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बाराबंकी/ न जातिवाद न धर्मवाद और गैर कांग्रेसवाद देश को बचाना है तो अब गैर भाजपावाद के रास्ते पर देश को चलाना होगा।
    यह सलाह आल इण्डिया किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव व कम्युनिस्ट पाटी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अतुल कुमार अंजान ने देवा रोड स्थित गाँधी भवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में दिया उन्होंने कहा देश इस वक्त संकट कालीन दौर से गुजर रहा है। देश का नौजवान व मजदूर किसान का भविष्य अंधकारमय है। देश के हर नागरिक को नई आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आना होगा और किसानों को इस आन्दोलन को घर-घर पहुँचना होगा। खेत बचेगा तो किसान बचेगा और हिन्दुस्तान बचेगा। अतुल अंजान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधे आक्रमण करते हुए का कि वे सत्ता में बने रहने के लिए देश की जनता को बराबर गुमराह कर रहे है उनके दस वाक्यों में नौ वाक्य झूठ पर आधारित होते है और विडम्बना यह है कि देश की जनता अभी तक झूठ बर्दाश्त करती रही, अज्ञानी ज्ञान बाँट रहें है।
    हिन्दी मासिक पत्रिका परिकल्पना के प्रधान सम्पादक और सुप्रसिद्ध ब्लागर रविन्द्र प्रभात ने कहा देश की संस्कृति और समरसता को छिन भिन्न  कर सत्ता हथियाने वाली साम्राज्यवादियों के गुलामी की ओर ले जा रहें है। रिहाई मंच के संयोजक एडवोकेट मो0 शुऐब ने कहा कि दिल्ली के बार्डर पर धरना दे रहें किसानों की अकेले की लड़ाई नहीं है। देश के खाद्यन्न को अपने चहेते पूंजीपतियों के हवाले मोदी जी कर देना चाहते है। हरित क्रान्ति के सूरमाओं के परिश्रम की बलि चढ़ा देना चाहते है। अन्न दाताओं को हमें इस लड़ाई में पूर्ण समर्थन देना ही सच्चा राष्ट्रवाद है। कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य कौंसिल के सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि 26 दिसम्बर 1925 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में मौलाना हसरत मोहानी ने मुकम्मल आजादी के के नारे के साथ की थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी देश की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके वजूद के आने से रोकने के लिए देश भर में हजारों की संख्या में लोगों की गिरफ्तारियाँ की गयी थी। बावजूद इसके कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया और जन मुद्दों पर जमकर संघर्ष किया और आगे भी करते रहेंगें।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव एडवोकेट बृजमोहन वर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि देश आर्थिक गुलामी की ओर अग्रसर है और जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेज शासकों की मुखबरी किया करते थे वह साम्राज्यवादियों की ऐजेन्ट की भूमिका में है। अन्त में उन्होंने कार्यक्रम में पधारे समस्त अतिथियों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।
    कार्यक्रम में वामपंथी विचारधारा के लेखक अनिल राजिमवाले द्वारा रचित पुस्तिका ’’मुखबिर राज और आजादी के महानायक भाग-2 का विमोचन मुख्य अतिथि अतुल कुमार अंजान सहित अन्य अतिथिगणों ने किया। उर्दू दैनिक इंकलाब के जिला संवाददाता तारिक खान द्वारा संचालित कार्यक्रम में डाॅ0 कौसर हुसैन और शिवदर्शन वर्मा ने भी अपने विचार रखे।


    इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख व्यक्तियों में साहित्यकार डाॅ0 विनय राज, पंण्डित राजनाथ शर्मा, मूसा खा ईंसान, डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित, डाॅ0 एस0एम0 हैदर, कामरेड प्रवीन कुमार, विनय कुमार सिंह, पत्रकार फैजान मुसन्ना महन्त बी0पी0दास, पर्यावरण विद्य हाजी सलाउद्दीन किदवाई, एडवोकेट विजय प्रताप सिंह, आनन्द सिंह, अरविन्द सिहं, नीरज वर्मा, गौरी रस्तोगी, अंशूलता मिश्रा, गाजी अमान, अलाउद्दीन, श्याम सिंह, भूपेन्द्र पाल सिंह, शिवम सिंह, आशीष शुक्ला, महेन्द्र यादव, अंकित चैधरी, दल सिंगार, अविनाश वर्मा, आदि रहे।

S.V. Ghate : our first general secretary

 सच्चिदानंद विष्णु घाटे का जन्म14  दिसंबर  1896  को  मंगलौर;कर्नाटक के  एक  निम्न  मध्य वर्गीय परिवार में हुआ। उनके बड़े भाई तथा पिता पुरोहित थे। चारां ओर सनातनी पुरातनपंथी  वातावरण  व्याप्त  था।प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने विद्रोही रूप धारण  कर  लिया।  वे  पहले  तो गैर-सनातनी बन गए, फिर नास्तिक।वे  पुरोहिती  वातावरण  को  पूरी  तरहना पसंद करने लगे। उन्होंने अपनी टीक;चोटीद्ध काट डाली और अंग्रेजी स्टाइलमें  बाल  रखने  लगे।  उनकी  चाची  ने उनका बाथरूम जाना बंद कर दिया।विरोध में उन्होंने गरम पानी से नहाना बंद कर दिया जो मृत्यु-पर्यन्त उनका कार्यक्रम रहा! एक बार पूजा के बाद उन्होंने शालिग्राम पत्थर फेंक दिया।वे जानवरों को पसंद किया करते थे। स्कूल में उनका एक प्रिय बछड़ा था जो उनके पीछे-पीछे जाया करता था।  मेरठ  जेल  में  भी  उनका  अपना हिरण था।सच्चिदानंद ने के.ई.एम. हाईस्कूल से 1914 में मैट्रिक पास किया। वे वाद-विवाद समिति के सचिव थे। फिर वे  सेंट  एलोयसियस  कॉलेज  में  भर्ती हुए  और  वहां  से  1917  में इंटरमीडिएट  पास  किया।  उस  समय एनी बेसेंट के नेतृत्व में ‘होम रूल लीग’का आंदोलन चल रहा था। सच्चिदानंद ने उनके दैनिक अखबार ‘न्यू इंडिया’का प्रचार किया।फिर वे बंबई के सिडेन हैम कॉलेज में बी.कॉम में भर्ती हो गए जबकि उन्हें गणित से सख्त नफरत थी! वे ही बादमें भा.क.पा. के कोषाध्यक्ष बने! बीमार  पड़ने  के  कारण  वे अहमदाबाद  चले  गए  और  पूरा  एक साल ;1918 बिताया। वहां उनकी मुलाकात सी.जी. शाह से हुई जो बाद में उनके सहयोगी बने।समाजवाद की ओर1919 में वे बंबई वापस आ गए और एक बीमा कंपनी में नौकरी कर ली। कंपनी दिवालिया हो गई। इस बीच उनकी  मुलाकात  मंगलौर-निवासी गोपाल भट से हुई जो गिरगांव के श्रीकृष्ण लॉज के मालिक थे। उन्होंने घाटे कोमैनेजर नियुक्त किया। उन्हें ग्राहकों केबिल  जमा  करने  होते  थे  और  फिर सिनेमा जाने की पूरी आजादी थी! वे सेंट जेवियर कॉलेज में भर्ती हो  और  वहां  से  1923  में  बी.ए.;ऑनर्स किया।इस  बीच  सी.जी.  शाह  बंबई  आ गए थे और स्कूल टीचर का काम कर रहे थे। वे आर.बी. लोटवाला के निजी सचिव  और  लाइब्रेरी  के  इन्चार्ज  थे।लोटवाला अकसर ही विदेश जाया करतेऔर वहां से पुस्तकें लाया करते। इससे घाटे का सम्पर्क समाजवादी साहित्य से हुआ। वे बहुत तेजी से ढेर सारी पुस्तकें और पत्रिकाएं पढ़ते। सी.जी. शाह और घाटे ने एक अध्ययन मंडली बनाई। कुछ समय बाद घाटे ने एस.ए. डांगे द्वारा प्रकाशित द सोशलिस्ट पढ़ा और बड़े ही प्रभावित हुए। उन्होंने डांगे को बुला  भेजा।  डांगे  उस  समय  ‘कामतचाल’ में रहा करते। दोनों में खूब बातें हुई।जल्द ही वे दोनों तथा उनका ग्रुप बंबई कांग्रेस में काम करने लगा। वे कांग्रेस में मूलगामी दल बन गए। एम.एन.राय मास्को से भारतीय कम्युनस्टिं को नियंत्रित करने और मनमाना आदेश देने की कोशिश कर रहे थे। घाटे समेत भारतीय कम्युनिस्टों को यह सब पसंद नहीं था।लॉज में घाटे की स्थिति पार्टी द्वारा गुप्त कार्य के अनुकूल थी। घाटे को विदेशी संपर्क बनाने तथा कॉमिन्टर्न से संपर्क  में  रहने  का  काम  दिया  गया।उन्होंने साथ ही संगठन और साहित्य का  इंतजाम  शुरू  किया।  इस  प्रकार घाटे का निवास अंडरग्राउंड क्रांतिकारियों  और कम्युनिस्ट गतिविधियों का केंद्र बन गया। विदेशों में संदेश और व्यक्ति भेजे जाते।मार्च 1924 में डांगे को कानपुर षड्यंत्र  केस  में  गिरफ्तार  कर  लिया गया।  घाटे  ने  जोगलेकर,  निम्बकर,मिरजÛकर, वी.एच. जोशी, इ. के साथमिलकर डिफेंस कमिटि बनाई।कानपुर स्थापना सम्मेलन, 19251925 के आरंभ में सत्यभक्त ने सभी  कम्युनिस्टों  से  संपर्क  स्थापित करना आरंभ किया। अ.भा. कम्युनिस्ट सम्मेलन  25  दिसंबर  1925  से कानपुर में आरंभ हो गया। इसमें एस.वी. घाटे प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। सम्मेलन में केंद्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारी चुने गए। घाटे और बगरहट्टा पार्टी के दो महासचिव चुनेगए।  प्रमुख  भूमिका  घाटे  की  थी। 1927 में बंबई में कार्यकारिणी की विस्तारित बैठक में पार्टी का संविधान बदला गया और घाटे पार्टी के एकमात्र महासचिव बनाए गए।सम्मेलन के बाद मजदूर किसान पार्टियों का गठन किया गया। बंगाल मेंफरवरी 1926 में इसकी स्थापना कीगई। घाटे की देखरेख में बंबई में मजदूरकिसान पार्टी का गठन 1927 में किया गया जिसमें मिरजÛकर, निम्बकर तथाअन्य  साथियों  का  भी  योगदान  रहा।वास्तव में यह ग्रुप बंबई कांग्रेस प्रदेशकमेटी के अंदर एक सोशलिस्ट ग्रुप केरूप  में  काम  कर  रहा  था।  1927आते-आते  इस  ग्रुप  ने  मजदूरों  केविभिन्न तबकों में अपना प्रभाव बनालिया था और उनकी ट्रेड यूनियनों कागठन कर लिया था।1927 के आरंभ में टेक्सटाइलमजदूरों के बीच हलचल शुरू हो गईथी और उनकी हड़तालें होने लगी थी।इन हड़तालों ने 1928 आते-आतेबडे़ आंदोलन का रूप धारण कर लियाथा।  अप्रैल  1928  में  लगभग  डेढ़लाख  मजदूरों  ने  6  महीने  हड़तालेआरंभ कर दी। इन सारी गतिविधियोंमें पार्टी के महासचिव के रूप में एस.वी. घाटे की महत्वपूर्ण भूमिका रही।1927 में मजÛदूर किसान पार्टीकी ओर से बड़े पैमाने पर मजदूर दिवस मनाया गया। 1927 में ही भारत में साईमन कमिशन आया। उसके विरोधमें बंबई में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन औ रहड़तालों  का  तांता  लग  गया।  बंबई कई दिनों तक बंद रही और साईमन कमिशन  ने  शहर  में  प्रवेश  करने  की हिम्मत नहीं की। वह बाहर-बाहर सेही पूना चला गया। कमिशन के सात सदस्यों का विरोध करने के लिए सात पुतले जलाए गए, साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी ने 50,000 हजÛार मजÛदूरों काविशाल जुलूस निकाला। घाटे इन सारीगतिविधियों के केंद्र में रहे।जनवरी  1927  में  शापुरजी सकलतवाला बंबई आए वे इंगलैंड से आए थे और तब तक ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बन चुके थे। घाटे औरमिरजÛकर ने उनसे मुलाकात की औरउनके सम्मान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया।घाटे  संयुक्त  हड़ताल  कमेटी  के सदस्य थे जिसमें एन.एम.जोशी, डांगे,जोगलेकर तथा अन्य सदस्य भी शामिल थे। घाटे गिरणी कामगार यूनियन के केंद्र के इंचार्ज थे और कोषाध्यक्ष भी थे।1928  के  दिसंबर  में  अखिल भारतीय मजदूर और किसान पार्टी का सम्मेलन कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल मेंहुआ, उसके साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी की  भी  बैठक  हुई।  इस  सम्मेलन  में घाटे  की  महत्वपूर्ण  भूमिका  रही  और उन्होंने  सही  तरीके  से  दिशा निर्देशनकिया।मेरठ षड््यंत्र केस 1929-331929 के मार्च महीने में समूचे भारत से 32 कम्युनिस्ट एवं मजदूरनेताओं को गिरफ्तार कर मेरठ जेल में बंद  कर  दिया  गया।  उन्हें  वहां अलग-अलग सेलों में डाला गया जहां परिस्थितियां अत्यंत ही खराब थी। कई सप्ताह के संघर्ष के बाद ही कैदियों को एक  जगह  रहने  की  इजाजत  मिली।इन गिरफ्तार साथियों में एस.वी. घाटे भी  थे,  उन्हें  12  साल  के  कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। बाद मेंये सजÛा घटा दी गई। घाटे तथा अन्य साथियों को 1933 के अंत में रिहाकर दिया गया। महात्मा गांधी कम्युनिस्टोंसे मिलने मेरठ आए। जनवरी 1934में घाटे बंबई वापस आ गए। मेरठ से रिहा होने के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन का पुनर्गठन किया गया। 1934 में घाटे को फिर गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी तबियत खराब रहने लगी।1935  में  पी.सी.  जोशी  पार्टी  के महासचिव बनाये गए। इस बीच घाटे ने जेल से भागने की कोशिश की, उन्हें छः महीने सतारा के जेल में रहना पड़ा जहां वो बिल्कुल ही अकेले रहते थे।रिहा होने के बाद वे मद्रास चले गए।मद्रास में गतिविधियां इस बीच कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी;सी.एस.पी. का गठन 1934 में किया गया। एस.वी. घाटे इस पार्टी के अखिल भारतीय  नेतृत्व  में  आ  गए।  घाटे  ने दक्षिण  भारत  में  सी.एस.पी.  और कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। द. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी  का  गठन  घाटे  के  जीवन  का महत्वपूर्ण अंग है। एम-सिंगारवेलु के साथ  मिलकर  उन्होंने  पार्टी  की  कई इकाइयों  का  गठन  किया।  साथ  हीउन्होंने  कई  ट्रेड  यूनियन  संगठन  भी बनाए।  उस  समय  मद्रास  में  न्यूएज नामक  मासिक  पत्रिका प्रकाशित हुआ करती थी। घाटे ने इसका प्रकाशन  अपने  हाथों  में  ले  लिया।आखिरकार घाटे, सिंगारवेलु और आमिर हैदर खान की कोशिशों के फलस्वरूप मद्रास प्रेसीडेंसी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी क गठन किया गया।1940  में  उन्हें  गिरफ्तार  करमंगलौर में नजरबंद कर दिया गया।फिर वेल्लोर जेल भेज दिए गए। इसके बाद  1940  में  ही  उन्हें  कोटा  केनजदीक देवली कैम्प स्थानांतरित करदिया गया। वहां उनकी मुलाकÛात बाबासोहन सिंह भकना, धनवंतरी, सोहनसिंह जोश, इ. से हुई। घाटे ने देवली मेंपंजाब के भाकपा के कम्युनिस्टों और‘कीर्ति  कम्युनिस्टों’  के  बीच  मतभेदोंऔर विवादों को हल करने में महत्वपूर्णभूमिका  अदा  की।  इसके  फलस्वरूपकीर्ति पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीमें शामिल हो गई।1942 में घाटे को राजामुंदरी जेलऔर  फिर  वेल्लोर  जेल  स्थानांतरितकिया  गया।  उन्हें  अप्रैल  1944  मेंरिहा  किया  गया।  इस  बीच  पार्टी  केप्रथम कांग्रेस बंबई ;1943द्ध में हुई।अपनी अनुपस्थिति में ही पार्टी की केंद्रीयसमिति  का  सदस्य  चुन  लिया  गया।जेल से छूटने के बाद वे बंबई आ गए।वहां  वे  पार्टी  के  वित्तीय  मामलों  कीदेखरेख करने लगे।आजÛादी के बादआजÛादी के बाद नई परिस्थिति मेंजोशी  के  नेतृत्व  में  पार्टी  ने  देश  कीआजÛादी का स्वागत किया। लेकिन जल्दही  पार्टी  पर  वाम  संकीर्णतावादीदुस्साहसिक लाइन हावी हो गयी। जोशीकी जगह रणदिवे पार्टी के महासचिवबने। घाटे ने बी.टी.आर. लाइन का विरोध किया। इस बीच घाटे को अंडरग्राउंडजाना पड़ा। वे गिरफ्तार कर लिये गए।उन्हें 1950 में रिहा किया गया। घाटे,अजय घोष और डांगे ने पार्टी नेतृत्वद्वारा अपनाई गई नीतियों का विरोधकिया।सितंबर 1950 में घाटे, डांगे औरअजय  घोष  ने  पार्टी  की  नीतियों  कीआलोचना करते हुए और बेहतर दिशादर्शाते हुए एक दस्तावेज तैयार किया।इसे ‘‘थ्री पीजÛ लेटर’ कहते है। इसकेबाद  अप्रैल  1951  में  पार्टी  का कार्यक्रम तैयार हुआ। इस प्रकार पार्टी धीरे-धीरे सही दिशा की ओर चल पड़ी।घाटे अपने संस्मरणों में कहते हैपार्टी को पूंजीवादी जनवादी क्रांति की वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए थी।रणदिवे द्वारा यह कहना कि देश को आजÛादी नहीं मिली है गलत नीति थी।केंद्रीय समिति के सदस्य के रूप में घाटे अपनी आंशिक गलती स्वीकार करते हैं।घाटे 1948 की दूसरी पार्टी कांग्रेस की तैयारियों के लिए पहले ही कलकत्तापहुंचे।जनवरी 1950 में मास्को से प्रकाशित कॉमिन्फॉर्म की पत्रिका ‘फॉर एलास्टिंग पीस’ में प्रकाशित संपादकीय बी.टी.आर. की लाइन से अलग था। इसतथा अन्य घटनाओं के फलस्वरूप बी.टी.आर. को इस्तीफा देना पड़ा औरराजेश्वर राव थोड़े समय के लिए महासचिव बने। पार्टी की हालत बदहाल थी।कोई किसी से बात नहीं करता था। पार्टी हेडर्क्वाटर समाप्त-प्राय हो चुका था।सभी निराश और पस्त हो गए थे।ऐसे में घाटे सभी से मिलकर उन्हें काम के लिए प्रोत्साहित किया करते। घाटेलिखते हैं कि वे, डांगे और अजय घोष पार्टी के बचे-खुचे अवशेषों से पार्टी कोफिर से जीवित करने में लग गए। पार्टी का अंडरग्राउंड सम्मेलन 1951 मेंकिया गया जिसमें घाटे उपस्थित थे। पार्टी का कोषाध्यक्ष होने के अलावा घाटे नेप्रकाशन विभाग और प्रेस भी संभाला। वे लगातार नेतृत्व में बने रहे।पार्टी में फूट ;1964द्धघाटे ने अक्टूबर 1962 में किए गए चीनी आक्रमण का जोरदार विरोधकिया। जून 1963 में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने घाटे के नेतृत्व में केंद्रीयकंट्रोल कमिशन को पार्टी में चल रही समानांतर सांगठनिक गतिविधियों औरगुटबाजी की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। घाटे ने अपनी रिपोर्ट अप्रैल1964 तक तैयार कर ली। पूरे दस महीनों तक घाटे और उनके साथियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में घूमकर सबूत इकट्ठा किए। उन्होंने गुटबाजी का पूरा पर्दाफाश किया। अप्रैल 1964 में ही पार्टी में फूट पड़ गई।घाटे  निरंतर  पार्टी  की  केंद्रीय  समिति  में  रहे।  अमृतसर  ;1958  से  वे राष्ट्रीय परिषद और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। वे पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे और केंद्रीय कंट्रोल कमिशन के सदस्य भी।वे कई भाषाएं जानते थेः मराठी, बंगला, कन्नड़, तमिल, हिन्दी, अंग्रेजी, इ।उनकी मृत्यु 28 नवंबर 1970 के दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद हो गई।

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बाराबंकी किसान आंदोलन में अब तक लगभग 39 किसान शहीद हो चुके हैं और प्रधानमंत्री कच्छ के किसानों के पास जाकर बात कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली में बैठे किसानों के पास जाकर बात करने का समय नहीं है अखिल भारतीय किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने शहीद किसानों की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को चाहिए कि अडानी अंबानी का मोह छोड़कर किसान हित में बात कर अविलंब नए कृषि कानूनों को रद्द करें किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि सरकार किसानों की बलि ले रही लेकिन किसानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी अडानी सरकार नेस्तनाबूद हो जाएगी किसान सभा के जिला उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि चार किलो 4 किलो धान बेचकर 1 किलो आलू किसानों ने खरीदा है यह बात सरकार को मालूम है लेकिन अडानी, अंबानी के रुपयों के कारण सरकार बड़े-बड़े विज्ञापन किसान आंदोलन के खिलाफ प्रकाशित करा रही है लेकिन इससे किसान गुमराह नहीं होगा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि न्यूनतम कृषि मूल्य कानून लागू होने के बावजूद भी धान किसान को सरकार मूल्य नहीं दिला रही है पार्टी के जिला सह सचिव डॉक्टर कौशल हुसैन ने कहा कि मोदी जब मध्यप्रदेश में बोल रहे थे यह वही मध्यप्रदेश है जहां पर 45 मंडियां बंद हो गई है पार्टी के सचिव सुदर्शन वर्मा ने कहा किसान आंदोलन के खिलाफ सरकार चाहे कितना ही संघी कार्यकर्ताओं से दुष्प्रचार करवाएं लेकिन आंदोलन जारी रहेगा श्रद्धांजलि सभा में महेंद्र यादव अध्यक्ष ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन आशीष शुक्ला अध्यक्ष अखिल भारतीय नौजवान सभा रमेश कुमार राम दुलारे राम जी कुलदीप अनुज वर्मा सर्वेश भूपेंद्र सिंह अंकित यादव अर्पित वर्मा ज्ञानेश्वर वर्माआदि प्रमुख लोग थे।।

 बाराबंकी। सरकार किसान की मांग तो मान ले लेकिन सत्तारूढ़ दल ने जो रूपया अडानी अम्बानी से लेकर जिलो-जिलों में बीस-बीस करोड़ की लागत से जिला कार्यालय बनवाए है और लाखों करोड़ रूपये चुनाव में खर्च करके सत्ता हासिल की है उसकी वापसी कैसे हो इसीलिए सरकार किसानों की मांगों को नहीं मान रही है और सम्पत्तियाँ बेचों अभियान चल रही है।
    यह बात दिल्ली में चल रहे किसान आन्दोलन के समर्थन में चले रहे गाँधी प्रतिमा के सामने धरना दे रहे किसान सभा के लोगों को सम्बोधित करते हुए प्रान्तीय उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसान मजदूर व्यापारी या नब्बे प्रतिशत जनता का रूपया छीनकर सरकार अडानी, अम्बानी को दे रही है। इसी वजह से देश में अव्यवस्था का दौर जारी है।
    किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान आन्दोलन में ज्यादा से ज्यादा किसानों को शामिल होकर अपनी बात करना होगा सरकार चाहती है आन्दोलन हिंसक हो जाय वह नहीं होगा। देश का आन्दोलन सरकार के पतन का कारण होगा।
    भारतीय कम्युनिट पार्टी के जिला सहसचिव डाॅ0 कौसर हुसैन ने कहा कि यह आन्दोलन किसानों के जीवन मरण का आन्दोलन है। सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि जनपद में किसानोें की धान की उपज का कोई खरीददार नहीं है। एक हजार रूपये प्रति कुन्तल धान बिक रहा है। किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि आन्दोलन तेज किया जायेगा। सरकार किसानों के खिलाफ कितनी अफवाहें फैलावे जनता अब जुमलेबाजों को समझ रही है।
    धरना सभा को आल इण्डिया स्टूडेन्टस फेडरेशन के महेन्द्र यादव नौजवान सभा के जिला अध्यक्ष आशीष शुक्ला, जिला लाल, दीपक वर्मा, ज्ञानेश्वर वर्मा, गिरीश चन्द्र रामनरेश आदि ने सम्बोधित किया। धरना सभा में प्रमेन्द्र कुमार, मुनेश्वर गोस्वामी, कैलाश चन्द्र, अमर सिंह, सर्वेश कुमार, कुलदीप, बीरेन्द्र कुमार वर्मा आदि लोग मौजूद रहे।

बाराबंकीः मोदी सरकार अडानी, अम्बानी की नौकर सरकार है उन्ही के इशारे पर कृषि क्षेत्र के काले कानून बनाये गए हैं और किसान आन्दोलन की मांगे सरकार नहीं मान रही है, आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने किसान सभा द्वारा दिल्ली किसान आन्दोलन कारियों के समर्थन में निकाले गए जलूस को जिलाधिकारी कार्यालय के सामने सम्बोधित करते हुए कहा कि ’’किसान और मजूदर मोदी सरकार को उखाड़ फेकेगा’’ क्योंकि अडानी और अम्बानी को फायदा देने के लिए बनाये गए कानूनों को सरकार रद्द नहीं करने जा रही है। 


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि किसानांे के समर्थन में आज भारत बंद पूर्णतया सफल है। पार्टी के जिला सह सचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि किसान विरोधी तत्वों को जनपद मंे किसानों की धान खरीद का नाटक दिखाई नहीं देता है, जबकि शहर में हजारों ट्रालियों पर लदा धान खड़ा है’ किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि धान खरीद को लेकर आन्दोलन चलाया जायेगा और इस सरकार की जुमलेबाजी की पोल खोला जायेगा। किसान सभा के जिला उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार ने कहा कि सरकार किसानों के जल, जंगल, जमीन अम्बानी और अडानी को बेच देना चाहते हैं।


छाया चैराहे से जलूस पुलिस लाइन चौराहा होते हुए सरकार  विरोधी गगन भेदी नारे लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक गया, जलूस गिरीश चन्द, पवन कुमार, रमेश कुमार, अमान गाजी, आशीष शुक्ला, मनोज कुमार, पवन वर्मा, संदीप तिवारी, महेन्द्र यादव, नैमिष सिंह, अंकित यादव, लव त्रिपाठी, आशीष वर्मा, भूपेन्द्र प्रताप सिंह, ज्ञानेश्वर वर्मा, अमर सिंह गुड्डू, राज कुमार, सहजराम वर्मा आदि प्रमुख किसान नेता थे अंत में राष्ट्रपति को सम्बोधित एक ज्ञापन जिला प्रशासन को दिया।

बाराबंकी। दिल्ली में तीन किसान विरोधी कानूनों को रद्द कराने के लिए चल रहे आन्दोलन के समर्थन में आॅल इण्डिया स्टूडेन्टस फेडरेशन व अखिल भारतीय नौजवान सभा ने जुलूस निकाला।
प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए स्टूडेन्स फेडरेशन के जिलाध्यक्ष महेन्द्र यादव ने कहा कि किसानों के समर्थन में छात्र नौजवान भी आन्दोलन करेंगे और इस देश विरोधी, जनता विरोधी सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। नौजवान सभा के जिलाध्यक्ष आशीष शुक्ला ने सरकार को ललकारते हुए कहा कि यह सरकार किसान मजदूर विरोधी सरकार है, गोदी मीडिया द्वारा हिप्टोनाइज अंध भक्त मतदाताओं द्वारा चुनी गई, अल्पमत की सरकार है, सरकार के मुखिया अडानी, अम्बानी के नौकर की भूमिका में रहते हैं और कार्पोरेट सेक्टर की यह गुलाम सरकार है। अन्त में राष्ट्रपति को सम्बोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से दिया गया, जिसकी प्रमुख मांगे किसान विरोधी काले कानूनों को रद्द किया जाये, नई शिक्षा नीति 2020 वापस लिया जाये, भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून बनाया जाये, बिजली कम्पनी विधेयक 2020 तत्काल वापस लिया जाए, श्रम कानूनों में संशोधन वापस लिया जाए तथा फर्जी मुकदमें वापस लिये जाए।
प्रदर्शनकारियों में नौजवान सभा के उपाध्यक्ष संदीप तिवारी, स्टूडेंस फेडरेशन के कोषाध्यक्ष अंकित यादव, दीपक शर्मा, प्रतीक शुक्ला, सचिन वर्मा, अंकुल वर्मा, श्याम सिंह आदि प्रमुख छात्र व नौजवान नेता थे।
प्रदर्शनकारी छाया चैराहे से पुलिस लाइन चौराहे होते हुए पटेल चैराहा से जिलाधिकारी कार्यालय सरकार विरोधी गनन भेंदी नारे लगाते हुए पहुंचे, जहां पर अतिरिक्त जिलाधिकारी संदीप गुप्ता ने ज्ञापन लिया।

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क्या हम कम बातें कर सकते हैं? मोदी के उत्थान में असली भूमिका प्रगतिशील और  धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की है | hastakshep | हस्तक्षेप

मौजूदा किसान आंदोलन की दिशा

प्रेम सिंह

किसान संसार का अन्नदाता है लेकिन आज की व्यवस्था में वह स्वयं प्राय: दाने-दाने को तरस जाता है. उसकी कमाई से कस्बों से लेकर नगरों में लोग फलते-फूलते हैं पर उसके हिस्से में आपदाएं ही आती हैं. सूखे की मार से फसल सूख जाती है. बाढ़ से खेत डूब जाते हैं. लेकिन दोनों से बड़ी आपदा तब आती है जब साल भर की मेहनत से घर आई फसल की कीमत इतनी कम मिलती है कि लागत-खर्च भी नहीं निकलता. … अगर आज किसान बदहाल है तो इसके लिए पूरी तरह सरकारों की किसान-विरोधी नीतियां ही जिम्मेदार हैं जो गावों को उजाड़ कर महानगरों के एक हिस्से को अलकापुरी बनाने में लगी हैं. … देश के पायेदान पर गांव हैं और नगरों के पायेदान पर गांवों से उजाड़े गए लोगों का निवास होता है. (‘खेती-किसानी की नई नीति’, सच्चिदानंद सिन्हा, समाजवादी जन परिषद्, 2004)

पिछले तीन दशकों से देश में शिक्षा से लेकर रक्षा तक, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से लेकर छोटे-मंझोले-खुदरा व्यवसाय तक, सरकारी कार्यालयों से लेकर संसद भवन तक और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से लेकर साहित्य-कला-संस्कृति केंद्रों तक को निगम पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत समाहित करने की प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में कृषि जैसा विशाल क्षेत्र इस प्रक्रिया के बहार नहीं रह सकता. संवैधानिक समाजवाद की जगह निगम पूंजीवाद की किली गाड़ने वाले मनमोहन सिंह ने बतौर वित्तमंत्री, और बाद में बतौर प्रधानमंत्री, इस प्रक्रिया को शास्त्रीय ढंग से चलाया. विद्वान अर्थशास्त्री और कुछ हद तक आज़ादी के संघर्ष की मंच रही कांग्रेस पार्टी से संबद्ध होने के चलते उनकी आंखें हमेशा खुली रहती थीं. कवि-ह्रदय अटलबिहारी वाजपेयी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कभी आंखें मीच लेते थे, कभी खोल लेते थे. नरेंद्र मोदी आंख बंद करके निगम पूंजीवाद की प्रक्रिया को अंधी गति प्रदान करने वाले प्रधानमंत्री हैं. वे सत्ता की चौसर पर कारपोरेट घरानों के पक्ष में ब्लाइंड बाजियां खेलते और ताली पीटते हैं. इस रूप में अपनी भूमिका की धमाकेदार घोषणा उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही कर दी थी – कांग्रेस ने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के पक्ष में कुछ संशोधन किए थे. मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही उन संशोधनों को अध्यादेश लाकर पूंजीपतियों के पक्ष में निरस्त करने की पुरजोर कोशिश की.

केंद्र सरकार द्वारा कोरोना महामारी के समय लाए गए तीन कृषि-संबंधी अध्यादेश – कृषि-उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, मूल्य का आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश 2020, आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश 2020 – उपर्युक्त प्रक्रिया और उसमें मोदी की विशिष्ट भूमिका की संगती में हैं. दरअसल, उपनिवेशवादी व्यवस्था के तहत ही कृषि को योजनाबद्ध ढंग से ईस्ट इंडिया कंपनी/इंग्लैंड के व्यापारिक हितों के अधीन बनाने का काम किया गया था. नतीज़तन, खेती ‘उत्तम’ के दर्जे से गिर कर ‘अधम’ की कोटि में आती चली गई. आज़ादी के बाद भी विकास के लिए कृषि/गांव को उद्योग/शहर का उपनिवेश बना कर रखा गया. हालांकि संविधान में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों की रोशनी में समतामूलक समाज कायम करने के संकल्प के चलते उपनिवेशवादी दौर जैसी खुली लूट की छूट नहीं थी. उद्योग (इंडस्ट्री) के मातहत होने के बावजूद कृषि-क्षेत्र ने आर्थिक संकट/मंदी में बार-बार देश की अर्थव्यवस्था को सम्हाला. अब मोदी और उनकी सरकार कृषि को पूरी तरह कारपोरेट घरानों के हवाले करने पर आमादा है. कारपोरेट घराने मुनाफे का कोई भी सौदा नहीं चूकते. नवउदारवादी नीतियों के रहते विशाल कृषि-क्षेत्र उनकी मुनाफे की भूख का शिकार होने के लिए अभिशप्त है.

छोटी पूंजी के छोटे व्यावसाइयों के बल पर पले-बढ़े आरएसएस/भाजपा बड़ी पूंजी की पवित्र गाय की तरह पूजा करने में लगे हैं. मोदी-भागवत नीत आरएसएस/भाजपा ने कारपोरेट घरानों को और कारपोरेट घरानों ने आरएसएस/भाजपा को मालामाल कर दिया है. जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा नज़र आता है, वे भ्रम फ़ैलाने में लगे रहते हैं कि वास्तव में कारपोरेट-हित में बनाए गए श्रम और कृषि-कानून मज़दूरों/किसानों को भी मालामाल कर देंगे! बड़ी पूंजी की पूजा का मामला आरएसएस/भाजपा तक सीमित नहीं है. कोई अर्थशास्त्री, राजनेता, यहां तक कि मजदूर/किसान नेता भी अड़ कर यह सच्चाई नहीं कहता कि कारपोरेट घरानों की बड़ी पूंजी राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधनों, कृषि और सस्ते श्रम की लूट का प्रतिफल है. यह लूट उन्होंने देश के शासक-वर्ग की सहमती और सहयोग से की है. फर्क यह है कि पहले कारपोरेट घराने पार्टियों/नेताओं की गोद में बैठने का उद्यम करते थे, अब पार्टी और नेता कारपोरेट घरानों की गोद में बैठ गए हैं. भारत में ‘गोदी मीडिया’ ही नहीं, ‘गोदी राजनीति’ भी अपने चरम पर है.

बड़ी पूंजी की पूजा के नशे की तासीर देखनी हो तो आरएसएस/भाजपा और उसके समर्थकों का व्यवहार देखिए. किसान कहते हैं कृषि-कानून उनके हित में नहीं हैं, लेकिन प्रधानमंत्री कहते हैं इन कानूनों में किसानों के लिए अधिकार, अवसर और संभावनाओं की भरमार है. किसान खुद के फैसले के तहत महीनों तक कृषि कानूनों के विरोध में धरना-प्रदर्शन करते हैं और ‘दिल्ली चलो’ की घोषणा करके संविधान दिवस (26 नवंबर) के दिन राजधानी में दस्तक देने के लिए कूच करते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री लगातार प्रचार करते हैं कि किसानों को विपक्ष द्वारा भ्रमित किया गया है – ऐसा विपक्ष जिसने 70 सालों तक किसानों के साथ छल किया है. किसानों को प्रतिगामी और मरणोन्मुख तबका तो सैद्धांतिक रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा में भी माना जाता है; लेकिन मोदी और उनके अंध-समर्थक उन्हें बिना सोच-समझ रखने वाला प्राणी प्रचारित कर रहे हैं.     

मोदी और उनकी सरकार की शिकायत है कि कृषि-कानूनों के खिलाफ केवल पंजाब के किसान हैं, गोया पंजाब भारत का प्रांत नहीं है. कहना तो यह चाहिए कि पंजाब के किसानों ने अध्यादेश पारित होने के दिन से ही उनके विरोध में आंदोलन करके पूरे देश को रास्ता दिखाया है. पंजाब के किसानों की शायद इस हिमाकत से कुपित होकर उन्हें ‘खालिस्तानी’ बता दिया गया है. देश के संसाधनों/उपक्रमों को कारपोरेट घरानों/बहुराष्ट्रीय कंपनियों को औने-पौने दामों पर बेचने में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाला शासक-वर्ग किसान-मंडी के बिचौलियों के बारे में ऐसे बात करता है, गोया वे जघन्य अपराध में लिप्त कोई गुट है! बड़ी पूंजी की पूजा का नशा जब सिर चढ़ कर बोलता है तो हर सिख खालिस्तानी, हर मुसलमान आतंकवादी, हर मानवाधिकार कार्यकर्ता अर्बन नक्सल और हर मोदी-विरोधी पाकिस्तानी नज़र आता है. प्रधानमंत्री का आरोप है कि लोगों के बीच भ्रम और भय फ़ैलाने का नया ट्रेंड देखने में आ रहा हैं. लेकिन उन्हें देखना चाहिए कि उन्होंने खुद पिछले सात सालों से एक अभूतपूर्व ट्रेंड चलाया हुआ है – कारपोरेट-हित के एक के बाद एक तमाम फैसलों का यह शोर मचा कर बचाव करना कि देश में पिछले 65 सालों में कुछ नहीं हुआ.

किसान पुलिस द्वारा लगाए गए विकट अवरोधों, पानी की बौछारों और आंसू गैस का सामना करते हुए संविधान दिवस पर दिल्ली के प्रमुख बॉर्डरों तक पहुंच गए. लेकिन पुलिस ने उन्हें दिल्ली में नहीं घुसने दिया. दबाव बनने पर केंद्र और दिल्ली सरकारों के बीच बनी सहमति के तहत किसानों को पुलिस के घेरे में बुराड़ी मैदान में जमा होने की अनुमति दी गई. लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार जंतर-मंतर पहुंच कर प्रदर्शन करने की मांग पर अडिग किसानों ने बुराड़ी मैदान में ‘कैद’ होने से इनकार कर दिया. उन्होंने दिल्ली के सिंघु और टीकरी बॉर्डरों पर धरना दिया हुआ है. उधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान कृषि कानूनों के विरोध में गाजीपुर बॉर्डर पर धरना देकर बैठे हैं. सरकार और पंजाब के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच 1 दिसंबर को हुई बातचीत पहले हुई 13 नवंबर की बातचीत की तरह बेनतीजा रही है. अब 3 दिसंबर को फिर बातचीत होगी, जिसकी आगे जारी रहने की उम्मीद है. किसानों ने अपना धरना उठाया नहीं है. वे 6 महीने के राशन के इंतजाम के साथ आए हैं, और अपनी मांगों के पूरा होने से पहले वापस नहीं लौटेंने का संकल्प दोहराते हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी दर्ज़ा देने की मांग तो है ही, साथ में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग भी है. आंदोलन की यह खूबी उल्लेखनीय है कि वह पूरी तरह शांतिपूर्ण और शालीन है, और उसके नेता सरकार के साथ बातचीत में भरोसा करने वाले हैं.    

सरकार अभी या आगे चल कर किसानों की मांगें मानेगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आंदोलनकारी किसान एक समुचित राजनैतिक चेतना का धरातल हासिल करने के इच्छुक हैं या नहीं. जिस तरह से दुनिया और देश में तेजी से बदलाव आ रहे हैं, खेती से संबद्ध कानूनों, संचालन-तंत्र (लोजिस्टिक्स) और संस्थाओं आदि में बदलाव लाना जरूरी है. आज के भारत में खेती को उद्योग के  ऊपर या समकक्ष स्थापित नहीं किया जा सकता. उसके लिए गांधी के ग्राम-स्वराज और लोहिया के चौखम्भा राज्य की विकेंद्रीकरण पर आधारित अवधारणा पर लौटना होगा. देश का प्रबुद्ध प्रगतिशील तबका ही यह ‘पिछड़ा’ काम हाथ में नहीं लेने देगा. खेती को सेवा-क्षेत्र के बराबर महत्व भी नहीं दिया जा सकता. अभी की स्थिति में इतना ही हो सकता है कि बदलाव संवैधानिक समाजवादी व्यवस्था के तहत हों, न कि निगम पूंजीवादी व्यवस्था के तहत. किसान खुद पहल करके पूरे देश में को-आपरेटिव इकाइयां कायम कर सकते हैं, जहां ताज़ा, गुणवत्ता-युक्त खाद्य सामान उचित दर पर उपलब्ध हो सके. इससे उसकी आमदनी और रोजगार बढ़ेगा. देश भर के किसान संगठन इसमें भूमिका निभा सकते हैं.      

किसान देश का सबसे बड़ा मतदाता समूह है. किसान का वजूद खेत मज़दूरों, जो अधिकांशत: दलित जातियों के होते हैं, और कारीगरों (लोहार, बढ़ई, नाई, धोबी, तेली, जुलाहा आदि) जो अति पिछड़ी जातियों के होते हैं, से मिल कर पूरा होता है. भारत के आदिवासी आदिकिसान भी हैं. खेती से जुड़ी इस विशाल आबादी में महिलाओं की मेहनत पुरुषों से ज्यादा नहीं तो बराबर की होती है. जातिवाद, पुरुष सत्तावाद और छुआछूत की मानसिकता से मुक्त होकर ही किसान निगम पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एकजुट और लंबी लड़ाई लड़ सकता है. आपसी भाई-चारा और सामुदायिकता का विचार/व्यवहार उसे विरासत में मिला हुआ है. निगम पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज में सांप्रदायिकता का जो ज़हर फैलाया जा रहा है, उसकी काट किसान ही कर सकता है. आज़ादी के संघर्ष में किसान शुरू से ही साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना का दुविधा-रहित वाहक था, जबकि सामंत और नवोदित मध्य-वर्ग के ज्यादातर लोग अंत तक दुविधा-ग्रस्त बने रहे. आंदोलन में शरीक कई किसानों के वक्तव्यों से पता चलता है कि वे देश पर कसे जा रहे नव-साम्राज्यवादी शिकंजे के प्रति सचेत हैं. किसानों की यह राजनीतिक चेतना स्वतंत्रता, संप्रभुता, स्वावलंबन की पुनर्बहाली के लिए जरूरी नव-साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का आधार हो सकती है.      

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

बाराबंकी। सरकार किसानों की आय दोगुना कर रही है, वहीं भूसा आठ रूपये किलो है और धान नौ रूपये किलो बिक रहा है । मोदी और योगी  किसानों व मजदूरों को उनके तथाकथित विकास के नाम पर आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही है। आल इण्डिया किसान सभा द्वारा निकाले गये प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसानों को राष्ट्रीय मार्ग पर निकलने से रोकने के लिए सरकार ने सड़कें खोद डाली है, और जगह-जगह पानी की बौछार किसानों पर कर रही है। किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसानों का संघर्ष जारी रहेगा चाहे उसके लिए जो भी कुरबानी देनी पड़े, किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि जनपद में किसानों के धान तौले नहीं जा रहे हैं जिसमें जिला प्रशासन और बड़े व्यापारियों की सांठगांठ है। वही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि पार्टी किसान संघर्ष के लिए हमेशा मदद करती रही है और आगे भी जारी रहेगी पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि यह ऐसी सरकार है कि बुआई के समय खाद का संकट, कीटनाशक दवाईयों का संकट और जब फसल तैयार हो तो उसका कोई खरीददार नहीं होता है और किसान बरबाद हो जाता है। किसान सभा का जुलूस डाॅ0 कौसर हुसैन के नेतृत्व में छाया चैराहे से होते हुए जिलाधिकारी कार्यालय तक गया जहां राष्ट्रपति के नाम सम्बोधित ज्ञापन सौंपा गया, प्रदर्शनकारियों में प्रमुख लोग अंशू लता मिश्रा, नैमिष कुमार सिंह, नीरज वर्मा, स्वप्निल वर्मा, आर्यन वर्मा, मुकेश वर्मा, निर्मल वर्मा, सचिन वर्मा, सुरेश यादव, दलसिंगार, राजकुमार, राम नरेश, राजेश सिंह, आशीष तिवारी, महेन्द्र यादव, प्रतीक शुक्ला आदि लोग रहे।

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लक्ष्मी विलास बैंक, 94 वर्षीय तमिलनाडु आधारित निजी बैंक पिछले कुछ वर्षों से जेट एयरवेज, रिलिगेयर, कॉक्स और किंग्स, कॉफी डे जैसे ज्ञात डिफाल्टर्स को दिए गए कुप्रबंधन और बुरे ऋण के कारण पिछले कुछ वर्षों से नुकसान कर रहा है, नीरव मोदी, रिलायंस हाउसिंग फाइनेंस, आदि । भ्रष्ट  शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई करने के बजाय रिजर्व बैंक ने घोषणा की है कि बैंक सिंगापुर के डीबीएस बैंक को सौंपा जाएगा ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव डी राजा ने खा कि लक्ष्मी विलास बैंक को न सौंपे विदेशी बैंक को  न सौपें और बैंक के जमाकर्ताओं और ग्राहकों के साथ-साथ बैंक के खुदरा निवेशकों के बड़े हित में बैंक को एक सार्वजनिक क्षेत्र बैंक में विलय करना वांछनीय है जैसा कि अतीत में कई मामलों में किया गया है । विदेशी निवेशकों को खुश करने के लिए सरकार के एजेंडे के विदेशी बैंक स्मैक को बैंक सौंपते हुए । एलवीबी के स्थगन की घोषणा करने के एक घंटे के भीतर भारतीय रिजर्व बैंक ने डीबीएस बैंक में विलय करने के प्रस्ताव के किया  है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पहले से ही तय किया गया था । इतनी जल्दी क्यों किसी को साफ नहीं होती । सरकार को इस मामले से पूरी तरह पूछताछ करनी चाहिए और डीबीएस बैंक को एलवीबी का सौंपना बंद करना चाहिए ।स्थानीय मुखर और आत्मनिर्भर के बारे में छत के ऊपर से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जोर से घोषणा करते रहते हैं । लेकिन वास्तव में वे यही करते हैं । मोदी सरकार की इन देशद्रोही विनाशकारी नीतियों के खिलाफ कामकाजी और किसान लड़ रहे हैं । 26 नवंबर 2020 को आम हड़ताल और किसान आंदोलन भी होगा ।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  सभी वर्गों से अपील करती है कि इन संघर्षों को एक बड़ी सफल बनाने के लिए पूर्ण एकजुटता और समर्थन करें । निजी क्षेत्र के कर्जदाता लक्ष्मी विलास बैंक (LVB) और सिंगापुर स्थित डीबीएस होल्डिंग्स की भारतीय शाखा के विलय में बैंकिंग क्षेत्र के संगठनों को गड़बड़झाला लग रहा है। बैंक के शेयरधारकों, आम नागरिकों और कई बैंकिंग यूनियन का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक  ने जिस तरह से डीबीएस इंडिया को लक्ष्मी विलास बैंक मुफ्त में देने का फैसला किया है, उसमें कई झोल हो सकते हैं। ऑल इंडिया बैंक इंप्लॉईज एसोसिएशनके महासचिव सीएच वेंकटचलम ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के नेतृत्व में एलवीबी के डीबीएस इंडिया में विलय की जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें बड़ा झोल नजर आ रहा है।  इस विलय को लेकर जिस जल्दबाजी में दिख रहा है, उसमें घोटाले की आशंका भी दिखाई दे रही है। बैंक के एक लाख से अधिक शेयरधारकों को विलय योजना पर प्रतिक्रिया देने के लिए महज तीन दिनों का वक्त दिया गया है।

आरबीआइ ने मंगलवार को कहा कि विलय के अस्तित्व में आने के बाद एलवीबी का परिचालन बंद समझा जाएगा।