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Posts Tagged ‘डाउन लोड’

दंगे राजनैतिक लाभ के लिए करवाए जाते हैं यह तो पहले भी कहा जाता रहा है। इस बार सभी राजनैतिक दलों ने इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर लिया। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार िशंदे ने तो यहाँ तक कह दिया कि चुनाव से पहले इस तरह के और दंगे भी करवाए जा सकते हैं। 1, नवम्बर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मुज़फ्फरनगर में कुछ शरारती राजनैतिक तत्व हैं जो माहौल को खराब करने के लिए एक वारदात को दबाना और दूसरी को उछालना चाहते हैं। भाजपा पर राजनैतिक लाभ के लिए दंगा करवाने का आरोप लगभग सभी दलों ने खुले रूप से लगाया है। ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है कि दंगे का माहौल तैयार करने की शुरुआत संघ परिवार और भाजपा से जुड़े हुए नेताओं ने ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए की थी। उन्हें अपने लक्ष्य में सफल होते देख अन्य दलों के नेता समाज को बाँटने के उनके इस अभियान का विरोध करने के बजाय भड़की हुई भावनाओं पर राजनैतिक रोटी सेकने के लिए उसमें शामिल हो गए। अगर देश एंव समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अन्य दलों के नेताओं ने निभाया होता तो भी इस साम्प्रदायिक हवा को रोका या इसकी तीव्रता को कम अवश्य किया जा सकता था। कुल मिला कर यदि देखा जाए तो मूल्यविहीन और सिद्वान्तविहीन राजनीति भी इसकी ज़िम्मेदार है। बेहतर भविष्य और सेकुलर लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें राजनीति में मूल्यों और सिद्वान्तों की वकालत करने वालों को महत्व देना ही होगा।
मोबाइल : 09455571488
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा था और सरकार की आँखें बन्द क्यों थीं? सरकार के पास दंगा होने की आशंका की खुफिया जानकारी भी थी। समाचार पत्रों में दंगे की सम्भावना की खबरें छप रही थीं। धारा 144 लगा दी गई थी। फिर भी महापंचायत होने दी गई। भड़काऊ भाषण, ज़हरीले नारों और हथियारों से लैस भीड़ का दृश्य वहाँ मौजूद उच्च पुलिस अधिकारियों के सामने था। पंचायत समाप्त होने से घंटों पहले इसमें भाग लेने आए लोगों द्वारा हत्या की वारदातें अंजाम दी जा चुकी थी। पंचायत समाप्त होने के बाद प्रशासन के पास हालात को सँभालने के लिए पर्याप्त समय था। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन ने जिस तरह स्थिति से निपटने में आपराधिक लापरवाही का प्रदशर्न किया उससे साफ तौर पर लगता है कि उस समय कानून व्यवस्था बनाए रखने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि यह कहा जाए कि तीनों की मंशा एक ही थी तो गलत नहीं होगा। फिरकापरस्त दंगा करवाना चाहते थे प्रशासन उसे रोकना नहीं चाहता था और सरकार की शान्ति बनाए रखने में कोई रुचि नहीं थी। इसका कारण सरकार व प्रशासन की अक्षमता और संवेदनहीनता थी, दंगाइयों के साथ मिली भगत या दंगा उपरान्त राजनैतिक लाभ हासिल करने की जुगत। मगर सच्चाई यही है कि दंगाइयों ने हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए लाशों को जलाया, बहाया और मिट्टी के नीचे दबा दिया। प्रशासन ने फाँसी पर लटकी हुई लाशों को आत्महत्या साबित करने का प्रयास किया। एफ.आई.आर. दर्ज करने में बाधाएँ उत्पन्न कीं। सत्ताधारी दल ने इसे कभी जातीय संघर्ष बताने की कोशिश की तो कभी सरकार के मंत्रियों ने अपनी रिपोर्ट में राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों को जबरन रोक कर अपना धंधा चलाने का आरोप लगाया। इन सभी प्रयासों का मात्र एक कारण था कि दंगे की व्यापकता और जघन्यता दुनिया पर ज़ाहिर न हो। सरकार और प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की बहाली और दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के मुकाबले में तथ्यों पर परदा डालने के मायने ज़्यादा थे। यही कारण है कि सरकारी तौर पर सिर्फ 62 मौतें बताई गईं जबकि मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से कुछ और हत्याओं से परदा उठा और आँकड़ा 100 पार कर गया। हालाँकि उन सभी की प्राथमिकी अभी तक दर्ज नहीं हो पाई है। इसके अलावा एक बड़ी संख्या लापता व्यक्तियों की है जिनके बारे में आशंका है कि उनकी हत्या हो चुकी है। यही स्थिति घर छोड़ कर जाने वाले दंगा पीड़ितों की संख्या की भी है। सरकार द्वारा इसे भी कम करके बताने का हर सम्भव प्रयास किया गया और फिर दंगा पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनहीनता को छुपाने के लिए राहत कैम्प चलाने वालों को ही सरकार के मंत्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुज़फ्फरनगर, शामली व अन्य जगहों पर छोटे बड़े तीन दर्जन से भी ज़्यादा राहत कैम्प काम कर रहे थे। मुज़फ्फरनगर में सज़ाक, तौली, बासी कलां, बु़ाना, सखीपुर, जौला, जोगी खेड़ा लोई, चरथावल, मीरापुर और शामली में मलकपुर, कान्धला, कैराना, खुरगान, मंसूरा, जलालाबाद, सुंता, रसूलपुर के अलावा ग्रामीण अंचलों में छोटे बड़े राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों ने पनाह ले रखी थी। शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को अपने रिश्तेदारों और सगे
संबधिंयों के यहाँ भी पनाह मिल गई थी। इनमें कई कैम्प ऐसे थे जहाँ एक साथ दस हजार तक दंगा पीड़ितों ने शरण ली थी। प्रदेश सरकार ने कैम्पों में दंगा पीड़ितों की मदद उनके खाने पीने रहने की व्यवस्था करने का कोई आँकड़ा अब तक नहीं दिया है। कुछ कैम्पों के आयाजकों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार की तरफ से उनको एक पैसे की भी कोई सहायता नहीं मिली। समाजवादी सरकार के मुस्लिम नेता और अखिलेश सरकार के विधायक मंत्री पहले की तरह कुछ ऐसे बिन्दुओं की खोज में लगे रहे जिससे पार्टी और सरकार का बचाव किया जा सके। सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान जो उस क्षेत्र के प्रभारी भी हैं, ने दो परस्पर विरोधी भूमिकाएँ अदा करके सबको हैरत में डाल दिया। पहले तो उन्होंने मीडिया के सामने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विरोध स्वरूप आगरा में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं गए। मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल यादव और कुछ वरिष्ठ सपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। परन्तु विधान सभा के मानसून सत्र में सदन के अन्दर आज़म खान ने ही सरकार का पूरी ताकत के साथ बचाव करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। हालाँकि गृह मंत्रालय का पदभार मुख्यमंत्री के पास होने के कारण यह ज़िम्मेदारी उनकी थी। तीन चार दिनों के भीतर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ जिससे आज़म खान का ह्रदय परिवर्तन हो गया यह तो वही बता पाएँगे। परन्तु जनता इसे उनकी राजनैतिक अदाकारी के रूप में ही देखती है। जब राहुल गांधी ने यह कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के लोग मुज़फ्फरनगर के 1015 मुस्लिम नौजवान जिनके भाई बहन दंगे में मारे गए हैं, से बात कर रहे हैं तो आज़म खान ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अखिलेश सरकार के मुज़फ्फरनगर सद्भावना मिशन पर गए मंत्री समूह ने अपनी रिपोर्ट में दुर्भावना वश जब ह कहा कि मदरसे के लोग दंगा पीड़ितों को जबरन कैम्पों में रोक कर अपनी दुकान चला रहे हैं तो इस पर आज़म खान ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। हालाँकि वह यह अच्छी तरह जानते थे कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की वापसी पर उनकी सुरक्षा का कोई बन्दोबस्त नहीं किया था। उन्हें यह भी मालूम था कि जो लोग अपने गाँव गए थे उनको मुकदमें वापस लेने के लिए
धमकियाँ दी जा रही थीं। बुाना के हुसैनपुर में खेत में काम कर रहे तीन मुसलमानों की 30, सितम्बर को की जाने वाली हत्या ने साबित भी कर दिया है कि असुरक्षा की आशंका बेबुनियाद नहीं थी और मंत्री समूह की रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा गया वह बदनीयती पर आधारित था। यदि राहुल
गांधी और मंत्री समूह की रिपोर्ट को जोड़ कर देखा जाए तो यह आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है कि आई.एस.आई. और दंगा पीड़ित मुस्लिम युवकों की मुलाकात उन्हीं मदरसों में होती थी। राहुल के बयान और शिवपाल की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की इस रिपोर्ट को खुफिया एवं जाँच एजेंसियों में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों को आतंकवाद के नाम पर मदरसों को घेरने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने का अवसर प्रदान करने के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार इसे मुसलमानों को पीड़ित और प्रताड़ित कर उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करके सुरक्षा देने के नाम पर राजनैतिक ठगी जारी रखने की कोशिश भी कहा जा सकता है। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुसलमानों के हित की बात करने वाली पार्टियों ने सुरक्षा के नाम पर उन्हें गोलबन्द करके सबसे अधिक छला है। भाजपा और शिवसेना जैसे दलों ने उन्हें इसका अवसर भी खूब दिया है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों के हित की कोई बात आती है साम्प्रदायिक दल और संगठन तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। उसके बाद इन तथाकथित सेकुलर और साम्प्रदायिक दलों के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो जाती है। थोड़े समय बाद ही सेकुलर दल हथियार डाल देते हैं और मुसलमानों को यह संदेश देने में लग जाते हैं कि वह तो कुछ करना चाहते हैं परन्तु स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। केवल राजनैतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि न्यायिक स्तर पर भी मुसलमानों के मामले में यह बार बार देखने को मिला है। आन्ध्र प्रदेश में रिज़र्वेशन का मामला रहा हो या यू.पी. में आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई का मुद्दा जानबूझ कर ऐसी कमियाँ छोड़ी गईं कि अदालत में जाकर केस गिर जाए और उसके बाद फिर वही राग कि हम तो करना चाहते हैं लेकिन ़ ़ ़। अखिलेश सरकार ने तो एक तीसरा रास्ता भी निकाल लिया है। मुसलमानों के खिलाफ उसी समुदाय के लोगों को इस्तेमाल करने का। खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के मामले में पंचनामा की बात हो या फिर मुज़फ्फरनगर का दौरा करने वाली टीम में तीन मुसलमानों को शामिल किया जाना इसी नई रणनीति का हिस्सा लगता है। खालिद मुजाहिद के पंचनामे में शामिल मुसलमान यह नहीं कह पाए कि उसमें खालिद के परिवार का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दंगों की जाँच का हिस्सा रहने वाले मुस्लिम मंत्री इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि दल के अगुवा से यह कह सकें कि जिन लुटे पिटे लोगों की जाँच उन्हें करनी थी उन पीड़ितों से कैम्पों में जाकर उनका दुख दर्द भी सुन लिया जाए। ऐसे लोगों से दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर कीचड़ उछालने वाली मंत्री समूह की रिपोर्ट पर उंगली रखने की उम्मीद करना सिर्फ धोखा है। इस तरह के मुस्लिम नेता अपने समाज में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार में अपने समाज का नहीं। मुस्लिम समाज को यह सब समझना होगा और अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाना होगा।
क्रमश:
-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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अमानवीय, पाष्विक, बर्बर या ऐसी कोई संज्ञा मुज़फ्फरनगर, श्यामली और आस-पास घटित होने वाली घटनाओं को अंजाम देने वालों के लिए पर्याप्त होगी? आचर्य और बेशर्मी की बात तो यह है कि इसे जायज़ ठहराने की उसी तरह की कोशिश की गईं जिस तरह गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताने का प्रयास किया गया था। उत्तर-प्रदेश में इस तरह के साम्प्रदायिक षड्यंत्र पिछले कई दंगों के मामले में पहले ही बेनकाब हो चुके हैं। इन दंगों में आमतौर से दंगाइयों ने समाज में विष घोलने और भावनाएँ भड़काने के लिए महिलाओं के साथ अभद्रता को हथियार रूप में प्रयोग किया है। फैज़ाबाद में तो हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के साथ ही मूर्तियों के खंडित करने की अफवाह भी फैलाई गई थी। बाद में यह तथ्य खुलकर सामने आगया कि मूर्तियाँ सही सलामत थीं। उनकी वीडियो भी जारी हो गई। किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ का कोई मामला कहीं दर्ज नहीं हुआ। यहाँ तक कि कोई यह बताने वाला भी नहीं था कि पीडि़त लड़की कौन और कहाँ की रहने वाली थी। इस बात के भी कई प्रमाण मिले कि दंगा पूर्व नियोजित था और लड़की के साथ छेड़छाड़ या मूर्तियों को खंडित करने की अफवाह जानबूझ कर गढ़ी गई थी। मुज़फ्फरनगर, शामली, मेरठ और बाग़पत में होने वाले दंगे के लिए भी बहाना यही बनाया गया कि जाट लड़की से मुसलमान लड़के ने छेड़छाड़ की थी। हालाँकि यह बात सही नहीं थी। मामला 27, अगस्त को मोटर साइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद उपजे विवाद से शुरू हुआ था। बात बढ़ गई और कंवाल ग्राम निवासी शाहनवाज़ की सचिन और गौरव नामक दो जाट युवकों ने चाकू मार कर हत्या कर दी। मुहल्ले के लोगों ने इन दोनों हमलावरों को भी मार डाला। दोनों पक्षों की तरफ से लिखवाई गई एफ.आई.आर. में भी मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर को ही विवाद का कारण बताया गया है। इस घटना से फिरकापरस्तों को पीढि़यों से चले आ रहे मुसलमान-जाट शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व को दंगों की आग में जलाने का मौका मिल गया। नफरत के सौदागरों ने मोटर साइकिल-साइकिल टक्कर की जगह लड़की के साथ छेड़छाड़ का प्रचार करना शुरू कर दिया। इस आग में घी डालने के लिए यू ट्यूब से पाकिस्तान की एक वीडियों डाउन लोड की गई जिसमें कुछ दाढ़ी टोपी वालों को एक व्यक्ति की पिटाई करते दिखाया गया था। इस वीडियो द्वारा प्रचारित किया जाने लगा कि मुसलमान जाट लड़के की पिटाई कर रहे हंै और विभिन्न माध्यमों से इसका बहुत व्यापक स्तर पर वितरण होने लगा। कथित रूप से यह काम भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम ने किया था। वातावरण इतना दूषित कर दिया गया कि इससे निपटने के लिए विभिन्न खापों ने पंचायतों का दौर शुरू कर दिया और 7, सितम्बर को कई खापों ने मिलकर ’बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत बुलाई जिसमें जमकर साम्प्रदायिक भाषण बाज़ी हुई। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगा भड़क गया। एक बार फिर यह प्रचारित किया गया कि पंचायत से वापसी पर मुसलमानों ने जाटों पर हमला कर दिया जिससे दंगा भड़का। यह बात सही है कि पंचायत से वापसी पर दोनों समुदाय के लोगों में कई स्थानों पर टकराव हुआ जिसमें दोनांे तरफ के लोग हताहत और घायल भी हुए थे। हमले की शुरुआत करने के मामले में परस्पर विरोधी आरोप भी हैं। परन्तु जहाँ तक दंगों की शुरूआत की बात है तथ्य कुछ और ही कहते हैं।
5, सितम्बर को एक खाप पंचायत के बाद नफीस नामक व्यक्ति को चाकू मार दिया गया। 7, सितम्बर को होने वाली महापंचायत में शामिल होने के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों के साथ मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदयिक नारे लगाते हुए लोग नगला मंदौड़ में इकट्ठा हुए। कहा जाता है कि यह संख्या एक लाख से भी अधिक थी। दोपहर में ही गढ़ी दौलत, कांधला निवासी नफीस अहमद ड्राइवर जो किराए पर महापंचायत में अपनी बोलेरो लेकर गया था उसकी हत्या कर दी गई। 4 बजे शाम में नंगला बुज़ुर्ग निवासी असगर पुत्र अल्लाह बन्दा को मार डाला गया। दिन में ही लपेड़ा निवासी फरीद पुत्र दोस्त मुहम्मद, सलमान पुत्र अमीर हसन, गढ़ी फीरोज़ाबाद निवासी नज़र मुहम्मद पुत्र मूसा, लताफत पुत्र मुस्तफा की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं के बाद फैलने वाली अफवाहों से एक बड़े दंगे की पृष्ठिभूमि तैयार हो गई। पंचायत से वापसी पर रास्ते में हथियारों के प्रदर्षन और नारेबाज़ी से कई स्थानों पर टकराव हुए और मुज़फ्फरनगर तथा शामली पूरी तरह दंगे की चपेट में आ गया। इसकी लपटें मेरठ और बाग़पत तक भी पहुँच गईं। करीब डेढ़ सौ गाँव मुसलमानों से खाली हो गए। उनके घरों को जला दिया गया। 7, अगस्त की रात से जो आगज़नी, हत्या, और बलात्कार की घटनाएँ हुईं उसे सही मायने में दंगा कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि इसका शिकार वह गरीब मुसलमान मज़दूर हुए जो पीढि़यों से जाट किसानों के यहाँ मज़दूरी करते आ रहे थे। उनके पास अपनी खेती नहीं थी। व्यवसाय के नाम पर लोहारी, बढ़ईगीरी या नाई के काम करते थे और इसके लिए भी उन्हीं जाटों पर आश्रित थे। सामाजिक स्तर पर उनकी जाट किसानों के सामने सर उठाने की भी हैसियत नहीं थी। इस एकतरफा दंगें में नौजवान, बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं की निर्मम हत्या की गई। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की एक साथ इतनी घटनाएँ उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई। इन घटनाओं को अंजाम देने का जो तरीका इक्कीसवीं सदी के मानव ने अपनाया उसका कोई उदाहरण दुनिया के किसी प्रजाति के जानवरों के इतिहास में नहीं मिलता। बुज़ुर्ग दम्पत्ति को आरा मशीन से काट कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। महिलाओं और कम उम्र लड़कियों के साथ उनके परिजनों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया। दूध पीते बच्चे को गोद में लिए हुए महिला को बच्चे समेत जि़न्दा आग में जला दिया गया। जले हुए शवों को अलग करने का प्रयास जब विफल रहा तो दोनों को एक साथ ही दफन कर दिया गया। कितने ही लोगों की हत्या कर सबूत मिटाने के लिए लाशों को नहर में बहा दिया गया, जला दिया गया या खेतों में मिट्टी के नीचे दबा दिया गया।
क्रमश:

मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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