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Posts Tagged ‘अन्ना’

दोस्त हो तो दौलतराज जैसा
मैं कृषि मंडी से बाहर हो गया, घर लौटने का मन नहीं था, संघ के लोगों द्वारा खाना फेंकने के बाद से मैं घर जाने से कतराता था, भीलवाड़ा में ही इधर-उधर भटकना, कहीं खाना, कहीं सोना, कुछ भी ठिकाना न था, अनिश्चय, अनिर्णय और अन्यमनस्क स्थिति के चलते मेरा अध्ययन प्रभावित हो गया, मैंने माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय में प्रथम वर्ष कला संकाय में प्रवेश तो लिया और साल भर छात्र लीडरशिप भी की, लेकिन एग्जाम नहीं दे पाया ,घर पर पिताजी को जब इसकी खबर मिली तो उनकी डाँट पड़ी ,कुछ गालियाँ भी, बस गनीमत यह थी कि पिटाई नहीं हुई, लेकिन इससे पढ़ाई बाधित हो गई, बाद का सारा अध्ययन स्वयंपाठी के रूप में ही संपन्न हुआ। उन विकट दिनों में मुझे अपने छोटे से कमरे में शरण दी, करेड़ा क्षेत्र की नारेली ग्राम पंचायत के रामपुरिया गाँव के निवासी दौलत राज नागोड़ा ने, वे भी आरएसएस के स्वयंसेवक थे, ऑफिसर्स ट्रेनिंग प्राप्त, संघ कार्यालय पर भी रह चुके थे, बदनोर में रहते हुए उन्होंने संघ के आदर्श विद्या मंदिर में आचार्य के नाते भी अपनी सेवाएँ दी थीं, वे बहुत ही सक्रिय स्वयंसेवक माने जाते थे, उनका बौद्धिक भी बेहद सधा हुआ होता था, एक शिक्षक की तरह वे बोलते जो समझने में आसान होता, संघ के गीत भी उन्हें खूब कंठस्थ थे, जिन्हें वे विभिन्न मौकों पर गाते थे ,उनमे लोगो को मोबलाइज करने की अदभुत क्षमता है। उन्हें भी संघ कार्य के दौरान कई प्रकार के कटु अनुभव हुए, भेदभाव और अस्पृश्यता की कड़वी अनुभूतियाँ। एक बार उन्होंने महाराजा अजमीड आदर्श विद्या मंदिर में आयोजित आरएसएस के ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप (ओटीसी) के बौद्धिक सत्र में जाति उन्मूलन में संघ की भूमिका से सम्बंधित सवाल उठा दिया, जिसका कोई जवाब संघ के पदाधिकारियों से देते नहीं बना ,तत्कालीन प्रचारक महोदय ने दौलत जी को कुछ उल्टा सीधा जवाब दे दिया, मामला इतना तूल पकड़ गया कि मारपीट की नौबत आ गई, जिला प्रचारक और दौलत राज नागोड़ा गुत्थमगुत्था हो गए, दौलत जी भी ठहरे ठेठ देहाती संघर्षशील व्यक्ति। हार मानने का तो सवाल ही नहीं उठता था, उन्होंने संघ के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में प्रचारक जी के बाल नोच लिए और उस दिन से आरएसएस से किनारा भी कर लिया, बाद में उन्होंने एक अम्बेडकर बचत समूह बनाकर दलितों को संगठित करना शुरू किया, यह काम उन्होंने निरंतर जारी रखा, दलित आदिवासी युवाओं को कानूनी प्रशिक्षण देने और उन्हें फूले, कबीर, अम्बेडकर के मिशन से जोड़ने में लगे रहे और आज भी लगे हुए हंै। संघ से लड़ाई होने के बाद दौलत राज जी गाडरीखेड़ा में एक कमरा किराये पर ले कर इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में आईटीआई करने लगे इस सरकारी संस्थान में भी संघियों की भरमार थी, उनको वहाँ भी उनसे संघर्ष करना पड़ा, बहुत ही कठिन परिस्थितियों में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की, पान की केबिन लगाकर उन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की। फिर प्रैक्टिस शुरू की, वहाँ भी गरीबों के मुद्दे उठाये, उनकी पैरवी की, आज भी पीडि़तों के लिए उनकी प्रतिबद्धता जग जाहिर है तो ऐसे समर्पित साथी के साथ उस छोटे से कमरे में मैं कई दिनों तक टिका, वहीं से एक अखबार निकालने की धुन मुझ पर सवार हुई, मैं अभिव्यक्ति का एक जरिया चाहता था, जिससे संघ और उसकी विचार धारा के दोगलेपन को उजागर कर सकूँ, अंततः वह जरिया पा लिया ‘दहकते अंगारे’ नामक पाक्षिक समाचार पत्र प्रारंभ करके, दौलत राज नागोड़ा तब से आज तक साथ बने हुए हैं, कई बार उन्मादी हुड़दंगी लोगों ने हमारे खिलाफ फतवे जारी किए, हमारी निंदा की गयी ,हमें अलग थलग करने के प्रयास किये गए, मगर संघी हमें दलित, पीडि़त, वंचित जनता से अलग कर पाने में सफल नहीं हुए। दलितों पीडि़तो और हाशिये के तबकों के लिए हमारी आवाज बंद होने के बजाए बुलंद ही हुई। आज दौलत राज नागोड़ा एक स्थापित वकील है, तीन बार वे आसींद बार एसोसिएशन के निर्विरोध अध्यक्ष रह चुके हैं और राजस्थान के दलित मूवमेंट का जाना पहचाना नाम है। इन दिनों वे दलित आदिवासी एवं घुमंतू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के प्रदेश संयोजक भी हंै और वंचितों के लिए पूरी तरह से समर्पित रहते हैं।
जिन्दगी में दोस्त तो बहुत मिले और मिलते रहते हैं, आगे भी मिलेंगे, पर विगत 25 वर्षों से दौलत जी के साथ जो वैचारिक और मिशनरी दोस्ती बनी रही, उसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ और अक्सर कहता हूँ कि जीवन में दोस्त हो तो दौलत राज जैसा।
बदलाव नहीं बदला लेने की इच्छा
मैं किसी भी तरीके से प्रतिशोध लेना चाहता था, इसके लिए किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार था, जैसा कि नीति कहती है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसलिए मैं उन तमाम लोगांे से मिलने लगा जिनको आरएसएस के लोग बुरे लोग बताते थे, अब मेरे परिचय क्षेत्र में सेकुलर विधर्मी सब आने लगे, मैं आगे होकर उनसे परिचय बढ़ा रहा था, संघ में रहते हुए मेरे गिनती के मुसलमान ही परिचित थे, चूँकि मैं उन दिनों हास्य व्यंग्य के नाम पर घटिया किस्म की फूहड़ राजस्थानी कविताएँ लिखता था और उन्हें सुनाने के लिए कवि सम्मेलनों में जाता था, इसलिए जमालुद्दीन जौहर, अजीज जख्मी और एक मौलाना नौशाद आलम नामक मुसलमान मेरे जान पहचान के थे, एक और भी व्यक्ति थे वे ट्रेड यूनियन लीडर थे अलाउद्दीन बेदिल, वो भी कभी कभार शेरो शायरी करते थे, इसलिए मुलाकातें हो जाया करती थीं, इनमें से नौशाद आलम मेरी उम्र के ही थे और कविता कहानी के अलावा भी उनसे बातें होती थीं, इसलिए मैंने उनसे दोस्ती बनाने का निश्चय किया और उनसे मिलने निकल पड़ा। नौशाद आलम मूलतः बिहारी थे और मेरे निकटवर्ती गाँव भगवानपुरा में एक मस्जिद में इमामत भी करते थे और मदरसे में पढ़ाते भी थें, ग़ज़लें लिखना तो उनका शौक मात्र था, बाद के दिनों में वे गुलनगरी भीलवाड़ा की मस्जिद के इमाम बन गए, यह उन दिनों की बात है जब कि दूसरी कारसेवा भी हो चुकी थी और बाबरी मस्जिद तोड़ी जा चुकी थी, मुस्लिम मानस गुस्सा था, विशेषकर संघ परिवार के प्रति मुस्लिम युवाओं में भयंकर गुस्सा दिखलाई पड़ता था, तो उस तरह के गरमागरम माहौल में मैं एक दिन मौलाना नौशाद आलम से मिलने पहुँचा, थोड़ी झिझक तो थी, आज मैं एक मस्जिद से लगे मदरसे में बैठा था, इन मस्जिदों के तहखानों में असलहे छिपाकर रखे जाने की बातें संघ में रहते बहुत सुनी थी, इसलिए थोड़ा सा भय भी था पर जब आ ही गया तो बात करके ही वापसी होनी थी, इसलिए रुका रहा, मदरसे से फ्री होकर मौलाना साहब नमाज पढ़ने चले गए, लौटे तो बातचीत का सिलसिला चला, घंटों तक हुई गुफ्तगू का कुल जमा सार सिर्फ यह था कि हमारा दुश्मन एक ही है इसलिए मिलकर उसकी खिलाफत की जाए, सहमति बनी एक संगठन दलित युवाओं का और एक मुस्लिम यूथ का बनाने की। मैंने दलित एक्शन फोर्स बनाई जिससे दलित नौजवान जुड़ने थे और मौलाना नौशाद आलम ने मुसलमान युवाओं के लिए हैदर -ए-कर्रार इस्लामिक सेवक संघ बनाया, मकसद था आरएसएस की कारगुजारियों का पर्दाफाश करना और जरूरत पड़ने पर सीधी कार्यवाही करके जवाब देना, इन संगठनों के बारे में जगह जगह चर्चा शुरू की गई, लोग जुड़ने भी लगे लेकिन हम कुछ भी कर पाते इससे पहले ही खुफिया एजेंसियांे को इन दोनों संगठनों की भनक लग गई और सीआईडी तथा आईबी के अधिकारी और स्थानीय पुलिस हमारे पीछे पड़ गई, हमारे द्वारा नव स्थापित दोनों ही संगठन अपने जन्म के साथ ही मर गए, हम कुछ भी नहीं कर पाए लेकिन इस असफलता ने मुझे निराश और हताश नहीं किया, मेरा गुस्सा जरूर और बढ़ गया, मैंने हार मानने की जगह आरएसएस को चिढ़ाने के लिए धर्म परिवर्तन कर लेने की तरकीब सोची।
-भँवर मेघवंशी
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

लोकसंघर्ष पत्रिका  का कवर

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ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा ब़ती महँगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यू.पी.ए. सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चौतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एकदो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही
बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की।
पेट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की, अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ ब़ाने के लिए विदेशी निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25 करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का ब़ा हुआ हौसला वैश्विक पूँजीवादी ताकतों की देन है।
मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते। यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएँगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते हैं ॔कुर्बान हो जाएँगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!’
मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धोपोंछ कर उसे एक ॔कारपोरेट पार्टी’ में तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।
लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ॔ब्रह्मफाँस’ फेंका है, उसमें सब फँसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है ताकि मानव सभ्यता को पूँजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह ॔शाइनिंग इंडिया’ की चकाचौंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है।
जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी
धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूँजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशों/मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी ॔मेंटर’ को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।
उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे ॔गुलाम दिमाग का छेद’ कहा था, वह ब़ कर बड़ा गड बन गया है।
नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूमफिर कर उनका विश्लेषण पूँजीवाद का विश्लेषण होता है और तर्क भी पूँजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूँजीवाद की हर श्ौ में विकास का दशर्न करने वाले माक्र्सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूँजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके
उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमरीकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊँची पूँजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंगूरनंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी।
भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। ॔शाइनिंग इंडिया’ की पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों ॔इंडियन एक्सप्रेस’ के स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापनगीत ॔जो मेरा है वो तेरा है’ को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और
गांधी? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी ॔म्युजिक ऑफ दि स्पीनिंग व्हील : महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फॉर दि इंटरनेट एज’ किताब आई, जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियाँ आजकल ब़चढ़ कर गांधीप्रेम का प्रदशर्न करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्घांतकारों में से एक हैं, जिनके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पॄाई जाती है कि वे ऋषियोंमुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!
भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूँजीवाद ने दूध की बूँद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूँफा के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं।
मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएँ हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो!
लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने ॔प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान’ लेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्गस्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खायापिया और कुछ हद तक अघाया मध्य वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जनभावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्गस्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जनसामान्य शामिल हो जाए तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनैतिक पार्टी बना ली है जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।
चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूँजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीनचार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमरीका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भ्रष्टाचार की चाट साहब लोगों के स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ॔॔चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इसे मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है।
यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूँजीवाद की वैश्विक शक्तियाँ हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमरीकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमरीकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक यह आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हायतौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ ब़ाने के लिए गरीबों को महँगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी।
उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर महँगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब तक जब तक कि उनका सफाया नहीं हो जाता!
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता महँगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएँगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है।
सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहाँ नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा ॔खुदरा में विदेशी निवेश : नवउदारवाद के ब़ते कदम’ (॔युवा संवाद’, फरवरी 2012) ॔समय संवाद’ देखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं/शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनैतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों/समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी ॔मैं आम आदमी हूँ’’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलतेचलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे ब़ाएँगे।
कौन है आम आदमी?
हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथसाथ कुछ न कुछ विश्लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पाँचसात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम.) में तोड़फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के ॔अच्छे’ उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन वह काम बिना राजनीति के और पूँजीवादी व्यवस्था को बदले बगैर नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बारबार कहा गया लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं।
जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं।
तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण
विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब धर्मनिरपेक्षता वादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहाँ यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपटक्रीड़ा के साथ एकदूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्पझप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आई.ए.सी. का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उनके ख़याल में तब नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें ॔मसीहा’ बना रहे थे।
अन्ना भी एन.जी.ओ. की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एन.जी.ओ. व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एन.जी.ओ. व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एन.जी.ओ. व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एन.जी.ओ. बाज लोमड़ वृत्ति के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एकदूसरे को इस्तेमाल करने के दावपेंच देखने को मिलेंगे। एकदूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूँजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!
चौथी बात यह कि ॔यूथ फॉर इक्वैलिटी’ में विश्वास करने वाली पार्टी यह भलीभाँति जानती है कि भारत में युवा शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भाँजी गई हैं। पाँचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी ॔जात’ दिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एन.जी.ओ.बाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु मानने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्हें भी केजरीवाल को राजनैतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गइरं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे ब़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है।
छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ॔आंदोलन की राख से उठी है’। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा माक्र्सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के ॔पोल खोल’ कार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहाँ हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनैतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्वास करते हों। लेकिन जब ए.बी. बर्द्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुँचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चौटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुँचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फरुर्खाबादी हो गया।
उनमें यह डर नहीं पैदा होता अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्त नहीं है। उन्हें चीन का ॔मार्केट सोशलिज्म’ मंजूर है, लेकिन ॔देशी समाजवाद’ की बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बारबार देवताओं के पास भागता है।
सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तविक संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकिया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर मंतर पर एफ.डी.आई. के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को वहाँ केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं।
जैसा कि अक्सर होता है, जंतर मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डी.जे. की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बारबार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डी.जे. बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डी.जे. पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आँखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहाँ से हटाया।
नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी ॔अंतर्राष्ट्रीय’ केंडे का नहीं है। पूँजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफसुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमरीका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फँसने से इनकार करते हैं वहाँ वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी।
दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदशर्न ॔मैं अन्ना हूँ’, ॔मैं केजरीवाल हूँ’, ॔मैं आम आदमी हूँ’ हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्य वर्ग की इस प्रवृत्ति को ॔दुखों के दागों को तमगेसा पहना’ कह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमालवृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनैतिक पार्टी नहीं निकल सकती है।
पार्टी को एक तरफ छोड़ कर ॔आम आदमी’ पर थोड़ी चर्चा करते हैं जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखोंकरोड़ों में खेलने वाले लोग जब ॔मैं आम आदमी हूँ’ की टोपी लगाते हैं तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वाह और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूँजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूँजीवाद का यार, याराना मीडिया दिनरात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए। आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनैतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ॔व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ॔आम आदमी, आम आदमीआम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुइरं, वे शुरू से ही मेहनतमजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।
सब टी.वी. पर एक सीरियल आर.के. लक्ष्मण की दुनिया’ आता है। उसका उपशीर्षक होता है ॔आम आदमी के खट्टे मीठे अनुभव’। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफसुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटेताजे सजेधजे होते हैं, स्कूटरकार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खानेपीने, बच्चों की पॄाई लिखाई, सैरसपाटे-पिकनिक, बच्चों के कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं।
मध्य वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्य वर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह ॔महान’ मध्य वर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।
भारत का मध्य वर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियाँ हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियाँ देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएँ और मध्य वर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहाँ उनकी जात भी ऊँची होगी और वर्गस्वार्थ भी बराबर सधेगा।
-प्रेम सिंह
शिकारियों के बीच घिरी एक लड़की

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इतने दिनों से अन्ना गैंग तमाम सरकारी महकमों और सत्ताधारी गैंग के नेताओं, मंत्रियों को भ्रष्ट, चोरडाकू, लुटेरा घोषित करती चली आ रही थी, अब सत्ताधारी गैंग के धुरंधरों ने पूरी अन्ना गैंग को बदनाम करने के लिए एक सूत्रीय अभियान छेड़ दिया है। भ्रष्टाचार विरोधी सम्प्रदाय के कुछ लोग इधरउधर से टँगड़ी मारकर रायता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि फैले रायते में अन्ना गैंग फिसलफिसल कर गिरे। सीन देखकर लग रहा है जैसे मोहल्ले के बच्चों की परस्पर विरोधी गैंगें खेल ही खेल में अचानक एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलकर वाक्युद्ध में मुब्तिला हो गई हों। एक गैंग हमला करती हुई दूसरी से कह रही है तू चोर! दूसरी काउन्टर हमला करती हुई पहली से कहती है तू चोर। पहली फिर हमले में तेज़ी लाते हुए कहती है तेरा बाप चोर, तो दूसरी प्रत्युत्तर में कहती है तेरा चाचा चोर, तेरा मामा चोर। पहली फिर ऐलानियाँ हमला करती है तेरा दादा चोर, परदादा चोर। दूसरी गैंग के सदस्य अपने हमले को और व्यापक बनाते हुए चिल्लाते हैं तू चोर, तेरा बाप चोर, तेरा पूरा खानदान चोर। इस तरह दोनों गैगें लड़झगड़कर एकदूसरे के खानदान की पोलपट्टी खोलते हुए अपनी भड़ास निकालती रहती हैं और मोहल्ले की तीसरी गैंग घात लगाए बैठी रहती है कि ये दोनों गैंगें लड़झगड़कर परिदृय से बाहर का रास्ता नापें तो हम झट से मैदान हथिया लें।

जहाँ तक चोरलुटेरों का सवाल है, सत्ताधारियों में तो इतने चोरलुटेरे निकल आए हैं कि अब तो किसी को गवाह सबूत तक देने की ज़रूरत नहीं होती। किसी को झूठे से ही यदि कह दिया जाए कि फलाँ विभाग का मंत्री चोर है तो पब्लिक आँख मूँदकर मान ले कि हाँ भैया ज़रूर होगा। सत्तासुख में लीन पाँचदस फीसदी लोग लूटखसौट की संस्कृति के झंडाबरदार बने हुए हैं और अन्ना गैंग इस लूटखसौट में कोई चोरी चकारी न हो इसके लिए माथाफोड़ी कर रही हैं। राष्ट्रीय संपदा की खुल्लमखुल्ला लूट में कोई भ्रष्ट गैरकानूनी तरीके से अपना घर न भर सके इसके लिए अन्ना और उनकी गैंग लोकपाल’ के लिए मचल रही है। उन्हें ऐसा लोकपाल चाहिए जो भ्रष्टाचारियों का गला मसक सके, उन भ्रष्टाचारियों का जो पैसा खाखाकर पूँजीवादी विकास’ की अंधाधुध रफ्तार में अडं़गा डाल रहे हैं, उसी पूँजीवादी विकास’ की जो गरीब मजदूर किसानों का गला दाबदाबकर उफना पड़ रहा है। इन भ्रष्टाचार विरोधी संतों को महँगाई से कोई मतलब नहीं, गरीबी बेरोज़गारी से कोई लेना देना नहीं, शोषण हो, दमन हो, उत्पीड़न हो, सामाजिक पिछड़ापन हो, साम्प्रदायिकता हो, धार्मिक उन्माद हो, जातिगत वैमनस्य हो, सब कुछ हो बस भ्रष्टाचार’ न हो। लोग एक बस भ्रष्टाचार’ न करें बाकी जिसकी जो मज़ीर करता रहे हमें मतलब नहीं!
अब भ्रष्टाचार विरोधी संतों साध्वियों की पोलें खोली जा रही हैं तो हमें बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हो रहा है बल्कि आश्चर्य तो हमें तब हो रहा था जब उनकी पोलें नहीं खोली जा रही थीं। क्योंकि वे ॔तू चोर तू चोर’ चिल्ला रहे थे और चोरों की तरफ से ॔तेरा बाप चोर’ की आवाज़ नहीं आ रही थी। बात दरअसल रोकड़े’ की है। जब भी रोकड़े’ की बात आती है तो अच्छे अच्छे लोग नीतिनैतिकता की तमीज़ को मैलीकुचैली कमीज़ की तरह खूँटी पर टाँगकर दोदो कौड़ी के लिए टुच्चों की तरह घटिया हरकतें करते दिखाई देते हैं। सरकार की ओर से किराया माफ टिकट पर हवाई जहाज़ के मज़े लेकर प्रायोजकों से पूरी किराए की वसूली शुद्ध रूप से ठगी नहीं तो और क्या है। देश में और भी कई शरीफज़ादे मौका मिलते ही एस़ी थर्ड क्लास में सफर कर फर्स्ट क्लास का पैसा वसूल करते हैं या एस़ी थर्ड क्लास का पैसा वसूलकर सेंकड क्लास स्लीपर में सफर कर लेते हैं। नीचे लेवल पर हों सकता है कुछ टुच्चे ऐसे भी हो जो सेकंड क्लास स्लीपर का पैसा वसूल कर जनरल बोगी में ठुसकर पैसा बचा लेते हों या जनरल क्लास का पैसा वसूलकर ट्रेन की छत पर बैठकर चले जाते हों। जैसा टुच्चा वैसी हरकत, कुछ तो हराम की कमाई हो। इज्ज़त का भले फालूदा हो जाए मगर हराम का माल ज़रूर खखोरेंगे। हम नैतिकता की भ्रष्टता के प्रति बिल्कुल चिंतित नहीं, इसलिए हराम का माल पाने की तमन्ना हरेक के सिर च़कर बोलती है। मगर इस तरह अनैतिकता से चाँपे गए पैसों से परोपकार की बीन बजाने का क्या अर्थ है! इससे तो बेहतर है कि खुले आम चौर्यकर्म और ठगी शुरू कर दी जाए। यूँ चेहरे पर शराफत का उजला मुखौटा लगाकर चोर दरवाज़ों से पैसा चाँपने की क्या तुक है। अनैतिकता से बनाई गई रकम से अनैतिक कारोबार भले सध जाए, समाजसेवा की नैतिकता कैसे सध सकती है! डकैत अगर कहने लगे कि साहब हमने एक पैसा भी अपनी अय्याशी पर खर्च नहीं किया, मानव मात्र की सेवा के लिए डकैती डाली है, तो मेरे ख़याल से भारतीय दंड संहिता उसे फूलों की माला पहनाकर घर रवाना नहीं कर देगी।
इधर आजकल मजे़दार वाक़िया चल रहा है। करोड़ों रुपया खाकर डकार भी न लेने वाले लोग किराए में टुच्चाई से बचाई मामूली रकम पर नज़र गड़ाए हुए हैं। जनता के विश्वास को खड़ेखड़े मिट्टी में मिलाने वाले एक ज़रा से बॉन्ड के उल्लंघन पर बदसलूकी पर उतर आएँ हैं। इधर से चोरचोर की चिल्लाचोट पर उधर से भी चोरचोर चिल्लाया जा रहा है। किसी ने सच ही कहा है कि चोरों को सारे नज़र आते है चोर! वही सीन है, एक गैंग उधर से चिल्ला रहा है तू चोर तेरा बाप चोर और दूसरा इधर से कह रहा है तेरा दादा चोर तेरा नाना चोर।

प्रमोद ताम्बट
मो. 9893479106

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इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं आ रहा है। कई अलगअलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनीअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।

यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ॐचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्मआधारित ॐचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबेछिपे ंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा ब़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ़हाने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और ब़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के “खतरे” का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जडें़ जमा रही है। उसकी जडें़ और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भीविशेषकर आदिवासी इलाकों मेंसाम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द ग़ा। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ॐचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें “लोकपाल” नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और “अन्ना संसद के ऊपर हैं” जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचानआधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूहचाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिकराजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। “मैं अन्ना हूँ” “हम जनता हैं” जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल “शाईनिंग इंडिया” वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघहिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

राम पुनियानी

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