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Posts Tagged ‘आतंकवाद’

पुलिस की कहानी को संदिग्ध
उत्तर प्रदेश सरकार ने आतंकवाद के नाम पर फर्जी फंसाए गए निर्दोष लोगों के ऊपर से मुकदमा हटाने की पहल शुरू की है जिसके तहत गोरखपुर में आतंकवाद के मामले में आरोपित तारिक कासमी का वाद वापसी का आदेश दिया है और कहा है कि जिला मजिस्ट्रेट गोरखपुर न्यायलय में वाद वापसी का शपथ पत्र दाखिल करें। यह समाचार आने के बाद खुफिया एजेंसियों के इशारे पर वाद वापसी का विरोध कुछ लोगों द्वारा नियोजित तरीके से प्रारंभ कर दिया गया है। यह वह लोग हैं जो जंग ऐ आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ थे और आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित पोषक हैं। जब भी जनता से जुडी हुई बात आती है तो यह लोग व्यवस्था से लाभ लेने के लिए उसकी चापलूसी में लग जाते हैं. खुफिया एजेंसियों के लोग मीडिया में अपने समर्थकों से आतंकवाद के नाम पर की गयी गिरफ्तारियों को सही साबित करने के लिए माहौल बनाने में लग गयी हैं और मीडिया के कुछ लोग बड़ी तेजी से इस मुहीम में लग गए हैं कि केस वापस न होने पाए।
गृह सचिव सर्वेश चंद मिश्र ने पत्रकारों को सरकार के इस फैसले से अवगत कराया। गृह सचिव ने बताया कि गोरखपुर के डीएम व एसएसपी से आख्या प्राप्त करने और न्याय विभाग के परामर्श से मुकदमा वापस करने का निर्णय किया गया है। अग्रिम कार्रवाई के संदर्भ में उन्होंने बताया कि सम्बंधित अदालत, डीएम व एसएसपी को इस सिलसिले में न्याय विभाग से पत्र भेजा जायेगा। मुकदमा वापसी की प्रक्रिया पर उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों पर उच्च स्तरीय समिति का फैसला होता है, जिसमे प्रमुख सचिव न्याय और प्रमुख सचिव गृह का परामर्श होता है।बाराबंकी में तारिक की गिरफ्तारी को गलत ढंग से दिखाए जाने और निमेष आयोग की रिपोर्ट के मसले पर उन्होंने स्वीकार किया कि आयोग ने एसटीएफ की कार्रवाई पर संदेह व्यक्त किया है।
अब सरकार की नियत अगर साफ़ है तोह बाराबंकी, फैजाबाद, लखनऊ में चल रहे मुकदमों को वापस ले लेगी क्यूंकि आर डी निमेष कमीशन ने तारिक व खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को संदेहस्पद माना है और बरामदगी को भी फर्जी माना है। इस तरह से आर डी एक्स , जिलेटिन राड, डेकोनेटर आदि एस टी एफ के लोग लाये कहाँ से। वैसे उक्त कथित सामग्री किसी न्यायलय के समक्ष पेश नही की गयी है। न्यायलय को यह सूचना दी गयी है कि उक्त विस्फोटक पदार्थ निष्क्रिय करा दिए गए हैं। अब खुफिया एजेंसियों की सारी बातें गलत साबित होने पर उनकी प्रतिष्ठा फंसी हुई है कि किसी भी तरह से केस वापसी न होने पाए और अपनी हिकमतमली से न्यायलय में फर्जी मुक़दमे में सजा करा दे। अभी हाल में झारखण्ड में जीतेन्द्र मरांडी को न्यायलय द्वारा फांसी की सजा सुनाई गयी थी किन्तु उच्च नयायालय ने उनको रिहा करने का आदेश पारित कर दिया। निचली अदालतों पर खुफिया एजेंसी व जिला प्रशासन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सजा कराने का कार्य भी करती है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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फिलिस्तीन के साथ भूमंडलीय माध्यमों का रिश्ता बेहद जटिल एवं शत्रुतापूर्ण रहा है।कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिन पर ध्यान देने से शायद बात ज्यादा सफ़ाई से समझ में आ सकती है।ये तथ्य इजरायली माध्यम शोर्धकत्ताओं ने नबम्वर 2000 में प्रकाशित किए थे।
शोधकर्त्ताओं ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबर भेजने वाले संवाददाताओं का अध्ययन करने के बाद बताया कि इजरायल में 300 माध्यम संगठनों के प्रतिनिधि इस संघर्ष की खबर देने के लिए नियुक्त किए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में संवाददाता किसी मध्य-पूर्व में अन्य जगह नियुक्त नहीं हैं।
मिस्र में 120 विदेशी संवाददाता हैं।इनमें से दो-तिहाई पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका से आते हैं। इनमें ज्यादातर संवाददाता वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी से अंग्रेजी में खबर देते हैं।चूंकि खबर देने वाले संवादाता इजरायल में रहकर खबर देते हैं यही वजह है कि इनकी खबरें इजरायली दृष्टिकोण से भरी होती हैं।इनमें अधिकांश संवाददाता यहूदी हैं।ये वर्षों से इजरायल में रह रहे हैं।
औसतन प्रत्येक संवाददाता 10 वर्षों से इजरायल में रह रहा है।अनेक की इजरायली बीबियां हैं।अनेक स्थायी तौर पर ये काम कर रहे हैं।चूंकि इन संवाददाताओं की मानसिकता पश्चिमी है अत: इन्हें इजरायल से अपने को सहज में जोड़ने में परेशानी नहीं होती। 91प्रतिशत संवाददाताओं का मानना है कि उनकी इजरायल के बारे में ‘अच्छी'(गुड) समझ है।
इसके विपरीत 41 प्रतिशत का मानना है कि अरब देशों के बारे में उनकी ‘अच्छी’ (गुड) समझ है।35 प्रतिशत का मानना है कि उनकी ‘मीडियम’ समझ है।ये जूडिज्म के बारे में ज्यादा जानते हैं, 57 प्रतिशत ने कहा कि वे जूडीज्म के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।जबकि मात्र 10 फीसदी ने कहा कि वे इस्लाम के बारे में ‘अच्छा’ जानते हैं।
ये संवाददाता अरबी की तुलना में हिब्रू अच्छी जानते हैं:54 फीसदी को हिब्रू की अच्छी जानकारी है जबकि 20 फीसदी को काम लायक ज्ञान है।इसके विपरीत मात्र 6 प्रतिशत को अरबी का अच्छा ज्ञान है।मात्र 42 फीसदी संवाददाताओं को अरबी थोड़ा सा ज्ञान है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी समाचार एजेन्सियों के लिए चंद इजरायली संवाददाता लिखते हैं। फिलिस्तीन के बारे में छठे-छमाहे खबर दी जाती है।फिलिस्तीन के बारे में उनके इलाकों में गए वगैर खबर देदी जाती है।सबसे बुरी बात यह कि इस इलाके में होने वाली घटना के बारे फिलिस्तीनियों की राय जानने की कोशिश तक नहीं की जाती।ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष की वस्तुगत प्रस्तुति संभव है।
भूमंडलीय माध्यम ज्यों ही आतंकवाद को इस्लामिक फंडामेंटलिज्म से जोड़कर बात करते हैं तो जाने-अनजाने इसके दुष्प्रभावों को दुनियाभर के मुसलमानों को झेलना पड़ता है। आतंकवाद चाहे वह किसी भी रुप में व्यक्त हो मूलत: राजनीतिक केटेगरी है। उसे धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है।
जब भी कहीं पर आतंकवादी हमला होता है तो तत्काल मुसलमानों से पूछा जाता है कि आपकी क्या राय है ?प्रश्न उठता है क्या माध्यम भी राय लेते समय धार्मिक अस्मिता का ख्याल करता है ? आमतौर पर भूमंडलीय माध्यम धार्मिक अस्मिता का ख्याल रखते हैं। इसके लिए वे स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों पर जोर देते हैं।स्टीरियोटाईय प्रस्तुतियों के माध्यम से उसकी वैचारिक प्रकृति को छिपाया जाता है।
इस तरह की प्रस्तुतियों में मुख्य जोर इस बात पर रहता है कि वह किसका एजेण्ट है ?जिसका एजेण्ट है उसने क्या दिया और क्या कहा ?ओसामा बिन लादेन के बारे में विभिन्न माध्यमों में जो जानकारियां पस्तुत की गयी हैं उनमें मूलत: इन्हीं बातों का विवरण है।इन पस्तुतियों से उसकी वैचारिक प्रकृति गायब है।
प्रसिध्द माध्यम विशेषज्ञ एम.सी.वासीउनी के अनुसार स्टीरियोटाईप इमेज अंतत: दर्शक और आतंकवादी के बीच सहिष्णुभाव पैदा करती है।इस तरह की प्रस्तुतियों का समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है।पहला,आतंक हिंसा की गतिविधियो को मिलने वाले महत्व से अन्य को वैसी ही कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करती है।
दूसरा,ज्यादा माध्यम कवरेज से यह संभव है कि राज्य के उत्पीड़न में इजाफा हो।यही स्थिति आतंकवादी पैदा करना चाहते हैं।इससे उन्हें अपने लक्ष्य के विस्तार में मदद मिलती है।इस तरह वे राज्य के उत्पीड़न को आमंत्रित करते हैं।जिसका आम जनता के ऊपर बुरा असर होता है।
तीसरा,आतंकवाद का नियमित या विस्तृत कवरेज आम जनता के अंदर भावशून्य स्थिति पैदा करता है।लेकिन कुछ माध्यम विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माध्यम कवरेज ‘सेफ्टी वाल्ब’ की भूमिका अदा करता है।
माध्यम कवरेज से पैदा होने वाली भावशून्यता से आम जनता में सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।वह आतंक और हिंसा को सच्चाई के रुप में देखने लगती है।नैतिक और राजनीतिक तौर पर उसके अन्दर प्रतिरोध का भाव खत्म होने लगता है।सामाजिक तौर पर भावशून्यता की स्थिति पैदा हो जाती है।यह वस्तुत: हिंसा की प्रकृति का विस्तार ही है।भावशून्यता की स्थिति पैदा करने में एक और तत्व मदद करता है वह है आतंकवादी को आतंकवादी की बजाय किसी और नाम से पुकारना।
मसलन् ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी न कहकर ‘जेहादी’ ,’फ्रीडम फाइटर’,’तालिबान’ या इसी तरह का कोई और नाम से जब पुकारा जाता है तो हम उसको जनता से जोड़ने और आतंकवादी गतिविधियों को वैधता प्रदान करने का काम करते हैं।इसी तरह यदि आतंकवादी को सामाजिक नियंत्रण से परे रुपायित किया जाये तब भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।
आतंकवादी गतिविधियों को अमूर्त या निर्वैयक्तिक रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।आतंकवादी कार्रवाई को सिर्फ ‘नुकसानदेह’ घटना के रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है। भावशून्य या संवेदनहीन हो जाने के कारण हिंसा का स्तर बढ़ जाता है,आतंकवादी प्रभाव में वृध्दि हो जाती है,पहले से ज्यादा लोग शिरकत करने लगते हैं।
आतंकवादी हिंसा का एक सिरा हिंसाचार से जुड़ा है तो दूसरा सिरा माध्यमों में प्रस्तुत हिंसा एवं आतंक के कार्यक्रमों से जुड़ा है।आतंकवाद पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरुरी है कि जनमाध्यमों में धर्म,हिंसा और आतंक के कार्यक्रमों पर अंकुश लगाना जरुरी है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के वैचारिक स्रोत पर भी पाबंदी लगाने के बारे में विचार किया जाना चाहिए।वे तमाम कार्यक्रम जो पुरानी मान्यताओं,आचार-व्यवहार,संस्कारों आदि को धारावाहिकों के जरिए प्रसारित करते हैं उनसे आतंकवाद और तत्ववाद को वैचारिक मदद मिलती है। जब तक इस क्षेत्र में प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते तब तक आतंकवाद या तत्ववाद को वैचारिक तौर पर परास्त करना असंभव है।संस्कृति-उद्योग के विकास की गति देखते हुए और बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों को देखते हुए यह कार्य असंभव लग रहा है। फिर भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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आज से पांच वर्ष पूर्व पानीपत के पास समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट हुआ था जिसमें 68 लोग मारे गए थे। इस केस में स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा तथा देवेन्द्र गुप्ता कारागार में निरुद्ध हैं। राम जी व संदीप को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है और इनके ऊपर दस-दस लाख का इनाम भी घोषित है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इंदौर निवासी कमल चौहान को गिरफ्तार किया है। कमल चौहान ने मीडिया के समक्ष कहा है कि मैंने जो किया वह अपनी मर्जी से किया राष्ट्रीय जांच एजेंसी का कहना कि समझौता एक्सप्रेस की जिस बोगी में बम विस्फोट हुआ था उस बोगी में दिल्ली में कमल चौहान ने बम प्लांट किया था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पंचकुला की अतिरिक्त सत्र न्यायधीश कंचन माही की अदालत में पेश किया जहाँ पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी को पुलिस कस्टडी रिमांड मिल गया।
आरोपी कमल चौहान के पिता राधेश्याम ने कहा है कि कमल चौहान आर एस एस के माध्यम से समाज सेवा कर रहा था लेकिन इस तथ्य के विपरीत वह सुनील जोशी का नजदीकी था। सुनील जोशी का कई बम विस्फोटो में नाम आया था। बाद में सबूत मिटाने के लिये उसके ही साथियों ने उसकी हत्या कर दी थी। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आर एस एस की विद्यार्थी शाखा स्थापित करने का काम करने के लिये कमल चौहान को ही जिम्मेदारी दी गयी थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कहना है कि कमल चौहान हमारा जिम्मेदार कार्यकर्ता नहीं था।
अब यह सवाल उठता है कि मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ जैसे बम कांडों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके अनुसांगिक कार्यकर्ताओं के नाम बराबर आये हैं लेकिन उसके ऊपर आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के बहुत सारे प्रमाण मिलने के बाद भी प्रतिबन्ध की बात नहीं की जा रही है। आज जरूरत इस बात की है कि देश की एक और अखंडता की हिफाजत के लिये मजबूत राष्ट्र के लिये ऐसे देशद्रोही संगठनो पर प्रतिबन्ध लगाया जाए अन्यथा इनकी नीतियाँ देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को कमजोर करेंगी अभी कुछ दिन पूर्व इनके कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तानी झंडा फहराकर हिंसा भड़काने की कोशिश की थी लेकिन जांच में यह तथ्य तुरंत प्रकाश में आ गया कि पाकिस्तानी झंडा अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों ने नहीं फ़हराया था बल्कि दंगा करने के लिये तथा अल्पसंख्यकों को बदनाम करने के लिये आर एस एस के लोगों ने ही झंडा फ़हराया था।

-मुहम्मद इमरान

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प्रधानमंत्री आवास के पास इजराइली दूतावास की कार में विस्फोट के बाद इजराइल ने विस्फोट के पीछे ईरान का हाथ बताया है। यह बात कहीं से समझ में आने वाली नहीं है। ईरान और भारत के अच्छे सम्बन्ध है। भारत अपने पेट्रोलियम पदार्थों की पूर्ती ईरान से लेकर करता है जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर आधारित हैं। अमेरिकी इजराइली गठजोड़ काफी समय से ईरान के ऊपर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर भी दबाव डाल रहा है कि वह ईरान से अपने हितों को त्याग कर सम्बन्ध विच्छेद कर ले। उसी कड़ी का एक षड्यंत्र कार बम विस्फोट भी हो सकता है। भारत को इन देशों की हरकतों के ऊपर गंभीर रूप से नजर रखने की जरूरत है। काफी दिनों से आर्थिक रूप से विश्व मानचित्र पर उभर रहे भारत को पिछाड़ने के लिये चाइना युद्ध की बात पश्चिमी मीडिया द्वारा व्यापक स्तर पर प्रचारित की जाती रही है। हमारे देश को ऐसी घ्रणित चालों से होशियार रहने की जरूरत है।

ईरान का कहना कि –
ज़ायोनी शासन के अधिकारियों ने सोमवार को नई दिल्ली और तिबलिसी में संदिग्ध आतंकवादी घटना में ईरान का हाथ होने की बात कही है। भारतीय अधिकारियों के अनुसार नई दिल्ली में सोमवार को इस संदिग्ध आतंकवादी घटना में इस्राइली दूतावास की एक इनोवा कार के पीछे एक मैग्नेटिक बम चिपका कर धमाका किया गया जिसमें भारत में इस्राइली कूटनैतिक की पत्नी तथा कार चालक घायल हो गये।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रामीन मेहमान परस्त ने इस आरोप का खंडन करते हुए उल्लेख किया है कि इस्राइल इन घटनाओं में ईरान पर आरोप लगाकर अवैध अधिक्रत फ़िलिस्तीन में अपने अत्याचारों तथा इसी प्रकार ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या के संदर्भ में विश्व समुदाय का ध्यान भटकाना चाहता है।
इसी प्रकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि संभवतः ईरान की छवि ख़राब करने के उद्देश्य से इस्राइल ने इस संदिग्ध घटना का षडयंत्र रचा हो।
जासूसी संस्था मूसाद जिस शैली को ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में प्रयोग करती रही है उसी शैली का नई दिल्ली की आतंकवादी घटना में भी प्रयोग किया गया है।
कुछ दिन पहले ब्रिटेन की साप्ताहिक पत्रिका टेलीग्राफ़ ने ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में मूसाद की भूमिका के संदर्भ में विवरण देते हुए लिखा था कि एक गोपनीय बैठक में मूसाद के पूर्व प्रमुख ने आतंकी गुट केदून को ईरानी परमाणु वैज्ञानिको की हत्या के आदेश दिये थे।
ज़ायोनी शासन के एजेंट अब तक अनेक आतंकवादी घटनाएं अंजाम दे चुके हैं, सन् 1995 में मालटा द्वीप में फ़िलिस्तीन के इस्लामी जेहाद आंदोलन के संस्थापक फ़तही शक़ाक़ी तथा संयुक्त अरब इमारात में फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोधक आंदोलन हमास के वरिष्ठ कमांडर की हत्या इस शासन द्वारा अंजाम दी गयी आतंकवादी घटनाओं के कुछ उदाहरण हैं।
निःसंदेह ज़ायोनी शासन कि जो स्वंय आतंकवाद की पैदावार है संदिग्ध आतंकवादी घटनाओ के बारे में निराधार दावे करके अपनी अत्याचारपूर्ण नीतियों पर पर्दा नहीं डाल सकता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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दिल्ली हाई कोर्ट के गेट नंबर पांच पर बम विस्फोट कर 12 लोगों की हत्या कर दी गयी जिससे सामान्य जनों में दहशत का भाव भी पैदा हुआ और जिन परिवारों के सदस्यों की हत्या हो गयी या घायल हैं उनकी तकलीफों को भी आसानी से समझा नहीं जा सकता है लेकिन सामान्य जन शोक संवेदना के अतिरिक्त कर भी क्या सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय खुफिया एजेंसी इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया तरह-तरह की सगूफेबाजी करके अपनी गैर जिम्मेदाराना स्तिथि का परिचय दे रहे हैं। घटना के बाद ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया खुफिया सूत्रों के हवाले से प्रचार करना शुरू कर दिया कि इसमें हूजी आतंकवादी संगठन ने ईमेल भेज कर बम विस्फोट कर जिम्मेदारी ले ली है। हिन्दुवत्व वादी तत्वों ने अफजल गुरु की फांसी से बम विस्फोट को सम्बद्ध कर दिया और तरह-तरह की बयानबाजी शुरू हो गयी। अगले दिन ही एक ईमेल प्राप्त होता है कि इंडियन मुजाहिद्दीन ने बम विस्फोट की जिम्मेदारी ले ली है। पुलिस ने दो व्यक्तियों के दाढ़ी नुमा स्केच जारी कर दिए हैं और कहा की संभावित आतंकी यह हैं इस तरह देश भर में उस तरह की दाढ़ी रखने वाले 18 व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया गया।
पहली बात तो यह है की यदि कोई सबूत या संदिग्ध व्यक्ति है तो उसका हल्ला इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया से मचा कर खुफिया एजेंसियां क्या साबित करना चाहती हैं। यदि कोई आतंकी हमले की आशंका है तो उससे निपटने के उपाय करने चाहिए न की उसका प्रोपोगंडा करना चाहिए। अब हो यह रहा है कि कोई भी आतंकी घटना होने पर पहले से ही इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया द्वारा एक पृष्टभूमि तैयार कर दी जाती है और एक समुदाय विशेष के लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है उनकी विवेचना का स्तर शेखचिल्ली की कहानियों की तरह होता है। विधि के अनुरूप कार्यवाई ही नहीं होती है। 161 सी.आर.पी.सी के तहत होने वाले गवाहों के बयान अघोषित रूप से प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आ जाते हैं उसके बाद विवेचना में वही सब लिख दिया जाता है जबकि 161 सी.आर.पी.सी के बयान आरोप पत्र तक गोपनीय होते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि किसी भी आतंकी घटना की जांच विधि के अनुरूप करके दोषियों को सजा कराने की है किन्तु ऐसा न करके जिम्मेदार लोग अफवाहबाजी उड़वा कर सांप्रदायिक रूप दे देते हैं। फर्जी ईमेल आदि से जिम्मेदारी ले लेने की थोथी बातों से अर्थ नहीं निकलता है। अगर इसी तरह से जिम्मेदारी लेने के आधार पर विवेचनाएं होती रहेंगी तो लतखोरीलाल भी कहेगा की अमुक आतंकी घटना मैंने की है और पूरे देश का इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया उसके प्रचार प्रसार के लिये कार्य करता हुआ नजर आएगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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