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Posts Tagged ‘पोस्को’


अब यही फायदे दूसरों को भी दिए जाते हैं, यही कारण है कि इन मामलों परटाटा, मित्तल या जिन्दल जैसे प्रतिस्पर्धा वाले लोग भी चुप्पी साध लेते हैं।
मेरे विचार में इसी को मुख्य आर्थिक मुद्दा समझा जाना चाहिए तथा सभी सूक्ष्म बिन्दुओं तक के लिए, सभी निर्णयों के लिए तथा उड़ीसा की जनता पर इसके विपरीत प्रभाव के लिए वहाँ की सरकार को उत्तरदायी माना जाना चाहिए।
उड़ीसा की जनता इन सब बातों को कैसे सुनिश्चित करेगी? वास्तव में इस हेतु पारदर्शी प्रक्रियाओं की स्थापना जब हो जाएगी तब ही उड़ीसा की जनता इस बात के लिए आश्वस्त होगी कि जो भी धनराशि उड़ीसा में आ रही है उसकी पूर्ण निगरानी की जाती है, मगर इन निगरानी तंत्र सम्बंधी प्रक्रियाओं की स्थापना हेतु उड़ीसा की जनता को ही दबाव बनाने के लिए आगे बढ़ना होगा।
मो09453993476

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आर्थिक विश्लेषकों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष समीक्षा एवं उनके यह विचार कि भारत में उड़ीसा राज्य एवं उसकी जनता के हित के लिए पोस्को प्रोजेक्ट हस्ताक्षरित नहीं किया गया है। हम इस बात को पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर इससे कौन लाभान्वित होगा और जनता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
संभवतः यह बात रेखांकित करने योग्य है कि एक ऐसा लोकतंत्र हो जिसमें सभी की सक्रिय सहभागिता हो तथा नागरिकों का एक समूह हो जो सदा सर्तक रहे तब ही शासक वर्ग को मजबूर किया जा सकेगा कि वह जिम्मेदारी की भूमिका में आए। राज्यों का एक समूह यह देखे कि उड़ीसा की ‘रायल्टीज’ में बढ़ोत्तरी हो। समझौते के स्मृति पत्र में उड़ीसा राज्य सरकार को यह स्पष्ट आश्वासन देती है कि वह प्रोजेक्ट की प्रगति हेतु हर सुविधा प्रदान करेगी परन्तु इस बात पर चुप है कि प्रोजेक्ट के कार्यों से स्थानीय समुदायों पर क्या कुप्रभाव पड़ेगा?
उड़ीसा राज्य सरकार को जिम्मेदार बनाना:- उड़ीसा के नागरिकों को चाहिए कि वे राज्य सरकार से प्रोजेक्ट की विस्तृत योजनाओं की पूर्ण पारदर्शिता की मांग करें। क्या वहाँ के अवसरों का मूल्यांकन एवं विश्लेषण किया गया? पोस्को द्वारा जल प्रयोग का आर्थिक मूल्य क्या होगा? जो लोग बेघर हो जाएँगे। उनके नुकसान का आंकलन कैसे होगा? पास पड़ोस के कृषक वर्ग की बड़ी बरबादी होगी। कृषि उत्पादन का जो नुकसान होगा उसका आर्थिक मूल्यांकन कैसे होगा एवं लाखों कृषक परिवारों की आजीविका में जो विघ्न होगा, इन सब बरबादियों का आर्थिक मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा? यह बात तो स्पष्ट है कि उनका उद्योग लाखों प्रभावितों को रोजगार तो दे नहीं सकेगा। अब हम इन सब का तख़मीना लगा सकते हैं। कृषि मामलों का वार्षिक नुकसान 100 करोड़ के आसपास होगा। अर्थात लगभग उसी वेतन/ मजदूरी के बराबर जो इस प्लान्ट से सालाना आर्जित होगा। यह एक बड़ी धनराशि हुई। इसी से कुछ ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर, सरकार को देना ही होगा। उडि़या समाज को भी यह सुनिश्चित करना है कि सरकार इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दे।
कृषि क्षेत्र में जो हानियाँ र्हुइं उनके सरकारी अनुमान क्या हैं और जिसके लिए उड़ीसा राज्य सरकार को जिम्मेदार करार देना चाहिए। जब तक उसे बिल्कुल निष्क्रिय न मान लिया जाए। इतने अधिक भूजल उपयोग और उसके विपरीत प्रभाव सम्बंधी हानियों का उड़ीसा राज्य सरकार ने क्या तख़मीना लगाया है?
उड़ीसा राज्य सरकार की इन सब बातों से निपटने की क्या योजना है? पोस्को से प्राप्त लाभ को कृषि सम्बंधी हानियों हेतु राहत दी जा सकती है या बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं या शैक्षिक कार्यों में इन समुदायों को सुविधा प्रदान की जा सकती है। या लाभ की धनराशि से इन समुदायों हेतु लघु उद्योगों की स्थापना भी की जा सकती है। हम को यह देखना चाहिए कि उड़ीसा राज्य सरकार ने इन सब के लिए क्या योजनाएँ बनाई हैं।
वास्तव में नए रोजगार सृजन से उड़ीसा को वेतन से 120 करोड़ सालाना का अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है जिससे स्थानीय आर्थिक दशा सुदृढ़ हो सकती है। दूसरी ओर पोस्कों को भूमि लीज़ पर देने से उसे 180 करोड़ रूपये की कीमत का नुकसान उठाना पड़ रहा है। जल मूल्य की 75 करोड़ सालाना की हानि, कृषि सम्बंधी 100 करोड़ वार्षिक हानियाँ तथा प्रोजेक्ट पर 2400 से 3600 करोड़ टैक्स हानियाँ भी उठानी पड़ रही हैं।
इसके अतिरिक्त कोयले पर बाजार आधारित ‘रायल्टी’ का नुकसान और इससे सम्बंधित 12 एम0टी0/वार्षिक स्टील की जो हानियाँ हैं वे अलग हैं।

ये सब ऐसे ‘इस्टीमेट’ हैं जिन्हें ‘मेमोरैन्डमआॅफअन्डरस्टैंडिंग’ (डव्न्) के आंकड़ोंसेछनकरआईहुईसूचनाओंसेसावधानीपूर्वकहासिलकियागयाहै।इन सबके सम्बंध में उड़ीसा सरकार ने कभीपारदर्शिता नहीं दिखाई।परन्तु जो रुझान हैं वे स्पष्ट हैं। गैरमुनासिबरायल्टीकेस्तरकेकारण।जबकिउनलोगोंपरप्रत्यक्षलाभकीअपेक्षाअप्रत्यक्षहानिकाअधिकभारपड़ाहै।अबक्याउड़ीसासरकारयहजवाबदेगीकियह‘डील’ उड़ीसा के लिए क्यों बेहतर है?

सरकार के इरादे या दिशाएँ स्पष्ट हैं, जब कोई इस बात पर यह विचार करता है कि भारत का कुल ज्ञात भण्डार 18 बिलियन टन है, इसमें से 4.5 बिलियन टन उड़ीसा में है। इस 4.5 में से राज्य सरकार एक बिलियन टन पोस्को को दे देगी और इसमें से 400 एम0टी0 वह कोरिया को निर्यात कर देगी।
उड़ीसा सरकार केवल 48000 करोड़ रुपये दर्शाती है, वह उस धनराशि को नहीं बता रही है जो घोटालों में गया, न ही अवसरों के नुकसान और प्रत्यक्ष मूल्यों के नुकसान को बतलाती है। अब इन बातों पर जब प्रश्न उठाए जाते हैं तो उन्हें उड़ीसा विरोधी बताया जाता है और राजनेताओं व नौकरशाहों की मशीनरी द्वारा उन्हें धमकाया जाता है।
जब उड़ीसा सरकार के जीत हार के धागे को देखा जाता है तो यह बात सामने आती है कि पोस्को विजयी हुई, उड़ीसा राज्य सरकार के राजनेता एवं नौकरशाहों ने भी विजय प्राप्त की, अगर इस खेल में कोई हारा तो वह उड़ीसा की जनता है।
खनिज को जिस प्रकार कम दाम पर बेच दिया गया है और जिस ढीलेपन से समझौता या ‘डील’ हुई वह यह बताने के लिए काफी है कि इसके द्वारा कितनी गै़र जिम्मेदारी का परिचय दिया गया और कितनी अपारदर्शिता की गई? फिर भी अभी सब कुछ गया नहीं है। एक सृदृढ़ और निगरानी रखने वाला समुदाय सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर सकता है कि वह जिम्मेदार बने और उसे आर्थिक समझ आ जाए।
हमारा इस बात पर पूर्ण विश्वास है कि पुनर्वास या विस्थापितों के जिन मुद्दों की बात होती है यह वास्तव में इसलिए है कि पोस्को को 2,50,000 करोड़ की जो सब्सिडी लौह अयस्क के मूल्यों पर दे दी गई है, इस पर से हमारा ध्यान हट जाए।
-डाॅ0 सनत मोहंती/संदीप दास वर्मा
-अनुवादक-डाॅ.एस.एम. हैदर
क्रमश:

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यहाँ हमें तमिलनाडु से लेकर उड़ीसा, बंगाल तक के मज़दूर गाँवों में देखने को मिले। सन् 2009 में ही केरल में न्यूनतम वेतन तीन सौ रुपये से ज़्यादा था (जो वाकई मज़दूर को मिलता भी था) इसलिए अच्छी मज़दूरी के आकर्षण में दूर-दूर के मज़दूरों का वहाँ आना सहज भी था। लेकिन 2007-08 में ही अमरीका से शुरू हुए आर्थिक मंदी के दौर ने अरब और खाड़ी के देशों पर भी असर डालना शुरू कर दिया था। केरल के बहुत सारे नौजवान खाड़ी के देशों में प्लंबर, पेंटर, ड्राइवर और होटलों में वेटर, कुक जैसे कुशल और अर्ध कुशल श्रेणी के कामों में लगे हुए हैं। आर्थिक संकट ने खाड़ी के देशों को यूरोप और अमरीका से आने वाले पर्यटकों से होने वाली आमदनी को प्रभावित किया, नतीजतन अनेक लोगों की नौकरियाँ ख़त्म हुईं। नौकरियाँ गँवाकर घर लौटे केरल के ग्रामीण नौजवानों ने खेतों में किए जाने वाले अनेक कामों को खुद करना शुरू कर दिया जिससे केरल में बाहरी मज़दूरों की माँग में भी कमी आई। हालाँकि यह असर घातक नहीं थे लेकिन फिर भी इसने राज्य की अर्थव्यवस्था के लगातार गैर आनुपातिक रूप से गल्फ-मनी पर बढ़ती निर्भरता के खतरों से आगाह तो किया ही।

खेती से पलायन-विस्थापन और राज्य

एक तरफ़ यह पलायन और विस्थापन है जिसमें प्रत्यक्ष रूप से राज्य की कोई भूमिका नज़र नहीं आती लेकिन इन मामलों में भी राज्य अपनी योजना की नाकामी और श्रम बाज़ार की असंगत प्रक्रियाओं में उसके सार्थक हस्तक्षेप की कमी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। दूसरी तरफ़ उस विस्थापन और पलायन के दिनोदिन बढ़ते उदाहरण हैं जिनमें राज्य ख़ुद सक्रिय भूमिका निभाता हुआ आम लोगों को विस्थापन और पलायन के लिए मजबूर कर रहा है। कानून की मनमानी व्याख्याएँ कर या नए दमनकारी कानून बनाकर और हर तरह के विरोध पर पुलिस की बंदूक तानकर भारतीय राज्य लोकतंत्र के मामले में अमरीका से होड़ ले रहा है। पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के बदले और भी जनविरोधी नया क़ानून लाने की कोशिश, उत्तर-पूर्व के राज्यों से लेकर कुडनकुलम, जैतापुर, कलिंगनगर, दादरी, पोस्को, नियमगिरि, भट्टा पारसौल, नर्मदा घाटी, रायगढ़, प्लाचीमाड़ा, नंदीग्राम, और तमाम जगहों पर लोगों ने अपनी ज़मीनें छीनने और उजाड़े जाने की राज्य की कोशिशों के खि़लाफ़ लड़ाई लड़ी और लड़ रहे हैं।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि भारत में औसत जोत का आकार घटकर 1.06 हेक्टेयर रह गया है जो एक परिवार का पेट पालने के लिए काफ़ी नहीं। दूसरी तरफ़ ज़मीन की सीलिंग बढ़ाने के लिए हर राज्य में क़ानून बदले जा रहे हैं। हज़ारों हेक्टेयर की खेती करने के लिए काॅर्पोरेट घरानों को बुलाया जा रहा है। सामूहिक खेती की बात तो दूर, लोग अब भूमि सुधार की माँग भी भूलते जा रहे हैं। और यह तो औसत है। असल में तो बिहार, केरल और बंगाल में चैथाई हेक्टेयर से भी छोटी जोतें बहुतायत में हैं। इतनी कम ज़मीन पर संसाधनहीन ग़रीब किसानों द्वारा खेती करने से किसी भी तरह उनकी उपज इतनी नहीं हो सकती कि वे सिर्फ़ खेती के ही सहारे जी सकें। नतीजतन, खेती उनके लिए आमदनी का मुख्य ज़रिया नहीं रह जाती और जैसे ही उन्हें वाजिब लगते दाम मिलते हैं, वे खेती से किनारा कर लेते हैं।
ग़रीब ग्रामीण आबादी दो तरह के विस्थापन झेल रही है। एक तो भौगोलिक जिसमें लोग रोज़गार की तलाश में और जि़ंदा रहने के जतन में एक जि़ले से दूसरे जि़ले या एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं, कभी मौसमी तौर पर कभी स्थायी तौर पर।
एक अन्य किस्म का विस्थापन हो रहा है जिसमें वे खेती के क्षेत्र से ही विस्थापित हो रहे हैं। वे खेती के क्षेत्र को छोड़ शहरों-महानगरों में मौजूद तमाम किस्म के असंगठित रोज़गारों का हिस्सा बन रहे हैं। वे आज रिक्शा चला रहे हैं, रेहड़ी लगा रहे हैं, फेरी लगा रहे हैं, सिक्योरिटी गार्ड बन रहे हैं, सब्ज़ी बेच रहे हैं, हम्माली कर रहे हैं, इमारतें बना रहे हैं, और कल उस रोज़गार से भी बेदख़ल हो रहे हैं। वे खेती से और गाँवों से बाहर शहर में आ गए हैं, जहाँ वहीं के बंद कारखानों के बेरोजगार मज़दूरों की पहले से ही इतनी भीड़ है कि इनके लिए हाशियों पर भी जगह नहीं। न रूपक में और न ही यथार्थ में। झाबुआ, धार, रतलाम जैसे आदिवासी बहुल इलाक़ों से जो आदिवासी रोज़गार की तलाश में क़रीबी राज्य गुजरात में काँच और गेत पत्थरों के कारखानों में काम करने जाते हैं, वे वहाँ से एकाध साल में ही सिलिकोसिस की मौत लेकर लौटते हैं। अब तक हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं लेकिन त्रासदी यह है कि जिसके घर का एक सदस्य उसी सिलिकोसिस का शिकार हुआ, विकल्प के अभाव में उसी घर से दूसरा, जानते-बूझते उसी काम के लिए जाता है।
-विनीत तिवारी
क्रमश:

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