Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

 Image may contain: 1 person, smiling
कुंवर मुहम्मद अशरफ हमारे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के योद्धा, प्रकाण्ड
विद्वान, विख्यात मार्क्सवादी इतिहासकार तथा भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के सुप्रसिद्ध नेता थे। इनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा जनवादी
आंदोलन के इतिहास का वह अध्याय है, जिससे नयी पीढ़ियां हरेक दिन प्रेरणा
प्राप्त करती रहेंगी।
आरंभिक जीवन 1
के.एम. अशरफ का जन्म उत्तरप्रदेश स्थित अलीगढ़ जिले की हाथरस
तहसील के दरियापुर गांव में 24 नवंबर 1903 को हुआ था। एक व्यक्ति
के रूप में अशरफ मिश्रित भारतीय संस्कृति के प्रतीक थे। वे मुस्लिम
राजपूत परिवार में पैदा हुए। हिन्दू तथा मुसलमान राजपूतों के कई रीति-
रिवाज एक जैसे ही थे। भिन्न धार्मिक विश्वासों के बावजूद दोनों के नाम भी
आमतौर पर एक तरह के होते थे। उन्नीसवीं शताब्दी में ठाकुर कुंॅवर
सिंह अलवर रियासत से आकर दरियापुर में बस गये। कुॅंवर सिंह को
एक बेटा हुआ जिसका नाम पड़ा ठाकुर मुराद अली खॉं। ठाकुर मुराद अली ने
कुछ अंग्रेजी पढ़ी और रेलवे में मुलजिम हो गए। पलटन में भी काम किया और
प्रथम महायु( में हिन्दुस्तान के बाहर
अफ्रीका, इराक आदि देशों में लड़े।
ठाकुर मुराद अली की शादी मथुरा
जिले के गहनपुर गांव के पॅंवारे में ठाकुर
नन्हू सिंह की लड़की अंची से हुई।
कुॅंवर मुहम्मद अशरफ उन्हीं के बेटे
थे। अशरफ तीन-चार ही साल के हो
पाये थे कि उनकी मांॅ चल बसी। पिता
के प्रति इतना गहरा स्नेह था कि बालक
को मॉं का अभाव खला नहीं।
मेधावी छात्र और राजनीति
अशरफ की पढ़ाई दरियापुर के
अपर प्राइमरी स्कूल में हुई। पिता के
बाद अशरफ पर सबसे ज्यादा असर
पंडित रामलाल का पड़ा जो उनके
शिक्षक थे। अशरफ ने 7वीं कक्षा तक
हिन्दी पढ़ी। कुछ और बड़ा होने पर
पिता ने अशरफ का अलीगढ़ धर्मसभा
हाई स्कूल में नाम लिखाया। वहॉं अपने
बहनोई के संसर्ग में उन्हें आर्य समाज
का भाषण सुनने का अवसर मिला।
लेकिन आर्य समाज की धार्मिक बातों
का बालक अशरफ पर कोई अधिक
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-28
कुंॅवर मुहम्मद अशरफः प्रकांड मार्क्सवादी
इतिहासकार और भाकपा नेता
प्रभाव नहीं पड़ा। उन दिनों आर्य समाज
राष्ट्रीय आजादी और स्वदेशाभिमान का
जबरदस्त प्रचारक था। अशरफ को
उन उपदेशों से देशभक्ति के प्रथम पाठ
उन्हें अवश्य मिले।
मुराद अली की बदली होने पर
वह मुरादाबाद आ गये, तो वहां उन्होंने
मुस्लिम हाई स्कूल में अशरफ का नाम
लिखाया। अशरफ पहले संस्कृत और
हिन्दी लेकर पढ़ रहा था। यहां
संस्कृत-हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था
नहीं हो सकने के कारण उन्हें
फारसी-उर्दू लेनी पड़ी।
अशरफ ने 1918 में फारसी के
साथ मैट्रिक पास किया। अशरफ के
दिल में देश-सेवा के विचार पनपने
लगे। दरियापुर में शंकर लाल और
ठाकुर मुराद अली के घर का बहुत
अच्छा संबंध था। शंकर लाल की भावज
ने मातृविहीन अशरफ को पुत्र की तरह
पाला था! शंकर लाल एक राजनीतिक
हत्या में लपेट लिये गये थे। इससे
बालक अशरफ की भावना का उधर
प्रेरित होना स्वाभाविक था। मौलाना
अब्दुल्ला सिद्दिकी और एनी बेसेन्ट की
नजरबंदी की खबर ने अशरफ के
राजनीतिक भाव को जगाने का काम
किया।
अशरफ 1918 में एम.ए.ओ.
कॉलेज, अलीगढ़ में दाखिल हुए। उस
वक्त इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ही
परीक्षाएंॅ ली जाती थीं। अशरफ ने अरबी
तर्कशास्त्र और इतिहास विषय अध्ययन
के लिये चुने। अशरफ मुरादाबाद में ही
एक ओजस्वी वक्ता के रूप में उभरने
लगे। अलीगढ़ आने पर बहस और
व्याख्यान का शौक और बढ़ गया।
इतिहास और दर्शन उनके प्रिय विषय
थे।
अशरफ 1920 में बी.ए. में
दाखिल हुए। इसी समय असहयोग,
खिलाफत और महात्मा गांधी की आवाज
देश में गूंजने लगी। 1921 में अशरफ
ने मौलाना मुहम्मद अली तथा अन्य
के साथ अलीगढ़ में जामिया मिलिया
कायम की जो राष्ट्रीय शिक्षा का प्रतीक
बन गया। राष्ट्रीय आंदोलन में
छात्र-जीवन से ही अशरफ खुलकर
काम करने लगे। तिलक स्वराज-फंड
के लिए चंन्दा जमा करना, खादी प्रचार
और हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रचार
अशरफ का प्रधान काम था। 1923
में उन्होंने जामिया से बी.ए. पास किया।
1924 में फिर अलीगढ़
मुस्लिम-यूनिवर्सिटी में नाम लिखाया।
मुस्लिम तसुव्वफ मुस्लिम दर्शन और
इतिहास उनके विषय थे। उन्होंने
1926 में एल.एल.बी. प्रथम श्रेणी में
पास करने के साथ ही उन्होंने यूनिवर्सिटी
में रिकॉर्ड स्थापित किया।
सक्रिय राजनीति में प्रवेश
वे 1920-21 के
असहयोग-आंदोलन में काम कर चुके
थे। 1922 में शौकत उस्मानी से
परिचय हुआ। शौकत उस्मानी ने उनसे
सोशलिज्म की बातें की। गया कांग्रेस
के बाद 1923 में कलकत्ता जाने पर
अशरफ ने मुजफ्फर अहमद और
कुतुबउद्दीन से भेंट की। 1925 में
यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय ही उनके
विचार समाजवाद की ओर कुछ
आकर्षित हुए लेकिन अब भी समाजवाद
का, उनका ज्ञान धुंधला-सा था।
1926 में एम.ए. करने के बाद वह
अलवर गये। राजा की ओर से भी
उनका सम्मान हुआ और वह राजकीय
मेहमान बनकर ठहरे। अशरफ ने
सामन्ती व्यवस्था को बहुत निकट से
देखा।
मुजफ्फरनगर में तीन माह में एल.
एल.बी. होने के बाद अशरफ ने वकालत
भी की। अलवर रियासत के महाराजा
ने अशरफ को अपनी रियासत के काम
में खींचना चाहा। अशरफ ने विलायत
जाकर और पढ़कर आने की शर्त रखी।
अलवर की राजकीय स्कॉलरशिप
लेकर, वह विलायत के लिए रवाना
हुए।
विदेश यात्रा
अशरफ 1927 में लंदन पहुंॅचे।
बैरिस्टरी की पढ़ाई शुरू की। उनकी
इच्छा हिन्दुस्तान के सामाजिक जीवन
का अध्ययन करने थी। लन्दन
यूनिवर्सिटी में 1200-1550 तक
भारत का सामाजिक जीवन ‘‘पी.एच.
डी.’’ के लिए अपना विषय चुना।
शापुरजी सकलतवाला, सज्जाद जहीर,
महमुदुज्जफर, मुहम्मद अली आदि
कितने ही भारतीयों से उनकी घनिष्ठता
हुई। अशरफ अब कम्युनिस्ट विचारधारा
के साथ पूर्णतः प्रतिब( हो गये थे।
1929 में अलवर महाराज की
जुबिली थी। अशरफ अलवर की
स्कॉरलशिप से पढ़ते थे। महाराजा का
पत्र गया और वह अलवर पहॅुंच गये।
अशरफ उस समय महाराजा के प्राइवेट
सेक्रेटरी थे। जुबिली समारोह ने अशरफ
की ऑंखे खोल दी। एक सप्ताह के
भीतर पन्द्रह लाख रुपये साफ कर
लिये गये। लार्ड इरविन उस समारोह
में भाग लेने आए थे। महाराजा के
प्राइवेट सेक्रेटरी के रूप में तीन माह में
अशरफ ने भारत के रियासती सामंतवाद
और उपनिवेशवाद को निकट से देखा।
अशरफÛ अपने विद्रोही मन को दबा
नहीं सके। महाराजा की फरमांॅबरदारी
उनके लिए असह्य हो गयी। वह अलवर
छोड़कर घर चले आये। 1930 के
शुरू में घर से रुपया लेकर अशरफ
फिर लन्दन चले गये और 1932 में
पी.एच.डी. होकर भारत लौटे।
लंदन में अशरफ मार्क्सवादी और
राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रिय हो गए।
श्रीनिवास अय्यंगर, का. अली, और
शापुरजी सकलतवाला के साथ मिलकर
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की
लंदनकमिटि का गठन किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में
वामपक्ष के नेता
1932 में भारत लौटने पर
डॉक्टर कुॅंवर मुहम्मद अशरफ सक्रिय
राजनीति में भाग लेने लगे।
1933-34 में एक वर्ष के लिए
उन्होंने मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
का काम किया। कानपुर में मजदूर
कॉन्फ्रेंस हुई। डॉ. अशरफ उसमें शामिल
हुए। मथुरा में किसानों के आंदोलन
और बेगÛारी के विरोध में होने वाले
हरिजनों के आंदोलन में उन्होंने खूब
भाग लिया। डॉ. अशरफ ने राजनीतिक
क्षेत्र में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वामपक्ष के
नेता के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्थान
प्राप्त कर लिया।
वे कांग्रेस तथा कांग्रेस सोशलिस्ट
पार्टी में शामिल हो गए।
1934 में कॉंग्रेस सोशलिस्ट पार्टी
की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जयप्रकाश
नारायण, आचार्य नरेन्द्रदेव, ई.एम.एस.
नाबूदरीपाद, डॉ. जेड.ए. अहमद,
सज्जाद जहीर, डॉ. राममनोहर लोहिया,
अशोक मेहता आदि के साथ डॉं. कुॅंवर
मुहम्मद अशरफ भी चुने गये। 1936
में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के
अवसर पर वे अखिल भारतीय कांग्रेस
कमिटी के एक सचिव चुने गये।
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं.
जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मुस्लिम
जनसंपर्क का कार्यभार सौंपा।
जवाहरलाल नेहरू द्वारा सौंपे गये
काम के लिए डॉ. अशरफ सर्वथा योग्य
थे। उन्हें फारसी तथा अरबी भाषाओं
का पूर्ण ज्ञान था। मध्यकालीन और
दर्शन के अधिकारी विद्वान थे। दो
दशकों तक वे स्वाधीनता संग्राम के
मुस्लिम नेताओं के निकट संपर्क में रहे
थे।
वे इलाहाबाद में ए.आई.सी.सी.
कार्यालय में काम करने लगे। उन्होंने
कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों के बीच
अभियान चलाया।
ए.आई.एस.एफ. से संपर्क
डॉं. अशरफ अखिल भारतीय
कांग्रेस समिति में कम्युनिस्ट दल के
प्रवक्ता बन गये। वे अखिल भारतीय
छात्र संघ ;एआईएसएफद्ध में भी
दिलचस्पी लेने लगे। अखिल भारतीय
छात्र संघ के कलकत्ता अधिवेशन
;जनवरी 1939द्ध की अध्यक्षता और
1940 में नागपुर के ऐतिहासिक
अधिवेशन का उद्घाटन उन्होंने किया।
देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र संघ
द्वारा आयोजित सभाओं में वे प्रबल
आकर्षण के केंद्र बन गये। वे ए.आई.
एस.एफ. में कम्युनिस्ट फ्रैक्शन के
इन्चार्ज भी थे। उन्होंने निर्देशन में
महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1940
में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना
अबुलकलाम आजाद के विशेष आग्रह
पर डॉ. अशरफ ने उनके सचिव के
रूप में भी कार्य किया।
दूसरे विश्वयु( के दौरान उन्हें भी
अन्य कम्युनिस्टों तथा वामपंथियों के
साथ देवली के यातना-शिविर में
गिरफ्तार कर बंद कर दिया गया। यहां
अन्य कैदियों के साथ उन्होंने तीस दिनों
तक भूख हड़ताल की। इस भूख हड़ताल
से उनका स्वास्थ्य बुरी तरह गिर गया।


1943 में जेल से रिहा होने पर
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन
केंद्रीय मुख्यालय में रहकर काम करने
लगे। पार्टी-पत्रों में लिखना और देश
के विभिन्न हिस्सों में जनता के बीच
प्रचार अभियान तक व्यस्त रहना
कामरेड अशरफ के प्रधान काम हो
गया।
विश्वयु( के बाद वे आर.डी.
भारद्वाज की बीमारी के कारण
अनुपस्थिति के बाद कांग्रेस में
कम्युनिस्ट प्रवक्ता बन गए।
यु(ोत्तर काल में जन उभार का
और पार्टी की नीतियों के सशक्त प्रचार
के रूप में संघर्ष को शक्ति पहुंचाते रहे।
1946 में वे दिल्ली आये और
दरियागंज पार्टी कम्यून में मात्र 8 रु.
मासिक और भोजन भत्ता लेकर पूरा
वक्ती की तरह काम करने लगे। कम्यून
में रहने वाले सभी नौजवान थे। डॉ.
अशरफ ही सबसे ज्यादा उम्रवाले,
सर्वाधिक अनुभवी और परिपक्व थे। वे
कम्यून जीवन में हमेशा अत्यंत विनम्र,
अनुशासित और साथियों के प्रति स्नेही
बने रहें। वे बड़े जिन्दादिल स्वभाव के
थे। हास्य, विनोदप्रियता और
हाजिर-जवाबी कूट-कूट कर भरी थी।
भारत विभाजन के बाद
 1947 में भारत विभाजन के
समय कॉ. अशरफ दिल्ली में ही थे।
उस समय की सांप्रदायिक घटनाओं और
हिंसात्मक कार्यवाईयों ने उन्हें बहुत
अस्तव्यस्त कर दिया। बंॅटवारे के बाद
हिन्दू-मुस्लिम दंगे अत्यंत लोमहर्षक
और वेदनापूर्ण थे। कॉ. अशरफ बहुत
ही संवेदनशील व्यक्ति थे। पार्टी की
दिल्ली प्रदेश कमेटी ने व्यक्तिगत सुरक्षा
के ख्याल से अशरफ और दूसरे मुस्लिम
साथियों को दरियागंज कम्यून से
हटाकर जामा मस्जिद के पास प्रांतीय
दफ्तर में जाने का आग्रह किया। जब
कॉमरेडों के पहरे में डॉक्टर कुॅंवर
मुहम्मद अशरफ कम्यून छोड़ रहे थे,
तब उनकी ऑंखों से ऑंसू की धारा
फूट पड़ी। वर्षों तक इस क्षेत्र में रहने
के बाद केवल मुस्लिम होने के कारण
उन्हें यह जगह छोड़नी पड़ रही थी।
डॉ. अशरफ विशेष रूप से दुःखी थे।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने
लंबे समय तक संघर्ष किया था।
पार्टी की शक्तियों को फिर से
गोलबंद करने और विभाजन के बाद
दंगों की वजह से जनता से टूटे संबंधों
को जोड़ने में कॉ. अशरफ ने बड़ी अहम
भूमिका अदा की। जब पार्टी-केंद्र ने
दिल्ली से उर्दू दैनिक ‘‘आवामी दौर’’
निकालने का फैसला किया तब डॉ.
कुंॅवर मुहम्मद अशरफः प्रकांड मार्क्सवादी…
अशरफ उसके संपादक और कॉ.
टीकाराम सखुन सहायक संपादक बनाये
गये। एक पार्टी हमदर्द ने धन का
इंतजाम किया और कनॉट प्लेस में
दफ्तर खोला गया। फिर भी अपने
अल्पकाल में ही ‘‘आवामी दौर’’ ने
अच्छी भूमिका अदा की और पाठकों के
बीच में अपना स्थान बना लिया।
पाकिस्तान में
‘‘आवामी दौर’’ बंद हो जाने पर
पाकिस्तान में पार्टी संगठन के लिए
1948 में पार्टी के आदेश पर के.एम.
अशरफ को जाना पड़ा। विभाजन के
बाद पाकिस्तान में पार्टी की अत्यंत
क्षति हुई। पार्टी के अनुशासित सिपाही
होने के नाते उन्होंने इस कठिन काम
को अपने हाथ में लिया। पाकिस्तान में
पार्टी पर घोर दमन हुआ। पार्टी पर
पाबंदी लगा दी गयी थी। कॉ. अशरफ
भूमिगत रहकर काम करते थे। बाद में
गिरफ्तार कर लिये गये। उन पर आरोप
था कि भारतीय नागरिक होकर
गैरकानूनी रूप से पाकिस्तान आये है।
जेल में उनकी शारीरिक स्थिति
चिंताजनक हो गई। कुछ पुराने मित्रों
के हस्तक्षेप से वे इस शर्त पर रिहा हुए
कि उन्हें फौरन पाकिस्तान छोड़ना
पड़ेगा। भारत भी उन्हें स्वीकार करने
को तैयार नहीं था। भारतीय नागरिकता
समाप्त हो गई थी।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक
महान यो(ा का कोई देश नहीं था।
कुछ मित्रों की सहायता से वे इलाज के
लिए इंगलैंड पहुंचे। जब तबीयत कुछ
सुधरी तो उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण
से मध्यकालीन भारत के इतिहास पर
ब्रिटिश संग्रहालय में शोधकार्य प्रारंभ
कर दिया। जीवन-यापन के लिए पर्याप्त
धन न होने पर भी उन्होंने कठिन परिश्रम
किया। ब्रिटिश संग्रहालय में सुबह घुसने
वाले वे प्रथम तथा शाम को निकलने
वालों में अंतिम व्यक्ति होते थे।
भारत वापसी
डॉ. कॅुंवर मुहम्मद अशरफ के मन
में इस दौरान अपने प्यारे देश भारत
लौटने की बात हमेशा उठती रही। छठे
दशक के मध्य में एक देशविहीन
नागरिक के रूप में वे भारत वापस
आये। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल
नेहरू और शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल
कलाम आजÛाद से निकट संबंध रहने
के बावजूद भारत सरकार ने उन्हें
नागरिकता देने में दो वर्ष गुजार दिये।
पं. नेहरू ने इस दिशा में बड़ी कोशिशें
कीं। कॉ. अशरफ से उन्होंने आग्रह किया
कि कश्मीर की जनता का इतिहास
लिखने की योजना में वे श्रीनगर में
रहकर काम करें। दो वर्ष बाद दिल्ली
यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में
इतिहास विभाग के अध्यक्ष बनाये गये।
डॉ. अशरफ का व्यक्तित्व मिश्रित भारतीय
संस्कृति का प्रतीक था। उन्हें अपने
भारतीयपन और राजपूत वंश परंपरा
का गौरव था। इंगलैंड से भारत लौटने
पर जब उन्होंने भारतीय नागरिकता के
लिए पं. जवाहरलाल नेहरू और मौलाना
अबुलकलाम आजाद, दोनों से भेंट कर
अपने आग्रह के लिए तर्क पेश किया
और नेहरू ने मजाक में यह कहकर
अशरफ को नाराज कर दिया कि ‘‘अब
आप भारतीय नहीं हैं।’’ इस पर डॉ.
अशरफ ने गुस्से से जवाहरलाल नेहरू
से कहा थाः ‘‘मैं आपसे ज्यादा भारतीय
हूं। मैं राजपूत हूं’’।
उन्होंने भारतीय इतिहास कांग्रेसों
में कई पेपर प्रस्तुत किए।
1969 में विश्व विख्यात हम्बोल्ट
यूनिवर्सिटी में अतिथि-प्रोफेसर के रूप
में डॉ. अशरफ बर्लिन गये। बर्लिन में
दो वर्ष के प्रवास काल में अपने प्रिय
विषय पर उन्होंने गंभीर शोध और
अध्ययन किया। ‘‘मध्ययुग में भारत
की जनता की सामाजिक और
सांस्कृतिक स्थिति’’ के अध्ययन के
लिए इस बीच मास्को और ताशकंद
भी गये। उन्होंने प्रचुर सामग्री एकत्रित
की। इतिहास लिखने के अत्यंत
महत्वपूर्ण और बहुमूल्य कार्य को
असामयिक मृत्यु ने पूरा नहीं होने दिया।
56 वर्ष की उम्र तक देश की
आजÛादी और श्रमजीवी जनता के संघर्ष
में व्यस्त रहते हुए 1962 के 7 जून
को जर्मन जनवादी गणतंत्र की
राजधानी बर्लिन में हृदयगति रूक जाने
से उनकी जीवन-यात्रा का अंत हो
गया। उनकी मृत्यु का शोक व्यापक
राजनैतिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में मनाया
गया।


डॉ. के.एम. अशरफ को अपने देश
की संस्कृति और इतिहास की खोज का बहुत शौक था। वह भारत को
राजनीतिक आजÛादी के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक
तौर पर संपन्न और विकसित देखना चाहते थे। समाजवाद उनके जीवन का लक्ष्य था।
उनका जीवन पार्टी और देश के लिए समर्पित था। उनका बलिदान, पार्टी
तथा जनता के लिए उनका योगदान कॉ. अशरफ अपने देश का एक
प्रामाणिक इतिहास लिखना चाहते थे। राजा-रानियों का इतिहास नहीं, जनता
का इतिहास, समाज का इतिहास, जीवन के हर एक अंश का इतिहास। इतिहास
संबंधी बहुत-सी सामग्री एकत्रित कर, इतिहास लिखने की जवाबदेही नयी
पीढ़ी पर सौंप कर वह चले गये। वह स्वयं इतिहास के एक विषय बन गये।

  दादा गजेन्द्र सिंह जैसी प्रतिभाएँ इस संसार में सदियों में पैदा होते हैं। वह बहुयामी प्रतिभाओं वाले व्यक्ति थे।     दादा गजेन्द्र सिंह के 9वें स्मृति दिवस पर उनके पैतृक आवास हसनापुर में आयोजित स्मृति सभा को सम्बोधित करते हुए इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लाॅयर्स के उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक परमात्मा सिंह ने कहा कि गजेन्द्र सिंह जब मैं विधायक था तब वह भी विधायक थे उन्होंने अपना सारा जीवन जनहित, सभ्य एवं आदर्श समाज के निर्माण के संघर्ष को समर्पित कर दिया था। वह एक आदर्श जनप्रतिनिधि थे। 

                           सभा की अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार महंत बी0पी0 दास बाबा ने कहा कि देश को इस समय स्व0 गजेन्द्र दादा जैसी राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिभाओं की नितान्त आवश्यकता है। रिहाई मंच के संयोजक मुहम्मद शुऐब एडवोकेट ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक समरसता पर घोर संकट है यदि हम अब भी न जागे तो देश की दशा एवं दिशा क्या होगी, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि कोरोना की आड़ में केन्द्र एवं राज्य में स्थापित साम्राज्यी शक्तियों ने जनता का बड़ी निर्दयता के साथ शोषण किया है। अध्ययन करने की बात है कि समाजवादी शासित देशों में कोरोना का प्रभाव क्यो कम रहा। भाजपा नेता उमाशंकर वर्मा उर्फ ‘‘मुन्नू भैय्या’’ ने कहा कि कोरोना का संकट देश में अभी भी बरकरार है, ऐसे में कोई ढिलाई नहीं करना चाहिए, मोदी और योगी सरकार जनहित में कार्य कर रही है। साहित्यकार डा0 विनय दास ने दादा को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वह साहित्य एवं मानव धर्म प्रेमी थे और समाज में इनके समावेश के पक्षधर थे। हिन्दी साहित्य में विद्वान डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित ने दादा गजेन्द्र सिंह के सुपुत्र रणधीर सिंह सुमन की प्रशंसा करते हुए कहा कि कम लोग हैं जो अपने पुरखों का स्मरण एवं सम्मान करते हैं, उन्होंने गजेन्द्र जी के साथ बिताए अपने स्मरणों की चर्चा की। 

                 सभा में पधारे आगन्तुकों का स्वागत करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि देश को साम्राज्यवादी शक्तियों ने दबोच रखा है और किसान, मजदूर और दबे-कुचले समाज का अस्तित्व घोर संकट में है। 

                                        वरिष्ठ पत्रकार एवं उर्दू दैनिक इंकिलाब के जिला संवाददाता मो0 तारिक खां के द्वारा संचालित स्मृति सभा में जिला टैक्स बार के अध्यक्ष पवन कुमार वैश्य, नवीन सेठ, उपेन्द्र सिंह एडवोकेट, सिटी इण्टर कालेज के प्रधानाध्यापक विजय प्रताप सिंह, रामनगर डिग्री कालेज के प्रवक्ता डाॅ0 इकबाल बहादुर सिंह, कमल सिंह चंदेल, कामरेड डाॅ0 कौसन हुसैन, डाॅ0 एस0एम0 हैदर ने भी अपने-अपने विचार रखते हुए स्व0 दादा गजेन्द्र सिंह को अपने श्रद्धां सुमन अर्पित किये। 

                               इस अवसर पर कलीम किदवई, आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष मो0 वसीम राईन, रिजवान राईन, प्रवीण कुमार, शिव दर्शन वर्मा, राम नरेश वर्मा, संजय, कृष्ण मोहन, पुष्पेन्द्र सिंह, नीरज वर्मा, विजय प्रताप सिंह, निर्मल वर्मा आदि लोग उपस्थित रहे। इस अवसर पर दादा गजेन्द्र सिंह की स्मृति में एक वाटिका का शिलान्यास परमात्मा सिंह एवं महंत बी0पी0 दास के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय का उद्घाटन आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने किया .इस अवसर पर मुखविर राज और आजादी के महानायक -1 तथा लोकसंघर्ष पत्रिका के विशेष अंक का विमोचन भी किया ने किया .
आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘ मोदी सरकार किसानों के सम्बंध में जिन कानूनों का निर्माण किया है उससे किसानों का कोई भला नहीं होने वाला है । ” मण्डी समाप्त हो जाने के बाद किसानों को न्यूनतम लागत मूल्य मिलने के बजाय 1,200 रूपये प्रति कुन्टल धान खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है और आवश्यक वस्तु अधिनियम से अनाज को बाहर कर बड़े पूंजीपतियों को सस्ते दामों पर खाद्यान्न खरीद कर स्टॉक करने का जो लाइसेन्स मिल गया है उससे शहरी उपभोक्ताओं को भी महंगे दाम पर खाद्यान्न खरीदना पड़ेगा । सरकार ने संविदा खेती की अनुमति देकर गांव में रहने वाले 80 प्रतिशत गरीब पिछड़े लोगों से बटाईदारी का हक छीन लिया है । कार्पोरेट सेक्टर के लोग गांव में छोटे और मंझौले किसान जो लोगों के खेत बटाई पर लेकर जीविकोपार्जन करते थे उनका जीविकोपार्जन का साधन छीन लिया है । श्री यादव ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि बाराबंकी जिला प्रशासन ने आज से कुछ वर्ष पूर्व बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर बाराबंकी के किसानों की जमीन छीनने का प्रयास किया था , जिसका विरोध आल इण्डिया किसानसभा के पदाधिकारी होने के नाते गांव – गांव जाकर विरोध कर उस प्रस्ताव को रद्द कराया था लेकिन योगी सरकार के आने के बाद जिला प्रशासन के अधिकारी किसानों की जमीन को छीनने के लिए बाराबंकी विकास प्राधिकरण का प्रस्ताव तैयार किया है जिसका किसानसभा भरपूर विरोध करेगी और किसानों की एक इंच जमीन भी प्राधिकरण को नहीं देने देंगे । वि सान सभा आने वाले दिनो में किसानों की जमीन बचाने के लिए आन्दोल । का रास्ता अख्तियार करेगी।भारतीय कम्युनिस्टपार्टी के इस कार्यक्रम के अवसर पर पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीरसिंह सुमन ,पार्टी के जिला सचिव ब्रजमोहन वर्मा ,सह सचिव डॉ कौसर हुसेन ,शिव दर्शन वर्मा ,किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ,उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार ,गिरीश चन्द्र ,वीरेंद्र कुमार ,अमर सिंह ,महेंद्र यादव ,आशीष शुक्ला,रमेश वर्मा ,मुनेश्वर ,रामदुलारे यादव ,श्याम सिंह एडवोकेट ,अंकुल वर्मा सहित सैकड़ों लोग थे .

मुंबई: वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और लोकसभा के पूर्व सदस्य रोजा देशपांडे का बुढ़ापे के कारण शनिवार दोपहर यहां उनके आवास पर निधन हो गया।

देशपांडे, 9 1वर्षीय , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक, श्रीपाद अमृत डांगे की बेटी थीं।

वह एक बेटे और एक बेटी से बचे हैं।

देशपांडे ने संयुक्ता महाराष्ट्र आंदोलन (महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के लिए आंदोलन) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य के रूप में गोवा मुक्ति संघर्ष में हिस्सा लिया था।

1974 में, वह बॉम्बे दक्षिण मध्य निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं।

उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश का लाभ प्राप्त करने के लिए एक अभियान का नेतृत्व किया था, और विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकार की समितियों में श्रम समस्याओं, विशेष रूप से महिला श्रमिकों की सेवा की।

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।

भवानी शंकर सेनगुप्ता का जन्म

26 जनवरी 1909 को खुलना

जिले के फूलटोला थाने के भैरव

नदी किनारे स्थित पयग्राम में हुआ

था। अब वह स्थान बांग्लादेश में स्थित

है। वे अत्यंत अल्प साधनों वाले

मध्यम-वर्गीय परिवार के थे। उनके

पिता का नाम हर्षित सेनगुप्त और

माता का नलिनीबाला था। प्रारंभिक

शिक्षा करने के बाद भवानी सेन 13

वर्ष की उम्र में गांव छोड़ 20मील

दूर मूलधर फूफी के घर चले गए।

इसका कारण था परिवार की गरीबी।

वहां उसने 1921 में खररिया हाई

स्कूल में प्रवेश ले लिया। 1927 में

मैटिक पास करने के बाद मूलधर

छोड़ दिया।

राजनैतिक गतिविधियों का आरंभ

वह असहयोग आंदोलन का

जमाना था। हथकरघे और चरखे ने

उनकी देशभक्ति की भावनाओं को

जगा दिया था। प्रत्येक रविवार वे

स्कूल के अपने सहपाठियों के साथ

‘हित साधन समिति’ के स्वयंसेवक

के रूप में मुष्टि-भिक्षा के लिए निकल

जाया करते। इस काम में उन्हें अत्यंत

ही आनंद मिलता। 1926 में उन्होंने

एक कताई प्रतियोगिता में प्रथम

पुरस्कार जीता। वे चरखा चलाने में

निपुण हो गए थे।

1929 में ही मूलधर में खुलना

जिला राजनैतिक सम्मेलन का

अधिवेशन आयोजित किया गया।

देशबंधु सी.आर. दास आनेवाले थे

लेकिन नहीं आ पाए, इसलिए

वीरेंद्रनाथ सस्भाल ने उनका स्थान

लिया। भवानी सेन के शब्दों में ‘‘इसी

समय मैं अव्यक्त रूप से क्रांति के

शिविर में आ गया।’’

भवानी सेन निर्मल दास के मार्फत

‘जेसोर-खुलना दल’ के नेता प्रमथ

भौमिक के संपर्क में आ गए। दल

डॉ. भूपेंद्रनाथ दत्त के प्रभाव में

मार्क्सवाद की ओर झुकने लगा। यह

1925 की बात है। साथ ही भवानी

ने टैगोर तथा अन्य द्वारा रचित साहित्य

में भी दिलचस्पी ली। उन्होंने लिखा है

कि मूलधर हाई इंगलिश स्कूल से

मैट्रिक करके प्रथम श्रेणी की

स्कॉलरशिप पाई। वे दौलतपुर के हिन्दू

अकादमी में इंटरमीडियट में भर्ती हो

गए और छात्रवृत्ति प्राप्तकर्ता की

हैसियत से उन्हें निःशुल्क छात्रावास,

भोजन तथा मुक्त पढ़ाई मिला करती।

कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनियां-23

भवानी सेनः बहुमुखी प्रतिभा युक्त साथी

इस बीच उन्होंने लेनिन, ट्रॉट्रस्की,

पोस्टगेट, एम.एन.रॉय, इ. लेखकों की

पुस्तकें पढ़ डालीं। प्रमथ भौमिक के

अलावा उनका परिचय विष्णु चटर्जी

से हुआ जो आगे चलकर बांग्लादेश

के महान किसान नेता बने।

1929 में इंटरमीडियट पास

करने के बाद कलकत्ता चले गएऋ

उन्हें फिर छात्रवृत्ति मिली। उन्होंने

स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अर्थशास्त्र

में ऑनर्स के साथ पढ़ाई की। उनकी

फीस माफ थी।

चटगांव शास्त्रगार कांड के बाद

प्रमथ भौमिक भूमिगत हो गए। उस

वक्त भवानी बी.ए. की परीक्षा की

तैयारी में लगे हुए थे। प्रमथ उनसे

गुप्त रूप से मिले और ट्रेड यूनियन

का काम करने तथा कम्युनिस्ट पार्टी

से संपर्क बनाने की सलाह दी। सुभाष

चंद्र बोस ने इन युवाओं को अपने

दल में शामिल करने का प्रयत्न किया

था लेकिन प्रमथ की कोशिशों से यह

नाकाम हो गया।

मेरट षड्यंत्र केस के दौरान बाहर

के साथियों में भवानी ने बी.टी.आर

तथा अन्य कुछ साथियों से संपर्क

किया लेकिन उन्हें उनका रूख पसंद

नहीं आया। कुछ समय तक भवानी

सेन ने ‘कारखाना’ नामक साप्ताहिक

का सम्पादन किया लेकिन बिना नाम

के। वे 22 मई 1932 को गिरफ्तार

कर लिए गए और अलीपुर सेंट्रल

जेल भेज दिए गए। वहां वे

फरवरी1933 तक रहे। फिर

हिजली कैम्प भेज दिए गए। वहां

उनकी मुलाकात जेसोर-खुलना ग्रुप

के पुराने साथियों से हुई। वे कम्युनिस्टों

के प्रवक्ता बन गए। जेल के अंदर

‘अनुशीलन’ वालों के साथ मार्क्सवाद

पर जमकर वाद-विवाद हुआ। उन्होंने

सबों पर विजय पाई और मार्क्सवादी

विद्वान के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी।

कई लोग कम्युनिस्ट बनने लगे।

जुलाई 1933 में भवानी सेन

का तबादला प्रेसिडेन्सी जेल कर दिया

गया। वहां कई लोग उन्हें जानते थे

और उनका ज्ञान का लोहा मानते थे।

वहां कॉ. गोपाल हलधर भी थे।

देवली कैम्प में

1934 में भवानी सेन को सुदूर

देवली कैम्प भेज दिया गया। वहां

विभिन्न क्रांतिकारी गुटों के नेता और

सदस्य भी थे। वहां प्रमथ भौमिक,

धरणी गोस्वामी, रेवती बर्मन, पांचु

गोपाल भादुरी, जीतेन घोष ;बाद में

बांग्लादेश मेंद्ध, सरोज आचार्य, सुधांशु

अधिकारी, इ. थे।

मार्क्सवाद पर क्लास लगने लगे

और मार्क्सवादी दर्शन संबंधी भवानी

सेन के लेक्चर काफी लोकप्रिय होने

लगे। कुछ लोग कम्युनिस्टों से ईर्ष्या

करने लगे। बात यहां तक बढ़ गई

कि कई कम्युनिस्ट विरोधी नजरबंदों

ने 1936 में एक दिन कम्युनिस्टों

की खूब पिटाई कर दी। कम्युनिस्टों

की संख्या कम थी। भवानी सेन को

बहुत पीटा गया और वे बेहोश हो गए।

कई कम्युनिस्टों को अस्पताल भेजना

पड़ा।

इस घटना के कुछ दिनों बाद

स्थिति में परिवर्तन होने लगा और

पिटाई करने में प्रमुख भूमिका अदा

करने वाला स्वयं ही कम्युनिस्ट बन

गया! भवानी ने दंगाइयों के नाम बताने

से इन्कार कर दिया। इस पर दंगा

करने के आरोप में उन्हें दो हफ्ते

‘‘काल-कोठरी की सजा’’ दी गई

उन्हें एम.ए. ;अर्थशास्त्रद्ध की परीक्षा में

भी देवली से ही बैठना पड़ा।

देवली में ढेर-सारी किताबें हुआ

करतीं। उन्होंने जेम्स जीन्स, एडिंगटन,

मैक्स प्लैंक से लेकर भारतीय दर्शन

संबंधी पुस्तकें भी पढ़ लीं। प्रमथ

भौमिक के अनुसार, अंग्रेजी में उपलब्ध

हेगेल की सारी रचनाएं उन्होंने पढ़

रखी थीं। उन्होंने मार्क्स की पूंजी का

अध्ययन किया।

1936 में वे देवली में कम्युनिस्ट

समन्वय समिति ;कोऑर्डिनेशन

कमिटिद्ध में शामिल हो गए। उनके

साथ-साथ धरणी गोस्वामी, रेवती

बर्मन, प्रमथ भौमिक, पांचु गोपाल

भादुरी, सुशील चटर्जी और लगभग

सौ अन्य नजरबंद भी शामिल हो गए।

देवली कैम्प में पहली बार 7

नवंबर 1936 को सुशील चटर्जी

के कमरे में ‘‘नवंबर क्रांति दिवस’

मनाया गया। पांच कैम्पों से लगभग

125 नजरबंद इसमें शामिल हुए।

भवानी सेन का भी भाषण हुआ।

1937 में उन्हें देवली से हटाकर

कोमिल्ला में एक गांव में रहने पर

मजबूर किया गया। विभिन्न जेलों में

छह वर्ष बिताने के बाद अगस्त

1938 में वे रिहा कर दिए गए।

रिहा होने पर भवानी सेन अपने

घर और परिवार के पास नहीं गए।

इसके बजाय वे कलकत्ता चले गए।

उन्होंने पूर्वी बंगाल रेलवे वर्कर्स यूनियन

के कांचरापाड़ा और लिलुआ केंद्रों में

रेलवे मजदूरों के बीच काम करना

आरंभ कर दिया। 1938 में उन्हें

रेलवे पार्टी शाखा में सदस्यता मिल

गई। वे पूर्व बंगाल रेलवे वर्कर्स यूनियन

के संगठन सचिव चुने गए।

1940 में उन्हें कलकत्ता से

निष्कासित कर दिया गया। वे तुरंत

भूमिगत हो गए। भूमिगत रहते हुए ही

उन्होंने इंदिरा सेन से विवाह कर

लिया। 1947 में इंदिरा बीमार हो

गईं और मृत्यु-पर्यन्त कई वर्षों तक

बीमार रहीं। भवानी सेन ने बड़े शांत

भाव से ये सारे दुख झेले और परिवार

की देखभाल की। 1942 में जब

पार्टी पर से पाबंदी हटाई गई तो उन्हें

भा.क.पा. की प्रांतीय समिति का

कार्यकारी सचिव बनाया गया। अब वे

खुलकर काम करने लगे। मई

1943 बंबई में आयोजित प्रथम पार्टी

कांग्रेस में उन्हें केंद्रीय समिति का

सदस्य बनाया गया।

बंगाल का महा-अकाल, 1943

1943-44 में बंगाल में

भयंकर महा-अकाल पड़ा जिसमें तीस

लाख से भी अधिक लोग मारे गए।

अकाल की पृष्ठभूमि में 1944 में

भवानी सेन ने बंगला में ‘भंगनेर मुखे

बांग्ला’ ;बर्बादी के कगार पर बंगालद्ध

नामक पुस्तक लिखी। यह अंग्रेजी में

‘रूरल बंगाल इन रूइन्स’ के शीर्षक

तले प्रकाशित हुई।

यु(ोत्तर साम्राज्यवाद-विरोधी

उभार, 1945-47

इस दौर की विभिन्न घटनाओं के

दौरान भवानी सेन एक गंभीर और

सुयोग्य नेता के रूप में उभर आए।

29 जुलाई 1946 को सारा बंगाल

बंद रहा। कांग्रेस और फॉरवर्ड ब्लॉक

के कुछ शरारती तत्वों ने पार्टी दफ्तर

पर हमले किए। भवानी सेन ने

शांतिपूर्वक स्थिति का सामना किया।

‘कलकत्ता नरसंहार’ और

नोआखाली के भयानक दंगे हुए।

भवानी ने संतुलन बनाए रखा। वे

बेलियाघाटा में गांधीजी से मिले और

संप्रदायवाद-विरोधी अभियान में पार्टी

के पूर्ण समर्थन की घोषणा की।

भवानी सेन की क्षमता 1946

में आरंभ हुए तेभागा आंदोलन के

दौरान उभरी। वे इस महान किसान

संघर्ष के रणनीति-निर्धारक, प्रमुख

प्रवक्ता, प्रचारक, लेखक और

संगठनकर्ता थे।

दूसरी पार्टी कांग्रेस, 1948

फरवरी-मार्च 1948 में भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी की दूसरी पार्टी

कलकत्ता में ही संपन्न हुई। उन्होंने

कांग्रेस में सक्रिय भूमिका अदा की।

वे केंद्रीय समिति और पोलिट ब्यूरो

के सदस्य चुने गए। बंगाल में पार्टी

अवैध घोषित कर दी गई।

इस दौर के जीवन का एन.के.

कृष्णन ने बड़ा ही दिलचस्प वर्णन

किया है। वे भी पॉलिट ब्यूरो सदस्य

थे और भवानी सेन के साथ एक ही

‘डेन’ ;अड्डेद्ध में रहते थे। वहां दोनों

को ही स्वादिस्ट बंगला खाना बनाना

सीखने का मौका मिला।

पोलिट ब्यूरो सदस्य के रूप में

भवानी सेन भी अन्य साथियों के साथ

संकीर्णतावादी दुस्साहिक लाईन के

लिए जिम्मेदार थे। 1951 में उन्होंने

इस संबंध में आत्म-आलोचना की।

उनकी आत्म-आलोचना सबसे स्पष्ट

और सबसे खरी थी।

वे 1951 के पार्टी सम्मेलन में

पार्टी सदस्यता से एक साल के लिए

मुअत्तल कर दिए गए। उन्होंने यह

फैसला सच्चे मन से मान लिया और

निचले स्तर से काम शुरू किया।

लेकिन उन्हें अनावश्यक रूप से

प्रताड़ित किया गया। उनका नाम

पूरावक्ती कार्यकर्ताओं की लिस्ट से

हटा दिया गया और अपना बंदोबस्त

खुद करने को कहा गया। इसलिए

उन्हें किसान सभा के ऑफिस में रहना

पड़ा। उन्हें पार्टी की साप्ताहिक पत्रिका

‘मतामत’ का उप-संपादक बनाया

गया। बाद में वे बारासात चले गए

और 24-परगना के किसानों के बीच

काम करना आरंभ किया।

1954 में उन्हें अखिल भारतीय

किसान सभा का महासचिव चुना गया।

उन्होंने बदलते कृषि संबंधों का काफी

अध्ययन किया और कई पुस्तकें

लिखीं। 1955 में उन्होंने ‘भारतीय

भूमि व्यवस्था और भूमि सुधार’

प्रकाशित की। इस पुस्तक ने तहलका

मचा दिया। 1955 में पार्टी कांग्रेस

से पहले ‘फोरम’ में भी उनका लेख

प्रसि( हुआ। उस वक्त किसान और

कम्युनिस्ट आंदोलनों में कृषि के क्षेत्र

अनिल राजिमवाले

शेष पेज 6 परपूंजीवादी संबंधों के विकास के

बारे में काफी विवाद रहा। भवानी सेन

ने इसमें अग्रणी भूमिका अदा की।

वे किसानों से आसानी से संबंध

कायम कर लेते। साथ ही सै(ांतिक

अध्ययन भी करते। उन्होंने नए खेत

मजदूर वर्ग को पहचान लिया। इस

विषय में खासकर उन साथियों से

बड़ी बहस चलती जो आगे चलकर

पार्टी छोड़ गए। वे अ.भा. किसान सभा

के बनगांव अधिवेशन के प्रमुख

संगठनकर्ता थे।

1955 के बाद भावानी सेन ने

विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन की नई

प्रस्थापनाएं तेजी से आत्मसात करना

आरंभ किया। वे विश्व कम्युनिस्ट

सम्मेलनों के नए दस्तावेजों एवं

प्रस्थापनाओं के दृढ़ समर्थक बन गए।

1970 में बारासात में अ.भा.

किसान सभा ने अपना सम्मेलन किया

जिसके वे प्रमुख संगठकर्ता थे। वे

इसके अध्यक्ष चुने गए। लाखों लोग

उन्हें सुनने सभा-स्थल पर आए।

पार्टी में विभाजन और भावानी सेन

प. बंगाल की पार्टी इकाई लगातार

उनकी उपेक्षा करती रही। आगे

चलकर ये ही लोग पार्टी से बाहर

चले गए। 1962 में चीनी आक्रमण

के बाद स्थिति गंभीर हो गई। भवानी

सेन ने एक पुस्तक लिखीः

‘‘कम्युनिस्ट शिविर में मतभेद

क्यों?’’ इसकी दसियों हजार प्रतियां

भवानी सेनः बहुमुखी प्रतिभा युक्त साथी

बिकीं। संकीर्णतावादियों के बाहर जाने

के बाद पार्टी के प्रमुख साथियों ने

पार्टी के पुनर्गठन का कार्य आरंभ

किया। प. बंगाल में यह काम बहुत

कठिन था। पार्टी को लगभग

आरंभ-बिन्दु से शुरू करना पड़ा।

भवानी सेन ने अथक परिश्रम के जरिए

60 और 70 के दशकों में राज्य में

भा.क.पा. को फिर से खड़ा कर

लिया, बल्कि उसे एक महत्चपूर्ण शक्ति

का रूप भी दे दिया।

पार्टी संगठन में

1956 में पालघाट ;केरलद्ध

कांग्रेस में भवानी सेन पार्टी की केंद्रीय

समिति के सदस्य चुने गए। 1958

में वे भा.क.पा. की राष्ट्रीय परिषद

सदस्य चुने गए। 1961 में पार्टी की

राष्ट्रीय परिषद और केंद्रीय

कार्यकारिणी समिति में शामिल कर

लिए गए।

1964 में पार्टी में विभाजन के

बाद वे पार्टी की प. बंगाल राज्य

परिषद के सचिव बनाए गए। उसी

वर्ष बंबई कांग्रेस में वे पार्टी की केंद्रीय

कार्यकारिणी समिति के सदस्य चुने

गए।

1965 में उन्होंने कलकत्ता में

पार्टी की नई पुस्तक-दुकान स्थापित

की। वे ‘कालांतर’ अखबार के दैनिक

बनने के बाद इसके सम्पादक मंडल

के अध्यक्ष बन गए।

1968 में पटना में संपन्न पार्टी

कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रीय परिषद, केंद्रीय

कार्यकारिणी और पहली बार केंद्रीय

सेक्रेटारिएट में शामिल किया गया।

1971 में कोचीन पार्टी कांग्रेस में वे

फिर से केंद्रीय सेक्रेटारिएट में आ

गए। उन्हें अन्य कार्यों के अलावा पार्टी

शिक्षा का प्रभारी बनाया गया तथा पार्टी

स्कूल एवं सिलेबस को नया रूप देने

का कार्य उन्होंने अन्य साथियों के

साथ किया। इस सिलसिले में उन्होंने

बल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी

जर्मनी की यात्राएं कीं।

बांग्लादेश की मुक्ति में भवानी

सेन की भूमिका

1971 में पाकिस्तानी आक्रमण

के विरू( बांग्लादेश मुक्ति-आंदोलन

की सहायता में भवानी सेन की भूमिका

को आज भी याद किया जाता है।

मुक्ति संघर्ष को बिरादराना सहायता

देने में उनकी भूमिका आमतौर पर

अनजानी है। उन्होंने प. बंगाल की

सीमावर्ती जिलों में पार्टी साथियों को

बांग्लादेश के साथियों का स्वागत और

सहायता करने के इंतजाम का आदेश

दिया। उन्हें केंद्रीय पार्टी से बांग्लादेश

के संबंध में विशेष जिम्मेदारी दी गई

थी। जेसोर, खुलना तथा अन्य

सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण का विशेष

इंतजाम किया गया। भवानी सेन ने

व्यापक दौरा किया, यहां तक कि वहां

की जनता को संबोधित भी किया।

उन्होंने अद्भुत कार्य किया। मुक्ति के

बाद वे कई बार बांग्लादेश गए।

भवानी सेन की मृत्यु 10 जुलई

1972 को मास्को में हृदय-गति

रूकने से हो गई। वहां वे इलाज के

लिए गए थे।

ठबाराबंकी। विकास प्राधिकरण बाराबंकी का गठन का प्रस्ताव पहले भी हुआ था, लेकिन किसानों के विरोध के कारण प्रस्ताव ठण्डे बस्ते में चला गया था और अब जिला प्रशासन फिर किसानों की जमीन को औने-पौने दामों पर खरीदकर किसानों को बेरोजगार कर देना चाहते हैं, जब मजदूर गुजरात महाराष्ट्र से जब वहां से भागे तो उन्हें गांव में ही ठिकाना मिला था। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर सरकार किसानों की जमीन छीन लेना चाहती है। पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि एक तरफ किसानों की जमीन छीनी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों की नौकरी छिन रही हैं, यह सरकार नरभक्षी सरकार है। सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने भी कहा कि ओ0पी0डी0 अविलम्बह खोली जाये, जनता को इलाज मिल सके। जुलूस छाया चैराहे से जिलाधिकारी कार्यालय बाराबंकी तक गननभेदी नारे लगाते हुए आया। जिसका नेतृत्व किसान सभा अध्यक्ष विनय कुमार सिंह, पार्टी के सह सचिव डाॅ0 कौसर हुसैन व किसान सभा उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने योगी-मोदी मुर्दाबाद, नरभक्षी सरकार बदलनी है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद आदि नारे लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। 

प्रदर्शनकारियों में प्रमुख लोग अंकुल वर्मा, श्याम सिंह, विनीत वर्मा, अलाउद्दीन, नीरज वर्मा, महेन्द्र यादव, आशीष, प्रदीप, रितेश यादव, शिवम यादव, पवन पाण्डे, अभिषेक, दीपक, लव त्रिपाठी, भूपेन्द्र प्रताप सिंह, सहजराम, गिरीश चन्द्र, वीरेन्द्र वर्मा, सहजराम, कल्लूराम प्रधान, अमर सिंह गुड्डू आदि प्रमुख लोग थे। 

 बिहार में महागठबंधन सरकार बनेगी-अतुल कुमार अंजान राष्ट्रीय सचिव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 

पिछले  कुछ दिनों से कामरेड अतुल कुमार अंजान की तबियत खराब होने के कारण

बिहार चुनाव की प्रभावी तैयारियों में कमी महसूस की जा रही थी लेकिन खुदा बड़ा कारसाज है कामरेड अतुल कुमार अंजान के स्वास्थ्य में अचानक तेजी से सुधार हो रहा है और बिहार चुनाव में उनके सक्रिय रुप से भाग लेने की सम्भावनाएं बढ गई है जिससे विपक्षी खेमे के ऊपर विपरीत प्रभाव पड रहा है।

कामरेड अतुल कुमार अंजान का हिन्दी भाषी प्रदेशों में विशेष प्रभाव है। 

हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अतुल कुमार अंजान बहुत ही प्रभावी वक्ता है।

1974 मेें ब्लिट्ज के संपादक  आर के करंजिया लखनऊ आए उस अवसर का एक फोटो है। जनरल हबीबुल्ला  रामेंद्र वर्मा हमीदा हबीबुल्लाह करंजिया रमेश सिन्हा बिशन कपूर  और भैय्याजी

 सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट और

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा महिला आंदोलन के संगठनकर्ताओं में एकविमला डांग का जन्म 26दिसंबर 1926 को लाहौर में हुआ था। वे उन बहुत-ही थोडे़ कम्युनिस्टों में थीं जिन्हें भारत सरकार से ‘पद्मश्री’ 1992 पाने का सम्मान मिला था।

विमला के पिता का नाम औतार लाल बकाया था जो बी.बी.सी. रेडियो में ब्रॉडकास्टर थे। वे लंदन में रहा करते थे और उदार राष्ट्रवादी विचारों के थे। विमला की मां कमला और उनकी छोटी बहन 1931 में रोम गईं। जहां उन्होंने मैडम मारिया मांटेसरी की देखरेख में मांटेसरी डिप्लोमा कोर्स

किया। कमला उन प्रथम चार भारतीय महिलाओं में थीं जो मांटेसरी टीचर बनीं। वापस लौटकर कमला ने लाहौर

में सर गंगाराम गर्ल्स हाईस्कूल में नौकरी

कर ली। आगे उन्होंने ही समूचा परिवार संभाला, खासकर विमला के पिता की

लदंन में 1943 में मत्यु के बाद। आरंभिक पढ़ाई

लाहौर का सर गंगाराम गर्ल्स हाई स्कूल शानदार संस्था थी। उसकी देखरेख सरोजिनी नायडू की छोटी बहन मृणालिनी चट्टोपाध्याय करती थीं। वहां न सिर्फ उच्च कोटि की पढ़ाई होती थी बल्कि देशभक्ति की भावना भी विद्यार्थियों में भरी जाती थी। विमला पढ़ाई में बहुत

तेज थीं और खेलकूद में भी। जल्द ही वह स्पोर्ट्स कैप्टन बन गई। तीर-धनुष

चलाना सीखा, गाना गाना भी सीखा,जिसमें वह प्रथम आई।

मृणालिनी चट्टोपाध्याय के प्रिंसिपल बनने के बाद स्कूल में काफी परिवर्तन आए। विमला स्कूल के वॉल-पेपर

दीवार पर लगाया जाने वाला अखबार  ‘फॉरवर्ड’ के संपादकीय मंडल में शामिल हो गई। महात्मा गांधी का

जन्मदिन और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाने लगा। विमला ने गांधीजी की प्रशंसा में गीत भी लिखे।

मृणालिनी की बहन सुहासिनी ने लाल झंडे की प्रशंसा में और ‘इन्टरनेशनल’ उठ जागों भूखे बंदी’ गाए। विमला

इन गतिविधियों से गहरे रूप में प्रभावित हुई। उसने सुहासिनी से रूसी क्रांति के

बारे में भी काफी कुछ सुना। सुहासिनी बंबई में रहा करती थी लेकिन अपनी बहन मृणालिनी से मिलने लाहौर जाया करतीं। गंगाराम स्कूल में उनकी मुलाकात विमला के माता-पिता से हुई। 1944 में विमला और उनके भाई

रवि बकाया आगे पढ़ाई के लिए बंबई चले गए। विमला को विल्सन कॉलेज

में दिखला मिला। उसने अर्थशास्त्र में ऑनर्स कोर्स किया। उसे जल्द ही स्कॉलरशिप मिल गई।

ए.आई.एस.एफ. से संपर्क

जल्द ही विमला का संपर्क बॉम्बे स्टूडेंट्स यूनियन के साथ हुआ। उसने कॉलेज में स्टूडेंट्स फेडरेशन बनाना शुरू किया किया। वहां

स्टूडेंट्स कांग्रेस भी सक्रिय थी। एस.एफ. के सदस्य पार्टी अखबार ‘पीपुल्स वार’ बेचा करते और पार्टी साहित्य भी।

एस.एफ. ने बंगाल अकाल के लिए ‘बंगाल बचाओ’ काउंटर भी बनाए।

उन्होंने राहत समिति का गठन भी किया।

विमला बी.एस.यू. ऑफिस रोज जाया करती। साथ ही रवि बकाया और सत्यपाल डांग मिलकर फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन के ऑफिस भी जाया करते।

इस बीच सत्यपाल भी पढ़ाई के लिए बंबई आ गए थे। जल्द ही सत्यपाल

डांग बॉम्बे स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव बन गए।

विमला का परिवार बंबई आ गया था सुहासिनी से इस परिवार के संबंध अधिक गहरे हो गए। इससे बेहतर

कम्युनिस्ट और क्रांतिकारी बनने में सहायता मिली।

कॉलेज में रूसो के सुप्रसिद्ध वक्तव्यः ‘‘मनुष्य आजाद जन्म लेता है लेकिन वह सभी जगह गुलामी की जंजीरों में

बंधा है’’ पर वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। विमला ने भी

उसमें हिस्सा लिया। इसमें ‘द स्टूडेंट’ के संपादक सुब्रत सेनगुप्ता से उन्हें बड़ी मदद मिली।

बंबई में जन-उभार, 1946

जनवरी 1946 में सुभाषचंद्र बोस के जन्मदिन के अवसर पर बंबई में विशाल प्रदर्शन फूट पड़े। पूरे शहर में

हड़ताल रही और दुकानें बंद रहीं। ग्रांट रोड स्टेशन से विल्सन कॉलेज जाते

समय चारों ओर आंसू गैस और फायरिंग के निशान थे। विल्सन कॉलेज में

हड़ताल हो गई। अंग्रेजी राज के खिलाफ नारे लग रहे थे। स्टूडेंट्स फेडरेशन और स्टूडेंट्स कांग्रेस का संयुक्त जुलूस निकला। स्टूडेंट्स कांग्रेस के विद्यार्थियों

ने कहा कि वे मिलकर संघर्ष करेंगे।

विद्यार्थी एकता के नारे लगने लगे।

एक बड़ी आम सभा हुई। ‘प्रार्थना समाज’

के पास फायरिंग में दो व्यक्ति घायल हो गए थे।

उसी रात भा.क.पा. केंद्रीय कार्यालय पर गुंडों द्वारा आक्रमण किया गया।

रवि बकाया भी वहीं थे। आग लगाने का प्रयत्न विफल कर दिया गया। पूरा स्टॉफ जमकर लड़ा। बलराज साहनी

घायल हो गए। दूसरे दिन अखबारों में इस तोड़फोड़ की खबर प्रकाशित हुई।

सत्यपाल डांग भी वहां थे।

जनवरी से मार्च 1946 तक

जनआंदोलन चलता रहा। विमला ने परीक्षा के लिए छुट्टी ले ली। वह अब एम.ए.अर्थशास्त्र में पढ़ रही थी।

फरवरी ;1946 के अंतिम

सप्ताह में बंबई में ब्रिटिश रायल इंडियन नेवी ;आर.आई.एन. विद्रोह हुआ जिसमें विद्रोही नाविकों ने लाल झंडा फहराया

था। इसके समर्थन में ए.आई.एस.एफ.

और बी.एस.यू. ने सक्रिय आंदोलन चलाया जिसमें विमला ने भी हिस्सा

लिया। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़ी। विल्सन कॉलेज

तथा अन्य जगहों के विद्यार्थियों ने भूख-हड़ताल करके अपना खाना

जहाजों पर पहुंचाया। अंग्रेज सरकार ने नौसैनिकों के लिए खाना-पानी और

ईधन की सप्लाई बंद कर दी थी।

25 फरवरी को विमला को लोकल ट्रेन बीच में ही छोड़नी पड़ी और वह परेल स्थित पार्टी ऑफिस चली गई।

सभी महिला साथियों को अपने-अपने घर जाने का निर्देश दिया गया।

विद्यार्थियां ने के.ई.एम. अस्पताल में रात-दिन घायलों की सेवा की। बी.

एस.यू ने कैसल बैरक्स में प्रदर्शन किया।

नरगिस बाटलीवाला ने विमला से बातचीत की और विमला को ‘पार्टी फ्रैक्शन’’ में ले लिया गया। इसमें सत्यपाल डांग और रवि सिन्हा भी

शामिल थे। इस बीच विमला के बड़े भाई शशि बकाया की बंबई में ही मृत्यु हो गई। वे भी पार्टी से संबंधित थे।

शशि ने कई क्रांतिकारी गीत लिखे जो आगे चलकर विद्यार्थी तथा अन्य

आंदोलनों में गाए गए। बंबई के विद्यार्थी ‘स्क्वाड’ ने ये गाने विभिन्न अवसरों पर खूब गाए।

एम.ए. की पढ़ाई विमला बकाया ने स्कूल ऑफ

इकोनोमिक्स में एम.ए. में दाखिला ले लिया। उन्होंने कपड़ा उद्योग पर शोध

कार्य किया। सत्यपाल और रवि सिन्हा भी उसी इंस्टीच्यूट में भर्ती हो गए।

विमला नियमित रूप से लाइब्रेरी में काम करती थीं। वहां ए.आई.एस.एफ.

गठित किया गया और यूनियन के चुनावों में भी साथियों ने काम किया।

विमला तथा अन्य साथियों ने मालाबार हिल्स इलाके से काफी फंड इकट्ठा किया।

भा.क.पा. की प्रथम कांग्रेस में

1943 विमला बकाया ने भा.क.पा. की प्रथम कांग्रेस ;बंबई,1943 में पंजाब

से सांस्कृतिक ग्रुप के सदस्य के रूप में भाग लिया। बाबा सोहन सिंह भखना,

सोहन सिंह जोश, तेजा सिंह स्वतंत्र तथा अन्य कई सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट साथ थे।

यह बंबई जाने का विमला के लिए पहला मौका थाः ऊंची बिल्डिंगें, चौड़ी

सड़कें, लोकल ट्रेनें, समुन्दर का किनार। भा.क.पा. के शीर्षस्थ नेताओं को देखने-सुनने का अवसर मिला।

पी.सी. जोशी, डॉ. अधिकारी, बी.टी.आर. रणदिवे, सज्जाद जहीद, अमीर हैदर खान, वगैरह। सत्यपाल डांग भी

गए थे। बिनोय रॉय का बंगाल इप्टा ग्रुप बड़ा प्रभावशाली था। मखदूम मोहिउद्दीन के गीत बड़े प्रचलित हुए।

लाहौर लौटने पर विमला को पार्टी में शामिल कर लिया गया। पार्टी केंद्र से अरूण बोस को कॉलेज में बोलने

के लिए आमंत्रित किया गया। उनके स्वागत में राष्ट्रगीत गाए गए।

इसके बाद अरूण बोस ने

विद्यार्थियों के लिए पार्टी स्कूल में लेक्चर दिया। विमला एकमात्र छात्रा थी।

बंगाल का अकाल ;1943

1943 में बंगाल में महा-अकाल पड़ा। ए.आई.एस.एफ. ने राहत-कार्य के लिए अपना दल भेजा। पंजाब से

चार विद्यार्थी गए जिनमें विमला और सत्यपाल भी शामिल थे। वे सूखा पीड़ितों

के लिए कपड़े ले गए। विमला का ग्रुप रंगपुर जिला गया जो बिनोय रॉय का घर था। उनकी बहन रेवा रॉय भी साथ

आईं। विमला ने डायरी लिखी। वे सभी कई-कई घंटे अपना सामान ढोते हुए

चला करते। चारों ओर सूखी हड्डियों वाले लोग भूखे-नंगे, यहां तक लाशें

और हड्डियां बिखरी मिलतीं। ‘राहत

कैम्पों’ में स्थिति भयानक थी। विमला

बकामा ने कई जगह ‘‘सुनो हिन्द के

रहने वालों, सुनो, सुनो…..’’।

दो सप्ताह बाद ग्रुप कलकत्ता वापस

आ गया। पंजाब स्टूडेंट्स फेडरेशन ने

‘बंगाल सहायता’ अभियान चलाया।

विमला ने अनीता और सावित्री के साथ

मिलकर काफी काम किया। जल्द ही

विमला प्रादेशिक ए.एफ. की समिति में

शामिल कर ली गई।

अंतर्राष्ट्रीय यूथ कमिशन

1946 में ए.आई.एस.एफ. के

निमंत्रण पर अंतर्राष्ट्रीय यूथ कमिशन

भारत आया जिसमें सोवियत, यूगोस्लाव,

फ्रेंच और डैनिश प्रतिनिधि शामिल थे।

उन्हें बंबई घुमाया गया और विमला

तथा सत्यपाल उन्हें डी.आर.डी. वाडिया

के घर ले गए।

यूथ कमिशन के भारत से प्रस्थान

के बाद आई.यू.एस. ;इंटरनेशनल

यूनियन ऑफ स्टूडेंट्सद्ध के अंतर्राष्ट्रीय

कार्यालय में ए.आई.एस.एफ.का

प्रतिनिधि भेजने का सवाल आया। विश्व

युवा महोत्सव में भी शामिल होना था।

विमला बकाया का नाम प्रस्तावित हुआ।

जल्द ही विमला विदेश जाने की

तैयारियां करने लगी। उसे अंतर्राष्ट्रीय

कार्य की ट्रेनिंग दी जाने लगी। सत्यपाल

डांग की देखरेख में अंतर्राष्ट्रीय कार्य

के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श

हुआ। उस व डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. में ए.

आई.एस.एफ. की प्रतिनिधि विद्या कानूगा

के साथ हुए पुराने पत्राचार का अध्ययन

किया गया।

विमला बकाया जून 1947 में

‘एस.एस.समारिया’ नामक जहाज से

विदेश के लिए निकल पड़ी। जहाज

कैरो होते हुए 21 दिनों बाद लिवरपूल

पहुंचा। वे अपने साथ शहीदे-आजम

भगत सिंह की पेंटिंग्स तथा अन्य

महत्वपूर्ण चीजें ले जा रही थीं जिन्हें

संवेदनहीन कस्टम अफसरों ने नुकसान

पहुंचाया। कुमुद मेहता उनसे मिलने

आई थीं। वे लंदन पहुंचे। वहां विमला

की मुलाकात किट्टी बूमला, अरविंद

मेहता, डॉ. के.एम. अशरफ, शराफ अथर

अली और अन्य साथियों से हुई। उन्हें

ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर

ले जाया गया जहां उनकी मुलाकात

रजनी पामदत्त से हुई।

अगले दिन विमला प्राग के लिए

चल पड़ी। वह महोत्सव कार्यालय गई।

उनकी मुलाकात किट्टी हुकम, विद्या

कानूगा तथा अन्य से हुई। ऑस्ट्रेलिया

के बर्ट विलियम्य डब्ल्यू.एफ.डी.वाई. के

सचिव थे। 14 जुलाई 1947 को

फ्रांसीसी क्रांति दिवस मनाया गया।

सत्यपाल डांग भी प्राग पहुंच गए।

युवा महोत्सव के उद्घाटन समारोह

में विमला भारतीय प्रतिनिधिमंडल में

आगे-आगे चल रही थी। इसके कुछ

समय बाद आई.यू.एस. के परिषद की

बैठक में विमला ने हिस्सा लिया। यह

उसी जगह हुआ जहां महोत्सव

आयोजित किया गया था। मदन बकाया

और गुल झवेरी भी बंबई से आ गए।

महोत्सव के अंतिम दिन चेकोस्लोवाकिया

के राष्ट्रपति भी आए। इस प्रकार प्रथम

विश्व युवा महोत्सव संपन्न हुआ।

आई.यू.एस. के कार्यालय में एशिया

से केवल दो प्रतिनिधि थे-विमला

बकाया भारत से और इंडोनेशिया से

सुगियोनो। विमला ने अपने संस्मरणों

में लिखा है कि आरंभ में आई.यू.एस.

की कार्यप्रणाली काफी नौकरशाहीपूर्ण

थी। उनमें औपनिवेशिक देशों की

.अनिल राजिमवाले

समस्याओं की समझा की कमी थी।

इसलिए आई.यू.एस. ने एक

‘औपनिवेशिक ब्यूरो’ की स्थापना की

जिसमें विमला भी थीं।

विमला बकाया अथक परिश्रम से

अपना काम किया करतीं। वे सुबह 7

बजे ही ऑफिस चली जाया करतीं और

शाम 6 बजे अपने होस्टल लौटतीं।

आरंभ में उन्हें स्टूडेंट्स रिलीफ कमिटि

का इन्चार्ज बनाया गया। उन्हें

चेकोस्लोवाक कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर

जाने का भी मौका मिला।

प्राग में विमला को सुप्रसि(

क्रांतिकारी लेखक जूलियस फ्यूचिक

की पत्नी गुस्तावा फ्यूचिकोवा से मिलने

का अवसर मिला। जूलियस फ्यूचिक

प्रसि( पुस्तक ‘फांसी के तख्ते से’ के

लेखक थे। उनकी जर्मनों ने यातनाएं

देकर हत्या कर दी थी।

चेकोस्लोवाकिया एक तरह से

विमला का अस्थाई घर बन चुका था।

उसने कई जगहों पर भारत में शिक्षा

की स्थिति के बारे में भाषण दिए। उसके

साथ कई मौकों पर अंग्रेज विद्यार्थी टॉम

मैडन और आई.यू.एस.अध्यक्ष जोसफ

ग्रोहमान हुआ करते। विमला के भाषणों

में तथ्य और आंकड़ें भरे होते थे।

इस बीच उसकी जान-पहचान

कारमेल ब्रिकमान और बेन फील्ड से

हुई जो औपनिवेशिक समस्या को

अधिक समझते थे। कारमेल यहूदी थी।

अंग्रेजी बोलनेवालों से जान-पहचान

बढ़ी। इसके अलावा, अई.यू.एस. में चेक

भाषा पढ़ाई जाने लगी।

जल्द ही जाम्भेकर, रेड्डी और रंगा

राव भी प्राग आ गए। आसपास का

वातावरण यु( के बाद कठोर था। जब

विमला डांगः पद्मश्री विभूषित

कभी विमला पत्र डालने जाती तो

पासपोर्ट दिखाना पड़ता था और पोस्ट

मास्टर को पत्र दिखाना पड़ता। सभी

को खाने के कूपन मिला करते। बाद

में आई.यू.एस. का अपना कैन्टीन चलने

लगा।

रूसी क्रांति दिवस धूमधाम से

मनाया गया जिसमें चेकोस्लोवाक नेता

भी शामिल हुए। विमला ने भी नृत्य

-संगीत में भाग लिया। उसे

स्विट्जरलैंड जाने का भी मौका मिला।

उसे प्राग में ओरिएन्टल इंस्टीच्यूट जाने

का अवसर भी मिला जहां प्रो. लेस्नी से

मुलाकात हुई। प्रो. लेस्नी कई बार शांति

निकेतन आ चुके थे।

भारत वापसी

विमला बकाया 1951 में भारत

लौटी। वह बंबई गई और वहां एक

विज्ञापन एजेंसी में उन्हें काम मिला।

उस वक्त पार्टी की स्थिति बहुत खराब

थी। ’बी.टी.आर. लाइन’ के चलते पार्टी

तहस-नहस हो चुकी थी। विमला को

अपना परिवार भी चलाना था।

10 अप्रैल 1952 को विमला

और सत्यपाल डांग का सरल तरीके से

रजिस्ट्री विवाह हुआ। यह तय हुआ कि

परिवार के लिए विमला नौकरी करती

रहेगी। 1954 में विमला के भाई रवि

बकाया के सोवियत रूस से लौटने के

बाद वे परिवार की सहायता करने लगे।

अब विमला डांग 1954 में छहरटा,

अमृतसर में सत्यपाल के पास चली

गई।

छहरटा में विमला और सत्यपाल

डांग लेबर कालोनी में आम मजदूरों

के ही समान एक कमरे वाले घर में

रहने लगे जिसमें सिर्फ एक छोटा-सा

आंगन था जहां पानी के लिए एक हैंड

पम्प लगा हुआ था। आंगन में ही खाना

बनाना और कपड़ा धोना हुआ करता।

यहां तक कि घर में शौचालय भी नहीं

था। अन्य कइयों के समान सुबह-सुबह

खेतों में जाना पड़ता था। दूसरे मजदूरों

के ही समान उन्हें भी पंजाब की

चिलचिलाती गर्मी बिना पंखे के गुजारनी

पड़ती थी। आम मजदूर उन दोनों से

बड़ा ही प्रेम करते। सारी कठिनाइयों के

बावजूद वे दोनों खुश थे। समय के

साथ अन्य मजदूरों के सामन उनकी

स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ।

शुरू में विमला डांग ने कॉलेज में

लेक्चरर काम ले लिया लेकिन 1958

में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और पार्टी

की पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गईं। छहरटा

डांग-द्वय के लिए आधी सदी से भी

अधिक अपना घर बना रहा।

जल्द ही विमला डांग छहरटा

म्युनिसिपल कमिटि की अध्यक्ष बन

गई। उनकी देखरेख में रोड तथा अन्य

निर्माण के कई कार्य सम्पन्न हुए जैसे

रोडों पर लाइटें, अस्पताल, पानी,

इत्यादि। छहरटा पंजाब में वह पहला

शहर बना जहां महिलाओं के लिए ‘क्रैच’

बनाए गए। श्रमिक महिलाएं काम पर

जाने से पहले अपने बच्चे वहां देखभाल

के लिए रख जाया करतीं। बच्चों को

मुफ्त भोजन मिलता और उनकी बड़ी

अच्छी देखभाल होती। छहरटा भ्रष्टाचार

से पूरी तरह मुक्त था।

विधानसभा में

1947 में सत्यपाल डांग 

अमृतसर से विधान सभा के लिए जीते और 1980 तक एमएलए रहे।

1980 में वे हार गए। इसके बाद 1992 में विमला डांग को पार्टी की ओर से खड़ा किया गया और वे जीत

गईं। विमला डांग विधान सभा में कम्युनिस्ट ग्रुप की नेता रहीं।

विमला डांग गैर-पंजाबी कश्मीरी पंडितों के परिवार से थीं। वे बड़ा अच्छा

पंजाबी बोलना और लिखना सीख गई।

वे पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेजी में बहुत अच्छा भाषण देती थीं।

भारत-पाक युद्ध के दौरान

1965 में भारत-पाक युद्ध के

दौरान छहरटा पर पाकिस्तानी एयर फोर्स ने बमबारी की थी। विमला और सत्यपाल डांग ने नागरिक सुरक्षा व्यवस्था संगठित की। बमबारी के दौरान घायलों की चिकित्सा का इंतजाम किया

गया। विमला और उनकी टीम ने एक कैंटीन का इंतजाम किया जिसे एकता यूनियन ने आर्थिक मदद दी। वाघा

सीमा पर जाने वाले और वहां से लौटने वाले जवानों के लिए यह कैंटीन खोली गई थी। आसपास के गांवों के लोगों ने

दूध और अन्य सामग्री इकट्ठा की।

एकता यूनियन का ऑफिस नागरिक सुरक्षा का मुख्य केंद्र था जिसकी देखरेख स्व. जयकरण सिंह पठानिया कर रहे थे।

पंजाब स्त्री सभा का काम

विमला डांग की देखरेख में पंजाब स्त्री सभा एक मजबूत संगठन बन गया।

वे इसके संस्थापकों में थीं। सभा ने जनता खासकर महिलाओं ओर बच्चों

के लिए बड़े काम किए। अनाथ बच्चों की बड़ी मदद की। स्त्री सभा ने फंड

इकट्ठा किए और उन बच्चों को स्टाइपेंड का इंतजाम किया जिनकी देखभाल कारने वाला कोई नहीं था।

यह काम आतंकवाद के दौर में विशेष तौर पर किया गया। पंजाब स्त्री सभा ट्रस्ट रजिस्टर किया गया।

अखिल भारतीय महिला फेडरे में भी विमला डांग

की सक्रिय भूमिका रही। वे इसके संस्थापना सम्मेलन में उपस्थित थीं और उसकी कार्यकारिणी में चुनी गईं।

आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष

पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के दौर में विमला और सत्यपाल डांग उनके निशाने पर थे। उन दोनों ने न

सिर्फ आतंकवाद का विरोध किया बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष संगठित किया।

सैंकड़ों कम्युनिस्ट इस संघर्ष में अपनी जान गंवा बैठे। विमला-डांग की जान

खतरे में रही और उनकी सुरक्षा का इंतजाम किया गया।

विमला डांग और सत्यपाल डांग भा.क.पा. की राष्ट्रीय परिषद में शामिल

कर लिए गए। 1990 के दशक में दोनों ने ही राष्ट्रीय परिषद से अपना

नाम वापस ले लिया और पार्टी के किसी भी पद पर रहने से इंकार कर दिया।

ऐसा अपनी उम्र के कारण किया। उन्होंने चुनाव लड़ने से भी इंकार कर दिया।

1992 में विमला डांग को

‘पद्मश्री’ से नवाजा गया। 2005 में विमला गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। उनकी 10 मई 2009 को चंडीगढ़ में मृत्यु हो गई।

भारतीय संस्कृति के विषय में पं॰ जवाहर लाल नेहरू का द्रष्टिकोण [ अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये दक्षिणपंथियों द्वारा आज भारतीय संस्कृति पर जो तीखे हमले बोले जा रहे हैं और उसे धर्म विशेष से जोड़ कर संकुचित, कुंठित और पथभ्रष्ट करने के भयानक प्रयास किये जा रहे हैं, तब भारतीय संस्कृति के बारे में पं॰ जवाहर लाल नेहरू के सुष्पष्ट विचार हमें उसकी व्यापकता का दिग्दर्शन कराते हैं। आज के संगीन हालातों में यह और अधिक प्रासंगिक हो गये हैं। श्री रामधारीसिंह दिनकर की पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” की भूमिका के रूप में यह आलेख 30 सितंबर 1955 को पूरा किया गया था। अंतिम ढाई पंक्तियों को छोड़ यह आलेख अक्षरशः प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका शीर्षक भी मेरे द्वारा दिया गया है- डा॰ गिरीश ] मेरे मित्र और साथी दिनकर ने, अपनी पुस्तक के लिये जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है। यह ऐसा विषय है जिससे, अक्सर, मेरा अपना मन भी ओत- प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ लिखा है, उस पर इस विषय की छाप आप से आप पड़ गयी है। अक्सर मैं अपने आप से सवाल करता हूँ, भारत है क्या? उसका तत्व या सार क्या है? वे शक्तियां कौन-सी हैं जिनसे भारत का निर्माण हुआ है तथा अतीत और वर्तमान विश्व को प्रभावित करने वाली प्रमुख प्रव्रत्तियों के साथ उनका क्या संबंध है? यह विषय अत्यंत विशाल है, और उसके दायरे में भारत और भारत के बाहर के तमाम मानवीय व्यापार आ जाते हैं। और मेरा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह इस संपूर्ण विषय के साथ अकेला ही न्याय कर सके। फिर भी, इसके कुछ खास पहलुओं को लेकर उन्हें समझने की कोशिश की जा सकती है। कम से कम, यह तो संभव है ही कि हम अपने भारत को समझने का प्रयास करें, यद्यपि, सारे संसार को अपने सामने न रखने पर भारत-विषयक जो ज्ञान हम प्राप्त करेंगे, वह अधूरा होगा।संस्क्रति है क्या? शब्दकोश उलटने पर इसकी अनेक परिभाषायें मिलती हैं। एक बड़े लेखक का कहना है कि “संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गयी हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।“ एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि “संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण द्रढ़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।“ यह “मन आचार या रुचियों की परिष्क्रति या शुद्धि” है। यह “सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना” है। इस अर्थ में, संस्क्रति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है जो बुनियादी और अंतर्राष्ट्रीय है। फिर, संस्कृति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेक राष्ट्रों में अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिये हैं।इस नक्शे में भारत का स्थान कहाँ पर है? कुछ लोगों ने हिन्दू-संस्कृति, मुस्लिम-संस्कृति और ईसाई-संस्कृति की चर्चा की है। ये नाम मेरी समझ में नहीं आते, यद्यपि, यह सच है कि जातियों और राष्ट्रों की संस्कृतियों पर बड़े-बड़े धार्मिक आंदोलनों का असर पड़ा है। भारत की ओर देखने पर मुझे लगता है, जैसा कि दिनकर ने भी ज़ोर देकर दिखलाया है, कि भारतीय जनता की संस्कृति का रूप सामासिक है और उसका विकास धीरे धीरे हुआ है। एक ओर तो इस संस्कृति का मूल आर्यों से पूर्व, मोहंजोदड़ों आदि की सभ्यता तथा द्रविड़ों की महान सभ्यता तक पहुंचता है। दूसरी ओर, इस संस्कृति पर संस्कृति की बहुत ही गहरी छाप है जो भारत में मध्य एशिया से आये थे। पीछे चल कर, यह संस्क्रति उत्तर-पश्चिम से आने वाले तथा फिर समुद्र की राह से पश्चिम से आने वाले लोगों से बार-बार प्रभावित हुयी। इस प्रकार, हमारी राष्ट्रीय संस्क्रति ने धीरे धीरे बढ़ कर अपना आकार ग्रहण किया। इस संस्क्रति में समन्वयन तथा नये उपकरणों को पचा कर आत्मसात करने की अद्भुत योग्यता थी। जब तक इसका यह गुण शेष रहा, यह संस्क्रति जीवित और गतिशील रही। लेकिन, बाद को आकर उसकी गतिशीलता जाती रही जिससे यह संस्क्रति जड़ होगयी और उसके सारे पहलू कमजोर पड़ गये। भारत के इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंदी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है जो बाहरी उपकरणों को पचा कर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है; जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रव्रत्ति को बढ़ाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुक़ाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियां हैं जो केवल राजनीतिक ही नहीं, सान्स्क्रतिक एकता के लिये भी प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताक़तें भी हैं जो जीवन में विच्छेद डालती हैं, जो मनुष्य- मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं।अतएव आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धान्तिक नहीं है उसका संबंध हमारे जीवन की सारी प्रक्रिया से है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही हमारा भविष्य निर्भर करता है। साधारणतः, ऐसी समस्याओं को सुलझाने में नेत्रत्व देने का काम मनीषी करते हैं। किन्तु, वे हमारे काम नहीं आये। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो इस समस्या के स्वरूप को ही नहीं समझते। बाकी लोग हार मान बैठे हैं। वे विफलता-बोध से पीड़ित तथा आत्मा के संकट में ग्रस्त हैं और वे जानते ही नहीं कि जिंदगी को किस दिशा की ओर मोड़ना ठीक होगा।बहुत से मनीषी मार्क्सवाद और उसकी शाखाओं की ओर आक्रष्ट हुये और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मार्क्सवाद ने ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण उपस्थित करके समस्याओं पर सोचने और उन्हें समझने के काम में हमारी सहायता की। लेकिन आखिर को, वह भी संकीर्ण मतवाद बन गया और, जीवन की आर्थिक पध्दति के रूप में उसका चाहे जो भी महत्व हो, हमारी बुनियादी शंकाओं का समाधान निकालने में वह भी नाकामयाब है। यह मानना तो ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है; लेकिन जिंदगी यहीं तक खत्म नहीं होती। यह आर्थिक विकास से भी ऊंची चीज है। इतिहास के अंदर हम दो सिद्धांतों को काम करते देखते हैं। एक तो सातत्य का सिद्धान्त है और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते हैं, परन्तु, ये विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। इसी प्रकार, परिवर्तन भी अपने भीतर सातत्य का कुछ अंश लिये रहता है। असल में, हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों पर जाता है जो हिंसक क्रांतियों या भूकंप के रूप में अचानक फट पड़ते हैं। फिर भी, प्रत्येक भूगर्भ-शास्त्री यह जानता है कि धरती की सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं, उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकंप से होने वाले परिवर्तन उनकी तुलना में अत्यंत तुच्छ समझे जाते हैं। इसी तरह, क्रान्तियाँ भी धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म रूपान्तरण की बहुत लंबी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती है। इस द्रष्टि से देखने पर, स्वयं परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परंपरा के आवरण में लगातार चलता रहता है। बाहर से अचल दीखने वाली परंपरा भी, यदि जड़ता और म्रत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गयी है, तो धीरे धीरे वह भी परिवर्तित हो जाती है।इतिहास में कभी कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन, साधारणतः, बाहर से उसकी गति दिखाई नहीं देती। परिवर्तन का बाहरी रूप, प्रायः, निस्पंद ही दीखता है। जातियाँ जब अगति की अवस्था में रहती हैं, तब उनकी शक्ति दिनोंदिन छीजती जाती है, उनकी कमज़ोरियाँ बढ़ती जाती हैं। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रव्रत्तियों का क्षय हो जाता है। तथा, अक्सर वे राजनीतिक रूप में गुलाम भी हो जाती हैं।संभावना यह है कि भारत में संस्कृति के सबसे प्रबल उपकरण आर्यों और आर्यों से पहले के भारतवासियों, खास कर, द्रविड़ों के मिलन से उत्पन्न हुये। इस मिलन, मिश्रण या समन्वय से एक बहुत बड़ी संस्क्रति उत्पन्न हुयी जिसका प्रतिनिधित्व हमारी प्राचीन भाषा संस्क्रत करती है। संस्कृति और प्राचीन पहलवी, ये दोनों भाषायें एक ही माँ से मध्य एशिया में जनमी थीं, किन्तु, भारत में आकर संस्क्रत ही यहाँ की राष्ट्रभाषा हो गयी। यहाँ संस्क्रत के विकास में उत्तर और दक्षिण, दोनों ने योगदान दिया। सच तो यह है कि आगे चल कर संस्क्रत के उत्थान में दक्षिण वालों का अंशदान अत्यंत प्रमुख रहा। संस्क्रत हमारी जनता के विचार और धर्म का ही प्रतीक नहीं बनी, वरन भारत की सांस्क्रतिक एकता भी उसी भाषा में साकार हुयी। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्क्रत यहाँ की जनता की बोले जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है, फिर भी, सारे भारतवर्ष पर वह अपना प्रचुर प्रभाव डालती ही आयी है। कुछ दूसरे प्रभाव भी भारत पहुंचे और उनसे भी विचारों और अभिव्यक्तियों को नयी दिशाएं प्राप्त हुयीं।काफी लंबे इतिहास के अन्दर, भूगोल ने भारत को जो रूप दिया, उससे वह एक ऐसा देश बन गया जिसके दरवाजे बाहर की ओर बन्द थे। समुद्र और महाशैल हिमालय से घिरा होने के कारण, बाहर से किसी का इस देश में आना आसान नहीं था। कई सहस्राब्दियों के भीतर, बाहर से लोगों के बड़े बड़े झुंड भारत आये, किन्तु, आर्यों के आगमन के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ, जबकि बाहरी लोग बहुत बड़ी संख्या में भारत आये हों। ठीक इसके विपरीत, एशिया और यूरोप के आर-पार मनुष्यों के अपार आगमन और निष्क्रमण होते रहे; एक जाति दूसरी जाति को खदेड़ कर वहाँ खुद बसती रही और इस प्रकार, जनसंख्या की बुनावट में बहुत बड़ा परिवर्तन होता रहा। भारत में, आर्यों के आगमन के बाद, बाहरी लोगों के जो आगमन हुये, उनके दायरे बहुत ही सीमित थे। उनका कुछ-न-कुछ प्रभाव तो पड़ा, किन्तु, उससे यहाँ की जनसंख्या के स्वरूप में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। लेकिन, फिर भी, याद रखना चाहिये कि ऐसे कुछ परिवर्तन भारत में भी हुये हैं। सीथियन और हूण लोग तथा उनके बाद भारत आने वाली कुछ अन्य जातियों के लोग यहाँ आकर राजपूतों की शाखाओं में शामिल होगये और यह दावा करने लगे कि हम भी प्राचीन भारतवासियों की संतान हैं। बहुत दिनों तक बाहरी दुनियाँ से अलग रहने के कारण, भारत का स्वभाव भी अन्य देशों से भिन्न हो गया। हम ऐसी जाति बन गये जो अपने आप में घिरी रहती है। हमारे भीतर कुछ ऐसे रिवाजों का चलन होगया जिन्हें बाहर के लोग न तो जानते हैं और न ही समझ पाते हैं। जाति-प्रथा के असंख्य रूप भारत के इसी विचित्र स्वभाव के उदाहरण हैं। किसी भी दूसरे देश के लोग यह नहीं जानते कि छुआछूत क्या चीज है तथा दूसरों के साथ खाने-पीने या विवाह करने में, जाति को ले कर, किसी को क्या उज्र होना चाहिये। इन सब बातों को लेकर हमारी द्रष्टि संकुचित होगयी। आज भी भारतवासियों को दूसरे लोगों से खुल कर मिलने में कठिनाई महसूस होती है। यही नहीं, जब भारतवासी भारत से बाहर जाते हैं, तब वहाँ भी एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से अलग रहना चाहते हैं। हममें से बहुत लोग इन सारी बातों कों स्वयंसिद्ध मानते हैं और हम यह समझ ही नहीं पाते कि इन बातों से दूसरे देश वालों को कितना आश्चर्य होता है, उनकी भावना को कैसी ठेस पहुंचती है।भारत में दोनों बातें एक साथ बढ़ीं। एक ओर तो विचारों और सिद्धांतों में हमने अधिक-से-अधिक उदार और सहिष्णु होने का दावा किया। दूसरी ओर, हमारे सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होते गये। यह विभक्त व्यक्तित्व, सिध्दांत और आचरण का यह विरोध, आज तक हमारे साथ है और आज भी हम उसके विरुध्द संघर्ष कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि अपनी द्रष्टि की संकीर्णता, आदतों और रिवाजों की कमजोरियों को हम यह कर नजर-अंदाज कर देना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज बड़े लोग थे और उनके बड़े बड़े विचार हमें विरासत में मिले हैं। लेकिन, पूर्वजों से मिले हुये ज्ञान और हमारे आचरण में भारी विरोध है और जब तक हम इस विरोध की स्थिति को दूर नहीं करते, हमारा व्यक्तित्व विभक्त का विभक्त रह जायगा।जिन दिनों जीवन अपेक्षाक्रत अधिक गतिहीन था, उन दिनों सिध्दान्त और आचरण का यह विरोध इतना उग्र दिखायी नहीं देता था। लेकिन, ज्यों-ज्यों राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की रफ्तार तेज होती गयी, इस विरोध की उग्रता भी अधिक से अधिक प्रत्यक्ष होती आयी है। आज तो हम आणविक युग के दरवाजे पर खड़े हैं। इस युग की परिस्थितियाँ इतनी प्रबल हैं कि हमें अपने इस आंतरिक विरोध का शमन करना ही पड़ेगा और इस काम में हम कहीं असफल होगये तो यह असफलता सारे राष्ट्र की पराजय होगी और हम उन अच्छाइयों को भी खो बैठेंगे जिन पर हम आज तक अभिमान करते आये हैं।जैसे हम बड़ी-बड़ी राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का मुकाबला कर रहे हैं वैसे ही, हमें भारत के इस आध्यात्मिक संकट का भी सामना करना चाहिये। भारत में औद्योगिक क्रान्ति बड़ी तेजी से आ रही है और हम नाना रूपों में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों का यह अनिवार्य परिणाम है कि उससे सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं; अन्यथा न तो हमारे वैयक्तिक जीवन में समन्वय रह सकता है, न राष्ट्रीय जीवन में। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक परिवर्तन और औद्योगिक प्रगति तो हो, किन्तु, हम यह मान कर बैठें रह जायें कि सामाजिक क्षेत्र में हमें कोई परिवर्तन लाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार समाज को परिवर्तित नहीं करने से हम पर जो बोझ पड़ेगा, उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे, उसके नीचे हम दब जाएँगे।ईसा के जन्म के बाद की पहली सहस्राब्दी और उससे पहले के भारत की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह उस तस्वीर से भिन्न है, जो बाद को मिलती है। उन दिनों के भारतवासी बड़े मस्त, बड़े जीवन्त, बड़े साहसी और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह से युक्त थे तथा अपना संदेश वे विदेशों में दूर दूर तक ले जाते थे। विचारों के क्षेत्र में तो उन्होने ऊंची से ऊंची चोटियों पर अपने कदम रखे और आकाश को चीर डाला। उन्होने अत्यंत गौरवमयी भाषा की रचना की और कला के क्षेत्र में उन्होने अत्यंत उच्च कोटी की कारयित्री प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों का भारतीय जीवन घेरों में बंद नहीं था, न तत्कालीन समाज में ही जड़ता या गतिहीनता की कोई बात थी। उस समय एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, समग्र भारत में सांस्क्रतिक उत्साह भी लहरें ले रहा था। इसी समय, दक्षिण भारतवर्ष के लोग दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर गये और वहाँ उन्होने अपना उपनिवेश स्थापित किया। दक्षिण से ही बौध्द मत का संदेश लेकर बोधि-धर्म चीन पहुंचा। इस साहसिक जीवन की अभिव्यक्ति में उत्तर और दक्षिण दोनों एक थे और वे परस्पर एक दूसरे का पोषण भी करते थे।इसके बाद, पिछली शताब्दियों का समय आता है, जब पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भाषा में क्रत्रिमता और स्थापत्य में सजावट की भरमार इसी पतनशीलता के प्रमाण हैं। यहाँ आकर हमारे विचार पुराने विचारों की आव्रत्ति बन जाते हैं और कारयित्री शक्ति दिनोंदिन क्षीण होने लगती है। शरीर और मन, दोनों की साहसिकता से हम भय खाने लगते हैं तथा जाति-प्रथा का और भी विकास होता है एवं समाज के दरवाजे चारों ओर से बन्द हो जाते हैं। पहले की तरह बातें तो हम अब भी ऊंची-ऊंची करते हैं, लेकिन, हमारा आचरण हमारे विश्वास से भिन्न हो जाता है।हमारे आचरण की तुलना में हमारे विचार और उद्गार इतने ऊंचे हैं कि उन्हें देख कर आश्चर्य होता है। बातें तो हम शान्ति और अहिंसा की करते हैं, मगर, काम हमारे कुछ और होते हैं। सिध्दांत तो हम सहिष्णुता का बघारते हैं, लेकिन, भाव हमारा यह होता है कि सब लोग वैसे ही सोचें, जैसे हम सोचते हैं, और जब भी कोई हम से भिन्न प्रकार से सोचता है, तब हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। घोषणा तो हमारी यह है कि स्थितप्रज्ञ बनना अर्थात कर्मों के प्रति अनासक्त रहना हमारा आदर्श है, लेकिन, काम हमारे बहुत नीचे के धरातल पर चलते हैं और बढ़ती हुयी अनुशासनहीनता हमें वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों ही क्षेत्रों में नीचे ले जाती है।जब पश्चिम के लोग समुद्र के पार से यहाँ आये, तब भारत के दरवाजे एक खास दिशा की ओर से खुल गये। आधुनिक औद्योगिक सभ्यता बिना किसी शोर-गुल के धीरे-धीरे इस देश में प्रविष्ट होगयी। नये भावों और नये विचारों ने हम पर हमला किया और हमारे बुध्दिजीवी अंग्रेज़ बुध्दिजीवियों की तरह सोचने की आदत डालने लगे। यह मानसिक आंदोलन, बाहर की ओर वातायन खोलने का यह भाव, अपने ढंग पर अच्छा रहा, क्योंकि इससे हम आधुनिक जगत को थोड़ा-बहुत समझने लगे। मगर, इससे एक दोष भी निकला कि हमारे ये बुध्दिजीवी जनता से विच्छिन्न हो गये क्योंकि जनता विचारों की इस नयी लहर से अप्रभावित थी। परंपरा से भारत में चिंतन की जो पध्दति चली आ रही थी, वह टूट गयी। फिर भी कुछ लोग उससे इस ढंग से चिपके रहे, जिसमें न तो प्रगति थी, न रचना की नयी उद्भावना और जो पूर्ण रूप से नयी परिस्थितियों से असंबध्द थी।पाश्चात्य विचारों में भारत का जो विश्वास जगा था, अब तो वह भी हिल रहा है। नतीजा यह है कि हमारे पास न तो पुराने आदर्श हैं, न नवीन, और हम बिना यह जाने हुये बहते जा रहे हैं कि हम किधर को या कहाँ जा रहे हैं। नयी पीढ़ी के पास न तो कोई मानदंड है, न कोई दूसरी ऐसी चीज, जिससे वह अपने चिंतन या कर्म को नियंत्रित कर सके।यह खतरे की स्थिति है। अगर इसका अवरोध और सुधार नहीं हुआ तो इससे भयानक परिणाम निकल सकते हैं। हम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संक्रान्ति की अवस्था से गुजर रहे हैं। संभव है, यह उसी स्थिति का अनिवार्य परिणाम हो। लेकिन आणविक युग में किसी देश को अपना सुधार करने के लिए ज्यादा मौके नहीं दिये जायेंगे। और इस युग में मौका चूकने का अर्थ सर्वनाश भी हो सकता है।यह संभव है कि संसार में जो बड़ी बड़ी ताक़तें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना ही चाहिये कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामासिक व्यक्तित्व का विकास किया है। उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुद्रढ़ एकता कहाँ छिपी हुयी है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत, आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे और यदि भारत को नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब के सब अधूरे रह जायेंगे और हम देश की कोई ऐसी सेवा नहीं कर सकेंगे जो प्रभावपूर्ण और ठोस ह पुनरुत्पादित और जारी द्वाराडा॰ गिरीश
की दृष्टि ही भारतीय संस्कृति है – डॉ गिरीश

भारतीय संस्कृति के विषय में पं॰ जवाहर लाल नेहरू का द्रष्टिकोण

[ अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये दक्षिणपंथियों द्वारा आज भारतीय संस्कृति पर जो तीखे हमले बोले जा रहे हैं और उसे धर्म विशेष से जोड़ कर संकुचित, कुंठित और पथभ्रष्ट करने के भयानक प्रयास किये जा रहे हैं, तब भारतीय संस्कृति के बारे में पं॰ जवाहर लाल नेहरू के सुष्पष्ट विचार हमें उसकी व्यापकता का दिग्दर्शन कराते हैं। आज के संगीन हालातों में यह और अधिक प्रासंगिक हो  गये हैं। श्री रामधारीसिंह दिनकर की पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” की भूमिका के रूप में यह आलेख 30 सितंबर 1955 को पूरा किया गया था। अंतिम ढाई पंक्तियों को छोड़ यह आलेख अक्षरशः प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका शीर्षक भी मेरे द्वारा दिया गया है- डा॰ गिरीश ]

मेरे मित्र और साथी दिनकर ने, अपनी पुस्तक के लिये जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है। यह ऐसा विषय है जिससे, अक्सर, मेरा अपना मन भी ओत- प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ लिखा है, उस पर इस विषय की छाप आप से आप पड़ गयी है। अक्सर मैं अपने आप से सवाल करता हूँ, भारत है क्या? उसका तत्व या सार क्या है? वे शक्तियां कौन-सी हैं जिनसे भारत का निर्माण हुआ है तथा अतीत और वर्तमान विश्व को प्रभावित करने वाली प्रमुख प्रव्रत्तियों के साथ उनका क्या संबंध है? यह विषय अत्यंत विशाल है, और उसके दायरे में भारत और भारत के बाहर के तमाम मानवीय व्यापार आ जाते हैं। और मेरा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह इस संपूर्ण विषय के साथ अकेला ही न्याय कर सके। फिर भी, इसके कुछ खास पहलुओं को लेकर उन्हें समझने की कोशिश की जा सकती है। कम से कम, यह तो संभव है ही कि हम अपने भारत को समझने का प्रयास करें, यद्यपि, सारे संसार को अपने सामने न रखने पर भारत-विषयक जो ज्ञान हम प्राप्त करेंगे, वह अधूरा होगा।

संस्क्रति है क्या? शब्दकोश उलटने पर इसकी अनेक परिभाषायें मिलती हैं। एक बड़े लेखक का कहना है कि “संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गयी हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।“ एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि “संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण द्रढ़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।“ यह “मन आचार या रुचियों की परिष्क्रति या शुद्धि” है। यह “सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना” है। इस अर्थ में, संस्क्रति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है जो बुनियादी और अंतर्राष्ट्रीय है। फिर, संस्कृति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेक राष्ट्रों में अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिये हैं।

इस नक्शे में भारत का स्थान कहाँ पर है? कुछ लोगों ने हिन्दू-संस्कृति, मुस्लिम-संस्कृति और ईसाई-संस्कृति की चर्चा की है। ये नाम मेरी समझ में नहीं आते, यद्यपि, यह सच है कि जातियों और राष्ट्रों की संस्कृतियों पर बड़े-बड़े धार्मिक आंदोलनों का असर पड़ा है। भारत की ओर देखने पर मुझे लगता है, जैसा कि दिनकर ने भी ज़ोर देकर दिखलाया है, कि भारतीय जनता की संस्कृति का रूप सामासिक है और उसका विकास धीरे धीरे हुआ है। एक ओर तो इस संस्कृति का मूल आर्यों से पूर्व, मोहंजोदड़ों आदि की सभ्यता तथा द्रविड़ों की महान सभ्यता तक पहुंचता है। दूसरी ओर, इस संस्कृति पर संस्कृति  की बहुत ही गहरी छाप है जो भारत में मध्य एशिया से आये थे। पीछे चल कर, यह संस्क्रति उत्तर-पश्चिम से आने वाले तथा फिर समुद्र की राह से पश्चिम से आने वाले लोगों से बार-बार प्रभावित हुयी। इस प्रकार, हमारी राष्ट्रीय संस्क्रति ने धीरे धीरे बढ़ कर अपना आकार ग्रहण किया। इस संस्क्रति में समन्वयन तथा नये उपकरणों को पचा कर आत्मसात करने की अद्भुत योग्यता थी। जब तक इसका यह गुण शेष रहा, यह संस्क्रति जीवित और गतिशील रही। लेकिन, बाद को आकर उसकी गतिशीलता जाती रही जिससे यह संस्क्रति जड़ होगयी और उसके सारे पहलू कमजोर पड़ गये। भारत के इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंदी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है जो बाहरी उपकरणों को पचा कर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है; जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रव्रत्ति को बढ़ाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुक़ाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियां हैं जो केवल राजनीतिक ही नहीं, सान्स्क्रतिक एकता के लिये भी प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताक़तें भी हैं जो जीवन में विच्छेद डालती हैं, जो मनुष्य- मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं।

अतएव आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धान्तिक नहीं है उसका संबंध हमारे जीवन की सारी प्रक्रिया से है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही हमारा भविष्य निर्भर करता है। साधारणतः, ऐसी समस्याओं को सुलझाने में नेत्रत्व देने का काम मनीषी करते हैं। किन्तु, वे हमारे काम नहीं आये। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो इस समस्या के स्वरूप को ही नहीं समझते। बाकी लोग हार मान बैठे हैं। वे विफलता-बोध से पीड़ित तथा आत्मा के संकट में ग्रस्त हैं और वे जानते ही नहीं कि जिंदगी को किस दिशा की ओर मोड़ना ठीक होगा।

बहुत से मनीषी मार्क्सवाद और उसकी शाखाओं की ओर आक्रष्ट हुये और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मार्क्सवाद ने ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण उपस्थित करके समस्याओं पर सोचने और उन्हें समझने के काम में हमारी सहायता की। लेकिन आखिर को, वह भी संकीर्ण मतवाद बन गया और, जीवन की आर्थिक पध्दति के रूप में उसका चाहे जो भी महत्व हो, हमारी बुनियादी शंकाओं का समाधान निकालने में वह भी नाकामयाब है। यह मानना तो ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है; लेकिन जिंदगी यहीं तक खत्म नहीं होती। यह आर्थिक विकास से भी ऊंची चीज है। इतिहास के अंदर हम दो सिद्धांतों को काम करते देखते हैं। एक तो सातत्य का सिद्धान्त है और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते हैं, परन्तु, ये विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। इसी प्रकार, परिवर्तन भी अपने भीतर सातत्य का कुछ अंश लिये रहता है। असल में, हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों पर जाता है जो हिंसक क्रांतियों या भूकंप के रूप में अचानक फट पड़ते हैं। फिर भी, प्रत्येक भूगर्भ-शास्त्री यह जानता है कि धरती की सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं, उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकंप से होने वाले परिवर्तन उनकी तुलना में अत्यंत तुच्छ समझे जाते हैं। इसी तरह, क्रान्तियाँ भी धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म रूपान्तरण की बहुत लंबी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती है। इस द्रष्टि से देखने पर, स्वयं परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परंपरा के आवरण में लगातार चलता रहता है। बाहर से अचल दीखने वाली परंपरा भी, यदि जड़ता और म्रत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गयी है, तो धीरे धीरे वह भी परिवर्तित हो जाती है।

इतिहास में कभी कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन, साधारणतः, बाहर से उसकी गति दिखाई नहीं देती। परिवर्तन का बाहरी रूप, प्रायः, निस्पंद ही दीखता है। जातियाँ जब अगति की अवस्था में रहती हैं, तब उनकी शक्ति दिनोंदिन छीजती जाती है, उनकी कमज़ोरियाँ बढ़ती जाती हैं। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रव्रत्तियों का क्षय हो जाता है। तथा, अक्सर वे राजनीतिक रूप में गुलाम भी हो जाती हैं।

संभावना यह है कि भारत में संस्कृति के सबसे प्रबल उपकरण आर्यों और आर्यों से पहले के भारतवासियों, खास कर, द्रविड़ों के मिलन से उत्पन्न हुये। इस मिलन, मिश्रण या समन्वय से एक बहुत बड़ी संस्क्रति उत्पन्न हुयी जिसका प्रतिनिधित्व हमारी प्राचीन भाषा संस्क्रत करती है। संस्कृति

 और प्राचीन पहलवी, ये दोनों भाषायें एक ही माँ से मध्य एशिया में जनमी थीं, किन्तु, भारत में आकर संस्क्रत ही यहाँ की राष्ट्रभाषा हो गयी। यहाँ संस्क्रत के विकास में उत्तर और दक्षिण, दोनों ने योगदान दिया। सच तो यह है कि आगे चल कर संस्क्रत के उत्थान में दक्षिण वालों का अंशदान अत्यंत प्रमुख रहा। संस्क्रत हमारी जनता के विचार और धर्म का ही प्रतीक नहीं बनी, वरन भारत की सांस्क्रतिक एकता भी उसी भाषा में साकार हुयी। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्क्रत यहाँ की जनता की बोले जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है, फिर भी, सारे भारतवर्ष पर वह अपना प्रचुर प्रभाव डालती ही आयी है। कुछ दूसरे प्रभाव भी भारत पहुंचे और उनसे भी विचारों और अभिव्यक्तियों को नयी दिशाएं प्राप्त हुयीं।

काफी लंबे इतिहास के अन्दर, भूगोल ने भारत को जो रूप दिया, उससे वह एक ऐसा देश बन गया जिसके दरवाजे बाहर की ओर बन्द थे। समुद्र और महाशैल हिमालय से घिरा होने के कारण, बाहर से किसी का इस देश में आना आसान नहीं था। कई सहस्राब्दियों के भीतर, बाहर से लोगों के बड़े बड़े झुंड भारत आये, किन्तु, आर्यों के आगमन के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ, जबकि बाहरी लोग बहुत बड़ी संख्या में भारत आये हों। ठीक इसके विपरीत, एशिया और यूरोप के आर-पार मनुष्यों के अपार आगमन और निष्क्रमण होते रहे; एक जाति दूसरी जाति को खदेड़ कर वहाँ खुद बसती रही और इस प्रकार, जनसंख्या की बुनावट में बहुत बड़ा परिवर्तन होता रहा। भारत में, आर्यों के आगमन के बाद, बाहरी लोगों के जो आगमन हुये, उनके दायरे बहुत ही सीमित थे। उनका कुछ-न-कुछ प्रभाव तो पड़ा, किन्तु, उससे यहाँ की जनसंख्या के स्वरूप में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। लेकिन, फिर भी, याद रखना चाहिये कि ऐसे कुछ परिवर्तन भारत में भी हुये हैं। सीथियन और हूण लोग तथा उनके बाद भारत आने वाली कुछ अन्य जातियों के लोग यहाँ आकर राजपूतों की शाखाओं में शामिल होगये और यह दावा करने लगे कि हम भी प्राचीन भारतवासियों की संतान हैं। बहुत दिनों तक बाहरी दुनियाँ से अलग रहने के कारण, भारत का स्वभाव भी अन्य देशों से भिन्न  हो गया। हम ऐसी जाति बन गये जो अपने आप में घिरी रहती है। हमारे भीतर कुछ ऐसे रिवाजों का चलन होगया जिन्हें बाहर के लोग न तो जानते हैं और न ही समझ पाते हैं। जाति-प्रथा के असंख्य रूप भारत के इसी विचित्र स्वभाव के उदाहरण हैं। किसी भी दूसरे देश के लोग यह नहीं जानते कि छुआछूत क्या चीज है तथा दूसरों के साथ खाने-पीने या विवाह करने में, जाति को ले कर, किसी को क्या उज्र होना चाहिये। इन सब बातों को लेकर हमारी द्रष्टि संकुचित होगयी। आज भी भारतवासियों को दूसरे लोगों से खुल कर मिलने में कठिनाई महसूस होती है। यही नहीं, जब भारतवासी भारत से बाहर जाते हैं, तब वहाँ भी एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से अलग रहना चाहते हैं। हममें से बहुत लोग इन सारी बातों कों स्वयंसिद्ध मानते हैं और हम यह समझ ही नहीं पाते कि इन बातों से दूसरे देश वालों को कितना आश्चर्य होता है, उनकी भावना को कैसी ठेस पहुंचती है।

भारत में दोनों बातें एक साथ बढ़ीं। एक ओर तो विचारों और सिद्धांतों में हमने अधिक-से-अधिक उदार और सहिष्णु होने का दावा किया। दूसरी ओर, हमारे सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होते गये। यह विभक्त व्यक्तित्व, सिध्दांत और आचरण का यह विरोध, आज तक हमारे साथ है और आज भी हम उसके विरुध्द संघर्ष कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि अपनी द्रष्टि की संकीर्णता, आदतों और रिवाजों की कमजोरियों को हम यह कर नजर-अंदाज कर देना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज बड़े लोग थे और उनके बड़े बड़े विचार हमें विरासत में मिले हैं। लेकिन, पूर्वजों से मिले हुये ज्ञान और हमारे आचरण में भारी विरोध है और जब तक हम इस विरोध की स्थिति को दूर नहीं करते, हमारा व्यक्तित्व विभक्त का विभक्त रह जायगा।

जिन दिनों जीवन अपेक्षाक्रत अधिक गतिहीन था, उन दिनों सिध्दान्त और आचरण का यह विरोध इतना उग्र दिखायी नहीं देता था। लेकिन, ज्यों-ज्यों राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की रफ्तार तेज होती गयी, इस विरोध की उग्रता भी अधिक से अधिक प्रत्यक्ष होती आयी है। आज तो हम आणविक युग के दरवाजे पर खड़े हैं। इस युग की परिस्थितियाँ इतनी प्रबल हैं कि हमें अपने इस आंतरिक विरोध का शमन करना ही पड़ेगा और इस काम में हम कहीं असफल होगये तो यह असफलता सारे राष्ट्र की पराजय होगी और हम उन अच्छाइयों को भी खो बैठेंगे जिन पर हम आज तक अभिमान करते आये हैं।

जैसे हम बड़ी-बड़ी राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का मुकाबला कर रहे हैं वैसे ही, हमें भारत के इस आध्यात्मिक संकट का भी सामना करना चाहिये। भारत में औद्योगिक क्रान्ति बड़ी तेजी से आ रही है और हम नाना रूपों में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों का यह अनिवार्य परिणाम है कि उससे सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं; अन्यथा न तो हमारे वैयक्तिक जीवन में समन्वय रह सकता है, न राष्ट्रीय जीवन में। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक परिवर्तन और औद्योगिक प्रगति तो हो, किन्तु, हम यह मान कर बैठें रह जायें कि सामाजिक क्षेत्र में हमें कोई परिवर्तन लाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार समाज को परिवर्तित नहीं करने से हम पर जो बोझ पड़ेगा, उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे, उसके नीचे हम दब जाएँगे।

ईसा के जन्म के बाद की पहली सहस्राब्दी और उससे पहले के भारत की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह उस तस्वीर से भिन्न है, जो बाद को मिलती है। उन दिनों के भारतवासी बड़े मस्त, बड़े जीवन्त, बड़े साहसी और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह से युक्त थे तथा अपना संदेश वे विदेशों में दूर दूर तक ले जाते थे। विचारों के क्षेत्र में तो उन्होने ऊंची से ऊंची चोटियों पर अपने कदम रखे और आकाश को चीर डाला। उन्होने अत्यंत गौरवमयी भाषा की रचना की और कला के क्षेत्र में उन्होने अत्यंत उच्च कोटी की कारयित्री प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों का भारतीय जीवन घेरों में बंद नहीं था, न तत्कालीन समाज में ही जड़ता या गतिहीनता की कोई बात थी। उस समय एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, समग्र भारत में सांस्क्रतिक उत्साह भी लहरें ले रहा था। इसी समय, दक्षिण भारतवर्ष के लोग दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर गये और वहाँ उन्होने अपना उपनिवेश स्थापित किया। दक्षिण से ही बौध्द मत का संदेश लेकर बोधि-धर्म चीन पहुंचा। इस साहसिक जीवन की अभिव्यक्ति में उत्तर और दक्षिण दोनों एक थे और वे परस्पर एक दूसरे का पोषण भी करते थे।

इसके बाद, पिछली शताब्दियों का समय आता है, जब पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भाषा में क्रत्रिमता और स्थापत्य में सजावट की भरमार इसी पतनशीलता के प्रमाण हैं। यहाँ आकर हमारे विचार पुराने विचारों की आव्रत्ति बन जाते हैं और कारयित्री शक्ति दिनोंदिन क्षीण होने लगती है। शरीर और मन, दोनों की साहसिकता से हम भय खाने लगते हैं तथा जाति-प्रथा का और भी विकास होता है एवं समाज के दरवाजे चारों ओर से बन्द हो जाते हैं। पहले की तरह बातें तो हम अब भी ऊंची-ऊंची करते हैं, लेकिन, हमारा आचरण हमारे विश्वास से भिन्न हो जाता है।

हमारे आचरण की तुलना में हमारे विचार और उद्गार इतने ऊंचे हैं कि उन्हें देख कर आश्चर्य होता है। बातें तो हम शान्ति और अहिंसा की करते हैं, मगर, काम हमारे कुछ और होते हैं। सिध्दांत तो हम सहिष्णुता का बघारते हैं, लेकिन, भाव हमारा यह होता है कि सब लोग वैसे ही सोचें, जैसे हम सोचते हैं, और जब भी कोई हम से भिन्न प्रकार से सोचता है, तब हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। घोषणा तो हमारी यह है कि स्थितप्रज्ञ बनना अर्थात कर्मों के प्रति अनासक्त रहना हमारा आदर्श है, लेकिन, काम हमारे बहुत नीचे के धरातल पर चलते हैं और बढ़ती हुयी अनुशासनहीनता हमें वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों ही क्षेत्रों में नीचे ले जाती है।

जब पश्चिम के लोग समुद्र के पार से यहाँ आये, तब भारत के दरवाजे एक खास दिशा की ओर से खुल गये। आधुनिक औद्योगिक सभ्यता बिना किसी शोर-गुल के धीरे-धीरे इस देश में प्रविष्ट होगयी। नये भावों और नये विचारों ने हम पर हमला किया और हमारे बुध्दिजीवी अंग्रेज़ बुध्दिजीवियों की तरह सोचने की आदत डालने लगे। यह मानसिक आंदोलन, बाहर की ओर वातायन खोलने का यह भाव, अपने ढंग पर अच्छा रहा, क्योंकि इससे हम आधुनिक जगत को थोड़ा-बहुत समझने लगे। मगर, इससे एक दोष भी निकला कि हमारे ये बुध्दिजीवी जनता से विच्छिन्न हो गये क्योंकि जनता विचारों की इस नयी लहर से अप्रभावित थी। परंपरा से भारत में चिंतन की जो पध्दति चली आ रही थी, वह टूट गयी। फिर भी कुछ लोग उससे इस ढंग से चिपके रहे, जिसमें न तो प्रगति थी, न रचना की नयी उद्भावना और जो पूर्ण रूप से नयी परिस्थितियों से असंबध्द थी।

पाश्चात्य विचारों में भारत का जो विश्वास जगा था, अब तो वह भी हिल रहा है। नतीजा यह है कि हमारे पास न तो पुराने आदर्श हैं, न नवीन, और हम बिना यह जाने हुये बहते जा रहे हैं कि हम किधर को या कहाँ जा रहे हैं। नयी पीढ़ी के पास न तो कोई मानदंड है, न कोई दूसरी ऐसी चीज, जिससे वह अपने चिंतन या कर्म को नियंत्रित कर सके।

यह खतरे की स्थिति है। अगर इसका अवरोध और सुधार नहीं हुआ तो इससे भयानक परिणाम निकल सकते हैं। हम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संक्रान्ति की अवस्था से गुजर रहे हैं। संभव है, यह उसी स्थिति का अनिवार्य परिणाम हो। लेकिन आणविक युग में किसी देश को अपना सुधार करने के लिए ज्यादा मौके नहीं दिये जायेंगे। और इस युग में मौका चूकने का अर्थ सर्वनाश भी हो सकता है।

यह संभव है कि संसार में जो बड़ी बड़ी ताक़तें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना ही चाहिये कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामासिक व्यक्तित्व का विकास किया है। उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुद्रढ़ एकता कहाँ छिपी हुयी है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत, आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे और यदि भारत को नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब के सब अधूरे रह जायेंगे और हम देश की कोई ऐसी सेवा नहीं कर सकेंगे जो प्रभावपूर्ण और ठोस ह

पुनरुत्पादित और जारी द्वारा

डा॰ गिरीश