को आगे बढ़े साम्राज्यवादी देशों विशेष अमेरिका के सामने समर्पित कर देना पड़ेगा उनकी जनता की आकांक्षाओं के विरुद्ध होगा समाजवादी देश नवोदित देशों की सहायता केवल इसलिए करते हैं कि वह अपनी जनता की आकांक्षाओं को पहचाने जो साम्राज्यवादी व्यवस्था के अंतर्गत विकसित होने वाले एक अधिकारी पूंजीवाद से टकरा रही है सोवियत संघ की सहायता व सहयोग की परीक्षा इसी नीति के आधार पर की जा सकती है। आत्मनिर्भरता के लिए आर्थिक सहयोग
स्वतंत्रता के बाद भारत को यह देखने में देर नहीं लगी कि इस्पात उद्योग हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की हमारे स्वतंत्र औद्योगिक विकास की आधारशिला है द्वितीय पंचवर्षीय योजना से ही भारत में भारी उद्योगों विकास पर जोर देना प्रारंभ कर दिया था नेहरू सरकार ने अमेरिका व ब्रिटेन से अपने देश में सार्वजनिक क्षेत्रों में इस्पात का कारखाना लगाने की मांग की नवोदित देशों को ऐसा कर खाना देना वह ठीक नहीं समझते थे और उन्होंने इनकार कर दिया।देश भी इसके लिए नहीं तैयार थे वह भारत को अपने देश में बना दैनिक प्रयोग का सामान सिगरेट साबुन कपड़ा छोटी मशीनें दवाइयां आदि किसी भी मात्रा में देने को तैयार थे किंतु इस्पात का कारखाना भारी उद्योगों की भारी मशीनें तैयार करने का कारखाना देने को तैयार नहीं पर यह सहायता हमें स्वावलंबी बनाने की दिशा में नहीं थी अमेरिका ब्रिटेन तथा पश्चिमी जर्मनी ने भारत में इस्पात का कारखाना लगाने से इंकार कर दिया और सलाह दी कि भारत को अपनी पिछड़ी अर्थव्यवस्था के अनुकूल ही काम करना चाहिए उसे कृषि और कुटीर उद्योगों को बढ़ाना चाहिए इसके लिए हर प्रकार की सहायता भी देने को तैयार थे नेहरू सरकार ने विवश होकर सोवियत संघ से बात की और खुशी से इसके लिए राजी हो गया 2 फरवरी 1955 को दोनों देशों के मध्य भिलाई इस्पात के कारखाने के बनाने के बारे में समझौता हो गया मई 1956 में डाली गई 4 फरवरी 1959 को पहले पहल उसमें पिक कच्चा लोहा तैयार किया गया 12 अक्टूबर 1959 को पहले पहल इस्पात कारखाने में बनाया गया और नवंबर 1959 को सर्वप्रथम प्रथम बार रेलिंग इस्पात का बनाना प्रारंभ हुआ इस प्रकार साम्राज्यवादी देशों से विकास में अपने पिछड़े होने के विशाल अंतर को पूरा करने की और हमारा पहला कदम भिलाई का इस्पात का कारखाना था जो हमें सोवियत संघ के सहयोग से प्राप्त हुआ था। 16 से 1 दिसंबर 1956 को जब स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरु भिलाई के इस्पात कारखाने की वृद्धि देखने गए तो उन्होंने कहा कि जब मैं देश में भ्रमण करते हुए ऐसी योजना को देखता हूं तब तो भारत का भावी चित्र मेरे सामने आ जाता है और मैं प्रसन्न हो जाता हूं मैं स्वयं पूरे भारत का चित्र ना देख सकूंगा किंतु मैं उसकी प्रतिमूर्ति देख रहा हूं और उसी से प्रसन्न हो जाता हूं।

               आगे बोलते हुए उन्होंने कहा आप देखते हैं कि बहुत से रूसी प्लांट के निर्माण के लिए यहां आए हैं हमने इनको क्यों यहां बुलाया है साधारण उत्तर है कि हमने उनको उनसे कुछ सीखने के लिए बुलाया है इस काम का भली-भांति जानते हैं हमारे पास अच्छे इंजीनियर है पर भी अभी तक इस काम को अच्छी प्रकार नहीं जानते हैं अब भी सीख रहे इस काम के पूरा होने के बाद जब हम दूसरी इसी प्रकार का नया प्लांट लगाएंगे तब हमें या तो विदेशी सहायता की बिल्कुल आ सकता ना होगी या फिर बहुत कम सहायता की आवश्यकता होगी भविष्य में कुछ ही वर्षों में यदि हम कोई ऐसा कर खाना बनाने तो हमें कोई सामान अपने देश में तैयार करना चाहिए और हमारे इंजीनियरों को इस लायक होना चाहिए कि वह उसे स्वयं बगैर विदेशी सहायता के बना लें इन शब्दों से स्पष्ट है कि भारत आर्थिक दृष्टि से आज निर्भर होना चाहता था और आत्मनिर्भर बनने के लिए ही सोवियत संघ ने सहायता एवं सहयोग प्राप्त किया जो उसे साम्राज्यवादी देशों से नहीं प्राप्त हो सकता निर्माण के दौर में दिलाई कारखाने की क्षमता केवल 10 लाख टन रखी गई थी। 

(1)
सभ्यता के बारे में यह जाना-माना सच है कि दर्शन, अध्यात्म, धर्म, विज्ञान, कला, साहित्य, अध्ययन-मनन के अन्य विविध शास्त्र, स्वतंत्र अध्ययन-मनन आदि में गहरे डूबा व्यक्ति हमेशा कम बातें करता है. गांधी की अवधारणा लें तो राजनीति के बारे में भी यह सच माना जा सकता है. (भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इस मायने में भी शानदार था कि उसके विविध धाराओं में सक्रिय नेतृत्व ने हमेशा तौल कर बोलने का विवेक कायम रखा और बहस का एक स्तर एवं मर्यादा बनाए रखी.) इसके साथ जिस व्यक्ति का गहरा जीवनाभुव होता है, भले ही वह पारंगत विद्वान न हो, कम से कम बातें करने वाला होता है. कोई भी विषय अथवा संदर्भ हो, बात में सार और ईमानदारी होना जरूरी माना गया है. कह सकते हैं सार और ईमानदारी बात की आत्मा होते हैं. तभी भाषा में बात से ज्यादा अर्थ-व्यंजक शब्द शायद ही दूसरा कोई हो.
हालांकि, सभ्यता का सच यह भी है कि दुनिया में हर दौर में ज़बानी जमा-खर्च करने वालों की कमी नहीं रही है. बातें बनाना, बातें छोंकना, बातें चटकाना, बातों की खाना, बातों के बताशे फोड़ना, बातों से पेट भरना, बातों के पुल बनाना जैसी अनेक अभिव्यक्तियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं. ऐसे लोगों को नागर भाषा में वाचाल, लबार आदि और देहाती भाषा में बक्कू, बकवादी, बतोलेबाज़, बात फरोश, गप्पी, गड़ंकी,  गपोड़ी, लफ्फाज़, हांकने वाले, फेंकने वाले आदि कहा जाता है. इनके बारे में नागर और देहाती दोनों समाजों में कतिपय अश्लील अभिव्यक्तियां भी प्रचलित हैं. हर मामले में टांग अड़ाने की आदत के बावजूद, ऐसे लोगों को बात-चीत में गंभीरता से नहीं लिया जाता. सभ्यता ने अपने बचाव में यह पेशबंदी की हुई है.     
ज़बानी जमा-खर्च करने वाले लोगों में कोई कुदरती कमी नहीं होती. उनकी कमजोरी इंसानी ही होती है. विभिन्न (मल्टीप्ल) सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारणों के चलते ऐसे लोग खोखलेपन को ही सद्गुण (वर्च्यू) मान लेते हैं. आचार्य नरेंद्र देव ने संस्कृति को चित्त की खेती कहा है. चित्त की समुचित और सतत निराई-डसाई होती है, तो वह हरा-भरा रहता है. यानी संस्कृति फलती-फूलती है. ज़बानी जमा-खर्च करने वाले लोगों का समस्त जीवन-रस (इसेंस ऑफ़ लाइफ) जबान की प्यास बुझाने में ही खप जाता है, और चित्त की खेती सूखी रह जाती है. चित्त से असंबद्ध ज़बान कुछ भी बोलने के लिए हमेशा लपलपाती रहती है. वे सम्पूर्ण ‘निष्ठा’ के साथ ज़बानी जमा-खर्च में जुटे रहते हैं. ऐसे लोग प्रत्येक मौके को अनुष्ठान (इवेंट) बना देने में माहिर हो जाते हैं. क्योंकि अनुष्ठानवाद खोखलापन भरने का साधन बन जाता है. वे खुद से ही प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं कि जितना भारी-भरकम अनुष्ठान करेंगे उतना ही उनकी ‘महानता’ में चार चांद लगेंगे. इस तरह वे ‘महान सभ्यता’ और ‘महान संस्कृति’ की एक अपनी ही दुनिया रच लेते हैं. मनोवेत्ता यह शोध कर सकते हैं कि सभ्यता-विमर्श से बाहर रखे गए ऐसे लोगों का क्या यह सभ्यता से बदला होता है?    
आधुनिक युग के पूर्व तक केवल थोथी बातें करने वालों का सभ्यता-विमर्श के केंद्र में आना असंभव होता था. ‘थोथा चना बाजे घना’, ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ जैसी उक्तियों से पता चलता है कि समाज में ज्ञान के अधकचरेपन की पहचान का विवेक भी बराबर काम करता था. विद्वता उत्तराधिकार में या प्रचार से नहीं मिल सकती थी. यहां तक कि राजसत्ता के क्षेत्र में उत्तराधिकार के चलते कोई ‘बातों का बादशाह’ सत्ता के शीर्ष पर आ जाता था, तो जनमानस उसकी सनकों का शिकार होने के बावजूद उसे मन से स्वीकृति नहीं देता था. राजाओं के बारे में यह स्थिति थी, तो विद्वानों की कड़ी कसौटी के बारे में समझा जा सकता है.
(2)
आधुनिक युग में लोकतंत्र के चलते राजनीतिक सत्ता पर दावेदारी के साथ ज्ञान की सत्ता पर दावेदारी भी सार्वजनिक हुई. लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक सत्ता पर दावेदारी के संघर्ष में भाषण की कला का महत्व बढ़ गया. भाषण के साथ कुछ न कुछ अतिशयोक्ति जुड़ी रहती है. लेकिन कोरी लफ्फाजी ज्यादा देर नहीं चल पाती. सच्चे नेतृत्व की पहचान का आधार संयमित और सार्थक वक्तृता माना जाता है. अगर बात संयमित और सार्थक है, तो भाषण-कला कमजोर होने पर भी सच्चा नेतृत्व पहचान लिया जाता है. इस कसौटी के बावजूद असत्य, अंधविश्वास और घृणा परोसने वाले भाषणबाज़ भी लोकप्रिय होते  हैं. सार्वजनिक जीवन के किसी पड़ाव पर किसी नेता और उसके संगठन द्वारा फैलाए गए असत्य, अंधविश्वास और घृणा समाज में स्वीकृति पाते है, तो उसकी ज़िम्मेदारी अकेले उस नेता और संगठन की नहीं होती. असत्य, अंधविश्वास और घृणा का पेटेंट भले ही नेता और संगठन का अपना होता है, जिस समाज में असत्य, अंधविश्वास और घृणा स्वीकृति पाते है, वह समाज सबका साझा होता है. दूसरे शब्दों में, असत्य, अंधविश्वास और घृणा समाज में बड़े पैमाने पर तभी स्वीकृत होते हैं, जब सत्य, तर्क और प्रेम का दावेदार नेतृत्व (राजनीतिक और बौद्धिक दोनों) लंबे समय तक और बड़े पैमाने पर अपनी बातों में मिलावट अथवा धोखा करता रहा हो.
असत्य, अंधविश्वास और घृणा फ़ैलाने वाले नेता/संगठन की लोकप्रियता के पीछे तात्कालिक निहित स्वार्थों की भूमिका जरूर हो सकती है, लेकिन वह गौण भूमिका होती है. उदाहरण के लिए नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अचानक ‘उत्थान’ के पीछे निहित स्वार्थों, यानी अंबानी-अडानी की भूमिका गौण है; प्रमुख भूमिका उस प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की है, जिसने भारतीय संविधान का खुला उल्लंघन करते हुए मेहनतकश किंतु गरीब/लाचार जनता की छाती पर अंबानी-अडानी का साम्राज्य खड़ा किया. ध्यान दिया जा सकता है कि नई आर्थिक नीतियों के विरोध में उठ खड़े हुए देशव्यापी आंदोलन को विनष्ट करने में आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की भूमिका ज्यादा नहीं रही है; असली भूमिका प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की है.चर्चा को थोड़ा और बढ़ाएं तो देख सकते हैं कि आज़ादी के समय से ही भारतीय संविधान का विरोध लगातार आरएसएस/जनसंघ ने ही नहीं किया है, कम्युनिस्टों ने भी किया है. कम्युनिस्ट नेतृत्व के लिए आज भी भारतीय संविधान और उस पर आधारित बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र में हिस्सेदारी स्वाभाविक स्थति नहीं है. समाज को शिक्षित और जागरूक बनाने वाली शिक्षा के स्वरूप, माध्यम, ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) और उपलब्धता की व्यवस्था का काम आरएसएस/बीजेपी ने नहीं किया है. असमान और बहुपरती शिक्षा की व्यवस्था आरएसएस/बीजेपी की देन नहीं है. शिक्षा और शासन के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी थोपने का काम आरएसएस/बीजेपी का नहीं है. इस समय देश में बड़े पैमाने पर फैले निजी स्कूल/संस्थान/कॉलेज/यूनिवर्सिटी भी अकेले आरएसएस/बीजेपी की बदौलत नहीं स्थापित हुए हैं. आरएसएस/भाजपा शिक्षा का भगवाकरण करते हैं. धर्मनिरपेक्ष सरकार आने पर भगवाकरण के प्रयास निरस्त किए जा सकते हैं. शिक्षा का निजीकरण-व्यावसायीकरण (प्राइवेटाइजेशन-कमर्शियलाईजेशन) असली समस्या है. सैद्धांतिक और नीतिगत विषयों की यह सूची काफी लंबी हो सकती है. प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व ने सैद्धांतिक और नीतिगत मामलों के अलावा विभिन्न सरकारी संस्थाओं के संचालन संबंधी मामलों में भी निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाई है.
इस खेमे की फासीवाद-विरोध की आवाज़ खोखली साबित होती है, क्योंकि आरएसएस/भाजपा का हिंदू-राष्ट्र धर्मनिरपेक्षता के चोर-बाज़ार में ढलता है. हाल का उदाहरण लें तो देख सकते हैं कि आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली विधानसभा का चुनाव बीजेपी के मुकाबले नवउदारवाद और साम्प्रदायिकता का ‘सही’ अनुपात बैठा कर जीत लिया. प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे ने पूरी ताक़त लगा कर मुसलमानों के कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के हिस्से के वोट एकमुश्त आप के पक्ष में डलवा दिए. मुसलामानों को दंगे मिले और जेल के साथ कोर्ट-कचहरी के चक्कर. बार-बार जिस कपिल शर्मा को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगे भड़काने का मुख्य आरोपी बताया जाता है, वह पिछली विधानसभा में आप का विधायक था और चुनाव के ऐन पहले भाजपा में शामिल हुआ था. लेकिन एक भी धर्मनिरपेक्ष पत्रकार या एक्टिविस्ट इस सच्चाई का उल्लेख नहीं करता. कोरोना महामारी नहीं आती तो दिल्ली सरकार के सौजन्य से दिल्ली का वातावरण ‘सुंदर कांड’ के हवन-प्रवचन से ‘पवित्र’ हो रहा होता.                
आरएसएस 1925 से हिंदू-राष्ट्र के झूठ का पीछा कर रहा था, लेकिन भारत की जनता ने न स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में, न स्वतंत्रता मिलने के बाद उसका साथ दिया. देहात में शाखा लगने का कोई सवाल ही नहीं था. आरएसएस की राजनीतिक भुजा जनसंघ/भाजपा को राजनीतिक प्रक्रिया में संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों का पालन करना होता था. कम से कम भाजपा के वाजपेयी-युग तक यह स्थिति बनी हुई थी. आजकल तीव्र आशंका जताई जाती है कि मोदी संविधान बदल देंगे. यह हो सकता है कि इस पारी के अंत तक या अगली पारी की शुरुआत में मोदी संविधान से धर्मनिरपेक्षता शब्द हटा दें; यह कहते हुए कि हिंदू स्वभावत: धर्मनिरपेक्ष होता है; कि यह शब्द संविधान की प्रवेशिका में इंदिरा सरकार ने बाद में जोड़ा था. लेकिन इस शब्द के साथ भी मोदी की भाजपा देश को हिंदू-राष्ट्र की तर्ज़ पर चलाती रह सकती है. जैसे संविधान की प्रवेशिका में उल्लिखित समाजवाद शब्द और मूल चेतना (बेसिक स्पिरिट) में निहित समाजवादी विचारधारा के बावजूद 1991 में देश को पूंजीवाद के रास्ते पर डाल दिया गया था. इस फैसले के तहत जब देश के अधिसंख्य नागरिकों से बराबरी का अधिकार हमेशा के लिए छीन लिया गया, तो वे कोरे हिंदू और कोरे मुसलमान रह गए. कहने का आशय यह है कि संवैधानिक ‘समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र’ एक पूरा पैकेज है. एक की बलि देकर दूसरे को नहीं बचाया जा सकता. नरेंद्र मोदी की उग्र सांप्रदायिकता देश में चलने वाले उग्र और कुत्सित (शैबी) पूंजीवाद का उपोत्पाद (बाईप्रोडक्ट) है.   
बहरहाल, समाज में असत्य, अंधविश्वास और घृणा की अचानक प्रतिष्ठा का एक कारण मुकाबले में औसत दर्जे (मीडियोकर) या औसत दर्जे से नीचे (बिलो मीडियोकर) का नेतृत्व भी होता है. इस संदर्भ में भारत की वर्तमान स्थिति साफ़ है. यहां प्रतिस्पर्धा नवउदारवाद के समर्थकों के बीच है, जिनमें प्रछन्न नवउदारवादी भी शामिल हैं. नवउदारवाद का विरोधी नेतृत्व प्रतिस्पर्धा से बाहर रखा जाता है, क्योंकि वह प्रतिस्पर्धा की मूल शर्त (नवउदारवाद के दायरे में खेलना) को पूरा नहीं करता. नवउदारवादी दायरे में सक्रिय राजनीतिक और बौद्धिक प्रतिस्पर्धियों का बोदापन किसी से छिपा नहीं है. यह स्थति दर्शाती है कि दरपेश चुनौती के समक्ष भारत का राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व उत्तरोत्तर मीडियोकर होता गया है. इस दशा (प्रीडिकेमेंट) पर विस्तृत विवेचना के लिए किशन पटनायक की पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ देखी जा सकती है. दुनिया के स्तर पर भी इसके कुछ उदाहारण देखे जा सकते हैं. डोनाल्ड ट्रम्प (अमेरिका), पुतिन (रूस), एरदोगन (टर्की) आदि की लोकप्रियता के पीछे एक गौण कारण उनके मुकाबले में मीडियोकर नेतृत्व का होना भी है. अमेरिका में पिछली बार बर्नी सेंडर्स अपनी ही पार्टी में हिलेरी क्लिंटन से परास्त हो गए थे और इस बार जो बिडन से. हिटलर और मुसोलिनी के उत्थान के जटिल कारणों में एक यह भी था कि चर्चिल, स्टालिन और रूज़वेल्ट बड़े पाए के नेता नहीं थे. उनके मुकाबले गुलाम भारत के गांधी का कद कहीं ज्यादा ऊंचा था. बल्कि गांधी, जो मानवता के स्टेट्समैन थे, ने राजनीति में स्टेट्समैनशिप की अवधारणा ही बदल दी थी.        (3)
सार्वजनिक जीवन में असत्य, अंधविश्वास और घृणा के उछाल को कोई तात्कालिक घटना आधार प्रदान करती है. आइए इस बारे में थोड़ा विचार करें. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) काल में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नवसाम्राज्यवाद की जड़ें ज़माने का काम बिना बातें किए चुपचाप चल रहा था. कुछ मुखर नागरिक समाज एक्टिविस्ट्स नवउदारवाद की मार से बदहाल गरीब भारत के लिए कुछ रियायतें मांगने में सफल होते थे. उसे सुधारों को मानवीय चेहरा प्रदान करना कहा जाता था. उस दौर को भारत में नवसाम्राज्यवाद के अवतरण का चुप्पा-युग कह सकते हैं. उनके पहले अटलबिहारी वाजपेयी का दौर भी लगभग चुप्पा ही था. उनके शासनकाल में बिना संसद में बहस कराए एक के बाद एक अध्यादेशों के ज़रिए देश की संप्रभुता गिरवीं रखी जा रही थी. उस समय तक देश की संप्रभुता को गिरवीं रखने के खिलाफ एक प्रतिबद्ध आंदोलन सक्रिय था. देश के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग मुद्दों पर होने वाले उस आंदोलन का स्वरूप फुटकर था. संभावना जताई जा रही थी कि वह फुटकर आंदोलन जल्द ही राजनैतिक रूप से एकताबद्ध (इंटीग्रेटेड) होकर बढ़ते नवसाम्राज्यवादी शिकंजे को तोड़ कर देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता और स्वावलंबन को बहाल करेगा. वाजपेयी सरकार के अलोकतांत्रिक फैसलों पर कड़े सवाल उठाए जाते थे. सवाल उठाने पर वाजपेयी चेंक कर कहते थे, ‘कोई माई का लाल भारत को नहीं खरीद सकता!’ राष्ट्र-भक्ति और स्वदेशी की बढ़-चढ़ कर बात करने वाला आरएसएस अध्यादेशों के ज़रिए  लादी जाने वाली नवसाम्राज्यवादी गुलामी पर चुप्पी साध लेता था.
दरअसल, वाजपेयी 1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू किए जाने पर कह चुके थे कि कांग्रेस ने उनका (आरएसएस-भाजपा का) काम (पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू करना) हाथ में ले लिया है. ध्यान कर सकते हैं कि अन्यथा भाषण-प्रिय वाजपेयी की रुची उन दिनों अचानक भाषण के बजाय ‘चिंतन’ में बढ़ गई थी. देश के ज्यादातर बुद्धिजीवियों ने 1991 से ही चुप्पी साधी हुई थी. जैसा कि किशन पटनायक ने कहा है, भारत में अंग्रेजी बोलने-लिखने वाले ही बुद्धिजीवी होते हैं. ये बुद्धिजीवी आज तक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आज़ादी के संघर्ष और संविधान के मूल्यों का उल्लंघन कर देश नवसाम्राज्यवाद की गिरफ्त में आ चुका है, जिसका मूलभूत कारण 1991 में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियां हैं. तीन दशक बाद यह बताने की जरूरत नहीं कि 1991 में जिस भारत पर आर्थिक संकट बताया गया था, वह मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत सशक्त हुआ अमीर भारत था. वरना रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाली अधिकांश भारतीय जनता को विदेशी मुद्रा भण्डार घटने या बढ़ने से क्या फर्क पड़ने वाला था? सुधारों का मकसद और दिशा स्पष्ट थे : तब तक के अमीर भारत को आगे निगम भारत (कॉर्पोरेट इंडिया) में विकसित करना. कोरोना काल में सारी दुनिया देख चुकी है कि निगम भारत को बनाने और चलाने में जुटे गरीब भारत की क्या दुर्दशा हो चुकी है!    
नवसाम्राज्यवाद की अगवानी में समर्पित लंबे चुप्पा-युग के गर्भ से अचानक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में एक लबार-युग का विस्फोट होता है. देश की ख्यातनाम विभूतियां जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर आयोजित मजमे में भाषण करने के लिए बेताब हो उठतीं हैं. रातों-रात पूरे देश में जंतर-मंतर और रामलीला मैदान खड़े कर दिए जाते हैं. निगम भारत के नागरिक गण बच्चो-कच्चों को लेकर इंडिया गेट से क्नॉट प्लेस तक ‘प्रभात फेरी’ लगाते हैं. कारपोरेट घरानों के साथ आरएसएस आंदोलन का पूरा साथ देता है. मीडिया एकजुट होकर आंदोलन को हाथों-हाथ लेता है. देश में चौतरफा बातों की बाढ़ आ जाती है. बातें भी ऐसी-ऐसी जो न उठाई जाएं न धरी जाएं! आंदोलन की एक स्तंभ किरण बेदी ने अन्ना हजारे को बड़ा और अरविंद केजरीवाल को छोटा गांधी घोषित करते हुए ऐलान कर दिया कि बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर दो फ़कीर हैं, जो देश का भला करने निकले हैं. उत्तेजना और उतावलापन इतना अधिक था कि बात भ्रष्टाचार-विरोध तक सीमित न रह कर दूसरी-तीसरी क्रांति तक जा पहुंची. ‘क्रांति’ के लिए रातों-रात आम आदमी की नई पार्टी के गठन की घोषणा हो गई. देश का प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष तबका पार्टी और उसके नेता के साथ एकजुट हो गया और आम आदमी के नाम पर धड़ाधड़ जबान साफ़ करने लगा. एक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार ने कहा, ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख से आम आदमी पार्टी पैदा हुई है; अब पीछे मुड़ कर नहीं देखना है’. बातों का ऐसा बाज़ार सजा कि गांधी के आखिरी आदमी को ‘गायब’ कर, निगम भारत के देश-विदेश में फैले प्रोफेशनलों/अधिकारियों/व्यापारियों को आम आदमी के रूप में स्थापित कर दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में ईमानदारी और सादगी के ठेकेदारों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेईमान के रूप में बदनाम करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी. जबकि उनके जैसा ईमानदार और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाला प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के अलावा अन्य कोई नहीं हुआ. मनमोहन सिंह ईमानदार नई आर्थिक नीतियों को लेकर भी थे. उन्होंने कभी यह मिथ्या प्रचार नहीं किया कि वे किसान/मजदूरों/बेरोजगारों के लिए अच्छे दिन लाने वाले हैं. उन्होंने चुनौती खुली रखी – देश को आर्थिक संकट से बचाने के लिए किसी के पास नई आर्थिक नीतियों से अलग कोई विकल्प हो तो बताएं.       
आंदोलन के प्रथम पुरुष ने गुजरात मॉडल के प्रणेता नरेंद्र मोदी की खास तौर पर प्रशंसा की. विनम्र मोदी ने ख़त लिख कर आभार जताया, और दुश्मनों से सावधान रहने की हिदायत दी. नरेंद्र मोदी पहले से बातों के बादशाह थे, लेकिन गुजरात में ही छटपटा कर रह जा रहे थे. राष्ट्रीय स्तर पर बातों की बिसात बिछ गई तो उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था. क्योंकि उनके फेंकना शुरू करने से पहले माहौल और मैदान तैयार हो चुका था. (भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन द्वारा निर्मित आधार नहीं मिलता तो हो सकता है नरेंद्र मोदी अंतत: गुजरात में ही छटपटा कर दम तोड़ देते, और देश के अगले प्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी या तीसरी शक्ति का कोई नेता होता.) मोदी ने खुद को कारपोरेट घरानों के हवाले करके पार्टी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के अखाड़े में अडवाणी को शिकस्त दी और तैयार मैदान में आ डटे. सुधारों के मानवीय चेहरे की बात करने वाली कांग्रेस आगे के लिए कारपोरेट के काम की नहीं रह गई थी. उधर कारपोरेट केजरीवाल को भी टिटकारी दिए हुए था. प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमें की हालत देखिए, एक तत्काल बनाई गई पार्टी के नेता को मोदी की काट बता कर पेश किया जाने लगा. वे जनता को बताने लगे कि मोदी के मुकाबले केजरीवाल की रेटिंग विदेशों में भी ऊपर चल रही है! केजरीवाल ने प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमें की मदद से बनारस में मोदी को दोहरी जीत का तोहफा भेंट कर ‘छोटे मोदी’ का खिताब झटक लिया.   
यह थोड़ा ब्यौरा इसलिए दिया गया है ताकि जान लें कि मोदी के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले सत्य, तर्क और प्रेम का दावेदार प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमा कितनी ‘सच्ची’ और ‘तार्किक’ बातें कर रहा था. उनमें से आज तक एक ने भी खेद का एक वाक्य नहीं कहा है. इसके दो ही कारण सकते हैं : या तो ये लोग समझते हैं जनता उनके धोखे को नहीं पकड़ सकती; या परम ज्ञानी होने के नाते जनता के साथ धोखा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं. तब से अब तक गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है, मोदी बात-बात पर बातों का बाज़ार सजाते हैं. उनका विरोधी खेमा कभी उपहास उड़ाता है, कभी कटाक्ष करता है, कभी चुटकुले बनाता है, कभी नारे बनाता है, कभी कार्टून बनाता है, कभी धिक्कारता है. मोदी के लोकतंत्र विरोधी फासीवादी हथकंडों पर लेख लिखता है. इस जुगलबंदी में निगम भारत के निर्माण की गति तेज़ होती जाती है.     
(4)
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की समीक्षा के दौरान मैंने लिखा था कि स्वतंत्रता संघर्ष के नेताओं की लिखतें (राइटिंग्स) सामने नहीं होती, तो आने वाली पीढ़ियां यही समझतीं कि देश के संसाधनों और श्रम को कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेच कर बातें बनाते जाना ही नेता का सबसे बड़ा काम होता है! कोरोना महामारी एक अवसर हो सकता था कि बातों की बीमारी से बाहर आया जाए. लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असत्य, अंधविश्वास और घृणा आगे और महामारी पीछे चल रही है. 6 महीने बीत जाने के बाद भी देश में कोरोना महामारी से जुड़े समस्त पहलुओं को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हैं. महामारी के बीच लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ सीमा-विवाद हो गया. झड़प में भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए. राजनीति की मोदी-शैली के तहत सीमा-विवाद और सैनिकों की शहादत भाषण का मौका बन गए.
मौजूदा सत्ता-प्रतिष्ठान यह प्रवृत्ति (ट्रेंड) जारी रखना चाहेगा, ताकि उसकी सत्ता और यह अन्यायपूर्ण व्यवस्था चलती रहे. इतिहास की गवाही के मुताबिक असत्य, अंधविश्वास और घृणा पर टिकी व्यवस्था देर-सवेर धराशायी होती है. ऐसा जल्दी भी हो सकता है, बशर्ते मोदी-विरोधी खेमे की तरफ से कम बातें की जाएं. यह कोई आसान काम नहीं है. कम बातें होंगी तो प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व यह समझ पाएगा कि संवैधानिक मूल्य उसका प्राथमिक सरोकार नहीं हैं. उसका प्राथमिक सरोकार अपने प्रति है. उसने फासीवाद-विरोध की अपनी एक दुनिया रच ली है, जिसे बचाने के उद्यम में वह लगा रहता है. इस दुनिया में वह आश्वस्त रहता है कि वह कभी गलत नहीं हो सकता. एक तरफ मोदी की दुनिया है, दूसरी तरफ इनकी दुनिया है. इन दो दुनियाओं की टकराहट में निगम भारत की ताकत बनती जाती है. आज मोदी का पलड़ा भारी है, तो  निगम भारत में असत्य, अंधविश्वास और घृणा का पलड़ा भारी है. कल संविधान का पलड़ा भारी होगा, तो भारत में सत्य, तर्क और प्रेम का पलड़ा भारी हो जाएगा. आरएसएस/भाजपा की भी एक भूमिका हो सकती है. अगर वहां कुछ ऐसे लोग हैं, जो इस स्थिति को समाज और देश के लिए सही नहीं मानते, वे अपनी बात कहना शुरू करें.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

रेणु चक्रवर्ती एक असाधारण
कम्युनिस्ट नेता, संगठनकर्ता और भाकपा की सांसद थीं।

उन्होंने कम्युनिस्ट और महिला आंदोलनों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
उनका जन्म 21 अक्टूबर
1917 को कलकत्ता में हुआ था।
उनका परिवार ब्राह्मो परंपरा में पला हुआ था। पिता का नाम साधनचंद्र राय और माता का ब्रह्मकुमारी था।
रेणु उनकी एकमात्र संतान थी।
प्रकाशचंद्र राय और अघोर कामिनी देवी उनके दादा-दादी थे। वे सभी काफी संभ्रात और शिक्षित थे। रेणु के पति सुप्रसिद्ध ( कम्युनिस्ट पत्रकार निखिल चक्रवर्ती थे। सुमित उनके एकमात्र पुत्र जानी-मानी अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिक ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक हैं।
इंगलैंड में कम्युनिस्ट बनना
रेणु दी गीत-संगीत में भी निपुण थीं। उन्होंने कलकत्ता के लॉरेटो  कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ाई की जिसमें
‘डिस्टिन्क्शन’ मिला। फिर वे
विक्टोरिया कॉलेज में भर्ती हो गईं।
इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें
इंगलैंड भेज दिया गया। उन्होंने
कैम्ब्रिज के न्यूनहैम, कॉलेज में
दाखिला लिया।
कैम्ब्रिज में वे 1937 से 1939
तक पढ़ी और उन्हें अंग्रेजी साहित्य
में ‘टाइपॉस’ की डिग्री मिली। इंगलैंड
में वे प्रसि( कम्युनिस्ट रजनी पामदत्त
;आर.पी.डी.द्ध के संपर्क में आईं। इसके
अलावा वे वहां रह रहे कई भारतीय
कम्युनिस्टों से भी मिलीे। रेणु दी ब्रिटिश
कम्युनिस्ट पार्टी में काम करने लगीं।
इंगलैंड में निवास के दौरान रेणु
रॉय को कई देश घूमने का मौका
मिला। उन्हें बर्लिन के ‘उन्टेर डेर
लिन्टेन’ ;वहां का प्रमुख राजमार्गद्ध पर
नाजी युवा सैनिकों द्वारा ‘गूज-स्टेप’
;मार्चद्ध करते हुए अपनी आंखों से देखने
को मिला। उन्होंने नाजी जर्मनी द्वारा
ऑस्ट्रिया पर हमला करते हुए देखा
जहां वे कुछ ही महीने पहले गई थीं।
इस संदर्भ में उन्हें मिमि शेन्केल की
याद आई जो सुभाषचंद्र बोस की
सचिव और भावी पत्नी थीं। इसी वक्त
चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण और
सुडेटेनलैंड पर कब्जे की घटनाएं
घटीं। इन घटनाओं से उनके मन में
फासिज्म के प्रति घृणा पैदा हो गई। वे
हिटलर द्वारा महिलाओं के लिए दिए
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-15
रेणु चक्रवर्तीः असाधारण कम्युनिस्ट, महिला नेत्री
गए ‘किन्डर, किर्शे, कुएशे’ के नारे
से भी घृणा करने लगीं अर्थात महिलाएं
बच्चा पैदा करें, रसोई घर में रहें
ओर केवल चर्च जाएं।
रेणु रॉय को प्रसि( मार्क्सवादी
सि(ांतकार जॉन स्टैªची का
समाजवाद तथा अन्य विषयों पर
व्याख्या सुनने का भी अवसर मिला।
रेणु दी ‘फेडिन्ड’ ;फेडरेशन ऑफ
इंडियन स्टूडेंट्स सोसायटीज इन
इंगलैंड एंड आयरलैंडद्ध की संस्थापक
महासचिव भी थीं। उन्होंने 1938 में
अमेरिका में आयोजित विश्व युवा
कांग्रेस में भी हिस्सा लिया। प्रो. हीरेन
मुखर्जी कहते हैं कि उन्होंने पहली
बार रेणु रॉय के बारे में कैम्ब्रिज में
1939 में सुना। उस समय वे विश्व
विद्यार्थी सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप
में गई थीं। उस समय नारा थाः
‘‘केवल लाल झंडा, दूसरा कोई
नहीं।’’
भारत में आंदोलन में शामिल
रेण चक्रवर्ती लिखती हैंः ‘‘जब मैं
भारत लौटीं तो देश की आजादी की
लड़ाई में भाग लेने की संभावना से
खूब उत्साहित हो गई।’’ उन्होंने
कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1940
से 1947 तक अंग्रेजी साहित्य में
लेक्चरर के पद पर काम किया। साथ
ही वे पार्टी और जन कार्यों में भी
सक्रिय हिस्सा लेती रहीं।
1940 के आरंभ में रेणु रॉय ने
दिल्ली में संपन्न ए.आई.एस.एफ.
सम्मेलन में भाग लिया। बंगाल में
गर्ल स्टूडेंट्स कमिटि का गठन किया
गया जिसे संगठित करने में रेणु रॉय,
कनक दासगुप्ता तथा अन्य ने सक्रिय
भाग लिया। 1940 में लखनऊ में
महिला विद्यार्थियों का अखिल भारतीय
सम्मेलन आयोजित किया गया। इसकी
अध्यक्षता रेणु रॉय ने कीं। एक गर्ल
स्टूडेंट्स ऐसोसिएशन का गठन किया
गया। इस प्रकार युवा महिला
विद्यार्थियों ने महिला आंदोलन की नींव
रखी।
रेणु रॉय की मुलाकात इंगलैंड में
निखिल चक्रवर्ती से हुईऋ उनका विवाह
भारत लौटकर 3 जनवरी 1942
को संपन्न हुआ।
यु(, अकाल और महिला
आत्मरक्षा समिति
रेणु रॉय ने द्वितीय विश्वयु( के
दौरान बर्मा के सीमावर्ती इलाकों में
ब्रिटिश और अमरीकी सैनिकों द्वारा
महिलाओं पर ढाए जा रहे अत्याचारों
के खिलाफ वाइसरॉय को दिए जाने
वाले मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर इकट्ठा
किए। अंग्रेज प्रशासन सीमा-स्थित
गांवों को ढहा दे रहा था। इसके
खिलाफ रेणु तथा अन्य ने जोरदार
अभियान चलाया। साथ ही बढ़ती
जापानी सेनाओं से आत्मरक्षा की
तैयारियां कीं। इसके अलावा अकाल
की स्थितियां भी पैदा हो रही थीं।
महिला आत्म-रक्षा समिति का
जन्म इन्हीं परिस्थितियों मंे महिलाओं
के व्यापक जनसंगठन के रूप में हुआ।
जापानी फासिस्टों ने 20 दिसंबर
1942 को कलकत्ता पर बमबारी
आरंभ कर दी थी। बमबारी बाद के
दिनों में बढ़ती गई और कई अन्य
शहर इसके चपेट में आ गए, जैसे
विशाखापट्नम, चटगांव इत्यादि।
इसके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर लोगों
का पलायन होने लगा जिसमें
महिलाओं और बच्चों को विशेष कष्ट
होने लगा। रेणु दी तथा महिला समिति
की अनय महिला नेताओं ने
जगह-जगह रिलीफ और मदद के
लिए दौड़ लगाई।
अप्रैल 1942 में रेणु चक्रवर्ती
तथा अन्य नेत्रियों ने आपसी
विचार-विमर्श कर महिला समिति
निर्मित करने के लिए एक संगठन
समित गठित की। इला रीड को
संगठन सचिव बनाया गया। रेणु
चक्रवर्ती, मणिकंुतला सेन, इला रीड
तथा अन्य नेत्रियों ने एक प्रभावशाली
संगठन बना लिया जो समूचे प्रदेश मे
फेल गया। हजारों महिलाएं सदस्य
बन गई।
साथ ही नारी सेवा संघ का भी
गठन किया गया। इसने अत्यंत ही
गरीब महिलाओं के पुनर्वासित किया।
रेणु दी की माता ब्रह्म कुमारी रॉय
इसके कंेद्र में थीं। वे ऑल इंडिया
वीमेन्स कॉन्फ्रेंस ;ए.आई.डब्ल्यू.सी.द्ध
मेंभी सक्रिय थीं। निखिल चक्रवर्ती की
माता शैलजा चक्रवर्ती भी महिला
पुनर्जारण के काम में सक्रिय थीं।
कलकत्ता महिला आत्मरक्षा
समिति का प्रथम सम्मेलन 27-28
अप्रैल 1943 को आयोजित किया
गया। इसमें रेणु चक्रवर्ती का भाषण
भी हुआ। इस महिला समिति का प्रथम
प्रादेशिक सम्मेलन 8 मई 1943
को कलकत्ता में संपन्न हुआ। इसका
बड़ा ही जीवंत वर्णन रेणु दी ने किया
है
महिला समिति ने 5000
महिलाओं का जुलूस असेम्बली
बिल्डिंग के सामने निकला। वे
अकाल-राहत की मांग कर रही थीं।
रेणु चक्रवर्ती ने नागरिक प्रतिरक्षा,
फर्स्ट एड केंद्र और राहत किचन
गठित करने का काम किया।
मणिकुंतला सेन ने अपने संस्मण
‘शेदिनेर कथा’ ; उन दिनों के बारे मेंद्ध
में लिखा हैः ‘‘कार्यकर्ताओं की बैठक
बुलाने का निर्णय किया गया….मैंने
वक्ता की ओर देखा….वह अभी-अभी
इस उम्र में इंगलैंड से लौटी थी!……
.मुझे उसका नाम का पता लगा -रेणु।
वह सुप्रसि( डॉ. बिधानचंद्र रॉय की
भतीजी थी……ऐसे परिवारों के
लड़के-लड़कियां भी पार्टी में शामिल
हो रहे थे। मैं बड़ी खुश हुई। यह वही
रेणु थी जो मेरे राजनैतिक जीवन में
मेरी नजदीकी कार्यकर्ता, सहयोगी,
मित्र और सहायक बनी, पार्टी और
बाहर की दुनिया में जानी-मानी रेणु
चक्रवर्ती।’’
रेणु चक्रवर्ती ने ‘छात्री संघ’
;लड़कियों का विद्यार्थी संगठनद्ध के
1940 के सम्मेलन की अध्यक्षता
की। इसमें सरोजिनी नायडू मुख्य
अतिथि थीं।
रेणु चक्रवर्ती ने 1946-47 के
दंगों के दौरान नोआखाली तथा अन्य
जगहों मंे सक्रिय कार्य किया। वे
लिखती हैंः मेरा छोटा बच्चा मात्र एक
साल का था ;सुमित-लेखकद्ध।
हालांकि उसे छोड़ने में दिल कट रहा
था, नोआखाली की पीड़ित बहनों की
आवाजें मुझे घर बैठने नहीं दे रही
थी।’’
एन.एफ.आई.डब्ल्यू का संगठन
रेणु चक्रवर्ती ए.आई.डब्ल्यू.सी.
की कार्यकारिणी की सदस्य थीं। कई
अन्य कम्युनिस्ट और वामपंथी
महिलाएं भी इस संगठन मे सक्रिय
थींऋ लेकिन धीरे-धीरे संगठन में
राजनैतिक-वैचारिक मतभेद उभर
आए।
वीमेन्स इंटरनेशनल डेमोक्रटिक
फेडरेशन ;डब्ल्यू.आई.डी.एफ.द्ध का
संस्थापना कांग्रेस पैरिस में
नवंबर-दिसंबर 1945 में आयोजित
की गई। महिला आत्मरक्षा समिति
इससे संब( हो गई। डब्ल्यू.आई.डी.
एफ. जून 1953 में कोपनहेगन में
होने वाले विश्व महिला सम्मेलन के
लिए भारत की महिलाओं को भी
आमंत्रित किया। यह आमंत्रण विदेश
अनिल राजिमवाले
रेणु चक्रवर्ती
रेणु चक्रवर्तीः असाधारण कम्युनिस्ट…
से भारत लौटते हुए रेणु चक्रवर्ती लाई थीं। उनसे अनुरोध किया गया था कि
वे वीमेन्स इंटरनेशनल का प्रचार करें। साथ ही वे विश्व सम्मेलन के लिए
भारत से 30 महिलाओं का प्रतिनिधिमंडल गठित करें।
रेणु चक्रवर्ती ने 10 मार्च 1953 को दिल्ली मे एक बैठक में भाग लिया
जिसमें इन प्रस्तावों पर विचार किया गया। डब्ल्यू.आई.डी.एफ. की अपील
पर रेणु चक्रवर्ती, अरूणा आसफ अली तथा 12 राज्यों के प्रतिनिधियों ने
हस्ताक्षर किए। नई दिल्ली के बंगाली मार्केट में तैयारी समिति का कार्यालय
खेाला गया। राष्ट्रीय तैयारी सम्मेलन 9 मई 1953 को दिल्ली में संपन्न
हुआ। इसमें ही अखिल भारतीय महिला सम्मेलन आयोजित करने के लिए
एक राष्ट्रीय समन्वय समिति का गठन किया गया।
रेणु चक्रवर्ती एन.एफ.आई.डब्ल्यू. के प्रथम सम्मेलन संबंधी अपने संस्मरण
;एन.एफ.आई.डब्ल्यू स्मारिका, 1974, अंग्रेजी मेंद्ध मंे लिखती हैं कि समन्वय
समिति जुलाई 1953 से जून 1954 तक सक्रिय रही।
एन.एफ.आई.डब्ल्यू. का संस्थापना सम्मेलन 4 जून 1954 को आरंभ
हुआ। इसमें एन.एफ.आई.डब्ल्यू. की स्थापना की गई। रेणु चक्रवर्ती संगठन
की उपाध्यक्ष बनाई गई। उन्होंने ही इसका संविधान भी तैयार किया था। एन.
एफ.आई.डब्ल्यू. के 1962 के सम्मेलन में उनहें संगठन का महासचिव
बनाया गया। इस पद पर वे 1970 तक बनी रहीं।
संसद में रेणु चक्रवर्ती 1948-51 के पार्टी में संकीर्णतावादी दौर में
गुप्त रूप से काम करती रही। अपनी लाईन बदलते हुए पार्टी ने 1952 के
आम चुनावों मंे हिस्सा लेने का फैसला लिया। उन्हें पार्टी की ओर से
बशीरहाट क्षेत्र से लोकसभा के लिए खड़ा किया गया। लोकसभा का यह
चुनाव वे जीत गईं। लोकसभा में वे बंगाल से एकमात्र महिला सदस्य थीं। वे
दूसरे और तीसरे आम चुनावों में भी लोकसभा सीट के लिए चुनी गईं
1962 के चुनावों मे उन्हें पूरे देश में लोकसभा चुनावों में सबसे अधिक वोट
मिले। उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र की जनता की अनदेखी कभी नहीं की।
इसलिए आम आदिवासी और सामान्य जनता उन्हें बहुत चाहती थी।
ससंद मे उस दौर में एक दिलचस्प घटना घटी। लोकसभा मे किसी
सामान्य-से विषय पर तीखी बहस और तनातनी हो गई। इससे प्रधानमंत्री
नेहरू बड़े ही विचलित हो गए। उन्हें औरों का व्यवहार तो समझ मंे आ रहा था
लेकिन कम्युनिस्ट सदस्य एक छोटी-सी बात पर इतने नाराज क्यों हो गए,
यह समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने एक नोट भेजकर रेणु चक्रवर्ती को बुला
भेजा। वे उस वक्त लोकसभा में कम्युनिस्ट ग्रुप की उपनेता थीं। रेणु दी ने कहा
कि ऐसा स्पीकर के अड़ियलपन और रूखेपन के चलते हुआ। फिर विषय
बदलने के लिए रेणु दी ने कमरे में लगे नेहरूजी की तस्वीर की प्रशंसा की।
मुलाकात खत्म होने पर नेहरू ने फोटो पर हस्ताक्षर करके रेणु चक्रवर्ती को
भेज दिया और साथ ही बहस पर एक नोट भी!
रेणु चक्रवर्ती 1969 मे बंगाल कांग्रेस के अजय मुखर्जी के नेतृत्व में
बनी दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार में सहकारी मामलों की मंत्री भी बनीं।
पार्टी नेतृत्व में
रेणु चक्रवर्ती भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 1958 में संपन्न अमृतसर
पार्टी कांग्रेस में राष्ट्रीय परिषद में चुनी गईं। 1962 में हुए चीनी आक्रमण की
उन्होंने दो-टूक शब्दों में निंदा की। पार्टी में विभाजन के बाद उन्हें सेंटल
कंट्रोल कमिशन का सदस्य बनाया गया। वे जमशेदपुर तथा अन्य स्थानों में
चल रहे मजदूर आंदोलन में भी सक्रिय थीं। इस सिलसिले में उन्हें जेल की
सजा भी भुगतनी पड़ी।
उनकी पुस्तक ‘कम्युनिस्ट इन इंडियन वीमेन्स मूवमेंट’ ;भारतीय महिला
आंदोलन में कम्युनिस्टद्ध 1940 से 50 के महिला आंदोलन के इतिहास
संबंधी अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है। इसके लिए उन्होंने काफी शोधकार्य किया
और शोध-सामग्री जुटाई।
1970 के बाद पुरानी हृदय की बीमारी से उनका स्वास्थ्य खराब रहने
लगा। उनका ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ हुआ, फिर भी वे सक्रिय रूप से बनी रहीं।
लेकिन बाद में उन्हें ‘ब्रेन हेमोरेज’ ;मस्तिष्क स्रावद्ध हो गया।
उनका देहान्त 16 अप्रैल 1994 को हो गया।
-अनिल राजिमवाले

गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर गहरा दुख और रोष जताते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राज्य सरकार से ज़िम्मेदारी लेने और मुख्यमंत्री के त्यागपत्र की मांग की है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा “ मुख्यमंत्री ने संज्ञान लिया है, कड़ी कार्यवाही के निर्देश दे दिये गये हैं, मुआबजे की घोषणा कर दी गयी है, फलां- फलां को सस्पेंड या तबादला कर दिया गया है, मार दो, ठोक दो “ मुख्यमंत्री द्वारा तीन साल से रोज ब रोज की जा रही घोषणाओं के प्रसारण से उत्तर प्रदेश की जनता तंग आ चुकी है। जनता परिणाम चाहती है और उत्तर प्रदेश सरकार परिणाम दे नहीं पा रही है।म्रतक पत्रकार पुलिस को लगातार लिखित शिकायतें कर रहे थे, पर पुलिस अकर्मण्यता और अहमन्यता से ग्रसित थी। परिणाम स्वरूप पत्रकार पर जान लेवा हमला हो गया और उनकी दुखद मौत होगयी। हमले से लेकर मौत तक मुख्यमंत्री ने कोई संज्ञान नहीं लिया। पत्रकार का परिवार अनाथ होगया तो अब बड़ी बड़ी घोषणाएँ की जारही हैं। “ इन घोषणाओं को अपने पास रख लीजिये और विक्रम जोशी के परिवार को विक्रम जोशी लौटा दीजिये सम्मानित मुख्यमंत्री जी! “ भाकपा ने आक्रोश के साथ सवाल खड़ा किया है।भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा- उत्तर प्रदेश में जंगल राज है। सरकार संरक्षित अपराधी हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं, महिलाओं से बलात्कार और उनकी हत्याएं हो रही हैं, ठगी, लूट, छिनेती, अपहरण/ फिरौती और चोरियाँ आदि सरे आम जारी हैं। आपके खोखले दाबों  के बीच कोरोना के मरीज फुटपाथों पर दम तोड़ रहे हैं, अवसाद में लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं आदि आदि।पुलिस आम लोगों के प्रति क्रूर बनी हुयी है। लोगों को पीट रही है, जुर्माने बसूल रही है तथा झूठे मुकदमे दर्ज कर जेल पहुंचा रही है। आम आदमी की शिकायतों पर अमल नहीं किया जाता, जिसका दुष्परिणाम सभी के सामने है। रिश्वतख़ोरी और भ्रष्टाचार सातवें आसमान पर है। फर्जी एंकाउंटरों के जरिये सरकार और पुलिस अपनी ध्वस्त छवि को बचाने में जुटी है। पर जनता की रक्षा एंकाउंटर्स से नहीं होती, उसे सुरक्षा चाहिये, न्याय चाहिये।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डॉ गिरीश ने मांग की है कि पत्रकार के परिवार को बिकरू कांड में शहीद पुलिसकर्मियों के समकक्ष पावनायें दी जायें। हत्यारों को एनएसए में निरुध्द किया जाये तथा प्रदेश के सभी नाग रिकों के जानमाल की सुरक्षा की जाये। जिम्मेदार अफसरों को दंडित किया जाये तथा व्याप्त अराजकता की सरकार ज़िम्मेदारी ले और  योगी तुरंत त्यागपत्र दे।

हम, विश्व प्रसिद्ध तेलुगु क्रांतिकारी कवि और सार्वजनिक बौद्धिक, वरवरा राव के परिवार के सदस्य, जो नवी मुंबई के तलोजा जेल में कैद हैं, अपने बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। उनकी स्वास्थ्य की स्थिति छह सप्ताह से अधिक समय से डरावनी है, जब से उन्हें 28 मई, 2020 को तलोजा जेल से जेजे अस्पताल में अचेत अवस्था में स्थानांतरित किया गया था। यहां तक ​​कि उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी और तीन दिन बाद वापस जेल भेज दिया गया था, उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ है और उन्हें अभी भी आपातकालीन  हेल्थकेयर  की जरूरत है।

अब चिंता का तात्कालिक कारण यह है कि शनिवार शाम को हमें उनके द्वारा प्राप्त नियमित फोन कॉल पर हम बहुत हैरान हैं। हालाँकि 24 जून और 2 जुलाई को पहले की दो कॉल भी उनकी कमजोर और गूँजती आवाज़, असंगत भाषण और अचानक हिंदी में कूदने से चिंतित थीं। पांच दशकों से तेलुगु में एक वाकपटु और मुखर सार्वजनिक वक्ता और लेखक के रूप में, चार दशकों तक एक तेलुगु शिक्षक और उनकी सुरीली स्मृति के लिए जाना जाता है, यह अड़चन, असंगति और स्मृति की हानि अपने आप में अजीब और भयावह थी।

लेकिन नवीनतम कॉल, 11 जुलाई को और अधिक चिंताजनक है क्योंकि उन्होंने अपने स्वास्थ्य पर सीधे सवालों के जवाब नहीं दिए और अपने पिता और मां के अंतिम संस्कार के बारे में एक तरह की भ्रमपूर्ण और मतिभ्रम वाली बात की, जो सात दशक और चार दशक बाद हुई थी पहले क्रमशः। तब उनके सह-आरोपी साथी ने उनसे फोन लिया और हमें सूचित किया कि वह चलने में सक्षम नहीं है, शौचालय जाएं और अपने दांतों को खुद से ब्रश करें। हमें यह भी बताया गया कि वह हमेशा मतिभ्रम कर रहा है कि हम, परिवार के सदस्य, जेल गेट पर उसे रिहा करने के लिए इंतजार कर रहे थे। उनके सह-कैदी ने भी कहा कि उन्हें न केवल शारीरिक बल्कि तंत्रिका संबंधी मुद्दों के लिए तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है। भ्रम, याददाश्त में कमी और असंगति इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और सोडियम और पोटेशियम के स्तर में गिरावट के परिणाम हैं जो मस्तिष्क क्षति पहुंचाते हैं। यह इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन घातक भी हो सकता है। तलोजा जेल अस्पताल इस तरह की गंभीर बीमारी से निपटने के लिए या तो चिकित्सा विशेषज्ञता या उपकरण से लैस नहीं है। इस प्रकार यह अत्यधिक आवश्यक है कि वह इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के कारण अपने जीवन को बचाने और संभावित मस्तिष्क क्षति और जीवन के लिए जोखिम को रोकने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में स्थानांतरित हो जाए।

वर्तमान समय में हम सभी तथ्यों को छोड़ रहे हैं, जैसे कि उनके खिलाफ मामला गढ़ा गया है; उसे 22 महीने जेल में बिताने पड़े, एक प्रक्रिया के रूप में सजा में बदल गया; उनकी जमानत याचिकाओं को अब कम से कम पांच बार खारिज कर दिया गया और यहां तक ​​कि उनकी उम्र, बीमार स्वास्थ्य और कोविद भेद्यता वाली जमानत याचिकाओं को भी नजरअंदाज कर दिया गया। उनका जीवन अभी हमारे लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। हमारी वर्तमान मांग है कि उसकी जान बचाई जाए। हम सरकार से मांग करते हैं कि उसे एक बेहतर अस्पताल में स्थानांतरित किया जाए या हमें आवश्यक चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाए। हम सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि उसे किसी भी व्यक्ति के जीवन के अधिकार से वंचित करने का कोई अधिकार नहीं है, एक बहुत ही कम कैदी है।

पी हेमलता, पत्नी
पी सहजा, पी अनाला, पी पावना, बेटियां ”

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 41 आयुध कारखानों को निगमित करने के तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने के केंद्र के निर्णय को गलत करार दिया।

82,000 रक्षा नागरिक कर्मचारियों और 41 आयुध कारखानों की ट यूनियनों के विरोध को अनदेखा करते हुए, केंद्र सरकार 218 साल पुराने भारतीय आयुध कारखानों को कॉर्पोरेट करने के अपने फैसले के साथ आगे बढ़ रही है। रक्षा विभाग को पीएसयू में बदलने और निजीकरण करने के लिए हमारे देश की रक्षा तैयारियों को खतरे में डाल देगा।

सरकार ने हाल ही में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटीकरण की प्रक्रिया में रक्षा मंत्रालय की सहायता के लिए रणनीतिक और कार्यान्वयन प्रबंधन परामर्श सेवाएं प्रदान करने के लिए एक सलाहकार नियुक्त करने के लिए प्रस्ताव (निविदा) के लिए एक अनुरोध को अधिसूचित किया।

रक्षा मंत्रालय अपनी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से दावा कर रहा है कि सरकार ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज को कॉरपोरेट करने के विषय पर ट्रेड यूनियनों के साथ परामर्श की प्रक्रिया में है। रक्षा असैन्य कर्मचारियों के प्रमुख संघों ने आयुध कारखानों के बारे में चर्चा करने के लिए किसी भी बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया है। सलाहकार के चयन के लिए प्रस्ताव के लिए ब्याज-सह-अनुरोध की अभिव्यक्ति को सरकार के डिजाइन को उजागर करता है। रक्षा नागरिक कर्मचारियों के संघ पहले से ही सरकार के फैसले के खिलाफ अनिश्चितकालीन हड़ताल की तैयारी कर रहे हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री से सरकार के फैसले को वापस लेने की अपील की है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 218 साल पुराने रक्षा उद्योग को नष्ट करने के केंद्र के कदम को विफल करता है और आयुध कारखानों के कर्मचारियों का समर्थन करता है, जो आयुध कारखानों के निगम के खिलाफ विरोध कर रहे हैं।

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सीबीडीटी और सीबीआईसी के विलय और सभी स्तरों पर संवर्ग को घटाने के निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करती है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी गहरी चिंता के साथ नोट करता है कि सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के विलय के प्रस्ताव पर विचार कर रही है यानी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी), बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष रूप से डाउन करने के इरादे से सभी स्तरों पर कैडर। यह भी गंभीर चिंता के साथ ध्यान दिया जाता है कि कर्मचारियों के कई भत्तों पर अंकुश लगाया जाएगा और भारतीय राजस्व सेवा के संवर्ग में आगे की भर्ती को रोक दिया जाएगा। नई नौकरियों को खाली करने के अलावा, जो पद खाली पड़े हैं, वे भविष्य में भरे नहीं जा सकते हैं। एक के बाद एक केंद्र सरकार केंद्र सरकार के विभागों और खाली पड़े पदों को समाप्त कर रही है, जिससे इस देश के लाखों और लाखों बेरोजगार युवाओं के रोजगार के अवसर दूर हो रहे हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार
के ऐसे प्रतिगामी कदमों का विरोध करती है और लोगों से मोदी सरकार द्वारा अपनाई जा रही ऐसी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आह्वान करती है।


 रानी- भावना की न धारा में अब तुम बहों  ,वक्त अब भी है स्थिति को पहचान लो .छोड़ गद्दी दो ऐसे बशर के लिए ,जो कि लेनिन का दुश्मन हो, बलवान हो..जान अपनी तो बच जाएगी इससे और ,उस बशर  पे  भी अपना इक एहसान हो .खत्म इससे हो लेनिन  मिले राज फिर, पूरे सारे बच्चे अपने अरमानहों ..बादशाह -वक्त झुकने को कहता है झुक जाएँ हम ,पर हुकूमत का मालिक हमें बख्श दे. ऐसा कोई बशर तुम अगर ढूंढ लो , कि समर्थन जिसे अपना हर शख्स दे..रानी -एक इंसान ऐसा ही मौजूद है ,नेतृत्व की पूंजीपतियों का करता है वह .शाख उसकी सारी जगह रूस में , और लेनिन से  बिल्कुल न डरता है वह  ..गो कि तुमको हटाना है वह चाहता  दुश्मनी कम्युनिस्टों  से करता है वह.है करेंसकी   नाम उसका भला ,राज करने की इच्छा पे  मरता है वह..बादशाह -माफ करना बुजुर्गों    सिंहासन को इस आज मजबूर हो के मै खुद छोड़ता.
 जिसको कायम किया तुमने  तलवार से, आज कमजोर हो के  मैं मुंह मोड़ता .. ए मंत्री गणों और सेनापति ,अब से  नौकर  न हो मैं तुम्हें छोड़ता.
 रूस का अब  भला सिर्फ भगवान करे ,सारे इंसानी रिश्ते मै खुद तोड़ता ..
कवि-
 इधर जार मजबूत हो गया राज को छोड़.
 करेंसकी  शासक बना बाधाएं सब तोड़ ..करेंसकी -रूस की है हुकूमत जो मुझको मिली आज मेरा मुकद्दर बदल जाएगा ,
जार की सारी ताकत अब पामाल है जल्द लेनिन का खतरा भी टल जाएगा .
पूंजीपतियों खजानों को दो खोल अब जार शाही का अंकुश जरा भी नहीं ,
हर तरह से हिफाजत हुकूमत को  हो है मुखालिफ  जो मौसम बदल जाएगा.
  अपनी संपत्ति लो चाहे जितनी बड़ा हमने आजाद बिजनेस का नारा दिया,
अपनी सरकार मजबूत लेकिन करो वरना सपनों का एक दुर्ग  जल जाएगा .
ध्यान लेनिन का  रखना है लेकिन कहीं ना हुकूमत मजूरों की कायम करें ,
जो फटीचर है वो फिर संभल जाएंगे और हमारा जनाजा निकल जाएगा ..
खाद्य मंत्री –
अच्छा था कि हुकूमत हमको मिली न होती,
जनता से आज अपनी अदावत दिली न होती .
ना दाना है पास अपने किसानों के घर भी खाली,
 भूखों की सुन के चीखे हिम्मत हिली  न होती .
हम रोकते क्यों पूंजी पतियों के खातमे को,
उनके जो साथ अपनी किस्मत सिली न होती.
जो जानती न जनता कमजोरियां हमारी ,
लेनिन की बांछें  फिर तो बिल्कुल खिली न होती..
 उद्योग मंत्री-
 कारखानों के मजदूर बागी हैं सब, एक लेनिन की जय कार करते हैं वह .
उनको शासन में लाना कठिन काम है, कि पुलिस फ़ौज से भी न डरते हैं वह..
 उनकी कुल मुल्क की यूनियन एक है ,और एका की खातिर तो मरते हैं वह .
उत्पादन की कैसे हम आशा करें ,काम लेनिन  के कहने पे करते हैं..गृहमंत्री -डर हुकूमत का बिल्कुल खत्म हो गया ,लोग जो चाहते कर रहे हैं वही .
है पुलिस लूट करने में सारी लगी, किसी अफसर से वह  डर रहे हैं नहीं..
 शांति कायम दोबारा हो फिर रूस में ,इसकी कोई फिक्र कर रहे हैं नहीं .
लाख कोशिश करो लाख हमले  करो , फिर भी कम्युनिस्ट तो मर रहे हैं नहीं ..
युद्ध मंत्री-
 फ़ौज  लड़ने से इंकार है  कर रही ,हमसे लड़ने का फौजी सबब पूछते .
खाइयों से सिपाही भागे आ रहे ,मरते अफसरों को जब  वो टोकते..
  फौज में भी है लेनिन  का गालिब असर ,दुश्मनों को नहीं है वो  अब रोकते.
 देश खतरे में है इसको है जानते ,युद्ध करने से फिर भी वो  मुंह मोड़ते ..
करेंसकी-
  आप लोगों ने ऐसे बताया हमें ,जैसे हमको है कुछ जानकारी नहीं.
 विदेशों से लेनिन  में यहां आ गया, आप लोगों को है समझदारी नहीं ..
फ़ौज अब भी बहुत अपने माफिक  सुनो जो, करती है सिर्फ चांदमारी नहीं .
मिटायेंगे कम्युनिस्ट  ताकत को हम,हमने  बाजी कभी कोई हारी नहीं ..युद्ध मंत्री -जर्मनी से लड़ाई खत्म न करें ,एक भी जिससे खाली सिपाही न हो .
ध्यान जनता का न दे तब अभावों  तरफ,युद्ध  स्थिति का उसको  पता ही न हो..
गर गए जीत युद्ध में हम तो फिर, कभी लेनिन की  वाह वाही न हो .
वरना   जितने दिनों तक लड़ाई चले ,कर ले मजबूत खुद को कोताही न हो..
 गृहमंत्री –
मुल्क की तब  हिफाजत में जनता जुटे , जर्मनी से जो चालू लड़ाई रहे .
फिर असंतोष उसका भी थम जाएगा, और अपनो भी इसमें  भलाई रहे ..
भूख और वस्त्र की तब फिकर कम रहे ,शांति से लोग करते कमाई रहे .
कम्युनिस्टों का पर संगठन तोड़ दो, उनकी आजाद ना कार्यवाही रहे..
 करेंसकी-
 आप सभी की राय से मिलती मेरी राय.
 करें काम इस ढंग से सब आफत टल  जाए..
 सब आफत टल जाए काम कुछ ऐसे करना होगा,
कम्युनिस्टों पर  सरेआम पाबंदी धरना होगा .
लागू कर दो कानून न अब हड़ताल कोई कर पाये,
 काम सभी मजदूरों को अब  पूरा करना होगा .
जिन फौजों पर पर सुबहा हो वह तुरंत हमें बतलाओ,
 ऐसी फौजों को  को सरहद पर अब जाकर लड़ना होगा.
 वफादार फौजों  को जल्दी सुनो इकट्ठा कर लो ,
गद्दारों से  मुल्क की उनको रक्षा करना होगा .
कह दो लेनिन का  हर चमचा अब मुल्क छोड़ भग जाए.
 नहीं मौतकुत्ते  से बदतर उसको मरना होगा..
कवि-
 हुक्म  करेंसकी का हुआ ,जब लागू सब ठौर .
दमन च्रक चलने लगा ,रूस में चारों ओर ..
क्रांति कारी भी  हुए छिपने  पर मजबूर .
गुप्त जगह पर लेनिन से बोले यूँ  मजदूर ..
एक मजदूर- जार शाही मिटी पर जुलम न मिटे ,खून अपना बहाना अभी और है.
 हर कदम पर गिरफ्तार होने का डर ,आप कहिए जहां में कहां ठौर  है..
 दूसरा मजदूर-
 लाख जाने गई और न कुछ हो सका, क्या यह बलिदान बेकार ही जायेगें.
 है गरीबों की किस्मत में रोना लिखा, पेट बच्चों का अपने न भर पाएंगे..
एक किसान –
डर हुकूमत का गांवों  में गालिब है अब,   सारे साथी रहे गांव को छोड़ है.
देख कम्युनिस्ट को ले  सिपाही कहीं ,हाथ और पांव देते हैं तोड़ है ..
लेनिन-
जुल्म मेहनतकशों पे जो है हो रहे ,एक सूरत से केवल वो मिट पायेगे .
 राज  मजदूर करने लगे रूस  पर ,खुद ब खुद ए लुटेरे तब भग जाएंगे ..
पहला मजदूर –
राज मजदूर का जल्द हो रूस में  जिंदगी दांव पर दी है लगा.
 उनके हथियार हमको रहे रोकते किसी साथी ने अब तक न की है दगा ..
लेनिन –
जिन पे सुबहा जरा भी दगा का  रहा ,लाल झंडा उनको न थमाया  गया.
क्रांति की कसौटी पे उतरा खरा , वह ही पार्टी का मेंबर बनाया गया..
 दूसरा मजदूर –
कामरेड बात सच्ची रहे तुम बता ,धोखा कोई कम्युनिस्ट करेगा नहीं.
गो कि दिक्कत बहुत असलहा है नहीं , चाहे मर जाए कोई डरेगा नहीं ..
लेनिन-
फ़ौज का हर सिपाही अमन चाहता ,इसलिए साथ लड़ने को तैयार है.
 अफसरों की खिलाफतकी परवाहनहीं , रखे तैयार सारे ही  हथियार है..
पहला मजदूर-
मजदूर लड़ने को तैयार है ,सिर्फ हथियार की उनको दरकार है.
 फ़ौज के साथियों का सहारा मिले ,तो समझ लो लुटेरों की फिर हार है..
लेनिन-
सागरों में जो फौजें रहीं घूम है ,क्रांति की सबसे बेहतर पुजारी है वो .
उनके मल्लाह शोषण को देगें मिटा ,कुछ भी करने की उनकी  तैयारी है जो..
 दूसरा मजदूर –

कितना मजबूत अपना है ये संगठन,ए हमारी समझ में है अब आ गया .
रास्ता तैं करो राज कैसे ले हम,सुखी  होने का वक्त अब आ गया..
लेनिन-
इससे पहले कि हम कार्रवाई करें ,राय सब साथियों की तुरंत जान ले .
है हर संगठन के यहां प्रतिनिधि ,जो करें  फैसला वहीं मान लें ..
मजदूर-
 अभी सभी साथी प्रतिनिधियों की मीटिंग बुला ली जाती है उसी में अगले प्रोग्राम का फैसला कर लिया जाएगा. कवि-
 सभी प्रतिनिधियों  की मीटिंग होती है जिसमें लेनिन सभी की राय पूछते हैं.
 स्थल सेना का प्रतिनिधि –
 शोला हर छावनी रूस की बन चुकी , सिपाही बगावत को तैयार है .
अफसरों की खिलाफत से साथी सुनों ,हर  कमेटी हमारी ही हुशियार है ..
जल सेना का प्रतिनिधि –
ए जिंदगी लगा दी हमने है दांव  पर ,
शोषण व हमने एक को मिटाना   जरूर है .
शमशीर है निकाली मेहनत करोशों की खातिर,
मिटने या जीतने का छाया सरूर है .
सारे समुन्द्र नदियों में गस्त कर रहे हैं ,
अपनी विजय का इससे हम को गुरूर है.
 जंगी  जहाज सारे डाले खड़े हैं लंगर ,
दुश्मन के हर किले पर निशाना जरूर है .
अब फैसला हो केवल बगावत पक्ष में,
तब जुल्म से बचेंगे जो बेकसूर हैं .
कारखाने के मजदूरों का प्रतिनिधि –
 कारखानें सभी दुर्ग है बन चुके ,
है और सिपाही बने सारे मजदूर हैं.
है हुकूमत को ताकत से अब छीनना,
कामयाबी नहीं हम से अब दूर है..
किसान प्रतिनिधि –
मजूरी जो खेतों में हैं कर रहे वो , सरासर बगावत को है चाहते .
साथ छोटे किसानों का  उनको मिला, भूमि पर अपना हक जो अब मांगते ..
 रेल मजदूरों का प्रतिनिधि –

 यूनियन जो हमारी थी पहले बनी ,क्रांति में साथ देगी न अपना कभी .
आम मजदूर पर क्रांति को चाहता बस बजा दो बिगुल क्रांति का तुम अभी ..
 लेनिन –
पूंजीपति सब एक हैं ,करेंसी की सरदार .
राज बचाने को सभी, लिए खड़े तलवार..
 लिए खड़े तलवार कि हम पर जुल्म कर रहे भारी,
 गांव- गांव में लूट मची डर से कांपें नर नारी .
अधनंगी मजदूर बहन की अस्मत खुलेआम लुटती,
 लाचार खड़े भाई के दिल पर चला रहे आरी .
इन डाकुओं के राज में भूखे नन्हें  मासूम पड़े रहते,
सिसक -सिसक रोटी माताएं हर पल आंसू जारी.
पैसे वालों के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते ,
मजदूर के बच्चे करें मजूरी है कितनी लाचारी.
 मजदूर किसान ही मिल करके सारा सामान करें पैदा,
हक जमीदार पूंजीपति का है कैसी मक्कारी .
उठोरहें  बगावत ही तुम्हारी पास बाकी है,
 कि अब शासन चलाने की मजूरों की है बारी..
 कवि –
 किया बगावत का जभी लेनिन ने ऐलान.
 मजदूर सिपाही सब चले ,अपनी थाम कृपान ..
  राजधानी पर किया सर्वप्रथम अधिकार .
मुकाबला करता कहां  करेंसकी सुकुमार ..
 गया वह राजधानी से भाग ,
भाग्य गे  मेहनत कशन के जाग.
फिर किए इकट्ठा सेनापति सब ,
कहां यूँ भर ह्रदय  अनुराग.
 मिटा दो लेनिन की तकदीर,
 लगा दो साम्यवाद में आग..
  करेंसकी-
 ए लुटेरे फटीचर हुकूमत करें ,एक पल भी मुझको गवारा नहीं.
 जो जमीन पर रहे आसमां पर चढ़े ,आगे हरगिज़ हो ऐसा दोबारा नहीं ..
सेनापति-
 जो हुआ है ,नहींरोक  मिल रहा ,और आगे की उम्मीद हम क्या करें .
बाल बांका न लेनिन का कर सके, उनके साथी फिर हमसे भला क्या डरे ..
करेंसकी –
अब डराने की  केवल नहीं बात है, राज हाथों से अपने अब जा रहा .
 जां लड़ा कर अगर हम इसे  छीन ले ,होगा माफिक कि जो वक्त है आ रहा ..
सेनापति-
चंद शहरों है ए बगावत अभी ,फ़ौज काफी अभी तक वफादार है .एक हल्ले में गर ये  मिटा न मिले, फिर तो  मिटने के अपने ही आसार हैं..
 करेंसकी –
 या तो मिट जाओ खुद या मिटा दो उन्हें ,राह दूजी कोई अब गवारा नहीं .
राज लेनिन करेगा अगर रूस  पर ,फिर है जीने का कोई सहारा नहीं..
 हमने मिटने की अपनी न परवाह किया ,हक मजदूरों को पूरा कभी न दिया.
 पूंजीपतियों तुम्हीं  अब सहारा बनो, रूस में और कोई हमारा नहीं ..
फौज के अफसरों संग  हमारे रहो ,और उम्मीद लेनिन  से कुछ न करो .
हुक्मरां हम नहीं रूस के गर  रहे ,फिर है हमदर्द कोई तुम्हारा नहीं ..
सब शरीफों को लेनिन  फटीचर करें ,उसका एलन अब  है यही हो रहा .
उनका दर्जा मजूरों सा  हो जाएगा, जो न गफलत  में हम को पुकारा कहीं .
सैकड़ों साल से जो ऐश कर रहे ,जमीनों के मालिक अब तक रहे .
 हैसियत ले बचा जां लगा दांव  पर,वरना  मिलता है मौका दोबारा नहीं ..
सेनापति –
खाते पीते लोग सब देंगे अपना साथ .
यदि हम बैठे न रहे धरें  हाथ पर हाथ..
 धरे हाथ पर हाथ भला हम कैसे रह पाएंगे .
अगर न करते वार चोट गहरी खा जाएंगे ..
लेनिन के हाथों से मरना हमको हरगिज न गंवारा है.
जीतेंगे या फिर मैदानों   में हम वीर गती पाएंगे ..
जितने जनरल मशहूर यहाँ ,हर युद्ध जिन्होनें जीता है,
संचालन युद्ध करने को ,सब साथ हमारे आएंगे.
 चौदह  ताकतवर देशों की फौज अब रूस के अंदर हैं ,
कम्युनिस्ट न अबकी बच सकते ,सब घेर के मारे जाएंगे .
अब करेंगे कल से हम हमला ,हर हमला जीत में बदलेगा ,
परसों पर प्रातः राजधानी में, विजई लश्कर पहुंचाएंगे ..
कवि –
बड़ा करेंसकी फ़ौज  ले ,राजधानी की ओर .
उसकी जीतों का हुआ पेट्रोग्रांड  में शोर ..
पेट्रोग्रांड  में शोर  मच गया फ़ौज  विदेशी आने  का,
 चौदह  देशों ने अहद किया लेनिन सिद्धांत मिटाने का
 इन सब की फौजों ने मिलकर लेनिन की ताकत को घेरा ,
रास्ता न मिले कम्युनिस्टों को  फिर अपनी जान बचाने का ..
बड़े-बड़े शाही जनरल अपनी फौजें ले टूट पड़े ,
मकसद था इन मजदूरों को शासन से तुरंत हटाने का .
लेनिन मजदूर किसानों के नेताओं से तब यू बोले,
 खुशहाल भविष्य अगर चाहो है वक्त ए खून बहाने का ..
लेनिन-
मजा हैपेट्रोग्रांड में शोर .
बढ़े आ रहे मजदूरों दुश्मन चंहू  ओर  मचा है ……
घटा मुसीबत की है रूस पर छाई अब  घनघोर. मचा है …
 खतरे में है लाल हुकूमत जिंदगानी मजदूरों की,
 सभी संगठित आज हो गए है सम्पति के चोर .मचा है ..
 प्रथम बार अब मुक्ति मिली है तुम्हें लूट और शोषण से ,
मुफ्त खोर है तुम्हें मिटाने और मुनाफा खोर, मचा है…
 मेहनतकश तलवार उठा ले बेईमानों मक्कारों पर ,
तमन्ना है मिट जाने की है लगा ले पूंजीपति सब जोर . मचा है …
मल्लाहों  का प्रतिनिधि-
सारी जल सेना मिटने को तैयार है ,क्रांति को है बचाना किसी भी तरह.
 क्रांति की हार ग्चें कहीं जो हुई ,मरना तो पड़े गीदड़ों की तरह..
शेष

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने देर से भले ही ऑल पार्टी मीटिंग बुलाने के लिए सरकार की सराहना की।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डी राजा ने कहा कि
हमारी पार्टी उन शहीद सैनिकों और अधिकारियों को सलाम करती

है जिन्होंने 15 जून को अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान दिया।
हमारे देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा करने में उनकी वीरता और समर्पण के लिए हर भारतीय को हमारे रक्षा बलों पर गर्व है। वे भारत सेना, भारत नौसेना और भारत वायु सेना हैं। पूरा देश उनके पीछे खड़ा है।
2 हमारे देश की सुरक्षा और विदेश नीति की स्थिति राष्ट्रीय सहमति के आधार पर विकसित की जाती है। सरकार को इन सभी मामलों पर राजनीतिक दलों, संसद और लोगों को विश्वास में लेना चाहिए।
3 भारत चीन गतिरोध
भारत और चीन के बीच मौजूदा गतिरोध के कारण, हमारी पार्टी का विचार है कि देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति का सम्मान किया जाना चाहिए और इसे बहाल किया जाना चाहिए क्योंकि यह अप्रैल 2020 तक था।
भारत और चीन एशियाई देश हैं जिन्होंने एशियाई शताब्दी के लिए खड़े होने का दावा किया है।
अभी हमारे देश और पड़ोसी देशों पकिस्तान और नेपाल के बीच संबंध शत्रुतापूर्ण हैं। हमें श्रीलंकाई से भी दिक्कत है।
ऐसी स्थिति में अमेरिका हमारे क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए भारत को एक तरह के सैन्य गठबंधन में घसीटने की कोशिश करता है।
सरकार को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए।
भारत के अच्छे पड़ोसी संबंध राष्ट्रीय स्थिरता और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसका मतलब है कि भारत को एक उचित दक्षिण एशियाई नीति विकसित करनी चाहिए।
तत्काल कार्य भारत और चीन के बीच सीमा विवादों को सुलझाने के लिए उच्चतम स्तर पर बातचीत तेज करना है। यह शांति और स्थिरता सुनिश्चित करेगा। भारतीय प्रधान मंत्री और चीनी नेता के बीच पहले शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में उल्लिखित दोनों देशों को “एक दूसरे की संवेदनशीलता, चिंताओं और आकांक्षाओं का सम्मान करने का महत्व” का सम्मान करना चाहिए।
भारत में राजनीतिक दलों को हमारी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए एक साथ खड़ा होना चाहिए। पूरे देश को एक होना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऐसी एकता के लिए खडी है।

जौनपुर और आजमगढ़ की घटनायें अवांछित और दुर्भाग्यपूर्ण
कोरोना काल में भी समाज को बांटने का खेल खेल रही है भाजपा
भाकपा ने रासुका हटाने और न्यायिक जांच की मांग की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश की  भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि वह जौनपुर जनपद के भदेठी और आजमगढ़ जनपद के सिकंदरपुर की घटनाओं के जरिये अपनी सांप्रदायिक राजनीति को धार देना चाहती है। अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये वह कोरोना काल में भी विभाजनकारी घ्रणित राजनीति करके देश, समाज और मेहनतकशों की एकता को गहरी हानि पहुंचा रही है। निश्चय ही दोनों ही घटनायें दुर्भाग्यपूर्ण हैं और होनी नहीं चाहिए थी। भाकपा ऐसी घटनाओं को अशोभनीय और अवांच्छित मानती है। लेकिन इन घटनाओं को लेकर समुदाय विशेष पर एनएसए की कार्यवाही घोर अनुचित और राजनीति प्रेरित है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव डॉ गिरीश ने  कड़े शब्दों में भर्त्सना करते  हुए  कहा कि कोरोना काल में ही उत्तर प्रदेश भर में कोई दर्जन भर दलितों की हत्या होचुकी है और अन्य अनेक का उत्पीड़न हुआ है। प्रतिदिन महिलाओं के साथ बदसलूकी, हत्या और उत्पीड़न की वारदातें होरही हैं। पर उन मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लगाना तो दूर कई मामलों में एफ़आईआर तक नहीं हुयी अथवा बहुत मुश्किलों से हुयी। लेकिन उपर्युक्त दोनों मामलों में एकतरफा एनएसए की कार्यवाही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की गरज से की गयी है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा कि आज ही आजमगढ़ जनपद के उबारपुर गांव में भाजपा लालगंज के जिलाध्यक्ष के बेटों ने मनरेगा में काम कर रहे मजदूरों पर दिन- दहाड़े हमला कर उन्हें लहूलुहान कर दिया। क्या न्यायहित में और निष्पक्षता का परिचय देते हुये सरकार उन पर रासुका लगायेगी, भाकपा ने सवाल खड़ा किया है।  भाकपा सचिव मंडल ने कहा कि भाजपा और उसकी सरकारें कोरोना से निपटने में पूरी तरह विफल हो गईं। देश भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3 लाख से अधिक होकर दुनियाँ में देश चौथे स्थान पर पहुँच गया। अन्य मरीज भी इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। लोग भूखों मर रहे हैं। मजदूरों को रोजगार मिलना तो दूर तमाम उद्योग बन्द होरहे हैं और मजदूरों का काम छिन रहा है। किसानों को फल और सब्जियां खेतों में नष्ट करनी पड़ी हैं। कानून व्यवस्था तार तार होचुकी है। एक से एक विकराल घपले- घोटाले सामने आरहे हैं। लोग हतप्रभ हैं और अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।इन असफलाताओं से ध्यान हटाने को भाजपा सरकार ने अपने चिर- परिचित हथकंडों को स्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अपने कुत्सित उद्देश्यों के लिये वह सरकारी मशीनरी को भी अन्यायपूर्ण और दमनकारी कार्यवाहियों के लिये बाध्य कर रही है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने मांग की कि दोनों मामलों में अवांच्छित रासुका हटाई जाये और न्यायहित में दोनों घटनाओं की जांच उच्च न्यायालय के सेवारत न्यायाधीश से करायी जाए।

राष्ट्रीय संकट महामारी के समय जनपद में जनता की मदद की बजाए जनता के कष्ट बढ़ाने का कार्य ज्यादा हुए है। यह आरोप लगाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि बाराबंकी में मार्च माह में 3219 वाहनों का चालान किया गया। अप्रैल माह में 6398 वाहनों का चालान व 36 वाहनों को सीज किया गया और जब जनता का संकट और बढ़ा तो मई माह में 8135 वाहनों का चालान व 61 वाहनों को सीज कर दिया गया। वही महामारी अधिनियत के तहत 160 केस दर्ज कर 180 लोगों को गिरफ्तार किया गया, हद तो यहां तक हो गई कि नारकोटिक्स ड्रग एण्साइकोट्राॅपिक सब्स्टांसेस एक्ट का निरोधक कानूनन मानकर फर्जी बरामदगी दिखाकर मार्च में 14 अप्रैल 4, और मई में 32  को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।  जनपद का बहुचर्चित केस बांसा निवासी नसरूद्दीन का है। जिनको मसौली पुलिस घर से बुलाकर 150 ग्राम मार्फीन के साथ दिखाकर जेल भेज दिया गया जिस पर भाजपा के कई सांसद व विधायकों ने मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर जांच की मांग की है। वही नाबालिग छात्र मो0 जुनेद को बाराबंकी से पकड़कर जैदपुर से अवैध रूप से निरूद्ध रखा गया है और 300 ग्राम मार्फीन दिखाकर चालान कर दिया गया जुनेद का बाप ने प्रार्थना-पत्र देकर मांग की थी कि गिरफ्तारी टीम में शामिल लोगों के मोबाइल लोकेशन चेक किये जाये जिससे घटना फर्जी होगी। वही मसौली के ही बांसा निवासी फतेहखान को भी घर से बुलाकर 300 ग्राम मार्फीन दिखाकर जेल भेज दिया था उसकी मां ने भी मुख्यमंत्री को प्रार्थना-पत्र देकर विशेष जांच की मांग की थी। सुमन ने मांग की कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रवासी मजदूरों के सभी वाद समाप्त कर दिये हैं। उसी तरह राष्ट्रीय संकट महामारी के समय महामारी अधिनियम व मोटर वाहन अधिनियम के सभी मुकदमें समाप्त किये जाये और चालान करना बंद किया जाये। एन0डी0पी0एस0 एक्ट में के तहत निरूद्ध किये गये लोगों की एक विशेष जांच कटी बनाकर साक्ष्य व सबूत लेकर सभी वाद समाप्त किये जाये तथा दोषी पुलिस कर्मचारियों पर वाद दर्ज कर मार्फीन कहां से लाकर दिखाया है की भी जांच की जाये अन्यथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूर होकर आन्दोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। श्री सुमन ने आगे कहा कि लोक कल्याणकारी राज्य ने इस तरह की कार्यवाहियां लोकतंत्र को शर्मिन्दा करती हैं।  आॅल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज उ0प्र0 के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राईन ने बताया कि बांसा निवासी नसरूद्दीन हमारे संगठन का जिलाध्यक्ष है और उनकी पत्नी पिछले ग्राम प्रधानी के चुनाव में कुछ मतों से पिछड़ गयी थी राष्ट्रीय महामारी के समय नसरूद्दीन व उनकी पत्नी ने गरीब व्यक्तियों की आर्थिक रूप से मदद भी की थी। उनकी उभरती छवि को धूमिल करने के लिए एक सवर्ण अल्पसंख्यक नेता ने स्थानीय पुलिस से मिलकर नसरूद्दीन की गिरफ्तारी करायी थी। आॅल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज पूरे प्रदेश में आन्दोलन चलायेगा। श्री वसीम राईन ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि अविलम्ब घटना की जांच कराकर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही की जाये।